by – आनंद

नहीं, पंद्रह लाख वाला स्यापा नहीं कर रहा हूँ, यहाँ आप को प्रैक्टिकल या व्यवहारिक हिन्दुत्व से मिला रहा हूँ । कुछ मुद्दे दे रहा हूँ जो कि बिलकुल tip of the iceberg हैं, इस लिस्ट में वृद्धि हो सकती है और होती रहनी भी चाहिए । बस इतना ख्याल रखा जाये कि लिस्ट को इतनी लंबी न बनाएँ कि वो अव्यवहारिक बन जाये ।व्यवसाय – नए एवं पारंपरिक, नए व्यवसायों की सीख देती हुई संस्थाएं, प्राकृतिक संसाधनों का विकास कर के या उनसे उत्पादन बनाकर वह भी पर्यावरण से संतुलन बनाए रखकर ।और भी बहुत हैं, यहाँ मैंने जान बूझकर यूं समझिए कुछ जोड़ा ही नहीं है ताकि आप लोग भी इन मुद्दों पर सोचें कि क्या ऐसे काम हो सकते हैं जो हिंदुओं की शक्ति बढ़ाए? आप ने देखा होगा, विधर्मियों का हर स्थान, उनको नए संसाधन, नए उत्पन्न के स्रोत उपलब्ध कराता है । यह सोच समझकर होता है, और यह सोच बनाए रखना भी अपने आप में एक rewarding काम है । गाय पर भी बहुत है । और तो कुछ ऐसी बातें निकलेंगी जो कभी हो भी रही थी, लोगों को आय मुहैया करा भी रही थी, यह सोचना होगा कि बंद क्यों हुए ।

क्या हमारे नेताओं ने कभी हमें ऐसी योजनाओं के बारे में कुछ कहा है ? कभी इस तरह की योजनाएँ प्रस्तुत की हैं?
क्या व्यवहारिक हिन्दुत्व, भावुक हिन्दुत्व से अधिक काम का नहीं होगा ? यह अपने आप में धनार्जन करेगा, अपने आप में शक्ति भी बढ़ेगी । धन शक्ति लाएगा, शक्ति हमें बचाएगी । समृद्ध समाज की नेता सुनता है, विपन्न समाज को मोहताज बनाकर नेता उसे विपन्न ही रखते है, टुकड़े फेंककर खुद सम्पन्न हो जाते हैं । सम्पन्न समाज की मांगें भी सुनी जाती हैं ।

बाकी भावुक मुद्दों पर खून खराबा अधिक होगा और कुल मिलाकर नुकसान ही अधिक होगा । एक समर्थ और सम्पन्न समाज की मांगे अधिक सुनी जाती हैं, और वो अपनी मांगें मनवाने का सामर्थ्य भी रखता है । आप क्या बनना चाहेंगे ?

आप को एक परस्पर संबन्धित उदाहरण देता हूँ । यह अपने आप में एक शृंखला है । पशुपालक, खटीक और चर्मकार । पशुपालक अभीतक हिन्दू बचे हैं लेकिन इसमें मुसलमान पैठ बना रहे हैं । और वामी, हिंदुओं को अपना पारंपरिक व्यवसाय छोड़कर आरक्षण मांगने को उकसा रहे हैं । जब कि यह नहीं बता रहे कि आरक्षण से उनके समाज की ताकत इतनी नहीं बढ़ेगी जितना पशुपालन कमाई दे सकता है । खटीक और चर्मकार को तो कम्युनिस्ट लगभग बर्बाद कर चुके, उनसे उनके करोड़ों की कमाई छीनकर मुसलमानों के हाथों में दे चुके हैं । और ये कमाई हो रही है हम हिंदुओं से ही । और उस कमाई से ज़कात जा रही है जिसपर जिहादी पल रहे हैं । ज़कात भले ही गरीबों को सहायता कर रही हो, कैदियों को छुड़ाना और जिहाद की सहायता करना भी ज़कात से होता है इसपर विस्तार से सप्रमाण लिख चुका हूँ ।और भी कई ऐसे व्यवसाय निकलेंगे। सरकार अब ओरगनिक खेती खाद आदि को बढ़ावा देने की योजनाएँ ला रही है उसमें गोपालन के लिए मौके हैं । गौ रक्षकों के लिए भी गोपालन में काम और कमाई के मौके हैं । गायों को जीवित रखकर कमाएंगे तो गो रक्षण भी हो जाएगा अपने आप, कोई गुंडा कह भी नहीं पाएगा । लेकिन हमारे युवा गौ रक्षण में केवल इमेज चमकाने का मौका और काम के तौर पर एक परमानेंट डेस्क जॉब अपना हक़ समझते हैं तो बात बनने से रही ।वा क ई गिरोह अपने लाभ की योजनाओं पर वाकई गहरा होम वर्क करता है । उसका कारण यह भी है कि वे उसके लिए भरपूर पैसे लगाते हैं । फिर योजना के तहत सरकार से लाभ लेते हैं । सरकार को रिटर्न क्या देते हैं यह संशोधन का विषय होता है इसीलिए हिंदुओं में चिढ़ होती है कि इनकी मुफ्तखोरी हमारे टैक्स के पैसों पर चलती है । किन्तु उस योजना को पास कराने के लिए जो होमवर्क और lobbying होती है वह मुफ्त में नहीं होता।

हिंदुओं की ओर से क्या होता है ? “कार्य नि: शुल्क हो ! निस्वार्थ हो !’ की गर्जनाएँ उठती हैं और झाग बैठ जाता है ।

वैसे इस मुद्दे में हिन्दू समझते बहुत कुछ हैं । चाहते भी बहुत हैं । लेकिन एक असहायता सी है कि वे झल्लाहट में ठीकरा मोदी और भाजपा और संघ पर फोड़ रहे हैं । यहाँ भांति भांति के लोगों से सामना होता है । पहला खेमा है उन राष्ट्रवादियों का जो मोदी जी की विविध नीतियों से नाराज हैं ।

दूसरा खेमा है इस पहले खेमे के राष्ट्रवादियों के गुस्से को हवा देनेवाले लोगों का वर्ग, जो राष्ट्रवादियों के गुस्से को हवा क्यों दे रहा है, समझना मुश्किल नहीं है । इसे पहचानना आसान नहीं है क्योंकि सोशल मीडिया पर ये लोग राष्ट्रवादी या हिन्दुत्ववादियों के सुर में सुर मिलाकर क्रोध का सुर बुलंद करने की भरसक कोशिश करते हैं ।बाकी इनके पास सुझाव के नाम से ठोस योजना कुछ नहीं होती, कोई पर्याय नहीं होता। राष्ट्रवादियों की निराशा या हताशा को अधिकाधिक हवा दे कर वे उन्हें NOTA की ओर धीरे से धकेलते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके मालिकों का नाम भी सुनने को कोई तैयार नहीं है । इसलिए बड़ी होशियारी से केवल मोदी कुछ काम का नहीं, फूंके हुए कारतूस हैं आदि नकारात्मकता ही फैलाएँगे । मोदी जी का नाम गलत तरीके से लेने की हरकत भी ऐसे लोगों में पायी जा सकती है । ओवैसी जैसे जान बूझकर मोडी या पाकिस्तानी या भारतीय मुस्लिम राजनेता जैसे मुड़ी या मुदी कहते हैं यही तुच्छता का भाव प्रदर्शित करना इनकी खासियत होती है ।रोमन राजनेता सिसेरों ने भीतरघातियों के लिए जो कहा था वो इनके लिए ही कहा था कि “वो शहरियों के बीच खुला घूमता है, वो गद्दार नहीं लगता क्योंकि वो उनकी ही बोली बोलता है, उसका चेहरा भी उनके जैसा ही है उसके तर्क भी वही हैं जो बाकी शहरियों के होते हैं । सभ्य लोगों के दिलों की गहराईमें जो ख्वाहिशें आम तौर पर हमेशा दबाई रखी होती हैं उनको ये भीतरघाती हवा देता है, उन्हें जायज ठहरा देता है और सत्ता और समाज के नियमों को गलत। राष्ट्र की आत्मा में यह सडन का प्रवेश करा देता है । संस्कृति के जो आधारस्तम्भ होते हैं उनकी नींव खोखली करने का ही ये काम करता है ।राजनीति को वो इस कदर रोग ग्रस्त कर देता है कि उसकी प्रतीकार की क्षमता ही खत्म हो जाती है । इससे तो सुपारी हत्यारा भी बेहतर आदमी होता है।”यहाँ कुछ कहना चाहता हूँ, कृपया पढ़ने और समझने के बाद ही प्रतिक्रिया दें।

कई वर्षों से मैं कुछ संस्थाओं के बारे में लिखता आ रहा हूँ । ऐसी संस्थाएं जो हिंदुओं के लिए सामाजिक और आर्थिक चिंतन करें और यह प्रॉडक्टीव हो, उससे हिंदुओं को आर्थिक लाभ के अवसर प्राप्त हों, उनकी आर्थिक शक्ति बढ़े, जिससे उनकी राजनैतिक और सामरिक शक्ति भी बढ़ सकती है । जो धर्म और संस्कृति को सशक्त बना सकती है । वामियों के फैलाये गए सडन तथा जहर का काट विकसित करने में कर्मरत हो सकती है । हिंदुओं पर होते सांस्कृतिक हमलों का कानूनी लड़ाइयों द्वारा प्रत्युत्तर दे सकती है – जीती जा सकती हैं जैसी बहुत लड़ाइयाँ हैं, हम बस इस उलझन में रहते हैं कि कौन लड़े; हम तो हमारी आजीविका में व्यस्त हैं, हम नहीं लड़ेंगे ।यहाँ इस्लाम की एक सीख याद आती है कि खुद लड़ नहीं सकते तो लड़नेवालों की सहायता करो । धन से सहायता को सब से अधिक वरीयता दी जाती है क्योंकि धन वो सब चीजें खरीद सकता है । अब दूसरों के कुछ संगठनों की बात करते हैं ।यहूदियों के ADL के बारे में कई बार लिखा है । रिहाई मंच और CIM INDIA के बारे में भी लिख चुका हूँ । ये संस्थाएं अपने समुदाय के लोगों के लिए कानूनी केसेस लड़ती हैं । और भी उनकी गतिविधियां हैं, उनके ऑफिस हैं और वहाँ लोगों को बाकायदा अच्छी करियर बनाने के अवसर प्रदान किए जाते हैं ।

हिंदुओं के लिए ऐसी संस्था की आवश्यकता अधोरेखित कर चुका हूँ । केवल इतना ही नही, इस मामले में एक मोडेल प्लान भी तीन सालों से लिखकर तैयार है जिसमें उसकी कम से कम आर्थिक जरूरत को भी बताया गया था। तब जो रकम की आवश्यकता थी उसको, व्याज दर कम होने के कारण संशोधित किया गया है । यह किस लिए बता रहा हूँ यह भी स्पष्ट हो जाएगा।

अब आप यह भी जानिए कि सोशल मीडिया द्वारा कई लोगों से संपर्क कर के उनके साथ इस योजना को शेयर कर चुका हूँ । नाम लेना उचित नहीं समझता लेकिन आज मोदी विरोध में जो भी हिन्दुत्व के पुरोधा प्रखर हैं उनमें से शायद ही कोई छूटा हो । कुछ से व्यक्तिगत मिला, कुछ से फोन पर संपर्क किया या WA / ईमेल से । सब से इसी उम्मीद में संपर्क किया था कि ये रसूख, पहुंचवाले लोग हैं, अपने कांटैक्ट और पहुँच की बातें तो बहुत करते हैं, हो सकता है यह संस्था बन जाएगी और काम आएगी। इसके लिए सोशल मीडिया द्वारा भारत भर के कई अधिवक्ता मित्रों से भी निजी संपर्क स्थापित किए लेकिन इसे अंजाम देने के लिए जो जरूरतें हैं वो कहीं से भी पूरी होती न दिखी।शुरुआती दिनों में मेरी यही मंशा रही थी कि अगर भाजपा हिंदुओं का पक्ष है तो यह योजना उनके लिए और inter alia हिंदुओं के काम आ सकती है । इसलिए सोशल मीडिया में भाजपा के बड़े पक्षधर और तगड़े संपर्कों का हवाला देनेवाले लोगों से बात की । बाकी फॉलो अप की लिमिट होती है, सेल्स में भी रहा हूँ कुछ साल तो समझ आता है कि गलत नंबर लगा है, ठीक है, कोल्ड कॉल भी जरूरी है सेल्स में ।

पचास गलत लोगों से मिलने के बाद ही शायद एक सही आदमी मिलता है । अभी भी शायद मोड में ही चल रहा हूँ, सही व्यक्ति कोई मिला नहीं, चमकता पीतल खूब मिला। अपवाद हैं, उनके बारे में कुछ न कहूँ तो कृतघ्न कहलाऊंगा लेकिन इतने उल्लेख से वे दो तीन व्यक्ति समझ जाएँगे यह आशा है ।

मोदी जी या अमित शाह जी ने मेरा नाम सुना है या नहीं मुझे पता नहीं । छोटा आदमी हूँ । लेकिन मेरा उनसे आज तक कोई संपर्क नहीं हुआ है ।

सरसंघचालक जी से भी कभी साक्षात्कार नहीं हुआ तो मैं उनको कुछ कहने का अधिकार नहीं रखता कि उनको भी बता आया लेकिन उन्होने अनसुना कर दिया । नहीं, उनसे कभी मिल ही नहीं पाया । ============================== =इसके इतर भी लोगों से मिलकर कई सुझाव देते रहा हूँ । प्रभावित तो होते हैं सभी लेकिन आज तक कोल्ड कॉलिंग ही रही है । कई सूचन मेरे वाल से सभी के लिए कितनी बार किए हैं जिसपर सभी ने वाह वाह, practical चीज है कहा है लेकिन जिनसे भी कभी बात हुई और पूछा क्या आप ने किया है तो विषय चेंज किया गया हालांकि जो भी करना था सब को अपने घर में ही करना था। एक अगर पंचिंग बैग लगानी हो तो उनको अपने ही घर या सोसायटी में लगानी थी । अमेज़ोन और फ्लिपकार्ट की लिंक्स भी दी थी उन पोस्ट्स के साथ कि ढूँढने के लिए समय जाया न करना पड़े । किसी भी ने फोटो नहीं डाली ताकि दूसरे भी प्रेरणा ले सके । और ऐसा नहीं कि चमकने के अवसर छोड़े हैं, फोटो तो इनके आते रहें ।जाने दीजिये, कोई बात नहीं । बस इतना ही ध्यान रखें कि राम भी उसकी ही सहायता करते हैं जो खुद की सहायता करता है । नहीं तो राम नाम सत्य होता है ।वैसे ऐसी संस्था कार्यरत होती तो आजतक कुछ महत्वपूर्ण काम हुए होते। हिन्दू सशक्त हो जाते, राष्ट्रवादियों में निराशा न होती । क्योंकि ऐसे मुद्दों पर कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी जाती कि सरकार को हिंदुओं की आवाज सुनने में सुविधा होती, उनके हितों में निर्णय लेने में दिक्कत न होती। हिंदुओं के लिए भी निर्णय होते ।

मैंने लिखा था कि आत्मरक्षा के लिए बंदूक केवल खरीदकर काम नहीं बनता। उसे चलानी पड़ती है, उसपर खर्च करना पड़ता है । नरेंद्र मोदीजी को बंदूक समझ लीजिये, लेकिन हम उस बंदूक से खुद ही चलने की अपेक्षा रख रहे हैं और वह नहीं चली तो बंदूक को दोषपूर्ण बता रहे हैं । हमने बंदूक उठाई ही नहीं, चलाई ही नहीं ।

मेरे नजरिए से यह एक practical बात है क्योंकि जिनको हम हमारे शत्रु मानते हैं और वे हैं भी, मोदीजी के लिए वे भी देश की प्रजा हैं, उनको वो दुत्कार या नकार नहीं सकते । वे अपनी मांगें ले जा रहे हैं, और हम ने यह भी तय नहीं किया कि सरकार से क्या मांगना है जिससे हमारा निरंतर लाभ होता रहे। जो सरकार खुद दे रही हैं उन योजनाओं में भी हमें बैठे ठाले वह भी मलाईदार नौकरियाँ ही चाहिए ।

बाकी नाराजगी के कारण NOTA आदि का प्रचार करने के पहले यह भी सोचिए कि 2014 के पहले आप लोग किस तरह दबे सुरों में पोस्ट्स लिखते थे और कितनों को कहाँ कहाँ से धमकियाँ मिली हैं । अब पिछले चार सालों में आप ने उन लोगों के प्रति खुलकर लिखा तो है, आज भी लिख रहे हैं । 2019 में अगर आप की नेगेटिविटी की वजह से वे लोग सत्ता में वापस आयें तो वे आप के कोई कृतज्ञ नहीं होंगे, आप तो का नंबर लगेगा ही ।बाकी मोदी का विकल्प खोजना या उसपर काम करना मोदी के सत्ता में रहते ही पॉसिबल हो सकता है । क्या काँग्रेस और वामी आप को हिन्दुत्व का काम करने देंगे अब ? तब ही जो आप को धमकाए थे वे, आप के नेगेटिविटी फैलाने के कारण वापस आए तो क्या आप को बख्शेंगे ? सब से पहले NOTA ही खारिज करेंगे ताकि आप दुबारा उनके खिलाफ प्रयोग न कर सकें ।

और हाँ, मोदी जी को आप इतनी गाली गुफ्तार की है, आप को कुछ हुआ तो है नहीं । काँग्रेस सत्ता में क्या आप सोनिया के लिए इस तरह से लिखते थे ? सपाई आजम ने एक बार 66A का दुरुपयोग क्या किया, सब के आवाज कैसे बैठ गए थे याद नहीं ?

वैसे आप ने एक बात अगर नोट की हो तो यह है कि यह पोस्ट मोदी जी के तारीफ में नहीं लिखी गई। उनके सरकार के कुछ कामों की तारीफ की जा सकती है हालांकि आप को इस हद तक उनसे नफरत करनेवाले मिलेंगे जो कहेंगे कि अच्छा हुआ तो श्रेय उस मंत्रालय और मंत्री का, बुरा हुआ तो दोष मोदी जी का । ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जो यूं तो कहेंगे कि मोदी जी को केवल 31% वोट मिले हैं, किन्तु नकारात्मकता फैलाने के काम में यह भी कह देंगे कि मोदी जी अपने 88 करोड़ हिन्दू मतदाताओं का विश्वास तोड़ रहे हैं । लेकिन छोड़िए, मुझे मोदी जी की तारीफ नहीं करनी। यह पोस्ट मैंने विकल्प विकल्प करनेवालों तथा अकार्यक्षमता पर ही बोलनेवालों के लिए लिखी है। सोशल मीडिया पर निंदा के अलावा ठोस काम कुछ हुआ नहीं, तो मोदी जी का फिलहाल हमारे लिए विकल्प नहीं दिख रहा। 2024 के लिए हिंदुओं के लिए कुछ ठोस काम करते हैं, लेकिन उसके लिए स्वतन्त्रता मोदी जी के रहते ही मिलेगी ।

हम में से कई लोग युद्ध की बात तो करते रहते हैं । एक महत्व की बात कहता हूँ । अगर खुद को सेना का हिस्सा समझते हैं तो कृपया नेतृत्व के निर्णय पर सवाल न करें । पानीपत की लड़ाई हारने का एक कारण यह भी था कि इब्राहिम खान गारदी जो मराठा तोपखाने के सेनापति थे, उनका सुझाव माना नहीं गया बल्कि अहंकार से मराठा सेना के अन्य सेनापतियों ने उसे ठुकराकर अफगान सेना पर हमला किया । इब्राहिम खान गारदी के सामने से ही चले गए जिसके कारण वो तोपें नहीं चला सका । सेना कत्ल हुई और इब्राहिम खान गारदी को अब्दाली ने बहुत ही क्रूर तरीके से मार दिया क्योंकि उसको फोड़ने की कोशिश को उसने ठुकरा दिया था। इस्लाम का तकाजा ठुकराकर काफिर से वफा की तो इस्लाम उसे कैसे बख़्शता ?

खैर, यहाँ बात लड़ाई हारने की है, अगर लड़ाई में उतरे हैं तो यह याद रखें कि सेना को साथ लड़ना होता है। जब एक होकर लड़ा जाता है तो संख्या बल तथा आदेश पर समर्पित भाव से कार्रवाई कभी कभी गलत निर्णय को भी सही करा देती है । और अगर निर्णय पर शक जताकर सैनिकों का मनोबल तोड़ा तो जीत को भी हार का मुंह देखना पड़ता है । आनंद