by — पुण्य प्रसून बाजपेयी

जन्म काबुल में । पिता कंधार के । बचपन मुफलिसी मे बीता । संघर्ष जिन्दगी की पहचान थी । 1973 में फिल्म दाग से फिल्मी सफर की शुरुआत हुई । पहचान डायलाग डिलिवरी की बनी । फिल्म कोई भी हो । स्किरप्ट राइटर कोई भी हो लेकिन खुद के डायलाग खुद ही लिखेगें । और डायलाग इतने असरदार की फिल्मो की पहचान ही डायलाग किसने लिखा इससे भी बनने लगी । और उस शख्स की मौत की खबर जब बरस के पहले ही दिन आई तो 70-80 के दशक में फिल्मो के शौकिनो में नास्टालाजिया छा गया । जाहिर है जिसने भी 70-80 के दशक को लडकपन में जिया है । स्कूल से भाग कर फर्स्ट डे फस्ट शो देखा है उसके लिये नायको की छवि के बीच चाहे अनचाहे ये शख्स रगो में दौडने लगा । फिर चाहे नायको की कतार में दिलीप कुमार हो या राजेश खन्ना य़ा फिर अमिताभ बच्चन या गोविन्दा ही क्यो ना हो । चाहे-अनचाहे इस शख्स की अदाकारी और स्क्रिन पर डायलग डिलिवरी की टाइमिंग और हास्य की अदाकारी मौत की खबर के साथ काकटेल बन कर हर जहन में समायी जरुर । लेकिन कल्पना किजिये जिन्दगी को जिस अंदाज में किसी शख्स ने बचपन में अपनाया हो और मौका मिला तो अपनी भोगी हुई जिन्दगी को डायलाग के आसरे पर्दे पर उभार दिया । और देखने वालो ने इसे दिल से महसूस किया । लेकिन इस समझ को बहुत कम लोग जानते होगें कि जिन हालातो को कादर खान के पिता ने अफगानिस्तान में रहते हुये जिया उस दौर अतिवामपंथी सोच रुसी और चीनी मिजाज को जीते हुये अफगानिस्तान भी पहुंची थी । यानी गुलामी के दौर में वर्ग संघर्ष का अनकहा सच । कादर खान को तो उनकी मां लेकर बंबई आ गई क्योकि उससे पहले कादर खान के तीन भाई अफगानिस्तान में जन्म के चंद दिनो में ही मर चुके थे । तो जगह हालात बदलने की ख्नाइश समेटे कादर खान की मां इकबाल बेगम बंबई आई । पर जिन्दगी की जद्दोजहद में कादर खान को बंबई के रंग नहीं मिले बल्कि खुद की खामोशी और हालात के संघर्ष ने कब्रिस्तान में ढकेल दिया । जहा घंटो कादर खान बैठे रहते । वहा उनकी आवाज कोई सुनने वाला नहीं था तो अपने भीतर के आक्रोष को जोर जोर से बोलने में कोई परेशानी भी नहीं थी । वाकई ये किसी को भी अजब लग सकता है कि कैसे कोई बच्चा कब्रिस्तान या कहे शमशान में बैठ कर अपने भीतर के सवालो को बोल बोल कर बाहर करता होगा । पर ये हकीकत है कि कब्रिस्तान के माहौल ने बालक कादर खान की जिन्दगी में बंबई के रंग भर दिये । रंगो के खोने के बाद कब्रिसतान में कभी किसी ने बालक कादर खान को चिल्लाते हुये देखा । अपने भीतर के सवालो से जुझते कादर खान के बोल में किसी को नाटकियता दिखायी दी तो किसी को हकीकत के शब्द सुनायी दिये । और इसी कडी में उस दौर में थियेटर के कलाकार अशरफ खान ने कादर खान से पूछ लिया अभिनय करोगे । अभिनय तो किया ही नहीं है । जानता भी कुछ नहीं हूं । कोई बात नहीं अदाकारी सीखी नहीं जाती सिर्फ डायलाग याद करने होते है । और लंबे लंबे डायलाग याद कर बोलने होते है । ये तो बहुत आसान है । और संभवत इतने ही संवाद के बाद अशरफ खान कब्रिस्तान से कादर खान को उस माहौल में ले गये जो बाप के संघर्ष और कब्रिस्तान की खामोशी से बिलकुल अलग था । और कादर खान का मतलब क्या हो सकता है ये और किसी ने नहीं पहली बार दिलीप कुमार ने महसूस किया । क्योकि नाटको को करते वक्त कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को युसुफ भाई यानी दिलीप कुमार ने महसूस किया । किसी के कहने पर दिलीप कुमार जब कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को देखने-सुनने थियेटर पहुंचे । नाटक के दौरान दिलीप कुमार ने महसूस किया कि कादर खान उम्र से कही ज्यादा परिपकिव हो । तो नाटक खत्म होने के बाद कादर खान को अपने साथ फिल्म में काम करने का आफर देने से नहीं चुके । उस दौर में दिलीप कुमार को लेकर तपन सिन्हा ने सगीना फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी । जेके कपूर फिल्म प्रोड्यूस कर रहे थे । कमोवेश शूटिंग शुरु होने वाली थी । पर कादर खान के डायलाग डिलिवरी को देखकर दिलीप कुमार ने खास तौर पर पूरी फिल्म में सिर्फ एक डायलाग की जगह कादर खान के लिये तपन सिन्हा को बोलकर निकाली । अल्ट्रा लेफ्ट के आंदोलन और वर्ग संघर्ष के बीच एक गरीब मजदूर के संघर्ष को दिखलाती इस फिल्म में सिर्फ दिलीप कुमार ही नहीं बल्कि अनिल चटर्जी और कल्याण चटर्जी के साथ अपर्णा सेन सरीखे कलाकर थे जो फिल्म में अतिवाम आंदोलन चला रहे थे । लेकिन उनके नेता के तौर पर कादर खान की इन्ट्री वैचारिक तौर पर सगीना फिल्म की ही नहीं बल्कि सगीना महतो के चरित्र को जीते दिलीप कुमार को भी परिभाषित करते है । महज नब्बे सेकेंड के डायलाग में बतौर लीडर कादर खान का संबोधन और वामपंथी नेता की भूमिका में सवाल करते बंगाली थियेटर के महान कलाकार अनिल चटर्जी थे । तो कल्पना किजिये 1974 के फिल्म सगीना में कादर खान को कैसे डायलाग के लिये दिलीप कुमार तैयार करते है और तपन सिन्हा कादर खान के लिये कौन सा डायलाग लिखते है । कुछ इस तरह है फिल्मी अंदाज…. ” आज मै आप लोगो के सामने एक साधारण मजदूर की बात करना चाहता हूं जिसकी छाती में एक शेर का दिल है । जो गरीब है । लेकिन जिसके अलफाज परिवर्तन की वादी में बदलते है ।उसका नाम है सागीना महतो । सगीना दो रुपये रोज का मजदूर है । लेकिन करोडो की लागत से बनी जिस कंपनी में वह काम करता है वह उसके नाम से डरती है । इसीलिये सगीना जैसे लोगो की हमारे संगठन में जरुरत है । इसलिये हमारे नये साथी वहा जाये और उसे संगठन में शामिल करने का प्रयास करें ।
[ अनिल चटर्जी ] सगीना के मुताल्लिकात ये भी मशहूर है कि उसे शराब की लत और लंफंगेपन की आदत है ।

[कादर खान ] लफगें वह विदेशी कैपटलिस्ट है जो सदियो से गरीब मजदूर जनता का खून पीते आये है । सगीना को अगर शराब की लत है तो उसे हम धिक्कार कर अलग नहीं कर सकते ।

[ अनिल चटर्जी ] ठीक है शराबी को भी हम अपनी छाती से लगा लेगें जरुर लेकिन उसके बाद हमारी जंग के अंजाम का क्या होगा ।

[ कादर खान ] अगर इस जंग में कामयाबी हमारी नियम है अनीरुद्द बाबू तो हमे इस देश के हर सागीना को अपने साथ लाना होगा । ये लडाई गरीब मजदूर जनता की लडाई है । ये लडाई सगीना महतो की लडाई है ।

और पूरी फिल्म में कादर खान का ये डायलाग दिलीप कुमार के कद को बढाती है । वाम संघर्ष को पैनापन देती है । तो क्या आजाद भारत में जब राजेश खन्ना का दौर था । प्रेम काहनियां हर दिल अजीज थी तब वाम संघर्ष को लेकर या कहे वर्ग संघर्ष के आसरे सागीना महतो को तपन सिन्हा ने रचा । ये समाज के भीतर के विद्रोही पन का इभार था और इसी कडी में याद किजिये फिल्म मुक्कदर का सिकंदर । पूरी फिल्म अमिताभ बच्चन के ही इद्र गिर्द रेगती है । हालाकि फिल्म कई महान कलाकार है । विनोद खन्ना और अमजद खान तक । पर फिल्म के शुरु में अमिताभ ते लिय़े जो डायलाग कादर खान बोलते है वह पूरी फिल्म में अमिताभ का पिछा करती रहती है । और संयोग से ये डायलाग डिलिवरी कब्रिस्तान में है । यानी चाहे अनचाहे कादर खान खुद से [ बचपन की याद ] बाहर 1978 में रिलिज हुई फिल्म मुकद्दर का सिक्दंर के वक्त तक बाहर निकल नहीं पाये थे । तो कब्रिसतान में बालक अमिताभ बच्चन जब अपनी मां को लेकर पहुंचते है । और रो रहे है तब फकीर के तौर पर कादर कान की इन्ट्री होती है । और डायलग के ब्द इसलिये महत्वपूर् है क्योकि इसे कादर खान ने ही लिखा । जरा अंदाज देखिये….” किसकी कब्र पर रो रहे है।

[ बालक ] हमारी मां मर गई है ।

[कादर खान] देखो चारो तरफ देखो । इनमे भी कोई किसी की मां । कोई किसी की बहन है । कोई किसी का भाई है । पर शबो गम में मिट्टी के नीचे सभी दबे पडे है । ‘ मौत पर किसकी रिश्तेदारी है , आज इनकी तो कल हमारी बारी है ।

‘ बेटे इस फकीर की एक बात याद रखना , जिन्दगी का अगर सही लुप्फ उठाना है तो मौत से खेलो । सुख में हंसते हो तो दुख में कहकहे लगाओ । जिन्दगी का अंदाज बदल जायेगा ।
” जिन्दा है वो लोग जो मौत से घबराते है , मुर्दो से बदतर है वो लोग जो मौत से घबराते है । ”

सुख को ठोकर मार , दुख को अपना । अरे सुख तो बेवफा है , चंद दिनो के लिये आता है और चला जाता है । पर दुख तो अपना साथी है , अपने साथ रहता है ।
पोछ ले आंसू….पोछ ले आसूं । दुख को अपना लें । तकदीर तेरे कदमों में होगी , तू मुकद्दर का बादशाह होगा …….

और इस लंबे डायलाग के बाद स्क्रिन पर अमिताभ की इन्ट्री होती है जहा वह गीत बजता है ….रोते हुये आते है सब ..हंसता हुआ तू जायेगा ….मुकद्दर का सिंकदर कहलायेगा ।
उस दौर में शोले और बाबी के बाद सबसे कमाई वाली फिल्म मुकद्दर का सिकंदर ही रही । और सोवियत संघ में जब इस फिल्म ने घूम मचायी तो रुसी कादर खान के डायलाग ही ज्यादा बोलते सुनाई दिये ।

मौत की खबर ने अमिताभ बच्चन को कितना विचलित किया ये 2018 के आखरी दिन मौत की गलत खबर आने पर भी अमिताभ ने ट्विट कर बेटे सरफराज के हवाले से सही खबर की जानकारी दी । और अगले ही दिन यानी बरस बदलते ही 2019 की पहली खबर कादर खान की मौत की आई तो अपनी सफल फिलमो की कतार में कादर खान को मान्यता देने से भी अमिताभ ट्विट करने से नहीं चूके । लेकिन जिन दो कलाकारो की याद ऐसे मौके पर आई उसमें एक कलाकार राजेश खन्ना तो है नहीं लेकिन फिल्म रोटी समेत आधे दर्जन फिल्मो में कादर खान के लिखे शब्द ही राजेश खन्ना ने बोले और सुनने वालो ने तालिया बजायी लेकिन युसुफ भाई [ दिलीप कुमार ] तो जिन्दा है पर वह उम्र के जिस पडाव पर है और जिस बिमारी से ग्रस्त है । उसमें वह अपनी कोई प्रतिक्रिया तो दे नहीं पायेगें और ना ही दे पाये । लेकिन फिल्म सागीना में तो सायरा बानो भी थी । और अगर सायरा बानो ने दिलीप कुमार को कादर खान की मौत की जानकारी दी होगी तो आंखो में आंसू तो दिलीप कुमार के भी भर आये होगें ।