अख़लाक़ अहमद उस्मानी

इराक़ के नतीजे चौंकाने वाले हैं। आतंकवाद और लूट की मार झेल रहे दुनिया के सबसे मीठे तेल वाले इराक़ में चुनाव नतीजों को पूरी दुनिया आश्चर्य से देख रही है। शिया नेता मुक़्तदा अलसद्र का सुधारवादी गठबंधन सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा है, हालांकि बहुमत से वह बहुत दूर है। अंग्रेज़ी में ‘अलायंस टुवर्ड्स रिफ़ॉर्म’ और अरबी में ‘सायरून’ नामक गठबंधन की सरकार बन जाने में कोई कसर नज़र तो नहीं आती लेकिन उन्हें कम से कम तीन पार्टियों के साथ की ज़रूरत पड़ेगी। अलसद्र के गठबंधन में इंटीग्रीटी पार्टी, इराक़ी कम्यूनिस्ट पार्टी, यूथ मूवमेंट फ़ॉर चेंज, पार्टी ऑफ़ प्रोग्रेस एंड रिफ़ॉर्म, द इराक़ी रिपब्लिकन ग्रुप और स्टेट ऑफ़ जस्टिस पार्टी ने जीत हासिल की है।

कह सकते हैं कि यह नए इराक़ की समाजवादी, वामपंथी, सुधारवादी धड़े की जीत है जो देश में आतंकवाद, पंथवाद, भ्रष्टाचार, ग़रीबी और अमेरिका से लड़ने के नाम के साथ सत्ता संभालने जा रही है। हालांकि इराक़ की एक सदन व्यवस्था में लोकसभा की 329 सीटों में 165 सीटों के साथ बहुमत साबित करने पर सरकार बनाई जा सकती है। मुक़्तदा अलसद्र के गठबंधन को 54 सीटें मिली हैं और वह सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरा है।

पिछले चुनाव से अलसद्र को इस बार 20 सीटों का फ़ायदा हुआ है। अलसद्र ख़ुद प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन सकते क्योंकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा और इराक़ी क़ानून के मुताबिक़ चुनाव जीतकर नहीं आने वाला व्यक्ति दोनों ही संवैधानिक पद नहीं संभाल सकता लेकिन वह किंगमेकर तो बन ही गए हैं।

इराक़ में सरकार के गठन में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि जनता ने इतना त्रिशंकु जनमत दिया है कि कम से कम चार गठबंधन मिलकर ही सरकार बना पाएंगे। अभी तक प्रधानमंत्री रहे हैदर अलअबादी गठबंधन में शामिल होते हैं तो फिर से प्रधानमंत्री के लिए दावेदारी पेश करेंगे जबकि मुक़्तदा अलसद्र को इस पद से दूर ही रहना होगा। इराक़ की जनता ने हैदर अलअबादी को तीसरे और उनसे पहले सत्ता संभाल रहे नूर अलामालिकी को चौथे नम्बर पर धकेल दिया है।

यह लेख लिखने तक समाचार मिले हैं कि मुक़्तदा अलसद्र ने निवर्तमान प्रधानमंत्री हैदर अलअबादी से मुलाक़ात की है जिनकी पार्टी ने 42 सीटें जीती हैं। हादी अलआमिरी का गठबंधन दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उन्हें 47 सीटें मिली हैं और सद्र ने उनसे भी मुलाक़ात की है। मुक़्तदा अलसद्र, हादी अलआमिरी और हैदर अलअबादी के गठबंधन को सरकार बनाने के लिए अब भी 22 सीटों की दरकार है जिसके लिए उन्हें कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के नेशरवान बरज़ानी या पूर्व प्रधानमंत्री नूरअलमालिकी की पार्टी स्टेट ऑफ लॉ कॉलीशन का साथ लेना होगा। दोनों पार्टियों ने 25-25 सीटें जीती हैं। मुक़्तदा अलसद्र के सामने चुनौती है कि वह बदनाम ज़माना नूर अलमालिकी के गठबंधन से दूर रहें क्योंकि जीत के बावजूद यह देखा जाना चाहिए कि इराक़ में मतदान घटा है।

पिछले लोकसभा चुनाव 2015 में जनता ने बहुत जोश के साथ 79% वोट डाले थे लेकिन इस चुनाव में सिर्फ़ 44.52% वोट ही डाले गए हैं। यह हताशा उस भ्रष्टाचार और पंथवाद के झगड़े से उभरी है जिसे अमेरिकी, ज़ायोनिस्ट, वहाबी और हथियार दलाल ताक़तें देश में जिंदा रखना चाहती हैं।

शिया धर्मगुरू होने के बावजूद मुक़्तदा अलसद्र ईरान की पसंद नहीं हैं। वह अमेरिका के भी ख़िलाफ़ हैं। कह सकते हैं कि वह इराक़ी सम्मान के लिए उभरे हुए नेता हैं। उन्होंने जब वामपंथी समाजवादी धड़ों के साथ लिया था तब उन्हें ईरान की नाराज़गी के सुर सुनने पड़े थे। पिछली फ़रवरी में ईरान के नेता अली अकबर विलायती ने कहा था कि वह इराक़ में सुधारवादियों और कम्यूनिस्टों की सरकार के ख़िलाफ़ हैं। विलायती का उस समय इराक़ी सांसदों की भारी नाराज़गी का सामना करना पड़ा था।

सोशल मीडिया में लाल बुरक़े पर कम्यूनिस्ट निशान के साथ वायरल तस्वीर में जिस महिला का सबसे ज़्यादा ज़िक्र हो रहा है वह इराक़ी कम्यूनिस्ट पार्टी की नेता सुहैद अलख़तीब हैं। वह नजफ़ से सांसद चुनी गई हैं। पेशे से शिक्षिका, महिला और ग़रीबों के अधिकार के लिए काम करने वाली सुहैद ने जीत के बाद कहा कि इराक़ में कम्यूनिस्ट पार्टी का ईमानदारी का लम्बा इतिहास है। हमने कभी विदेशी आक्रांताओं के लिए एजेंट का काम नहीं किया। हम सामाजिक न्याय के पक्ष में हैं और साम्प्रदायिक हिंसा से हमें छुटकारा चाहिए। हर इराक़ी को चाहिए। उम्मीद कर सकते हैं कि इराक़ का नया जनादेश देश को पिछड़ेपन और हिंसा से बाहर निकालकर प्रगति के मार्ग पर ले जाएगा।

(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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