शराब के कारण अनेक हस्तियां इस दुनिया को अपनी अद्भुत प्रतिभा की संपूर्ण झलक नहीं दिखा सकीं और अपने लाखों-करोड़ों चाहने वालों को समय से पहले ही अलविदा कहकर चली गईं

लव कुमार सिंह

1 अप्रैल 2018 को 1930 और 40 के दशक के प्रसिद्ध गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल उनकी 114वीं जयंती पर बहुत ही शिद्दत के साथ याद किए गए। पत्र-पत्रिकाओं, वेबसाइट्स और ब्लॉग्स पर उनकी बेजोड़ प्रतिभा के अनेक विवरण प्रकाशित किए गए। वाकई में कुंदनलाल सहगल संगीत और अभिनय क्षेत्र की एक बेजोड़ हस्ती थे। वे लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार जैसे गायक-गायिकाओं के प्रेरणास्रोत थे।

लेकिन सहगल साहब की जिंदगी के बारे में जिस बात का जिक्र सबसे कम होता है, वह है उनकी शराब और सिगरेट की लत। इसी लत के कारण कुंदन लाल सहगल केवल 43 वर्ष की आयु में अपने परिजनों और प्रशंसकों को रोता बिलखता छोड़कर इस दुनिया से कूच कर गए।

सहगल पर लिखी गई प्रमाणिक सामग्री हमें बताती है सफलता के शिखर पर चढ़ने के साथ शराब उन्हें बुरी तरह अपनी गिरफ्त में लेती चली गई। वे सिगरेट के भी शौकीन थे। बाद के वर्षों में तो यह हाल था कि उन्होंने बिना शराब पीए एक भी गाना नहीं गाया। संगीतकार नौशाद ने उनसे एक गाना किसी तरह बिना शराब पीए गवाने में सफलता प्राप्त की। फिर वही गाना सहगल ने शराब पीकर गाया। बिना शराब पीए गाया गाना ज्यादा बेहतर बन पड़ा था। इससे सहगल को अपनी गलती का अहसास भी हुआ पर तब तक काफी देर हो चुकी थी।

अपने अंतिम दिनों में कुंदन लाल सहगल के सामने ऐसी नौबत आ गई थी कि अगर वह एक भी पैग शराब का लेते तो मौत उन्हें जकड़ सकती थी और नहीं लेते तो बिना शराब की छटपटाहट एक प्रकार से मौत के समान ही थी। 18 जनवरी 1947 को मात्र 43 वर्ष की आयु में कुंदनलाल सहगल की मृत्यु हो गई।

अनगिनत हैं सहगल जैसी कहानियां

जिगर मुरादाबादी ( Jigar Moradabadi 1890-1960)
“मखमली शेरों के शायर”, “मोहब्बतों के शायर”, “हुस्न और इश्क के शायर” कहे गए गए जिगर मुरादाबादी ने अपनी शायरी से पूरे हिन्दुस्तान (बाद में पाकिस्तान का भी) का दिल जीत लिया था, मगर शराब को नहीं जीत सके। उन पर लिखा साहित्य हमें बताता है कि कई बार हालात ऐसे होते कि मुशायरे से पहले ही वे जमीन पर होते और आयोजक उन्हें ऐसे ही उठाकर कार्यक्रम स्थल पर लाते थे। इसके बावजूद लोग उनके दीवाने थे क्योंकि उनके शब्द इतने सरल, रसभरे और आम थे कि वे सीधे लोगों के दिल पर जाकर लगते थे।

शराब ने न सिर्फ उनके शरीर को नुकसान पहुंचाया, बल्कि शायरी और शोहरत को भी प्रभावित किया। हालत यह हो गई कि शादी के बाद भी जब शराब नहीं छूटी तो पत्नी के परिजनों को जिगर साहब से कहना पड़ा कि या तो आप शराब के साथ रहें या पत्नी के साथ। जिगर साहब ने शराब को चुना और पत्नी को तलाक दे दिया। शराब से खुद जिगर भी परेशान हो गए थे। इसीलिए शराब पीने के बाद वह रोते भी थे और उससे छुटकारा पाने की इच्छा जताते थे। बाद में उन्होंने शराब पर काबू पाया और पत्नी को फिर अपना लिया। हालांकि शराब छोड़ने के बाद वे सिगरेट ज्यादा पीने लगे थे। इन सब चक्करों में उनकी याद्दाश्त भी कमजोर हो गई थी। वे ब्योरों को डायरी में लिखते थे मगर यह भूल जाते थे कि डायरी कहां रखी है। 70 साल की आयु मेें जिगर ने इस दुनिया को अलविदा कहा।

मजाज लखनवी (Majaz Lakhnavi 1911-1955)
“उर्दू अदब का कीट्स” और “क्रांति का गायक” कहे गए तरक्की पसंद शायर असरारुल हक मजाज या मजाज लखनवी शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। साथ में गजल के माहिर खिलाड़ी। मुशायरों की वह जान माने जाते थे।

मजाज पर लिखे साहित्य से हमें पता चलता है कि एक विवाहित लड़की से की गई नाकाम मोहब्बत ने मजाज को शराबी बना दिया। शराब के नशे में वह इस लड़की से शादी करने की बात कहते हुए बड़बड़ाते थे। मजाज की शराबखोरी को देख लोग कहने लगे थे कि मजाज शराब को नहीं, शराब मजाज को पी रही है। उनके कुछ मित्र भी अच्छे नहीं थे क्योंकि वे उनसे उनका कलाम सुनने के बदले में उन्हें शराब पिलाया करते थे। अनेक बार उनके मित्र उन्हें यहां-वहां से मूर्छित हालत में उठाकर उनके या अपने ठिकाने पर पहुंचाते थे। हालत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें रांची में मेंटल हास्पिटल में भी भर्ती कराना पड़ा था। ज्यादा शराब की वजह से उन्हें तीन नर्वस ब्रेकडाउन हो चुके थे। इसके बावजूद उन्होंने लखनऊ में एक रात मित्रों के साथ खूब शराब पी और शराबघर की छत पर जाड़े की रात में पड़े रहे। इससे उनके दिमाग की नस फट गई और पांच दिसंबर 1955 को मात्र 44 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto1912-1955)
उर्दू साहित्य के प्रमुख स्तंभ रहे और दुनियाभर के महान लेखकों में शुमार किए गए सआदत हसन मंटो भी शराब और सिगरेट से पराजित हो गए थे। इसकी वजह से उन्हें अस्पताल और पागलखाने तक में भी रहना पड़ा था। आखिर वे शराब से पीछा क्यों नहीं छुड़ाते थे? इस सवाल के जवाब में वे कहते थे कि “जिंदगी अगर परहेज से गुजारी जाए तो एक कैद है और अगर बदपरहेजी से गुजारी जाए तो भी कैद है। यानी दोनों में कोई अंतर नहीं है। किसी ने किसी तरह हमें जुराब के धागे (जिंदगी) का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस।” शायद इसी फलसफे में यकीन करने के कारण वे जिंदगीभर शराब नहीं छोड़ सके। अपने लेखन से दुनिया को स्तब्ध कर करीब 43 साल की उम्र में मंटो दुनिया छोड़ गए। उनका निधन साहित्य की बहुत बड़ी क्षति थी और इस क्षति का कारण बनी उनकी शराब की लत। शराब और टीबी की बीमारी ने उन्हें पूरी तरह खोखला कर दिया था।

जांनिसार अख्तर (Janisar Akhtar 1914-1976)
बीसवीं शताब्दी के उर्दू के प्रमुख शायरों में से एक माने जाने वाले जांनिसार अख्तर आज के मशहूर पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर के पिता थे। जांनिसार अख्तर ने कई यादगार गीत लिखे और “बहू बेगम” के नाम से फिल्म भी बनाई। उनकी शायरी की सात किताबें भी प्रकाशित हुईं। उन्होंने नेहरू जी के कहने पर पिछले तीन सौ साल की श्रेष्ठ भारतीय कविता को संकलित करने का काम भी किया। यह किताब “हिन्दुस्तान हमारा” शीर्षक से दो खंडों में प्रकाशित हुई। मुंबई में 19 अगस्त 1976 को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। जांनिसार अख्तर के बारे में भी कहा जाता है कि यदि वे बेतहाशा शराब पीने के आदी नहीं होते तो शायद इतनी जल्दी अपने चाहने वालों से अलविदा नहीं कहते।

हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) 1922-1995)
हरिशंकर परसाई जी ने व्यंग्य को एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया। वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य लेखक माने गए। उनके बारे में लिखे गए संस्मरणों से हमें पता चलता है कि परसाई जी को भी शराब की लत लग गई थी। उनके इस शौक ने उनकी सेहत को तो नुकसान पहुंचाया ही, इसकी वजह से उन्हें कई बार बेहद शर्मिंदगी का भी सामना करना पड़ा।

रांगेय राघव ( Rangey Raghav 1923-1962)
छोटी सी उम्र में ही बहुत ज्यादा और उम्दा लेखन कर गए और “कब तक पुकारूं” जैसी कई कालजयी रचनाओं के लेखक रांगेय राघव लिखने के दौरान सिगरेट बहुत पीते थे। उनके निकट के लोगों ने लिखा है कि जब वे राघव जी के बंद कमरे को खोलते थे तो कमरे में से धुंए का भभका सा बाहर निकलता था। संभवतः ज्यादा सिगरेट पीने के कारण ही रांगेय राघव बहुत ही कम आयु (39) में अपने परिजनों और प्रशंसकों का साथ छोड़कर इस दुनिया से चले गए। उन्हें कैंसर बताया गया था। रांगेय राघव के लिखने की रफ्तार बहुत तेज थी। कहा जाता था कि जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा उतने समय में वे पुस्तक लिख सकते थे। वे लिखते थे तो कई दिन तक लिखते ही रहते थे और पढ़ते थे तो पढ़ते ही रहते थे। उनके कमरे में उनके मित्रों को हर समय लिखे हुए कागजों का ढेर लगा दिखता था। साहित्य के जानकार कहते हैं कि यदि रांगेय राघव की असमय मृत्यु न होती तो हिन्दी साहित्य प्रेमियों को न जाने कितनी और अद्भुत रचनाएं पढ़ने को मिलतीं।

मोहन राकेश (Mohan Rakesh 1925-1972)
50 के दशक में नई कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ और हिंदी नाटकों के अग्रदूत मोहन राकेश की खुद की जिंदगी भी किसी नाटक, फिल्म या उनकी किसी रचना की तरह ही बीती। तीन शादियां करने वाले मोहन राकेश जीवन के झंझावतों में कुछ ऐसे उलझे कि उन्हें भी इन समस्याओं का हल शराब और सिगरेट में ही दिखाई दिया। कहीं भीं टिककर नौकरी नहीं करने, आर्थिक दिक्कतों और वैवाहिक जीवन के धमाकों के बीच सिगरेट और शराब के सेवन ने लोगों के इस चहेते लेखक को अंदर से तोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि मात्र 47 साल की उम्र में ही यह कलमकार इस दुनिया को छोड़ गया। तीन दिसंबर 1972 को अचानक ही लोगों को पता चला कि मोहन राकेश अब इस दुनिया में नहीं रहे।

मीना कुमारी (Meena Kumari 1932-1972)
अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और उम्दा अदाकारा मीना कुमारी को भी शराब ने बरबाद कर दिया। मीना कुमारी ने भी अपने बचपन की विसंगतियों, विवाहित जीवन के विवादों और विफल प्रेम की वजह से शराब का दामन थामा तो ऐसा थामा कि ताउम्र उससे पीछा नहीं छुड़ा सकीं। हालत यह हो गई थी कि मीना कुमारी अपने पर्स में भी शराब की छोटी-छोटी बोतलें रखने लगी थीं और मौका मिलने ही शराब गटकने लगती थीं। वे खुद को बरबाद करने पर इस कदर आमादा थीं कि उन्होंने शराब से छुटकारे के लिए अशोक कुमार की होम्योपैथी की गोलियों को भी लेने से इनकार कर दिया था। आखिरकार ज्यादा शराब के सेवन से उनका लीवर फेल हो गया। लीवर साइरोसिस की बीमारी से 1972 में मात्र 40 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

संजीव कुमार (Sanjeev Kumar 1938-1985)
संजीव कुमार उर्फ हरीभाई जरीवाला हिन्दी फिल्मों के महान अभिनेताओं में से एक माने गए। संजीव कुमार भी शराब के शौकीन थे। हालांकि शुरुआत में शराब की मात्रा नियंत्रित थी, मगर प्रेम में विफलताओं (हेमामालिनी के साथ) के बाद संजीव कुमार की शराब बहुत बढ़ गई। साथ में बेपरवाह खानपान ने उनकी हालत बिगाड़ दी। नतीजा ये हुआ कि उनका दिल दगा दे गया। 1985 में मात्र 47 साल की आयु में उन्हें हार्ट अटैक पड़ा और संजीव कुमार अपने प्रशंसकों को निराश करके इस दुनिया से चले गए। हालांकि संजीव कुमार का दिल जन्म से ही कमजोर था और उनके परिवार में अनेक सदस्यों की मृत्यु 50 से कम आयु में ही हो गई थी, लेकिन ज्यादा शराब के सेवन ने संजीव कुमार के स्वास्थ्य के लिए आग में घी का काम किया।

अमजद खान ( Amjad Khan 1940-1992)
हिन्दी फिल्मों के मशहूर खलनायक अमजद खान चाय के इतने शौकीन थे कि उनकी यह आदत बुरी लत में तब्दील हो गई थी। वे 25-30 कप चाय रोजाना पी जाते थे। 1986 में उनका एक्सीडेंट हो गया था। इसके बाद उनका शरीर फैलने लगा, लेकिन इसकी रोकथाम के बजाय अमजद खान की चाय और अन्य गरिष्ठ खानपान जारी रहा। नतीजतन उनका शरीर और वजन बढ़ता ही चला गया। 1992 में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।

ओमपुरी (Om Puri 1950-2017)
मशहूर अभिनेता ओमपुरी केवल 66 वर्ष की उम्र में अपने चाहने वालों को निराश और दुखी करके इस दुनिया से चले गए। स्वयं उनके मित्र अभिनेता रजा मुराद ने मीडिया को बताया है कि उन्होंने कई बार ओमपुरी से कहा कि वह शराब के शिकंजे से स्वयं को बाहर निकालें, लेकिन ओमपुरी ऐसा नहीं कर पाए। शराब के बहुत ज्यादा सेवन और स्वास्थ्य पर ध्यान न देने की वजह से ओमपुरी का वजन काफी बढ़ गया था।
अपनी निंजी जिंदगी के झंझावतों और अकेलेपन के कारण इन दोनों ओमपुरी ने शराब को अपना गहरा साथी बनाया हुआ था। शराब के साथ वह सिगरेट भी पीते थे। शराब के साथ सिगरेट का मेल स्वास्थ्य के लिए और भी खतरनाक होता है। ओमपुरी के दिल के दौरे कि यही वजह रही जो उन्हें समय से पहले ही इस दुनिया से रुखसत कर गई।