by –वीरेंदर भाटिया

” मेरे एक मित्र अक्सर कहते हैं कि मुल्क की आबादी को समाजशास्त्र और धर्म शास्त्र से भी पहले अर्थशास्त्र समझाया जाना चाहिए। क्योंकि तमाम समाजवादी और धार्मिक कृत्यों के पीछे सीधे या टेढ़े अर्थ जुड़ा रहता है। तमाम धार्मिक चेहरों के पीछे भी अर्थ खड़ा है। तमाम धार्मिक भीड़ के पीछे भी अर्थ खड़ा है। भीड़ में अकेले अकेले आदमी का मनोबिज्ञान पढा जाये तो प्रत्येक का पहला मकसद अर्थवान होना है, मोक्ष वोक्ष का भरम वे बाबाओं से बेहतर जानते हैं।
सूत्र बताते हैं कि डेरा सच्चा सौदा तेजी से अपने आर्थिक पतन को हासिल हो रहा है। ताजा खबर यह है कि डेरा सच्चा सौदा के पास लंगर पकाने के लिए भी पैसे नही बचे हैं।
इस एक खबर में दो तत्व समाहित है। पहली यह कि प्रत्येक संस्थाएं समाजवाद या सेवा के मुखौटे में चलती है लेकिन मुखोटे के पीछे मकसद खुद को स्थापित करना ही होता है
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख जब जेल चला गया तो पीछे कोई सेकंड लाइन पूरे अधिकार के साथ डेरा चलाती ऐसी व्यवस्था नही होने दी गयी।
एकल अधिपत्य की भावना में रत आदमी समाजवादी धारणा का सबसे बड़ा दुश्मन है, यह इस उदाहरण से समझा जा सकता है। एक संस्था को ख़त्म करने का कोई सबसे बड़ा गुनाहगार है तो वह राम रहीम है लेकिन राम रहीम को शहीद करार देंगे श्रद्धालु, मुजरिम नही।
दूसरा पहलू यह है कि जो लोग परमार्थ के लिये सेवा डालते थे उनका भी गणित था। उनके दिमाग मे ठूंस ठूंस कर भरा है कि आप एक रुपिया भी सेवा में डालेंगे तो हजार गुना वापस देगे सतगुरु जी। अब सतगुरु जी के खुद के पसीने छूट रहे हैं तो अर्थशास्त्र तमाम धर्म शास्त्रों पर हावी हो गया तमाम समाजशास्त्र नीचे दब गए श्रद्धालुओं के अर्थशास्त्र के। अब सेवा के पैसे नही आते।
डेरा मैनेजमेंट ने एक औऱ आत्मघाती खेल खेला कि राम रहीम के वापिस आने की खबरे फेंकते रहे श्रद्धालुओं के बीच । पत्तों में, रोटी में दर्शन तक करवा दिए उन्हें। किसी न किसी पर्व या आयोजन के बहाने भीड़ इकठा करने के कई असफल प्रयास कर चुकी मैनेजमेंट। छ्त्रपति केस तक तो कुछ लोग आते रहे लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल गई है। डेरा मुखी की छाया से निकलने की कोई रणनीति ना डेरा मैनेजमेंट के पास है ना डेरा मुखी चाहता है कि डेरा उसके बिना चले । सेवा भावना की पोल इससे बडी क्या होगी कि सेवा सेकंडरी है, डेरा मुखी का वर्चस्व प्राइमरी है।एकल आदमी संस्थाओं, परिवारों, पार्टियों , संगठनों का हश्र यही होता है। 2017 में लिखा एक लेखछत्रपति को गणित नही आता
एक छोटे से अखबार का भला क्या गणित होता है। कुल जमा पांच हजार प्रतियां बिक जाएं रोज तो अखबार सिद्ध और प्रसिद्ध हो जाये। बिक रही प्रतियों के हिसाब से विज्ञापन मिल जाएं तो अखबार का खर्च ठीक चलता रहे और विस्तार पर कुछ सोचा जा सके। सिरसा में अखबार के कुल पाठक ही 5000 होंगे उनमे बहुतो के पास सांध्य दैनिक नही आता, कुछ के पास कोई दूसरा अखवार आता है, कुछ बाबा के चेले है और कुछ विज्ञापन दाता बाबा के डेरा से कारोबार से जुड़े है , कुछ को राशिफल पढ़ना है जो छत्रपति नही देते और कुछ का हाजमा ही नही है कि वह छत्रपति का अखबार पूरा सच पचा पाए।

गणित के हिसाब से सोचिए तो फिर बचा क्या। बचा सिर्फ छत्रपति जो गणित नही समझता था। आज उस बचे हुए छत्रपति को समझने की जरूरत है जो गणित के महीन जानकारों के बीच बिना गणित के उतरता है और बहुतों का गणित बिगाड़ देता है।

गणित समझने वाला व्यक्ति अपनी बुक्कत जितने आंकड़ो में खेलता है। उसकी जिंदगी की गुना भाग इतनी ही होती है कि जिंदगी निर्विघ्न चलती रहे और इसके लिये वह गीदड़ की जिंदगी जीना स्वीकार कर लेता है जिसे मरे हुए शिकार में से बची हुई जूठन मिलती रहती है, जूठन छोडने वाला माई बाप होता है। माई बाप तमाम उम्र निरीह जानवरो का शिकार करता है। गीदड़ कभी चूं नही करता लेकिन जैसे ही माई बाप का खुद का शिकार हो जाता है , वही गीदड़ सबसे ज्यादा मुखर होता है।

छत्रपति को यह गणित कभी नही आया। उसकी नजर बिजनेस पर नही खबर पर होती थी। आर्य समाज से चौधरी देवी लाल ट्रस्ट को जमीन देने की एक खबर थी। रात के अंधेरे में इस जमीन की रजिस्ट्री तहसील सिरसा में हुई जिसकी किसी को भनक तक नही लगी। लेकिन पूरा सच के मुख्य पन्नो पर वह खबर अगली शाम को थी। उस खबर का असर इतना बड़ा था कि सियासी तापमान में उछाल आ गया, आर्य समाज के पदाधिकारियों की तुरंत क्लास लगी । गणित समझने वाला कोई पत्रकार समझ सकता है तब की सत्ता का खौफ। और खौफ इतना ही नही बल्कि यह भी कि स्थानीय अखबारों की तब फ़ॉलोउप न्यूज़ देने की भी हिम्मत नही हुई। इस खबर के बाद हर कोई पूरा सच पढ़ना चाहता था लेकिन छत्रपति ने प्रसार संख्या पर कोई खास ध्यान नही दिया और सेल्स पर एक प्रभारी नियुक्त करके अपनी खबरदारी में जुटा रहा।

पूरा सच का वार्षिक सम्मेलन हुआ 20 अक्टूबर 2002 को। उस सम्मेलन में पूरा सच को पत्रकारिता की उपलब्धियां बताने की जरूरत नही थी। अखबार की रोज पाठकों को उडीक रहती लेकिन साल की वित्तीय उपलब्धि अगर छत्रपति से पूछ ली जाती तो सिरसा का सबसे ख्यात अखबार होने के बावजूद अखबार नुक्सान् में था और छत्रपति घर से हर माह पैसे डाल रहा था। गणित का होशियार आदमी अखबार की प्रसिद्धि को अवश्य भुनाता लेकिन इतना स्वाभाविक और सरल काम भी छत्रपति कर नही पाया ।

गणित तो और भी बहुत थे। मैंने 22 अक्टूबर 2002 को छत्रपति का सबसे अलग रूप देखा। वार्षिक सम्मेलन कार्यक्रम की समीक्षा हेतु छत्रपति ने मुझे बुलाया लेकिन समीक्षा की बात को परे कर उसने कहा सुन, मै डेरा की आमदनी का भंडाफोड़ करने वाला हूं। मैं जिंदगी में पहली बार छत्रपति के विराट रूप से डर गया था। मैंने कहा, प्रधान जी क्यो जान जोखिम में डालते हो। छत्रपति अपनी अलमारी से किताब निकालते हुए मेरी और पीठ किये खड़े थे। और यकीनन उनकी पीठ थी तभी मैं यह कहने का साहस कर पाया कि बच्चे पाल लो प्रधान जी। बाकी भी तो चला रहे हैं अख़बार। यदि उनकी आंख से मेरी आँख मिल रही होती तो मैं यह बात कह नही पाता। उन्होंने मेरी और मुड़ते हुए मेरी आँख में आंख डाल दी। बोले,,- तू कभी नही मरेगा।” मैंने उनकी आंख में निडरता देखी। वहां गणित नही था। मैं किस गणित की बात कर रहा हूं। डेरा सच्चा सौदा छत्रपति को इतने रुपये देने को राजी था कि वह a4 अखबार साइज से सीधे बड़ी अखबार का सेटअप डाल लेता। गणित जानने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगो ने डेरा के साथ खूब पहाड़े खेले है। एक दूनी दूनी और 10 दूनी एक करोड़। डेरा ने कहा सत्यवचन। जिस दिन आदितय इंसां पकड़ा जाएगा उस दिन सबके पहाड़े उजागर होंगे।

छत्रपति धर्म पर खड़ा था। छत्रपति अधर्म के खिलाफ खड़ा था। धर्म और अधर्म के घालमेल के लिए गणित की जरूरत होती है लेकिन धर्म को जब अधर्म के खिलाफ़ आवाज उठानी होती है तब उसे सबसे पहले गणित को ही बाहर करना होता है।
22 अक्टूबर 2002 की रात मै सोया नही। छत्रपति ने साध्वी की चिठी क्यो छापी जब कोई भी छापने को राजी नही था। क्या छत्रपति सच जानता है । क्या छत्रपति साध्वी से मिल चुका है। रणजीत सिंह की खबर के पीछे छत्रपति ही क्यो लगा है। रणजीत सिंह का कत्ल हो गया है यह खबर भी छत्रपति ही निकाल कर लाया। रणजीत सिंह के कत्ल की कहानी बना कर उस पर मिट्टी डाली जा चुकी थी, छत्रपति ने उस कत्ल को खबर बना दिया। क्यो छत्रपति शुदायी बना हुआ है। क्यो छत्रपति इस कदर बेचैन है। क्यो छत्रपति डेरा सच्चा सौदा से डर नही रहा। क्यो रणजीत के कत्ल के बाद डरने की बजाय छत्रपति और मुखर और निडर हो गया है। क्या छत्रपति साध्वी को जुबान दे बैठा है कि बहनो की लड़ाई हम लडेंगे।
छत्रपति के इस व्यक्तित्व को गणित के किसी परिमाप में नापा नही जा सकता । छत्रपति की लड़ाई परिणति तक पहुंची है
बाबा जेल में बैठा सोचता होगा कि गणित की इस दुनिया मे सब लोग गणित के फार्मूलों में फिट नही होते। कुछ लोग छत्रपति भी होते हैं।
वएक छोटा छ्त्रपति

2002 में छ्त्रपति चले गए। 2001 से 2002 उनके निधन तक मुझे उनका सानिध्य मिला। वे मुझसे काफी बड़े थे उम्र में, लेकिन बातचीत में वे बड़े होने का दम्भ नही रखते थे। बातचीत में उनसे समन्वय स्थापित करना आसान था। सम्प्रेषण का यह गुण बड़े लोगों मे कम होता है। वे अक्सर कहते थे कि मेरी दोनों बेटियों का रुझान कविता की ओर है। छोटा बेटा अरिदमन उन दिनों ज्यादा छोटा था इसलिए बचा बड़ा बेटा। उनका रुझान पूछते तो वे अक्सर चुप हो जाते। फिर कहते, पता नही यार, क्या करेगा ये लड़का। अपनी मस्ती में से निकलता ही नही। फिर संतोष की एक सांस छोड़ते कि वैसे तो सब कामो में ठीक है लेकिन अबूझ है लड़का।
मैं सिर्फ छ्त्रपति को जानता था 2002 तक। छ्त्रपति परिवार के किसी अन्य सदस्य से नही मिला था। छ्त्रपति की हत्या के बाद अंशुल से पहली बार पूरा सच आफिस में मिला। वह अबूझ लड़का तब 25 साल का रहा होगा। छ्त्रपति की कुर्सी पर बैठा वह लड़का मुझे भी अबूझ ही लगा। पढ़ने लिखने में अंशुल की रुचि अपने बहन भाईयों में सबसे कम थी। और पूरा सच जैसे अखबार का वह संपादक था अब। शहर के बुद्धिजीवी अक्सर चिंता व्यक्त करते कि पूरा सच को उसी तेवर में छपते रहना चाहिए जिस तेवर में छ्त्रपति छापता था। लेकिन छ्त्रपति वाली नजर, अध्ययन और जुनून कोई कैप्सूल नही कि किसी को भी खिला दिया जाए और कोई भी आदमी छ्त्रपति के तेवर में फिट हो जाएगा। यह कोई किसी बाबे की गद्दी नही कि अध्यात्म का वह बेशक ककहरा न जानता हो लेकिन लोग उसे माथा टेकने ही लगेंगे। संपादक होना तो भीतर को उजागर करना था, संपादक होना तो भाषा, कंटेंट, तथ्यों और अखबार की प्रतिष्ठा के साथ न्याय करना था औऱ लड़का बिल्कुल अबूझ था जो संपादक था, अध्ययन वगैरह से कोई खास सरोकार नही था उसका।

मैं मिला तो अंशुल ने मुझसे कहा कि अखबार को आपका सहयोग चाहिए क्योंकि जब तक वह छ्त्रपति के इलाज और देहांत के बाद की रस्मों में व्यस्त था तब तक हम कुछ लोग पूरा सच में एक्टिव रहे। उसने एक्टिव लोगो को एक्टिव रखने की पहल की। मुझसे उसने रेगुलर लेख लिखने का सहयोग मांगा। मैंने 2011 तक फिर हर रविवार उसे लेख दिया। लेकिन वह अबूझ लड़का जो पढ़ने लिखने से कोई ज्यादा सरोकार नही रखता था उसने मेरे पहले ही लेख पर संपादकीय कैंची चला दी। मुझे बुरा लगना ही चाहिए था कि कल का लड़का जिसका ज्यादा कोई सरोकार नही है लेखन से वह मेरे लेख पर कैंची चला रहा है। लेकिन मुझे बुरा नही लगा। मुझे संतोष हुआ कि छ्त्रपति का एक समान गुण छोटे छ्त्रपति मे विद्यमान था जो अखबार के तेवर को बचाएगा । छ्त्रपति भी संपादन में बेहद निर्दयी थे और किसी की लिहाज नही करते थे। मैं अंशुल को बहुत कम आंक रहा था औऱ उसी आकलन अनुसार अपने लेख का स्तर रख पाया लेकिन अंशुल ने पहले ही लेख में बताया कि गुणवत्ता में कमी बर्दाश्त नही। मैने उत्तरोत्तर अच्छे लेख दिए, सुधार किया स्वयं में।
उनके एक मित्र हैं लेखराज ढोट। वकील हैं। असल मे वे छ्त्रपति के दोस्त थे। उनके साथ रहते थे हमेशा। लिखते भी थे। लेखराज ढोट छ्त्रपति की पसंद के लेखक थे। छ्त्रपति के निधन के बाद वे साये की तरह अंशुल के साथ रहे। वे लेख लिखते और कई बार ऐसा होता कि अंशुल पूरे लेख पर लाल पेन चला देते । लेखराज तिलमिला कर रह जाते लेकिन अंशुल की संपादकीय कैंची के बिना नही ही छप पाता वह लेख।

वह अबूझ लड़का खेत जोतता हुआ सीधे संपादक की कुर्सी पर आ बैठा था। उसने अब खेत के साथ साथ अखबार संभालना था, अखबार के प्रति लोगो की अपेक्षाओं पर पूरा उतरना था, उसे परिवार संभालना था, और इन सबसे बढ़कर उसे छ्त्रपति की लड़ाई को आगे ले जाना था, छ्त्रपति के केस को आगे ले जाना था और सामने दुश्मन इतना बड़ा कि कोई कल का लड़का क्या ही सामना कर ले और वो भी ऐसी परिस्थितियों में जब सब ही बिके जा रहे थे, जब सब ही गणितज्ञ हुए जाते थे कि लाभ का तलपट कहाँ और कैसे बनेगा। अंशुल ने छ्त्रपति को गोली लगने से लेकर छ्त्रपति के अंतिम संस्कार के दिन तक देखा कि छ्त्रपति की देह रोज कुछ कुछ मर रही थी और समानांतर कोई नया छ्त्रपति रोज अपना कद बड़ा कर रहा था। छ्त्रपति के अंतिम संस्कार तक छ्त्रपति के कद को अंशुल ने सही सही आंक लिया था और उस कद के अनुरुप अपने आप को इतना तेजी से ढाला की सब ही हतप्रभ थे। मुझे याद है जब पहली बार डेरा मुखी की पेशी पड़ी। अंशुल ने कहा कि छ्त्रपति की यह पहली जीत है कि डेरा मुखी को हम उसकी सेफ गाह से निकाल कर अदालत तक ले आये हैं। अंबाला में पेशी थी। डेरा ने वहां 40 हजार लोग इकट्ठा कर लिए। मीडिया का ध्यान उधर गया। अंशुल छ्त्रपति निहत्थे एक बॉडीगार्ड के साथ अम्बाला अदालत में मौजूद था। अंशुल ने मीडिया में कहा कि डेरा मुखी भीड़ दिखाकर डराना चाहता है। हम अंतिम सांस तक पूरे दम के साथ लड़ेंगे। हमे न्यायालय पर पूरा भरोसा है। यह क्या बोल रहा था छोटा छ्त्रपति जिसकी अभी अभी शादी हुई है वह जान हथेली पर रखकर 40 हजार लोगों की भीड़ के सामने निडर खड़ा है। हम चाक चौबंद चारदीवारी मे फेसबुक पर क्रांति करते कितने हीन दिखते हैं इस जोखिम भरी लड़ाई के सामने। लेकिन अंशुल डर नही सकता था क्योकि कोई भी इंसान जो छ्त्रपति के साथ कुछ दिन भी रह गया उसका डर निकल जाता था फिर अंशुल तो दिन रात उनके साथ रहा था। छ्त्रपति की आंखों में अजीब सी निडरता हमेशा चमकती रही जिसने बहुत से अंगी संगियो को निडर बनाया।
अंशुल छ्त्रपति अपने अबूझ तत्व को और जटिल करके हमारे सामने रखता गया। सच पूछिये तो वह लड़का मेरे लिए आज भी अबूझ ही है जिसने अलग अलग मोर्चों पर इतने संग्राम एकसाथ झेले। छ्त्रपति के परिवार के पास खेती के अतिरिक्त आमदनी का कोई साधन नहीं। खेती से ही वह परिवार चलाता, अखबार चलाता और केस के लिए भागदौड़ करता। उसके सामने ये विशालकाय दुश्मन जिसके पास ना साधनों की कमी थी ना धन की न सम्पर्को की । डेरा मुखी ने बेहद लालच फेंके, बेहद डर फेंके, बेहद कुटिलताये खेलीं जिसमे सरकारें बहती गयी, राजनेता बहते गये, अफसर बहते गए और लोग बहते गए । मुल्क की अधिकतर आबादी ताकतवर के साथ झट से खड़ी हो जाती है। अधिकतर आबादी का अपना कोई वजूद नही होता। अम्बाला कोर्ट में और बाद में भी अंशुल धड़ल्ले से बोला, बेबाक लिखा। लोग कहते पाए गए कि बाबा का कुछ बिगड़ना नही अंशुल अपने बाप की तरह मुफ्त में मारा जाएगा। क्या खट लिया उसके बाप ने। वे तमाम लोग दरअसल उस वक्त डेरा मुखी को बाप कह रहे होते थे। वे तमाम लोग ताकतवर की चिरौरी कर रहे होते थे । छ्त्रपति ने जब एक दिन मुझसे कहा था कि “तुम कभी नही मरोगे?” तो रह रह कर मुझे उनकी बात याद हो आती कि समझाईश लेकर आने वाले तमाम लोग अमर होने के खामखयाली ख्वाब में हैं।

डेरा मुखी ने अदालतों के बाहर भीड़ जमा की। शहर में भीड़ दिखाई, सफ़ाई अभियान के बहाने भीड़ दिखाई, सरकारें , अफसर मशीनरी भीड़ के आगे नतमस्तक होते गए, भीड दिखाकर डेरामुखी ने सरकार से जेड सुरक्षा और कोर्ट से रेगुलर बेल ले ली। ये अबूझ लड़का कहता था कि यही भीड़ इसके लिए एक दिन मुसीबत लेकर आएगी। भीड़ की आड़ में पंचकूला खेलता डेरा मुखी इस अबूझ लड़के की सूझ को सच साबित कर रहा था।

अंशुल छ्त्रपति ने कोई क़िताब पढ़ी हो मुझे जानकारी नही लेकिन किताब पढना ही पढना नही है। जीवन पढना और जीवट होते जाना दरअसल पढना है जिसे पढ़ना से आगे कढना कहते हैं। अंशुल जब कोर्ट और कानून की भाषा मे मीडिया में बोल रहा होता है तब हमें हैरान करता है कि बरसो की प्रैक्टिस वाले अधिसंख्य वकील भी कानूनी भाषा और प्रोसीडिंग इस तरह बयान नही कर पाते जो अंशुल करता रहा।

डेरा मुखी को 2017 के अगस्त में जब सजा हुई तब अंशुल बहुत बिजी हो गए। उन्होंने कुछ फोन मेरी तरफ डाइवर्ट कर दिए। उनमे एक फोन आनंद बाजार पत्रिका कोलकाता का भी था। सुब्रत बसु ने कहा कि आप पूरा सच फिर से शुरू करना चाहें तो abp सहयोग कर सकती है। हम कुछ साथियों ने यह प्रस्ताव अंशुल के सामने रखा। अंशुल ने भरी मीटिंग में कहा कि इस पूरी लड़ाई में मुझे अनगिनत आफर आये। पंजाब से भी आये जिनकी खिलाफत डेरा करता है और अन्य लोगो से भी लेकिन मैंने एक भी पैसा किसी आर्गेनाईजेशन से नहीं लिया क्योंकि डेरा सच्चा सौदा इसी ताड़ में है कि वह पूरी लड़ाई को प्रायोजित लड़ाई सिद्ध कर सके। हम किसी का सहयोग नही लेंगे। अखबार हम खुद चलाएंगे। समय बेशक और लग जाये। वह अबूझ लड़का कितनी सावधानी से बूझ रहा था पूरी लड़ाई को । मुझे उस दिन फिर इस छोटे छ्त्रपति ने हैरान किया था।

केस और पूरी कानूनी लड़ाई से सम्बंधित अनगिनत किस्से हैं (कुछ तकनीकी बातें करने के लिए मैं अधिकृत नही) जो छोटे छ्त्रपति को बडे छ्त्रपति से भी आगे ले जाते हैं। रामचन्द्र छ्त्रपति दरअसल इस लड़ाई के प्रकाश दीप की बाती हैं जिसमे तेल अंशुल छ्त्रपति बन कर जला

वीरेंदर भाटिया दस साल पूरा सच मे स्तम्भ लेखक रहे ”
प्रस्तुति- सिकंदर हयात 9971712174