by — जगदीश्वर चतुर्वेदी

इस लेख को लिखने का एक मकसद और भी है कि मुझे लिखने के पहले गुरुदेव याद बहुत आते हैं। यह सच है मैं उनके ‘प्रिय सुपात्रों’ में नहीं आता । मैं उनसे पढ़ा हूँ ,और ऋणी हूँ। सवाल उठा है नामवर सिंह में ऐसा क्या है जिसके कारण उनकी मंडेला के साथ तुलना की जाए ? वे तो महान भी नहीं हैं ।यह सच है वे महान नहीं हैं। यह भी सच है कि उनसे अनेक सुधीजन नाराज रहते हैं, और उनकी नाराजगी के अपने –अपने कारण हैं । जितनी एक व्यक्ति में बुराईयां हो सकती हैं वे किसी हद तक नामवरजी में भी हैं ।मंडेला में भी थीं।व्यक्ति का मूल्यांकन बुराईयों के आधार नहीं किया जा सकता। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय उसकी अच्छाईयों को केन्द्र में रखा जाना चाहिए। मैं निजी तौर पर नामवरजी का अकादमिक कर्जगीर हूँ । मुझे उनसे न तो कोई लाभ मिला है और नहीं उन्होंने कभी मेरे लिए पक्षपात किया है और नहीं कहीं उनकी सिफारिश से मुझे नौकरी ही मिली है। मेरा उनसे विलक्षण संबंध है। मैं न उनका कभी करीबी था और न कभी उनसे दूर था । मैं जितना उनका स्वभाव जानता हूँ,उन्होंने कभी भी मेरी लिखी कोई किताब नहीं पढ़ी और न मैंने कभी उनसे किसी पुस्तक का लोकार्पण कराया और न उनसे कभी कहा कि मेरी पुस्तकें सरकारी खरीद में बिकवा दो। मेरा उनसे निजी तौर पर शिक्षक के नाते रागात्मक संबंध रहा है।

नामवर सिंह महान नहीं हैं। वे सामान्य मनुष्य हैं। सामान्य मनुष्य को जो करना चाहिए वही वे जीवनभर करते रहे हैं ।व्यक्ति को सामान्य से महान बनाने का काम तो उसके काम करते हैं। नेल्सन मंडेला भी सामान्य मनुष्य थे,उनको महान तो उनके कर्मों और विचारों ने बनाया । मंडेला के व्यक्तित्व के अनेक गुण हैं जो अनेक महान लोगों में देखने को मिल जाएंगे।मंडेला को नए युग का क्रांतिकारी उदारतावादी कहना ज्यादा समीचीन होगा। अफ्रीकी समाज में सामाजिक परिवर्तन का नया और सटीक पैराडाइम बनाना असामान्य काम था। उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी जनता को नस्लवादी शोषण और औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति दिलाई। मुक्ति के नए मानवाधिकार राजनीतिक पैराडाइम में समूचे राजनीतिक परिदृश्य को स्थानांतरित किया।उल्लेखनीय है दक्षिण अफ्रीकी समाज में जनजातीय चेतना और क्रांतिकारी चेतनाओं का सीधे शोषकवर्गों के साथ टकराव था। शोषकवर्गों के नस्लवादी शासन से निकलकर दक्षिण अफ्रीका किस दिशा में जाए इसे लेकर व्यापक मतभेद थे । खासकर दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के बीच में स्वाधीनता संघर्ष के दौरान जिस तरह की घनिष्ठता थी उसमें नए शासन को कम्युनिस्टों से पृथक करके रखना संभव नहीं था। कम्युनिस्टों की लंबे समय से मांग थी कि वे यदि शासन में आएंगे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करेंगे। जिनलोगों ने जुल्म किए हैं उनको दण्डित करेंगे । दूसरी ओर जनजातीय समूहों में भी हथियारबंद समूह थे जो पुरानी परंपराओं को बचाते हुए दक्षिण अफ्रीका को पुराने जनजातीय मार्ग पर ले जाना चाहते थे। इन दोनों के वैचारिक और सशस्त्र समूहों के बीच में दक्षिण अफ्रीका में उदार बुर्जुआ परंपरा बहुत ही क्षीण रुप में मौजूद थी।

दक्षिण अफ्रीका में नए दौर की मांग थी कि उदार बुर्जुआ परंपराओं और मूल्यों का विकास किया जाय। बुर्जुआ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण किया जाय। क्रांतिकारी-जनजातीय अतिवादी ध्रुवों से राजनीति को स्थानांतरित करके उदार बुर्जुआ पैराडाइम में लाया जाय ।यह काम बेहद कठिन और मुश्किलों भरा था। इसके लिए लंबी छलांग की जरुरत थी और यही वह बिंदु है जहां नेल्सन मंडेला ने नायक की भूमिका अदा की। क्रांतिकारी-जनजातीय वैचारिक ध्रुवों से छलांग लगाकर मुक्ति के मानवाधिकार पैराडाइम को निर्मित किया ।
सामाजिक परिवर्तन के लिए छलांग जरुरी होती है यह बात फ्रेडरिक एंगेल्स ने सबसे पहले रेखांकित की थी और मंडेला इसे भली-भांति जानते थे। मंडेला के सामने सारी दुनिया के क्रांतिकारी और समाजवादी समाज व्यवस्थाओं का गाढा अनुभव था। वे समाजवादी व्यवस्था के पराभव को भी देख चुके थे और जानते थे कि किन कारणों से समाजवादी व्यवस्था गिरी है ।

मंडेला ने बताया कि नया दौर उदार बुर्जुआ मूल्यों के विकास की मांग करता है । यही नया बिंदु है जहां पर वे अपने को लेनिन-माओ से अलगाते हैं और मार्क्स-गांधी के करीब आते हैं । बीसवीं सदी में अनेक देशों का सामंती या जनजातीय समाजों से सीधे समाजवाद में रुपान्तरण हुआ । यह रुपान्तरण अस्वाभाविक ढ़ंग से हुआ । कबीलाई या सामंती जीवन व्यवस्था से समाजवाद में सीधी छलांग का दुष्परिणाम था कि उदार बुर्जुआ मूल्यों को वहां लोग जान ही नहीं पाए।

कबीलाई-सामंती समाजों में आधुनिक अर्थ में लोकतंत्र नहीं होता यही वजह है कि जिन देशों में समाजवाद आया वहां पर उसने लोकतंत्र विरोधी रुख अख्तियार किया ।सर्वहारा अधिनायकवाद के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही स्थापित की गयी और बडी संख्या में आम जनता को उत्पीडन-दमन का शिकार बनाया गया।बिना उदार पूंजीवादी मूल्यों का विकास किए बिना सर्वहारा के अधिनायकवाद की स्थापना की अवधारणा का मार्क्स–एंगेल्स के नजरिए या कम्युनिस्ट घोषणापत्र से कोई संबंध नहीं है ।

मार्क्सवाद का अर्थ अन्य के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं है । मार्क्सवाद मुक्ति का विज्ञान है और इसका बुनियादी लक्ष्य है ‘वर्चस्व’ और ‘शोषण’ के सभी रुपों का खात्मा करना । समाज में शोषक-शोषित के संबंधों का खात्मा करने का अर्थ यह नहीं है कि शोषकवर्ग के लोगों को शारीरिकतौर पर खत्म किया जाय । बल्कि इस संबंध को खत्म करने का अर्थ है कि समाज में स्वाभाविक लोकतांत्रिक विकास प्रक्रियाओं के जरिए सामाजिक परिवर्तन को संभव बनाया जाय । जिस तरह शोषकवर्ग एकदिन में पैदा नहीं होता वैसे ही उसका खात्मा भी रातों-रात संभव नहीं है। शोषक सत्ता को क्रमशः जीवन के सभी स्तरों से खत्म किया जाय और यह काम धैर्य के साथ और जनता का दिल जीतकर किया जाय । समाजवादी देशों में विकास के उच्च रुपों का निर्माण हुआ लेकिन जनता की शिरकत के बिना और राज्यतंत्र के दमन-उत्पीडन के जरिए। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में कम्युनिस्टों के साथ संघर्ष करते हुए जो कार्यक्रम स्वीकार किया था ,उस कार्यक्रम को स्वाधीनता मिलने के साथ बदला । इस बदलाव की प्रक्रिया समानांतर चली।

मसलन् एक तरफ गोरों के साथ समझौते की शर्तें तय हो रही थीं वहीं दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के कार्यक्रम और राजनीतिक कार्यक्रम में बदलाव किया गया । नेल्सन मंडेला का सबसे बड़ा योगदान है कि मानवाधिकारों के आधार पर दक्षिण अफ्रीकी समाज का निर्माण ।मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के कारण नए स्वतंत्र दक्षिण अफ्रीका के निर्माण के लिए नए मानकों, मूल्यों और सामाजिक संबंधों को निर्मित करने की दिशा में विचार-विमर्श शुरु हुआ । नेल्सन मंडेला का महान योगदान यही है कि वे पुराने वैचारिक सोच-विचार-एक्शन से सभी दलों को बाहर लेकर आते हैं और सभी दलों को नए सिरे से कार्यक्रम बनाने के लिए मजबूर करते हैं ।नेल्सन मंडेला 1994-99तक दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।पहली लोकतांत्रिक सरकार बनायी । इस सरकार का पहला मुख्य लक्ष्य था नस्लभेदीय राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक संरचनाओं को नष्ट करना ।मंडेला सरकार का लक्ष्य था नस्लभेदीय संरचनाओं को नष्ट करके उनके स्थान पर समानतावादी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण करना।महज पांच सालों में यह काम उन्होंने सभी स्तरों पर संपन्न किया । इसके अलावा गरीबी,भुखमरी,हिंसा,अपराध आदि से जुड़ी समस्याओं को भी केन्द्र में रखा गया था लेकिन नस्लभेदीय संरचनाओं को खत्म करने पर सबसे पहले मुख्य जोर दिया गया । मंडेला सरकार के पांच साल के शासन के बाद गरीबी,भुखमरी,हिंसा,स्वास्थ्य और शिक्षा को केन्द्र में रखा गया है। बडे पैमाने पर भूमिसुधार कार्यक्रमों को लागू किया गया जिससे आम नागरिकों को गरीबी के खिलाफ लड़ने में मदद मिले ।
अब जरा ठहरकर हिंदी में नामवर सिंह फिनोमिना, भूमिका और योगदान पर विचार करें। यह सच है नामवर सिंह का कद नेल्सन मंडेला से तुलना योग्य नहीं है। मंडेला एक राजनीतिक नेता हैं, और नामवर सिंह लेखक हैं । जिस तरह मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में मंडेला पर चर्चाएं हो रही हैं उसी तरह मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में नामवर सिंह पर चर्चाएं होनी चाहिए।

मंडेला हमारे लिए एक रुपक है। काले लोगों के नायक के रुप में मंडेला ने जो यश अर्जित किया और न्यायपूर्ण समाज के संस्थापक नायक की पहचान बनायी। ठीक यही काम अपने तरीके से नामवर सिंह ने आलोचना के जरिए हिंदी भाषा और साहित्य के लिए किया है। उनके लिखे की हमने तीखी आलोचना अन्यत्र की है ,लेकिन उनके सकारात्मक योगदान पर भी हमारी नजर होनी चाहिए।

हिंदी साहित्य में अनेक प्रोफेसर हैं।अनेक आलोचक हैं। लेकिन अपने बयानों और लेखन और उपस्थिति से हिंदी के परिवेश में सक्रियता और जोश पैदा करने का जो काम नामवर सिंह ने किया है वह विरल है । आज भी वे फेसबुक पर नहीं हैं लेकिन उनके चाहने वाले सैंकडों लोग फेसबुक पर हैं। वे बूढ़े हो गए हैं ,कम बोलते हैं, लेकिन जनता को गोष्ठी में खींचकर लाने में वे आज भी सब पर भारी पड़ते हैं । सब लेखक चाहते हैं कि एकबार नामवर उन पर कुछ बोल दें । नए लेखकों के लिए उनके प्रशंसा में कहे गए कथनों का बड़ा महत्व है ।मैं तो आज तक तरस रहा हूँ कि वे मेरे बारे में एक अच्छा वाक्य कह दें। नए लेखक लंबे समय तक उनकी कही बातों के नशे में रहते हैं । कथन के नशे का नायक बनना आसान काम नहीं है। मंडेला और उनमें यह विलक्षण संयोग है।

मंडेला कथन के नायक हैं और नामवर भी । मंडेला सबसे मिलते हैं और बिना किसी पूर्वाग्रह के मिलते हैं,नामवर सिंह भी यही काम करते हैं । मंडेला से मिलकर लोग भावविभोर होकर लौटते हैं और नामवर सिंह से मिलकर भी अपूर्व सुख मिलता है। मंडेला और उनके बीच में सादगी भी एक सेतु है।

दोनों का मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध रहा है । दोनों ने एक अवधि के बाद मार्क्सवाद के दायरे के बाहर निकलकर काम किया और सोचा है ।दोनों की मार्क्सवाद के प्रति पुख्ता,सर्जनात्मक और पूर्वाग्रहरहित धारणाएं हैं ।दोनों के लिए मार्क्सवाद सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है।विश्व दृष्टिकोण है । दोनों ने अपने से भिन्न विचारधारा के लेखकों-कलाकारों-राजनेताओं आदि के कार्यक्रमों-पुस्तक समर्पण-जलसे आदि में जाकर उदारमना के रुप में ख्याति पायी है । दोनों ने मार्क्सवाद के दायरे के बाहर निकलकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को अपने आचार- व्यवहार का हिस्सा बनाया है ।

मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में साहित्य को देखने की मार्क्सवादियों को आदत नहीं है। हमारी आलोचना ने मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य विकसित नहीं किया है ।नामवर सिंह द्वारा वर्णित ‘दूसरी परंपरा’ ,’वर्ग’ की बजाय ‘मनुष्य’ को केन्द्र में रखती है। नामवर सिंह की व्यापक अकादमिक अपील और सामाजिक-साहित्यिक स्वीकृति का आधार भी यही है। ‘दूसरी परंपरा’ मानवाधिकार परंपरा है ।

मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में साहित्य में काम करने का अर्थ है उपेक्षित विषयों, सामाजिक समूहों , लेखकों आदि की ओर लौटना।लेखकों को सामाजिक-साहित्यिक शिरकत के लिए प्रेरित करना । नामवर सिंह ने अपने भाषणों ,पुस्तक लोकार्पण और लेखों के जरिए यह काम खूब किया है। लेखक के लिए प्रोत्साहित करना, उत्साह वर्धन करना मूलतः मानवाधिकार के साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में आता है ।

समस्या यह है कि हम सभी सब्जैक्टिविटी के शिकार हैं । लेखक या कृति या साहित्यादोलनों पर बातें करते समय आत्मग्रस्त रहते हैं। साहित्य और मानवीय जीवन में सब्जैक्टिविटी की भूमिका है लेकिन इस भूमिका को जितना कम कर सकें उतना ही बेहतर होगा । नामवर सिंह पर बातें करते समय भी सब्जैक्टिविटी रहती है ।

नामवर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है उनके वक्तव्य और उदार मानवीय व्यवहार। वे जब भी कोई बयान देते हैं तो उस पर सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान जाता है और साहित्यकारों में उस पर व्यापक चर्चा होती है । ये हमेशा ‘मनुष्य के भविष्य’ को ध्यान में रखकर बयान देते हैं । लेखकों पर दिए बयानों पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ है और सबसे ज्यादा उनकी आलोचनाएं भी हुई हैं। वस्तुगत तौर पर देखें तो इस तरह के बयानों को प्रोत्साहन बयान कहें तो बेहतर होगा। ये संबंधित साहित्यकार के साहित्येतर मनोभावों और लक्ष्यों को प्रेरित करते हैं । इन बयानों में कहीं -कहीं द्विवेदीजी की तरह ही ‘उच्छन्न भावुकता’ ,आत्मविश्वास और सत्यनिष्ठा भी है।

दूसरी परंपरा की धुरी है ‘पीड़ा में आशा’ की खोज करना, यह मंडेला के नजरिए की भी धुरी है। इसी पहलू को नामवर सिंह ने भी काफी पहले ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में रेखांकित किया था। यह परंपरा जब अपने को कबीर से जोड़ती है तो मूलतः साहित्य के मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य को ही सामने लाती है ।

आलोचना की बहसों में मानवाधिकार खो गए और हजारीप्रसाद द्विवेदी बनाम रामविलास शर्मा या रामचन्द्र शुक्ल आदि केन्द्र में आ गए । जबकि ‘दूसरी परंपरा’ का लक्ष्य है ‘जागना और विवेक के साथ सोचना’।
‘दूसरी परम्परा की खोज’ का मकसद है साहित्य के मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य का निर्माण करना । भारत में मानवाधिकारों के साथ जोड़कर या उनके नजरिए से चीजों, घटनाओं, कृतिकार आदि को देखने या विवेचित करने की परंपरा नहीं है । उन्होंने ‘परम्परा की खोज’ के लिए इस कृति को लिखा ।

संयोग देखें परम्परा की खोज के नाम पर जो मसले किताब में उठाए गए वे मानवाधिकार के सामयिक मसले हैं । ‘दूसरी परम्परा’ उनकी है जो आलोचना में उपेक्षित रहे हैं। दूसरी परंपरा ‘खोज’ पर जोर देती है,’निर्णय’ सुनाने पर नहीं । यह खुली परम्परा है ।आप इसका यथासंभव दिशा में विकास कर सकते हैं । इसमें लेखक का साहित्यिक और गैर-साहित्यिक कर्म शामिल है। मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य की बुनियादी विशेषता है हर चीज को अन्तर्विरोधों की कसौटी पर परखना और विश्लेषित करना । अन्तर्विरोधों के बिना कोई भी विषय नहीं खुलता । मानवाधिकारवादी में आत्मविश्वास और सत्यनिष्ठा होनी जरुरी है। कबीर और अन्य लेखकों की ओर नामवर सिंह ने इसी बुनियादी परिप्रेक्ष्य के आधार पर विचार किया है ।

मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में वह सारा साहित्य आएगा जो सभी किस्म के भेदभाव और वर्चस्व का विरोधी हो,आत्म-सम्मान पर जोर देता हो, सामाजिक स्वत्व-रक्षा के सवालों पर हमें सोचने को उदबुद्ध करे।अन्याय का प्रतिवाद करे। मानवाधिकारों के बारे में सबके प्रति समान नजरिया रखता हो। स्त्री,अल्पसंख्यक और दलितों के हकों की हिमायत करे। सभी भाषा और बोलियों को समान अधिकार दे। शांति के पक्ष और युद्ध के विरोध में लिखा गया हो। साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद,आतंकवाद आदि के विरोध में लिखी रचनाएं भी मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में आएंगी।ज्ञान के दीवाने नामवर नामवर सिंह के व्यक्तित्व के कई कोण हैं। उनमें से एक है उनका ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ का कोण। हिन्दी के लेखकों में प्रेमचंद के बाद वे अकेले ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ की पहचान वाले लेखक हैं। हिन्दी के लेखकों की नज़र उनके हिन्दी पहलू से हटती नहीं है। खासकर शिक्षकों-लेखकों का एक बड़ा हिस्सा उन्हें प्रोफेसर के रूप में ही देखता है।

नामवर सिंह सिर्फ एक हिन्दी प्रोफेसर समीक्षक और विद्वान नहीं हैं। प्रोफेसर, आलोचक, पुरस्कारदाता,नौकरीदाता,गुरू आदि से परे जाकर उनके व्यक्तित्व ने ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ की स्वीकृति पायी है। इस क्रम वे हिन्दी अस्मिता का अतिक्रमण कर चुके हैं यह कब और कैसे हुआ यह कहना मुश्किल है। लेकिन उन्होंने सचेत रूप से लेखकीय -शिक्षक व्यक्तित्व को ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ में रूपान्तरित किया है। उनकी प्रसिद्धि के ग्राफ को ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया है।

नामवर सिंह कम लिखते हैं। घर में कम रहते हैं। अधिकांश समय देशाटन करते हैं। व्याख्यान देते हैं। अनेकबार कुछ नहीं बोलते लेकिन सैंकड़ों किलोमीटर चलकर जाते हैं। पांच-सात मिनट मुश्किल से बोलते हैं। अनेकबार बहुत अच्छा भी नहीं बोलते। लेकिन अधिकांश समय उन्हें लोग अपने यहां बुलाना पसंद करते हैं। बुलाने वालों में विभिन्न रंगत के लोग हैं। वे किसी एक रंगत के लोगों के कार्यक्रमों में नहीं जाते। वे अधिकतर समय विचारधारा की सीमा से परे जाकर बोलते हैं। उनके बोलने और कार्यक्रमों में बुलावे के पीछे प्रधान कारण है उनका ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’।

‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ के कारण उन्हें सार्वजनिक बौद्धिक जीवन में ऐसी भूमिका निभानी पड़ रही है जिससे चाहकर भी वे अपना पिण्ड नहीं छुड़ा सकते। उनके ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व ’ को लेकर अनेकबार उनसे शिकायतें भी की गयी हैं। अकेले में वे अपनी कमजोरियों को मान भी लेते हैं। लेकिन बाद में उनका व्यक्तित्व फिर पुराने मार्ग पर चल पड़ता है।

वे अपने भाषणों में अनेक विषयों पर बोलते हैं और सुंदर बोलते हैं। लेकिन विगत कई दशकों से उनके भाषणों के केन्द्र में एक ही विषय है जो बार-बार आया है जिसके बारे में उन्होंने बार-बार रेखांकित किया है वह है ‘आलोचनात्मक मनुष्य’। इस मनुष्य के लिए ही उन्होंने अपनी सारी यात्राएं समर्पित कर दी हैं। इसके लिए वे अपनी विद्वता, विविधभाषाओं के साहित्यज्ञान और विभिन्न विचारधाराओं का इस्तेमाल करते रहे हैं।
वे जहां जाते हैं मानवीय अज्ञान से टकराते हैं। वे जानते हैं कि जिस गोष्ठी में जा रहे हैं वहां उस विषय के कम जानकार आ रहे हैं ,श्रोताओं में भी सक्षम लोग कम हैं,इसके बावजूद वे जाते हैं और गंभीर,नए,चालू,उत्सवधर्मी विषयों पर अज्ञान से मुठभेड़ करते हैं।

उन्हें अपनी विद्वता का एकदम दंभ नहीं है। गोष्ठियों में वे उस समय ज्यादा सुंदर लगते हैं जब वे इरेशनल के खिलाफ बोल रहे होते हैं। इरेशनल को वे कभी माफ नहीं कर पाते,सहन नहीं कर पाते। वे कमजोर तर्क से सहमत हो जाते हैं,सामंजस्य बिठा लेते हैं लेकिन इरेशनल से सामंजस्य नहीं बिठा पाते। उनके व्याख्यानों या टिप्पणियों की दूसरी बडी खूबी है उनका भारतीय और हिन्दी तर्कसिद्धांत। इसमें वे पक्के भौतिकवादी के रूप में मंच पर पेश आते हैं। अनेक बार उनके विचारों में पुनरावृत्ति दिखाई देती है। लेकिन इसका भी कारण है जिसकी खोज की जानी चाहिए।

नामवर सिंह जब भी बोलते हैं तो अंतर्विरोधों में बोलते हैं। अंतर्विरोध के बिना नहीं बोलते। अंतर्विरोधों के आधार से खड़े होकर बोलने के कारण उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक और आक्रामक नजर आता है और वे इस सारी प्रक्रिया को ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ की छाप के साथ करते हैं।
नामवर सिंह ने अपने भाषणों में राष्ट्रवाद,हिन्दीवाद,कट्टरता, फंडामेंटलिज्म,अतिवादी वामपंथ, साम्प्रदायिकता,आधुनिकतावाद,नव् य उदारतावाद,पृथकतावाद आदि का कभी समर्थन नहीं किया। वे इन विषयों पर बोलते हुए बार-बार सभ्यता के बड़े सवालों की ओर चले जाते हैं।

किसी के भी मन में यह सवाल उठ सकता है कि नामवर सिंह देशाटन क्यों करते हैं ? वे इतने बूढ़े हो गए हैं आराम क्यों नहीं करते ? उनके पास पैसे की क्या कमी है जो इस तरह भटकते रहते हैं ? वे चुपचाप बैठकर लिखते क्यों नहीं ? आदि सवालों और इनसे जुड़ी बातों को हम सब आए दिन सुनते रहते हैं।

नामवर सिंह जानते हैं भाषणों से संसार बदलने वाला नहीं है। मैं जहां तक समझता हूँ भाषणों से उन्हें कोई खास मानसिक शांति भी नहीं मिलती। कोई खास पैसे भी नहीं मिलते। इसके बावजूद वे भाषण देने जाते हैं,जो भी बुलाता है उसके कार्यक्रम में चले जाते हैं। मेरी समझ से इसका प्रधान कारण समाजीकरण। नामवरसिंह भाषण नहीं देते समाजीकरण करते हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया के बहाने ही उन्होंने लोगों का मन जीता है, बेशुमार प्यार और सम्मान अर्जित किया है।

नामवर सिंह के जीवन में अनेक कष्टप्रद क्षण आए हैं और उसे उन्होंने झेला है। निजी तौर पर गहरी पीड़ा का भी अनुभव किया है। इसके बावजूद इसे उन्होंने कभी सार्वजनिक नहीं होने दिया। कष्टों को झेलने के कारण एक खास किस्म की कुण्ठा और ग्लानि भी पैदा होती है उसे भी अपने लेखन और व्यक्तित्व में आने नहीं दिया।

मैंने उन्हें कभी ग्लानि या कुण्ठा में नहीं देखा। इसके कारण वे स्वतंत्र ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ का निर्माण करने में सफल रहे हैं। कुण्ठा और ग्लानि मनुष्य को परनिर्भरता और भय की ओर ले जाती है और परनिर्भरता और भय से नामवर सिंह को सख्त नफरत है।

वे कभी निष्क्रिय नहीं रहते। अहर्निश सक्रियता के बीच में ही यात्राएं करते हैं। अकादमिक जिम्मेदारियों का पालन करते हैं। सामाजिकता निबाहते हैं। उन्हें वे लोग पसंद हैं जो रिवेल हैं या बागी हैं। परिवर्तनकामी हैं। रूढियों से लड़ते हैं। वे घर पर आते हैं विश्राम के लिए ,और कुछ दिन रहने के बाद फिर से चल पड़ते हैं। घर उनका परंपरागत अर्थ में घर नहीं है। वह उनके विश्राम का डेरा है वहां वे नए सिरे से ऊर्जा संचय करते हैं और निकल पड़ते हैं।

उनके व्यक्तित्व में नया और पुराना दोनों एक ही साथ मिलेगा। वे भाषण पुराने पर देते हैं पैदा नया करते हैं। उनके पुराने विषयों पर दिए गए भाषणों में पुरानापन नहीं है। उन्हें पुराने की आदत है नए से प्रेम है। पुराने की आदत, परंपरा से जुड़े रहने के कारण है, और नए से प्रेम वर्तमान और भविष्य की चिन्ताओं के कारण है। यही वजह है कि उनके व्यक्तित्व और व्याख्यान में नया और पुराना एक ही साथ नजर आता है। इसके आधार पर ही वे सभ्यता निर्माण के मिशन को अपने तरीके से पूरा कर रहे हैं।

नामवर सिंह ने जीवन से ज्यादा साहित्य,संस्कृति,विचारशास्त्र आदि के क्षेत्र में जोखिम उठाया है। जितने जोखिम उन्होंने विचारों के क्षेत्र में उठाए हैं ,उतने ही वे जीवन में उठा पाते तो और भी ज्यादा सुखी होते। उनका पुराने से जुड़ा होना जीवन में जोखिम उठाने से रोकता रहा है और वे उसे सहते रहे हैं।

उन्होंने विचारों की दुनिया में अपने को पूरी तरह खो दिया है लेकिन निजी जीवन में वे अपने को खो नहीं पाए हैं और अनेक मसलों पर किनाराकशी करके दर्शक बनकर देखते रहे हैं। कुछ लोग इसे पलायन भी कह सकते हैं। लेकिन यह पलायन नहीं है सामाजिक जोखिम नहीं उठाने की शक्ति का अभाव है।

नामवर सिंह आधुनिक ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ के मार्ग पर चलते रहे हैं और उनके आलोचक पीछे -पीछे उनकी असंगतियों का शोर मचाते रहे हैं। साहित्य के दायित्व को उन्होंने राष्ट्रीय दायित्व के रूप में ग्रहण किया है और अन्य दायित्वों को इसके मातहत बना दिया है। यही उनकी महान विभूति का प्रधान कारण है।

नामवर सिंह विचारों के समुद्र हैं। वे साहित्य,समीक्षा,राजनीति,,तकनी क,मीडिया आदि किसी भी क्षेत्र में अतुलनीय क्षमता रखते हैं। वे इनमें से किसी भी क्षेत्र पर मौलिक ढ़ंग से प्रकाश डालने में सक्षम हैं। किसी भी गंभीर बात को अति संक्षेप में कहने में सक्षम हैं। वे प्रभावित करते हैं। माहौल बनाते हैं। अपनी उपस्थिति से आलोकित करते हैं। लेकिन किसी का व्यक्तित्व बनाने,तराशने वाले कारीगर का कौशल उनके पास नहीं है।

वे समुद्र हैं,महान व्यक्तित्व हैं, कारीगर नहीं। यही वजह है कि उनके आसपास रहने वाले अधिकांश शिष्य उनके गुणों,क्षमता और विद्वता आदि में कहीं से भी नामवर सिंह का उत्पाद नहीं लगते। शिष्य सोचते हैं गुरूदेव की कृपा से वे भी महान हो जाएंगे,गुरूदेव जैसे हो जाएंगे,लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। शिष्य भूल जाते हैं कि वे समुद्र किनारे बने हुए रेती के मकान हैं जिन्हें जब भी समुद्री लहरें आतीं है बहा ले जाती हैं।
नामवर सिंह ने अपना व्यक्तित्व अपने परिश्रम,मेधा और संघर्षों के आधार पर बनाया है। उन्हें स्वयं के अलावा किसी ने मदद नहीं की। वे इसी अर्थ में आत्मनिर्भर हैं । वे अपनी सारी शक्ति एक चीज के लिए लगाते रहे हैं वह है ज्ञानप्रेम। ज्ञानप्रेम ने उन्हें महान बनाया है। यह प्रेम उनके किसी शिष्य में नहीं है। दीवानगी की हद तक वे आज भी इसके दीवाने हैं और इसी ने उनके ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ का निर्माण किया है।