kedar-nath

पंकज शर्मा

मुझे तुमसे बड़ी शिकायत है
आखिर तुमने ऐसा क्यों किया
जो दुआएं लेकर आए थे तेरे दर पर
बदले में तूने उनको ही दर्द दिया
नहीं बरसानी थी रहमत तो ना बरसाते
कम से कम मौत का तमाशा तो ना दिखाते
अब जवाब दो…उन आंसुओं का
जिन्हें तलाश है..अपने नन्हे बच्चे की
खामोश क्यों हो…कुछ कहो उनसे
जिन्हें तलाश है अपने सिंदूर की
वो देखो एक बच्चा बिलख रहा है
अपनी मां की सड़ती लाश से चिपटा हुआ
और वो भी देखो… वो आदमी रो रहा है
अपने पिता के शव के अंतिम संस्कार के लिए
कमाल का खेल है तुम्हारा…भगवान
जो तेरे घर में थे उनके घर का चिराग बुझा दिया
लाशों के ढेर पर भी तूने अपना घर बचा लिया
अरे मैं भूल ही गया…तुम तो भूत मनभावन हो
तुम्हें कहां सुहाती होंगी ये इंसानी रौनकें
तुम्हें कहां अच्छी लगती होंगी तमाम खुशबुएं
तुम्हें तो मरघट ही रास आता है
तुम्हें तो सृष्टि विनाश ही भाता है….
तुमने जो किया तुम्हारा दोष नहीं…
भक्तों की गलती है…जो उन्हें होश नहीं
अब लाशों पर बैठ कर डमरू बजाओ
दुनिया को बार बार रौद्र रूप दिखाओ
तुम्हारे दर पर अब मैं तो नहीं आऊंगा
ना मन्नतें मांगूंगा…ना दीए जलाऊंगा
अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं
जब तेरी भक्ति में ज़िंदगी की रवायत ही नहीं