by — वीर विनोद छाबड़ा

यों तो भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अनेक ऐसे पल हैं जिन्हें सुनहरे हरफ़ों में लिखा गया है। लेकिन 10 फरवरी 1952 का दिन कुछ ज्यादा ही खास है दरअसल, इस दिन भारतीय ने अपनी पहली टेस्ट विजय हासिल की थी और वो भी क्रिकेट के पितामह इंग्लैंड पर। हालांकि इंग्लिश टीम में लेन हटन, डेनिस कॉम्प्टन, बिल एडरिच, एलेक बेडसर और जिम लेकर जैसे वर्ल्ड क्लास खिलाडियों के न होने से भारतीय दर्शक बहुत मायूस थे। मगर इसके बावजूद ये भारतीयों को हराने के लिए काफ़ी थी जो अभी तक एक बार भी जीत का स्वाद से चखने से महरूम थे। इंग्लैंड पहले चार टेस्ट में सिर्फ एक टेस्ट ही जीत पायी थी।

चेपक, मद्रास में पांचवां और आखिरी टेस्ट शुरू होने से पहले भारतीय टीम परिशानियों में घिर गयी। विजय मांजरेकर, सीएस नायडू, नाना जोशी और हेमू अधिकारी जैसे नामी खिलाड़ी बाहर कर दिए गए और क्रिकेट की भाषा में 41 साल के बुज़ुर्ग लाला अमरनाथ के साथ-साथ मुश्ताक़ अली, सीडी गोपीनाथ और रमेश दिवेचा को भीतर किया गया। अगर हेमू अधिकारी फिट होते तो आउट ऑफ़ फॉर्म चल रहे छह फुटे चौड़े कंधों वाले पारसी पॉली उमरीगर भी ज़रूर बाहर बेंच पर बैठे होते।

इंग्लिश कप्तान डोनाल्ड कार ने सिक्का उछाला जो उनके हक़ में गया। चमकीली धूप में पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया। लेकिन इंग्लैंड फ़ायदा नहीं उठा पाया। अगले दिन लंच से पहले पूरी टीम 266 रन पर आउट हो गयी। कोई और दिन होता तो ये स्कोर इंग्लैंड का स्कोर बहुत कम कहलाता। मगर भारतीयों को डराने के लिए काफी था। लेकिन उस दिन ऐसा नहीं था। इंग्लैंड की टीम डरी हुई थी। खब्बू लेफ्ट-आर्म स्पिनर वीनू मांकड़ ने 8 अंग्रेज़ों को पवेलियन की राह दिखाई थी। उनकी इस शानदार परफॉरमेंस ने भारतीय टीम अति-उत्साहित थी। और ये उत्साह रनों में कन्वर्ट हुआ। भारत ने 457 रन बना डाले। चश्माधारी पंकज रॉय ने 111 और बाहर होते-होते रह गए उमरीगर ने 130 (नॉटआउट) रन बनाये और वो भी उस वक्त जब कप्तान विजय हज़ारे ने उनकी ख़राब फॉर्म के मद्देनज़र उन्हें नीचे सात नंबर पर बल्लेबाज़ी के लिए भेजा था। उस दिन उमरीगर के अंदर भी अपनी कूवत साबित करने की चाहत थी।

अब इंग्लैंड के सामने सबसे बड़ी समस्या थी, 191 की लीड को ख़त्म करना और इतना ज़्यादा वक़्त पिच पर बर्बाद करना कि भारत को कोई मौका न मिले। दो दिन पूरे-पूरे बाकी। काम मुश्किल था। टर्निंग पिच पर रुकना आसान नहीं था और फिर सामने ख़तरनाक़ स्पिनर मांकड़। इंग्लैंड की टीम चौथे दिन ही 183 रन पर ताश के पत्तों की माफ़िक ढह गयी। एक इनिंग और 8 रन से करारी हार। गुलाम अहमद और मांकड़ ने चार-चार विकेट लिए। मांकड़ की मैच फीगर थी 108 रन पर 12 विकेट। उस विजयी भारतीय टीम के एकमात्र जीवित सदस्य मीडियम पेसर 88 वर्षीय सीडी गोपीनाथ का कहना है कि स्टेडियम में मौजूद 24000 दर्शक झूम उठे थे। हम बहुत खुश थे, अनहोनी को होनी कर दिखाया। ज़ोर-ज़ोर से उछल-कूद नहीं की। बस एक-दूसरे की पीठ थपथपाई।

इस पहली-पहली जीत के लिए 20 साल और 25 टेस्ट का लंबा इंतज़ार करना पड़ा। इस जीत पर भले ही मुल्क में जश्न मनाया गया लेकिन खिलाडियों को प्रति टेस्ट 250 के मेहनताने के अलावा एक धेला भी नहीं मिला। सबसे बड़ा खामियाज़ा तो जीत के हीरो और सीरीज़ में 34 विकेट और 224 रन अपने नाम करने वाले वीनू मांकड़ को भुगतना पड़ा। उन्हें अगली गर्मियों में इंग्लैंड जाने वाली टीम में शामिल नहीं किया गया। दरअसल, उन्हें लंकाशायर लीग का ऑफर मिला था। उन्होंने क्रिकेट बोर्ड से गारंटी मांगी कि अगर उन्हें टीम में शामिल किया जाए तो वो लंकाशायर लीग के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन नहीं करेंगे। लेकिन बोर्ड ने साफ़ मना कर दिया, तुम जैसे दर्जनों स्पिनर हैं हमारे पास।