ए.फ़ैज़ुर्रहमान

पाकिस्तान की धरती पर पिछले दिनों रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के अपमान के मामले में पूर्व गवर्नर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी को बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया गया था। इन दोनों ने रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के अपमान की एक आरोपी आसिया बीबी से हमदर्दी का इज़हार किया था। इतिहास गवाह है कि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने अपने विरोधियों के साथ प्यार और हमदर्दी भरा व्यवहार का ऐसा उदाहरण पेश किया है कि रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के सम्मान में दुर्व्यवहार करने वाला भी जल्द ही हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) का प्रशंसक बन गया, लेकिन पाकिस्तानी उलमा ने अपने देश में ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के अपमान के आरोपियों से हमदर्दी का इज़हार करना भी नामुमकिन हो गया है, जिनके खिलाफ़ ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं है, कि वास्तव में इन लोगों ने ये जुर्म किया भी है?

इस बात से किसी को इंकार नहीं कि हज़रत मुहम्मद(सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) या किसी भी पैग़म्बर की शान में गुस्ताख़ी करना इस्लाम में बहुत बड़ा जुर्म है, लेकिन सिर्फ संदेह के आधार पर बगैर किसी दलील के किसी को मुजरिम मान लेना इस्लाम की आधारभूत शिक्षा के खिलाफ है। अब तक इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण भी नहीं है कि बीबी आसिया ने शाने रसूलल्लाह(सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) में गुस्ताख़ी की भी है? पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी के अनुसार आसिया बीबी पर ये सिर्फ एक आरोप है, क्योंकि उसके खिलाफ गवाही देने और शिकायत करने वाले मौके पर मौजूद नहीं थे। पाकिस्तानी अदालतें ऐसा दक्षिणपंझी संगठनों के दबाव में कर रही हैं।

इस प्रकार की घटना 1947 में भी हुई थी, जब लाहौर हाईकोर्ट के जज आरिफ इक़बाल भट्टी को इस जुर्म में कत्ल कर दिया गया था, कि उन्होंने 1995 में शाने रसूल (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) में गुस्ताख़ी करने वाले दो ईसाई लोगों को रिहा कर दिया था। प्रश्न ये है कि क्या पाकिस्तानी दण्ड संहिता की धारा 295-C में शाने रसूल (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) में गुस्ताख़ी की सज़ा इस्लामी आदर्शों की रौशनी में है? इसके आलावा ये कि इस तरह के मामलात में हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) की क्या प्रतिक्रिया रही है? वास्तव में इन सवालों के जवाब बहुत ही अहम हैं। जहाँ तक इस्लामी शरीअत का सम्बंध है, तो ये बात पूरी तरह साफ है कि हर वो कानून जो इस्लामी शिक्षा ये टकराता हो, वो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है।

दिलचस्प बात तो ये है कि खुद कुरान करीम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) पर लगाये गये आरोपों का वर्णन करके उसका खण्डन भी करती है। कुरान करीम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) को इस बात का आदेश नहीं देती कि आप अपने विरोधियों को कोई सज़ा दें। हालांकि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) को विरोधियों की इन बातों से तकलीफ भी होती थी, लेकिन रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) को कुरान की आयत ’उनकी बातों पर आप सब्र करें, और उन सबको पूरी तरह छोड़ दें(73:10)‘ इससे आपको संतोष मिल गया था। इस तरह आप नैतिकता के सर्वोच्च आसन पर बैठे हैं। कुरान करीम आप (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) और आप (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के मानने वालों को निर्देश देता है कि माफ और नज़रअंदाज़ कर दिया करो, इसलिए कि अल्लाह रहम करने वालों को पसंद करता है। एक दूसरी आयत से पता चलता है कि जब बुराई का बदला भलाई से दोगे, तो उसके और तुम्हारे बीच की दुश्मनी ख़त्म हो जायेगी, और वो तुम्हारा क़रीबी दोस्त बन जायेगा।(41:34)

आप (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने इस नसीहत को अपने ख़त में भी बयान किया है। ये कुरान की वास्तविकता है कि रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) लोगों के लिए रहम रखते थे, और कदापि कठोर हृदय वाले नहीं थे(3:159)। रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) का पूरा जीवन ऐसी मिसालों से भरा पड़ा है, कि आपने अपने जानी दुश्मनों की बुरी बातों औऱ व्यवहार को भी क्षमा कर दिया। एक यहूदी व्यक्ति इस्लाम धर्म के सुधारवादी आंदोलन का कड़ा विरोधी था। उसने रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) को अस्सामो अलैकुम (अर्थात आपकी मृत्यु हो, बर्बाद हों) कहा, हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हा) ने इसके जवाब में कहा कि ‘तुम्हारी ही मृत्यु हो, बर्बाद हो’ आप (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने इस पर सख्त नाराज़गी का इज़हार किया और कहा “खामोश रहो, और अच्छे बनो”। जब सहाबा इकराम (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) ने रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) से इस यहूदी को सबक़ सिखाने की इजाज़त मांगी, तो रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने उन्हें मना कर दिया। (सही बुखारी)

एक दूसरी रवायत के मुताबिक एक यहूदी ने आप (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) से अपना क़र्ज़ इस बुरे अंदाज से मांगा कि सहाबा इकराम (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) को गुस्सा आ गया, और सब उसकी ओर लपके, लेकिन रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने सबके मना कर दिया और कहा ”क़र्ज़ देने वाले को अपना क़र्ज़ सख्ती से मांगने का अधिकार है“। इसके आलावा रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए फरमाया “धरम में ज़्यादती करने से बचो, इसलिए कि तुमसे पहले वाले लोग इसी वजह से मृत्यु को प्राप्त हुए और बर्बाद हुए हैं।”

कुरान और हदीस से किसी ऐसी बात का सुबूत नहीं मिलता कि रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) का अपमान करने वाले की सज़ा मौत है। मन में ये सवाल आना स्वाभाविक है कि जब खुद रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) इस्लाम के स्पष्ट दुश्मन को माफ कर सकते हैं, तो क्या पाकिस्तानी उलमा एक ग़रीब महिला को क्षमा नहीं कर सकते, जिसे इस्लाम से कोई शिकायत नहीं, और सिर्फ शक के आधार पर उसको अपराधी मान लिया गया है?

एक व्यक्ति ने ये ऐलान भी कर दिया है कि आसिया बीबी को अदालत से बरी किये जाने पर जो भी उसकी हत्या करेगा, उसको वो छः हज़ार डालर इनाम देगा। ये व्यवहार उस धर्म और उस रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के नाम पर किया जा रहा है, और ऐसे रसूलल्लाहू (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) से प्रेम के नाम पर किया जा रहा है, जिनके पूरी मानवता के लिए दया होने में कोई शक नहीं है, क्योंकि खुद कुरान ने रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) को ये उपाधि प्रदान की है।

संक्षेप में ये, कि इस तरह का घटिया व्यवहार पूरे विश्व में इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दे रहा है। हिंसा और इस्लामोफोबिया में गहरा सम्बंध है। दोनों एक दूसरे से ताक़त प्राप्त करते हैं। क्या 2005 ई. में डेनमार्क में कार्टून का प्रकाशन धार्मिक व्यक्तित्वों को बदनाम करने की योजनाबध्द साज़िश नहीं थी? वास्तव में इस प्रकार की योजनाबध्द साज़िशें सिर्फ साम्प्रदायिक नफरत को ही हवा देती हैं। इसलिए न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि अच्छी सोच रखने वाले हर नागरिक को विश्व में शांति की स्थापना के लिए उठ खड़े होना चाहिए और उन नापाक कोशिशों की भरपूर निंदा करनी चाहिए।

मैं ये भी बता देना उचित समझता हूँ कि मुसलमानों में हिंसा को प्रोत्साहन का अकेला कारण मुस्लिम समाज में पेट्रो-डालर की रेल पेल है, और पूर्वाग्रह से ग्रस्त वक्ता व कट्टरपंथी धार्मिक लोग भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं। इन्हीं लोगों के धोखे में आकर मुसलमान आपसी भेदभाव की नदी में डूबते और संप्रदायों में बंटते जा रहे हैं। हर संप्रदाय दूसरे संप्रदाय को गुमराह कहता है, और उसे कमतर समझता है। इस स्थिति का अकेला हल ये है कि मुसलमान आपस में मिल बैठ कर अपने अपने ख़यालात का इज़हार करें, और इस्लाम का सही रूप पेश करने के लिए सम्मेलनों का भी आयोजन करें, और रसूलल्लाह (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) के तरीके पर पूरी तरह अमल करें, इसी में मुसलमानों की कामयाबी का राज़ छिपा है।

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

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