by – संजय तिवारी
आधुनिक युग में इस्लाम के इतिहास में ऐसा कोई मसीहा पैदा नहीं हुआ है जिसने एक झटके में मुस्लिम महिलाओं को इतनी बड़ी राहत दे दिया, जितनी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिया है। तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक और अमानवीय करार दिये जाने के बाद मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के लिए नया कानून बनाया है जिसे लोकसभा पारित कर चुकी है। इस नये कानून के मुताबिक अगर कोई मुसलमान अपनी पत्नी को तीन तलाक देता है तो उसे तीन साल की सजा हो सकती है और महिला को हक होगा कि वह तलाक देने वाले अपने पति से अपने लिए हर्जाना तथा बच्चे की कस्टडी भी ले सकती है।

अगर आप इस्लामिक कानून के बारे में थोड़ा बहुत जानते हैं तो यह जानते होंगे कि इस्लाम में महिलाओं को किसी प्रकार का कोई हक हासिल नहीं है। इस्लाम में विवाह एक कन्ट्रैक्ट है जो औरत मर्द के बीच होता है और इस कन्ट्रैक्ट में तलाक देने का हक सिर्फ मर्द के पास होता है। औरत अपनी तरफ से मर्द को तलाक नहीं दे सकती। कान्ट्रैक्ट की शर्तों के मुताबिक तलाक देने के बाद मुस्लिम मर्द औरत को किसी भी प्रकार से कोई गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं होता है, औरत सिर्फ कान्ट्रैक्ट के मुताबिक मेहर की रकम अपने पास रख सकती है।

लेकिन कानून बन जाने के बाद अब ऐसा नहीं हो सकेगा। अब अगर मुस्लिम मर्द तलाक देगा तो औरत अपने गुजारे भत्ते के लिए अदालत जा सकेगी। इस बारे में हालांकि अभी बहुत कुछ काम किया जाना बाकी है क्योंकि नये कानूनी प्रावधान में न तो एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगायी गयी है और न ही पत्नी को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपनी तरफ से तलाक की अर्जी दाखिल कर सके। फिर भी मुस्लिम महिलाओं ने चौतरफा इस कानून का स्वागत किया है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन्हें यह होगा कि उनके सिर पर हर वक्त जो तीन तलाक की तलवार लटकती रहती थी, वह हट गयी है। यह उनके लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत राहत की बात है।

हालांकि लोकसभा में बहस के दौरान प्रस्तावित विधेयक पर कई तरह के सवाल उठाये गये। जिसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि तीन तलाक के खिलाफ तीन साल की सजा और हर्जाना दोनों का प्रावधान एक साथ करके सरकार ने कोई भ्रम पैदा कर दिया है। लेकिन ऐसा नहीं है। कानूनी पहलुओं से यह कदम उचित है। कैसे? आइये समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तीन तलाक को अवैध घोषित कर दिया है फिर भी लोग तलाक दिये जा रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए जरूरी था कि सरकार क्रिमिनल लॉ को इसमें जोड़ती क्योंकि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी तलाक दे रहे हैं वो सीधे सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं जो क्रिमिनल एक्ट बन जाता है।

लेेकिन इतने से मुस्लिम महिलाओं का हित सधता नहीं था इसलिए बच्चे की कस्टडी और हर्जा खर्चा का प्रावधान भी साथ में कर दिया ताकि अगर मुस्लिम महिला को उसका पति इसके बाद भी न रखना चाहे तो वह पत्नी को हर्जाना देने के लिए बाध्य हो।

एक बात और समझने लायक है। बहुत सारे मुस्लिम ये तर्क कर रहे हैं कि सरकार ने इंस्टन्ट ट्रिपल तलाक पर रोक लगाया है जबकि तीन महीने में एक एक तलाक बोलकर तलाक देने की व्यवस्था कायम रहेगी। क्योंकि कानून कह रहा है बोलकर, लिखकर या इलेक्ट्रानिक मीडियम से दिया जानेवाला तीन तलाक गैर कानूनी होगा। कानून में कहीं यह नहीं लिखा है कि वह तीन तलाक एक साथ बोलकर दिया जाएगा या तीन में एक-एक बार बोलकर दिया जाएगा। अगर कोई आदमी अपनी औरत को तीन महीने में एक एक बार बोलकर तलाक देता है तो भी यह कानून प्रभावी रहेगा।

इस्लाम में सिर्फ तीन बार बोलकर ही तलाक दिये जाने का प्रावधान है। वह एक साथ बोलकर दे दिया जाए या फिर तीन महीने में तीन बार बोलकर दिया जाए। और सरकार ने तीन बार तलाक बोलने को ही गैर कानूनी करार दे दिया है। चाहे वह एक बार में बोला जाए या फिर तीन महीने में। होगा वह गैर कानूनी ही। इसलिए जब भविष्य में अदालतों में इस कानून से जुड़े मामले आयेंगे तो यह तर्क महत्वपूर्ण हो जाएगा।

लेकिन अभी मुस्लिम महिलाओं को मोदी से और भी कई उम्मीदें हैं। मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि तीन तलाक पर रोक लगाने से जो राहत मिली है वह तब तक बेमतलब है जब तक चार शादी का विधान इस्लाम में प्रचलित है। इन महिलाओं का कहना है कि तीन तलाक पर रोक लगाने से चार शादियों का चलन बढ़ेगा जिसे रोकने के लिए जरूरी है कि भविष्य में सरकार इस बारे में भी पहल करे। कोई मुस्लिम तब तक दूसरी शादी न कर सके जब तक कि वह अपनी पहली पत्नी को वैधानिक रूप से तलाक न दे दे। इसके साथ ही मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक देने का अधिकार मिलना चाहिए। जब तक ये दो उपाय नहीं होते तीन तलाक रोकने से मुस्लिम महिलाओं की दुर्दशा में कोई खास सुधार नहीं आयेगा। मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद है कि उनके लिए मसीहा बनकर आये मोदी इस दिशा में भी जरूर पहल करेंगे।

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