संजय शरमन जोठे

दुनिया भर का इतिहास देख लीजिये, जब भी व्यापक पैमाने पर सभ्यतागत या नैतिक उत्थान या पतन हुआ है तो वो धर्मों के बदलाव से जुडा हुआ है. इस्लाम पूर्व काल का बर्बर समाज इस्लाम के आने के साथ सामाजिक, नैतिक रूप से एकदम से उंचाई छूने लगता है. उनकी सामाजिक राजनैतिक शक्ति दुनिया का नक्शा बदल डालती है. उनका वैचारिक और दार्शनिक फलक भी अचानक से विस्तार लेने लगता है.यूरोप में जीसस के साथ केथोलिक इसाई धर्म के साथ पूरे यूरोप की सामाजिक नैतिक चेतना एक छलांग लेती है. बाद में मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेंट इसाइयत की धारा बनाते हैं और यूरोप में पुनर्जागरण की शुरुआत होती है. आज का यूरोप अमेरिका और शेष दुनिया में छा गयी विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की चमक इसी पुनर्जागरण से आई है.

चीन कोरिया और जापान का इतिहास भी बौद्ध धर्म से जुडा हुआ है. कन्फ्युशियास और ताओ को छोड़कर बौद्ध धर्म में प्रवश करते ही उन्होंने अपने समाज और राष्ट्र को एक नयी उंचाई पर पंहुचा दिया था. इसके बाद उनमे गजब के बदलाव हुए थे. उनके वैचारिक और दार्शनिक बदलाव बौद्ध धर्म से जुड़े हुए हैं.
भारत के बर्बर और बलि-आहुति-यज्ञवादी प्राचीन कबीलाई धर्म से बौद्ध धर्म में प्रवेश करते ही प्राचीन भारत में एक सामाजिक नैतिक क्रान्ति होती है. बौद्ध काल का भारत ही वास्तव में वो भारत है जिसे पूरी दुनिया इतिहास और पुरातत्व में सम्मान से देखती है.

बौद्ध धर्म पर इस्लामिक और ब्राह्मणी आक्रमण के बाद भारत में बौद्ध धर्म के पतन के साथ ही भारत का सामाजिक और नैतिक पतन भी होता है. इसी सामाजिक, नैतिक और दार्शनिक पतन की स्थिति में भारत हजार साल तक बार बार गुलाम हुआ. भारत का वैचारिक, दार्शनिक और सभ्यतागत पतन असल में किसी अन्धविश्वासी और शोषक धर्म के हावी हो जाने की घटना से जुडा हुआ है, वो पतन अचानक कहीं आसमान से नहीं टपका है.इस शोषक धर्म के खिलाफ और लगातार हो रहे वैचारिक, सामाजिक, सभ्यतागत और नैतिक पतन को रोकने के लिए अब अंबेडकर भारत को नवयान बौद्ध धर्म देकर गये हैं. ये भारत के लिए मार्टिन लूथर भूमिका है.जो मित्र भारत में दलितों बहुजनों को बौद्ध धर्म में जाने की पहल को व्यर्थ की कवायद मानते हैं वे पहले अरब, यूरोप, दक्षिण एशिया, और खुद भारत में हुई सांस्कृतिक, सामाजिक नैतिक क्रांतियों का इतिहास पढ़ें.

सभी देशों समाजों में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक क्रान्ति एक नए धर्म के साथ आरंभ होती है. पुरानी अस्मिता और पुराने धर्म को छोड़े बिना कहीं भी बदलाव नहीं होता. हो भी नहीं सकता. पुरानी अस्मिताओ को छोड़ने का व्यापक कार्यक्रम ही धर्म बदलना है.व्यक्तिगत रूप से भी जब आप तरक्की करते हैं या स्वयं में बदलाव लाते हैं या सेल्फ इम्प्रूवमेंट करते हैं तो इस सेल्फ इम्प्रूवमेंट का अनिवार्य अर्थ पुराने सेल्फ से डिस्कनेक्ट करना ही होता है. पर्सनालिटी डेवलपमेंट के सिद्धांत भी इसी पर आधारित हैं.इसलिए अंबेडकर का दिया हुआ बौद्ध धर्म भारत के दलितों बहुजनों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सभ्य और समर्थ होने की दिशा में सबसे बड़ी देन है. भारत बुद्ध को अपनाएगा तो सभ्य और समर्थ होगा.

इसे अपने घर की दीवारों पर लिख कर रख लीजिये.बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भारत के दलित बहुजनों में बहुत तेजी से बदलाव होते हैं। ये बात सैकड़ों अनुसंधानों से सिध्द हो चुकी है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत सहित उत्तर प्रदेश में जो रिसर्च हुई हैं उन सबमे साफ जाहिर होता है कि ऊपर ऊपर ही नहीं बल्कि बहुत बुनियाद में बदलाव हो रहे हैं।
पहला सबसे बड़ा बदलाव ये हो रहा है कि बौद्ध धर्म अपनाते ही उनकी अपनी जातीय और धार्मिक पहचान से जुड़ी हीन भावना खत्म होने लगती है। वे पहली बार खुद को एक इंसान समझते हैं।दुसरीं बात ये कि उनके घरों से व्यर्थ के देवी देवता और शास्त्र बाहर निकल जाते हैं। धीरे धीरे ब्राह्मणवादी कर्मकांड जैसे मृत्युभोज, श्राध्द, दहेज इत्यादि जैसे असभ्य और खर्चीले व्यवहार बन्द होने से उनके घर मे धन बचने लगता है।तीसरा ये कि काल्पनिक भगवानों और उनकी कार्टून कथाओं से बच्चे आजाद हो जाते हैं। वे जिंदगी को सीधे और वैज्ञानिक ढंग से देखते हैं और उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होने लगता है। बच्चो में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगती है।चौथा ये कि वे नए रोजगार की तलाश करते हुए शिक्षा, प्रबन्धन, कौशल और तकनीक से जुड़े कई प्रयोग करने लगते हैं, इससे उनमे नया बल और स्पष्टता जन्म लेती है।पांचवा ये कि उनमे एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना जन्म लेती है जो उनमे आपस में सहयोग और सोशल नेटवर्किंग को बढ़ाती है। अब इसका एक अखिल भारतीय स्वरूप भी बन चुका है। इसका वैश्विक नेटवर्क भी पहले से ही मौजूद है।छठवां ये कि भारत के बौध्द अपनी प्रेरणाओं के लिए अरब या इटली पर निर्भर नहीं होते। बूद्ध और बौद्ध धर्म विशुद्ध भारतीय है। ये हमारा धर्म है। हम इसे आगे बढ़ाएंगे। इस कारण किसी दूर बैठे पोप या खलीफा से मार्गदर्शन नहीं लेना है। हमारे बूद्ध और अंबेडकर हमारे बीच मे बैठे हैं।
सातवां ये कि बूद्ध को मानने वाले कई देश हैं। आधे से ज्यादा एशिया सदियों से बुद्धमय हुआ बैठा है पश्चिमी देशों के बौद्धिक वर्ग में भी बुध्द का व्यापक प्रभाव है। वो समीकरण भी भारत को मदद करते हैं और आगे भी करेंगे।

ऐसे और सैकड़ो बिंदु हैं जो रिसर्च से निकलकर आये हैं।अब भारत के ओबीसी, दलीतों, आदिवासियों को इकट्ठे होकर एक देशव्यापी आंदोलन छेड़ देना है। बूद्ध के धर्म मे जाति, वर्ण और भेदभाव की कोई जगह नहीं है। जो बुराइयां पुराने अभ्यास की तरह गन्दी आदतों की तरह चली आती है उनका भी इलाज किया जा रहा है।
भारत के प्रबुद्ध और सभ्य होने का एकमात्र मार्ग बौद्ध धर्म से होकर गुजरता है। इस बात को पूरे भारत मे फैलाइए, ये बहुत बड़ा मिशन है और सभी बहुजनों पर एक बड़ी जिम्मेदारी है। अन्धविश्वास छोड़ें, बौद्ध आचार व्यवहार को खुद अपनाएं और दूसरों को प्रेरित करें। शरुआत अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं से करें।
एक सीनियर जर्मन प्रोफेसर ने अपने बीस साल के भारत में काम के अनुभव से बताया कि भारत के विश्वविद्यालयों कालेजों और रिसर्च संस्थानों में उन्हें हजारों लोग मिले जो बौद्ध धर्म अपना लेना चाहते हैं, लेकिन कोई संस्थागत ढांचा ही नहीं है इसे अमल में लाने का …