by — प्रिय दर्शन

जब पत्रकारिता में वैचारिक चमक और साहस दोनों कम होते जा रहे हैं, उस दौर में राजकिशोर का जाना हिंदी के बौद्धिक समाज के लिए एक बड़ा हादसा है। कम से कम चार दशकों से वे भारतीय समाज की विराट उथल-पुथल और सार्वजनिक जीवन में बढ़ते अंधेरे के बीच जैसे एक प्रकाश-स्तंभ का काम कर रहे थे- अपने नियमित लेखन से सबको रास्ता और रोशनी दिखाते हुए। ‘रोशनी यहां है’ कहने को उनकी एक किताब का नाम है, लेकिन यह उनके पूरे लेखन का रूपक भी है। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के अलावा वे तीसरे ऐसे पत्रकार थे जिनके गद्य की चमक और ख़ुशबू साहित्य और समाज में दूर तक फैलती थी।

लेकिन राजकिशोर इन दोनों से अलग थे। उनके लेखन में तर्क और संवेदना का अद्भुत मेल होता था। यह तर्क किसी शून्य से नहीं आता था। वह उनके अध्ययन और चिंतन की उपज होता था। कई बार वे अपनी मौलिक धारणाओं से चकित कर देते थे। कई बार वे किसी पहले से स्थापित धारणा को इस तरह पलटते कि उन पर नए सिरे से विचार करने की इच्छा होती। लेकिन वे कहीं से अतिरेकी नहीं थे। दूसरों का पक्ष समझने का धीरज उनमें ख़ूब था। इस धीरज की वजह से भी उनकी तर्क पद्धति बहुत मानवीय हुआ करती थी। समकालीन राजनीति और जीवन पर उनकी पकड़ बहुत गहरी थी और उनके चिंतन में एक मौलिकता थी जो उनको लगभग दार्शनिक बनाती थी। कभी अनामिका ने उनको हिंदी का कन्फ्यूशियस लिखा था। वैचारिक तौर पर वे समाजवादी थे- लोहिया से लेकर किशन पटनायक तक के विचारों के बेहद क़रीब। लोहिया उनकी वैचारिकता के प्राणवायु थे। उनके चिंतन में सामाजिक न्याय, आर्थिक बराबरी और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न केंद्रीय था। ख़ुद को नास्तिक मानते थे और दृढ़ता के साथ किसी भी कर्मकांड का विरोध करते थे। बस सवा महीने पहले उन्होंने अपने जवान बेटे को खोया था लेकिन मृत्यु पर होने वाले धार्मिक कर्मकांडों से इनकार किया था- यह कहते हुए कि नास्तिकता के इम्तिहान के मौक़े ऐसे ही होते हैं।

इन चार दशकों में उनकी सक्रियता का दायरा बहुत बड़ा रहा। ‘रविवार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में रहते हुए उन्होंने दुनिया भर के विषयों पर जो लेख लिखे, उनसे आने वाली पीढ़ियां प्रशिक्षित हुईं। राजेंद्र माथुर या प्रभाष जोशी की तरह उन्हें किसी बड़े समूह का संपादक होने का सुयोग नहीं मिला, लेकिन छोटी-छोटी जिन पत्र-पत्रिकाओं का बीच-बीच में उन्होंने संपादन किया, उन पर उनकी विचार दृष्टि की छाप बहुत स्पष्ट रही। ‘दूसरा शनिवार’, ‘विदुरा’ और ‘रविवार डाइजेस्ट’ के उनके संपादित अंक अब भी बचाए रखने की इच्छा होती है। ‘आज के प्रश्न’ शृंखला के तहत उन्होंने जो बीसेक किताबें संपादित कीं, वे पिछले दो दशकों में देश के समकालीन मुद्दों को समझने के लिहाज से युवाओं के लिए संभवतः सबसे प्रासंगिक संदर्भ-ग्रंथ हैं। वैचारिक आलेखों पर तैयार उनकी कई किताबें हिंदी की समृद्ध विरासत हैं। और तो और, उनके दो उपन्यास भी हैं- ‘तुम्हारा सुख’ और ‘सुनंदा की डायरी’, और एक कविता संग्रह- ‘पाप के दिन।‘

यह अनायास नहीं है कि राजकिशोर जी के सान्निध्य में युवा पीढी के कई पत्रकार ख़डे हुए। उनसे कई लोगों ने लिखना सीखा- सुघड़, सतर्क और सुंदर गद्य। यह जाना कि बिना अधीर और असंयमित हुए अपनी बात कैसे रखी जाती है। उनका गद्य जितना शालीन था उतना ही महीन भी, विरोध को वे बहुत मर्यादापूर्वक व्यक्त करते थे और जहां ज़रूरत समझते, अपने गद्य में व्यंग्य और वाग्विदग्धता की बहुत गहरी और तीखी धार ले आते। इन पंक्तियों के लेखक ने भी उनका यह गुण अर्जित करने की कोशिश की और पाया कि यह काम बहुत मुश्किल है। लेकिन उनका लिखा हुआ पढ़कर ही नहीं, उनके कहने पर लिख कर भी कई युवा लेखक आगे बढ़े। अखबारों-पत्रिकाओं और किताबों के संपादन के दौरान उन्होंने नियमित तौर पर युवा लेखकों से लेख लिखवाए। ‘आज के प्रश्न’ शृंखला की किताबों के लेखक बहुत पके हुए और दिग्गज विचारक नहीं हैं, ज़्यादातर वे अपने समय के उत्सुक और प्रश्नाकुल युवा पत्रकार हैं जिन्होंने मेहनत से किसी मुद्दे पर अपनी एक राय बनाई और प्रस्तुत की।

खास बात यह है कि राजकिशोर के अध्ययन का दायरा मूलतः हिंदी साहित्य-केंद्रित होते हुए भी विस्तृत था। वे जिस सहजता से प्रसाद और प्रेमचंद, श्रीकांत वर्मा और शमशेर पर लिख सकते थे, उसी सहजता से आर्थिक और सामाजिक महत्व के दूसरे समकालीन प्रश्नों पर भी। उनके साहित्यिक लेख पढ़कर उनको एक मौलिक आलोचक कहने की तबीयत होती थी, जबकि जाति या सांप्रदायिकता के प्रश्न पर उनकी टिप्पणियां उनको बिल्कुल समाजशास्त्री बनाती थीं। हालांकि वे ख़ुद यह पूछ सकते थे कि हिंदी के किसी आलोचक को समाजशास्त्री भी क्यों नहीं होना चाहिए। दरअसल उनके लेखन में ये दोनों जैसे एकाकार हो जाते थे और यही वजह है कि बहुत सारे शास्त्रीय टिप्पणीकारों के मुक़ाबले उनकी अंतर्दृष्टि अपनी मौलिकता और गहराई में चकित करती थी। हिंदी साहित्य में चली कई बहसों में उनका हस्तक्षेप अचानक सबसे सही पक्ष लगने लगता था। ‘हिंदी लेखक और उसका समाज’ उनके इस पक्ष को समझने के लिहाज से उल्लेखनीय किताब है। इस किताब में वे प्रेमचंद के घीसू-माधव पर हो रहे दलित हमले पर विचार करते हैं, शमशेर की कविता और रघुवीर सहाय की पत्रकारिता की चर्चा करते हैं, देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘मुसलमान’ की अपने ढंग से व्याख्या करते हैं और श्रीलाल शुक्ल से लेकर निर्मल वर्मा तक को सवालों से बींध देते हैं। ‘राग दरबारी’ का संदर्भ लेकर हिंदी व्यंग्य में सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन पर चोट करने की जो प्रवृत्ति है, उसको वे रेखांकित करते हुए यह कहना नहीं भूलते कि हरिशंकर परसाई इस प्रवृत्ति के अपवाद हैं। निर्मल वर्मा की वैचारिक मुद्राओं पर वे बहुत सख़्त लहजे में टिप्पणी करते हैं और भीष्म साहनी के तमस की सीमाओं का उद्घाटन करते वे हिचकते नहीं।

लेकिन साहित्य राजकिशोर की चिंताओं का बस एक आयाम है। अगर ध्यान से देखें तो उनकी चिंता मूलतः एक मानवीय लोकतंत्र की है। बल्कि इस तरह सोचने पर यह खयाल आता है कि वे राजेंद्र माथुर या प्रभाष जोशी के मुक़ाबले रघुवीर सहाय के कहीं ज़्यादा क़रीब खड़े हैं। इसी किताब में रघुवीर सहाय पर लिखते हुए वे एक बहुत मार्मिक वाक्य लिखते हैं- ‘व्यावसायिकता भाषा को अंदर से घायल करती है तो तानाशाही बाहर से।‘ कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा और विचार पर हो रही चोट को वे किस कदर पहचानते थे।

लोकतंत्र की जो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, उन पर भी शायद इसी वजह से राजकिशोर बार-बार विचार करते दिखाई पड़ते हैं। ‘रोशनी यहां है’ नाम के उनके संचयन में ‘बाज़ार की तानाशाही’ के नाम से एक लेख है। लेख की प्रारंभिक पंक्तियां ही बताती हैं कि राजकिशोर तानाशाही के कितने रूपों की शिनाख्त करते थे- ‘बीसवीं सदी ने अनेक प्रकार की तानाशाहियां और उनके ख़िलाफ़ संघर्ष देखा है। इनमें चार मुख्य हैं- फौज की तानाशाही, नस्ल की तानाशाही, विचार की तानाशाही और बाज़ार की तानाशाही। पांचवीं तानाशाही पुरुष की तानाशाही है जिसका इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना सभ्यता का इतिहास।‘

जातिवाद, सांप्रदायिकता, और लैंगिक गैरबराबरी- वे तीन बिंदु हैं जिन पर राजकिशोर बार-बार लौटते हैं। ‘जाति कौन तोड़ेगा’ और ‘अगर मैं दलित होता’ जैसे उनके मशहूर लेखों के अलावा उनकी टिप्पणियों में जातिवाद से संघर्ष का प्रश्न बार-बार सामने आता है। इसी तरह वे सांप्रदायिकता पर कई कोणों से विचार करते हैं और धर्म और ईश्वर तक को प्रश्नांकित करते हैं। लैंगिक संवेदना के पक्ष में जितना मार्मिक लेखन उनका है, वह हिंदी में कम लोगों का होगा।
बल्कि ध्यान देने लायक बात यह है कि अपने उत्तर काल में राजकिशोर लोहिया की अंगुली थामे-थामे गांधी तक पहुंचते हैं और धीरे-धीरे लगभग गांधीवादी हो उठते हैं। कुछ इस हद तक कि नितांत तार्किक होते हुए भी वे तर्कवाद के पार जाने को तैयार नज़र आते हैं। लेकिन यह गांधीवाद जब उनको जाति के संदर्भ में अपर्याप्त लगता है तो बिल्कुल आख़िरी दौर में वे अंबेडकर की ओर मुड़ते हैं। यह अनायास नहीं है कि उनकी मृत्यु के तत्काल बाद उनसे जुड़ी जो किताब प्रकाशित हुई, वह अंबेडकर के लेखों के अनुवाद से बनी है जिसमें उनका मशहूर लेख ‘जाति का विनाश’ भी शामिल है।

कहने की ज़रूरत नहीं कि उनके न रहने से विचारहीनता का बढ़ता ऊसर कुछ और बड़ा हो गया है।
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राजकिशोर जी से मेरा रिश्ता सिर्फ लेखक-संपादक और पाठक का नहीं था। वे दिल्ली में मेरे सबसे आत्मीय जनों में रहे। उनसे मेरी पली मुलाकात 1993 में हुई थी। हालांकि यह मुलाकात अच्छी नहीं रही थी। मैं दिल्ली नया-नया आया था और ‘नवभारत टाइम्स’ के दफ्तर में आकर अपने प्रिय लेखक से मिला था। इस पहली मुलाकात में ही यह समझ में आ गया था कि लेखक जितना सरल है, व्यक्ति उतना ही जटिल है। उनके व्यक्तित्व में एक लापरवाह अक्ख़ड़ता थी जिसके साथ उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं पत्रकारिता छोड़ कर कोई क़ायदे का काम करूं। इसके बाद ‘नवभारत टाइम्स’ के दफ़्तर में ही आते-जाते उनसे सामना हो जाता, लेकिन बातचीत से मैं कतराता था। लेकिन अचानक ‘नवभारत टाइम्स’ के गलियारे में ही राजकिशोर जी ने मुझे रोक लिया।

उन्होंने ‘जनसत्ता में प्रकाशित मेरा एक लेख ‘अपने घर लौटता एक लेखक’ पढ़ा था। यह बीस साल बाद रूस लौटे लेखक अलेक्जांद्र सोल्ज़ेनिस्तीन के संकटों पर केंद्रित एक लेख था। उन्होंने कहा, ‘आपका लेख पढ़ा था।’ मैंने पूछा, कैसा लगा? उनका जवाब था, ‘बहुत अच्छा नहीं, लेकिन दूसरों से बेहतर।‘

यह जवाब भी मेरे लिए किसी इनाम से कम नहीं था। अगला इनाम उन्होंने अगले ही लम्हे यह दिया कि मुझे चाय पिलाने ले गए। यह हमारी आत्मीयता की शुरुआत थी। हालांकि दोनों के बीच बराबरी का कुछ नहीं था। वे बहुत वरिष्ठ थे- उम्र में भी, ओहदे में भी और हैसियत में भी। मैं उन दिनों दिल्ली आया बिल्कुल अनजान सा फ्रीलांसर था और वे उस दौर के ‘नवभारत टाइम्स’ के शीर्षस्थ पत्रकारों में थे, जब उस अखबार की तूती बोलती थी। राजकिशोर तब भी अपने ओहदे से बड़े थे।

लेकिन अगले कुछ दिनों में उन्होंने यह दूरी बिल्कुल घटा दी थी। उन्होंने कहा कि शाम को चार बजे के बाद वे फ्री हो जाया करते हैं और मैं चाहूं तो उनके पास आकर बैठ सकता हूं- बस गपशप के लिए।

इस निरंतर संवाद के दौरान कई बातें समझ में आती रहीं। लेखक राजकिशोर और व्यक्ति राजकिशोर के बीच एक फ़ासला था। व्यक्ति के रूप में वे अयोग्यताओं, अपर्याप्तताओं और औसतपन के प्रति कहीं ज़्यादा कटु थे। वे दूसरों की आलोचना करने में देरी नहीं करते थे, जरूरत भर निंदा भी कर लिया करते थे। कई बार- बेशक बहुत कम- उनके मुंह से गालियां भी निकल पड़तीं, जिससे मेरा भाषिक शील कुछ ज़्यादा आहत होता। मैं सोचता था कि यह फासला क्यों है। क्या लेखक और व्यक्ति अलग-अलग हैं?

यह बात धीरे-धीरे मेरी समझ में आई- और निजी अनुभवों से ही आई- कि राजकिशोर जी के व्यक्तित्व की कई परतें हैं। जो सबसे ऊपरी परत है, जो सतह है- उस पर समय की धूल-मिट्टी, उसके राग-विराग, बहुत हैं। यहीं से उनकी तात्कालिक और त्वरित टिप्पणियां आती हैं। लेकिन राजकिशोर जी के व्यक्तित्व की एक दूसरी परत भी थी। वे इस तात्कालिक आवेग से इतनी ही तेज़ी से उबर आते थे। वे शत्रुओं की भी प्रशंसा कर लेते थे और मित्रों की सीमाओं को भी पहचानते थे। जो सबसे भीतरी परत थी, असली राजकिशोर वहां बसते थे। यहां पर्याप्त संवेदना और करुणा थी, दूसरों के काम आने की तत्परता भी, दूसरों से कुछ न मांगने का शील भी और अन्याय से आंख न मिलाने वाला साहस भी। जो उनका सतही अक्खड़पन था वह शायद इसी अंदरूनी अक्खड़पन से पैदा आक्रोश की भी उपज था। संभवतः इसी व्यक्तित्व की वजह से उन्हें नौकरियों के बड़े अवसर नहीं मिले- वे अपने लचीलेपन को उस जरूरी लिजलिजेपन में नहीं बदल पाए जो कई बार सफलता या करिअर के शिखर पर पहुंचने के लिए ज़रूरी होता है। संभवतः अपनी नौकरी भी उन्होंने अपने इसी व्यक्तित्व की वजह से खोई थी।

लेकिन इस व्यक्तित्व ने उन्हें मित्रों का एक भरा-पूरा समाज दिया- या यह समाज उन्होंने बनाया। 1994 में, मेरी मां इलाज के लिए दिल्ली आई- एम्स में भर्ती हुई। तब तक मैं इस महानगर में एक अनजान युवक ही था जिसका कोई बड़ा मददगार नहीं था। शायद ऐसी किसी मदद की ज़रूरत भी नहीं थी। लेकिन अचानक एक दिन मैंने पाया कि राजकिशोर अपनी पत्नी के साथ मेरी मां को देखने अस्पताल चले आए। जब यह ख़बर मिली कि उन्हें कैंसर है, वे पांडवनगर के मेरे घर पर भी आए। यह सहज करुणा थी जो राजकिशोर जी को सपत्नीक एक युवक के घर ले आई थी जिसके सिर से जल्द ही मां का साया उठने वाला था।

तब से बना वह पारिवारिक रिश्ता आने वाले दिनों में और प्रगाढ़ हुआ। जब मेरी शादी हुई तो वे फिर अपनी पत्नी विमला जी को लेकर मेरे घर आए। उन्होंने स्मिता- यानी मेरी पत्नी- को आश्वस्त किया कि वह खुद को अकेला न समझे, यह मान ले कि वे दोनों उसके सास-ससुर हैं। इस आश्वस्तिदायी वाक्य के अलावा इस रिश्ते के परीक्षण की और कोई घड़ी नहीं आई- लेकिन यह वाक्य भी अपने-आप में एक ऐसी डोर बांधने वाला था जो उनके निधन के बाद भी बंधी हुई है। बरसों बाद जब दिल्ली में मैं अपना घर लेने के संघर्ष में जुटा हुआ था तो राजकिशोर जी ने अपनी ओर से मदद का प्रस्ताव किया और वह मदद भी की।

ऐसा नहीं कि राजकिशोर के व्यक्तित्व की इस आत्मीयता का प्रसाद सिर्फ़ मुझे मिला हो। अपने समय के कई समकालीन या कुछ वरिष्ठ लोगों के नाम मुझे तत्काल याद आते हैं जिनसे राजकिशोर जी और उनका परिवार जुड़े रहे और यह जुड़ाव बिल्कुल निजी चिंताओं और मदद तक जाता रहा। संजीव क्षितिज, संत्येंद्र रंजन, अरिहन जैन, हरिमोहन मिश्र, अरुण त्रिपाठी और ऐसे ढेर सारे कई मित्र हैं जिनका राजकिशोर जी के यहां से बिल्कुल पारिवारिक नाता रहा। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस पारिवारिकता में धीरे-धीरे राजकिशोर जी का योगदान कम होता गया, उनकी पत्नी का बढ़ता गया।

तो निजी और सतही बातचीत में राजकिशोर जी के व्यकित्व में जो अक्खड़पन नज़र आता था, जो कभी-कभी लगभग अशालीन होता हुआ प्रतिक्रियावाद दिखता था, दरअसल वह अपने भीतरी मन को- अपने साहस को, अपनी करुणा को चुपचाप अपने भीतर सिंचित होते रहने देने का एक उपक्रम भर था। वे दूसरों को जैसे अपने उस व्यक्तित्व से दूर रखते थे, उसमें दाखिल होने नहीं देते थे। इस ज़िद ने उन्हें बनाया भी और उन्हें तोड़ा भी।

जब अप्रैल में उनके युवा बेटे विवेक का देहावसान हुआ तो उसका दुख उन्होंने किसी से बांटने से इनकार कर दिया। शवदाहगृह मे भी वे कोशिश करते रहे कि यह दुख उनके चेहरे पर न दिखे। शोक जताने आने वालों से अधिकतम तटस्थता के साथ मिलने की कोशिश करते। मृत्यु के दार्शनिक आयामों को भी याद करते और जीवन की दैनंदिन खबरों का भी हवाला देते जिनमें युवाओं की मौत कोई अनूठी बात नहीं होती।

अपने भीतर पोसा-पाला यह दुख जैसे उन्हें खा गया। वह उनके फेफड़ों में ऐसा संक्रमण बन कर बैठ गया जिससे वे आइसीयू में 20 दिन लड़ते रहे, लेकिन अंततः नाकाम रहे।
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बेटे की मौत के बाद जो लोग यह देखकर आश्वस्त हो रहे थे कि राजकिशोर अपने गमों से उबर कर दुनिया में लौट आए हैं और दुनिया भर के विषयों पर लिख रहे हैं, वे अचानक यह खबर सुन कर अवसन्न रह गए कि राजकिशोर एम्स के गहन चिकित्सा कक्ष में भर्ती हैं। जीवन और मृत्यु की यह एक नई लड़ाई थी जिसे एक दुख से उबर भी न पाई मां और बहन- यानी राजकिशोर जी की पत्नी और बेटी अकेले ल़ड रही थी। बेशक, इस मोड़ पर वे सारे मित्र साथ खड़े थे जो पिछले कुछ दशकों में इस परिवार ने कमाए थे। कोई खाना ला रहा था, कोई देखने आ रहा था, कोई ढाढस बंधा रहा था, लेकिन अंततः यह विमला जी और गुड़िया की लड़ाई थी जो उन्होंने लड़ी।

और यह ल़डाई भी क्या लड़ाई थी? अपने आख़िरी दिनों में राजकिशोर जी के भीतर विफलता का सा एक एहसास था जिसका ज़िक्र उनकी पत्नी ने उनके निधन के बाद आयोजित एक स्मृति-सभा में भी किया।

लेकिन एम्स के आपात्कालीन हिस्से की सातवीं मंजिल के एक लंबे गलियारे में एक मां और बेटी ने 20 दिन जिस तरह काटे, उसे राजकिशोर जी देख पाए होते तो शायद विफलता का यह एहसास उनके भीतर से जाता रहता। जिस एम्स में आधा घंटा काटते घुटन होती है, वहां ये दोनों 20 दिन रहीं- किसी कैदी या मजबूरी में पड़े किसी तीमारदार की तरह नहीं, बल्कि इतने सहज भाव से कि देखकर हैरानी होती थी। गहन चिकित्सा कक्ष के बाहर के उस गलियारे में जितने दुखियारे लोग थे, उनकी फिक्र करना, उनका हाल पूछना, अपने लिए आया खाना उनको खिलाना- यह सब वे इतनी आत्मीयता से कर रही थीं कि वह चार फुट चौड़ा गलियारा जैसे उनके जाने-पहचाने मुहल्ले में बदल गया था। यह वह सामाजिकता थी- वह अराजनीतिक समाजवाद, जिसकी बात राजकिशोर जी जीवन भर करते रहे और जिसे अपने आचरण में उनके सबसे करीबी लोगों ने ढाला। कहने की ज़रूरत नहीं कि राजकिशोर जी के विश्वासों के तहत ही इन्होंने भी कुछ रिश्तेदारों के आग्रह के बावजूद राजकिशोर जी के अंतिम संस्कार को कर्मकांड से दूर रखा।

इस मज़बूती का एक और पहलू है। मां और बेटी दोनों को एहसास था कि उनके घर का एक और सदस्य कभी भी जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता था जैसे बेटी मां से यह अंदेशा छुपाए रखना चाहती हो और मां बेटी को दिलासा देती रहना चाहती हो कि उसके पिता ठीक होकर घर लौट आएंगे। इस हूक पैदा करने वाली त्रासदी का एक गवाह बन कर जीवन का कुछ और मर्म समझने का मुझे अवसर मिला, इतना भर कह सकता हूं।

बेशक, मृत्यु अंततः सबसे बड़ा सच साबित हुई। सारी उम्मीदों को उसने धूल में मिला दिया, राजकिशोर जी की देह अग्नि को समर्पित हो गई। लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके प्रशंसकों और मुरीदों ने उनको जिस तरह याद किया, वह बताता है कि रचनात्मकता की उम्र रचनाकार से बड़ी होती है, कि उसकी सांस भले चुक जाए, उसके सरोकार बचे रहते हैं।
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वे 71 साल के थे। इन दिनों ये उम्र जाने की नहीं होती। हालांकि राजकिशोर होते तो अपनी तार्किकता से पूछ सकते थे कि फिर जाने की क्या उम्र होती है।