असम के ‘बोका चौल’ चावल को जीआई टैग (जियोलॉजिकल आइडेंटीफिकेशन यानी भौगोलिक पहचान चिह्न) प्रदान किया गया है। इस टैग को मिलने के बाद पूरी दुनिया में ‘बोका चौल’ चावल को असम के विशिष्ट चावल के रूप में पहचाना जाएगा। इस चावल की खास बात यह है कि इसे खाने के लिए पकाना नहीं पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि जीआई टैग विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादित कुछ विशिष्ट कृषि, प्राकृतिक, हस्तशिल्प और औद्योगिक उत्पादों को दिया जाता है। ऐसा उत्पाद जो किसी क्षेत्र में 10 वर्ष या उससे ज्यादा समय से उत्पन्न या निर्मित होता है तो उसे जीआई टैग दिया जा सकता है। जीआई टैग को देने का मुख्य उद्देश्य उस उत्पाद का संरक्षण करना है। इससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस उत्पाद का प्रीमियम मूल्य भी तय होता है। जीआई टैग मिलने के बाद दूसरे क्षेत्र के उत्पादक उस नाम का उपयोग करके अपने उत्पादन को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय बाजार में नहीं बेच सकते हैं।

जीआई टैग विश्व व्यापार संगठन द्वारा प्रदान किया जाता है और भारत के लिए इसका मुख्यालय चेन्नई में है। भारत में सबसे पहला जीआई टैग 2004-05 में दार्जिलिंग चाय को मिला था। 2017 में जीआई टैग तब चर्चा में आया था जब रसगुल्ला पर पश्चिम बंगाल और उड़ीसा ने जीआई टैग के लिए दावा किया था। रसगुल्ला का फैसला पश्चिम बंगाल के हक में हुआ था। अभी हाल ही में कड़कनाथ नाम के मुर्गे के जीआई टैग को लेकर मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भी दावेदारी हुई थी, जिसमें बाजी मध्य प्रदेश के हाथ लगी थी।

बोका चौल (बोका सोल भी कहते हैं) चावल असम के निचले हिस्सों में बोया जाता है। यह पूरी तरह स्वदेशी चावल है जिसे मिट्टी चावल भी कहते हैं। इसे मुख्य रूप से नलबारी, बारपेटा, गोलपाड़ा, कामरूप, दरंग, धुबरी, चिरांग, बोंगाईगांव, कोकराझार, बक्का आदि क्षेत्रों में बोया जाता है। यह जून में बोया जाता है औऱ दिसंबर में इसकी कटाई होती है।

जैसा कि पहले बताया गया कि इस चावल को खाने के लिए पकाने की जरूरत नहीं पड़ती। खाने से पहले चावल को करीब एक घंटे तक पानी में भिगो दिया जाता है। इस अवधि में यह पानी में ही पके हुए चावल की तरह फूल जाता है। इसके बाद इसे खाया जा सकता है। असम में इसे दाल, सब्जी के साथ ही दही, गुड़ और केले के साथ भी खाया जाता है।

यह बेहद पौष्टिक भी है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार बोका चौल चावल में 10.73 प्रतिशत फाइबर और 6.8 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। कुल मिलाकर बहुत ही बढ़िया भोजन और सबसे बढ़िया बात यह कि इसे खाने के लिए गैस, चूल्हा, इंडक्शन आदि की जरूरत ही नहीं है।

असम के ग्रामीण क्षेत्रों में यह चावल 60 से 80 रुपये प्रति किलो जबकि शहरी क्षेत्रों में 100 से 150 रुपये प्रति किलो मिलता है।