निष्पक्ष लोगों के ऊपर खतरा बढ़ने का मतलब यह भी है कि हमारी राजनीति और समाज पर खतरा बढ़ गया है

‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की हत्या पर भारत सरकार के एक मंत्री का कहना है कि वे इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने मध्य मार्ग तलाशने की कोशिश की थी. इस बात और स्पष्ट करके कहा जाए, तो यह कहा जाएगा कि शुजात बुखारी ने विभिन्न परस्पर-विरोधी पक्षों में किसी एक की बात को सही मानने के बजाय तटस्थता से काम लिया था. उन्होंने संवाद और सामंजस्य के जरिए सर्वमान्य समाधान की ओर बढ़ने की हिमायत की थी. और जैसा कि होता है, इस क्रम में उन्हें समय-समय पर सरकार और चरमपंथियों समेत सभी संबंधित पक्षों की आलोचना करनी पड़ी थी. प्रकारांतर से गौरी लंकेश के साथ भी कमोबेश ऐसा ही हुआ था. वे भी कई पक्षों की एक साथ आलोचना कर सबकी आंखों की किरकिरी हो चुकीं थीं. पिछले कई वर्षों में तटस्थ बौद्धिकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा की ऐसी कई घटनाएं हुई हैं.

लेकिन इससे इतर बौद्धिकों और विचारकों से लेकर सामान्य जनों के बीच भी एक विचित्र बहस चल पड़ी है. यह कहा जा रहा है कि बौद्धिकों को अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी चाहिए. उन्हें बताना चाहिए कि मौजूदा राजनीतिक ध्रुवों में वे कहां पर खड़े हैं. यह कहा जा रहा है कि ‘तटस्थ’ होना या दिखना एक प्रकार का पाखंड है. कुछ लोग इसे राजनीतिक अवसरवाद और सभी पक्षों से लाभ उठाने की प्रवृत्ति करार दे रहे हैं. कुछ इसे विभिन्न विवादास्पद प्रश्नों पर रणनीतिक चुप्पी साधने या चुनिंदा प्रश्नों पर ही लिखने-बोलने के सुभीते से जोड़कर देख रहे हैं. कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के उस काव्यांश को बारंबार उद्धृत किया जा रहा है कि ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी इतिहास’. यह सब दरअसल ‘तटस्थता’ शब्द और कर्म के वास्तविक मर्म को न समझ पाने की वजह से है.

‘तटस्थता’ का अर्थ ‘उदासीनता’ नहीं है. हालांकि आध्यात्मिक संदर्भों में ‘उदासीनता’ भी नकारात्मक न होकर सकारात्मक हो जाती है. फिर भी, सामाजिक और राजनीतिक प्रसंगों में ‘उदासीनता’ अवांछनीय ही कही जा सकती है. तटस्थ, उदासीन, निष्पक्ष, निरपेक्ष, निर्लिप्त आदि शब्द लगभग समानार्थी मान लिए जाते हैं. लेकिन ये सारे शब्द अलग-अलग भाव रखते हैं. तटस्थ शब्द ‘निष्पक्ष’ के बहुत करीब है, फिर भी, इनके बीच भाव का अंतर हो सकता है.

किसी भी विषय पर विचार या तर्क-वितर्क के दौरान देखा गया है कि आमतौर पर लोग दो पक्षों में बंट जाते हैं. लेकिन मान लीजिए कि किसी व्यक्ति को लगता है कि उन दोनों ही विपरीत पक्षों में से किसी का भी पक्ष न्याय या सत्य के अनुरूप नहीं है, तो वह उन दोनों पक्षों से अलग होकर का न्याय या सत्य का पक्ष लेता है. तो ऐसे व्यक्ति को हम तटस्थ या निष्पक्ष कह सकते हैं. ऐसा व्यक्ति चर्चा में शामिल होता है और हस्तक्षेप भी करता है, लेकिन किसी भी पक्ष के साथ उसकी पूर्व प्रतिबद्धता नहीं होती. संबंधित पक्षों में जिसकी भी गलती उसे नजर आती है, उसकी गलती विनम्रतापूर्वक दिखाने या सत्याग्रही विरोध करने की आज़ादी उसकी पास होती है. लेकिन यदि वह व्यक्ति उक्त विषय पर पक्ष-विपक्ष पर हो रही चर्चा से ही दूरी बरत लेता या चुप रहता, तो उसे निरपेक्ष, निर्लिप्त या उदासीन कहा जा सकता है. आज समाज और राजनीति में अधिकांश लोग हमें या तो किसी न किसी पार्टी, संगठन या विचाराधारा के प्रति प्रतिबद्ध मिलते हैं या फिर निर्लिप्त. सही मायनों में तटस्थ व्यक्ति तो हमें दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते.

इसलिए आज यदि कोई मानता है कि तटस्थ होना सबसे अधिक सहूलियत और सुभीते वाला काम है, तो यही कहा जाएगा कि वह तटस्थता और तटस्थ लोगों स्थिति को ठीक से नहीं समझता. दरअसल तटस्थ होना आज के दौर में सबसे मुश्किल स्थिति है.

आज के ज्यादातर तटस्थ लोग अकेले हैं और असंगठित हैं. यदि वे संगठित भी होने की कोशिश करें, तो भी हाशिए पर ही रहेंगे क्योंकि उनकी संख्या बहुत कम होगी. उनके पीछे किसी स्थापित दल, संगठन या सत्ता की शक्ति नहीं होती, क्योंकि वह सभी को आईना दिखाकर उनसे दुश्मनी मोल ले चुके होते हैं. ‘तटस्थ’ लोगों के पास यदि कोई सुविधा है, तो केवल यह कि वे बिना किसी दलबंदी का शिकार हुए जनता का, सत्य का और न्याय का ‘पक्ष’ ले सकते हैं. यह सहूलियत बहुत खतरे वाली है, क्योंकि फिर वह कहीं का नहीं रह जाता. असंगठित और अमूर्त ‘जनता’ उसकी वास्तविक सुरक्षा के लिए आगे नहीं आती. न्याय का पक्ष लेने का दावेदार कोई दल या संगठन उसके साथ खड़ा हो, ऐसा कम ही होता है, क्योंकि सबने अपनी-अपनी विचारधारा और दलीय हितों के आधार पर न्याय को अलग-अलग रूप में परिभाषित कर रखा होता है.

दुनियाभर में आज ज्यादातर समाजों में घनघोर राजनीतिक ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है. हमें केवल यही विकल्प दिया जाता है कि या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे विरोधी के साथ. बीच का या इससे परे का कोई रास्ता नहीं. परस्पर-विरोधी विचारधाराओं के खांचे बना दिए गए हैं और हमसे कहा जाता है कि इन बने-बनाए खांचों में से किसी एक को चुन लो. जबकि सच्चाई यह है कि प्रचलित अर्थों वाली कोई भी विचारधारा अपने व्यापकतम रूप में भी न्याय और सत्य का एकांश ही हो सकती है. लेकिन होता क्या है? व्यावहारिक रूप में वह विचारधारा अपने-आपमें पूर्ण सत्य होने का भ्रम और अहंकार पाल लेती है और इस तरह अपने अनुयायियों को कट्टर, जड़ और हिंसक बनाने की संभावना से लैश होती है. प्रतिक्रिया और प्रतिशोध के नाम पर वह अपनी हर मानसिक, वाचिक और कर्मणा हिंसा को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करती है. उनकी मानवीय संवेदना, उनकी तर्कपद्धति, उनका न्यायबोध और यहां तक कि उनकी कल्पनाशीलता भी, यानी लगभग सबकुछ उस कथित विचारधारा या उस पर आधारित राजनीतिक दल से मर्यादित होने लगती है.

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से ऐसे समझा जा सकता है. जब केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का कोई कार्यकर्ता मारा जाता है, तो हमारे वामपंथी भाई-बहन की संवेदना उस तरह से नहीं जागती. इसी तरह पश्चिम बंगाल में यदि भाजपा का कोई कार्यकर्ता मारा जाता है, तो तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा कोई व्यक्ति उसकी मुखर आलोचना नहीं करता. दिखावे के लिए या पॉलिटिकली करेक्ट होने के लिए वह सार्वजनिक रूप से कुछ गोलमोल कह भी दे, लेकिन मन-ही-मन वह इतनी प्रतिक्रिया से भरा होगा कि उस हत्या को न्यायोचित ठहरा चुका होगा. यही मनःस्थिति किसी वाम कार्यकर्ता या तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता की हत्या के समय आरएसएस, भाजपा और अन्य पार्टियों से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं की होती है.

इस तरह किसी भी विचारधारा का अंध-समर्थन और खेमेबाजी हमारी न्यूनतम मानवीय संवेदनशीलता तक का अपहरण कर सकती है. कोई कम तो कोई ज्यादा. फर्क केवल समय, परिस्थिति, विचारधारात्मक लोकेशन और मात्रा का ही होता है. जबकि ये सभी पार्टियां सिद्धांत और विचारधारा के स्तर पर अहिंसा की माला जपती दिख सकती हैं.

ऐसे में ‘तटस्थ’ लोग क्या करेंगे? हत्या किसी की भी हो, तटस्थ लोगों का दिल कराहेगा. उनकी मानवीय संवेदनशीलता शुद्ध और अक्षुण्ण रहती है, इसलिए वे किसी भी प्रकार की हिंसा का विरोध करते हैं. इसलिए वे अलग-अलग समय पर अलग-अलग पार्टी और संगठन का विरोध कर उनसे दुश्मनी और मनमुटाव मोल लेते हैं. हर पार्टी अलग-अलग समय पर उन्हें अलग-अलग पार्टी का दलाल, प्रवक्ता या छिपा समर्थक घोषित करती रहती है. और अंततः ये तटस्थ लोग या तो अलग-थलग पड़ जाते हैं या किसी विचारधारा या खेमा के अंध-समर्थक के हाथों हिंसा का शिकार हो जाते हैं.

आज जब स्वयं बौद्धिकों के बीच ही‘तटस्थता’ बदनाम हो रही है तो इसका कारण इस शब्द का सकारात्मक और नकारात्मक अर्थ-निरूपण भी है. ‘तटस्थ’ शब्द का सर्वमान्य विश्लेषण संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि ‘खेमेबाज’ या ‘दलबंद’ लोग उसे स्वीकारने को तैयार ही नहीं होते. स्वीकारें भी क्यों? उनके सामने नकली ‘तटस्थ’ लोगों का व्यावहारिक उदाहरण होता है जिनकी वजह से वे किसी सच्चे ‘तटस्थ’ व्यक्ति को भी ‘धूर्त अवसरवादी’ ठहरा बैठते हैं. कई बार उन्हें ‘अराजनीतिक’ कहकर भी कोसा जाता है. ‘तटस्थता’ को वे ‘सर्वतुष्टिकरण’ या सबका मुंह पोछते रहने के अर्थ में लेते हैं. वे समझते हैं कि यह सबको खुश करके अपनी जेब भरने वाला काम है. जबकि तटस्थता का ऐसा अर्थ लगाना इसके मूल अर्थ का जबरिया विकृतीकरण है.

सच्चाई यह है कि तटस्थता को जीवन में अपनाना बहुत मुश्किल है. यह बहुत साहस और कलेजे का काम है. इसमें कोई सुकून और सुरक्षा नहीं, बल्कि खतरे ही खतरे हैं. इन पंक्तियों के लेखक ने निजी अनुभवों से जाना है कि जब कोई अपने जीवन में तटस्थता को अपनाना शुरू करता है, तो संस्था-संगठन और दलों की बात तो जाने दें, स्वयं अपने कुल-परिजन और यार-दोस्त तक खफा होने लगते हैं.

तटस्थ लोगों का रोजी-रोजगार और घर-गृहस्थी तक चलना मुश्किल हो जाता है. यह विडंबना ही है कि स्वयं समाज ने ही तटस्थ लोगों के लिए इतनी दीवारें खड़ी कर दी हैं. आज जो भी संवादहीनता, हिंसक प्रतिक्रियावाद और युद्ध की परिस्थितियां बन रही हैं, उसकी वजह है कि हमने सत्यान्वेषी और विश्वमानुष बनने के लिए जरूरी तटस्थता का परित्याग स्वयं तो कर ही दिया है, हम अन्य तटस्थ लोगों को भी दुत्कारने का कोई अवसर नहीं चूकते.

आज के ध्रुवीकृत समाज में तटस्थता संभव भी है, यह आत्मविश्वास ही छीजता जा रहा है. जबकि तटस्थता का अर्थ कायरतापूर्ण चुप्पी या रणनीतिक मौन नहीं है. तटस्थता में विरोध की और जोरदार विरोध की पूरी गुंजाइश है. मानवता और न्याय की कसौटी पर उसका भी एक पक्ष होता है, जिसमें उसके विरोधी का सम्मान और कल्याण भी शामिल होता है. इसलिए उसके विरोध का तरीका होता है- ‘अहिंसक सत्याग्रह’. अहिंसक सत्याग्रह में दूसरों का मखौल उड़ाना, किसी को नीचा दिखाना, संवाद के स्तर पर छुआछूत बरतना, किसी पर हमेशा के लिए कोई ठप्पा लगा देना या स्टीरियोटाइप गढ़ना, ये सब हरगिज नहीं कर सकते.

गांधी को ही लीजिए. गांधी बेंथम और मिल के ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ की जगह ‘सर्वोदय’ का विचार लेकर आए थे. ‘स्वराज’ का विचार भी लेकर आए. इसमें ‘अदर’ या ‘अन्य’ की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, क्योंकि हर किसी को ‘स्व’ के विस्तार के रूप में ही देखा गया. जालिम के हृदय-परिवर्तन और प्रबोधन का सत्याग्रही प्रयास किया गया. धनपशुओं में भी ट्रस्टीशिप की भावना भरने का आह्वान किया गया. सर्वधर्म-सद्भाव और सर्वधर्म-समन्वय का प्रयास किया गया. छुआछूत-उन्मूलन और मानव-मानव के बीच के हर भेद को मिटाने का प्रयास किया गया. सत्य, प्रेम और करुणा के आधार पर वैचारिक मुक्तता की संभावना को जिंदा रखा गया. लेकिन हुआ क्या? वामपंथियों ने गांधी को ‘बुर्जुआ का दलाल’ कहा. दलित चिंतकों ने गांधी को ‘वर्ण-व्यवस्था का पोषक’ कहा. ब्राह्मणों और सवर्णों ने उन्हें ‘वर्ण-व्यवस्था और सनातन-धर्म के लिए खतरा’ माना. कट्टर हिंदुवादियों ने उन्हें ‘मुसलमानों का तुष्टिकरण करने वाला’ कहा. धर्मांध मुसलमानों ने उन्हें ‘केवल हिंदुओं का हित साधनेवाला नेता’ करार दिया. यहां तक कि वे अपने ही संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तक में अलग-थलग पड़ गए. यानी वे हर तरफ से गए. यह जरूर है कि गांधी जैसे तटस्थ, प्रयोगशील और परिवर्तनशील लोगों की अहमियत हमें बाद में पता चलती है. उल्लेखनीय है कि गांधी ने अपने जीते-जी ही ‘गांधीवाद’ नाम की किसी भी विचारधारा का कोई अस्तित्व होने से साफ इंकार कर दिया था.

किसी विचारधारा-विशेष को मानने वाले लोग अंततोगत्वा एक प्रजाति, जाति या संप्रदाय की शक्ल में ढलने लगते हैं. जबकि यदि केवल विचार को लेकर आगे बढ़ें तो हर व्यक्ति एक संभावना है. जैसे नास्तिकता अपने-आप में एक विचार है, जिसकी वैचारिक बुनियाद बहुत तार्किक, वैज्ञानिक, मानवीय और व्यापक हो सकती है. लेकिन यदि नास्तिक लोग नास्तिकतावाद की विचारधारा के आधार पर अपना एक संगठित समुदाय बनाने की ओर बढ़ चलें, तो वे हिंदुवाद, इस्लाम या ईसाइयत की तर्ज पर ही ‘नास्तिकतावाद’ नाम के एक नए संगठित-धर्म (ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन) को जन्म दे देंगे. इसके बाद उनमें भी वही जड़ता, कट्टरता, प्रचारवाद, विस्तारवाद और हिंसक प्रतिक्रियावाद जैसी बुराइयां घर करती जाएंगी, जो अन्य पंथिक धर्मों के साथ है. यानी जिसका विरोध करने चले थे, वे वही बन जाएंगे.

विचारधारा या दलबंदी के साथ यही सबसे बड़ी समस्या है. इसका सौ मन बोझ सिर पर लिए फिरनेवाले लोग उस विचारधारा से इतर कुछ सोच ही नहीं पाते. अभी एक खास विचारधारा के लोगों को ‘भक्त’ कहने का प्रचलन शुरू हुआ है. ठीक है कि वे एक प्रकार के ‘भक्त’ हुए, लेकिन हम स्वयं कौन से ‘भक्तिमुक्त’ अवस्था को प्राप्त हुए? हम भी तो प्रकारांतर से दूसरे प्रकार के ‘भक्त’ बनने को तत्पर रहते हैं.

किसी तटस्थ विचारक ने ठीक ही कहा था कि हम ‘अंधश्रद्धा’ तो कहते हैं, लेकिन ‘अंध-अश्रद्धा’ नहीं कहते. जबकि ‘अंध’ विशेषण का ठेका केवल श्रद्धा ने ही नहीं ले रखा है, अश्रद्धा भी अंधी हो सकती है. विचारों के मनका पिरोकर जब विचारधारा-रूपी माला बना ली जाती है, और बिखरने के डर से उन मनकों को बांध दिया जाता है, तो वह उस धागे में ही कैद हो जाती है. विचार का प्रवाह नदी की भांति होता है, जबकि विचारधारा तालाब की पानी की तरह होती है, उसके सड़ने का खतरा बना रहता है.

मनुष्य अपने स्वभाव से ही विचारों का प्राणी है. जैसे ही हम उसे विचारधारा का प्राणी बनाने की कोशिश करते हैं, वैसे ही उसका वैचारिक विकास रुक जाता है, कुंद हो जाता है, सीमित हो जाता है. वह अपनी विचारधारा का अंध-लठैत बनकर घूमने लगता है. अन्य मतों और पक्षों को सुनने-समझने की उसकी शक्ति कम होती जाती है. अन्य विचारों को पढ़ने-समझने तक की उसकी रुचि समाप्त होने लगती है. वह अपने चारों ओर एक बाड़ा बना लेता है. वह अपनी विचारधारा के लोगों से ही मिलना और संवाद करना चाहता है. फिर आपस में एक-दूसरे की पीठ ठोकने का खेल चलता है. विचारधारा और दलबंदी लोकतंत्र को भी ‘बहुमतवाद’ की स्तर तक संकुचित कर देती है. और फिर इसे ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने में देर नहीं लगती.

इसीलिए कबीर जैसे संत ने कहा कि ‘घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे’. तो वह घूंघट दरअसल हमारी संकीर्ण ‘विचारधारा’, दलबंदिता या खेमाबाजी या अपूर्ण सत्यांश को खंड-खंड में देखने की प्रवृत्ति ही है. उस घूंघट को हटाकर देखिए, उससे उबरकर देखिए, तभी वास्तव में सत्य का दर्शन होता है. तटस्थता को महसूस करके देखिए, वह मनुष्य या विश्वमानुष होने का निकटतम एहसास देती है. यदि हम अपने-अपने विचारधारात्मक टीले पर बैठकर छद्म ‘तटस्थता’ के व्यक्तिगत और नकारात्मक उदाहरणों की चीर-फाड़ और उनका मनोनुकूल विश्लेषण करते रहेंगे, तो वह भी हमें बहुत हद तक सुसंगतता का एहसास कराती रहेगी. लेकिन वह सुसंगतता एक प्रकार का ‘हेत्वाभास’, एक प्रकार की ‘फैलसी’ ही होगी.

आज न तटस्थता सुलभ रह गई है और न तटस्थ लोगों की कद्र ही. आज नक्सलवादियों से या कश्मीरी चरमपंथियों से बातचीत करने के लिए एक अदद तटस्थ व्यक्ति हमें ढूंढ़े न मिलेगा. मिल भी जाए और वह सबके हक में कोई न्यायसंगत समाधान सुझा भी दे, तो कोई भी पक्ष उसे मानने को तैयार न होगा.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी किन्हीं ऐसे संगठन या व्यक्तित्व का प्रभाव दिखाई नहीं देता जिनकी बात हर कोई कम-से-कम सुनने और विचारने को भी तैयार हो. संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था का क्या हाल है देख लीजिए. दो दिन पहले ही अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् से अपनी सदस्यता त्याग दी है.

आज हर जगह गुट हैं, संकीर्ण स्वार्थों पर आधारित गठबंधन हैं, व्यापारिक और सैन्य गठजोड़ हैं. अंतरराष्ट्रीयता और वैश्विकता की व्यापक और उदात्त भावना कहीं नहीं दिखाई देती. विचारहीन और अदूरदर्शी राष्ट्राध्यक्ष और हर देश के संकीर्ण ‘राष्ट्रवादी’ दल अपने ही बीच के तटस्थ लोगों को खलनायक और राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत करते रहते हैं. ऐसे तटस्थ लोगों को जब जेल में डाल दिया जाता है, तो गिने-चुने मानवाधिकार समूहों या अनौपचारिक नागरिक समूहों के अलावा और कोई उनके बचाव को आगे नहीं आता. वे सरकारी पुलिस या नॉन-स्टेट एक्टर्स में से किसी के भी हत्थे चढ़ सकते हैं. इनमें से कोई भी उन्हें अगवा कर सकता है. हिरासत में उनके साथ उत्पीड़न होता है. उनकी हत्या तक हो जाती है. कई बार यह छोटी-मोटी खबर भी बनती है और कई बार नहीं भी बनती.

परस्पर-विरोधी विचारधारात्मक टकरावों के घनघोर अंधेरे में हम अपनी-अपनी छोटी-छोटी टॉर्च लेकर घूम रहे हैं. उसी अंधेरे में शंका, पूर्वाग्रह, परस्पर-द्वेष और मतांधता की अपनी-अपनी लाठी बेतहाशा भांज रहे हैं. ‘ये मारा’, ‘ये पछाड़ा’, ‘उसको हराया’, ‘उसके छक्के छुड़ाए’, ‘उसकी सरकार बनवाई’ और ‘उसको चुप्प कराया’ का खेल उसी अंधेरे में चल रहा है. तू-तू-मैं-मैं, छीः-छीः-हट-हट का शोर उसी अंधेरे में बरपा है.

यह अंधेरा एक ऐसा ब्लैक होल या कृष्ण विवर सरीखा है जिसने अतीत में भी सुकरात और गांधी जैसे कई तटस्थ सितारों को निगल लिया. लेकिन हम याद रखें कि विराट अनन्त में ऐसे सितारों के मिटने और बनने का क्रम फिर भी निरंतर चलता ही रहता है. सच्चे अर्थों वाले ‘तटस्थ’ लोग वास्तव में होते रहे हैं और होते रहेंगे. ये ‘विचारों’ वाले लोग होते हैं, ‘विचारधारा’ वाले नहीं. विचारधारा वाले लोगों को भी वे अपना विरोधी या शत्रु नहीं मानते, बल्कि वे उन सबको तटस्थता से सुनने-समझने का प्रयास करते हैं. उन सबका प्रबोधन करने के लिए जरूरी करुणा और समानुभूति उनमें होती है.

तटस्थता यदि आज एक अव्यावहारिक आदर्श भी लग रहा हो, तो भी विज्ञान-युग की पीढ़ियों को उसी आदर्श की दिशा में बढ़ना होगा. इस विराट अनन्त में और प्रकृति में सबकुछ गतिशील और परिवर्तनशील है. मानवता का इतिहास बताता है कि ‘आदर्श’ की हमारी परिभाषा तक गतिशील और परिवर्तनशील रही है. तिस पर भी ‘विचारधारा’ का इतना कठोर आग्रह और अहंकार क्यों भला! और हिंस्रता इतनी कि आप किसी तटस्थ या मध्यमार्गी सत्यशोधक की जान ले बैठें!

 

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