पुण्य प्रसून बाजपेयी

विकास की परिभाषा बदलने के लिये खड़ा हुआ है गुजरात का युवा!

गुजरात चुनाव में सड़कों पर अगर युवा नजर आने लगे हैं। तो उसके पीछे महज पाटीदार, दलित या ओबीसी आंदोलन नही है। और ना ही हार्दिक पटेल,अल्पेश या जिग्नेश के चेहरे भर है । दरअसल गुजरात का युवा जिस संकट से गुजर रहा है उसका सच महंगी शिक्षा और बेरोजगारी है। और छात्र-युवा के बीच के संकट को समझने के लिये पहले कालेजो की उस फेहरिस्त को समझें,जिसने गुजरात की समूची शिक्षा को ही निजी हाथों में सौंप दिया है। जिले दर जिले कालेज हो या यूनिवर्सिटी। टेक्निकल इस्टीट्यूट हो या फिर मेडिकल कालेज। कालेजों की समूची फेहरिस्त ही शिक्षा को इतना महंगा बना चुकी है कि गुजरात में हर परिवार के सामने दोहरा संकट है कि महंगी शिक्षा के साथ बच्चे पढ़ें। और पढ़ने के बाद नौकरी ही नहीं मिले। और गुजरात का सच ये है कि 91 डिप्लोमा कॉलेज प्राइवेट हैं। 21 में से 15 मेडिकल कालेज प्राइवेट है। दो दर्जन से ज्यादा यूनिवर्सिटी प्राइवेट है। और प्राइवेट कॉलेजो में शिक्षा महंगी कितनी ज्यादा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि सरकारी कालेज में एक हजार रुपये सेमेस्टर तो निजी डिप्लोमा कालेज में 41 हजार रुपये प्रति सेमेस्टर फीस है। इसी तरह निजी मेडिकल कालेजों में पढ़ा कर अगर कोई गुजराती अपने बच्चे को डाक्टर बनाना चाहता है तो उसे करोड़पति तो होना ही होगा। क्योंकि अंतर खासा है । मसलन सरकारी मेडिकल कालेज में 6 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । तो निजी मेडिकल कालेज में 3 से 6 लाख 38 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । और गुजरात के सरकारी मेडिकल कालेजो में 1080 छात्र तो निजी मेडिकल कालेज में 2300 छात्र पढाई कर रहे है । यानी मुस्किल सिर्फ इतनी नहीं है कि पढाई मंहगी हो चली है । फिर भी मां बाप बच्चो को पढा रहे है । मुश्किल तो ये भी है मंहगी पढाई के बाद रोजगार ही नहीं है । हालात कितने बदतर है ये इससे भी समझा जा सकता है कि प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेजों में 25 से 30 हजार सीट खाली हैं । खाली इसलिये हैं क्योंकि डिग्री के बाद भी रोजगार नहीं है । सरकार का ही आंकडा कहता है कि 2014-15 में 20 लाख युवा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं ।

तो गुजरात की चुनावी राजनीति में ऊपर से हार्दिक पटेल , जिगनेश या अल्पेश के जरीये जातियों में बंटी राजनीति नजर आ सकती है लेकिन गुजरात के राजनीतिक इतिहास में ये भी पहली बार है कि जातियों में राजनीति बंट नहीं रही है बल्कि जातियों में बंटा समाज विकास के नाम पर ही एकजुट हो रहा है । यानी विकास का जो सवाल गुजरात जाकर मोदी उठा रहे हैं । विकास के इसी सवाल को गुजराती भी उठा रहा है । यानी सवाल कांग्रेस की राजनीति का नहीं बल्कि गुजरात के विकास मॉडल का है, जहां हर परिवार के सामने संकट बीतते वक्त के साथ गहरा रहा है । तो विकास के नाम पर गुजरात के चुनाव में विकास का बुलबुला इसलीलिये फूट रहा है क्योंकि एक तरफ गुजरात के रजिस्ट्रड बेरोजगारो की तादाद बीते 15 बरस में 20 लाख बढ़ गई । और दूसरी तरफ मनरेगा के तहत जाब कार्ड ना मिल पाने वालों की तादाद 31 लाख 65 हजार की है । और यही वह सवाल है जो विकास को लेकर मंच से जमीन तक पर गूंज रहा है । यानी राहुल गांधी कहते हैं कि विकास पगल हो गया है तो मोदी जवाब देते है कि मैं ही विकास हूं। यकीनन लड़ाई विकास को लेकर ही है । क्योंकि विकास के दायरे में अगर रोजगार नहीं है तो फिर छात्र-युवा और मनरेगा के बेरोजगारो के सामने संकट तो है । दरअसल 2016-17 का ही गुजरात का मनरेगा का आंकडा कहता है 3,47,000 लोगों ने मनरेगा जाब कार्ड के लिये अप्लाई किया और उसमें से सिर्फ 1,35, 000 लोगों को जाब कार्ड मिला । और जिन 39 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम भी मिला तो वह भी सिर्फ 19 दिनों का ही मिला ।

यानी काम 100 दिनों का देने की स्थिति में भी सरकार नहीं है । और मनरेगा के तहत ही बीते दस बरस में 38,45,000 में से 6,80,000 लोगों को ही काम मिला ।यानी रोजगार का संकट सिर्फ शहरों तक सीमित है ऐसा भी नहीं । मुश्किल ग्रामीण इलाको में कही ज्यादा है। और अगर विकास का कोई मंत्र रोजगार ही दिला पाने में सत्रम हो नहीं पाया है तो समझना गुजरात के उस समाज को भी होगा जहा कमोवेश हर तबका पढाई करता है । दलितों में भी 70 फिसदी साक्षरता है । पर शिक्षा कैसे महंगी होती चली गई और कैसे काम किसी के पास बच नहीं रहा है ये इससे भी समझा जा सकता है 60 फिसदी से ज्यादा बच्चे 12 वी से पहले ही पढाई छोड देते है । मसलन , 2006 में 15,83,000 बच्चो ने पहली में दाखिला लिया । 2017 में 11,80,000 छात्र दसवी की परिक्षा में बैठे । यानी करीब 4 लाख बच्चे दसवीं की पढाई तक पढ नहीं सके । और –मार्च 2017 में 12वी की परिक्षा 5,30,000 बच्चों ने दी । यानी हायर एजडूकेशन तक भी साढे छह लाख बच्चों ने पढाई छोड़ दी । तो गुजरात चुनाव का ये रास्ता ऐसे मोड़ पर जा खडा हुआ है जहां पहली बार जातियों में टकराव नहीं है । विकास की मोदी परिभाषा के सामानांतर हर गुजराती विकास की परिभाषा को अपनी मुश्किलो को खत्म करने से जोडना चाह रहा है । और ये हालात गुजरात में अगर राजनीतिक तौर पर कोई नया परिमाम देते है तो मान कर चलिये 2019 का रास्ता भी उस इकनामी से टकरायेगा जहां जाति – धर्म में बांटने वाली राजनीति नहीं चलेगी और जन समस्या एकजुट होकर नया रास्ता निकालेगी ।

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One thought on “विकास की परिभाषा बदलने के लिये खड़ा हुआ है गुजरात का युवा!

  1. सिकंदर हयात

    Narendra Nath
    11 hrs ·
    मेरा विरोध मोदी सरकार से नहीं बल्कि उसे इमानदार और बाकी सब को करप्ट,उसे देशभक्त और बाकी सब को देशद्रोही बता देने से है। जबकि जब भी नजदीकी तौर से इन सबकी करतूत देखता हूं तो कड़वी हकीकत दिखती है-सब मिले हुए हैं जी। हमाम में सब नंगे हैं।
    इसकी एक और मजबूत वजह पढ़ें जो कहानी अचानक याद एक घटना से याद आ गयी-
    अभी एक दिन पहले खरबों के घोटाले के अभियुक्त तेलगी की लंबी बीमारी से माैत हो गयी। वही तेलगी जिसने सिस्टम को ठेंगा दिखाया था। याद करें,जब जांच हुई तो देश के एक बहुत ही सीनियर और सर्वहारा नेता का इसमें सामने आया। तेलगी ने जांच में नाम लिया भी।
    उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वोरा कमिटी बनी थी। उसने राजनीति-अपराधी-अफसर और बाकी एलीट सोसइटी के गठजोड़ पर पर एक बहुत खतरनाक रिपोर्ट दी थी। इसमें भी उस सर्वहारा राजनेता का सबसे खुलकर आया।
    दाऊद से जुड़े मामले में नाम आया।
    पॉवर सर्किल में आज तक इसे सामान्य झान के सबसे आसान सवाल के रूप में सभी जवाब जानते हैं कि अगर ब्लैक मनी छुपानी है तो देश में सबसे सुरक्षित ठिकाना किनके यहां है।
    लेकिन उस राजनेता का कभी कुछ नहीं हुअर। न तब।न अब। पिछली सरकार ने पद्मश्री तो इस सरकार ने पद्म विभूषण दे दिया। क्या पता कल यही सरकार भारत रत्न भी दे।क्योंकि कल सोनिया के पसंदीदा वे थे आज वह मोदी के पसंदीदा था। करप्शन का केंद्र बिंदु इंच नहीं घिसका। न उसकी हनक में कमी अायी। जब चाहें, आंख मूंद कर प्याज,चीनी की कीमत उठा-गिरा दें।
    यह सब नजदीक से देखता हूं। और आप कहते हैं कि मान लें सिस्टम बदल गया और बड़ा दावा करने लगते हैं तो मुझे आपकी खुशफहमी पर कभी-कभी दया भी आती है।Om Thanvi
    15 mins ·
    अच्छी पोस्ट। ब्लैकमेल करने वाला 1000 कापी क्यों बनवाएगा? जो तकनीक का विशेषज्ञ हो, वह उसे ऐसे ही वायरल कर देगा। अगर वह किसी पार्टी के लिए काम कर रह रहा है (जैसा कि आरोप है) तो वह ब्लैकमेल में पैसा लेकर वैसी सीडी दबने-छुपने क्यों देगा? फिर, जो सीडी और लोगों के पास भी है उसके नाम पर कोई किसी नेता को ब्लैकमेल करने की सोचेगा भी कैसे? ब्लैकमेल का फ़ोन किसने किसको किया, यह भी पुलिस ने अब तक नहीं बताया है।
    प्रदेश भाजपा आइटी सेल के किसी कार्यकर्ता ने एफआइआर की है। उसकी शिकायत पर पुलिस उसी रात दिल्ली चल पड़ी? लाजपत नगर की कथित दुकान का पता किसने दिया? दुकानदार और कापी कराने वाला तो देने से रहा? आजकल ऐसी कापी कराने क्या विशेषज्ञ लोग बाज़ार जाते हैं? दस दिन लगें, तब भी करेंगे ख़ुद। अगर करना हो। और सीडी पर नहीं, पेन ड्राइव पर कापी करेंगे। बाक़ी जानकार लोग इस पेच पर और रोशनी डाल सकते हैं।
    See Translation

    Dilip Khan
    7 hrs ·
    वसूली, रंगदारी और फिरौती के मामले में पुलिस सबसे पहले ये बताती है कि फलाने आदमी फलाने से इतनी रकम मांग रहा था।

    Sudhir Chaudhary जब जिंदल मामले में फंसा था और तिहाड़ जेल गया तो सबको पता था कि सुधीर चौधरी ने नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी है।
    Vinod Verma के मामले में अब तक रकम की कहीं कोई बात ही नहीं हुई है। पुलिस को उठाना था, पुलिस उठा ले गई।
    अब शोर सुनकर कल-परसों रकम भी गिना देगी कुछ। टेक्नोलॉजी के ज़माने में कोई 1000 सीडी बनाकर रखता है क्या? विनोद जी डिजिटल एडिटर रह चुके हैं। उन्हें तकनीक की समझदारी है।
    पुलिस का कोई भी दावा सटीक नहीं है। जिस व्यक्ति से ब्लैकमेलिंग करने की बात कही गई, वही पुलिस के दावे को नकार रहा है।–
    सुने कि राजेश पूणत की सीडी पहले सो पब्लिक डोमेन में है। ऐसे में विनोद जी क्यों उनको फोन करेंगे? झूठी पुलिस, डरपोक सरकार ———————————————————————- संघ का अंडर कवर पत्रकार तिवारी जहा विनोद वर्मा को कांग्रेस का आदमी सा कुछ बता रहा था डिलीट वही थानवी चौहान और कायस्त लिखते हे !Om Thanvi added 4 new photos.8 hrs · कांग्रेस का दलाल आजकल हर उस पत्रकार को कहा जाता है, जो भाजपा का आलोचक हो। विनोद वर्मा की फ़ेसबुक वॉल को मैंने आज सिरे से टटोला। दलाल कहने वालों पर तरस ही आया। हाँ, छत्तीसगढ़ के नेताओं और पुलिस के प्रति उनकी अनेक पोस्ट हैं। पत्रकार बिरादरी के बारे में भी। उनकी निर्ममता देख अब लगता है कि जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह कम से कम विनोदजी को बहुत हैरान न करता होगा। देखें, उनकी चार पोस्ट की झलक।Vikram Singh Chauhan
    11 hrs ·
    पत्रकारों की गिरफ़्तारी किसी चोर उच्चके के गिरफ़्तारी से भी आसान है। घर गए और रात को बिस्तर से उठा लिया जैसे रात में किसी का मर्डर करके आया था पत्रकार। न कहीं कोई एफआईआर और न किसी अनुमति की जरूरत। विनोद वर्मा के पास मौजूद सीडी ओरिजिनल होगी तब भी इनके कोर्ट ,इनकी पुलिस इनके लैब इस सीडी को फेक ठहरा देगी। अब किसी जाँच संस्था में यकीन करने के दिन नहीं रहे हैं। अख़लाक़ के थैले में बकरा था ,शुरू में लैब ने भी बताया बकरा था ,बाद में वो बीफ हो गया और अब पूरे परिवार पर गौ हत्या का मामला चल रहा है। आप बीबीसी में काम कर रहे हो या सीएनएन में ,आप बड़े पत्रकार हो ,आपकी अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता हैं इससे वर्तमान भाजपा सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। अब तो आप उनके अदने से कार्यकर्ता के ऊपर भी ऊँगली नहीं उठा सकते। मैंने इस दिन की कल्पना तभी कर लिया था जब मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाने की घोषणा की थी। पहले भाजपा के लोग दूसरों के सीडी बनाते थे अब उनके बनने लगे हैं। मोदी की डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा लाभ अब देखने को मिल रहा है। देश की जनता अब किसी भी वीडियो को देखकर तुरंत बता देती है ये फेक है या असली। इसके लिए किसी लैब की जरूरत नहीं रह गई है।—————————————-Rakesh Kayasth
    Yesterday at 08:32 ·
    पत्रकार के तौर पर मैं विनोद वर्मा को लंबे समय से जानता हूं। मेरे परिचय उस वक्त से है, जब वर्माजी दिल्ली में मध्य प्रदेश से निकलने वाले अखबार देशबंधु अखबार के ब्यूरो चीफ हुआ करते थे। मैने उन्हे हमेशा एक संजीदा, संवेदनशील और गहरी साहित्यिक अभिरूचि वाले व्यक्ति के तौर पर जाना है। आज सुबह-सुबह उन्हे हिरासत में लिये जाने की ख़बर आई तो मैं हतप्रभ रह गया।
    विनोद वर्मा हिंदी के कई बड़े संस्थानों में संपादक रह चुके हैं। बीबीसी लंदन से भी वे लंबे समय तक जुड़े रहे हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक सवालों के साथ मानवाधिकार संबंधित मुद्धों में भी उनकी गहरी रुचि रही है। ख़बर है कि छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम विशेष रूप से गाजियाबाद आई और यूपी पुलिस की मदद से उन्हे हिरासत में लिया गया। उनके पास छत्तीसगढ़ के किसी नेता की आपत्तिजनक सीडी होने की बात कही जा रही है।
    आपत्तिजनक शब्द एक बहुत ही रिलेटिव टर्म है। अंग्रेजी के मशहूर लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा है- ख़बर वह नहीं होती है, जो हर कोई बताना चाहता है। ख़बर वह होती है, जिसे छिपाने की कोशिश की जाती है।
    सीडी में क्या था, नेता कौन है, छत्तीसगढ़ पुलिस का आरोप क्या है। इन बातों की मुझे कोई जानकारी नहीं है। इसलिए मैं इन बातों पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। लेकिन पहली नज़र में यह एक सम्मानित पत्रकार के उत्पीड़न का मामला लगता है, इसलिए मैं खुलकर अपना विरोध दर्ज करना चाहता हूं।
    छत्तीसगढ़ सरकार को इस मामले पारदर्शिता दिखाते हुए बताना चाहिए उसका पक्ष क्या है और सुबह चार बजे असंदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड वाले एक पत्रकार के घर छापा मारकर उसे हिरासत में क्यों लिया गया।
    यह ठीक है कि पत्रकार बिरादरी अब पूरी तरह बंट चुकी है। लेकिन सरकारी तंत्र के हावी होने का समर्थन किसी भी आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। सरकारे आती और जाती रहेंगी लेकिन इंस्टीट्यूशन के तौर पर मीडिया हमेशा रहेगा। मैं उम्मीद करता हूं कि पत्रकार समुदाय इस घटना पर एकजुटता दिखाएगा।

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