by – असगर वजाहत

क्या हिंदुस्तान में भी चीन की विश्व प्रसिद्ध दीवार जैसी कोई दीवार थी ? आमतौर पर इतिहास की किताबे और दस्तावेज़ भारत में चीन जैसी किसी दीवार के होने की बात नहीं करते और फिर अगर हमारे देश में चीन जैसी कोई दीवार थी तो वह कहा चली गयी उसके बारे में कुछ लिखा क्यों नहीं गया – ? चीन की विश्व प्रसिद्ध दीवार के बारे में कहा जाता हे की यह मनुष्यो दुआरा किया गया एकलौता निर्माण हे जो अंतरिक्ष से भी दिखता हे इसका सीधा मतलब यही हुआ की हमारे देश में चीन जैसी कोई दीवार होती तो उसकी जानकारी हमें ही नहीं पुरे संसार को होती तो सच्चाई क्या हे क्या हिंदुस्तान में चीन जैसी कोई दीवार नहीं थी इतिहास अपने गर्भ में अनगिनत रहस्य छुपाये हुए हे ————– इतिहास के एक ब्रिटिश शोधार्थी राय मॉक्सहम ने पहली बार हमे बताया हे की हिंदुस्तान में भी चीन जैसी एक दीवार थी यह मामूली दीवार न थी इसकी लम्बाई दो हज़ार मिल से अधिक थी यह लगभग पुरे देश को दो हिस्सों में बाटती थी यह पेशावर से शुरू हो ती ठगी और दिल्ली आगरा झाँसी सागर होती हुई नर्मदा नदी को पार करती थी और फिर खंडवा बुरहानपुर से पूर्व की और मुड़ जाती थी चंदरपुर होती हुई यह सम्भलपुर कर्णाटक में जाकर समाप्त होती थी इस दीवार की देखभाल के लिए 12000 आदमियों के अतिरिक्त सेकड़ो घोड़े और कुत्ते रखे जाते थे यह विशाल दीवार चीन की दीवार की तरह पथरो की नहीं थी यह दीवार कांटेदार झाड़ियों थूहड़ बाबुल और बांस और ऐसे पोधो से बनायीं गयी थी जिनमे नुकीली कांटे होते हे और इस कारण से दीवार को पार नहीं किया जा सकता था इसकी चौड़ाई पंद्रह से बीस फिट थी और ऊंचाई भी बीस फ़ीट के आसपास थी यह दीवार इतिहास के गर्भ से बाहर कैसे निकली यह एक रोचक कहानी हे दीवार की खोज का पूरा शैर्य रॉय मॉक्सहम को जाता हे जो लंदन यूनिवर्सिटी पुस्तकलय में दस्तावेज़ आदि के संरक्षण के इंचार्ज हे वे 1990 से लगातार भारत आते रहे भारतीय इतिहास में उनकी गहरी रूचि हे जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भारत में चीन जैसी दीवार के अस्तित्व को खोज निकाला हे और उस पर कई साल की मेहनत के बाद उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई हे पुस्तक का नाम ” दा ग्रेट डेज़ को इंडिया ” हे इतिहास के जानकार और समर्पित शोधकर्ता रॉय मॉक्सहम ——————————————————- महीनो की मेहनत , सेकड़ो दस्तावेज़ दसियो पुराने नक्शो को पढ़ने उनकी पडताल करने के बाद एक दिन मॉक्सहम को हिंदुस्तानी कस्टम डिपॉर्टमेंट की वार्षिक रिपोर्ट 1869 -70 मिल गयी इस रिपोर्ट में हिंदुस्तान की दीवार के विषय में विस्तृत जानकारी थी

दस्तावेज़ के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने प्रमुखतः नमक पर तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओ पर टेक्स वसूलने के लिए यह दीवार बनायीं थी और यह कस्टम लाइन कहलाती थी इस दस्तावेज़ में दीवार की लम्बाई 2504 मील बताई गयी थी दीवार जहा जहा सुविधा थी हरी कांटेदार झाड़ियों आदि से बनाई गयी थी और कही कही दीवार सूखे कांटेदार झाड़झंखाड़ की थी जिस क्षेत्र में पेड़ पौधे न थे वहा दीवार पथरों की थी ————————————————————— भारतीय विद्वानों ने ही नहीं अँगरेज़ अधिकारियो ने भी इस अमानवीय टेक्स वसूलने की पद्धत्ति के खिलाफ लिखा हे और कहा गया हे की धन के लालच में मनुष्यता का ऐसा पतन कम ही देखने में आता हे मॉक्सहम ने अपनी पुस्तक मे साफ़ लिखा हे की ——————————————————————1854 में कस्टम्ज़ लाइन इतनी बढ़ गयी थी की इसका बजट 790000 रूपये था और इसके कर्मचारियों की संख्या 6600 थी कस्टम लाइन अथार्थ कंटीली लाइन में हर एक मील के बाद एक फाटक हुआ करता था एक मील तक देख भल की जिम्मेदारी एक जमादार की होती थी रात में यहाँ गश्त होती थी 1870 में इस कंटीली दीवार के कारण 12500000 रूपये वसूल किये गए —————————– बिना टेक्स दिए सामान निकाल लिए जनेव का जुरमाना पारी आठ रूपये होता था उस ज़माने में खेतिहर मज़दूर का वेतन तीन रूपये था इस दर्ष्टि से जुरमाना बहुत ज़्यादा था और जुरमाना ना चूका पाने की सूरत में छह महीने का कठोर कारावास दिया जाता था!

1879 के आस पास यह अनुभव किया गया की उत्पादन के मूल स्थान पर ही टेक्स वसूलना अधिक सरल और लाभकारी इसलिए कंटीली दीवार को समाप्त करने का निर्णय लिया गया और वह इतिहास बन गयी दस्तावेज़ों पत्र नक्शो से एकत्रित की जानकारियों आदि लेकर मॉक्सहम ने कमर कसी इस दीवार को खोजने के लिए उनका मानना था की इतनी लम्बी चौड़ी दीवार के अवशेष कही तो मिलेंगे उन्हें संभवतः यह पता नहीं था की दीवार खोजने का काम कितना कठिन होगा . जानकारिया आदि लेकर मॉक्सहम 1996 में भारत आये वे अपने परिचितों के साथ झाँसी में रहने का प्रोग्राम बनाकर आये थे क्योकि नक्शे के अनुसार कस्टम हेज़ झाँसी के एक गांव के पास गुजरती थी और मॉक्सहम को लगता था की उसके कुछ हिस्से वहाँ देखे जा सकते थे कस्टम हेज लाइन कभी कभी थोड़ी बहुत बदलती भी रहगी हे मॉक्सहम ने तय किया की 1869 -79 के बीच लाइन की जो पोजीशन हे उसके अनुसार खोज की जायेगी वे झाँसी के आस पास नक़्शे और अपने अनुमान के अनुसार भटकते रहे पर हाथ कुछ नहीं लगा मॉक्सहम को लगा की उनके पास बड़ा नक्शा होना चाहिए नहीं तो कस्टम हेज नहीं खोज पाएंगे मॉक्सहम 1997 में फिर भारत आये इस बार उनके पास बड़ा नक्शा था उन्हें आशा थी की ग्वालियर और आगरा के आस पास वे कंटीली दीवार के अवशेष खोज लेंगे लेकिन यहाँ पर पता लगा की वे जो नक़्शे लाये हे उनमे गलती हे फिर भी वे अपने अनुमान से दस पंद्रह दिन झाँसी आगरा फरुखाबाद आदि जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में कस्टम हेज की तलाश करते रहे लेकिन सफलता नहीं मिली उन्हें लग चूका था की नयी सड़के बनने नहरे निकलने खेती में सुधार और आबादी बाद जाने के कारण कस्टम हेज समाप्त हो गयी लेकिन उन्हें आशा थी की जिन इलाको में खेती अच्छी नहीं होती उबड़ खाबड़ जमीन हे वहाँ कंटीली दीवार के कुछ हिस्से शायद देखे जा सकते हे!

1876 के नक्शे के अनुसार कस्टम हेज आगरा के दक्षिण पूर्व दो नदियों यमुना और चंबल के बीच से गुजरती हे इसी नक़्शे के अनुसार कस्टम हेज चाका नगर गाँव से होती हुई जाती हे चाका नगर जाने के लिए वह कानपूर से बस में बैठकर बकेवर पहुंचे यही से तांगा लिया और लखना आये और यमुना पार करके चकनागर पहुंचे वहाँ जब एक स्थानीय बूढ़े सज़्ज़न निबाल सिंह से जब कस्टम हेज के बारे में पूछा गया की क्या वह गाँव के पास से गुजरती हे तो उन्होंने झट कहा की क्या आपलोग परमट लेन के बारे में पूछ रहे हे मॉक्सहम को याद आया की उन्होंने कुछ दस्तावेज़ों में कस्टम हेज के लिए परमानेंट लाइन शब्द भी पढ़ा था अब बाट साफ़ हो गयी थी लेकिन त्रासदी यह पता चली की पचास साल पहले कस्टम हेज सड़क के नीचे आ गयी थी लेकिन मॉक्सहम ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी वे अपनी दिशा में आगे बढे और अगले गाँव पाली पहुँचे यहाँ लोगो को परमानेंट लाइन के बारे में जानकारी थी पर वह भी सड़क के नीचे आ गयी थी लेकिन ऐसे कठिन मौयके पर श्री पी एस चौहान मिले और उन्होंने बताया की परमानेंट लाइन यहाँ से गुजरती थी वह सड़क के नीचे आगयी हे पर एक भाग बचा हुआ हे यह सुनकर मॉक्सहम को लगा की उनकी सालो की मेहनत रंग ले आयी हे वे चौहान साहब के साथ कांटो की दीवार के अवशेष के पास गए उन्होंने देखा की बीस फ़ीट ऊँची और दस फ़ीट चौड़ी जमीन पर कांटेदार पेड़ और दूसरी झाड़ियाँ और थूहड़ आदि के पौधे छितरे पड़े हे चौहान साहब ने कहा यही हे परमानेंट लाइन मॉक्सहम प्रसन्न हो गए फोटो आदि खींची गयी इतिहास के गर्भ से एक नयी खोज संसार के सामने आगयी.