by -एच.एल.दुसाध

हिन्दू ईश्वर और धर्मशास्त्रों द्वारा अस्त्र-शस्त्र इस्तेमाल करने की एकमात्र अधिकृत हिन्दू जाति, अपनी भारी विजय के बावजूद ‘पद्मावती’ के निर्माता संजय लीला भंसाली के लिए एक इंच भी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. इस समर-वीर जाति के दबाव में आकर पद्मावती के निर्माता ने अनिच्छापूर्वक ढेरों समझौते कर लिए हैं, फिर भी सदियों से हिन्दू जन अरण्य में ‘सिंह’ की भांति विचरण करने वाले लोग, उसे बख्सने के मूड में नहीं दिख रहे हैं. पद्मावती के निर्माता की करुणतर स्थिति का अनुमान 15 जनवरी के कई अख़बारों में छपी इस फिल्म के फुल पेज की विज्ञापन सामग्री से लगाया जा सकता है. विज्ञापन में आज के सुपर स्टार रणवीर सिंह या शाहिद कपूर की कोई तस्वीर नहीं: करबद्ध तस्वीर है सिर्फ पद्मावती बनीं दीपिका पादुकोण की. पद्मावती के गेटप में दीपिका जिस तरह हाथ जोड़े नमूदार हैं, उससे ऐसा लगता है जैसे वह हाथ जोड़कर फिल्म को दिखाए जाने की गुहार लगा रही हैं. इस विज्ञापन में लिखा है ‘फिल्म ‘पद्मावत’सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ पर आधारित है. फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच कोई ‘ड्रीम –सिक्वेंस’ ना था और ना है. यह फिल्म राजपूतों की वीरता, साहस और विरासत को समर्पित एक यादगार कृति है. यह फिल्म रानी पद्मावती को अत्यंत सम्मान के साथ प्रस्तुत करती है और किसी भी तरह उनके चरित्र को धूमिल या गलत तरीके से प्रस्तुत नहीं करती. पद्मावत एक ऐसी फिल्म है जिस पर हर भारतीय को गर्व होगा.’

शायद भारतीय फिल्म हिस्ट्री में किसी भी निर्माता को एक समूह विशेष की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए फिल्म का नाम बदलने लेकर इस तरह का आश्वासन देने लिए विवश नहीं होना पड़ा होगा. वर्तमान समय में भारतीय फ़िल्मी दुनिया के एक बड़े स्तम्भ के इस तरह आत्म- समर्पण करने के बावजूद राणाप्रताप -मानसिंह-योद्धाबाइयों की वर्तमान पीढी को उनके प्रति कोई रहम नहीं. उन्होंने राजपूतों की धरती राजस्थान में हर हाल में फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए सरकार पर दबाव बनाते हुए कह दिया है- ‘यदि फिल्म रिलीज होती है तो शेष में चितौड़ गढ़ की महिलाएं 24 जनवरी को जौहर करेंगी.’ बहरहाल फिल्म पद्मावती का परिवर्तित नाम ‘पद्मावत’ का रिलीज राजपूतों की प्रतिष्ठा से जुड़ चुका है और उनकी धमकी की अनदेखी कर अगर यह फिल्म रिलीज हो जाती है तो चितौड़गढ़ ,जिसका संपर्क रानी पद्मावती से है , की क्षत्राणियां अपने पुरुषों की इज्जत बचाने के लिए के लिए जौहर के इतिहास में कुछ नए पन्ने जोड़ देंगी. ऐसे में 21 वीं सदी में वास कर रहे लोगों को उस गौरवशाली परम्परा का एक बार फिर से दर्शन करने का अवसर मिल जायेगा जिसकी शुरुआत महाभारत काल से हुई थी.

महाभारत प्रेमी आमतौर पर यह नहीं गौर करते कि कुरुक्षेत्र के महारणांगन में अर्जुन अपने भाई-बंधुओं की संभावित मृत्यु की आशंका से नहीं , युद्धोतर वर्ण –संकरता के भयावह परिणाम की आशंका से डरकर गांडीव रख दिए थे . कुलक्षय से वर्ण-संकरता की सृष्टि हो सकती है, यह मानते हुए ही पार्थ ने श्रीकृष्ण के समक्ष करुण निवेदन करते हुए कहां था –‘ हे केशव ! हमलोग वंश नाश के कुफल से अवगत होते हुए भी ऐसे कार्य(युद्ध) से विरत क्यों नहीं हो रहे है? पुनः कृष्ण को समझाते हुए हुए कहे थे-‘हे कृष्ण! कुलक्षय अर्थात युद्ध में कुल के पुरुषों के निधन के परिणामस्वरूप कुलधर्म नष्ट होता है अर्थात कुल व कुल धर्म की रक्षा के लिए पुरुष नहीं बचते. कुल अधर्मग्रस्त होने से कुलबधू नारियां दूषित हो जाती हैं: नष्ट हो जाती हैं . और नारियां दूषित होने पर वर्ण संकर जन्म लेते हैं. वर्ण संकर जन्म लेने पर जो वंश नाश करता है , उसे नरक गमन करना पड़ता है. जो वंश नाश करते हैं उनके ही दोष से वर्ण संकर होते हैं और वर्ण संकर के फलस्वरूप जाति धर्म व कुल धर्म नष्ट हो जाता है. हमें वंशनाश के कुपरिणाम को समझते हुए इस प्रकार के पाप से विरत रहना चाहिए, यह हम क्यों नहीं समझ रहे हैं!’

वीर अर्जुन कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े होकर जो भय पाए थे, युद्धोपरांत उसके समाधान का चित्र देखने लिए उपस्थित हुए थे, द्वारका. श्रीकृष्ण के उकसावे में स्वयं उनकी और बलराम की संतानें , समग्र यदुकुल प्रभाष नदी के तीर पर मद्यपान से विभ्रांत होकर : आत्मघाती समर में मृत्य-देहों का स्तूप बन गए थे. स्वयं श्रीकृष्ण और बलराम तक निहत हुए थे. श्रीमद्भागवत के एकादस स्कन्ध की परिसमाप्ति होती है धूं-धूं करके जलती सतियों की चिता की अग्नि से. अकेले श्रीकृष्ण की सोलह सहस्र पत्नियां, एक लाख साठ हजार पुत्रों की पत्नियां, बलराम व अन्य यदुवंशियों की स्त्रियां एवं पुत्रबधुयें: सभी गांडीवधारी अर्जुन के सामने सती हुईं . कितने दिनों तक जलती रही होगी चिताग्नि, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है !

बहरहाल जाति-भेद प्रथा के जनक भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रथा को अजर-अमर रखने के लिए आर्य पुत्र अर्जुन को नारी-दाह का जो नुस्खा सुझाया, उसे भावी आर्य-पुत्रों ने मुक्त-ह्रदय से अपनाने में कोई कृपणता नहीं की. परिणामस्वरूप सुप्रचीनकाल में प्रभाष नदी के तीर से यदुवंशी रमणियों ने जिस प्रथा की शुरुआत की , वह मध्यकाल में राजस्थान की पद्मिनियों से लेकर आधुनिक काल में रूप कुंवरों तक आते-आते , एक ऐसी गौरवमयी प्रथा का इतिहास सृष्ट कर गयी, जिस पर हिन्दुओं के गर्व की कोई सीमा नहीं. सुप्रचीनकाल से लेकर रूप कुंवर तक लाखों-करोड़ों आर्य रमणियों ने हँसते-रोते प्राणोत्सर्ग कर , जिस गौरवमयी प्रथा का निर्वाह किया , उसका गौरवगान करने में इस देश के साहित्यकारों ने कोई कमी नहीं की. बहरहाल हिन्दू भगवान् कृष्ण ने जाति-भेद को कायम रखने के नारियों की प्राणाहुति की जो व्यवस्था आर्य –पुत्रों को दी एवं जिसकी बलिबेदी पर पंडित राहुल सांकृत्यायन के मुताबिक़ सवा करोड़ नारियां प्राणोत्सर्ग कीं, वह मृत्यु की एक सर्वथा भिन्न व्यवस्था रही . इसमें क़त्ल होने वाले को कातिल और उसके साथियों से कोई शिकायत नहीं : कातिल को अपने गुनाह का रत्ती भर ही अहसास नहीं रहा. दुनिया ने मृत्यु का साडम्बर अनुष्ठान प्राचीन रोम के ग्लैडियेटर युद्ध और स्पेन के बुल –फाईट में देखा है, किन्तु ये सारे अनुष्ठान सतीदाह के आध्यात्मिक अनुष्ठान के समक्ष फीके रहे. यहां सवाल पैदा हो सकता कि मृत्यु के इस निराले आध्यात्मिक अनुष्ठान में आर्य-नारियों ने क्यों हँसते-हँसते प्राणोत्सर्ग कर दिया? कारण एकाधिक रहे, पर मुख्य कारण जुड़े हैं धर्म शास्त्रों से जिनमें खास हैं.

वेद व शास्त्रों की यह प्रतिश्रुति कि जो नारियां मृत पति की चिताग्नि पर प्राणोत्सर्ग करेंगी, वे स्वर्ग में उनके साथ अनंतकाल, संभवतः 35, 000,000 वर्षों तक सुख भोग की अधिकारिणी होंगी; जिस तरह सपेंरा सांप को बिल से खींच लता है,उसी तरह सती अपने पति को नरक से खींचकर स्वर्ग में पहुंचा सकती हैं’. इसके अतिरिक्त मृत पति के साथ चितारूढ़ होकर प्राणदान करने से स्त्री के मायके व ससुराल वालों को विराट पुण्यलाभ के साथ ख्याति वृद्धि; वैधव्य के नारकीय जीवन की यंत्रणा से सदा-सदा के लिए मुक्ति पाने का कुछ मिनटों का कष्टकर विकल्प और सतीदाह के विनिमय में प्रसिद्धिलाभ एवं लम्बी समय से प्रचलित प्रथा के निर्वाह से मुंह चुराने के की परिणतिस्वरूप असहनीय सामाजिक व पारिवारिक उपेक्षा इत्यादि वे कारण रहे, जिससे यह प्रथा गौरवमयी बनी.

बहरहाल आर्य-पुत्रों के लिए सती-दाह की प्रथा जितनी भी गौरवमयी क्यों न रही हो , अंग्रेजों ने इसे मानवता के विराट कलंक के रूप में लिया. फलस्वरूप उन्होंने 4 दिसंबर, 1829 को कानून द्वारा इसे निषिद्ध घोषित कर हिन्दुओं को एक गौरवमयी प्रथा से वंचित कर दिया. किन्तु कानूनन इससे जबरन वंचित किये जाने के बावजूद उच्च वर्णीय लोगों का इसके प्रति आकर्षण बना रहा और उन्होंने रूप कुंवरों के माध्यम से इसे पुनर्स्थापित करने का छिट-फुट प्रयास भी किया. पर, कानून द्वारा कठोरता से हतोत्साहित किये जाने के कारण वे आगे नहीं बढ़ पाए, किन्तु आज हालात भिन्न हैं. राजस्थान सहित केंद्र में एक ऐसी सरकार मजबूती से कायम है ,जो अतीत की गौरवशाली परम्पराओं को पुनर्स्थापित करने के लिए सचेष्ट है. ऐसे में जौहर प्रथा के समर्थक इसे नए रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हो सकते हैं.

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं

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