ganga-ghat

सैयद एस.तौहीद

पटना वासियों को गंगा मईया का दूर चला जाना अखरता होगा। खासकर इस समय जब गर्मी शिददत की हो रही और डुबकी लगाने को दिल है। आज यह मजा कुछ ही घाटों तक सिमट कर रह गई है। अधिकांश घाटों से गंगा नदी दूर हो गई है । इसके काफी आगे चले जाने की सबसे ज्यादा तकलीफ ‘गंगा स्नान’ जैसे विशेष अवसरों पर महसूस होती है । क्या हालात बदल सकते हैं? विकास योजनाएं हालांकि समाज-कल्याण उददेश्य से चलाई जाती है,लेकिन प्राकृतिक स्रोतों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है ।गंगा नदी का ही उदाहरण लें जिसके ऊपर बांधों व पुलों का निर्माण हुआ । यह निर्माण अवश्य कारगर लगे ,लेकिन इससे गंगा में पानी का स्तर एवं धारा के रुख पर बुरा असर पडा । धार्मिक आस्था वाले लोग गंगा को आस्था का प्रतीक मानते हैं । पुजारी बताते हैं कि गंगा के आगे चले जाने से घाट बदहाल हो गए। आज घाटों का नाम तो घाट जरूर है,लेकिन घाटों की मूल सुंदरता का बडी तेजी से खात्मा हो रहा है । गंगा किनारे आबाद बहुत से पुराने घाट सुनहरे दिनों की कडवी कसक रह गए हैं । एलसीटी घाट का ही उदाहरण लें तो धुंधलकी यादों का वर्त्तमान तकलीफ देता है । दरअसल गंगा के दूर चले जाने से किनारे पर आबाद परंपरागत घाट उजडने की प्रक्रिया से स्वयं को बचा न सका। आज के एलसीटी घाट में बीते दौर का अक्स ही शेष रह गया है। आज भी घाट पर पुराना जहाज जर्जर मिल जाएगा,जो न जाने कब से छूटने का इंतजार में खडा है। घाट का सुनहरा दौर मुडकर देखना हो तो नज़रें इस पर टिकती हैं ।

वह दौर जब यहां हलचल हुआ करती थी,व्यावसायिक गतिविधियों के मददेनजर इस से उस पार आवाजही हुआ करती थी। जाहिर है कि घाटों पर इस तरह की हलचल आम बात थी,तब घाटों पर जाकर नदी को निहारना एक सुखद अनुभव था,जिसे आज याद किया जा सकता है । बहरहाल वो दिन अब दिन तो अब रहें नहीं, घाटों की रौनक अब रही नहीं । आज स्तिथि इस कदर उदासीन हो चली है कि दिन दहाडे आपराधिक वारदातों का भय बना रहता है। कहा जाता है कि आपसी रंजिश मिटाने की आसान जगह यह विरान घाट बन गए हैं। फिर भी जिन आंखो ने बीता कल देखा है,उनका विश्वास अब भी मिटा नहीं । अहले सुबह या शाम के वक्त वहां जाने पर कुछ बुजुर्ग अक्सर मिल जाते हैं। घाट को देखना हो तो इनकी आंखों में देखे, इन्हें आज के सच का गम है । इन लोगों का गंगा के घाटों से पुराना रिश्ता है ।बचपन और जवानी के दिनों में नदी की धारा के करीब रहे,बुढापे में भी बदलाव का आसरा लगा रहता है।

पानी दूर जाने के पीछे परिवर्तन का नियम भी कुछ हद तक जिम्मेदार रहा । पटनावासियों की आस्था है कि धारा के रुख बदलने से नदी इस ओर से उस ओर हो गई। दुजरा पहलवान घाट के लोग हट में कहते हैं कि फिल्हाल जहां गंगा बह रही,उसकी मूल जगह वही है। पानी का रुख बदलेगा तो गंगा जरूर पुराने घाटों पर फिर से नज़र आएगी ? पटना के बहुत से घाट आज महत्त्वहीन हो गए हैं । यह घाट दरअसल उपयोगिता के विमर्श से जूझते उसी जगह खडे हैं… जहां कोई खत्म होने वाली चीज होती है । देखा जाए तो गंगा के घाटों को खत्म करने की दिशा में हवा है। याद कीजिए वह गुजरा दौर,जब गंगा का पानी घाटों के किनारे बहता था,जरूरत पूरी होती थी। ठंडी हवाओं से पूरा मन शीतल हो जाता था । स्वर्णिम दौर की उसी रूप में वापसी अब असंभव के निकट है । वस्तुस्तिथि बहुत उत्साहजनक नहीं । इसका तात्पर्य यह कि बेहतर भविष्य की कामना छोड देनी चाहिए? घाटों की गुमनामी व बदहाली पर विचार करना जरूरी हो गया है । राजधानी के बहुत से घाट हाशिए पर चले गए हैं। हाशिए पर चली गई चीज को वापस लाने के लिए जनक्रांति की दरकार होती है । पटना में बहुत से घाटों पर गंगा एक मिटे हुए नाम की तरह बह रही है ।