by — राकेश कायस्थ

डिस्क्लेमर पहले और असली बात बाद में। बिना पढ़े, समझे और तार्किक हुए जिनकी भावनाएं आहत होती हैं, वे कृपया अपनी आंखें बंद कर लें। दूसरी बात यह कि मूर्खों के लिए मेरे मन में गहरा सम्मान है। लेकिन मित्र मंडली में मूर्ख मंडली का कोटा दस परसेंट पर फिक्स्ड है। इसलिए तीन बदत्तमीजियों के बाद शिशुपाल एक्ट के तहत मैं बाहर का रास्ता दिखा देता हूं।

अब आता हूं असली बात पर। मैं आरएसएस को एक अतार्किक गैर-जिम्मेदार, षडयंत्रकारी और विभाजनकारी विचारधारा मानता हूं। यह बात विचारधारा को लेकर है, व्यक्तियों को लेकर नहीं। व्यक्तिगत जीवन में मैने संघियों को हमेशा सह्रदय मित्र, सामाजिक और शालीन पाया है।

लेकिन गैर-राजनीतिक संगठन होने को ढोल पीटते हुए संघ लगातार जिस तरह का विध्वंसक राजनीतिक आचरण करता आया है, उससे देश और उसके नागरिकों को बहुत गहरा नुकसान उठाना पड़ा है।

साढ़े चार वर्ष की प्रगाढ़ निद्रा के बाद संघ एक बार फिर जागा है। मोहन भागवत समेत तमाम लोग राम मंदिर के लिए चिंतित हो गये हैं। चिंता इस कदर है कि व्हाट्स एप हाहाकार है और फेसबुक पर शंखनाद है। अब मंदिर निर्माण में एक साल, एक महीने और एक दिन क्या एक पल की देरी भी मंजूर नहीं है।

अपने पूरे कार्यकाल में मोदी विदेशी राजनेताओं के साथ झप्पियां डालकर फोटो खिंचवाते रहे लेकिन मोहन भागवत ने उनसे एक बार भी नहीं कहा कि हे विष्णु के अवतार एक बार अयोध्या हो आओ। तुम्हे इस देश में मंदिर बनवाने से कौन रोक सकता है। लेकिन साढ़े चार साल तक भागवत भी चुप थे और भक्त भी, क्योंकि गांव-गांव में स्मार्ट सिटी बन रही थी।
अब जबकि स्मार्ट सिटी बन चुकी है। नोटबंदी असाधारण रूप से सफल हो चुकी है और दुनिया के `सबसे ईमानदार’ राफेल सौदे के बाद अनिल अंबानी अपनी बनाई फाइटर प्लेन लेकर पाकिस्तान पर बम बरसाने वाले हैं तब जाकर संघ को राम मंदिर की याद आई है। निचोड़ यह है कि सरकार ने अपने सारे ज़रूरी काम खत्म कर लिये हैं, करने को अब कुछ बचा नहीं है।

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा— अदालतों को व्यवहारिक फैसले देने चाहिए जिन्हें लागू किया जा सके। शाह साहब भूल गये कि अदालती कार्रवाई और धनिया के सौदे में फर्क होता है। मोल-भाव करके ठीक-ठीक लगाकर यहां कोई काम नहीं होता है। संघ के वरिष्ठ अधिकारी भैय्याजी जोशी ने आज प्रेस कांफ्रेंस करके कहा— सुप्रीम कोर्ट को हिंदुओं की भावना का ध्यान रखकर फैसला देना चाहिए। उन्होने यह भी कहा कि सुनवाई की तारीख जनवरी तक खिसकने से हिंदुओं को बहुत वेदना है।

यह कुछ ऐसी ही बात है, जैसे कोई मल्टीपल फ्रैक्चर के बाद डॉक्टर के पास जाये और कहे कि मैं बजरंगी बली का भक्त हूं, बिना प्लास्टर और बिना ऑपरेशन के ही मेरी हड्डियां जोड़ दो और वो भी दो दिन के अंदर। डॉक्टर कहे कि ऐसा नहीं होता, इलाज में वक्त लगेगा और कहां तक जुड़ेगी और कहां तक नहीं वह सारी रिपोर्ट देखकर ही बता पाउंगा। मरीज कहे कि जोड़ोगे कैसे नहीं मैं बजरंग बली का भक्त हूं।

आडवाणी के जमाने से राम मंदिर को लेकर बीजेपी का स्टैंड यह रहा है कि आस्था का प्रश्न अदालत से हल नहीं हो सकता। मतलब निर्णय पक्ष में आया तो मानेंगे अगर खिलाफ गया तो मानने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अचानक नरेंद्र मोदी के सरकार में आने के बाद अदालत में आस्था हो गई। यह दावा किया जाने लगा कि अक्टूबर तक फैसला आ जाएगा और फैसला मंदिर के पक्ष में ही होगा। अब मिश्राजी के जाने के बाद से अचानक अदालत फिर से हिंदू विरोधी लगने लगी है।

भइया पहले तय कर लो कि रास्ता कानूनी चाहिए या फिर 1992 वाला। अगर 1992 वाला ही चाहिए तो अदालत का वक्त क्यों बर्बाद करते हो। भारतीय न्यायपालिका पर ऐसे भी ज़रूरत से ज्यादा दबाव है और हज़ारों ऐसे मामले लंबित हैं, जहां सवाल जिंदगी और मौत का है। दिवगंत पत्रकार राजकिशोर ने एक लंबा लेख लिखा था, जिसमें उन्होने यह कहा था कि मुस्लिम समाज को विवादित भूमि पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

उनका तर्क यह था कि मुस्लिम समाज यह ना देखे कि किस तरह 1949 में आधी रात को विवादित परिसर के भीतर मूर्तियां रखी गईं और किस तरह एक आपराधिक षडयंत्र की तरह बाद में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया और एक भी दोषी को सज़ा नहीं हुई। इन बातों का कोई मतलब नहीं है कि क्योंकि पिछले 25 साल में आम हिंदू मानस जिस तरह हो चुका है, वह तर्क नहीं समझ पाएगा। अगर बहुसंख्यक समाज जिद पर अड़ा है तो देश में दीर्घकालिक शांति के लिए मुसलमानों को यह कदम उठाकर देखना चाहिए। राजकिशोर जी की इस बात से मैं एक हद तक सहमत हूं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई संघ परिवार मंदिर चाहता है।

संघ की रूचि मंदिर बनाने में नहीं बल्कि मंदिर मुद्धे को जिंदा रखने में है। इसके लिए तरह-तरह की साजिश और हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। संघ के कोटे राज्यसभा में गये राकेश सिन्हा प्राइवेट मेंबर बिल का शिगूफा छोड़ रहे हैं और राहुल गांधी को समर्थन देने की चुनौती दे रहे हैं। वे अपनी सरकार से इस मामले में अध्यादेश लाने को क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर राकेश सिन्हा यह नहीं जानते हैं कि प्राइवेट मेंबर बिल किन परिस्थितियों में लाया जाता है और उसका क्या हश्र होता है। दरअसल संघ को हिंदुओं को मूर्ख होने पर पक्का भरोसा है।

अगर राममंदिर बनाना होता तो उसकी कोशिशें दिख गई होतीं। जिन्हें संस्कृत के पांच मंत्र ठीक से याद नहीं है, वे आजकल धर्मरक्षक बने घूम रहे हैं। हिंदू होने के नाते मैं यह दावे से कह सकता हूं कि फरेब और धोखेबाजी हिंदू दर्शन का हिस्सा नहीं है। अगर कानून नहीं मानना है और आस्था के नाम पर मंदिर बनवाना है तो डंके की चोट पर कहिये, रोका किसने है। लेकिन न्यायालय की कनपटी पर बंदूक रखकर मनचाहा फैसला नहीं लिया जा सकता है।

मर्यादा पुरुषोत्तम घर-घर में हैं। विवादित जमीन पर मंदिर के बिना भी देश चल रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बिना देश नहीं चल रहा है। राजनीतिक फायदे के लिए न्यायपालिका के खिलाफ घृणित दुष्प्रचार देश के प्रति एक अक्षम्य अपराध है।

एक और आखिरी बात। संघ के अनुयायी बड़ी तादाद में हो सकते हैं। लेकिन वह संपूर्ण हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। एक सामाजिक संगठन की आड़ में संघ बीजेपी को सत्ता में बनाये रखने का उपकरण मात्र है। नैतिकता के प्रतिमानों पर मैं बाल ठाकरे को संघ और बीजेपी के तमाम नेताओं से हज़ार गुना बेहतर मानता हूं। बंदे ने जो कुछ किया डंके की चोट पर किया।

बाबरी मस्जिद टूटने के बाद जब बीजेपी के तमाम बड़े नेता बिल में जा छिपे थे, तब ठाकरे ने खुलकर कहा था कि मेरे लोग कारसेवा में शामिल थे। जिन लालकृष्ण आडवाणी के भड़काने पर ना जाने के कितने कम उम्र नौजवान मस्जिद गिराते हुए मलबे में दब गये, आडवाणी ने उन्हें हमेशा बाद में `उन्मादी भीड़’ कहा।

अटल बिहारी वाजपेयी दो दिन पहले तक कूटभाषा में कारसेवकों को मस्जिद गिराने और जमीन को समतल करने का संदेश दे रहे थे, लेकिन मस्जिद टूटते ही संघी अफवाह तंत्र ने खबर उड़ानी शुरू कर दी कि अटल जी बड़े आहत हैं। असली चेहरा सामने आने के बाद संघ को एक मानवीय और उदारवादी मुखौटा चाहिए था। इसलिए अगर आपको उग्र हिंदुत्व भी पसंद हो तो ऐसे लोगो की तरफ देखिये जिनका कोई धर्म-ईमान हो। ठगी करने वाले किसी के नहीं होते हैं।