नीरेंद्र नागर

अमित शाह: गुजरात के वेपारियों से बहुत डर लगता है साहेब!

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इस महीने की 5 तारीख को अमित शाह अपना केरल दौरा छोड़कर अचानक दिल्ली पहुंचे। किसलिए? तो मोदी और अरुण जेटली से जीएसटी पर चर्चा करने। इस मीटिंग के बाद सरकार ने जीएसटी कानूनों में कुछ बदलावों की घोषणाएं कीं। वे घोषणाएं क्या थीं, उनका यहां ज़िक़्र करना ज़रूरी नहीं है। हां, यह ज़ाहिर है कि उनका मक़सद था कि जीएसटी को लेकर व्यापारियों में, खासकर गुजरात के व्यापारियों में जो गुस्सा उभर रहा था, उसे शांत किया जाए।

सोचता हूं, अमित शाह ने इस मीटिंग में साहेब से क्या कहा होगा। यदि अमित शाह, अमर सिंह होते तो शायद यही कहते, ‘दलितों की पिटाई से डर नहीं लगता साहेब, किसानों की आत्महत्या से भी डर नहीं लगता साहेब, मुसलमानों की हत्या से तो बिल्कुल डर नहीं लगता साहेब, बेरोज़गारों की उम्मीदों को मरते देख भी डर नहीं लगता साहेब… लेकिन गुजरात के वेपारियों के गुस्से से बहुत डर लगता है…’

यह सही है। 2014 में सत्ता में आने के बाद मैंने पहली बार मोदी सरकार और उनकी टीम को इस कदर भयभीत अवस्था में देखा है। आखिर क्यों भयभीत हैं मोदी और बीजेपी? क्या हार के डर से? लेकिन माना तो यह जाता है कि गुजरात में मोदी और बीजेपी को कोई नहीं हरा सकता और यह हम पिछले कई सालों के चुनावों में देख चुके हैं। 2012 और 2014 के वोट प्रतिशत के आंकड़े देखें तो बीजेपी और कांग्रेस में मीलों का फ़ासला है। तो फिर क्यों डर गए मोदी और अमित शाह?

डर इसलिए गए कि इस बार जो तबका नाराज़ है, वह बीजेपी का खासमखास है। वही बीजेपी का वोटबैंक भी है और नोटबैंक भी। दुनिया इधर से उधर चली जाए लेकिन व्यापारी तबका बीजेपी से इतर नहीं जाता। कारण भी है, पिछले 70 सालों से बीजेपी और उसके पूर्ववर्ती अवतार व्यापारियों के गलत-सही हितों में ही काम करते रहे हैं और इसीलिए उसे इनसे हर प्रकार का सपोर्ट मिलता रहा है लेकिन पिछले एक साल में मोदी सरकार ने दो काम किए हैं। एक तो नोटबंदी और दूसरे जीएसटी। दोनों के उद्देश्य बेहतर थे। नोटबंदी से व्यापारियों को उतना फ़र्क पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता क्योंकि सारा काला पैसा बैंकों में जमा होकर वाइट हो चुका है। (पढ़ें ब्लॉग– नोटबंदी का जादू चल गया, काला धन सफ़ेद में बदल गया) लेकिन जीएसटी ने उनकी कमर तोड़ दी है। वे जो अपने व्यापार का असली टर्नओवर छुपाते थे और उसपर टैक्स नहीं देते थे, उसपर अब खतरा मंडरा रहा है और इसी कारण व्यापारी नाराज़ हैं।

कोई वाकई ईमानदार और निडर किस्म का नेता होता तो इस मामले में क्या करता? वह डटा रहता कि चाहे जो हो जाए, हम भ्रष्टाचार को खत्म करके रहेंगे लेकिन मोदी जी जो कह और कर रहे हैं, वह उनकी घबराहट को ही दर्शाता है। वह गुजरात में जाकर कह रहे हैं कि जीएसटी हम नहीं लाए, यह तो राज्य सरकारों का फैसला है और केंद्र सरकार की भूमिका तो बहुत छोटी है। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को भी बराबरी का भागीदार बताया। अरे वाह, कल तक जीएसटी पर विशेष अधिवेशन बुलाकर उसे ऐतिहासिक घटना बतानेवाले आज कह रहे हैं, हमने कुछ नहीं किया। मोदी जी से ऐसी उम्मीद नहीं थी खासकर तब जब वह पार्टी के शीर्ष मंच पर जाकर यह बोलते पाए गए हैं कि पार्टी को चुनावों से आगे बढ़कर सोचना चाहिए। यदि मोदी जीएसटी पर डटे रहते भले ही इस कारण वह गुजरात चुनाव हार जाते तो मेरी नज़र में उनका सम्मान कई गुना बढ़ जाता।

मोदी सरकार व्यापारियों की नाराज़गी से घबराई हुई है, यह जानकारी मुझे बीजेपी के अंदरूनी सॉर्स से ही मिल गई थी। अहमदाबाद में रहनेवाले मेरे एक पारिवारिक दोस्त ने पिछले महीने इसकी पुष्टि की थी। वह खुद बीजेपी में हैं और अमित शाह के क़रीबी रह चुके हैं। किस पद पर हैं, यह नहीं बताऊंगा वरना उसको मुश्किल हो जाएगी। उसने व्यापारियों की नाराज़गी की चर्चा करते हुए मुझसे पूछा भी था कि मीडिया का क्या सोचना है गुजरात चुनाव के परिणामों पर। मैंने कहा, ‘मैं दिल्ली में रहकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता। मेरे पास तो केवल आंकड़े हैं और कुछ सूचनाएं हैं। इनमें एक आंकड़ा बीजेपी के पक्ष में हैं और दूसरा आंकड़ा कांग्रेस के पक्ष में और तीसरा आंकड़ा दोनों को बराबरी का चांस देता है। मैंने कहा, ‘2012 के चुनावों की बात करें तो बीजेपी को तब 47 और कांग्रेस को 38 प्रतिशत वोट मिले थे। सामान्यतः सरकार से नाराज़गी के चलते 5 प्रतिशत वोटर अपना पक्ष बदलते हैं। यदि इस बार के चुनाव में ऐसा हुआ तो कांग्रेस 43 प्रतिशत पर और बीजेपी 42 प्रतिशत पर आ जाएगी। यानी मामला बराबरी पर आ जाएगा और कोई भी पार्टी मामूली बढ़त से चुनाव जीत सकती है।

‘लेकिन 2012 के बाद 2014 में भी चुनाव हुए हैं और तब के नंबर बहुत अलग हैं। बीजेपी को 60 प्रतिशत वोटरों का समर्थन मिला और कांग्रेस समर्थकों का प्रतिशत घटकर 34 प्रतिशत पर आ गया। अगर इन आंकड़ों में 5 या 10 प्रतिशत का फेरबदल हो तो भी परिणामों में खास अंतर नहीं आएगा और बीजेपी अच्छी तरह से जीत जाएगी।

‘इस बीच एक और चुनाव हुए हैं 2015 में और यह जनता के मूड का नवीनतम आईना हैं। वे थे पंचायत और शहरी निकाय चुनाव। इन चुनावों में गांवों में कांग्रेस को ज़बरदस्त सफलता मिली थी और उसने 31 में से 23 जिला पंचायतों में जीत हासिल की थी। बताते हैं कि बीजेपी की पिछले दस साल में इतनी दुर्गति नहीं हुई थी। यदि जनता का मूड वैसा रहा जैसा 2015 में था तो भी कांग्रेस की जीत की संभावनाएं हैं।’

इन आंकड़ों के इतर पटेलों का आरक्षण आंदोलन, दलितों के साथ हिंसा और जीएसटी पर व्यापारियों की नाराज़गी आदि ऐसे मुद्दे हैं जो ताश में जोकर के पत्ते की तरह हैं। ये जोकर क्या गुल खिलाएंगे, यह अभी से कहना मुश्किल है। खासकर तब जब गेम में सबसे बड़ा कार्ड प्लेयर खुद अमित शाह पत्ते बांट रहो हो। अमित शाह ने 2016 में नितिन पटेल की जगह विपिन रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाने के अपने फैसले पर मोदी की सहमति लेते वक्त उनसे कहा था, ‘आपको गुजरात का अगला चुनाव जीतना है ना? वह मैं जिता दूंगा।’

अमित शाह चालों और तिकड़मों के शहंशाह हैं, यह बात देश ने 2014 से पहले और उसके बाद भी कई बार देखी लेकिन मेरे उस बीजेपी वाले दोस्त ने बहुत पहले ही कह दिया था, ‘जैसे कहानियों में हम सुनते थे कि किसी राक्षस की जान एक तोते में है, वैसे ही मोदी की जान अमित शाह के हाथों में है। पार्टी चलाने, उसके लिए पैसा जुटाने और चुनाव जिताने का सारा काम मोदी ने अमित शाह के हाथों में सौंप रखा है, वह चाहे जिस तरह करें। साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेकर किसे चुनाव में बिठाना है, किसे खड़ा करना है, किसे लड़ाना है, यह सब अमित शाह सालों से करते आए हैं। मोदी तो केवल भाषण देते हैं और भीड़ इकट्ठा करते हैं। सारी ज़मीनी तिकड़म तो अमित शाह के कंधों पर है।’

लेकिन वही तिकड़मी अमित शाह आज परेशान हैं। परेशान हैं गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी से। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी संभावना कम है कि बीजेपी से नाराज़ गुजरात के व्यापारी इस बार कांग्रेस के साथ चले जाएंगे। यदि ऐसा हो तब तो कांग्रेस की स्थिति बहुत ही अच्छी हो जाएगी लेकिन जैसा कि लेखक आकार पटेल ने टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने ताज़ा ब्लॉग में लिखा है, ‘पंजाब की चंद हिंदू बहुमत वाली सीटों में से एक, गुरदासपुर लोकसभा सीट में बीजेपी को इस बार मुंह की खानी पड़ी जबकि पिछले दो दशकों से वह यहां से जीत रही थी। इस हार का एक कारण शायद यह रहा कि अच्छे दिनों के वादे से मायूस कई लोगों ने इस बार वोट ही नहीं डाला। गुजरात में भी इस बार यह हो सकता है।’

दूसरे शब्दों में बीजेपी सरकारों से नाराज़ व्यापारी तबका हो सकता है कि इस बार वोट (और नोट भी) न दें। नोटों की चिंता बीजेपी को नहीं है, वे तो देशभर और विदेश से भी आ जाएंगे लेकिन बीजेपी का कोर वोट बैंक यदि वोट न दे तो पार्टी का वोट शेयर गिरना लाज़मी है। इसका सीधा असर बीजेपी को मिलनेवाली सीटों पर पड़ेगा। अमित शाह अपने इन नाराज़ समर्थकों को मनाने में कामयाब हुए हैं या नहीं, यह आप नरेंद्र मोदी और अन्य बीजेपी नेताओं के आनेवाले दिनों के भाषणों से भी जान सकते हैं। यदि मोदी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की तारीफों के पुल बांधने और कांग्रेस को गलियाने तक सीमित रहे तो समझिए, बीजेपी के लिए मामला आसान है लेकिन यदि बीच में हिंदू-मुसलमान आया तो मानना होगा कि पार्टी को विजय की राह में कुछ भारी अड़चन दिख रही है और इस अड़चन को दूर करने के लिए बीजेपी ने सांप्रदायिकता के ब्रह्मास्त्र को चलाने का फैसला कर लिया है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में भी जब बीजेपी को हार नज़र आने लगी तो प्रधानमंत्री ने विकास मंत्र की जगह बीफ मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया था। गुजरात में भी आगे के कुछ महीने इस मामले में दिशासूचक होंगे।

https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ekla-chalo/amit-shah-and-bjp-are-very-afraid-of-businessmen-of-gujarat/

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5 thoughts on “अमित शाह: गुजरात के वेपारियों से बहुत डर लगता है साहेब!

  1. सिकंदर हयात

    Girish Malviya
    1 hr ·
    कल हमारे टेक्स के पैसे से अरुण जेटली जी ने बैंकों को खैरात बाटने की घोषणा कर दी अरूण जेटली ने कहा कि दो सालों में सरकारी बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपए मिलेंगे. इस पैसे की बदौलत सरकारी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात यानी सीएआर में बढ़ोतरी होगी. वैसे आपको बता दूं कि सीएआर बैंकों को कर्ज के जोखिम से निबटने में मदद करता है. नोटबंदी के बाद बैंकों के पास नकदी तो आ गई, लेकिन वो रकम कर्ज के तौर पर देने में दिक्कत सीएआर को लेकर रही.इसलिए सीएआर बढ़ेगी तो डूबे हुए उद्योग पतियों को ओर ज्यादा कर्ज दिया जाएगा कहने को तो यहाँ तक कहा गया है कि ऐसी स्थिति में फंसी हुई परियोजनाओं के साथ-साथ नई परियोजनाओं के लिए पैसे का इंतजाम हो सकेगा. ये रोजगार के मौके बढ़ाने में मदद करेगा. ये भी तय किया गया है कि सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम यानी एमएसएमई को ज्यादा से ज्यादा मदद दी जाएगी. एमएसएमई बड़े पैमाने पर रोजगार के मौके तैयार करता है. दूसरी ओर क्षेत्र विशेष के लिए मुद्रा योजना तैयार की जाएगी., लेकिन हकीकत में ऐसा होना सम्भव नही दिखता, ले देकर ये पैसा पुराने कर्ज को ही पाटने के काम आएगा
    रघुराम राजन ने बैकों को साफ तौर पर कहा था कि वे मार्च, 2017 तक अपनी बैलेंस शीट की हालत दुरुस्त कर लें लेकिन इसी बात के कारण उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया !
    वैसे पिछले साल रिजर्व बैंक एक हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट को बता चुका है कि कुल 57 बकायेदारों पर बैंक के एनपीए का 85 हजार करोड़ रूपये बकाया है, आरबीआई कहती हैं कि नाम गुप्त रहने चाहिए……… सुप्रीम कोर्ट पूछ रही हैं कि ‘लोगों को यह जानना चाहिए कि आखिर एक व्यक्ति ने कितना कर्ज लिया और उसे कितना लौटाना है. इस तरह की राशि के बारे में लोगों को जानकारी मिलनी चाहिए. आखिर सूचना को क्यों छिपाया जाए.’ ?
    रिजर्व बैंक कहता हैं कि वह बैंकों के हितों में काम कर रहा है और कानून के मुताबिक कर्ज नहीं लौटाने वाले लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किये जा सकते.!
    इस पर कोर्ट ने कहा, ‘रिजर्व बैंक को देश हित में काम करना चाहिए न कि केवल बैंकों के हित में.’ ?
    वैसे कोर्ट यह भी कहता हैं कि ‘लोग हजारों करोड़ रपये ले रहे हैं और अपनी कंपनियों को दिवालिया दिखाकर भाग जा रहे हैं लेकिन वहीं 20,000 रपये या 15,000 रपये कर्ज लेने वाले गरीब किसान परेशान होते हैं.’
    लेकिन क्या करे भाई साहब, यह सारी बाते हिन्दू हित की नही है ना , इसलिए इन बातो पर कोई चर्चा नही होता नही तो दिल्ली मे पटाखा नही जलाने को मिले तो ही भक्तों की सुलगने लगती है
    कोई चाहे 57 मिलकर 85 हजार करोड़ दबा ले , चाहे 12 ऐसे बैंक खातों मिले जिन पर 2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है. किसी को कुछ फर्क नही पड़ता क्योकि जो हिन्दू हित की बात करेगा , वही देश पर राज वही करेगा अर्थव्यवस्था जाए भाड़ में ………..
    यह लेख आज जनचोक में भी पब्लिश हुआ है———————————–Rajeev Mittal
    22 October at 12:35 ·
    टीपू सुल्तान…
    टीपू सुल्तान बर्बर हत्यारा था” उसके कार्यक्रम में मुझे न बुलाये – अनंत कुमार हेगड़े, केंद्रीय मंत्री !
    इन मूर्खों को कौन बताये कि औरंगज़ेब के मरने के बाद अगर अंग्रेज किसी से डरते थे तो वे हैदर अली और उनका बेटा टीपू सुल्तान थे…अंग्रेज कभी न तो मराठाओं से डरे न राजपूतों से..दोनों को अंग्रेजों ने बैल बना के रखा था..अगर मराठा और राजपूतों ने टीपू का साथ दिया होता तो अंग्रेज डेढ़ सौ साल पहले ही भारत छोड़ कर भाग गए होते…
    लेकिन तब सवर्ण हिंदुओं को अंग्रेजों के जूते चाटने में मज़ा जो आ रहा था..और सवर्ण हिंदुओं की यही मानसिकता बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में सामने आयी…————————————————————Himanshu Kumar
    23 October at 21:49 ·
    इस चित्र में दीपावली के दीप जलाये जो महिला खडी हैं वे हिन्दू नहीं मुसलमान हैं
    इन महिला के पति के टुकड़े टुकड़े कर दिए गये थे
    इन महिला के पति की हत्या करने वाले लोग हिन्दू थे
    लेकिन इस महिला के दिल में हिन्दुओं के लिए ज़रा भी नफरत नहीं है
    यह अपने पति के क़त्ल के लिए नफरत फ़ैलाने और हिंसा फ़ैलाने वाले लोगों को दोषी मानती हैं हिन्दुओं को नहीं,
    यह आज भी अदालत में इसी लिए लड़ रही हैं
    कि जिन लोगों ने निर्दोष हिन्दुओं के हाथों से निर्दोष मुसलमानों की हत्या करवाई
    उन नफरत की राजनीति करने वाले लोगों को कानूनी सबक सिखाइए
    ताकि देश में और निर्दोषों की हत्या रुक सके
    दुःख की बात है कि अदालत ने अभी तक इन की बात नहीं मानी है
    इनके पति की हत्या करवाने वाले आज भी खुले आम सत्ता पर बैठे हुए हैं
    इस महिला का नाम ज़किया ज़ाफरी है
    इनके पति का नाम अहसान ज़ाफरी था
    यह लोग अहमदाबाद में रहते थे
    अहसान ज़ाफरी कांग्रेस की तरफ से संसद सदस्य थे
    चुनाव आने वाले थे
    मोदी की हालत खराब थी
    चुनाव में मोदी की हार पक्की थी
    इसलिए योजना बना कर मोदी और उसके गिरोह ने गुजरात में दंगे भड़का दिए
    पहले ट्रेन में आग लगवा कर हिन्दुओं की हत्या करवाई गई
    उसके बाद किये जाने वाले दंगों की तैयारी पहले से ही कर ली गई थी
    मुसलमान व्यापारियों की दुकानों की लिस्ट टाइप करके फोटोकापी कर के पार्टी कार्यकर्ताओं में बांट दी गई थीं,
    इन लिस्टों के हिसाब से ही मुसलमानों की दुकानें जलाई गईं,
    भीड़ जब कांग्रेस नेता अहसान ज़ाफरी की हत्या करने के लिए आयी
    तो अहसान ज़ाफरी ने मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को फोन पर मदद भेजने के लिए कहा
    जवाब में नरेंद्र मोदी ने कहा कि तू मरा नहीं अभी तक
    इसके बाद भीड़ ने सांसद अहसान जाफरी के टुकड़े कर दिए और घर को आग लगा दी
    उस दंगे के बाद नरेंद्र मोदी ने पूरे गुजरात में घूम कर हिन्दुओं को भडकाया और चुनाव जीत लिया
    तब से आज तक नरेंद्र मोदी उसी दंगों की फसल काट रहा है
    उन्हीं दंगों से मिली लोकप्रियता के कारण आज नरेंद्र मोदी आज भारत का प्रधान मंत्री है
    लेकिन ज़किया ज़ाफरी बिना डरे उन दंगों और अपने पति की हत्या के लिए देश की सबसे ऊंची अदालत में लड़ रही हैं
    ज़किया ज़ाफरी, एक अकेली औरत लड़ रही है, बिना डरे, बिना थके, बिना रुके,
    मैं ज़किया ज़ाफरी से मिला हूँ,
    इस चित्र को देख कर मेरा दिल कर रहा है कि ज़किया बहन के पास जाकर उनकी थाली से एक दीपक लेकर मुंडेर पर रख दूं
    और दूर तक जो अँधेरा फैला है उस अँधेरे में रोशनी की एक झलक देख कर उनकी ही तरह थोडा सा मुस्कुरा दूं
    अँधेरा बहुत है, ग़म बहुत है, काम भी बहुत है रास्ता बहुत लम्बा है
    लेकिन दिया जलाना और मुस्कुराना कहाँ मना है,
    इसी तरह बहुत सारे चिराग जल जायेंगे मोहब्बत और हिम्मत के
    तो ये हिंसा, और नफरत के अँधेरे ज़रूर भाग जायेंगे
    इस अँधेरे में हमें इन चिरागों की रोशनी दिखाने के लिए बहुत शुक्रिया ज़किया बहन
    See Translation
    —————————————————————————————————————————–Shambhunath Shukla
    8 hrs ·
    केदारनाथ के भोलेबाबा और प्रधानमंत्री!
    शंभूनाथ शुक्ल
    भोले बाबा से आशीर्वाद लेने प्रधानमंत्री 20 अक्टूबर को केदारनाथ गए थे. अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने भोले बाबा को याद किया. लेकिन भोले बाबा के दरबार में प्रधानमंत्री को अपना काला चश्मा उतार कर जाना चाहिए था. 11 हज़ार फीट से कुछ ज्यादा ही ऊँचाई पर स्थित यह केदारनाथ मंदिर हिंदू आस्था का सर्वाधिक पवित्र प्रतीक है. यहाँ जाने के लिए मन में आस्था चाहिए न कि पर्यटन का भाव. लेकिन प्रधानमंत्री अपने स्वाभाव के प्रतिकूल केदारनाथ में प्रदर्शन अधिक किया आस्था कम जताई. नरेन्द्र मोदी कहाँ आस्था जताते हैं और कहाँ प्रदर्शन, यह पता तो नहीं चलता लेकिन केदारनाथ में उनके चेहरे के भाव प्रदर्शन के ही ज्यादा थे. याद करिए जब वे पहली बार वाराणसी गए थे अथवा जब वे संसद गए तब कैसे विनम्र थे. किन्तु इसके विपरीत अब उनके चेहरे से अहंकार झलकता है जो किसी भी नेतृत्त्व के लिए शुभ नहीं है. उनके हाव-भाव से लगा नहीं कि वे भोले बाबा से आशीर्वाद लेने आए थे. बल्कि ऐसा लगा मानों वे भोले बाबा के समक्ष अपने वैभव का प्रदर्शन कर रहे थे. हर मंदिर की अपनी गरिमा और अपने नियम-कायदे होते हैं वहां जाने पर उनकी पालना अपरिहार्य है. मगर प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. तब प्रश्न उठता है कि प्रधानमंत्री को वहां जाना ही क्यों चाहिए. बिना आस्था किसी भी धार्मिक स्थल पर जाना, उसे मानने वालों का अपमान ही समझा जाएगा.

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  2. सिकंदर हयात

    Abbas Pathan
    9 hrs ·
    एक मामूली एलडीसी केटेगरी का कर्मचारी भी यदि अपने काम को कर्तव्य निष्ठा से करे तो सुबह से शाम तक उसे पानी पीने का समय मुश्किल से मिले.. इतना काम है हमारे सरकारी तंत्र के पास की आज लाखों कर्मचारी संविदा पे काम करके काम को निपटाने के प्रयास कर रहे है किंतु फ़ाइलो का बोझ कम नही हो पा रहा।
    विडम्बना देखिये प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री स्तर के लोग किस तरह आराम से घूम फिर रहे है, महीनों से चुनावी प्रचार कर रहे है, यात्राएं निकाल रहे है.. इनके पास इतना समय आया कहाँ से की ये घण्टेभर तक मन की बातें कर लेते है। आप क्या कभी अपने आप मे झांकते नही की आप एक मामूली आदमी होकर भी कितने व्यस्त है और वे ऊँचे पदों पे चढ़कर भी इतना निठल्लापन कैसे कर लेते है। आज ताजमहल परिसर में योगी अदित्यनाथ झाड़ू निकालेंगे.. बड़े बड़े बैनर लग चुके है कि योगी जी झाड़ू निकालेंगे, अखबारों में कई बार छप चुका और इलक्ट्रोनिक मीडिया ने भी कई बार जनता को याद दिला दिया है कि योगी जी ताजमहल परिसर में झाड़ू निकालने वाले है। बन्दा 10 मिनट के लिए झाड़ू पकड़ेगा और इस 10 मिनट की नौटँकी पे अबतक करोड़ो खर्च हो चुके है। ठीक इसी तरह आजकल अखबारो में अक्सर तस्वीरेँ छपती है कि फलां कलेक्टर साहब झाड़ू निकालकर स्वच्छता का संदेश दे रहे है। क्या कलेक्टर का काम है अपनी ड्यूटी के समय झाड़ू लगाने की नौटँकी करना? कलेक्टर को सरकार लाखो रूपये झाड़ू निकालने के लिए नही देती, बल्कि झाड़ू के लिए सफाई कर्मचारी रखे हुए है। प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री और कलेक्टरो के पास झाड़ू लगाने एवं दीगर गतिविधियों में भाग लेने का समय आ कहाँ से जाता है जबकि समय तो आजकल चपरासी के पास भी नही होता।
    बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवन्त सिन्हा विगत 1 वर्ष से मोदी जी से मिलने का समय मांगते रहे किन्तु उस 80 वर्षीय नेता को प्रधाममंत्री से मिलने का अपॉइंमेन्ट ना मिल सका। यशवन्त सिन्हा को नजर तो आ रहा होगा कि किस तरह उन्हें नजर अंदाज किया जा रहा था और दूसरी तरफ मदरसे की महिलाओ से मिलने के लिए प्रधानमंत्री सम्बंधित आयोग को निर्देश दे रहे थे वे 25 मुस्लिम महिलाओं का इंतेज़ाम करे। मोदी जी 700 मुस्लिम महिलाओं से संवाद करने के लिए बेताब थे और वहां पार्टी का ही एक वरिष्ठ नेता एक साल से लाइन में लगा था। यशवन्त सिन्हा बहुत काम की बाते करना चाहते थे।
    दरअसल वहां संवाद नही नौटँकी करना था.. controversy creat करने की आदत पड़ चुकी है।
    और हां.. जनता को भी नौटँकी में ही मज़ा आता हैAbbas Pathan
    19 October at 00:09 ·
    भ्रष्ट कौन है आप तय कीजिये..
    एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 894 करोड़ सम्पत्ति के साथ बीजेपी सबसे अमीर पार्टी है वही सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की कुल सम्पत्ति 759 करोड़ है। 1885 में बने एक दल कांग्रेस के पास कुल 759 करोड़ की सम्पत्ति है जिसमे से 329 करोड़ की देनदारियां है। यानि के कांग्रेस के पास कुल शुध्द सम्पति 430 करोड़ हुई।
    दूसरी तरफ 37 साल पुरानी बीजेपी के पास 894 करोड़ की सम्पत्ति है जिसमे मात्रा 25 करोड़ की देनदारियां है। अतः बीजेपी की शुद्ध सम्पत्ति हुई 844 करोड़…
    एक पार्टी ने 9 साल सत्ता देखी और दूसरी पार्टी भारत के आज़ाद होते ही सेवा में लग गयी।
    खैर, बीजेपी शासन में शहजादे सहित कॉर्पोरेट जगत की सम्पत्ति बढ़ी और साथ मे बीजेपी की भी बढ़ी.. वही दूसरी तरफ व्यापारी बर्बाद हुए किसानों ने आत्महत्याएं की और जितनी सैनिक क्षति 10 साल में होती है उतनी मात्र 3 साल में हुई।।Abbas Pathan
    24 October at 11:14 ·
    गौरतलब है कि अबतक जितने भी सच्चे सूफी संत गुजरे है उनमे से किसी ने भी जुबानी लज़्ज़त की गुलामी नही की.. जितने भी सूफी गुजरे सभी ने कम खाया , रूखा सूखा पहले चुना और स्वादिष्ट चटपटे खाने से जान छुड़ाई है। इमाम गजाली ने लिखा कि “पेटभर खाना बवाल है”। हसन बसरी कहते है कि “नेक इंसान बकरी की तरह होता है जिसकी खुराक थोड़ी सी घास, मुट्ठी भर जव और दो घूंट पानी होती है और मुनाफिक(कुकर्मी) हड़प हड़प कर दरिंदे की तरह खाता है। सुफयान सौरी ने दिल की सख्ती के दो कारण बताए है , पेट भर कर खाना और ज्यादा बोलना.. इनके अतिरिक्त एक और सूफी हज़रत बायजीद का कौल है कि यदि फिरोन भूखा होता तो खुदाई का दावा ना करता और कारून बगावत पे ना उतरता इसलिए मैं कम से कम भोजन करता हूँ।
    दूसरी तरफ जितने भी अमीरे शहर गुजरे, जितने भी मालदार हुए उनका दस्तरख़्वान तरह तरह के पकवानों से हमेशा भरा हुआ रहा, बड़े बड़े इंसाफ पसन्द बादशाह तरह तरह के जायकेदार खानो का आनंद लेते रहे दूसरी तरफ कहीं ना कहीं दाने दाने को तरसते लोग भूख से मरते रहे।
    हाल ही में झारखंड के झरिया नामक इलाके में “वैधनाथ दास” 3 साल से राशन कार्ड बनवाने की जद्दोजहद कर रहा था, अंतः गरीबी से जूझ रहे वैधनाथ दास राशन तो नही बनवा सके और कुपोषण एवं भूख से मर गए। सरकार ने कहा है कि वैधनाथ भूख से नही बल्कि बीमारी से मरा है जबकि उसके परिजनों का कहना कि घर मे अनाज नही था.. मृत्यु का मुख्य कारण भूख थी।
    मैं किसी सरकार को दोष नही दे रहा बल्कि मुझे पूरा मुल्क ही हत्यारा नजर आ रहा है। किस सरकार को दोष देंगे हम? रोज़ तकरीबन 1000 लोग भूख से मरते है इस भारत महान में, कभी कभी कोई गुड़िया या बुढ़िया मिडीया को दिखाई पड़ जाती है तो हर तरफ संवेदनाओं की लहर दौड़ पड़ती है। यदि रोज़ मरते सेकड़ो लोग मिडीया द्वारा देश को नजर आने लग गए तो कोई भी सरकार जनहितैषी नजर नही आएगी और ना ही ये देश “इंसानो का देश” कहलाने लायक रहेगा।
    मैं रोज़ ही देखता हूँ कि बचा हुआ खाना नाली में फेंका जाता है, शादी ब्याह में सत्रह तरह के पकवान होते है जिसका 25% नष्ट होता है। ये खाना इतना बुरी तरह से नष्ट होता है कि जानवरों के खाने लायक भी नही रहता। जो लोग अपनी जरूरतों से चार पैसा ज्यादा कमा लेते है वे इतना ठूस ठूस कर खाने लग जाते है कि उन्हें अधिक खाने की वजह से बिमारियां लग जाती है।
    यदि हम जरूरत से ज्यादा हड़प हड़पकर खा रहे है या अनाज खराब कर रहे है तो इसका अर्थ है हम जीव हत्या कर रहे है.. हमारे द्वारा फेंका गया एक कटोरी भोजन किसी की मौत का कारण है।
    जोधाणा मुस्लिम जागरण मंच नामक सामजिक संस्था ने नारा दिया था “उतना ही ले थाली में, बाकी ना जाए नाली में”…..
    http://alfaaaaz.blogspot.in/2017/10/blog-post_34.htmlAbbas Pathan
    21 October at 18:26 ·
    भारत को जातिगत आरक्षण से मुक्त करना भाजपा के एजेंडे में है किन्तु इसके खिलाफ अभी बीजेपी खुलकर मोर्चा खोलने की स्थिति में नही है। आरक्षण मुक्त करने के पक्ष में केवल भाजपा ही नही बल्कि और भी सेकड़ो संघटन और दल है जो चाहते है “कोई भी सक्षम होने के बावजूद लंगड़ा घोड़ा लेकर ना दौड़े ” । भाजपा ने जिस दिन अपने संकल्प की और बढ़ना शुरू कर दिया उस दिन आरक्षण के विरुद्ध देशभर में ऐसी हवा चलेगी की हर कोई खुद बा खुद भाजपा के साथ जुड़ने लगेगा। कैसे , पढिये।
    सबसे पहले कोई नेताजी दलितों की नौकरियों के विरुद्ध विवादित बयान देंगे फिर मिडीया चार बेलगाम लोगो को लाकर बहस करने बैठा देगी। वे चार गधे ऐसे स्टाइल में बहस करेंगे मानो पूरा भारत बोल रहा हो। छोटी छोटी घटनाओं को मीडिया हाईलाइट करेगा जैसे तलाक और लव जिहाद के समय किया गया था। जरा सी चूक पे लीड स्टोरीज कवर होने लगेगी। कोई डॉक्टर यदि ऑपरेशन में सफल ना हो सका तो इस असफलता का ठीकरा आरक्षण पे फोड़ा जाएगा.. कोई कैदी जेल तोड़कर भागा तो आरक्षण प्राप्त पुलिस कर्मियो की परेड मिडीया कराएगा। कही कोई प्रशासनिक चूक हुई तो इसका कसूरवार आरक्षण को ठहराया जाएगा। अच्छे मार्क्स लाने वाले छात्रों की ढल चुकी उम्र दिखाई जाएगी जो नौकरी के लिए तरसते रह गए। गरीब जनरल परिवारों को खोज खोजकर स्टूडियो लाया जाएगा ताकि वे रोए और देश भावुक हो । जिस तरह शहीद सैनिको के परिवार वालो लाया जाता है ताकि वे रोये और आपके अंदर का देशभक्त जागे। ये भी ज्ञात रहे कि शहीद सैनिको के उन परिवारों को कभी स्टूडियो नही लाया जाता जिनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है, जबकि ऐसे मजबूर परिवारों की कोई कमी नही है।
    जिस तरह गाय गोबर तलाक राष्ट्रीय समस्या बन चुके थे उससे भी तेज रफ्तार की राष्ट्रीय समस्या आरक्षण को साबित जाएगा। ऐसे लोगो को छांटकर आगे लाया जाएगा जो अनुसूचित जाति जनजाति से आते है और आरक्षण का विरोध करते है। ऐसे लोगो को राष्ट्रवादी मिडीया देशभक्त नायक की तरह प्रस्तुत करेगी। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे इस्लाम के विरुद्ध बोलने के लिए तारिक फतह को लाया गया था और पर्सनल लॉ बोर्ड के विरुद्ध बोलने के लिये चंद बुर्खे वाली औरतो को उठा लाए थे ताकि करोड़ो लोगो की आवाज दबाकर इनकी आवाज लोगो को सुनाई जाए और देश को लगे कि यही तमाम महिलाओ की शुद्ध आवाज है।
    यही तो लक्ष्य है एक देश एक कानून यानि समान आचार संहिता.. एक देश एक टैक्स यानि जीएसटी और सभी के पास चार टांगो वाला घोड़ा.. अब दोड़ो और जीतो।
    तैयार रहिये.. आपने हिन्दू मुस्लिम, जातिवाद क्षेत्रवाद के नाम पे बहुत वोट लुटाए है, अब वो समय करीब है जब देश आरक्षण के मुद्दे पे पार्टी चुनेगा।
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  3. सिकंदर हयात

    Girish Malviya
    23 hrs ·
    एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो उत्तर प्रदेश के गांवों की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उनका मोबाइल डाटा खत्म हो गया , उन्होंने सोचा कि मैं किसी का wifi पासवर्ड माँग कर हॉटस्पॉट यूज़ कर लूंगा
    वह एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें जिओ फोन पर फ़ेसबुक ओर व्हाट्सएप चला रही थी । खुसरों ने हॉटस्पॉट शेयर करने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन ने खुसरो को फेसबुक पर देखा हुआ था ओर उसकी शहर में रहने वाली सहेली अमीर ख़ुसरो की म्यूच्यूअल फ्रैंड थी उसने झट से उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं ओर ‘छाप तिलक सब छीनी’ इसीने लिखी है,
    अब चारो पनिहारिनों को अपने अपने गाँव से सरपंची के बीजेपी का टिकट मिलने वाला था
    विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं फिर क्या था चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे राष्ट्रीय डिश खिचड़ी पर कविता सुनाओ तब पासवर्ड दूँगी, इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने उमा भारती की फैन थी तीसरी मोदी जी को पसंद करती थी और चौथी ने कमल पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो को डाटा जरूरी चाहिए था पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी –
    खिचड़ी पकाई जतन से, उमा ने दिया हिला ।
    आया मोदी खा गया, तू बैठी कमल खिला
    ला डाटा दिला
    यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठिकाना न रहा उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल वाई फाई पासवर्ड दिया बल्कि एक जियो की सिम भी दिलवा दी, ओर उन्होंने शाम को डिनर के लिए अमीर खुसरो को इन्वाइट किया, लेकिन अमीर ख़ुसरो के गांव आने की खबर योगी जी की हिन्दू युवा वाहिनी को मिल गयीं, उन्हें यह पता लग चुका था कि खुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे, इस वजह से उन्होंने ख़ुसरो को राह चलते घेर लिया और तेल पिलाई लाठी उनकी खूब खबर ली , अमीर ख़ुसरो गोरखपुर के बीआरडी हॉस्पिटल में भर्ती है उन्हें भी आक्सीजन चढ़ रही है …….—————————————————————————-Awesh Tiwari
    5 November at 16:03 ·
    अभी एक पत्रकार मित्र ने कहा कि जिन लोगों को सरकार भारत रत्न देने की बात चल रही है उनम जी मीडिया प्रमुख सुभाष चंद्रा का भी नाम है| मैं पिछले एक घंटे से सोच रहा हूँ कि सुभाष चंद्रा जी ने देश के लिए क्या किया ? मैं नहीं चाहता फिर भी जब उनके बारे में सोचता हूँ मुझे तेल चुपड़ी दाढ़ी और बाल में एक शख्स नजर आता है ,जिसने कम्बल ओढ़ कर घी पीया है| सुभाष चंद्रा जी के प्रवचन से जरुर प्रबंधन के छात्रों को लाभ मिला होगा, देश को हरबोले पत्रकारों की जमात देने का श्रेय भी सुभाष जी को जाता है ,नोट में चिप का राज भी इनके ही चैनल ने खोला था | देश को एक अदभुत सरकार देने का भी श्रेय भी सुभाष जी को दिया जा सकता है| राज्यसभा के सदस्य तो हैं ही पहली नजर में देवादिदेव विजय माल्या के जुडवा भाई भी लगते हैं|Awesh Tiwari
    2 November at 23:57 ·
    हम हिंदुस्तानी अन्न का नुकसान करने के मामले में सर्वाधिक निर्लज्ज है। भोजन को मिल बांट कर खाना भी हम नही जानते। जो खिचड़ी को राष्ट्रीय भोजन बनाने को अफवाह पर मजे ले रहे हैं दरअसल यह वही जमात है जो शादी ब्याह में ही नही घर पर भी थाली में भोजन छोड़ देना अपनी शान समझती है। अभी झारखंड के लातेहार के एक मित्र से बात हो रही थी वो बता रहे थे यहां कई इलाकों में आदिवासी चकवड़ कहकर जिंदगी जी रहे हैं। खुद मेरे जिले में अगर साँवाँ,कोदो,महुआ न हो तो लाखों आदिवासियों के जीवन पर बन आये।अब वक्त आ गया है कि अन्न के इस भारी नुकसान पर दण्ड का प्रावधान किया जाए। शादी ब्याह में बुफे में खाना खिलाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। सबसे जरूरी है कि अन्न का सही तरीके से बंटवारा हो ,इस देश मे कोई भूखा न सोये।Awesh Tiwari
    2 November at 20:16 ·
    पीएम मोदी ने कांग्रेस को “लाफिंग क्लब” कहा है। चलो कांग्रेस कुछ न कर रही देश को हंसा तो रही है। कभी उसके उपाध्यक्ष को पप्पू कहकर कभी उसकी विधवा माँ की बेचारगी पर तो उसके महासचिव के प्रेम विवाह को लेकर चुटकुले बनाये जाते हैं। लोग हंसते भी होंगे। हारे हुए पर हंसने की हमारे देश मे रीति भी है। लेकिन यह भी तो सच है न बीजेपी ने तो जैसे आम हिंदुस्तानी से हंसने के बहाने ही छीन लिए हैं। आप ऐसे करिये मोदी जी हमे केवल जी भर के मुस्कुराने का कोई एक बहाना दे दीजिए।Awesh Tiwari
    2 November at 16:36 ·
    शर्मीले राहुल के पास बैठी इस लड़की के चेहरे पर जो गर्वीली मुस्कुराहट दिख रही है ,वो मुस्कुराहट ही तो कही नही दिखती। मैं याद करने की कोशिश करता हूँ कि अबसे पहले किस नेता के पास खड़ी कोई लड़की यूं मुस्कुराई थी तो दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। यह तस्वीर राहुल की लोकप्रियता का पैमाना है। यह तस्वीर राहुल को युवाओं के नेता के तौर पर स्थापित करती है।क्या आप कल्पना कर सकते है कि देश की कोई बेटी किसी शाह किसी संघवी किसी नसीमुद्दीन के बगल मे बैठकर यूं मुस्कुराएगी?Awesh Tiwari
    1 November at 22:56 · Varanasi ·
    उत्तर प्रदेश के ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी के बिजलीघर में ब्वायलर ट्यूब में हुए विस्फोट से अब तक 18 लोग मरे हैं, 100 से ज्यादा घायल है | आपको लगता होगा यह तकनीक से जुड़ा हादसा है| सच्चाई हम आपको बताते हैं| यह देश की नवरत्न कंपनियों में से दो भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड और एनटीपीसी की बदहाली का एक नमूना है| यह घटना बताती है कि आजकल रेल मंत्रालय संभाल रहे पीयूष गोयल के पूर्व में लिए गए निर्णयों ने ऊर्जा मंत्रालय की ऐसी की तैसी कर दी है | आप नहीं जानते होंगे हम बताते हैं देश को उर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थापित की गई भेल पूरी तरह से फेल हो चुकी है ,अलग अलग परियोंओं में इकाइयों को स्थापित करने के लिए दिए गए एक एक दशक पुराने आर्डर पूरे नहीं हो पा रहे हैं | ऊंचाहार समेत देश के तमाम बड़े बिजलीघर कांग्रेस के वक्त में जापान या फिर रूस की टेक्नोलाजी से बने हुए हैं ,भेल की अकर्मण्यता का हाल यह है कि देश को आज बड़े पैमाने पर चीनी कंपनियों से यूनिट्स की खरीदी करनी पड़ रही है| जिस इकाई में दुर्घटना घटी उसे पहले इंटरनेशनल टेंडर के द्वारा बनवाया जाना था लेकिन अंत में इस इकाई की कमीशनिंग का काम १३०० करोड़ में भेल को दे दिया गया, दुखद यह कि ईकाई के स्थापित होने के साल भर भी न बीते यह घटना घट गई|Shambhunath Shukla
    22 hrs ·
    उत्तर प्रदेश में दो जिलों की जनता सर्वाधिक बुद्धि संपन्न और प्रगतिकामी है। एक रामपुर और दूसरा आज़मगढ़। मैने टीवी पर कभी इन दोनों जिलों के लोगों को किसी बाबा, बॉबी या तांत्रिक अथवा मुल्ला-मुल्ली की शरण गहते नहीं देखा। देश के स्तर पर ऐसा क्षेत्र बंगाल है। तांत्रिकों की शरण में पिछड़ी जातियाँ और मुसलमानों का भी पिछड़ा वर्ग ही जाता है जबकि ज्योतिषियों के फेर में ब्राह्मण और बनिया पड़ता है। इसी तरह देवबंद में धार्मिक निर्देश की माँग शेख़, सैयद और पठान करते हैं। धार्मिक चोचलों से मुक्त हिंदुओं में भंगी हैं और मुसलमानों में कसाई या क़ुरैशी तथा मनिहार हैं।

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  4. सिकंदर हयात

    Awesh Tiwari
    Yesterday at 08:21 ·
    राजा बोला ‘आज से 500,1000 के सारे नोट प्रचलन में नही होंगे” मैं तुरंत एटीएम दौड़ा,जेब मे पैसे नही थे। लेकिन जब एटीएम से 10 हजार रुपये बाहर आये तो मैं भौंचक रह गया,जो पैसे निकले वो 100 के नोट नही थे बल्कि 500,1000 के वो नोट थे जो प्रचलन में नही थे। ऐसा देश भर में हुआ। लोगों को यह कहकर पागल कर दिया गया कि हम कालाधन वापस ला रहे हैं। उनको किस्मत में इतनी दौड़ इतना मानसिक उत्पीड़न लिख दी गई कि देश सोमालिया और कांगो नजर आने लगा।Awesh Tiwari
    7 November at 22:18 ·
    हिंदुओं की आने वाली पीढियां इस बात का यकीन न करेंगी कि उनके बाप दादाओं ने 2014 में देश को एक ऐसी सरकार दी थी जिसकी अराजकता को चुपचाप सहना उनकी नियति बन गई थी। नोटबन्दी केवल एक घटना भर नही थी यह जबरदस्त बहुमत से बलबलाई एक मनबढ़ सरकार का अतिरंजित फैसला था। जिसमे बेवकूफी के साथ साथ अहंकार भी भरा हुआ था। मोदी और उनका मंत्रिमंडल जानता था कि न तो जनता में न ही विपक्ष में इतनी औकात है कि वो इस फैसले का विरोध कर सके।नोटबन्दी ने हमे बताया कि हम किस हद तक आज भी गुलाम हैं और हमने पीएम नही एक राजा का चुनाव कर लिया है।Awesh Tiwari
    7 November at 09:37 ·
    इस देश मे आप अगर अपनी हंसती मुस्कुराती जिंदगी से परे आम आदमी की बेबसी को नजदीक से देखेंगे तो कलेजा फट कर बाहर आ जायेगा। तीन दिन से बीएचयू में हूँ देश का माना जाना अस्पताल है। लेकिन अचरच में भर जाता हूं जब देखता हूँ कि जीवन मृत्यु से जूझ रहे मरीजों को आईसीयू में भर्ती होने के लिए मंत्रियों से सोर्स लगवाना पड़ता है। आप रात को 12 बजे के बाद जनरल वार्ड में जाएंगे तो बीएचयू की काली हकीकत और भी गाढ़े काले रंग में नजर आएगी। रात में पूरे अस्पताल के जनरल वार्ड, नर्सेज और वार्ड ब्वायज के भरोसे छोड़ दिये जाते है क्योंकि डाक्टर नही होते। गंदगी, अपराध, भ्रष्टाचार और उन सबके साथ इलाज।मौत की भी एक आवाज होतो है जो सारी रात सुनाई पड़ती है। सुरक्षाकर्मियों के डंडे से भयभीत मरीजों के परिजन डाक्टरों के इनायत की दुआएं मांगते है। यार मोदी जी दो साल बचे है इतना ही कर दो कि इस देश का गरीब आदमी सम्मान के साथ इलाज करा सके और गर मर भी जाये तो उसमे बेबसी न हो।———————-Girish Malviya
    6 hrs ·
    कल आडवाणी जी का जन्मदिन था, लाल कृष्ण आडवाणी जब ब्लॉग लिखा करते थे तब उन्होंने एक ब्लॉग में पत्रकार पी पी बालचन्द्रन की किताब ‘ ए व्यू फ्राम दि रायसीना हिल ‘ की समीक्षा की थी
    इस किताब में आडवाणी ने लेखक के नेहरू के बारे में दिए उद्धरण के बारे में बात की है ‘ पण्डित नेहरू अनेक लोगों के लिए बहुत कुछ थे। वह एक प्रतिभाशाली बैरिस्टर थे जो एक मंहगे वकील बन सकते थे यदि उन्हें पहला पाठ गांधी से न मिला होता तो।
    वह संसद में भ्रष्ट न्यायाधीशों या प्रधानमंत्रियों के हत्यारों या उनका भी जिन्होंने करेन्सी नोटो से भरे संदूकों को प्रधानमंत्री को रिश्वत दी थी का बचाव कर रहे होते।
    वह एक स्वप्नदर्शी थे जो तब तक नींद में थे जब तक उनके अच्छे दोस्त चाऊ एन लाई ने उन्हें जगा नहीं दिया, भले ही भौण्डे ढंग से क्यों न हो।
    और, निस्संदेह वह एक शानदार कलाकार थे जो अपने जीवन भर हेमलेट की भूमिका निभाते रहे और तब भी आभास देते रहे कि वह तो जूलियस सीज़र की भूमिका निभा रहे हैं।
    लेकिन इस अधिकांश, और जिसे किसी माप में मापा न जा सके, तो वह हमारे महानतम और सर्वाधिक सफल मध्यस्थ थे, जिन्होंने हमारे लिए बहुप्रतीक्षित हमारी अपनी नियति से हमारा मिलन कराया:
    हालांकि हमारी नियति से मिलन तय करते समय, इसे देश के निर्माता नेहरू ने देशभर में कुछ लैम्प पोस्ट खड़े करवाए – हमें बिजली देने के लिए नहीं अपितु भ्रष्टों, कालाबाजारियों और हवाला व्यापारियों को लटकाने के लिए: उन्हें लटका दो, यदि उन्हें हम खोज सकें। क्योंकि नेहरू सोचते थे कि यह घास के ढेर में सुई ढूंढने जैसा काम होगा, इतना कठिन और इतना अविश्वसनीय’
    इसे पढ़कर मुझे याद आता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी पचास दिनों नोटबन्दी के अपेक्षित परिणाम न पा सकने पर कुछ ऐसी ही ‘लटकाने’ की बाते की थी, हम में से कुछ लोगो को आज भी यकीन है मोदीजी से किसी दिन किसी ऐसे ही लैम्पपोस्ट के तले मुलाकात होगी और वो लैम्पपोस्ट की लगभग पीली रोशनी में उनका जर्द पड़ता चेहरा देख पाएंगें, शायद इसी तरह से 70 साल बाद ‘नियति से मिलन’ से मिलन को पुनर्परिभाषित किया जा सकता है शायद यही सच्चा tryst with destiny होगा——————————————Himanshu Kumar
    2 hrs ·
    अमीरी कैसे बढ़ती है ?
    जापान से भारत ने बुलेट ट्रेन के लिए नब्बे हज़ार करोड़ रूपये क़र्ज़ लिए ,
    तो जापान किसी जहाज़ में भरकर नोट भारत थोड़े ही भेज देगा,
    जापान अपने कम्प्यूटर के स्क्रीन पर एक लेटर लिख देगा,
    जिसमें लिखा होगा कि जापान नें भारत को नब्बे हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ दिया है,
    भारत सरकार अपने देश के रिजर्व बैंक को जापान का वह पत्र दे देगी,
    रिजर्व बैंक एक पत्र लिख कर उस बैंक को देगा जिसमें भारत सरकार का खाता है,
    मान लीजिये स्टेट बैंक में भारत सरकार का खाता है
    तो रिजर्व बैंक से स्टेट बैंक को एक पत्र आएगा कि भारत सरकार के खाते में नब्बे हज़ार करोड़ लिख दीजिये,
    तो भारत सरकार मानेगी कि उसके पास अब पैसा आ गया,
    अब भारत सरकार उस पैसे को
    लोहा कंपनियों को देगी,
    जिनसे उसे रेल पटरियां डालने के लिए लोहा खरीदना है,
    लोहा कंपनी उसे अपने कर्मचारी के खाते में डालेगी,
    कर्मचारी उस से कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन खरीदेगा,
    कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन तो देश में बढे नहीं,
    लेकिन नब्बे हज़ार करोड़ रुपया बढ़ गया,
    जो बढ़ जाता है उसकी कीमत कम हो जाती है,
    रुपया बढ़ा तो रूपये की कीमत कम हो जायेगी,
    जो नहीं बढ़ा उसकी कीमत बढ़ जाती है,
    कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन की कीमत बढ़ जायेगी,
    साथ में दाल सब्जी मछली दूध की कीमत भी बढ़ जायेगी,
    जिसे आप कहेंगे कि महंगाई बढ़ गयी,
    बिना उत्पादन बढ़ाये अगर आप
    पैसा बढ़ाएंगे
    तो उससे महंगाई बढ़ेगी,
    चलिए आगे चलते हैं,
    दाल सब्जी मछली दूध महंगा हो जाएगा तो जनता शोर मचाएगी,
    सरकार उस रूपये से
    दाल सब्जी मछली दूध विदेशों से मंगवायेगी,
    उससे किसान द्वारा उगाये गए
    दाल सब्जी मछली दूध की कीमत फिर से गिर जायेगी,
    लेकिन किसान के लिए कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन, की कीमत तो कम नहीं हुई,
    तो किसान के पास दाल सब्जी मछली दूध के उत्पादन से अब जो रुपया आएगा उससे उसका जीवन चलाना मुश्किल हो जाएगा,
    किसान अपने बच्चे को पढ़ा नहीं सकेगा, इलाज नहीं करा सकेगा,
    किसान इस सब के लिए क़र्ज़ लेगा,
    लेकिन उसका उत्पादन तो बढ़ा नहीं,
    महंगाई बढ़ने से खर्च तो बढ़ गया,
    लेकिन आमदनी बढ़ी नहीं,
    किसान घाटे में आ जाएगा,
    किसान क़र्ज़ चुका नहीं पायेगा,
    किसान फांसी लगा लेगा,
    यह अर्थव्यवस्था
    उत्पादक के पक्ष में काम ही नहीं करती—————————प्रद्युमन के केस में जब एक बस कंडक्टर फसता है या फसाया जाता है तो गुडगाँव कोर्ट के वकील बॉयकॉट करते है और उसका केस लेने से मना कर देते है.
    सीबीआई जब एक वकील के लड़के को इस केस में अरेस्ट करती है तो गुडगाँव कोर्ट के वकील उस लड़के के फेवर में खड़े हो जाते है क्योकि गिरफ्तार हुआ लड़का वकील का बेटा है.
    इन वकीलों के पास हम न्याय के लिए जाते है.
    कैसा गन्दा समाज बना रहे है हम, गरीब फसता है तो सब ठीक, अमीर फसता है तो इक्कठे होकर विरोध करते है.
    Geeta Yatharth———————-Ashok Kumar Pandey
    4 hrs · New Delhi ·
    राणा प्रताप के जीते जी भाई शक्ति सिंह अकबर की सेना मे चले गए थे, मरते ही बेटा अमर सिंह भी मुगलों का शरणागत हुआ। अंग्रेज़ आए तो बड़े बड़े राजपूताने उनके ग़ुलाम हो गए। सड़ गईं तलवारें म्यानों मे रखे रखे, घर अजायबघर बन गए।—
    और अब आज़ादी के बाद आन-बान-शान याद आई है। जैसा शातिर भंसाली वैसे मूरख ये/ राम भला करे।—————–Narendra Nath
    18 hrs ·
    नोटबंदी का एक साल
    ——————
    आज ही रिपोर्ट अायी है। 2017 में 15 लाख नौकरी कम हुई है। सभी सेक्टर में नौकरी कम हो रही है। नोटबंदी के बाद जीएसटी ने नौकरी सेक्टर में भयावह मंदी लायी है।
    मंदी में भी कंपनी के शेयर उछल रहे हैं। भारत में यह अब तक की यह सबसे बड़ी छंटनी का दौर पिछले एक साल से चालू है। 2009 के महामंदी में भी किसी एक कंपनी ने ऐसी बड़ी छंटनी नहीं की।
    याद करें कि नौकरी देने वाले अखबारों के अलग से कई पन्नों के पुलआउट जो पहले आते थे अब वही मेन अखबार में महज 1-2 पन्नों में सिमट कर रह गये हैं।
    लेकिन नौकरी की कमी समस्या नहीं है। उससे बड़ा खतरनाक ट्रेंड सामने आ रहा है। आफ्ट एफेक्ट देखें,नौकरी जाने को भी सही ठहराया जा रहा है। सेलेब्रेट किया जा रहा है। इसे बेहतर कल का हवाला देकर सरकार समर्थक युवा भी सपोर्ट कर रहा है जिसे खुद नौकरी की जरूरत है।
    इनके बीच संकेत है कि कई कंपनियां विकास और बेहतर कल के नाम पर इसी रास्ते पर चलने वाली है। छंटनी के नियम-कानून को बेहतर कल के नाम पर आसान किये जा रहे हैं। सरकार और सरकार के सपोर्टर कह रहे हैं कि नौकरी जाने के ट्रेंड को ,कानून का स्वागत करना होगा। करना ही होगा।
    डरें कि सरकार के मंत्री ताल ठोक कर पब्लिक डोमेन में कहते हैं कि जो नौकरी के लायक नहीं है सिर्फ उनकी नौकरी जा रहे हैं।
    बेहतर कल कीमत मांग रही है। देते रहें। बिना कुछ पूछे। उन लाखों लोगों में कुछ वैसे भी होंगे जो इन दिनों सवाल पूछे जाने को सबसे बड़ा अपराध मांगते होंगे। सवाल मांगने वालों को सोशल मीडिया पर बुलडोज करते होंगे। मुझे उनसे सहानुभूति है। उम्मीद है वह इस बुरे वक्त से जल्द निकलेंगे।
    यह तब है कि भारत में जॉब सीकर की संख्या विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है।
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  5. सिकंदर हयात

    दूरदर्शन के पूर्व पत्रकार Satyendra Murli जी ने किया “मन की बात” और नोटबंदी की जबरदस्त पोलखोल….नीचे उन्ही के शब्दों में पढ़े पूरा सच…
    केंद्र सरकार ने पूरे देश में विभिन्न माध्यमों से संदेश पहुंचाया कि पीएम मोदी रेडियो पर लाइव आकर ‘मन की बात’ करते हैं.
    लेकिन मैं शुरू से ही जानता था कि यह बात सरासर झूठ है.
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘मन की बात’ कार्यक्रम के बारे में मैंने कभी भी जनता को नहीं बताया कि उसकी रिकॉर्डिंग एक दिन पहले ही दूरदर्शन के पास आ जाती थी.
    वॉइस रिकॉर्डिंग का काम ‘ऑल इंडिया रेडियो’ करता था.
    जब इसका प्रसारण रविवार को किया जाता था, तो शनिवार शाम को रिकॉर्डिंग और स्क्रिप्ट हमारे पास होती थी.
    वॉइस रिकॉर्डिंग को टीवी पर दिखाने के लिए पीएम मोदी की कही एक-एक बात के अनुसार विजुअल लगाए जाते थे.
    शनिवार रात भर एडिटिंग चलती थी.
    उस रात भारतीय सूचना सेवा के कम से कम एक वरिष्ठ अधिकारी को ड्यूटी पर जरूर लगाया जाता था.
    शनिवार रातों को दूरदर्शन समाचार के न्यूज़ रूम में, मेरी भी बहुत बार ड्यूटी लगी हैं, लेकिन सबकुछ जानते हुए भी मैंने कभी भी इस बात का जिक्र तक नहीं किया.
    लेकिन मोदी सरकार का नोटबंदी वाला मामला पूरी तरह से राष्ट्रविरोधी, जनविरोधी, नियम-कानूनों को बाइपास करने व संवैधानिक व्यवस्था का मखौल उडाने वाला था.
    आरबीआई का प्रस्ताव मंगवाने और कैबिनेट की बैठक बुलाने से बहुत दिनों पहले ही पीएम मोदी द्वारा नोटबंदी का निर्णय लिया जा चुका था.
    प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी पर कई दिनों पहले से ही लिखी जा चुकी स्क्रिप्ट को पढ़कर कैमरे पर रिकॉर्ड व एडिट भी करवा लिया था, जिसे जनता ने प्रधानमंत्री मोदी का “लाइव” भाषण समझकर देखा-सुना.
    पीएम मोदी ने ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ को मीडिया में लाइव बैंड के साथ प्रसारित करने को कहा था, जिसे देश के तमाम चैनलों ने लाइव बैंड के साथ ही प्रसारित किया.
    पीएम मोदी ने देश की जनता को बरगलाने के लिए ऐसा दिखावा किया कि मानों उन्होंने अचानक ही रात 8 बजे राष्ट्र को संबोधित किया हो.
    यह अचानक घोषणा वाला नाटक इसलिए किया गया, ताकि देश की जनता को भरोसा हो जाए कि प्रधानमंत्री मोदी ने मामले को बेहद गोपनीय रखा है, लेकिन ऐसा हरगिज नहीं था.
    पीएम मोदी ने अपने करीबी पूंजीपति मित्रों व अन्य लोगों को नोटबंदी के बारे में बहुत पहले ही बता दिया था.
    नोटबंदी के चलते आर्थिक आपातकाल जैसे हालात पैदा हो गए थे. देशभर में सैंकड़ों लोगों की जान चली गई थी.
    तब मैंने राष्ट्रहित व जनहित में 24 नवबंर 2016 को भारतीय प्रेस क्लब में प्रेसवार्ता कर नोटबंदी से जुड़ी बहुत सी बातों का खुलासा किया और साथ ही पांच पेज़ की प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की.
    पीएमओ-प्रसार भारती की जांच कमेटी के सामने जब मैं उपस्थित हुआ, तब वहां दूरदर्शन के महानिदेशक ने मुझसे पूछा कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम भी रिकॉर्डेड होता है और प्रसारण से ‘एक घंटे’ पहले ही कॉपी हमारे पास आती है, तो आपने उसका खुलासा क्यों नहीं किया?
    डीजी की बात सुनकर मैं मुस्कुराने लगा था.
    मेरे मुस्कुराने के पीछे की वजह आप समझ सकते हैं न.—————————————————-Ujjwala Tupsundre
    21 November at 16:53 ·
    जयराम रमेश की माने तो भाजपा इंदिरा गाँधी के काफी समीप रही क्योंकि उनकी वेदों में रुचि थी…. और पंडित जवाहरलाल भी इन् क़िताबों से सन्दर्भ लें कर अपने भाषणों में बखूबी इस्तेमाल करते थे..और् धर्म का प्रदर्शन करने से बचते थे……!!!!!
    लेकिन् इंदिरा गाँधी को भाजपा नजदीक मानता था इसलिए ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार करवाया गया जनरल सुंदर ने 2000 सिक्खों को मौत के घाट उतार दिया बल्कि इंदिराजी को आश्वस्त कराया गया था कि जीवित हानि नहीं होगी खासकर मासूमो की तो बिल्कुल नहीं…….!!!
    सिक्ख माने या न् माने उन के खिलाफ् की गई साजिश
    हिंदुत्वादी ब्राह्मणी ताकतों के अंतगर्त ही रहीं…….अपनी गलती की सजा इंदिरा ने मन से स्वीकार की………यहीं बात राजींव गाँधी पर् भी लागू होती है…….किंतु यह सब पर्दे के पीछे का सच है………. अब राहुल गांधी का “टेम्पल रन” हिंदु वोटर्स का ध्यान खींचने के लिए हैं तो यह कांग्रेस की एक नाकाम कोशिश है….. जवारलाल नेहरू ….इंदिरा गांधी तक देश के आम।लोगों को पता नहीं था कि वे किस जाति से है…. वे हिन्दू ही है बस इतना पता था….दोनों ने अपने हिंदुत्व को अपने सार्वजनिक जीवन पर् हावी नहीं होने दिया…राजींव गांधी ने भी यह परंपरा निभाई थी लेकिन् इसका यह मतलब नहीं कि उनकी धर्म या भगवान पर् आस्था नहीं थी…जबकि राहुल का झुकाव तो प्राकृतिक रूप से ईसाई धर्म के प्रति होना चाहिए लेकिन् जिस घर में राजनीति -मानवता ही धर्म है उनके लिए निधर्मी ,समधर्म समभाव तथा धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली का अनुकरण काफी सहज है….नेहरू -गाँधी परिवार के इस मौलिक अधिकार पर् कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता…. वे शिवमंदिर जाएँ या और कहीं भी….लेकिन् बीजेपी व हिंदुत्व के प्रभाव में आकर राहुल गाँधी ऐसा कर रहे तो यह सरासर गलत है….क्योंकि कांग्रेस का वोटर कभी भी कट्टर हिंदुत्ववादी रहा ही नहीं ….आज बीजेपी को दम्भ हैं सम्पूर्ण बहुत का…जिसका प्रमाण कुल मिलाकर 31 प्रतिशत का ही है बाकी का 35/37 प्रतिशत अन्य पार्टियों में बिखरा पड़ा है और अन्य साइलेंट वोटर यह चुनावी प्रक्रिया से दूर है…जिसमें सभी धर्म के लोगों का समावेश है मतलब हिन्दू बहुसंख्यक होकर भी केवल 20 से 30 प्रतिशत ही कट्टर हिंदुत्व के पक्षधर है जिनमें विकास की परिभाषा भी निहित हैं
    अब तो सुना है के राहुल गाँधी कांग्रेसाध्यक्ष पद भी सँभालने की राभ पर् हैं और उन्हें भारत के जमीनी की बुनियादी ढाँचे के अध्ययन की कमीं हैं तो वे राजनीतिक् शह-मात का खेल खेल पाएंगे……????————————–Ujjwala Tupsundre
    16 November at 14:14 ·
    मुझे मर्यादा ,लिहाज तथा किसी भी धर्म-संस्कृति के शिष्टाचार बेहद पसंद हैं लेकिन् उसके लिए जबतक मैं न् चाहूं के मुझे क्या करना चाहिए….कोई ज़बरदस्ती करता है या करवाता हैं तब् उन सबको उखाड़ फेंकने से मुझे कोई हिचकिचाहट होती नहीं…..!!!!!
    बोले तो मेरी बला से….Ujjwala Tupsundre
    15 November at 20:00 ·
    भूख,प्यास,हगना, मूतना और सेक्स यह किसी भी जीवजन्तु से लेकर इंसान जानवर तक बुनियाद हक़ों में शुमार हैं…. इंसान के लिए नीति एवं धर्म की निर्मिती इन् सब जरूरतों के नियमितीकरण व नियमन करने के लिए हुआ हैं…… बशर्ते इसमें हिंसा या लालच का समावेश ना हो दुनियाभर में इसे अपराधों के श्रेणी रखा हैं….. किंतु भाजपा-आरएसएस जैसे अतिवादी आतंकवादियों ने इसकी नफरतों की हदें पार की हैं….नरेंद्र मोदी ने गुजरात से संघ का प्रभाव कम् करने के लिए संघ कार्यकर्ता संजय जोशी की अश्लील सीडी काण्ड करवा कर स्वयं को स्थापित किया क्योंकि संघ मोह-माया का त्याग करने का दांवा करते हैं उस वक्त यह फार्मूला चल गया….बुखार ही क्यों न् हो….?? ज्यादा दिन तक रहा तो दवाई बदल के देंनी पड़ती यह सीधा सिंम्पल नुस्खा अगर मोदी जी य्या उनकी टीम न् समझ पाई तो इन् लोगों की बेवकूफ़ी के क्या कहने….हो सकते हैं…..????
    खैर….जब मौत होनी है तो कौन रोक सकता है….??
    हम तो हार्दिक पटेल की बात कर रहे थे….जब बीजेपी के वृद्ध मंत्रीगण-नेता खुद का राशन कार्ड बनवाने पे तुले हो तो हार्दिक जैसे जवान छोकरे ने बनवाया या बनवा दिया तो फ़र्क क्यो पड़ना चाहिए…..???
    सुना है हार्दिक की और एक सीडी बाहर लॉन्च की गई….जिसमे वह अपने दो दोस्तों के साथ एक लड़की से आपत्तिजनक (पता नहीं किसे आपत्ति है) स्थिति में दिखाई दे रहा….अब सवाल यह कि आपत्ति तो उस लड़की को होनी चाहिए हमें क्यों हो रही है….???
    जबकि बीजेपी को गर्व होना चाहिए हार्दिक ,उसके दोस्त और वह लड़की भारतीय संस्कृति का ही वहन कर रहे है….खजुराहों के शिल्प इसका जीता जागता उदाहरण व सुबूत भी है और माता द्रौपदी पंचपति ….पांच पांडवों की चहेती और अधिकृत पत्नी हमारी संस्कृति की धरोहर व आदर्श हैं….. यह दोगलापन है बीजेपी का…..हिन्दू संस्कृति को मिट्टी में मिलाने का…..जबकि हमारे हिन्दू भाई और बहनें कितना नीतिमान जीवनयापन करते हैं इन् कट्टर लोगों ने तो आमजनों का जीवन दुश्वार कर रखा हैं….. भाई कोई तो इन्हें रोको

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