by — हेमंत मालवीय

बहारों फूल बरसाओ
मेरा कांवड़िया आया है – (२)
स्पीकरों डीजे बजवाओ
मेरा कांवड़िया आया है – (२)

ओ साली जरा टक्कर तो लगा तेरे इन गोरे हाथों से
उतर आऐ धर्म नाम गुंडे ,लाठी तलवार लिए हाथों में,
सड़क पे कारे पलटाओ
मेरा कांवड़िया आया है – (२)

नेताओ हर तरफ़ तान दो स्वागत अभिनंदन के पोस्टर
बडा भोला दिलबर है, भक्त जायेगा इनपे हग मूत कर
ज़रा तुम गांजा दारू पिलवाओ
मेरा कांवड़िया आया है – (२)

सजाई है बदमाश लफंगों ने अब ये कांवड़ नफरत की
इन्हें मालूम था आएगी इक दिन गवर्मेंट सिर्फ जुमलो की
DGP फूल बिखराओ
मेरा कांवड़िया आया है – (२)
बहारों …

धर्म के नाम पर उन गुंडों मवालियों के ऊपर लिखी पैरोड़ी, जिन्होंने कावड़यात्रा को बदनांम कर दिया है
शेष भोले भक्त बंधुओ से अग्रिम क्षमा , विशेषकर BJP मोदी योगी भक्तो से जिनकी धामिर्क भावनाये इस कड़वी सच्चाई , सड़को की गुंडाई, ट्रेफिकजाम,फेसबुक पोस्ट पर दिखाने से आहत होने वाली है ।…ये अनुरोध सभी धर्मों से है , मानने वालों से है जिसका जो भी धर्म है उसे सड़क छाप प्रदर्शन बना सड़को पे नही उसे सम्भाल कर अपने घर मनन वचन में धारण करो, सड़को पर यू ही चलने को जगह नही है ,
हेमंत मालवीय
आखिर मोदीजी नुसार गाँधी जी के फाइनेंसर घनश्याम दास बिड़ला का खून है,। किसी मौका परस्त अड़े खड़े, चौकीदार बता कर भागीदार बन चुके चाय वाले के पार्टनर्स अडानी,अम्बानी का नही, जिसने मजदूरों को 1 रुपये में सेंचुरी यार्न मिल चलाने को दे दी, और उनकी बकाया मजदूरी भी ।
खबरों की नकारात्मकता के दौर में
भाई @sanjay verma का मालिक मजदूर के सकारात्मक सम्बन्धो का एक अभिनव प्रयास नए मेक इन इंडिया की उम्मीद जगाती हुई रिपोर्ट

धामनोद के पास सेंचुरी यार्न मिल में मालिकों और मजदूरों के बीच चल रही लड़ाई ने एक दिलचस्प मोड़ ले लिया है ।अगर सब कुछ ठीक रहा , तो 84 एकड़ में फैली इस खूबसूरत फैक्ट्री में काम करने वाले लगभग एक हज़ार मजदूर अब इस मिल के नए मालिक बन सकते हैं ।
यह सब शुरू हुआ कोई आठ महीने पहले जब मिल मालिक कुमार मंगलम बिरला ने लगातार तीन साल से घाटे में चल रही अपनी इस फैक्ट्री को बेचने का फैसला किया और पिछले साल अक्टूबर के महीने में इस ‘वेरिएट ग्लोबल लिमिटेड ‘ नामक कंपनी को ढाई करोड़ रुपयों में बेच दिया ।नए मालिकों तौर तरीके अलग थे जो बिरला तहजीब में नाजों पले मजदूरों को रास नहीं आए। नए मालिक मानते थे कि फैक्ट्री के घाटे की एक खास वजह मजदूरों की अधिक संख्या और ज्यादा वेतन है ।सेंचुरी टेक्सटाइल मे एक मजदूर पर कम्पनी की लागत यानी सी टी सी लगभग सात सौ रुपए प्रतिदिन थी , जबकि इस तरह की दूसरी फैक्ट्रियों में आमतौर पर प्रतिदिन वेतन दो सौ से लगाकर चार सौ रुपये के बीच होता है । नए मालिक छटनी करना चाहते थे ताकि नए सस्ते मजदूरों को रखा जा सके । गुस्साए मजदूरों ने इस सौदे का विरोध किया और मांग की कि बिरला इस फैक्ट्री को वापस ले लें और पहले की तरह चलाएं । चौड़ाई शुरू हुई और फैक्ट्री बंद हो गई । इस बीच मजदूर नेताओं ने जन आंदोलनों की जानी-मानी नेता मेधा पाटकर से गुजारिश की कि वे इस लड़ाई में उनका साथ दें । मेधा पाटकर के इस आंदोलन से जुड़ने के बाद हालात तेजी से बदले ।मामला अदालत में गया , जहां अदालत ने अपनी तरह का एक अनोखा फैसला देते हुए इस लड़ाई में हस्तक्षेप किया और इस सौदे को निरस्त कर दिया ।
फैक्ट्री फिर एक बार बिरला ग्रुप की हो गई। बिरला ग्रुप का कहना था कि उन्हें फैक्ट्री बेचने का पूरा अधिकार है । उन्हें फैक्टरी चलाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता । मालिक और मजदूर बातचीत के लिए बैठे । मजदूर नेताओं ने कहा यदि मैनेजमेंट चाहे तो वे वेरिएट के सौदे की रकम से दस लाख रूपया अधिक देकर यह फैक्ट्री खरीद सकते हैं , यानी दो करोड़ साहठ लाख रूपयों में । यह बात बस यूं ही हवा में उछाल दी गई थी क्योंकि मज़दूर नेताओं को बिलकुल भरोसा नहीं था कि बिरला मैनेजमेंट इस बात के लिए राजी हो सकता है । पर बिड़ला ने सबको चौंकाते हुए अपना फैसला सुनाया कि यदि मजदूर कोआपरेटिव यूनियन इस फैक्ट्री को खरीदना चाहे तो वे सिर्फ़ एक रुपये कीमत में फैक्ट्री देने को तैयार है और वे फैक्ट्री की सारी देनदारियां चुका कर उसे कर्ज मुक्त कर मजदूरों को देंगे ।

अब गेंद मजदूर नेताओं और मेधा पाटकर के पाले में आ गई । मेहनतकशों के मालिक बनने का यह ख्वाब बेशक दिलकश है ।यही तो वह ख्वाब है जो दुनिया के तमाम मेहनतकशों को मार्क्स और दुनिया के तमाम उन तमाम नेताओं विचारकों ने दिखाया है जो इस धरती से गैर बराबरी ,शोषण ,भूख और गरीबी मिटाने की बात करते हैं ।
पर इस रूमानी ख्वाब को देखते हुए ज़मीनी हकीकतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस फैक्ट्री की अपनी मुश्किलें हैं । यार्न और डेनिम बनाने वाली यह सेंचुरी यार्न फैक्ट्री बिड़ला ने लगभग 26 साल पहले लगाई थी । इसकी अधिकांश मशीनें अब पुरानी हो चुकी हैं । इन 26 सालों में टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी की गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है । नई मशीनें अब इन पुरानी मशीनों के मुकाबले सिर्फ एक तिहाई बिजली खर्च करती हैं और इन से कहीं अधिक माल बनाती हैं ।सेंचुरी की पुरानी मशीनों के पुर्जे भी अब बाजार में मिलना बंद हो गए हैं । सेंचुरी की मशीनों पर डेनिम कपड़े की अधिकतम चौड़ाई सिर्फ 54 इंच तक ही बनाई जा सकती है , जबकि बाजार की मांग अब 110 इंच वाले कपड़े की है । इस बीच पावर लूम बनाने वाली छोटी-छोटी फ़ैक्ट्रियों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। इन फैक्ट्रियों का खर्च बहुत कम है इसलिए वह कम कीमत में अपना माल बेच पाती हैं । यदि मजदूर इस फैक्ट्री को चलाते हैं तो वह बाजार की कीमतों से प्रतियोगिता में कैसे टिकेंगे यह एक बड़ा सवाल है ।
सवाल और भी हैं । फैक्ट्री तो बिड़ला जी एक रुपए में दे देंगे परंतु उसे चलाने के लिए करोड़ों रुपए की वर्किंग कैपिटल चाहिए होगी । डीलर तीन महीने की उधार मांगते हैं। रॉ मटेरियल छः महीनों का स्टॉक रखना पड़ता है। फैक्ट्री पिछले पांच महीनों से बंद है इसलिए उसे दोबारा शुरू करने में कई मशीनों में बहुत सा मेंटेनेंस करना होगा ,जिसके लिए पैसा चाहिए होगा । पिछले दिनों मौजूदा मैनेजमेंट ने बिजली का लोड कम करवा दिया था और सिर्फ लाइटिंग के जितनी ही बिजली का कनेक्शन लोड रखा है अब उसे फिर पूरा लोड लेना होगा जिसके लिए पैसा चाहिए होगा । हलाँकि कंपनी के पास खुद का जनरेटर है पर उस से बिजली बनाने का खर्च लगभग बारह रुपये प्रति यूनिट आता है जबकि सरकारी बिजली सात रुपये प्रति यूनिट के भाव मिलती है ।प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के साथ भी कंपनी को कई मामले चल रहे हैं जिन्हें मजदूरों को निपटाना होगा ।
मेधा पाटकर इन सब मामलों को समझने के लिए सोमवार को फैक्ट्री में थीं । वे किसी माहिर बिजनेस मैन की तरह लागत और मुनाफे का जोड़ बाकी लगा रही थी ।फटेहाल आदिवासियों के साथ नारे लगाती मेधा पाटकर का यह नया रूप सेंचुरी के मजदूरों का कितना भला कर पाएगा यह समय ही बताएगा पर उनके आंदोलन में शामिल होने के बाद मजदूरों की रुकी हुई तनख्वाह अब चालू हो गई है और फैक्ट्री बंद होने के बावजूद सभी को पूरी तनख्वाह मिल रही है ।

मजदूरों में ही कई ऐसे हैं जो इस डील को अव्यवहारिक मानते हैं । उनका कहना है मजदूर मेहनत कितनी भी कर ले परंतु पुरानी टेक्नोलॉजी की इन मशीनों से अब बाजार में नहीं टिका जा सकता । जब बिड़ला के पेशेवर पढ़े-लिखे मैनेजर इसे नहीं चला पाए तो हम क्या कर लेंगे । इन लोगों का मानना है कि बिड़ला मैनेजमेंट की दूसरी पेशकश अधिक व्यवहारिक और फायदेमंद है जिसमें उन्होंने सभी मजदूरों को वीआरएस की रकम का एकमुश्त भुगतान करने की बात की है।
वीआरएस की रकम तय करने के लिए बिड़ला मैनेजमेंट से नौकरी के हर एक साल के बदले 50 दिनों का वेतन देने की बात चल रही है ।कई मज़दूर मानते हैं कि एक मुश्त पैसा ले कर कोई दूसरा काम ढूंढना ज़्यादा फायदेमंद है । यदि फैक्ट्री ले ली और फिर घाटे की वजह से बंद करना पड़ी तो न घर के रहेंगे ना घाट के । कई इंदौर की हुकमचन्द मिल की मिसाल देते हैं जिसके मज़दूरों की सारी जिंदगी इसी संघर्ष में बीत गई और वे कोई दूसरा काम भी न कर पाए ।
कंपनी की कीमत को लेकर भी मजदूर और नेता एकमत नहीं है । एक जानकार ने बताया कि 84 एकड़ जमीन का मूल्य लगभग 20 से 25 करोड़ , इमारतों के 25 करोड़ और मशीनों की भंगार कीमत सब कुछ जोड़ दिया जाए तो यह फैक्ट्री 70 करोड़ से अधिक की नहीं है । पर मजदूर अपने भावनात्मक लगाव की वजह से इसकी कीमत कहीं अधिक लगा रहे हैं । कई मज़दूर ऐसे है जो दूरदराज के इलाकों से यहां आए और पिछले बीस पच्चीस सालों से वे यहीं के होकर रह गए हैं । वे कहते हैं हम इस फैक्टरी के बगैर अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते । हमें यह फैक्ट्री दे दीजिए , हम अपनी जान लड़ा देंगे।
जज्बातों और जमीनी मुश्किलों की इस लड़ाई में फैसला लेना मुश्किल भी है और खतरनाक भी । मजदूरों को फैक्ट्री मालिक बनाने के प्रयोग इक्का-दुक्का ही सफल हुए हैं । मेधा पाटकर और उनके सहयोगी नेताओं के कंधों पर एक बड़े फैसले की जिम्मेदारी है ,क्योंकि यह न सिर्फ एक हज़ार मजदूरों के परिवारों के भविष्य का फैसला है , बल्कि आने वाले समय में जब भी कोई फैक्टरी घाटे की वजह से बंद होगी या बेची जाएगी तो इस फैसले को नजीर की तरह पेश किया जाएगा। दुआ कीजिये कि जो भी फैसला हो उन एक हज़ार परिवारों की ज़िंदगी मे बेहतरी ले कर आये —