इस महीने की 5 तारीख को अमित शाह अपना केरल दौरा छोड़कर अचानक दिल्ली पहुंचे। किसलिए? तो मोदी और अरुण जेटली से जीएसटी पर चर्चा करने। इस मीटिंग के बाद सरकार ने जीएसटी कानूनों में कुछ बदलावों की घोषणाएं कीं। वे घोषणाएं क्या थीं, उनका यहां ज़िक़्र करना ज़रूरी नहीं है। हां, यह ज़ाहिर है कि उनका मक़सद था कि जीएसटी को लेकर व्यापारियों में, खासकर गुजरात के व्यापारियों में जो गुस्सा उभर रहा था, उसे शांत किया जाए।

सोचता हूं, अमित शाह ने इस मीटिंग में साहेब से क्या कहा होगा। यदि अमित शाह, अमर सिंह होते तो शायद यही कहते, ‘दलितों की पिटाई से डर नहीं लगता साहेब, किसानों की आत्महत्या से भी डर नहीं लगता साहेब, मुसलमानों की हत्या से तो बिल्कुल डर नहीं लगता साहेब, बेरोज़गारों की उम्मीदों को मरते देख भी डर नहीं लगता साहेब… लेकिन गुजरात के वेपारियों के गुस्से से बहुत डर लगता है…’

यह सही है। 2014 में सत्ता में आने के बाद मैंने पहली बार मोदी सरकार और उनकी टीम को इस कदर भयभीत अवस्था में देखा है। आखिर क्यों भयभीत हैं मोदी और बीजेपी? क्या हार के डर से? लेकिन माना तो यह जाता है कि गुजरात में मोदी और बीजेपी को कोई नहीं हरा सकता और यह हम पिछले कई सालों के चुनावों में देख चुके हैं। 2012 और 2014 के वोट प्रतिशत के आंकड़े देखें तो बीजेपी और कांग्रेस में मीलों का फ़ासला है। तो फिर क्यों डर गए मोदी और अमित शाह?

डर इसलिए गए कि इस बार जो तबका नाराज़ है, वह बीजेपी का खासमखास है। वही बीजेपी का वोटबैंक भी है और नोटबैंक भी। दुनिया इधर से उधर चली जाए लेकिन व्यापारी तबका बीजेपी से इतर नहीं जाता। कारण भी है, पिछले 70 सालों से बीजेपी और उसके पूर्ववर्ती अवतार व्यापारियों के गलत-सही हितों में ही काम करते रहे हैं और इसीलिए उसे इनसे हर प्रकार का सपोर्ट मिलता रहा है लेकिन पिछले एक साल में मोदी सरकार ने दो काम किए हैं। एक तो नोटबंदी और दूसरे जीएसटी। दोनों के उद्देश्य बेहतर थे। नोटबंदी से व्यापारियों को उतना फ़र्क पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता क्योंकि सारा काला पैसा बैंकों में जमा होकर वाइट हो चुका है। (पढ़ें ब्लॉग– नोटबंदी का जादू चल गया, काला धन सफ़ेद में बदल गया) लेकिन जीएसटी ने उनकी कमर तोड़ दी है। वे जो अपने व्यापार का असली टर्नओवर छुपाते थे और उसपर टैक्स नहीं देते थे, उसपर अब खतरा मंडरा रहा है और इसी कारण व्यापारी नाराज़ हैं।

कोई वाकई ईमानदार और निडर किस्म का नेता होता तो इस मामले में क्या करता? वह डटा रहता कि चाहे जो हो जाए, हम भ्रष्टाचार को खत्म करके रहेंगे लेकिन मोदी जी जो कह और कर रहे हैं, वह उनकी घबराहट को ही दर्शाता है। वह गुजरात में जाकर कह रहे हैं कि जीएसटी हम नहीं लाए, यह तो राज्य सरकारों का फैसला है और केंद्र सरकार की भूमिका तो बहुत छोटी है। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को भी बराबरी का भागीदार बताया। अरे वाह, कल तक जीएसटी पर विशेष अधिवेशन बुलाकर उसे ऐतिहासिक घटना बतानेवाले आज कह रहे हैं, हमने कुछ नहीं किया। मोदी जी से ऐसी उम्मीद नहीं थी खासकर तब जब वह पार्टी के शीर्ष मंच पर जाकर यह बोलते पाए गए हैं कि पार्टी को चुनावों से आगे बढ़कर सोचना चाहिए। यदि मोदी जीएसटी पर डटे रहते भले ही इस कारण वह गुजरात चुनाव हार जाते तो मेरी नज़र में उनका सम्मान कई गुना बढ़ जाता।

मोदी सरकार व्यापारियों की नाराज़गी से घबराई हुई है, यह जानकारी मुझे बीजेपी के अंदरूनी सॉर्स से ही मिल गई थी। अहमदाबाद में रहनेवाले मेरे एक पारिवारिक दोस्त ने पिछले महीने इसकी पुष्टि की थी। वह खुद बीजेपी में हैं और अमित शाह के क़रीबी रह चुके हैं। किस पद पर हैं, यह नहीं बताऊंगा वरना उसको मुश्किल हो जाएगी। उसने व्यापारियों की नाराज़गी की चर्चा करते हुए मुझसे पूछा भी था कि मीडिया का क्या सोचना है गुजरात चुनाव के परिणामों पर। मैंने कहा, ‘मैं दिल्ली में रहकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता। मेरे पास तो केवल आंकड़े हैं और कुछ सूचनाएं हैं। इनमें एक आंकड़ा बीजेपी के पक्ष में हैं और दूसरा आंकड़ा कांग्रेस के पक्ष में और तीसरा आंकड़ा दोनों को बराबरी का चांस देता है। मैंने कहा, ‘2012 के चुनावों की बात करें तो बीजेपी को तब 47 और कांग्रेस को 38 प्रतिशत वोट मिले थे। सामान्यतः सरकार से नाराज़गी के चलते 5 प्रतिशत वोटर अपना पक्ष बदलते हैं। यदि इस बार के चुनाव में ऐसा हुआ तो कांग्रेस 43 प्रतिशत पर और बीजेपी 42 प्रतिशत पर आ जाएगी। यानी मामला बराबरी पर आ जाएगा और कोई भी पार्टी मामूली बढ़त से चुनाव जीत सकती है।

‘लेकिन 2012 के बाद 2014 में भी चुनाव हुए हैं और तब के नंबर बहुत अलग हैं। बीजेपी को 60 प्रतिशत वोटरों का समर्थन मिला और कांग्रेस समर्थकों का प्रतिशत घटकर 34 प्रतिशत पर आ गया। अगर इन आंकड़ों में 5 या 10 प्रतिशत का फेरबदल हो तो भी परिणामों में खास अंतर नहीं आएगा और बीजेपी अच्छी तरह से जीत जाएगी।

‘इस बीच एक और चुनाव हुए हैं 2015 में और यह जनता के मूड का नवीनतम आईना हैं। वे थे पंचायत और शहरी निकाय चुनाव। इन चुनावों में गांवों में कांग्रेस को ज़बरदस्त सफलता मिली थी और उसने 31 में से 23 जिला पंचायतों में जीत हासिल की थी। बताते हैं कि बीजेपी की पिछले दस साल में इतनी दुर्गति नहीं हुई थी। यदि जनता का मूड वैसा रहा जैसा 2015 में था तो भी कांग्रेस की जीत की संभावनाएं हैं।’

इन आंकड़ों के इतर पटेलों का आरक्षण आंदोलन, दलितों के साथ हिंसा और जीएसटी पर व्यापारियों की नाराज़गी आदि ऐसे मुद्दे हैं जो ताश में जोकर के पत्ते की तरह हैं। ये जोकर क्या गुल खिलाएंगे, यह अभी से कहना मुश्किल है। खासकर तब जब गेम में सबसे बड़ा कार्ड प्लेयर खुद अमित शाह पत्ते बांट रहो हो। अमित शाह ने 2016 में नितिन पटेल की जगह विपिन रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाने के अपने फैसले पर मोदी की सहमति लेते वक्त उनसे कहा था, ‘आपको गुजरात का अगला चुनाव जीतना है ना? वह मैं जिता दूंगा।’

अमित शाह चालों और तिकड़मों के शहंशाह हैं, यह बात देश ने 2014 से पहले और उसके बाद भी कई बार देखी लेकिन मेरे उस बीजेपी वाले दोस्त ने बहुत पहले ही कह दिया था, ‘जैसे कहानियों में हम सुनते थे कि किसी राक्षस की जान एक तोते में है, वैसे ही मोदी की जान अमित शाह के हाथों में है। पार्टी चलाने, उसके लिए पैसा जुटाने और चुनाव जिताने का सारा काम मोदी ने अमित शाह के हाथों में सौंप रखा है, वह चाहे जिस तरह करें। साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेकर किसे चुनाव में बिठाना है, किसे खड़ा करना है, किसे लड़ाना है, यह सब अमित शाह सालों से करते आए हैं। मोदी तो केवल भाषण देते हैं और भीड़ इकट्ठा करते हैं। सारी ज़मीनी तिकड़म तो अमित शाह के कंधों पर है।’

लेकिन वही तिकड़मी अमित शाह आज परेशान हैं। परेशान हैं गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी से। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी संभावना कम है कि बीजेपी से नाराज़ गुजरात के व्यापारी इस बार कांग्रेस के साथ चले जाएंगे। यदि ऐसा हो तब तो कांग्रेस की स्थिति बहुत ही अच्छी हो जाएगी लेकिन जैसा कि लेखक आकार पटेल ने टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने ताज़ा ब्लॉग में लिखा है, ‘पंजाब की चंद हिंदू बहुमत वाली सीटों में से एक, गुरदासपुर लोकसभा सीट में बीजेपी को इस बार मुंह की खानी पड़ी जबकि पिछले दो दशकों से वह यहां से जीत रही थी। इस हार का एक कारण शायद यह रहा कि अच्छे दिनों के वादे से मायूस कई लोगों ने इस बार वोट ही नहीं डाला। गुजरात में भी इस बार यह हो सकता है।’

दूसरे शब्दों में बीजेपी सरकारों से नाराज़ व्यापारी तबका हो सकता है कि इस बार वोट (और नोट भी) न दें। नोटों की चिंता बीजेपी को नहीं है, वे तो देशभर और विदेश से भी आ जाएंगे लेकिन बीजेपी का कोर वोट बैंक यदि वोट न दे तो पार्टी का वोट शेयर गिरना लाज़मी है। इसका सीधा असर बीजेपी को मिलनेवाली सीटों पर पड़ेगा। अमित शाह अपने इन नाराज़ समर्थकों को मनाने में कामयाब हुए हैं या नहीं, यह आप नरेंद्र मोदी और अन्य बीजेपी नेताओं के आनेवाले दिनों के भाषणों से भी जान सकते हैं। यदि मोदी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की तारीफों के पुल बांधने और कांग्रेस को गलियाने तक सीमित रहे तो समझिए, बीजेपी के लिए मामला आसान है लेकिन यदि बीच में हिंदू-मुसलमान आया तो मानना होगा कि पार्टी को विजय की राह में कुछ भारी अड़चन दिख रही है और इस अड़चन को दूर करने के लिए बीजेपी ने सांप्रदायिकता के ब्रह्मास्त्र को चलाने का फैसला कर लिया है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में भी जब बीजेपी को हार नज़र आने लगी तो प्रधानमंत्री ने विकास मंत्र की जगह बीफ मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया था। गुजरात में भी आगे के कुछ महीने इस मामले में दिशासूचक होंगे।

https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ekla-chalo/amit-shah-and-bjp-are-very-afraid-of-businessmen-of-gujarat/