KISHAN-MANTO

प्रस्तुति: सैयद एस.तौहीद

मंटो को लोग अक्सर हंसते हुए, शराब पीते हुए, दोस्तों का मजाक उडाते हुए, मानी हुई सच्चाइयों को झुठलाते हुए देखा है। मैंने लेकिन मंटो को रोते हुए भी देखा है। वह दुनिया के दुखों पर नहीं रोता, वह अपने दुखों पर नहीं रोता। उसे इश्क हुआ नहीं था, उसे किसी खतरनाक बीमारी का सामना नहीं करना पडा था। वह अपने डेढ बरस के बच्चे की मौत पर रो रहा था। जिस वक्त मुझे खबर मिली मैं जल्दी से उसके घर दौडा-दौडा गया। मंटो ने इस तरह अपनी लाल-लाल आंखों से मुझे घूर कर देखा मानो कह रहा हो—और तुम अब आए हो जबकि वह मर चुका है, जबकि हम उसे दफनाने ले जा रहे हैं? इससे पहले तुम कहां थे? तुम पहले आते तो शायद मेरा बच्चा बच जाता। उसका गला रूंधा हुआ था और उसके पपोटे सुजे हुए थे और उसने मुझसे कहा ‘क्रिशन, मैं मौत नहीं डरता,किसी मौत का असर नहीं लेता। लेकिन यह बच्चा—इसलिए नहीं कहता हूं कि यह मेरा बच्चा है—इसलिए कहता हूं—तुम इसे देखते हो न, इस वक्त भी कितना मासूम कितना नया,कितना प्यारा मालूम होता है। मैं सोंचता हूं कि जब कोई नया ख्याल अपने खात्मे तक पहुंचने से पहले टूट जाता है, उस वक्त कितना बडा सानेहा होता है। हर नया बच्चा एक नया ख्याल है। यह क्यों टूट गया? अभी मैंने इसे तडपते देखा है। मैं मर जाऊं,तुम मर जाओ, बुढे…जवान, अधेड उम्र के लोग मर जाएं,मरते रहते हैं, लेकिन यह बच्चा—फितरत को किसी नए ख्याल का इतना जल्दी न गला घोंटना चाहिए’। और वह फूट-फूट कर रोने लगा उसने जो खोल अपने ऊपर चढा दिया था, उसके टुकडे-टुकडे हो चुके थे।

उसके बाद मैंने उसे रोते नहीं देखा। लेकिन उन आंसुओं ने मुझे मंटो के अंदर उस गहरे समुद्र में पहुंचा दिया, जहां से उसके साहित्य की रचना होती है। उस समुद्र का रंग गहरा हरा और सुनहरा है। उसका पानी खारा है और शार्क मछलियां और ओक्टोपस और दूसरे खतरनाक समुद्री जानवर उसकी तह में छुपे हुए हैं। लेकिन यहां रंग-रंग की हरी चटटानें भी हैं जिनकी मखमली हरियाली पर सीप के मोती आराम कर रहे हैं । इस अजीबोगरीब दृश्य को मैंने सिर्फ एक बार देखा । आपने वो मोती देखे हैं जिन्हें मंटो एक गोताखोर बनकर अपने दिल की गहराईयों से निकाल कर लाता है। ये उसके खून की जमी हुई बुंदे हैं जिन पर वह अपने व्यंग्यमय अंदाज़ से आपके सामने पेश करता है। आप उसके अंदाज़ पर मत जाइए! ये सच्चे मोती हैं। यह हमारे मुल्क की बदकिस्मती है कि हम उसकी क़द्र नहीं करते। कहने को तो हिन्दुस्तान साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और ललित कलाओं का केन्द्र रहा है, लेकिन सदियों से हमने महान कलाकारों के साथ ऐसी खतरनाक बेपरवाही बरती है कि हमें अपने जुर्म का एहसास तक नहीं होता। मेरे सामने सहगल की मिसाल है। जब सहगल का इंतकाल हुआ तो हमारे मुल्क के महान नेताओं के मुंह से खेद का एक भी लफ्ज नहीं निकला, और ये वो लोग हैं जो दिन रात अपनी सभ्यता और संस्कृति की हिफाजत का रोना रोया करते हैं।

मंटों को अच्छे कपडों का शौक नहीं । उस अच्छे घर, अच्छे खाने और अच्छी शराबों का शौक है। उसका घर आपको करीने से सजा हुआ मिलेगा। वह साफ सुथरे पाक़ वातावरण में काम करने का आदी है। सफाई, नियमितता और उम्दगी उसके मिजाज की खासियते हैं। वह फूहडपन, अस्त-व्यस्तता, जो अधिकांश लेखकों के घर मिलती है, मंटो के यहा नदारद हैं। मंटो के घर में आपको कोई बात टेढी नहीं मिलेगी। सर्फ घरवाले की सोंच टेढी है। टेढी है, लेकिन उसमें भी एक जाहिर क्रम है जिसका उदघाटन अकसर उसकी कहानियों के अंत में होता है। मंटो की कहानियां उसके मिजाज़ और उसके वातावरण की प्रतीक हैं। मंटो अपनी कहानियों का लिबास नफासत से तैयार करता है। उनमें कहीं झोल नहीं आता। स्त्रीशुदा साफ-सुथरी कहानियां ! जबान मंझी हुयी, सलीस व सादा। हां, उसकी कहानियों के रंग अजीब होते हैं, उनकी तराश निराली होती है, उसकी उपमाएं अछूती, उसके अलंकार अनोखे होते हैं। वह साहित्य में सौंदर्य नहीं, रेखागणित का कायल है। हर चीज नपी-तुली रखता है। मंटो ज़मीन के बहुत करीब है, इतना करीब कि अक्सर घास की बाली में रेंगने वाले कीडे भी अपनी, समस्त ख़ूबियों के साथ उसे दिखाई दे जाते हैं। और जो लोग जिंदगी को एक ऊपरी नजरों से देखने के आदी हैं, वे मंटो के गहरे निरीक्षण और तीक्ष्ण दृष्टि की दाद देने में कामयाब नहीं रहते। इसमे कोई शक नहीं कि कहीं कही उसका हद से बढा हुआ अहं उसे धोखा दे जाता है। लेकिन ऐसा बहुत कम होता और उसकी अधिकांश रचनाएं उच्चतर मानवीयता के उददेश्य पर पूरा उतरती हैं। अपनी सादगी और सच्चाई और तल्खी के भीतर एक ऐसी खूबसुरती की बू-बास रखती है कि जिसको पाने के लिए इंसान आज तक तरस रहा है।

साप्ताहिक मुसव्विर में मंटो की कहानियां साया होती थी। यह कहानियां इतनी नुकीली थीं, इतने अजीबोगरीब अंदाज़ में लिखी गयी थीं कि कायल होना पडा। प्रेमचंद के बाद मंटो पहला साहित्यकार है जो साहित्य से सिनेमा की ओर झुका, शायद मंटो के लिए यह कहना सही न होगा। इसलिए कि उसकी अदबी ख्याति उसकी फिल्मी जिंदगी के बाद शुरू होती है। शायद मंटो पहिला लेखक है जो फिल्म से साहित्य की तरफ आया और अपने नाम की जडें मजबूत करके फिर फिल्मों की ओर चला गया। उसकी हर बात अजीब है। मंटो की उन कहानियों को पढने बाद मैने उसकी ‘लालटेन’ पढी। जो बटोत कश्मीर से ताल्लुक रखती है, जहां मंटो शायद अपनी घोर बीमारी की हालत में रहा था। मुझे तो उस कहानी का अधिकांश भाग मंटो की जिंदगी से जुडा मालूम देता है। उस कहानी के ब्योरों और अंतिम शब्दों में जो पीडा और करूणा है, वह खुद रोमानी मंटो की जिंदगी का एक हिस्सा मालूम होता है। इसके बाद जैसे मंटो की कहानियों से किसी ने सारी कोमलता, करूणा, नरमी व मिठास ले ली या शायद उसने खुद इन खूबियों को अपनी कहानियों से धक्के मार-मार कर निकाल दिया। मुझे तो ऐसा लगता है कि अपने अंतर के किसी भाव के कब्जे में वो ऐसा करता रहता है । उसकी ज्यादातर कहानियों में ऐसा मालूम होता है, जैसे वह इन भावनाओं को जान बुझकर धक्के देकर बाहर निकाल रहा हो। कभी बच्चों की तरह बिसुरने लगता है। कभी तल्ख लहजे, रुखे व कडवे अंदाज में हंसी उडाता है। मगर कोई नहीं समझता कि इस कटुता के भीतरी परत के अंदर कितनी कोमलता, करूणा और जिंदगी की चाह छुपी है। ऐसी चाहत, जिसकी भूखा आदमी और अनंत है, मिटाए नहीं मिटती है। मंटो आदि काल से भूखा है। उसकी हर कहानी में मुहब्बत की पुकार है। आप उसके अंदाज पर मत जाइए। वह हजार कहता है कि उसे इंसानों से मुहब्बत नहीं नहीं। मैं एक गले सडे कुत्ते से मुहब्बत कर लूंगा, लेकिन इंसानों नहीं। वह कहेगा कि ‘मुझे दया,दोस्ती, मुहब्बत पर यकीन नहीं। मेरा यकीन शराब पर है’। वह यह सब बातें कहता है –आपका जी जलाने के लिए,अपने आप को धोखा देने के लिए भी वो ये बातें कहता है। दर असल मंटो ने जिंदगी को समझने के लिए अपने आप को मोमी शमा तरह पिघलाया है। वह उर्दु अदब का अकेला शंकर है, जिसने जिंदगी के ज़हर को खुद घोल कर पीया है। फिर उसके बाद उसके रंग को खोल-खोल कर बयाम किया है। ज़हर से यदि शंकर का गला नीला हो गया था तो मंटो ने भी अपनी सेहत गंवा ली है। वो ज़हर मंटो ही पी सकता था।