by — अभिषेक श्रीवास्तव

हम आम लोगों के दैनिक जीवन में चीज़ों और उनकी नियत जगहों का बड़ा महत्‍व होता है। जो जहां रखा था वहां न मिले तो कितनी बेचैनी होती है। ऐसा अक़सर होता है। रोज़ ही की बात है कि हम चीज़ों को उनकी जगहो से जोड़कर खोजा फिरते हैं। औरतें इस मामले में बहुत परफेक्‍शनिस्‍ट होती हैं। अगर महीने भर बाद भी एक महिला अपने घर वापस आए तो वह एक नज़र में ताड़ जाती है कि जो चीज़ जहां छोड कर गई थी, वह वहां वैसे ही है या नहीं। हलका सा भी विचलन, स्‍थान परिवर्तन पकड़ में आ जाता है। दरअसल, हर संरचना का एक इतिहास होता है। यह इतिहास हमारी स्‍मृति में होता है। सामने जो दिख रहा है यदि वह स्‍मृति में बसे पैटर्न को चुनौती दे, तो आदमी डिस्‍टर्ब हो जाता है। मैं बचपन में पहली बार नरसिंह का चेहरा देखकर डिस्‍टर्ब हुआ था। उसके बाद अर्धनारीश्‍वर को देखकर आकर्षित हुआ। आजकल यक्षिणी की एक तस्‍वीर पर मुग्‍ध हूं। मैं सोचता हूं कि पार्वतीजी को कैसा लगा होगा जब ऑपरेशन के बाद पहली बार उन्‍होंने अपने बेटे का चेहरा देखा होगा। डॉक्‍टर को अगर वाकई सर्जरी करना आता था, तो उसे मनुष्‍य के चेहरे की मनुष्‍य का चेहरा लगाने में क्‍या दिक्‍कत थी? आदमी की जगह हाथी का सिर क्‍यों लगाया?

जिसे हम एब्‍सट्रैक्‍शन या अमूर्तीकरण कहते हैं, वह वास्‍तविक जगत की चीज नहीं है। या तो वह मिथकीय है या हमारी कल्‍पनाओं का हिस्‍सा। दुनिया एब्‍सट्रैक्‍शन से नहीं चलती। इस मूर्त जगत में हर चीज़ एक पैटर्न, एक संरचना में नियत है। वह संरचना हमारी सामूहिक स्‍मृति और अनुभव से पैदा होती है। आपका पैर कट जाए तो उसकी जगह नकली पैर ही लगेगा। भूकंप में मकान टूट जाए तो उसकी जगह नया मकान ही बनेगा। बुढ़वों का दांत टूट जाता है तो नकली दांत लगवाते हैं। आंख खराब हो जाए तो बैसाखी नहीं लेते, चश्‍मा पहनते हैं। कहने का मतलब कि विक्षत वस्‍तु का जो मूल स्‍वभाव होता है, हम उसकी ओर अधिकतम जाने का प्रयास करते हैं। बंबई की बाढ़ में डूबी सड़क को तालाब मानकर कोई उसमें मछली पालन तो नहीं करने लगता? पानी उतरने के बाद हर बार बनारस के घाट से मिट्टी हटाकर सीढ़ी ही निकाली जाती है। इसलिए क्‍योंकि वहां सीढ़ी ही थी।

चार सौ साल की स्‍मृति का मतलब होता है मोटामोटी दस पी़ढ़ी। एक कालखण्‍ड में अधिकतम चार पीढि़यां जीवित हो सकती हैं। सौ सवा सौ साल पहले भी जो चार पीढि़यां मौजूद रही होंगी, उनकी स्‍मृति अधिकतम 17वीं सदी तक जाती होगी। मने रामजन्‍मभूमि विवाद की जड़ जिस कालखण्‍ड तक जाती है, वहां की सामूहिक स्‍मृति में बाबरी मस्जिद एक यथार्थ है। इस यथार्थ को तब से लेकर अब तक यानी सौ साल के वक्‍फ़े में एक राजनीति विशेष ने एब्‍सट्रैक्‍ट बनाने का काम किया। बाबरी को तोड़ा जाना इस एब्‍सट्रैक्‍शन का एक पड़ाव रहा। बाबरी हमारी पीढ़ीगत स्‍मृतियों में कैद एक मूर्तिमान सच था। इसे एक राजनीतिक विचार ने अमूर्त्‍तीकरण की प्रक्रिया में गिरा दिया। छब्‍बीस साल पहले ढांचा गिरा, लेकिन तब से हर 6 दिसंबर उस दिन की याद ने- चाहे वह शौर्य के रूप में हो या शोक में- बाबरी की आकृति को हमारे ज़ेहन में और गाढ़ा ही किया। जिस पी़ढ़ी की भौगोलिक स्‍मृति में बाबरी कहीं नहीं था, वह वहां भी कायम हो गया। मस्जिद को मंदिर बताने की बारंबार तमाम कोशिशों ने मस्जिद को इस तरह हमारे ज़ेहन में और मूर्त्‍त किया। क्‍यों? क्‍योंकि मंदिर आज भी अमूर्त्‍त है।

मंदिर बने बगैर जैसे-जैसे वक्‍त बीतेगा, हर 6 दिसंबर के साथ हर नई पीढ़ी में यह सच पुख्‍ता होता जाएगा कि ‘’आज एक मस्जिद तोड़ी गई थी’’ मने ‘’वहां एक मस्जिद थी’’। दिक्‍कत यह है कि अमूर्त्‍त ‘’राम मंदिर’’ को मस्जिद के बरअक्‍स खड़ा करने के लिए कोई तरकीब खोजना मुश्किल होता जाएगा क्‍योंकि अब तोड़ने को कुछ बचा नहीं। मंदिर बनने में जितनी देर होगी, अमूर्त्‍तन उतना ही ज्‍यादा अन्‍यायपूर्ण, अस्‍वाभाविक व बर्बर साबित होगा। धीरे-धीरे मस्जिद ‘न्‍याय’ का पर्याय बन जाएगी और मंदिर जबरन थोपे गए अन्‍याय का। अगर कभी मंदिर बना, तो यह भारतीय इतिहास में अमूर्त्‍तन के अन्‍याय का पहला और इकलौता उदाहरण होगा जिसमें गणेश के सूड़ जैसा कॉमिक तत्‍व भी नहीं होगा।

अमूर्त्‍त हमेशा सुंदर के लिए जाना जाता है। अमूर्त्‍तन की प्रक्रिया आदर्श की प्राप्ति के लिए होती है। कल्‍पना हमारा युटोपिया है। सपना है। वह आदर्श है, जो हम जीते जी हासिल नहीं कर पाते। कल्‍पना न हो तो मनुष्‍य का अस्तित्‍व पशुवत है। सोचिए, अगर कभी मंदिर बन गया तो कल्‍पना, अमूर्त्‍तन, आदर्श, सपना, सब कुछ कितना बर्बर, त्रासद, मानवरोधी हो जाएगा! जिन लोगों ने बाबरी विध्‍वंस के बाद कविता लिखनी छोड़ दी थी, वे अतिसंवेदनशील थे, कह सकते हैं वे पागल थे। गिरी हुई मस्जिद की जगह अगर कभी मंदिर बना, तब कविता लिखना छोड़ने वाले, सपना देखना छोड़ने वाले, कल्‍पना करना छोड़ने वाले, अमूर्त्‍तन में भरोसा खोने वाले पागल नहीं, सामान्‍य मनुष्‍य ही होंगे। सपने पर से सामान्‍य मनुष्‍यों का भरोसा उठ जाना मानव सभ्‍यता का अंतिम खतरा है।

जीवन-जगत सामान्‍य रहे, आदमी आदर्शों की ओर देखे, राष्‍ट्र स्‍वप्‍नजीवी बनें, समाज कल्‍पनाशील बने, इसके लिए ज़रूरी है कि जो जहां था, वहां रहे। जो जहां से हटाया गया है, उसे वहीं स्‍थापित किया जाए। सामूहिक स्‍मृतियों से छेड़छाड न की जाए। दिमाग के तहखाने अवचेतन में उथल-पुथल न होने पाए। सब कुछ सुचारु, व्‍यवस्थित, यथावत रहे। मस्जिद टूट गई तो टूट गई, ऐसा होता है। बहुत कुछ ऐसा होता है जो नहीं होना चाहिए था। उसे दुरुस्‍त भी किया जाता है। और बिगाड़ा नहीं जाता। इसीलिए ज़रूरी है कि जहां जो टूटा है, वहां वो बने। कटे हुए हाथ की जगह हाथ ही लगे, पैर नहीं। कटे हुए सिर की जगह सिर ही लगे, सूंड़ नहीं। गिरी हुई मस्जिद की जगह मस्जिद ही बने, मंदिर नहीं!

मस्जिद की जगह मस्जिद बनाना कोई आदर्श नहीं, एक सहज बात है। मनुष्‍यता की हद तक सहज। मस्जिद की जगह मंदिर बनाना एक सपना है। ऑश्वित्‍ज़ की हद तक भयावह सपना।