अरुण माहेश्वरी

ऐसा लगता है, जब से मोदी सत्ता में आए हैं, पूरे देश में सिर्फ एक ही काम चल रहा है — पूरे सामाजिक ताने-बाने में तोड़-फोड़ और आगे किसी भारी विस्फोट के जरिये पूरे समाज को चिंदी-चिंदी करके उड़ा देने के लिये जीवन के तमाम क्षेत्रों में बारूद बिछाने का काम । यह शासन विध्वंसों के प्रयोग का शासन बन कर रह गया है ।

जीवन का हर स्वरूप हमेशा अनेक तत्वों के एकीकृत रूप से ही तैयार होता है, जिसे unified multiplicity कहते हैं । यह ‘विविधता में एकता’ वाली भारत की अपनी कोई खास विशेषता नहीं है । जब किसी भी ठोस से ठोस चीज को असंख्य टुकड़ों में बिखेरा जा सकता है, यह बिखराव ही इस बात का प्रमाण है कि हर चीज असंख्य तत्वों का समुच्चय होती है । इसीलिये, ध्वंसात्मकता मात्र के लिये हमेशा किसी बुराई के होने की अनिवार्यता नहीं होती है । वह खुद में एक स्वायत्त, स्वतंत्र खतरनाक प्रवृत्ति भी हो सकती हैं ।

खास तौर पर आज असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी के नाम पर जो परिस्थिति बन रही है, वह तो जैसे गुजरात के 2002 के नर-संहार के आगे हमारे देश में व्यापक पैमाने पर एथनिक क्लींजिंग की तरह की तैयारी की तरह दिखाई दे रही है । असम में आबादी की संरचना का विषय कई भौगोलिक-राजनीतिक कारणों से ही एक बहुत जटिल विषय बना हुआ है । इसे लेकर असमिया समाज में पिछले पचास साल से भी ज्यादा समय से भारी सामाजिक-राजनीतिक तनाव कायम है । बगल के पड़ौसी देश बांग्लादेश में बहुत सालों से, पाकिस्तान के दिनों से ही हमेशा एक अस्थिर राजनीतिक-आर्थिक परिस्थिति बनी रही है । इसीलिये वहां से दुनिया के सभी देशों में आबादी का एक निरंतर प्रवाह चलता रहता है । दुनिया के अधिकांश देशों में आपको बांग्लादेश के लोग मिल जायेंगे । पड़ौसी मुल्क के नाते रोजगार की तलाश में भारत में भी वहां से लोग आते रहे हैं और नाना उपायों से वे भारत में ही बस भी जाते हैं ।

नाना प्रकार की विपदाओं के कारण आबादियों के अपनी मूल स्थान से स्थानापन्न होने की यह समस्या सारी दुनिया में एक स्थायी समस्या है और इससे सभी जगह खास प्रकार के सामाजिक-राजनीतिक तनाव भी पैदा होते रहे हैं । आज पश्चिम के देशों में भी शरणार्थियों की समस्या सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या है । लेकिन इस दुनिया ने वे दृश्य भी देखे हैं जब, किसी अन्य देश के नागरिकों को नहीं, हजारों साल से रह रहे यहूदियों को हिटलर ने लाखों की संख्या में गैस-चैंबरों में ठूस कर मार दिया था । इसीलिये, आबादी के किसी हिस्से से, सह-नागरिकों से भी घृणा के मूल में हमेशा उनकी नागरिकता का सवाल ही प्रमुख नहीं होता है । ऐसी नफरत की अपनी खुद की ही एक फितरत होती है, जैसा कि हमने ध्वंसात्मकता के बारे में कहा — एक स्वतंत्र, स्वायत्त प्रवृत्ति !

बांग्लादेश से हमारे देश की तकरीबन 92 किलोमीटर की जल-सीमा है जिसे किसी प्रकार से भी पूरी तरह से बंद करना अब तक संभव नहीं हुआ है । इसीलिये तमाम राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों और दबावों के बावजूद असम में बांग्लादेश के लोगों का आना आज तक भी पूरी तरह से रुक नहीं पाया है । इसका भारी प्रभाव वहां आबादी में वृद्धि की दर के आंकड़ों पर भी पड़ा है । इन तथ्यों का संज्ञान लेते हुए ही सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2009 में अपने एक फैसले में असम में बाकायदा नागरिकों का एक रजिस्टर तैयार करने का आदेश दिया था । असम सरकार ने उसी रजिस्टर को हाल में प्रकाशित किया है, जिसके कारण पूरे असम में ऐसी उथल-पुथल मची हुई है, जिसकी विध्वंसक संभावनाओं का अनुमान तक लगाना कठिन है । इस रजिस्टर को प्रकाशित करने के पहले ही पूरे राज्य में सेना को तैनात कर दिया गया था ।

रजिस्टर में अब तक दर्ज नामों की जो पहली सूची जारी की गई है उसमें कुल 1.9 करोड़ लोगों के नाम शामिल हैं और 1.39 करोड़ ऐसे लोगों के नाम शामिल नहीं हैं जिन्होंने अपनी नागरिकता का आवेदन किया था । जिन नामों को शामिल नहीं किया गया हैं, उनमें राज्य के एक-दो मंत्री और सांसदों के नाम भी शामिल हैं । यद्यपि राज्य सरकार ने कहा है कि वह आगे और भी सूची प्रकाशित करेगी ताकि अब तक की सूची की कमियां दूर हो सके । लेकिन राज्य में अभी जो भाजपा की सरकार है उसने इस पूरे मामले में यह कह कर जटिलता पैदा कर दी है कि 2014 तक बांग्लादेश से राज्य में जितने हिंदू आए हैं, उन्हें वह नागरिकता देने के पक्ष में है, लेकिन मुसलमानों को नहीं । इस प्रकार, पहली बार भारत में नागरिकता के सवाल को धर्म की पहचान से, अथवा शासक दल की अपनी मन-मर्जी से जोड़ने की जो कोशिश की जा रही है, वह बेहद खतरनाक है । इससे भविष्य में हमारे देश में जिस प्रकार के भयानक सामाजिक तनाव पैदा हो सकते हैं और किस प्रकार यह भारत में हिटलरी जन-संहार की, जातीय क्लींजिंग की राजनीति की एक नई जमीन तैयार कर सकती है, इसकी आशंका करना जरा भी निराधार नहीं है ।

पिछले साढ़े तीन साल से ज्यादा के मोदी शासन के काल में अपने पड़ौसियों से नफरत करने, नागरिकों के बीच आपस में अविश्वास पैदा करने के जो सभी उपक्रम चल रहे हैं, यह हमारे देश को सचमुच साक्षात नर्क में बदल देने के उपक्रम से कम नहीं है । सार्त्र का एक नाटक है — नो एक्सिट । इसके अंत में सार्त्र यही कहते हैं कि यदि आपको अपने जीवन को नर्क में बदलना हो तो आप अपने पड़ौसी से नफरत करना शुरू कर दीजिए, उसे हमेशा अविश्वास की दृष्टि से देखिये । इससे उसका कितना अनिष्ट होगा, यह तो कोई नहीं कह सकता, लेकिन आपका जीवन जरूर नर्क में तब्दील हो जायेगा । हमारे आज के हुक्मरान और हमारा मीडिया आज इसी काम में लगे हुए दिखाई देते हैं । कहना न होगा, परस्पर सामूहिक नफरत पूरे सामाजिक जीवन को जहन्नुम बनाने से कम पाप नहीं है ।