labor

वो कृष्णा,
थक जाता होगा सारा दिन …
सर पे बोझ उठता होगा , मेरा घर कब बन
पायेगा ??ऐसा ख़्वाब
सजाता होगा !!


चन्दू
,चाय की दूकान से थक के घर जाता होगा
यकीनन खुद को सब से बड़ा पता होगा जब
दो जून की रोटी कमा के लाता होगा,

बेला,
का बच्पन जल जाता होगा जब कोई खिलौना
छीन लिया जाता होगा …बर्तन क्यों साफ़ नहीं है
कह के कोई मालिक जब चिलाता होगा …

रहीम ,फूल बेचता फिरता है
कभी पेन किताब दिखता है सडको पे ,
यकीन उसका मन भी कुछ लिखने को
कर जाता होगा !


खेल का मैदान नहीं है !
भूखे जिस्म में जान नहीं है !
करवाते हो मजदूरी दिन भर …
ये बच्चा क्या इन्सान नहीं है?? ….
मैं सोचती हु क्या इंसान ?क्या भगवान ?
कोई इसके लिए परेशान नहीं है ???
कोई तो स्मभालोइसको ..
. मेरे देश की क्या ये पहचान नहीं है?
यूँ मत रोंदो बचपन इन का….
जीवन है जीवन …. आसन नहीं है !!-