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लव कुमार सिंह

कहा जा रहा है कि जिस देश के पास ज्यादा युवा शक्ति है, उसके पिछड़ने की आशंका नहीं हो सकती। कहा जा रहा है कि चीन की विकास दर तो गिरी ही है, उसकी आबादी में युवाओं की संख्या भी तेजी से कम होती जा रही है, जबकि बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ रही है। 60 फीसदी से ज्यादा युवाओं का देश भारत चाहे तो इस मौके का फायदा उठा सकता है।
कहा जा रहा है कि ज्यादा युवा शक्ति वाले भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन वास्तविक हालात देखें तो क्या यह बात पूरी तरह सच है? देश में ज्यादा युवा होना अच्छी बात है, लेकिन यदि इन युवाओं का एक बड़ा हिस्सा सही दिशा से भटका हुआ हो तो इस अच्छी बात के बुरा बनने में जरा भी देर नहीं लगती। देश में हो रही छेड़खानी, रेप, मारपीट और अन्य आपराधिक घटनाएं इसी तरफ गंभीर संकेत कर रही हैं। भटकी हुई युवा शक्ति से देश का कोई भला नहीं हो सकता। ऐसी युवा शक्ति देश और समाज को खोखला करने का ही काम करेगी। अगर हम अपनी युवा शक्ति को संस्कार और रोजगार नहीं दे सकते तो यह देश को आगे बढ़ाने के बजाय बहुत पीछे ले जाएगी।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में कुछ युवाओं की नासमझी ने जिले में दंगा भड़का दिया और 50 से ज्यादा लोगों की जानें चली गईं। हजारों लोग घर से बेघर हो गए। 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में कुछ युवाओं ने चलती बस में एक युवती के साथ क्या किया, इसे सारी दुनिया जानती है। इसके बाद मुंबई में एक महिला पत्रकार के साथ हुए गैंग रेप में भी कई युवा शामिल थे। अब बदायूं एक बड़ा उदाहरण बन गया है। यहां यह भी बताते चलें कि दिल्ली, मुंबई या फिर बदायूं की इन बड़ी घटनाओं के बीच देश के अन्य हिस्सों में भी सैकड़ों बलात्कार हो गए। यानी सिलसिला न तो थमा है और न ही थमने की संभावना ही नजर आ रही है।
ये सिर्फ चंद उदाहरण हैं, ये बताने के लिए कि देश के युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा कहां व्यस्त है। इस हिस्से के युवाओं में से कोई इंजीनियरिंग का छात्र होकर भी चेन, पर्स लूट रहा है तो कोई राज्य स्तर का खिलाड़ी होकर भी सुपारी लेकर हत्याएं तक कर रहा है। कोई एमबीए करते हुए वाहन चोरी कर रहा है तो कोई पढ़ाई करते हुए एटीएम पर हाथ साफ करने की कोशिश कर रहा है। शराबखोरी, छेड़खानी और मामूली बात पर मारपीट तो इस हिस्से के युवाओं का जैसे जन्मसिद्ध अधिकार हो गया है। गांव-शहर में देशी-विदेशी शराब की नदियां बह रही हैं। शहरों में तो छेड़खानी जबरदस्त है ही, अनेक गांवों में शोहदों के हौसले इतने बुलंद हैं कि माता-पिताओं ने बेटियों की पढा़ई तक छुड़वा दी है।
इतना ही नहीं हंगामे, तोड़फोड़ और अव्यवस्था फैलाने में भी युवा ही सबसे आगे रहते हैं। निराशा की बात ये है कि उन्हें कोई भी बरगला लेता है। वे एक ऐसा खतरनाक झुंड बन जाते हैं जिन्हें कोई किसी भी दिशा में हांक लेता है। युवाओं का बड़ा हिस्सा होश से कम जोश से ज्यादा काम लेता है। 16 दिसंबर 2012 की घटना के बाद दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में हुए उद्देश्यपूर्ण प्रदर्शन तो इस देश में विरले ही देखने को मिलते हैं।

क्या हैं कारण

इस विकट समस्या के अनेक कारण हैं। अक्षम राजनीतिज्ञ, असंवेदनशील पुलिस और सुस्त न्याय व्यवस्था तो इसके लिए जिम्मेदार हैं ही, मगर कुछ सामाजिक कारणों पर भी हमें निश्चित ही गौर करना होगा।

एक : कन्या भ्रूण हत्या

आज का भारतीय समाज कन्या भ्रूण हत्या करके लड़कों की संख्या बढ़ा रहा है और लड़कियों की कम कर रहा है। कई अध्ययनों में यह कहा गया है कि जिस समाज में पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा होती है, खासकर उन जवान पुरुषों की संख्या जो निम्न आय वर्ग के होते हैं, वहां हर तरह की हिंसा, बलात्कार और अन्य तरह के अपराध जन्म लेते हैं।
भारत की आज कुछ ऐसी ही स्थिति है। देश में इस समय ऐसे जवान लड़कों की संख्या बहुत ज्यादा है, जो या तो कोई काम-धंघा नहीं करते हैं या कुछ काम करते भी हैं तो मौका पाकर चोरी-चकारी और छोटे-मोटे अपराध भी करते हैं। गांवों में, शहरों के बाहरी इलाकों में ऐसे लड़के बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। स्त्री-पुरुष संख्या के अनुपात में जो कमी आ रही है, उसका सबसे ज्यादा असर भी लड़कों की इसी बढ़ी हुई आबादी पर पड़ रहा है। उनकी शादियां नहीं हो रही हैं। बलात्कार की जब भी कोई ऐसा घटना घटती है जिसमें अजनबी पुरुष या पुरुषों द्वारा बलात्कार किया जाता है तो ऐसे ज्यादातर मामलों में ऐसे ही लड़कों की संलिप्तता सामने आ रही है।
अध्ययन कह रहे हैं कि स्त्री-पुरुष अनुपात को ठीक किए बिना छेड़खानी और बलात्कार की समस्या पर काबू नहीं पाया जा सकेगा। जब दफ्तरों में, सड़क पर ज्यादा से ज्यादा महिलाएं दिखाई देंगी, तभी ऐसी समस्या में कमी हो सकती है। यानी हमें कन्या भ्रूण हत्या को हर हाल में बंद करना होगा।

दो- बेलगाम बेटे

भारतीय समाज में बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि माता-पिता जितनी निगरानी और चौकसी बेटी की करते हैं, उतनी बेटों की नहीं करते। इसके बजाय बेटों को खुला और बेलगाम छोड़ दिया जाता है। अनेक माता-पिता को यह पता ही नहीं होता कि उनके बेटे कहां जा रहे हैं, किसके साथ उठ-बैठ रहे हैं, क्या कर रहे हैं। अगर मां-बाप, बेटों का बेटी जितना ही ध्यान रखें, उन्हें सही संस्कार सिखाएं, लड़कियों-महिलाओं की इज्जत करना सिखाएं तो न सिर्फ देश की युवा शक्ति सही दिशा में जाएगी बल्कि अपराधों की संख्या भी बहुत कम हो जाएगी।
हर परिवार में बेटे को महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए। उसे बताया जाना चाहिए कि स्त्री और पुरुष पूूरी तरह समान हैं। वह अपनी बहन या किसी अन्य लड़की से व्यवहार के स्तर पर बिल्कुल भी ऊपर नहीं है। उसे बताया जाना चाहिए कि किसी लड़की से दुर्व्यवहार संबंधी कोई भी शिकायत घर में सहन नहीं की जाएगी। यदि बाहर वह कुछ उल्टा-पुल्टा करता है, कोई अपराध करता है तो घर में कोई भी उसके साथ नहीं खड़ा होगा। यदि वह बाहर किसी अराजकता में शामिल होता है तो उसका साथ देने के बजाय परिजन उसे खुद कानून के हवाले करेंगे।

तीन- लड़का-लड़की में गैरबराबरी

समाज में लड़कियों-महिलाओं के प्रति मानसकिता को बदलने का काम सही प्रकार से नहीं हो रहा है। स्कूल स्तर पर ही यदि लड़के-लड़कियों को समानता का सबक सिखा दिया जाए तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। कोई भी पुरुष जन्म से हिंसक नहीं होता। उसकी परवरिश, उसका माहौल उसे हिंसक बनाता है। यदि घर में और स्कूल में लड़के को सिखाया जाएगा कि उसकी कोई भी अनुचित मांग नहीं मानी जाएगी, कि लड़के होने का यह मतलब नहीं है कि वह कुछ भी कर सकता है, कि उसे ना सुनने की आदत भी डालनी चाहिए, कि लड़की भी उसके बराबर की ही हकदार है, कि वह केवल लड़का होने से ही लड़की से श्रेष्ठ नहीं है तो काफी बदलाव आ सकता है।

चार- टेलीविजन और फिल्में

टेलीविजन और फिल्मों की आलोचना करना पुरातनपंथी विचार मान लिया गया है, मगर वास्तविकता यही है कि टेलीविजन और फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से औरत को उपभोग की वस्तु बना दिया गया है, उससे भी युवा शक्ति को सही दिशा नहीं मिल पा रही है। टेलीविजन और फिल्मों की कई कहानियों (उदाहरण फिल्म “इश्कजादे”) में आज जो दिखाया जा रहा है उसका सीधा सा संदेश यही जाता है कि औरत से आप बुरा बर्ताव कर सकते हैं। आप उसे कितना भी अपमानित कर सकते हैं और इतना कुछ करने पर भी वह आपको माफ कर देगी। मेट्रो शहरों की थोड़ी सी आबादी के आधार पर फिल्मकारों ने मान लिया है कि देश बदल गया है। वे बड़े आराम से फिल्मों में सेक्स के दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं, मगर उन्हें पता ही नहीं है कि उनकी इस कोशिश को युवा किस रूप में ग्रहण कर रहा है।

पांच- बेरोजगारी

युवाओं के भटकाव का यह भी बहुत बड़ा कारण है। जब व्यक्ति किसी काम-धंघे में लगा होता है तो गलत बातों की तरफ उसका ध्यान कम जाता है। पैसा पास होने से एक संतुष्टि का भाव भी उसमें रहता है। वास्तविकता यह है कि आज देश के युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा संतुष्ट नहीं है, क्योंकि उसके पास रोजगार नहीं है। इसके लिए न सिर्फ सरकारों की नीतियां जिम्मेदार हैं, बल्कि हमारी शिक्षा प्रणाली भी काफी हद तक दोषी है। हमारी शिक्षा प्रणाली किसी बच्चे को एक अच्छा इनसान बनने में तो मदद कर ही नहीं रही, उसे बड़े होने पर रोजगार दिलाने में भी सहायक नहीं हो पा रही है। यह भी बड़ा विरोधाभास है कि एक तरफ तो सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी है, दूसरी तरफ रोज सैकड़ों की संख्या में नौकरियों के विज्ञापन निकलते हैं, मगर निजी कंपनियों को योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलते।
निष्कर्ष यह निकलता है कि केवल युवाओं की संख्या बढ़ जाने से ही कुछ नहीं होगा। हमें युवाओं को संस्कार और रोजगार भी देना होगा। यह काम घर, स्कूल से शुरू करना होगा, साथ ही देश की नीतियों में बदलाव करना होगा। ऐसा होने पर ही युवाओं के एक भटके हुए हिस्से को सही दिशा मिल पाएगी और तब हम सही मायने में कह सकेंगे कि हां, युवा शक्ति भारत को बहुत आगे ले जा सकती है।