वो नाव समंदर की ख़तरनाक लहरों का मुक़ाबला करने लायक़ बिल्कुल नहीं थी. फिर उसमें औक़ात से ज़्यादा लोग और साज़ो-सामान लदे हुए थे.

पिछले सात दिनों और रात से नाव में सवार लोग समंदर की लहरों से पार पाकर अपनी मंज़िल तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे. मगर वो अब तक नाकाम थे. वजह ये कि वो नाव समंदर में उतारे जाने लायक़ ही नहीं थी.

उस नाव पर सवार कमोबेश हर शख़्स बीमार था. किसी को लंबे वक़्त से समंदर में रहने से परेशानी हो रही थी, तो कोई भूख और प्यास से कमज़ोर हो गया था.

आख़िरकार, तयशुदा वक़्त से दो दिन बाद, मंज़िल यानी मुलाक़ात की जगह से मीलों दूर वो नाव जब ज़मीन के किनारे लगी भी, तो कीचड़ में फंसकर अटक गई.

जैसा कि बाद में क्रांतिकारी चे ग्वेरा ने बिल्कुल सही कहा कि दिसंबर 1956 में फिदेल कास्त्रो और उनकी इंक़लाबी सेना की क्यूबा की ज़मीन पर विजयी वापसी, ज़मीन पर उतरने की घटना नहीं थी. असल में तो ये जहाज़ के मलबे का किनारे से टकरा जाना था.

जब ग्रानमा नाम का वो ऐतिहासिक जहाज़ कीचड़ में अटक गया, तो उसमें सवार सभी 82 लोग उससे बाहर निकले. वो निढाल थे. उनमें ज़रा भी हौसला नहीं बचा था.

फिदेल कास्त्रो

जनवरी 1959 में ली गई इस तस्वीर में क्यूबा की राजधानी हवाना में बातिस्ता पर विजय पाने के बाद फिदेल कास्त्रो भीड़ का अभिवदन कर रहे हैं.

जल्द ही हालात और ख़राब हो गए. सिएरा मास्त्रा की पहाड़ियों की तलहटी में क्यूबा की फौज ने उन लोगों पर अचानक हमला बोल दिया. इस हमले में ज़्यादातर लोग मारे गए. बचे रह गए तो मुट्ठी भर गुरिल्ला लड़ाके. इनमें फिदेल कास्त्रो और उनके छोटे भाई राउल भी थे.

इस बदनाम आग़ाज़ का अंजाम कुछ यूं हुआ कि उन लड़ाकों ने आख़िरकार क्यूबा में उस वक़्त के सैन्य शासक फुलजेन्सियो बतिस्ता की सेनाओं को मात दे दी.

इन मुट्ठी भर इंक़लाबियों के मुक़ाबले थी 40 हज़ार लोगों की सेना, जिसके पास उनसे बेहतर हथियार थे. ये बीसवीं सदी की सबसे कामयाब छापामार लड़ाइयों में से एक थी.

इससे भी ज़्यादा नाक़ाबिले-यक़ीन बात ये है कि वो क्रांतिकारी अब तक सत्ता में बने हुए हैं. क्यूबा पर दोनों कास्त्रो भाइयों ने कुल मिलाकर 60 बरस राज किया. कास्त्रो ने क्यूबा में एक पार्टी वाला साम्यवादी निज़ाम स्थापित किया, जिसने इस द्वीप पर अमिट छाप छोड़ी है.

अब इस ऐतिहासिक सफ़र में एक बहुत ही अहम मोड़ आने वाला है. इस क्रांति के जनक फ़िदेल कास्त्रो 2016 के आख़िर में चल बसे थे. कास्त्रो भाइयों के बाद किस चौराहे पर है क्यूबा?

अब उनके छोटे भाई राउल कास्त्रो राष्ट्रपति पद से रिटायर हो रहे हैं. 1959 के बाद ये पहली बार होगा जब क्यूबा पर ऐसे शख़्स की हुकूमत होगी, जो कास्त्रो नहीं है.

सवाल ये उठता है कि क़रीब छह दशक के अपने राज के बाद कास्त्रो भाई कौन सी विरासत सौंप कर जा रहे हैं.

वो किस तरह के मुल्क़ की बागडोर अपने वारिस के हाथ में सौंपने वाले हैं?
बिरान का कास्त्रो से नाता

जब ज़ईफ़ हो चुके कास्त्रो अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे बसर कर रहे थे, तो अपनी ज़िंदगी के सफ़र के बारे में सोचकर उन्हें ज़रूर तसल्ली हुई होगी.

हालांकि उनका शरीर बेहद कमज़ोर हो चुका था. मगर ज़हनी तौर पर सीनियर कास्त्रो आख़िरी वक़्त तक बेहद सक्रिय रहे. आख़िरी लम्हों में उनके बच्चे और नाती-पोते उनके साथ थे.

वो बड़े ज़िद्दी थे. ज़िद उनका ख़ानदानी गुण था. वो आख़िरी मोर्चे तक लड़ने वाला जज़्बा रखते थे. क़रीब 9 घंटे तक डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पुरज़ोर कोशिश की. लेकिन वो नाकाम रहे.

हम बात कर रहे हैं, मार्टिन कास्त्रो की. मार्टिन, फ़िदेल और राउल के सौतेले भाई थे. उनकी मौत सितंबर 2017 में उस जगह के बेहद क़रीब हुई, जहां वो पैदा हुए थे. उस जगह का नाम है बिरान. 87 बरस के मार्टिन की ख़ून की नली अचानक फ़ट गई थी. वो फ़िदेल कास्त्रो के गुज़र जाने के क़रीब एक साल बाद चल बसे थे.

हालांकि मार्टिन और फ़िदेल एक ही बाप की औलाद थे. दोनों ने बचपन साथ में खेलते हुए गुज़ारा था. फिर भी क्यूबा में वो दो ऐसे भाई थे, जिनकी ज़िंदगी में कोई भी मेल नहीं था.

एक भाई जहां क्यूबा की क्रांति का जनक बना. वहीं, दूसरे ने कभी घर नहीं छोड़ा.

फ़िदेल कास्त्रो शीतयुद्ध के प्रतीक थे. उन्होंने क्यूबा पर क़रीब आधी सदी तक राज किया. फ़िदेल ने पूंजीवादी अमेरिका के फ़्लोरिडा तट से महज़ 90 मील दूर स्थित द्वीप क्यूबा में वामपंथी हुकूमत क़ायम की. वो अक्सर बड़े गर्व से कहा करते थे, ‘मैंने साम्राज्यवादियों की नाक के नीचे जनता की हुकूमत क़ायम की है.’

1959 में क्यूबा की क्रांति के बाद मार्टिन को भी राजधानी हवाना आकर रहने और सरकार में किसी पद का ऑफ़र दिया गया था. लेकिन मार्टिन ने इसे ठुकरा दिया. वो साधारण इंसान थे. मार्टिन अपने घरेलू शहर में अपने जानवरों और गन्ने के खेतों के बीच ही संतुष्ट थे.

मार्टिन की बेटी जोसेफ़ा बीट्रिज़ कहती हैं, ‘मैं अक्सर ये सोचती हूं कि अगर मेरे पिता, फ़िदेल के साथ काम करते तो क्या हुआ होता. लेकिन वो कभी ऐसा नहीं चाहते थे.’ जोसेफ़ा की बातों में पिता के फ़ैसले पर अफ़सोस साफ़ झलकता है.

जोसेफ़ा अपने पिता को याद करते हुए बड़ी मोहब्बत से कहती है कि, ‘मेरे पिता ने कभी पढ़ाई नहीं की. लेकिन वो अपने दोनों सौतेले भाइयों की तरह ही अक़्लमंद थे.’ जोसेफ़ा एक पारिवारिक तस्वीर की तरफ़ इशारा करती हैं. मार्टिन की सूरत, राउल से काफ़ी मिलती लगती है.

कास्त्रो परिवार का पुश्तैनी घर फिनका लास मनाकास अब एक म्यूज़ियम है. इसे बड़ी मशक़्क़त के बाद फ़िदेल और राउल के ग्रामीण इलाक़े से ताल्लुक़ को जताने के लिए तैयार किया गया है.

क़स्बे के इतिहासकार एंतोनियो लोपेज़ मुझे पूरा इलाक़ा घुमाते हुए बातें करते हैं.

एंतोनियो कहते हैं कि बिरान एक ऐसा क़स्बा है, जिसे कास्त्रो ने तामीर किया. फ़िदेल के पिता एंजेल कास्त्रो पहली बार 1890 के दशक में क्यूबा आए थे.

वो स्पेन के गैलिशिया इलाक़े से ताल्लुक़ रखते थे और क्यूबा पर साम्राज्यवादी हुकूमत की हिफ़ाज़त के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा के तहत आए थे. एंजेल कास्त्रो ने स्पेन-अमेरिका के बीच युद्ध में हिस्सा लिया था.

जब 1898 में क्यूबा की आज़ादी के बाद वो दोबारा यहां आए, तो उन्होंने यहां की खदानों में काम करना शुरू कर दिया. बाद में एंजेल कास्त्रो, अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनी यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के लिए क्यूबा के गन्ने के खेतों में काम करने लगे.

बीसवीं सदी की शुरुआत यानी 1910 के आते-आते एंजेल कास्त्रो अमीर हो चले थे. उन्होंने सैंटियागो डे क्यूबा और नाइप बे के बीच के कीचड़ भरे रास्ते में स्थित कैमिनो रियल में कुछ ज़मीन ख़रीद ली थी.

अपने दौर के मुताबिक़, धीरे-धीरे एंजेल के खेतों का दायरा बढ़ता गया. वहां उन्होंने एक जनरल स्टोर, एक स्कूल, एक लोहार की दुकान, एक मयख़ाना, लकड़ी की टाल खोल ली, फिर उन्होंने अपनी ज़मीन पर हैती से आकर क्यूबा के गन्ने के खेतों में काम करने वालों के लिए कई झोपड़ियां भी बना लीं.

एंतोनियो मुझे वो छोटा सा स्कूल का कमरा दिखाते हैं, जहां पहले-पहल फ़िदेल कास्त्रो ने पढ़ाई शुरू की थी.

बाद में उन्हें जेसुइट पादरियों से पढ़ने के लिए सैंटियागो और हवाना भेज दिया गया था.

पास से गुज़रते हुए एक गाइड, सैलानियों को कास्त्रो की आधिकारिक कहानी सुनाती है. वो बताती है कि गन्ने के खेतों में कटाई करने वाले हैती के बंधुआ मज़दूरों की बुरी हालत ने फ़िदेल और राउल पर कितना गहरा असर डाला था.

एंतोनियो बताते हैं कि फ़िदेल ने एक बार कहा था कि ‘मैं एक ज़मींदार का पोता होने से ज़्यादा बेटा होने से ख़ुश हूं, क्योंकि हमारे परिवार में ज़मींदारी वाला भाव नहीं था’.

अफ़सोस की बात ये कि जब क्यूबा में समाजवादी क्रांति हुई तो एंजेल कास्त्रो गुज़र चुके थे. वो अपने बेटों को इस द्वीप के सबसे ताक़तवर लोग बनते नहीं देख सके. एंजेल की मौत 1956 में हो गई थी. वो फ़िदेल और राउल की मां लीना के क़रीब ही फ़िनका लास मनाकास में दफ़न किए गए थे.

हालांकि कम से कम एक बेटे के लिए गांव की शांति भरी ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.

शक्कर वाली मीठी कॉफ़ी पिलाते हुए अपने मेहमानख़ाने में बैठी जोसेफ़ा बताती हैं कि उनके पिता ज़्यादा ज़मीन नहीं छोड़ गए. उनके पास कुछ जानवर थे और ये छोटा सा घर था, जिसमें हम बैठे हुए थे.

बिरान में अभी गांव की वो अलमस्त ज़िंदगी बाक़ी है. गांव के लोग एक सरकारी दुकान के पास जमा होते हैं. काम के बाद थकन मिटाने के लिए वो थोड़ी रम पीते हैं. साथ में वो सस्ते हैम सैंडविच या कोई और ड्रिंक लेते हैं. दुकान के कैफ़ेटेरिया में सरकार सस्ती दरों में सामान बेचती है.

मार्टिन का बुनियादी क़िस्म का कंक्रीट का मकान, फ़िदेल कास्त्रो के उस प्लान का हिस्सा है, जिसके तहत उन्होंने क़स्बे के बाशिंदों के लिए 400 घर बनाए थे. ये मकान उनके पिता की ज़मीन पर बनी उन झोपड़ियों के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर थे, जो एंजेल ने हैती के मज़दूरों के लिए बनाईं थीं.

यहां सारे मकान आयताकार हैं. गुस्लख़ाना पर्दे से ढंका हुआ है. सड़क के किनारे बने ये मकान एक जैसे ही हैं. हालांकि कुछ चमकीली गुलाबी, पीली या हरे रंग वाली इमारते हैं, जो एकदम अलग दिखती हैं.

ज़्यादातर मकानों के सामने एक पोर्च है. मार्टिन अक्सर अपने घर के पोर्च में घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर आने-जाने वालों से बतियाया करते थे.

आख़िर में फ़िदेल की योजना के 400 में से केवल 218 मकान ही पूरे हुए.

जोसेफ़ा बताती हैं कि मार्टिन के जनाज़े में पूरा बिरान जुटा था. जोसेफ़ा कहती हैं कि, “सभी लोग मेरे पिता को जानते थे. लोग अक्सर मुझसे पूछते थे कि आख़िर मैं उन्हें अपने साथ हवाना क्यों नहीं ले गई. पर वो यहां ख़ुश थे.”

जोसेफ़ा अपने पिता को याद करते हुए कहती हैं, “वो कहते थे कि मुझे अमीरी नहीं चाहिए. खेतों की तरफ़ इशारा करते हुए वो कहा करते थे कि यही मेरी पूंजी है”.

सैंटियागो

केयो ग्रानमा जाने वाली हर नाव भीड़ भरी होती है. एक तरफ़ का किराया सिर्फ़ एक क्यूबन पेसो यानी 5 अमरीकी सेंट है. ये द्वीप तक पहुंचने का सबसे सस्ता ज़रिया है.

केयो ग्रानमा सैंटियागो की खाड़ी के मुहाने पर है. नाव के डेक पर ब्राज़ील से आए फ्रोज़न चिकन के बक्से लदे हैं. एक मोटरसाइकिल भी नाव पर सवार है, जिसे देखकर लगता है कि अब गिरी की तब गिरी.

वहीं नाव की बेंचों पर हाई स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे हैं, जो किसी बात पर एक-दूसरे पर चिल्लाकर ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे हैं.

मछुआरों वाले इस गांव के लोगों में से गिने-चुने ही गांव से बाहर जाते हैं. ऐसा लगता है कि ज़्यादातर स्थानीय लोग ऐसी ही ज़िंदगी पसंद करते हैं.

इस छोटे से जज़ीरे में पूरी ज़िंदगी बसर करने वाले रोसा कैरिदाद, वाल्वर्डे कहती हैं कि, “अगर वो चाहते हैं कि मैं यहां से बाहर जाऊं, तो इसके लिए उन्हें मुझे आग के हवाले करना होगा. फिर जब वो मेरे बदन पर लगी आग बुझा देंगे, तो मैं तैरकर फिर से केयो वापस आ जाऊंगी.”

रोसा की उम्र सत्तर के पार है. उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी है. वो कहती हैं कि ये कोई गंभीर बात नहीं. वो अपने पारिवारिक डॉक्टर के पास आई हैं, ताकि रोज़ाना खाने वाली दवा की नई खेप ले सकें.

रोसा छांव में बैठकर डॉक्टर क्लारा ल्यूकास का इंतज़ार कर रही हैं. डॉक्टर क्लारा बेहद साफ़-सुथरे क्लिनिक में दूसरे मरीज़ देख रही हैं.

डॉक्टर क्लारा की उम्र पचास के आस-पास होगी. वो तपाक से बात करती हैं. उन्हें अपने लोगों के बीच रहना पसंद है. इसे वो क्यूबा के बुनियादी हेल्थकेयर सिस्टम के लिए बेहद ज़रूरी मानती हैं.

क्लारा कहती हैं कि “ये द्वीप शहर से इतना दूर है कि मरीज़ों के इलाज के लिए बुनियादी साज़ो-सामान रखना पड़ता है.”

डॉक्टर क्लारा बताती हैं कि यहां 651 लोग रहते हैं. वो पहाड़ी की तरफ़ सांप की तरह रेंगती दिखने वाली टिन और लकड़ी के मकानों की क़तार की तरफ़ इशारा करती हैं. इस क़तार के आख़िर में एक चर्च दिखता है.

डॉक्टर क्लारा बताती हैं कि इस द्वीप पर गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को शहर तक पहुंचाने के लिए मोटर से चलने वाली बड़ी नाव भी है. हालांकि वो बड़े गर्व से कहती हैं कि उन्होंने इस द्वीप पर ही बहुत से लोगों की जान बचाई है.

रोसा कैरिदाद सेहत की इस सेवा के लिए शुक्रगुज़ार हैं. वो बिना पूछे ही क्यूबा की क्रांति के गुण गाने शुरू कर देती हैं, “किसी देश के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ कपड़े या खाना नहीं है, बल्कि सेहत और तालीम है. और ये दोनों ही चीज़ें हमें यहां मुफ़्त मिलती हैं.”

ये क्यूबा की क्रांति के दो सबसे मज़बूत पाए हैं. कास्त्रो भाइयों के राज में ये सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि माने जाते हैं.

हाल ये है कि अगर आप क्यूबा की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में कमियों की तरफ़ इशारा करते हैं. ये कहते हैं कि इनके आधुनिकीकरण की सख़्त ज़रूरत है. इसमें पूंजी की दरकार है. तो, ये कुछ सरकारी अधिकारियों की नज़र में ईशनिंदा जैसा जुर्म है.

जब डॉक्टर क्लारा से मैंने पूछा कि आख़िर वो राउल कास्त्रो के सियासी वारिस से क्या चाहती हैं, तो वो इस सवाल का जवाब बहुत संभलकर देती हैं. वो सिर्फ़ इतना कहती हैं कि क्यूबा में अफ़सरशाही बहुत बड़ा रोड़ा है. और सिर्फ़ 35 डॉलर महीने की तनख़्वाह पर बसर करना बहुत मुश्किल होता है. वो फ़ौरन ही ये भी कहती हैं, “लेकिन, पिछले कुछ सालों में मेरी तनख़्वाह पहले के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा बढ़ी है.”

साथ ही में क्लारा बड़ी ज़िम्मेदारी से ये भी कहती हैं कि क्यूबा पर लगे अमरीका के आर्थिक प्रतिबंध हटने चाहिए. ये एक ऐसी बात है, जो पूरे क्यूबा में आप को बार-बार सुनने को मिलती है. दवाओं की आपूर्ति से लेकर नए क़िस्म के बीजों की सप्लाई तक, “आर्थिक पाबंदी” को क्यूबा की हर आर्थिक चुनौती और मुश्किल के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. क्यूबा पर अमरीका ने पिछले 58 साल से आर्थिक पाबंदी लगाई हुई है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्यूबा के हेल्थकेयर सिस्टम के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. बहुत से डॉक्टर और नर्सें, नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि अस्पतालों में इन्फ़ेक्शन बहुत बड़ी समस्या है.

हालांकि इलाज पूरी तरह मुफ़्त है. फिर भी स्वास्थ्य सेवा के बड़े हिस्से का बोझ मरीज़ के परिजनों को उठाना पड़ता है. उन्हें चादरें, तकिया और कई बार तो खाना और बुनियादी एंटीबायोटिक दवाओं का इंतज़ाम भी ख़ुद ही करना पड़ता है.

फिर भी, डॉक्टर क्लारा कहती हैं कि लैटिन अमरीकी देशों में गिने-चुने ही ऐसे हैं, जो क्यूबा जैसी स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं अपने नागरिकों को देते हैं.

वैसे इस बात की तारीफ़ तो पैन अमरीकन हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन भी करता है. ख़ास तौर से क्यूबा के हेल्थ सिस्टम को इस बात की तारीफ़ मिलती है कि उसने क्यूबा में होने वाली बीमारियों से मज़बूती से लड़ाई लड़ी है, और जीत हासिल की है.

क्यूबा के मेनलैंड यानी मुख्य द्वीप पर मैंने उस जगह का दौरा किया, जहां से इसकी शुरुआत हुई थी. मैं मोनकाडा बैरक गया, जहां पर इंक़लाब की पहली गोली दाग़ी गई थी.

26 जुलाई 1953 को फ़िदेल और राउल ने सैंटियागो में मुट्ठी भर लोगों और गिने-चुने हथियारों की मदद से बतिस्ता के ज़ुल्मो-सितम के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. कास्त्रो भाइयों ने मोनकाडा की बैरक पर धावा बोल दिया.

तख़्तापलट की इस कोशिश को कुछ घंटों के भीतर कुचल दिया गया था. साज़िश करने वालों को गिरफ़्तार करके उनका ज़बरदस्त टॉर्चर किया गया. ख़ुशक़िस्मती से कास्त्रो भाई इन लोगों में से नहीं थे.

जब कास्त्रो भाइयों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा किया, तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में इस सैनिक अड्डे को स्कूल में बदल दिया. आज यहां एक ही छत के नीचे कई स्कूल चलते हैं. यहां पर उस बग़ावत के बारे में एक म्यूज़ियम भी खोला गया है.

क्यूबा के लोगों के लिए यहां की शिक्षा व्यवस्था भी बहुत गर्व की बात है. देश के ग्रामीण इलाक़ों को 1960 के दशक में ही अशिक्षा की जकड़न से आज़ाद करा लिया गया था. क्यूबा की उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक रिसर्च की पूरी दुनिया तारीफ़ करती है.

21वीं सदी की शुरुआत में विश्व बैंक की एक स्टडी में क्यूबा के छात्रों को को कैरीबियाई देशों के बीच गणित और विज्ञान की पढ़ाई के मामले में अव्वल पाया गया था. इनमें छात्र और छात्राएं दोनों शामिल थे. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि क्यूबा के स्कूल कई मामलों में ओईसीडी यानी 35 अमीर देशों की बराबरी के हैं.

शिक्षा को क्रांति का बुनियादी उसूल कहा जाता है. लेकिन आज क्यूबा की शिक्षा व्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है. संसाधनों की बेहद कमी है. बजट कम है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में टीचर्स की भी भारी कमी होती जा रही है.

हज़ारों स्कूल अध्यापक ग़ैरहाज़िर रहते हैं. इनमें से बहुत से लोगों ने तो पढ़ाने का काम ही छोड़ दिया है. वो अब प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं. आज क्यूबा में सैलानियों को किराए पर कमरा देकर ज़्यादा पैसे कमाए जा सकते हैं. वहीं टीचरों की तनख़्वाह बेहद कम है.

मोनकाडा के एक स्कूल में छात्र क़तार से बैठाए गए हैं. उनके बगल में ही एक तख़्ती लगी है, जिस पर लिखा है कि मोनकाडा के क्रांतिकारियों को मारने के बाद उनकी लाशें यहीं फेंकी गई थीं.

उनमें से एक बच्ची आवाज़ लगाती है कि “साम्यवाद के अगुवाओं”… बच्चे फ़ौरन उसी अंदाज़ में जवाब देते हैं कि… “हम सब चे ग्वेरा बनेंगे”.

पूरे क्यूबा में सुबह के वक़्त स्कूली बच्चे ये नारे लगाते हैं. इसके ज़रिए उन्हें समाजवाद का पाठ पढ़ाया जाता है. क्रांतिकारी चे ग्वेरा का सम्मान करना सिखाया जाता है.

इसके बाद हमें एक कक्षा में ले जाया जाता है, जहां बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं.

टीचर पूछता है कि “कौन इन शब्दों को पास्ट टेंस में बदल सकता है?” उसने ब्लैकबोर्ड पर लिखा है, “टू स्टडी” यानी पढ़ाई करना.

टीचर के सवाल के जवाब में कई बच्चे हाथ उठाते हैं लेकिन, टीचर उन बच्चों की तरफ़ इशारा करती है, जिन्होंने हाथ नहीं उठाए.

हमें बताया जाता है कि हम बच्चों से सवाल-जवाब कर सकते हैं. लेकिन हमारा तजुर्बा ये रहा कि ये बच्चे उस्तादों की रहनुमाई में बस क्रांति के नारे लगाते हैं. इंक़लाब के गुण गाते हैं.

इसीलिए बच्चों से बात करने के बजाय मैं हेड टीचर से ही बात करने लगा. मैंने कहा कि इस नारेबाज़ी पर अमरीका के मयामी में लोग सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि ये तो बच्चों को भरमाने का काम है. उनके ज़हन में ज़बरदस्ती क्रांति को लेकर यक़ीन ठूंसने जैसा है.

उस स्कूल की हेड टीचर एलेन इनफैंटे कहती हैं कि, “ये वाहियात बात है कि हम बच्चों के ज़हन में ऊल-जलूल बातें भर रहे हैं. हमारी क्रांति इंसानियत वाली है. हम यहां बच्चों की भलाई के लिए सोचते हैं. इसीलिए हम काम करने आते हैं. हम उन्हें उग्रवादी नहीं बनाते हैं हम उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करते हैं. उन्हें अच्छा इंसान बनाते हैं, ताकि वो समाज की सेवा कर सकें”.

सिएरा मैस्त्रा

डॉन मनोलो तब तक अपनी ज़मीन में काम किया था, जब तक उनके घुटनों ने जवाब नहीं दे दिया. उस वक़्त उनकी उम्र 90 साल हो चली थी.

डॉन ने पूरी उम्र सिएरा मैस्त्रा की पहाड़ियों में कॉफ़ी उगाते हुए बिताई थी. दो साल पहले वक़्त और हालात से मजबूर होकर उन्हें अपनी ज़मीन को पेंशन के एवज़ में लौटाना पड़ा.

डॉन के झुर्रियों भरे एक हाथ में सहारे के लिए छड़ी है. दूसरे हाथ से वो अपनी हैट संभालते हैं, जो उन्हें कैरेबियन इलाक़े की तेज़ धूप से बचाती है. डॉन कहते हैं कि, “हमने भूमिहीन मज़दूरों के तौर पर काम शुरू किया था. हमारे पास ज़मीन का अधिकार नहीं था”.

क्यूबा में क्रांति से पहले डॉन मनोलो अपनी कुल उपज का एक तिहाई हिस्सा स्थानीय ज़मींदार को दे देते थे. एक रोज़ कुछ दाढ़ी वाले लोग उनके खेतों में नज़र आए.

डॉन उन दिनों को याद करके कहते हैं कि, “हम में से बहुत से लोग फ़िदेल के लिए लड़ना चाहते थे. लेकिन उन्होंने कहा कि हर मज़दूर का सैनिक बनना ज़रूरी नहीं है. बहुत से लोगों को हमारे खाने के लिए अनाज पैदा करने का काम करना होगा. बाग़ियों ने हम से वादा किया कि जल्द ही हमारे पास अपनी ज़मीन होगी”.

उस वक़्त डॉन की उम्र भी फ़िदेल कास्त्रो के बराबर यानी 33 बरस थी. उस घटना के कुछ महीनों बाद उनकी मुलाक़ात फिर से फ़िदेल कास्त्रो से हुई थी. तब क्रांति के बाद अपना वादा पूरा करने के लिए फ़िदेल, स्थानीय किसानों को ज़मीन के काग़ज़ात देने आए थे.

ज़मीन सुधार के तहत, एक तयशुदा काश्त से बड़ी हर ज़मीन के मालिकाना हक़ को सरकार ने छीन लिया और उसके टुकड़े करके किसानों में बांट दिए. इन ज़मीनों सरकार की तरफ़ से चलाई जाने वाली कम्यून के हवाले कर दिया गया. सभी बड़े ज़मींदार, फिर चाहे वो क्यूबा के रईस हों या कोका-कोला और यूनाइटेड फ्रूट कंपनी जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां, सबकी ज़मीन का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था.

क्रांति के बाद क्यूबा में किसी भी विदेशी को गन्ने के खेतों के मालिकाना हक़ से महरूम कर दिया गया. ये वो शुरुआती फ़ैसले थे, जिनसे क्यूबा और अमरीका के बीच तनातनी शुरू हुई. कहा जाता है कि फ़िदेल कास्त्रो ने फिनका लास मनाकास में अपने परिवार की कुछ ज़मीन भी छीनकर सरकार के हवाले कर दी थी. इस बात पर उनकी मां बहुत नाराज़ हुई थीं.

वो क़ानून आज भी क्यूबा की कृषि व्यवस्था की बुनियाद है.

डॉन मनोलो उन दिनों को याद करके बताते हैं कि, “हम ने घोडों की एक परेड के साथ कैने डे लास मर्सिडीज़ में उस दिन पार्टी की थी. हम ख़ुश थे कि अब हमें हमारी ज़मीन के काग़ज़ात मिल गए थे. अब हमें कोई भी हमारी ज़मीन से बेदखल नहीं कर सकता था”.

सिएरा मैस्त्रा की पहाड़ियों की तलहटी की आबो-हवा कॉफ़ी की खेती के लिए मुफ़ीद है.

पोलो नोर्ते यानी उत्तरी ध्रुव नाम की एक जगह में लेरिडो मेदिना रहते हैं. उन्हें भी क्रांति के बाद ज़मीन का मालिकाना हक़ हासिल हुआ था. हालांकि अब उनके पास वो काग़ज़ात नहीं हैं. उन्होंने दस्तावेज़ को हवाना के एक म्यूज़ियम को दान कर दिया था.

ठंडी पहाड़ी हवा से बचने के लिए एक मोटी सी गर्म कमीज़ पहने लेरिडो कहते हैं कि अब वो पूरी तरह से अपनी बीवी ऐडा के भरोसे हैं. उनकी पत्नी और बेटे अब खेती का काम करते हैं.

लेरिडो पुराने दौर को याद करते हुए कहते हैं कि, “सबसे मुश्किल काम जंगल साफ़ करके ज़मीन को खेती लायक़ बनाना था. उस वक़्त इतने कल-पुर्ज़े भी नहीं थे. हमने हाथ से कुल्हाड़ी, दरांती और हंसिया की मदद से वो काम किया था”.

परिवार की पूरी उपज सरकार को बेच दी जाती है. कॉफ़ी को क्यूबा में खुले बाज़ार में नहीं बेचा जा सकता.

आज तक लेरिडो जैसे कई किसान उस कृषि सुधार को अपनी ख़ुदमुख़्तारी की बुनियाद मानते हैं. लेकिन आलोचक कहते हैं कि इस तरह वो पूरी उम्र के लिए सरकार के भरोसे हो गए.

राउल के राज में कुछ आर्थिक क़ानूनों में ढील दी गई है. हालांकि अभी भी निजीकरण नहीं हुआ है. फिर भी पोर्टो नोर्टे में कॉफी की खेती करने वाले किसानों ने मिलकर सहकारी संस्था बना ली है. लेरिडो के बेटे एज़िक्विएल कहते हैं कि सहकारी संस्था की मदद से किसान मिल-जुलकर अपने संसाधन जुटाते हैं. एकजुट होने की वजह से वो अपनी उपज की बेहतर क़ीमत हासिल कर पाते हैं.

लेकिन, चाहे कॉफ़ी की खेती करने वाले हों, या फिर गन्ने की, या तंबाकू की. सबका यही कहना है कि उनके पास खेती के लिए ज़रूरी तकनीकी संसाधन बहुत कम हैं. आज भी खेती के बहुत से औज़ार उन्नीसवीं सदी के ही हैं. जुताई का काम हल-बैल से होता है. इसके अलावा घोड़ा-गाड़ी और छुरी ही किसानों के औज़ार हैं.

लेरिडो कहते हैं कि, “मैदानी इलाक़ों में तो आप ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं. मगर, यहां पहाड़ी ढलानों पर नहीं कर सकते. किसानों के लिए चुनौतियां बड़ी हैं मगर, काम तो करना होगा”.

राउल के सत्ता छोड़ने के बावजूद, क्यूबा में खेती का पूरा सिस्टम सरकारी है. बहुत से किसानों के लिए तरक़्क़ी की रफ़्तार बेहद धीमी है. ख़ास तौर से सोवियत संघ के विघटन के बाद तो हालात बेहद मुश्किल हो गए. क्यूबा की अनाज की कुल ज़रूरत का तीन चौथाई, बाहर से ख़रीदा जाता है.

हालांकि, देश से भुखमरी का कमोबेश ख़ात्मा कर दिया गया है. इस बात की कम ही उम्मीद है कि आने वाला नया नेता, क्रांति की इस उपलब्धि को मिटाना चाहेंगे. क्योंकि खेती के उत्पादन का ये तरीक़ा क्यूबा की क्रांति का बुनियादी सिद्धांत है.

क्यूबा, कॉफ़ी का आयात करता है. चीनी, क्यूबा का मुख्य निर्यात है. चीनी ही क्यूबा की अर्थव्यवस्था की धुरी है.

क्यूबा के कमागुए सूबे की एक सड़क से गुज़रते हुए हम ने कुछ किसानों से बात की. वो गन्ने की फ़सल काट रहे थे. इन किसानों की अगुवाई करने वाले ओस्वानी इग्लेसियास ने कहा कि इस साल उनका लक्ष्य 40 हज़ार टन गन्ने के उत्पादन का है. इसके बाद इग्लेसियास ने पुराने पड़ रहे खेती के कल-पुर्ज़ों को लेकर शिकायत शुरू कर दी. उन्होंने कहा कि ज़्यादातर मशीनें सोवियत संघ के दौर की हैं.

ओस्वानी इग्लेसियास ने कहा कि, “आप वो हार्वेस्टिंग कंबाइन देख रहे हैं, वो 1972 की है. वहीं दूसरी वाली 1975 की. और ये जो सबसे नई मालूम देती है, वो भी 1994 की है. कल-पुर्ज़ों की भारी कमी है. जो चीनी कल-पुर्ज़े हैं भी उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं है”.

बाद में वो कंधे उचकाकर हंसते हुए कहते हैं. हमारे पास इनसे काम चलाने के सिवा कोई चारा नहीं.
प्लाया गिरोन

“गिरोन: लैटिन अमरीका में यांकी साम्राज्यवादियों की पहली हार का ठिकाना” – जब आप गिरोन क़स्बे में घुसते हैं, तो सड़क किनारे लगे बोर्ड पर बड़े-बड़े बोर्ड चीख-चीखकर ये बात कहते मालूम होते हैं.

क्रांति को लेकर बड़बोले दावों से अलग, ये बात है तो बिल्कुल सही. अमरीका ने 1961 में बे ऑफ़ पिग्स के अपने अधकचरे हमले से पहले लैटिन अमरीका के किसी भी मोर्चे पर कभी भी मात नहीं खायी थी. ये बे ऑफ़ पिग्स या प्लाया गिरोन ही था, जहां अमरीकी सेना की योजना नाकाम रही थी और उसे युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था.

इस हमले के लिए सीआईए ने कई महीनों तक क्यूबा से भागे लोगों को दक्षिणी फ्लोरिडा और ग्वाटेमाला में हमले की ट्रेनिंग दी थी. 16 अप्रैल 1961 को, झूठे झंडों से रंगे डगलस B-26 बॉम्बर विमानों ने सैंटियागो और हवाना के बाहर स्थित हवाई सैन्य ठिकानों पर बमबारी की.

इसके बाद क्यूबा पर समंदर से हमला किया गया. क़रीब 1400 आदमी गिरोन और पास के दो और समुद्री तटों पर अचानक नमूदार हो गए. ये हमला शुरुआत से ही बुरी तरह नाकाम रहा था. न तो हमले के निर्देश ठीक से दिए गए. न ही उनका ठीक से पालन हुआ. क्रांतिकारियों का तख़्तापलट करने गए लोग, समुद्र किनारे के दलदली इलाक़ों में फंसकर रह गए.

क्यूबा की सेनाओं कमान ख़ुद फ़िदेल कास्त्रो ने संभाली. वहीं, जब इन हमलों में अमरीका का हाथ उजागर हो गया, तो राष्ट्रपति जॉन एफ, कैनेडी ने हमलावरों की मदद के लिए अमेरिकी एयरफ़ोर्स को भेजने से मना कर दिया.

इस हमले को बुरी तरह कुचल दिया गया. कास्त्रो ने एक शानदार जीत हासिल की थी. वहीं कैनेडी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था.

चे ग्वेरा ने इस हमले के बाद राष्ट्रपति कैनेडी को शुक्रिया कहते हुए ख़त लिखा, “क्रांति कमज़ोर थी. आपने उसे पहले से बेहद मज़बूत बना दिया.”

इस हमले की पूरी कहानी क्यूबा के नज़रिए से प्लाया गिरोन स्थित एक म्यूज़ियम में देखी जा सकती है. यहां पर घूम रहे सैलानियों के बीच अमरीकी अंदाज़ वाली अंग्रेज़ी के बोल सुने जा सकते हैं. लेकिन, अगर किसी को वाक़ई उस हमले की पूरी हक़ीक़त जाननी है, तो उन्हें म्यूज़ियम से बाहर आकर डोलोरेस फिस की तलाश करनी चाहिए.

डोलोरेस, क़रीब ही एक सामान्य से घर में रहती हैं. उसका फ़र्श सीमेंट का बना है. गिरोन की भयंकर गर्मी में भी डोलोरेस का घर ठंडा रहता है. उनकी एक बेटी पड़ोस में ही रहती है. वहीं भतीजे का घर ठीक सामने है. वो मेरा स्वागत किसी पुराने रिश्तेदार की तरह करती हैं. असल में ये कोई पहली बार नहीं है, जब मैं उनसे मिलने पहुंचा.

डोलोरेस उन गिने-चुने ज़िंदा लोगों में से हैं, जो 1961 के अमरीकी हमले के दौरान गिरोन में ही थे. अब उनकी उम्र 84 बरस हो चली है. लेकिन उनकी कहानियां एकदम अलग हैं और आपको हिलने नहीं देतीं.

वो एक ऐसी आम इंसान हैं, जो क़िस्मत से उस मौक़े पर मौजूद थीं, जिसका क्यूबा के ज़हन और इतिहास पर गहरा असर पड़ा. उनकी कहानी, क्यूबा के किसी भी आम इंसान की कहानी सरीखी है, जिसने क्रांति को जिया है.

मैंने डोलोरेस से राष्ट्रपति बराक ओबामा के 2016 के क्यूबा दौरे से ठीक पहले बात की थी. उन्होंने उस हमले की कहानी मुझे फिर से सुनाई. डोलोरेस ने बताया कि उन्होंने उस रात फ़ुसफ़ुसाते हुए अपने पति को जगाकर कहा था, “वो समुद्र तट पर गोलियां चला रहे हैं”. डोलोरेस वहीं रहकर हमलावरों का मुक़ाबला करना चाहती थीं. लेकिन उनके पति ने उन्हें और उनकी ननद को बच्चों के साथ भागकर पास की पहाड़ी में छुपने के लिए मना लिया. उन्हें एक ख़ाली पड़े घर के दरवाज़े को तोड़कर उसमें पनाह लेनी पड़ी थी. भागते हुए वो अपने साथ थोड़ा-बहुत खाना ले जा सके थे.

लेकिन, इस बार वो बताती हैं कि किस तरह प्लाया गिरोन में बदलाव आ गया है.

डोलोरेस कहती हैं, “पहले यहां कुछ भी नहीं था. लेकिन अब मैं यहां के आधे घरों में रहने वालों को नहीं जानती. ज़माने भर से लोग यहां आकर बस गए हैं. यहां ओरिएंटे, कामागुए, हवाना और न जाने कहां-कहां से आकर लोग बस गए हैं”.

इसकी वजह ये है कि इस अलसाए से समुद्र तटीय गांव में कमाई का बहुत आसान ज़रिया है. जैसे ही आप गिरोन में घुसते हैं, हर घर में आपको नीला-सफ़ेद निशान दिखता है. इसका मतलब ये है कि यहां पर सैलानियों के ठहरने का इंतज़ाम है. यहां विदेशी नागरिक ठहर सकते हैं. क्यूबा में इन्हें कासास पार्टीकुलारेस कहा जाता है. ये आम क्यूबाई नागरिक के लिए सबसे बड़ा निजी कारोबार बन गए हैं.

हालांकि क्यूबा की सरकार ने पिछले एक साल से नए कारोबार के लिए लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा रखी है. फिर भी सैलानियों को ठहरने की जगह मुहैया कराना, आम क्यूबाई नागरिक के लिए सबसे आसान निजी कारोबार है. इसकी मदद से वो रोज़ की मज़दूरी से ज़्यादा पैसे कमा लेते हैं. इसके लिए उन्हें अपने घर में थोड़ा बहुत बदलाव करना पड़ता है, जिसमें ज़्यादा पैसे नहीं लगते.

डेनियर सुआरेज़, हवाना से आकर गिरोन में बसे हैं. स्थानीय लोग उन्हें जिम्मी पुकारते हैं. वो इसलिए यहां आ गए क्योंकि इस इलाक़े में टूरिज़्म का कारोबार तेज़ी से फैल रहा है. जिम्मी ने पहले यहां समुद्र किनारे स्थित सरकारी होटल में शेफ़ का काम किया. फिर वो इस इलाक़े के बेहद लोकप्रिय कासा में मैनेजर बन गए.

जिम्मी कहते हैं कि, “इस साल तो कारोबार ठीक है. मगर पिछले दो साल धंधा काफ़ी कमज़ोर रहा था”. वो इसकी दो वजहें बताते हैं. एक तो समुद्री तूफ़ान इरमा था, जिसने क्यूबा के उत्तरी तटीय इलाक़ों में भारी तबाही मचाई थी. तूफ़ान के असर से दक्षिणी तटीय इलाक़े अछूते रहे थे. लेकिन जिम्मी मानते हैं कि क्यूबा के उत्तरी इलाक़ों की टीवी पर आई तस्वीरों ने लोगों का मन इस इलाक़े में आने से बदल दिया.

वो, टूरिज़्म पर बुरे असर की दूसरी वजह के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम लेते हैं.

जिम्मी कहते हैं, “ये तो साफ़ दिखता है”. उनका इशारा डोनाल्ड ट्रंप के राज में आवाजाही के नियमों में सख़्ती की तरफ़ था. ओबामा के राज में अमरीका से रिश्तों में काफ़ी गर्माहट देखी गई थी.

जिम्मी कहते हैं, “बहुत कम ही अमरीकी सैलानी आ रहे हैं. आप उन्हें बमुश्किल देखते हैं. हम सिर्फ़ उम्मीद ही कर सकते हैं कि यूरोपीय सैलानी आते रहें. हम अभी चिंतित नहीं हैं. पर, अगर ट्रंप, क्यूबा आने-जाने के नियमों में रियायत बरतें तो अच्छा रहेगा”.

क्रांति के इतिहास की झलक पाने के अलावा, टूरिस्ट गिरोन परिंदे देखने या डाइविंग के लिए आते हैं. पास स्थित सिएनागा डे ज़पाटा नेशनल पार्क में इस देश के बेस्ट इको-टूरिज़्म का लुत्फ़ लिया जा सकता है.

गिरोन के ठीक बाहर कुएवा डे लोस पेसेस है. ये डाइविंग और स्नॉर्केलिंग का बेहद लोकप्रिय ठिकाना है.

हमारे इंस्ट्रक्टर रे हमें एक ऐसी मूंगे की चट्टान के पास ले जाते हैं, जिसे ज़्यादा नुक़सान नहीं हुआ है. यहां हमने कुछ कनाडाई नागरिकों को एक डूबी हुई नाव की तफ़्तीश का लुत्फ़ लेते हुए देखा.

दो दशक पहले फ़िदेल कास्त्रो विदेशी नागरिकों को शैतान मगर देश के लिए ज़रूरत के तौर पर देखते थे. वो मानते थे कि विदेशी सैलानियों की मदद से क्यूबा के लिए बेहद ज़रूरी विदेशी मुद्रा हासिल होती है.

लेकिन, आज की तारीख़ में टूरिज़्म को क्यूबा के आर्थिक भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी माना जाता है. सरकार को उम्मीद है कि आने वाले सालों में सैलानियों की तादाद और बढ़ेगी.

हालांकि टूरिज़्म की वजह से क्यूबा में गैरबराबरी या आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है. नए राष्ट्रपति को इस चुनौती पर भी ध्यान देना होगा. आज की तारीख़ में सैलानियों से विदेशी मुद्रा कमाने वाले और आम क्यूबाई नागरिक के बीच फ़र्क़ बढ़ रहा है.

जो लोग टूरिज़्म से जुड़े सरकारी संस्थानों में काम करते हैं, वो ख़ुद का कारोबार शुरू करना चाहते हैं. अभी तो आर्थिक नियम इतने सख़्त हैं कि कोई निजी डाइविंग शॉप नहीं खोल सकता.

रे कहते हैं कि, “हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपना काम शुरू करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि अभी कुछ वक़्त तक हालात ऐसे ही रहने वाले हैं. टूरिज़्म का मौजूदा मॉडल सरकार के लिए मुफ़ीद है”.

डूबते हुए सूरज के साए में बहुत से सैलानी बे ऑफ़ पिग्स में ताड़ के पेड़ के नीचे इकट्ठे हैं. वो ठंडी बीयर पी रहे हैं. या फिर क्यूबाई रम, जिसे नारियल के छिलके से बनाया जाता है. स्थानीय लोग इसे बेचते देखे जा सकते हैं.

इस मंज़र को देखते हुए कुछ लोग ही होंगे, जो सैलानियों के क्यूबा पर हमले को न देख सकें. ये उपमा बिल्कुल सटीक बैठती है. गिरोन के लोग आज ये सवाल करते हैं कि टूरिज़्म से होने वाली आमदनी का कितना हिस्सा वो अपने खाते में डाल सकते हैं.

चौराहे पर खड़ा क्यूबा

जब राउल कास्त्रो गद्दी छोड़ने की तैयारी कर रहे थे, तो क्यूबा में एक चुनाव हुए पूरे देश में लोग ज़िम्मेदारी से वोट देने निकले ताकि नेशनल असेंबली के लिए सदस्य चुन सकें.

19 अप्रैल को इसी नेशनल असेंबली के सदस्य नए राष्ट्रपति का चुनाव करेंगे, जो राउल कास्त्रो की जगह लेंगे.

ज़्यादातर लोगों को उम्मीद है कि उप-राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कनेल नए राष्ट्रपति होंगे. उन्हें कभी तो कट्टरपंथी और कभी उदारवादी आधुनिक नेता कहा जाता है. वो 1959 के बाद गैर-कास्त्रो सरकार के मुखिया हो सकते हैं.

मामला सीधा-सादा लगता है. लेकिन सच्चाई ये है कि नेशनल असेंबली में जितनी सीटें हैं, उतने ही उम्मीदवार यानी कुल 605 प्रत्याशी ही जनता के चुनने के लिए मैदान में थे. यानी जनता के पास कोई विकल्प ही नहीं था. इसके अलावा क्यूबा में एक ही पार्टी है. सो, किसी और राजनैतिक दल का प्रत्याशी ही मैदान में नहीं था.

पिछले साल कई नाराज़ और विपक्षी लोगों ने स्थानीय निकाय के चुनाव में मैदान में उतरने की कोशिश की थी. इनमें ओट्रो 18 समूह के सदस्य भी थे. उनका दावा है कि उन्हें अपना पर्चा दाखिल करने से भी रोका गया. पुलिस और सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने उन पर नामांकन न करने का दबाव बनाया.

जब मैंने लोगों को मतदान करते हुए देखा, तो मुझे राउल कास्त्रो का 2014 का बयान याद आ गया. राष्ट्रपति ओबामा के साथ कूटनयिक संबंध स्थापित करने को लेकर बनी ऐतिहासिक रज़ामंदी के पांच दिन बाद ही लोगों को उम्मीद की एक किरण दिखी थी.

संसद को संबोधित करते हुए राउल कास्त्रो ने अमरीका से बदले रिश्तों का ज़िक्र करते हुए कहा था:हमें ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अमरीका से रिश्ते सुधारने के लिए क्यूबा अपने बुनियादी विचारों को दरकिनार कर देगा. हम उन सिद्धांतों को नहीं छोड़ सकते, जिसके लिए हमने एक सदी तक लड़ाई लड़ी है. जिसके लिए हमारे लोगों ने इतना ख़ून बहाया और इतना जोखिम लिया.

संदेश साफ़ था-सियासी तौर पर क्यूबा में यथास्थिति बनी रहेगी. खुले विरोध या कई दलों वाली राजनैतिक व्यवस्था के लिए फ़िलहाल क्यूबा में कोई जगह नहीं. आज भी उनके लिए कोई जगह नहीं है.

एक दशक पहले क्यूबा में सरकार का विरोध करने वालों को लंबे वक़्त की क़ैद में डाल दिया जाता था. आज विरोध की आवाज़ को दबाने का ये तरीक़ा बंद किया जा चुका है. इसकी जगह एक नई व्यवस्था ने ले ली है. इसके तहत सरकार के ख़िलाफ़ मुंह खोलने वाले नेताओं और पत्रकारों को तयशुदा वक़्त के लिए इकतरफ़ा नज़रबंदी में डाल दिया जाता है. क्यूबा की सरकार इन्हें भाड़े के हत्यारे कहती है, जो अमरीका और फ्लोरिडा में बसे क्यूबाई लोगों से पैसे लेकर क्यूबा की सरकार के ख़िलाफ़ काम करते हैं.

इस बात में कम ही लोगों को शक होगा कि फ्लोरिडा की खाड़ी के दोनों तरफ़ कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें क्यूबा और अमरीका के बीच सुधरते रिश्तों को लेकर शक था. फ्लोरिडा में रहने वाले कास्त्रो विरोधी लोगों ने इस क़दम का ज़ोर-शोर से विरोध किया था. ख़ास तौर से फ्लोरिडा के सीनेटर मार्को रुबियो ने.

वहीं क्यूबा में बहुत से ऐसे विचारक थे, जिन्हें अमरीकी राष्ट्रपति का राजधानी हवाना आना नहीं सुहाया था. उन्हें लग रहा था कि पुराना दुश्मन, उनकी ही ज़मीन पर ख़ुद को पाक-दामन दिखाने की कोशिश कर रहा था.

अपने ऐतिहासिक दौरे में राष्ट्रपति ओबामा ने कहा था कि, ‘मैं अमरीकी महाद्वीप में बचे शीतयुद्ध के अवशेषों को दफ़नाने यहां आया हूं’. ओबामा ने उन परिवारों का ज़िक्र किया, जो दोनों देशों के बीच तनातनी की वजह से दो हिस्सों में बंटने को मजबूर हुए. उन्होंने दोस्ती की नई रौशनी के बिखरने की बात कही, ताकि दोनों देशों के बीच दूरी को पाटा जा सके. ओबामा को टीवी पर देख रही एक महिला ने मुझसे कहा था कि, ‘मेरे तो आंसू बह चले थे’.

फ़िदेल कास्त्रो ने एक अख़बार में ओबामा के मीठे बोलों को लेकर चेतावनी भरा लेख लिखा था. उन्होंने क्रांतिकारियों से चौकन्ने रहने की अपील की थी. सरकार के कई कट्टरपंथियों ने फ़िदेल कास्त्रो से सहमति जताई थी. वो क्यूबा में अमरीका के पक्ष में बह रही हवा के रुख़ को मोड़ना चाहते थे.

इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए.

फ़िदेल कास्त्रो की मौत के कुछ घंटे बाद ही निर्वाचित राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने ट्विटर पर फ़िदेल कास्त्रो को एक ज़ुल्मी तानाशाह कहा. ट्रंप ने कहा फ़िदेल की विरासत फ़ायरिंग स्क्वॉड, चोरी, बेइंतिहा कष्ट, ग़रीबी और बुनियादी अधिकारों से लोगों को महरूम रखने की है.

ज़ाहिर है ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से तय हो गया था कि दोनों देशों में तनातनी का दौर वापस आने वाला है.

तेज़ी से बिगड़ते रिश्तों की आग को एक ऐसी घटना से और बढ़ावा मिला, जिसे किसी जासूसी उपन्यास से कम नहीं कहा जा सकता. हवाना में तैनात 20 से ज़्यादा अमरीकी राजनयिकों की तबीयत राज़दाराना अंदाज़ में बिगड़ने लगी. किसी को सुनाई कम पड़ने लगा, तो किसी को चक्कर आने की शिकायत हुई और किसी का ज़हन ही सुन्न पड़ने लगा.

अमरीकी विदेश विभाग ने दावा किया कि उसके राजनयिकों पर हेल्थ अटैक हुआ है. अमरीका ने क्यूबा पर आरोप लगाया कि अगर वहां की सरकार ने ये हेल्थ अटैक नहीं किए तो, कम से कम वो अमरीकी राजनयिकों की सुरक्षा में नाकाम रही है.

क्यूबा ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है. क्यूबा की सरकार ने कहा कि ये पूरी कहानी झूठी है और भ्रम फैलाने के लिए गढ़ी गई, ताकि एक माहौल बनाया जा सके. क्यूबा ने आरोप लगाया कि पूरी कहानी इसलिए गढ़ी गई ताकि दोनों देशों के बीच बढ़ी हालिया नज़दीकी को दूरी में बदला जा सके और रिश्ते ख़राब किए जा सकें.

अब सच जो भी हो, इस घटना के बाद अमरीका ने क्यूबा में तैनात अपने राजनयिकों की संख्या घटा दी. अब हवाना में सिर्फ कामचलाऊ अमरीकी ही हैं. आज अमरीका और क्यूबा के बीच रिश्ते ओबामा के राज के मुक़ाबले बेहद ठंडे पड़ चुके हैं. बात ज़रा भी आगे नहीं बढ़ी है. इस माहौल में ही राउल कास्त्रो के वारिस गद्दी संभालेंगे.

तो, इसकी आम क्यूबाई नागरिक के लिए क्या अहमियत है? 92 बरस के कॉफ़ी किसान लेरिडो, या अपना कारोबार शुरू करने की ख़्वाहिश रखने वाले डाइविंग इंस्ट्रक्टर रे के ऊपर इससे क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है?

लोग ये कह सकते हैं कि अमरीका और क्यूबा के बिगड़़ते रिश्ते का बहुत ही कम असर आम क्यूबाई पर पड़ेगा. क्रांति के समर्थक ये कहेंगे कि सब कुछ ठीक ही रहेगा. वो ये भी कहेंगे कि क्यूबा की क्रांति का फल सुरक्षित हाथों में है. हर काम पहले जैसा ही बदस्तूर जारी रहेगा.

इसमें कोई शक नहीं कि क्यूबा में आने वाली सरकार, क्रांति के बुनियादी पायों से छेड़खानी की ज़ुर्रत नहीं करेगी. ख़ास तौर से मुफ़्त पढ़ाई और मुफ़्त इलाज या फिर ग़रीबों को मिलने वाली सब्सिडी में कोई बदलाव नहीं होगा.

लेकिन, जब आप ये पूछेंगे कि आख़िर क्यूबा इन ख़र्चों का बोझ कैसे उठाएगा? क्योंकि उसी का क़रीबी समाजवादी देश वेनेज़ुएला बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा है. आर्थिक तौर पर घुटनों के बल आ चुका है. तो आप के इस सवाल के जवाब में आम तौर पर लोग मुस्कुरा कर रह जाएंगे, या फिर कंधे उचका देंगे. ऐसे लोग बेहद कम होंगे, जो इस बात का जवाब दे सकें कि क्यूबा अपनी आर्थिक चुनौतियों से कैसे निपटेगा.

एक पार्टी पदाधिकारी ने कहा कि, “हम ने इससे भी बुरा दौर देखा है. सोवियत संघ का विघटन और स्पेशल पीरियड ऐसे ही बुरे दौर थे’. वो 90 के दशक में क्यूबा की आर्थिक चुनौतियों की ज़िक्र कर रहे थे. इस पदाधिकारी ने कहा कि, ‘अगर हम तब की चुनौतियां झेल सकते हैं, तो हम कुछ भी झेल सकते हैं”.

यही वो मौक़ा है जब क्यूबा के मौजूदा सिस्टम में अंधी आस्था साफ़ दिखती है. जब असली क्रांतिकारी, इंक़लाब में ही हर चुनौती का हल बताते हैं. फ़िदेल कास्त्रो और राउल कास्त्रो के राज में लोगों के लिए इतना ही काफ़ी था.

लेकिन, जब मैं तटीय क़स्बे मन्ज़ानिलो में एक बुज़ुर्ग पेड्रो रोडरिग्ज़ से मिला तो पेड्रो ने शिकायत की कि सरकारी संस्थाएं ठीक से नहीं चल रही हैं. पेड्रो का चश्मा टूटा हुआ था. उसके दोनों शीशों को प्लास्टर से जोड़ा गया था. वो शिकायत करते हैं कि ये क़स्बा अब उतना गुलज़ार नहीं रहा.

पूर्व एकाउंटेंट पेड्रो ने कहा कि, “अब यहां कोई कुछ भी नहीं बनाता. लोग बस चाहते हैं कि फल पक कर उनके हाथ में टपक जाए”.

ये क्यूबा के हालात पर तल्ख़ बयानी लगी? शायद. लाखों क्यूबाई नागरिक रोज़मर्रा की मुसीबतें झेलते हुए अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं. फिर भी उन्हें अपने देश की कई चीज़ों पर नाज़ है. ख़ास तौर से कास्त्रो भाइयों के राज की सामाजिक उपलब्धियों पर. ये वो उपलब्धियां हैं, जो बहुत से अमीर देश भी तमाम कोशिशों के बावजूद हासिल नहीं कर पाते.

लेकिन, जैसे-जैसे बेहतर ज़िंदगी की आम क्यूबाई नागरिक की मांग मुखर होगी. जैसे-जैसे वो बेहतर रहन-सहन के लिए आवाज़ उठाएंगे. वैसे-वैसे सरकारी संस्थानों और इस देश के नए निज़ाम के लिए चुनौतियां बढ़ती जाएंगी.

क्रेडिट्स

लेखक – विल ग्रांट

फ़ोटोग्राफ़ी – एलेक्ज़ेडर मेनेगिनी

रेखांकन – केटी होर्विच

अन्य तस्वीरें- गेटी और रॉयटर्स

ऑनलाइन प्रो़डक्शन – बेन मिलने

संपादक – फिनलो रोरर

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