by — प्रिय दर्शन

किशन कालजयी जी के कहने पर यह लेख सबलोग के लिए लिखा था। दिल्ली के अपने अनुभवों पर। पिछले दिनों छपा है। आप अगर देखना चाहें।

पहली बार दिल्ली मैं 1990 में आया था- एमए में दाख़िले के इरादे से। लेकिन दो महीने रहकर लौट गया। तब यह नहीं सोचा था कि दुबारा दिल्ली लौटूंगा। हालांकि पहली बार आने से पहले भी नहीं सोचा था कि कभी दिल्ली आऊंगा।

दरअसल उन दिनों दिल्ली और रांची के बीच की दूरी कहीं ज़्यादा बड़ी थी- मानसिक दूरी भी और वास्तविक दूरी भी। रांची से दिल्ली के बीच एक इकलौती ट्रेन थी जिसके यहां पहुंचने का समय रात 10.20 का हुआ करता था। वह अक्सर 2-3 घंटे देरी से पहुंचती- यानी रात 12 से लेकर 2 बजे के बीच कभी भी। उन दिनों इंटरनेट और मोबाइल तो दूर, लोगों के घर फोन भी नहीं हुआ करता था। रांची से दिल्ली अगर सात समंदर नहीं तो सात पहाड़ दूर ज़रूर लगती थी। फिर इतिहास, स्मृति और सत्ता के अबूझ रोमान और रहस्य के बीच दिल्ली की ऐसी भव्य छवि बनती है जो यहां से 1200 किलोमीटर दूर और कई सदी पीछे चलने वाले किसी शहर के किसी युवा को विस्मित छोड़ देती है। दिल्ली की यह छवि उस वास्तविक दिल्ली से कई गुना बड़ी है जो सड़कों, पुलों, बस्तियों, बंगलों और झुग्गी-झोपड़ियों तक में रोज़ बनती, बसती, जीती और मरती है। हालांकि रांची को तब भी हम लोग कोई पिछड़ा शहर नहीं मानते थे, लेकिन यह वास्तविक दिल्ली अपने फैलाव में इतनी बड़ी थी कि दूरी और विस्तार की जानी-पहचानी परिभाषाएं हमारे भीतर दरकने लगी थीं। 5 किलोमीटर की दूरी रांची में हमें बिल्कुल शहर से बाहर ले जाती, दिल्ली में बिल्कुल पड़ोस का मामला बन जाती।

मैं 9 जुलाई 1993 की रात, उन दिनों रोज़ाना चलने वाली उसी इकलौती ट्रेन, मूरी एक्सप्रेस से, आधी रात के बाद दिल्ली उतरा था। दिल्ली के क़रीब पहुंचते हुए जिस पहली चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा था, वह अचानक रोशनी का बढ़ा हुआ अनुपात था। अपने शहर के कम वोल्टेज वाली पीली बीमार रोशनियों के मुकाबले यहां की चमचमाती उजली रोशनी निस्संदेह लुभावनी थी। यात्रा के बिल्कुल आख़िरी सिरे पर ट्रेन जब यमुना पार कर रही थी तो दूर ट्यूब्स की झालर एक अलग नज़ारा बना रही थी। हालांकि अब दिल्ली जितने फ्लाई ओवरों से पटी पड़ी है और यमुना जिस तरह के अतिक्रमण की शिकार है, उसमें आधी रात के उस दृश्य का वैभव बचा होगा, इसकी उम्मीद कम है। इसकी जगह अब कहीं ज़्यादा चमचमाती और आक्रामक रोशनियों ने ले ली है।

बहरहाल, आने वाले दिनों में दिल्ली ने कई भ्रम तोड़े- अच्छे भी बुरे भी। पहली बात यही समझ में आई कि दिल्ली अपने अतीत को बुरी तरह कुचल कर आगे बढ़ रही है। जैसे इस शहर में कोई स्मृति बोध बचा ही नहीं है। दरियागंज और चांदनी चौक की पुरानी गलियों में अतीत की अच्छी बुरी ख़ुशबू ज़रूर है, कुछ बची-खुची रिवायतों का बोझ भी है, लेकिन सबकुछ जैसे अनचाहा, मजबूरी में ढोया जा रहा, किसी पुरानी, मर रही सभ्यता की निशानी की तरह। बाकी जो है, वह नई दिल्ली है, चारों तरफ फैलती उपभोक्ता दिल्ली है, घरों के आगे दुकानों से पटी पड़ी दिल्ली है, लोगों को ग्राहक और दुकानदार में, मकान मालिक और किराएदार में, बांटने वाली दिल्ली है।

हालांकि यह लिखते-लिखते मुझे अपने पहले मकान मालिक याद आ रहे हैं- एक बुज़ुर्ग दंपती जिन्होंने पांडव नगर में बनाए अपने 50 वर्गफुट के अपने मकान की ऊपरी मंज़िल हमें दे दी थी और निचले हिस्से में ख़ुद रहते भी थे और छोटी सी किराने की दुकान भी चलाते थे। अंकल-आंटी- यानी करतार सिंह और उनकी पत्नी- ने शुरू में भले हम चार दोस्तों पर संदेह किया हो, कुछ अकड़ भी दिखाने की कोशिश की हो. लेकिन जल्द ही हमने पाया कि हममें और उनमें कोई फ़र्क नहीं है, बल्कि वे कई मायनों में हमसे ज़्यादा निरीह हैं और उनका अकड़ना अपनी निरीहता छुपाने की कोशिश भर था। जब उन्हें लगा कि ऐसे परदे की ज़रूरत नहीं है तो जल्द ही वे बहुत सहज और आत्मीय लोगों में बदल गए। आने वाले दिनों में अपनी पत्नी के साथ रहते हुए भी उनसे नियमित मिलते-जुलते बार-बार यह खयाल आता रहा कि दिल्ली के क्रूर और चालाक होने का जो एक मिथक है, उसे इस परिवार ने मेरे आगे बार-बार तोड़ा।

यही बात कई और परिचितों और दोस्तों के बारे में कही जा सकती है जो दिल्ली ने दिए। वे सब बहुत सहज लोग रहे- अपनी मुश्किलों और अपने असुरक्षा बोध को पीछे छोड़ते हुए, अपना परिवार बनाते हुए और अपने घर बसाते हुए। मेरे देखते-देखते न जाने कितने लोग इस शहर के हो गए। बाहर से आए, अकेले कमरों में चादर बिछा कर सोने वाले, दोस्तों के साथ नौकरी की गुंजाइश तलाशते हुए, धीरे-धीरे एक से दो हुए, दो से तीन, नौकरी की जगहों बच्चों की पढ़ाई के स्कूलों का पता लगाने लगे, फिर अपने फ्लैट खरीदने की संभावनाओं का और अंत में उन्होंने यहां से बच्चों के शादी-ब्याह भी किए। उनके पुराने शहर छूटते हुए और जिस दिल्ली को कोसते-कोसते वे इस मोड तक पहुंचे, वह उनका अपना शहर होती चली गई। निस्संदेह, दिल्ली में बसने की प्यारी लगने वाली दास्तान के समांतर अपने शहर से उजड़ने की एक उतनी ही तकलीफदेह कहानी नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती। बेहतर पढ़ाई या नौकरी के नाम पर हम सबने अपने शहर छोड़े, अपने दोस्त छोड़े, अपनी नातेदारियां छोड़ीं और इन सबके साथ-साथ कई ज़िम्मेदारियां भी छोड़ी- एक तरह का स्मृतिभंग हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा होता चला गया, दिल्ली हमारे पुराने घर, शहर और व्यक्तित्व को खुरच-खुरच कर हमें अपना और सयाना बनाती रही। फुरसत की नादानियां छोड़ हम सफलता की व्यस्तताओं में लीन होते चले गए। शायद सभी बेदखल-विस्थापित समाजों की यही नियति होती है।

लेकिन एक स्तर पर दिल्ली हमें क़रीब भी लाती रही, दूर भी करती रही। मैं दिल्ली में रहने आया था, गाज़ियाबाद में रहने लगा। अगस्त 2001 में हम वसंधुरा के अपने घर में दाखिल हो रहे थे, तब पहली बार इस मलाल ने सिर उठाया था कि अब अपने बायोडाटा में स्थायी पता बदल जाएगा- इस घर से पहले वह ‘प्रतिमान प्रेस, किशोर गंज, हरमू रोड, रांची’ हुआ करता था, अब ‘ई-4, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9, वसुंधरा, गाज़ियाबाद’ हो गया। उन्हीं दिनों एक दिन हमने तय किया कि जब दिल्ली में नहीं, गाज़ियाबाद में रह रहे हैं तो गाजियाबाद के बाजार से वास्ता होना चाहिए। हम गाज़ियाबाद के मुख्य बाज़ार की तरफ पहुंचे। तब तक शहर से अनजान थे। देर शाम लौटते हुए साझे पर चलने वाले टेंपो में बैठे। टेंपो वाले ने आश्वस्त किया कि वह बोर्डर तक जाता है। लेकिन उसने टेंपो बस मोहन नगर तक छोड़ दिया। कहा कि गाज़ियाबाद यहीं ख़त्म हुआ, आगे दिल्ली शुरू होती है।

हम हैरान थे। न हम दिल्ली के हैं न गाज़ियाबाद के। हिंडन के किनारे की छूटी हुई जगह के उजाड़ में बस रहा है हमारा आशियाना। जैसे कोई नोमैंसलैंड हो जिसे यूपी-बिहार, झारखंड-पहाड़ से आए हुए लोग धीरे-धीरे बसा रहे हों। अब पाता हूं कि वाकई उजड़े हुए लोगों की टोली ने दिल्ली का यह उपग्रह-शहर बसा दिया है। यही हाल नोएडा का है. फ़रीदाबाद का है और कुछ हद तक गुड़गांव का है। अपनी-अपनी हैसियत से लोग इन इलाकों में बस रहे हैं।

एक तरह से देखें तो सबसे नई दिल्ली यही है। दिल्ली के भूगोल से बाहर, लेकिन दिल्ली के मानस के भीतर। दिल्ली तो उन अफ़सरों और कारोबारियों के हवाले है जिनके पास बडा पैसा है, कुछ खुशकिस्मत उस मध्यवर्ग के हिस्से भी चली आती है जो साठ और सत्तर के दशक में या अस्सी के शुरू में दिल्ली चला आया। नहीं तो अब हमारी हैसियत के लोग वहां सिर्फ किरायेदार हो सकते हैं।

दिल्ली का खेल यही है- वह जोड़ती भी है, काटती भी है। वह ठिकाना देती है लेकिन दूर कर देती है। वह आज़ादी देती है लेकिन अपना एक हाथ आपकी गर्दन पर रखती है। वह नए बनते भारत का मगरूर आईना है, लेकिन उसके भीतर पुराने बजबजाते भारत भी भरे पड़े हैं।

दरअसल दिल्ली आपको बुलाती तो है लेकिन एक बार आ जाने के बाद आपको इतनी फुरसत नहीं देती कि आप उसमें उतर कर उसे देख सकें। सैलानी की तरह आए हों तो आइए, नए-पुराने क़िले, मंदिर-मस्जिद, मकबरे, बाग, गेट, मीनार देखिए और लौट जाइए। यहां रह गए तो सब भूल जाइए। वैसे भी शहर पर्यटन स्थलों में नहीं बसते।

हम ही कहां ठीक से देख सके हैं दिल्ली को। पुराने चौक, पुराने गंजों, पुरानी गलियों में आते-जाते रहे, लेकिन धक्का-मुक्की, भीड़भाड़, शोर-शराबे, आपाधापी के बीच घुट रहे अतीत की फुसफुसाहट को, पुराने दिनों की परछाइयों को, कभी सरल-तरल शीतल मानी जाने वाली बावड़ियों की सूखी आंखों को, किन्हीं नामालूम गलियों में दबी आहटों को, जर्द खाती, दरकती हवेलियों में बसी दम तोड़ती दास्तानों को, इतिहास के बुझ रहे चिराग़ों को, देखने के लिए जो फुरसत, जो इतमीनान, जो आंख चाहिए, वह कहां पैदा कर सके।

और इस पुरानी दिल्ली के सिर पर चढ़ी आती, उसके चारों तरफ मशरूम की तरह फैल रही जो कई-कई नई-नई दिल्लियां हैं, वे अपने विस्तार से बाहर झांकने की मोहलत देती कब हैं? और क्या इन्हीं नई बनती दिल्लियो का पता, उसकी पहचान हमें मालूम है?

एक दिल्ली वह है जिसकी नए-नए मॉडलों की बड़ी-बड़ी चमचमाती गाडियों के लिए रोज़ नए बनते फ्लाइओवरो और चौड़ी होती सड़कों का जाल छोटा पड जाता है और जिसकी वजह से दिल्ली की सबसे पॉश कहलाने वाली कॉलोनियों के बाहर रोज रात को गाड़ी तो क्या, तिल धरने की भी जगह नहीं मिलती। यह सत्ता, कारोबार और प्रॉपर्टी के तिहरे खेल से बनी दिल्ली है।

एक दिल्ली वह है जो इन चौड़ी सड़कों और इनसे लगी चमचमाती इमारतों के पीछे न दिखाई पड़ने वाली अनाधिकृत कॉलोनियों, बस्तियों, झुग्गियों के अलावा फ्लाईओवरों के नीचे और पाइपों के भीतर तक रहती है। 20 साल पहले जब मैं दिल्ली आया था तो यमुना के किनारे झुग्गी बस्तियों का सिलसिला इतना बड़ा नहीं था जितना आज पसर गया है। इस झुग्गी-झोपड़ी वाली दिल्ली की आबादी बाकी सारी दिल्लियों से बड़ी है। यह दिल्ली हमारे सबसे ज़रूरी काम भी निबटाती है। हमें सुबह-सुबह दूध और अख़बार पहुंचाती है, हमारे घरों में झाड़ू-पोछा करती है, हमारे कपड़े इस्त्री करती है, हमारी गाड़ियां साफ़ करती है। दिलचस्प यह है कि इसी दिल्ली का बाज़ार भाव सबसे कम है। यह सबसे कम जगह घेरती है, सबसे कम बिजली जलाती है, सबसे कम पानी ख़र्च करती है। लेकिन इस दिल्ली को हम सबसे कम जानते हैं, सबसे कम देखते हैं और इससे सबसे ज़्यादा नफ़रत करते हैं।

इन दोनों के बीच बस रही एक तीसरी दिल्ली वह है जो दिल्ली के किनारे के इलाक़ों में या इससे लगे उपनगरों में बस रही है। एक बहुत बड़ी बिल्डिंग इंडस्ट्री इसी नई दिल्ली के सहारे है। नोएडा और गाज़ियाबाद में पलक झपकते खड़े हो गए अपार्टमेंट्स का संसार इसी दिल्ली ने बनाया है। दिल्ली से बाहर निकलते ही मॉल और मल्टीप्लेक्स का जो नया सिलसिला है, वह इसी जड़ों से उखड़ी, उजड़ी हुई दिल्ली की शामें गुलज़ार करने के लिए खड़ा हुआ है।

ऐसी और भी दिल्लियां हैं जो दिल्ली के इतिहास और भूगोल के भीतर और बाहर अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद कर रही हैं- सत्ता की दिल्ली, मीडिया की दिल्ली, तरह-तरह के माफ़िया की दिल्ली। इन सबके बीच रंगमंच-कला-साहित्य और प्रतिरोध की वास्तविक आवाज़ों की एक दिल्ली भी है जो दिल्ली के लिए ओजोन परत का काम करती है।
वैसे यह सच है कि इन बरसों में दिल्ली का तिलिस्म टूटा है। सूचना प्रौद्योगिकी और आवाजाही की सुविधाओं ने रांची और दिल्ली के बीच वह फासला नहीं रहने दिया है जो 20 साल पहले रांची से दिल्ली आ रहे एक युवा को डराता था। लेकिन दिल्ली में कई तिलिस्म जुड़े भी हैं। तमाम शायरों और साहित्यरकारों ने दिल्ली पर ख़ूब लिखा है- जिन्हें ख़ूब उद्धृत भी किया गया है। लेकिन इस नई दिल्ली को लेकर हाल में देखी एक फिल्म ‘बीए पास’ का एक संवाद याद करने की इच्छा होती है- ‘यह दिल्ली है, यहां अच्छे दिनों में प्लॉट कटते हैं, खराब दिनों में जेब कटती है और बुरे दिनों में गला कटता है।‘ इस कटती-बंटती दिल्ली में सबकी जेब, गर्दन और इज़्ज़त सलामत रहे, बस इतनी दुआ है।