by: दिलीप मंडल

महिलाओं की मुक्ति की कहानी मंदिरों में नहीं, मार्केट, स्कूल-कॉलेजों और वर्क प्लेस में लिखी जा रही है और इसमें उनका सबसे बड़ा साथी भारत का संविधान है.

वे लड़कियां हैं, वे मंदिर जाना चाहती हैं. वे वहां पुजारी बनने या मंदिर का मैनेजर बनने या मंदिरों से जुड़ी अरबों की जायदाद और धार्मिक सत्ता में हिस्सेदारी करने नहीं जा रही हैं. उन्हें मंदिर का मालिक नहीं बनना है. उनकी नज़र मंदिरों में रखे सोने-चांदी पर नहीं है. वे तो आस्था के प्रदर्शन के लिए, पुजारियों का आशीर्वाद लेने और मूर्तियों के दर्शन करने के लिए मंदिर जाना चाहती हैं. जब वे मंदिर जाएंगी, तो दान-दक्षिणा भी देंगी. मंदिरों में सेवा भी करेंगी. उनसे पुजारियों की सत्ता को कोई खतरा नहीं है. इसके बावजूद कुछ मंदिर उनके प्रवेश का विरोध कर रहे हैं. महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में उन्हें प्रवेश से रोका गया. अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद केरल के सबरीमाला मंदिर में उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है.

मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश अबाधित और असीमित कभी नहीं रहा, कहीं नहीं रहा. महिलाएं मंदिरों में पुजारी नहीं बनतीं. मंदिरों का प्रबंधक नहीं बनतीं. देवियों के मंदिरों में भी पुजारी और मैनेजर पुरुष ही होते हैं. ज़्यादातर मंदिरों में औरतें दर्शन के लिए जा सकती हैं, लेकिन देवियों का श्रृंगार और उनके वस्त्र बदलने से लेकर गहने पहनाने और उनकी मूर्तियों को धोने तक के सारे काम पुरुष ही करते हैं. मंदिरों के गर्भगृह पुरुषों के लिए ही हैं. कहना मुश्किल है कि ऐसा करने के पीछे कोई धार्मिक और शास्त्रीय व्याख्या है या फिर धर्म सत्ता पर नियंत्रण करने वाले पुरुष पुजारियों ने अपने स्वार्थ में यह व्यवस्था बना ली और बाद में उसके हिसाब से शास्त्र लिख लिए.

पुरुष पुजारियों के इस विशेषाधिकार को कभी महिलाओं ने चुनौती नहीं दी. ब्राह्मण महिलाओं ने भी नहीं. बाकी जातियों के तो पुरुषों को भी ये विशेषाधिकार नहीं हैं. इन विशेषाधिकारों को आज भी चुनौती नहीं दी जा रही है. महिलाएं ये भी नहीं कह रही हैं कि कम से कम देवियों के मंदिरों में पुजारी महिलाएं हों और वे ही देवियों का श्रृंगार आदि करें. अभी वे जो मांग रही हैं, वह बेहद सीमित और छोटी सी मांग है. वे दूर से, जहां से कहा जाए वहां से ही, देवता के दर्शन करना चाहती हैं. इससे धर्म की सत्ता मज़बूत ही होने वाली है. सबरीमाला जाने का मौका मिलने पर महिलाएं आखिर वहां पुरुष पुजारियों के ही चरण स्पर्श करने वाली हैं और उनसे ही आशीर्वाद लेने वाली हैं.

पुरुष पुजारी सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का विरोध क्यों कर रहे हैं? इसकी सिर्फ एक वजह है. धर्म की सत्ता विश्वास और आस्था से चलती है. ये आस्था अखंड और असीमित होनी चाहिए. अगर विश्वास और आस्था के आधार पर लोगों के दिमाग में ये बात बिठा दी गई है कि ये देवता ब्रह्मचारी हैं और उनकी मूर्ति के सामने खासकर रजस्वला यानी गर्भ धारण करने के योग्य उम्र वाली महिलाओं को नहीं आना चाहिए, तो ये व्यवस्था तर्क और विज्ञान से परे है. जो लोग विज्ञान के आधार पर स्त्री और पुरुष को समान बताते हुए सबरीमाला में औरतों के प्रवेश का समर्थन कर रहे हैं, वे असंगत बात कर रहे हैं.

अगर आपकी आस्था धर्मग्रंथों और शास्त्रों में है, तो ये आपकी पसंद की चुनी हुई बातों पर लागू नहीं होगा. आस्था पूरे पैकेज में आती है, आपको शास्त्रों को उनकी समग्रता में स्वीकार करना होगा. ये नहीं हो सकता कि आप शास्त्रों से अपने पसंद की बात चुन लें और जो पसंद नहीं है, उसे खारिज कर दें. अगर धर्म कहता है कि औरतों को किसी खास मंदिर में नहीं जाना चाहिए, तो उस धर्म में आस्था रखते हुए, आप धर्मविरुद्ध कार्य कैसे कर सकती हैं? यह तभी संभव है, जब धर्म अपने अंदर खुद ही बदलाव कर ले या जैसा कि आप कहती हैं कि सुधार कर ले. सबरीमाला के पुजारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका शास्त्र ऐसा कहता है.

हर धर्म समय के साथ बदलता है. लेकिन ये गति हर धर्म में एक समान नहीं होती. ईसाई धर्मग्रंथों में लिखे होने के बावजूद आज चर्च ये नहीं कहता कि यूनिवर्स के केंद्र में पृथ्वी है और सूरज धरती के चक्कर लगाता है. एक समय था जब ब्रूनो को यह कहने के लिए चर्च ने चौराहे पर ज़िंदा जला दिया कि धरती सूर्य का चक्कर लगाती है. लेकिन अब चर्च ने इस बात के लिए माफी मांग ली है. यह ईसाई धर्म का सुधार वाला पहलू है. लेकिन ईसाई धर्म विज्ञान की हर बात को नहीं मानता. इस धर्म के कई लोग और पादरी अब भी मानते हैं कि कुंवारी मेरी ने ईसा को जन्म दिया. आने वाले समय में हो सकता है कि चर्च इस स्थापना में भी संशोधन करे. ऐसा तमाम धर्मों के साथ हुआ है और हो रहा है.

हिंदू धर्म में सती प्रथा को शात्रोक्त कहा जाता था. विधवा विवाह निषेध था. समुद्र यात्रा पर पाबंदी थी. तलाक की कोई व्यवस्था नहीं थी. छुआछूत को शास्त्रीय मान्यता थी. शूद्रों को पढ़ने और संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था. हर जाति का एक शास्त्र निर्धारित कर्म था. एक ही अपराध के लिए अलग अलग जातियों को अलग सजाएं देने का विधान था. लड़कियों को शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं था. बेटियों को पैतृक संपत्ति पर अधिकार नहीं था. इनमें से बहुत कुछ बदल चुका है. कुछ चीजें आंतरिक स्तर पर सुधार से बदली हैं. कुछ बातें दंड विधान और संविधान के कारण बदली हैं. ये एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है.

हर समय पुरातन और नवीन के बीच संघर्ष चलता है. सत्ता या सत्ता पर बैठे लोग हमेशा परिवर्तन का विरोध करते हैं. लेकिन जब परिवर्तन की मांग या ज़रूरत बड़ी हो जाती है तो संस्था को बचाए रखने के हित में सत्ताएं परिवर्तन को स्वीकार भी कर लेती हैं. हो सकता है कि सती प्रथा शास्त्रों के हिसाब से बिल्कुल सही हो और कुछ लोगों को जन्म से अछूत मानने की बात ग्रंथ करते हों, लेकिन धर्म सत्ता अगर आज इन बातों को लागू करने की ज़िद करेगी तो अपना ही अहित करेगी. धर्म सत्ता का ये लचीलापन उसका उदार या मानवीय होना नहीं, उसका डिफेंस मेकेनिज़्म या ज़िंदा रहने की उसकी ज़रूरत के कारण है.

अब आखिरी बात. क्या औरतों को उन मंदिरों में जाने की ज़िद करनी चाहिए जहां उनके प्रवेश का पुजारी विरोध कर रहे हैं?

इस सवाल को इस तरह भी पूछा जा सकता है कि महिलाएं मंदिर जाना ही क्यों चाहती हैं. महिलाओं को ये समझना होगा कि उनकी मुक्ति आधुनिकता, लोकतंत्र और संविधान में है. आज भारत में जितनी लड़कियां पढ़ रही हैं और घर से बाहर निकलकर नौकरी या कोई और उत्पादक कार्य कर रही हैं, वो इतिहास की अभूतपूर्व घटना है. ऐसा सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि भारतीय संविधान ने उन्हें न सिर्फ पुरुषों के समान माना है, बल्कि उनके लिए विशेष अधिकार भी दिए हैं.

समानता के अधिकार के साथ, संविधान विशेष अवसर के सिद्धांत को भी मान्यता देता है. लोकतंत्र की वजह से उनका वोट पुरुषों के वोट के बराबर है. वे लगभग हर वो काम कर सकती हैं और हर जगह पर जा सकती हैं, जहां पुरुष जा सकते हैं. सेना में युद्धक भूमिकाओं में होने जैसे एकाध क्षेत्र अब भी पुरुषों के पास हैं, लेकिन बाकी दुनिया की तरह भारत में भी देर सबेर ऐसे मामलों में स्त्री-पुरुष समानता आ जाएगी.

बाज़ार ने भी तमाम क्षेत्रों को महिलाओं के लिए खोल दिया है. बाज़ार महिला और पुरुष को बराबर मानने के लिए तैयार है, बशर्तें इससे उसका कोई घाटा न हो. बाज़ार को महिला उपभोक्ताओं से भी बराबर प्यार है. महिला श्रम भी बाज़ार को चाहिए. महिलाओं की ज़िंदगी को आसान बनाने वाली हर चीज़ विज्ञान ने बनाई है. चाहे वो गर्भ निरोधक हों, या वाशिंग मशीन या मिक्सर ग्राइंडर. ये सब औरतों को मॉडर्निटी के गिफ्ट हैं.

मंदिरों का महिलाओं की ज़िंदगी आसान बनाने या उनके लिए अवसर मुहैया कराने में कोई योगदान रहा हो, ऐसा ज्ञात नहीं है. औरतों को मंदिरों में जाने और पुजारियों की आस्था को चोट पहुंचाने से कुछ भी हासिल नहीं होगा. खासकर उन धार्मिक महिलाओं को इससे परहेज़ करना चाहिए जिनका धर्म और उसके व्याख्याकार पुजारी ही कह रहे हैं कि उन्हें मंदिर में नहीं जाना चाहिए.

मंदिर में उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी. मंदिर इसका न इसका वादा कर रहे हैं न दावा. महिलाओं की ज़िंदगी स्कूल-कॉलेज, वर्कप्लेस और बाज़ार में बदल रही है. उनकी ज़िंदगी संविधान बदल रहा है. यही उनकी मुक्ति का मार्ग है.

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