पुण्य प्रसून बाजपेयी

राजधर्म के रास्ते पर भटक तो नहीं गये मोदी-योगी ?


धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म । यूं तो ये कथन लोहिया का है । पर मौजूदा सियासत जिस राजधर्म पर चल पड़ी है, उसमें कह सकते है कि बीते 25 बरस की राजनीति में राम मंदिर का निर्माण ना होना धर्म की दीर्घकालीन राजनीति है । या फिर मंदिर मंदिर सीएम पीएम ही नहीं अब तो राहुल गांधी भी मस्तक पर लाल टिका लगाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो राजनीति अल्पकालीन धर्म है । या फिर पहली बार भारतीय राजनीति हिन्दुत्व के चोगे तले सत्ता पाने या बनाये रखने के ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ मंदिर है । यानी धर्म को बांटने की नहीं धर्म को सहेजकर साथ खड़ा होकर खुद को धार्मिक बताने की जरुरत ही हिन्दुत्व है । क्योंकि पहली बार राजधर्म गिरजाधर हो या गुरुद्वारा या फिर मस्जिद पर नहीं टिका है । यानी हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने की जरुरत अब नहीं है । बल्कि हिन्दू संस्कृति से कौन कितने करीब से जुड़ा है राजनीति का अल्पकालीन धर्म इसे ही परिभाषित करने पर जा टिका है । इसलिये जिस गुजरात में अटल बिहारी वाजपेयी मोदी की सत्ता को राजधर्म का पाठ पढ़ा रहे थे । उसी गुजरात में राहुल गांधी को अब मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है । तो क्या हिन्दुत्व की गुजरात प्रयोगशाला राजनीतिक मिजाज इतना बदल चुका है कि मंदिर ही धर्म है । मंदिर ही सियासत ।

यानी नई राजनीतिक चुनावी लड़ाई हिन्दू वोट बैंक में साफ्ट-हार्ड हिन्दुत्व के आसरे सेंध लगाने की है । या फिर जाति-संप्रदाय की राजनीति पर लगाम लगती धर्म की राजनीति को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश । क्योकि यूपी ने 1992 में राममंदिर के नाम पर जिस उबाल को देखा । और हिन्दु-मुस्लिम बंट गये । और 25 बरस बाद अयोध्या में ही जब बिना राम मंदिर निर्माण दीपावली मनी तो खटास कहीं थी । बल्कि समूचे पूर्वाचल में हर्षोउल्लास था । तो क्या हिन्दुत्व की राजनीतिक प्रयोगशाला में सियासत का ये नया घोल है जहा हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने से आगे हिन्दुत्व की बडी लकीर खिंच कर सियासत को मंदिर की उस चौखट पर ले आया गया है जहा सुप्रीम कोर्ट का हिन्दुत्व को लेकर 1995 की थ्योरी फिट बैठती है पर 2017 की थ्योरी फिट नहीं बैठती। क्योंकि याद कीजिये सुप्रीम कोर्ट में जब हिन्दु धर्म और राजनीति में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो दिसबर 1995 में जस्टिस वर्मा ने कहा , ‘ हिंदुत्व शब्द भारत यों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। इसे सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। ” और याद किजिये 22 बरस बाद जब एक बार पिर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रचार में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 1995 की परिभाषा से इतर कहा , “धर्म इंसान और भगवान के बीच का निजी रिश्ता है और न सिर्फ सरकार को बल्कि सरकार बनाने की समूची प्रक्रिया को भी इससे अलग रखा जाना चाहिए। ” तो सुप्रीम कोर्ट ने राजसत्ता के मद्देनजर धर्म की जो व्याख्या 1995 में की कमोवेश उससे इतर 22 बरस बाद 2017 में परिभाषित किया । पर 1995 के फैसले का असर अयोध्या में बीजेपी दिखा नहीं सकी । और जनवरी 2017 के पैसले के खिलाफ पहले यूपी में तो अब गुजरात के चुनावी प्रचार में हर नजारा उभर रहा है ।

और संयोग ऐसा है कि गुरात हो या अयोध्या । दोनो जगहो पर राजधर्म का मिजाज बीते डेढ से ढाई दशक के
दौर में बदल गया । ये सवाल वाकई बडा है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद सोनिया गांधी ने द्वारका या सोमनाथ में उसी तरह पूजा अर्चना क्यों नहीं की जैसी अब राहुल गांधी कर रहे है । 2002 के बाद पहली बार है कि काग्रेस नेता मंदिर मंदिर जा रहे हैं। और 1992 के बाद से अयोध्या में बीजेपी के किसी नेता ने दीपावली मनाने की क्यो नहीं सोची जैसे अब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीपावली मनायी जबकि बीजेपी के कल्याण सिंह , रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह सीएम रहे । और कल्याण सिंह ने तो 1992 में बतौर सीएम धर्म की राजनीति की नींव रखी । तो तब कल्याण सिंह के मिजाज और अब योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक मिजाज । अंतर खासा आ गया है । लेकिन मुश्किल ये नहीं कि राजनीति बदल रही है । मुश्किल ये है कि -कल्याण सिंह हार्ड हिन्दुत्व के प्रतीक रहे । योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व का टोकनइज्म यानी प्रतिकात्मक हिन्दुत्व कर रहे है । और समझना ये भी होगा कि पीएम बनने के साढे तीन बरस बाद भी पीएम मोदी अयोध्या नहीं गये । पर सीएम बनने के छह महीने पुरे होते होते योगी अयोध्या में दीपावली मना आये । यानी एक तरफ राहुल गांधी भी मंदिर मंदिर घूम कर साफ्ट हिन्दुत्व को दिखा रहे हैं। और दूसरी तरफ केदारनाथ जाकर पीएम मोदी तो अयोध्या में योगी हिन्दुत्व का टोकनइज्म कर रहे है । तो कौन सी राजनीति किसके लिये फायदेमंद या घाटे का सौदा समझना ये भी जरुरी है । क्योकि जनता सत्ता से परिणाम चाहती है। और गुजरात से लेकर 2019 तक के आम चुनाव के दौर में अगर कांग्रेस या कहे राहुल गांधी भी टोकनइज्म के हिन्दुत्व को पकड चुके है । तो मुश्किल बीजेपी के सामने कितनी गहरी होगी ये इससे भी समझा जा सकता है कि योगी का हिन्दुत्व और मोदी का विकास ही आपस में टकरायेगा । क्योंकि संयोग से दोनों का रास्ता टोकनइज्म का है । और गुजरात में बीजेपी के सामने उलझन यही है कि गुजरात माडल का टोकनइज्म टूट रहा है । औोर हिन्दुत्व के टोकनइज्म की सत्ता अभी बरकरार है ।

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7 thoughts on “राजधर्म के रास्ते पर भटक तो नहीं गये मोदी-योगी ?

  1. सिकंदर हयात

    कृष्ण प्रताप सिंह क्या पता, यह दीयों की विडंबना है, अयोध्या की, या दोनों की! एक साथ सर्वाधिक दीये जलाने का जो कीर्तिमान अब तक पंजाब के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी बाबा गुरमीत राम रहीम के नाम था, अब अयोध्या के बहाने उस उत्तर प्रदेश सरकार के नाम है, जिसके राजमद ने मुहब्बत की अप्रतिम निशानी ताजमहल तक को सांप्रदायिक घृणा का शिकार और ‘कलंक’ बना डाला है!जो भी हो, इसे कोई और क्या समझे, जब वह अयोध्या भी नहीं समझ पा रही, जो गत बुधवार को कुछ घंटों के लिए उस पर थोप दी गई बेहूदा सरकारी जगर-मगर के बीच अनमनी सी इस कीर्तिमान का बनाया जाना देखती रही और अब जगर-मगर खत्म होते ही नए सिरे से उदास हो गई है.इतनी उदास कि कई लोगों को उसकी हालत देखकर सीता का वह शाप याद आने लगा है, जो उन्होंने तब दिया था, जब उनके कहें या स्त्री जीवन के बेहद कठिन दिनों में उन्हें एकदम अकेली करके अयोध्या सिर्फ राम ही होकर रह गई थी. याद करने वाले पूछते हैं कि सीता शाप नहीं देतीं तो क्या करतीं, अयोध्या में उनकी कौन-सी दुर्गति नहीं हुई?यकीनन, आज अयोध्या सीता जैसी ही अकेली है. उन्हीं जैसे कठिन दिनों के सामने खड़ी. इतनी विचलित कि यह भी नहीं समझ पा रही कि इस उदासी का गिला किससे और कैसे करे? बुधवार की जगर-मगर देखने तो सैकड़ों न्यूज चैनल दौड़ पड़े थे, अब उसकी उदासी को खोज-खबर लेने वाला कोई एक भी नहीं है.न्यूज चैनल तो न्यूज चैनल, अखबारों को भी उसके गिले-शिकवों में अब कोई रुचि नहीं है. सो भी जब सत्ताधीशों द्वारा बताया गया है कि उसे उदास करने के प्रयासों का यह अभी पहला चरण है. ऐसे तीन चरणों के बाद तो जानें क्या-क्या सहना और देखना पड़े उसे. वैसे भी पुरानी कहावत है उसके यहां: जहं-जहं चरण पड़े ‘संतन’ के तहं-तहं बंटाधार.अयोध्या के जिस साकेत पीजी कालेज से बुधवार को ‘नयनाभिराम’ शोभायात्रा निकाली गई, उसी में हिंदी पढ़ाने वाले वरिष्ठ कवि अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि अभी तो उसकी उदासी लगातार बढ़नी ही बढ़नी है. क्योंकि उसके नाम पर त्रेतायुग की वापसी का स्वांग जो रचा जा रहा है, अपनी कीर्तिपताका और ऊंची करने को व्यग्र उसकी हवस का अभी ऐसे कई और कीर्तिमान बनाने का मंसूबा है.
    यकीनन, यह मंसूबा वह बिना सब कुछ को अस्त-व्यस्त किए और उलटे-पलटे नहीं पूरा कर सकती. इस मंसूबे द्वारा किए गए कई उलट-पलट तो अभी से साफ दिखते हैं.उनमें से एक यह कि इस बार अयोध्या में छोटी दीपावली बड़़ी हो गई और बड़ी दीपावली यह देखकर सिर धुनने को अभिशप्त कि भले ही छोटी दीपावलीपर उसके घाटों पर जलाये गए एक लाख सतासी हजार दीयों से आस-पास के गरीबों व वंचितों के दिल इस तरह जल रहे थे कि वे उनका ज्योतित होना निहारने की हिम्मत नहीं कर पाये, या कहना चाहिए कि प्रायः उनसे डरे रहने वाले सत्ताधीशों के ‘व्यापक सुरक्षा प्रबंधों’ ने उनकी औकात इतनी ही रहने दी कि उन दीपपंक्तियों को उनके जयकारों के साथ टीवी के परदे पर देख सकें, लेकिन सुबह होते ही वंचना की आग उन्हें उन घाटों पर खींच लाई.
    वहां उनके हुजूम को हवा द्वारा बुझा दिए गए दीयों में बच रहे तेल को शीशियों वगैरह में भरते देखने के लिए वाकई पत्थर का कलेजा चाहिए था! इसलिए कि वे होली खेलने के लिए महाराज के माल पर टूट पड़ने वाले मिर्जा नहीं थे.
    जिस सत्ता ने घाटों पर दीये जलवाये थे, उसने उन्हें असहाय करके रख देने के बाद फिक्र नहीं की थी कि उनके घरों में दीये कैसे जलेंगे?
    जब उन्हें रामराज्य का सपना, माफ कीजिएगा, सब्जबाग दिखाया जा रहा था, वे उस जूठे बासी तेल से अपनी देहरी रोशन करने का सपना देखने को विवश थे! कृष्ण प्रताप सिंह दा वायर से सभार

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  2. सिकंदर हयात

    Awesh Tiwari
    Yesterday at 16:08 ·
    इंडिया टीवी कह रहा ” भोले बाबा का बेटा पीएम मोदी”, मेरे मन मे ख्याल आया हम तो घुइयां ही छीलते रह गए।Awesh Tiwari
    Yesterday at 19:46 ·
    भाजपा सरकार को सारा काम छोड़कर पहले पीएम की इमेज मेकिंग में लगना चाहिये खुद पीएम मोदी को आम आदमी के हक में कुछ गंभीर निर्णय लेने होंगे। दरअसल देश मे यह आम धारणा बनती जा रही है कि पीएम मोदी के समर्थक औसत बुद्धि के होते हैं। बहुत सारे समर्थक ऐसे हैं जो अपनी जुबान से कभी नही कहते कि मैं मोदी समर्थक हूँ Awesh Tiwari
    22 hrs ·
    यह अच्छा ही हो रहा था कि कांग्रेस के द्वारा शुरू की गई तमाम योजनाएँ मौजूदा सरकार में पूरी हो रही थी। पीएम मोदी इन सबका उदघाटन कर रहे थे,भक्त भी खुश,भाजपा भी खुश। लेकिन तभी एक बड़ी गड़बड़ी हुई ,बीजेपी ने कांग्रेस के बक्से से निकले जीएसटी पर भी हाथ डाल दिया।नतीजा आप सब देख रहे हैं। इसको कहते है दूसरे के घर से सांप पकड़कर लाना और अपने ही घर में छोड़ देना।Awesh Tiwari
    1 hr ·
    गाजीपुर के दैनिक जागरण के संवाददाता और आरएसएस कार्यकर्ता राजेश मिश्रा की हत्या बताती है कि इस बात से कत्तई फर्क नही पड़ता कि आप भाजपा सरकार के चरणों मे लहालोट होने वाले अखबार से जुड़े है या फिर सर्वाधिक ताकतवर संघ के सदस्य है। अगर आप पत्रकार हैं तो मारे जाएंगे। राजेश से मैं एक बार मिला हूँ अच्छा लड़का था। ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे और जागरण को सुबुद्धि कि वो कल सुबह आठ कालम का शीर्षक लगा सके ‘मेरे संवाददाता को भी मार डाला”——————————— Sanjay Shraman Jothe
    2 hrs ·
    एक बार फिर:
    पौ फटते ही श्रीयुत विज्ञानभट्टकलशधर शास्त्री अपने छात्रावास से निकल कर लौहपथगामिनी स्थानक की ओर निकल पड़े. देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्कृत महाविद्यालय से “मास्टर्स इन वैदिक साइंसेस” की महा उपाधि लिए पवित्र आर्यभूमि पर वैदिक विश्व महाविज्ञान की पुनर्स्थापना का प्रचंड संकल्प लिए वे बढे जा रहे थे. दायीं कांख में गहन धार्मिक (गधा) ग्रंथ चपेटे, बाईं कांख में मृगचर्म और कुश के तीन आसन संभाले कमण्डलु में गंगाजल लिए तुलसी दल और चिरोंजी चबाते हुए वे लम्बे लम्बे डग भरते जाते थे. मस्तक पर केशर चन्दन का मोटा लेप, शुभ्र उज्जवल जनेऊ लपेटे और मोटी सी शिखा में आध पाव चमेली का तेल चुपड़े हुए उनकी शोभा देखते ही बनती थी.
    स्थानक पहुंचाते ही सीधे वे ट्रेन की बोगी में जा घुसे. घुसते ही देखा कि कुछ महिलायें सीट पर झुण्ड बनाकर ताश खेल रही हैं और असभ्य भाव से हंसी ठिठोली कर रही हैं. कुछ कुलच्छिनी और कुलटा नारियां चलायमान दूरभाष यंत्र पर योयो हनी सिंह के गीत भी सुन रही हैं और मगन हुई जा रही हैं. शास्त्री जी को आता देख महिलायें कुछ संभली. इस कलिकाल के उत्तरार्ध में सतयुगी वेशभूषा धारण किये श्रीयुत शास्त्री को देख उन्हें कुछ जुगुप्सा हुई और वे मुस्कुराकर उन्हें घूर घूरकर देखने लगीं.
    अपने ब्रह्मचर्य पर आसन्न इस “भीषण संकट” को देखते हुए शास्त्रीजी खडाऊ उतारकर जोर से उछले और ऊपर की सीट पर मृगचर्म फैलाकर बद्धपद्मासन में ध्यानमुद्रा लगाकर बैठ गए. एक घंटे बाद जब उनका “कुपित ब्रह्मचर्य” शांत हुआ और जब कुछ पुरुषों का वार्तालाप उन्हें सुनाई दिया तब उन्होंने आँखे खोली और पूछा:
    “भद्रजनों आपने किस नगरी की ओर प्रस्थान किया है ?”
    लोगों को उनका प्रश्न समझ में नहीं आया एक मुंह फट मनुष्य असंयत भाषा में बोला “भैयाजी तनिक हिंदी में बोलिये ना”
    शास्त्री जी को भीतर तो इन मूढों के अज्ञान पर क्रोध आया, लेकिन प्रगट रूप से आँखें बंद कर उन्होंने अपने संस्कृतनिष्ठ प्रश्न का आंग्लभाषा में अनुवाद किया और गरजे:
    “भेयर इज यू गोइंग?”
    लोग प्रश्न समझकर एकसाथ बोले
    “अहमदाबाद”
    उत्तर सुनकर शास्त्रीजी के चहरे पर विस्मय और प्रसन्नता के प्रगाढ़ भाव एकसाथ उभरे. दो पल अवाक रहकर उन्होंने कुछ अन्य लोगों से पूछा “भेयर इज यू गोइंग?” अगलों ने भी मुस्कराकर कहा अहमदाबाद जा रहे हैं. उनका उत्तर सुनकर शास्त्रीजी और अधिक आनंदित हुए. फिर अपने सीट पर लटकते हुए उन्होंने पीछे वालों से भी यही प्रश्न पूछा फिर से उत्तर मिला – अहमदाबाद
    अंतिम उत्तर सुनकर वे भाव विभोर हो गए और आनंदातिरेक से उनके अश्रु निकल पड़े. लोग घबराकर उनके आसपास इकट्ठे हो गए और पूछा – “महाराज आप रो क्यों रहे हैं तबीयत तो ठीक हैं ना कुछ ज्यादा तो नहीं खा गए नाश्ते में ?”
    महाराज बोले “ बंधुओं चिंतित न हों, ये ख़ुशी के आंसू हैं, आज भारत में वैदिक विश्व महाविज्ञान के चमत्कार को साक्षात देखते हुए मेरे आँख नाक भर आये हैं”
    वही मुंह फट मनुष्य फिर बोला:
    “हम कछु बूझे नहीं … तनिक बिस्तार से बताइये महाराज”
    शास्त्रीजी बोले:
    “नरश्रेष्ठों, पिछली बार जब मैं ट्रेन में बैठा था तब कांग्रेस की कलमुंही सरकार थी तब वैदिक विश्व महाविज्ञान का इतना प्रचार नहीं हुआ था और उस समय पूरी की पूरी ट्रेन सिर्फ एक दिशा में एक ही नगरी की ओर जाती थी. आज प्रभु की अनुकम्पा से स्थिति कितनी बदल गयी है. अब आप ही देखिये एक ही ट्रेन में नीचे की सारी सीटें अहमदाबाद जा रही हैं और ऊपर की सीटें प्रयागराज जा रही हैं!!!
    धन्य है वैदिक विश्वमहाविज्ञान की लीला …——————————————————————————-Ujjwala Tupsundre
    4 hrs ·
    टीपू सुल्तान ” मास रेपिस्ट था”
    अंनत कुमार हेगड़े
    ई का होता है भाई……????
    मास रेप सुना था…..बेचारी निर्भया ब्राह्मण कन्या पर् कुछ सवर्ण व शूद्रों ने मिलकर रेप कर उसे बर्बरता से मार दिया और इसके पहले फूलन देवी का मास रेप……फूलन ने एक लाइन में नग्न खड़ा कर दोषी सवर्णों के पिछवाड़े गोलियों दागी थी…..!!!
    लेकिन् पूरे मास का एक ही बन्दा कैसे रेप कर सकता है…..????
    क्या भाई वो इतने शालिग्राम घिस घिस कर पीता था…..????
    यानि टीपू भैया एक अकेले ने पूरे हिंदुस्तान को एकसाथ प्रेंग्नेंट किया था…..और तुम् सालों बीजेपी वालों टीपू की नाजायज औलादे हो…….??????
    -😜😜😜😜😜😜😜😜
    अंनत कुमार हेगड़े जी आप जाओ कर्नाटक सरकार द्वारा आयोजित टीपू सुल्तान के जयन्ति समारोह में….और जरा मोदी जी / योगी जी को भी ले जाओ
    हो सकता है उनकी रूह इन् दोनों में घुस जाए तो हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ जाएं 😝😝😝😝😝😝😝😝😝
    कमज़र्फ क्या बोलते है इन्हें तो भी समझता है या नहीं…..????😜😜😜😜😜😜😜Ujjwala Tupsundre
    8 hrs ·
    अजित डोभाल को ना चायना से लड़ने का मौका मिला न् पाकिस्तान से और न् ही हमें खुश् होने का अवसर……!!!
    कोई बात नहीं भिड़ू अब जल्द डोभाल दाऊद इब्राहिम की प्रोपर्टी पता करने में लगे जैसे ही वह लोकेट होती है तत्काल जब्ती की कार्रवाई होगी…..तब् यह जो दिवाली के पटाखे रखे हैं जो कोर्ट की वजह फूटे नहीं वह अब फोड़े जाएंगे……एक मराठी में कहावत है “वड्या च् तेल वांग्या वर’ मतलब एक कि खीज दूसरे पर् निकालना
    बेचारा दाऊद……😝😝😝😝Ujjwala Tupsundre
    10 hrs ·
    ‘ताजमहल”
    God’s Own Country
    केरल सरकार ने किया सैल्युट और कहा हमें अपनी धरोहर पर् गर्व है , प्रेम के इस प्रतीक को देखने भारत आ जाओ……!!!!
    पर्यटन दिवस के बुकलेट में सरकार का आवाहन
    यह द्रवीडियन्स ना उन आर्यों के इरादों में ऐसी ही खूंटी गाढ़ देते हैं…..😜😜😜😜😜😜
    अब ले लो बे मजे भक्तों…😝😝😝😝😝😝😝😝

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  3. VIJAY AGARWAL

    Your statement is very shameful because you are unable to involve in corruption.I can write so many works done by nda government but secondly now in U P culprits can not survive. Thirdly if you are feeling unsafe can move from india.

    Reply
  4. tarun kumar

    तुम्हारे मुंह से ये बात अच्छी नहीं लगती है,क्या किया था केजरीवाल से मिलकर, पत्रकारिता धर्म निभा रहे थे,थू है तुम पर जो बिक गया

    Reply
  5. सिकंदर हयात

    Pushya Mitra
    3 hrs ·
    “सिंगापुर में 7% जीएसटी लगा कर भी हेल्थ सर्विस फ्री है और हमारे देश में 28 फीसदी जीएसटी लगा कर भी फ्री नही है। हम दवा पर 12% जीएसटी लगाते हैं लेकिन शराब को जीएसटी से बाहर रखते हैं।
    एक अस्पताल में ऑक्सिजन की कमी से बहुत सारे बच्चों की जान गई। जानते हैं क्यों? क्योंकि ऑक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को देने के लिए पैसे नहीं थे। एक अस्पताल में आपरेशन के दौरान बिजली चली गई और 4 मरीज़ मर गए। लोग सरकारी अस्पताल जाने से डरते हैं। और यही डर प्राइवेट अस्पतालों की पूंजी है। वे इसी डर पर पनपते हैं।”
    एक तमिल फिल्म में यह डायलॉग था, यह डॉयलॉग केंद्र सरकार को आपत्तिजनक लगा और फिल्म निर्माता को इसे हटाना पड़ा. खैर… इस डॉयलॉग को यहां, सोशल मीडिया पर तो जिंदा रख सकते हैं…? क्या…Pushya Mitra
    6 hrs · आखिर हिंदी का स्वतंत्र पत्रकार कैसे सर्वाइव करे………………………………………………….(आज सवेरे एक स्वतंत्र पत्रकार के बारे में एक पोस्ट लिखा था. उस पर चली बहस के बाद जो दिमागी चकल्लस चली उसी से यह लेख निकाला है.)
    हिंदी पत्रकारिता में आज भी एक स्वतंत्र पत्रकार का सर्वाइवल मुश्किल है. विभिन्न अखबारों में फीचर और आलेख लिखने वाले कुछ सीनियर पत्रकार भी अगर सर्वाइव कर रहे हैं तो इसमें या तो उनके व्यक्तित्व और अनुभव का योगदान है, या मीडिया हाउस में उनकी व्यक्तिगत सेटिंग का. एक क्राइम रिपोर्टर, एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर या एक रोविंग संवाददाता या फिर एक ग्रामीण संवाददाता. अपनी खबरों की दम पर स्वतंत्र रूप से अपना जीविकोपार्जन करने में विफल रहता है. ऐसे में उसे किसी और तरह का धंधा करना पड़ता है. जो ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेलिंग तक कुछ भी हो सकता है.
    अपने पत्रकारीय जीवन में कई ऐसे पत्रकारों से मिलना हुआ जिनमें सरकार और समाज के ऐसे तबके से खबर तलाश लाने का हुनर है, जिसके बारे में हम आप सोच भी नहीं सकते. इसकी वजह है कि उसकी पैठ हर जगह है. वह अच्छी कॉपी नहीं लिखता, मगर उसकी खबरें विस्फोटक होती हैं. मगर क्या कोई मीडिया हाउस इस स्थिति में है, या हिंदी में कोई ऐसी परंपरा है, कि संपादक उसकी खबरें वाजिब कीमत देकर खरीद सके. नहीं. यह परंपरा अंगरेजी में है, अंगरेजी के कई साथी स्वतंत्र पत्रकारिता करते हुए अच्छी तरह जी रहे हैं. मगर हिंदी में खबरों की कोई कीमत नहीं है, क्योंकि हमारी पूरी पत्रकारिता अब राज्य के आइपीआरडी की सेटिंग में खर्च हो रही है. हम उनकी गाइडलाइन के हिसाब से खबरें लिख रहे हैं, क्योंकि मीडिया हाउस का अपना सर्वाइवल मुख्यतः सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है, और इसके लिए कोई कारगर पॉलिसी नहीं है. सरकार के मुखिया के मूड पर निर्भर है कि वह किस मीडिया हाउस को विज्ञापन देगा, किसे नहीं. ऐसे में हिंदी पत्रकारिता बार-बार दंडवत हो जाती है.
    हालांकि कुछ लोग सीना तानकर खड़े भी होते हैं. जैसे राजस्थान में पत्रिका समूह करता रहा है. आज फिर वह वसुधा राजे के खिलाफ तन कर खड़ा हो गया है. मगर ऐसी मिसालें कितनी हैं? उंगलियों पर गिनने लायक. जाहिर है, इस माहौल में खबरों की जरूरत लगातार कम होने लगी है. बिहार का फार्मूला है, एक मोदी की खबर, एक नीतीश की खबर, एक शराबबंदी या बाल विवाह या दहेज प्रथा की सक्सेस स्टोरी. बस हो गया. यही पत्रकारिता है. हर राज्य का अपना पैटर्न होगा.
    तो ऐसे में जो खालिस पत्रकार हैं, क्या करें? उनका भी परिवार है, उन्हें भी रोजी-रोटी की फिक्र है. उनके सामने तीन रास्ते हैं, पहला, या तो वह सिस्टम का हिस्सा बन जाए और सरकारोन्मुखी पत्रकारिता का हुनर सीख ले. अपने मालिकान के लिए अगर सरकारों से डील करना आप सीख गये तो फिर आप पत्रकारिता जगत के शहंशाह हैं. दूसरा रास्ता है, हम जैसों का. जो परिधि पर हैं. परिवार है, इसलिए नौकरी करना जरूरी है. मगर पहला रास्ता चुन नहीं सकते. कभी सरकारोन्मुखी कर लेते हैं, बीच-बीच में जनोन्मुखी भी पुश करने की कोशिश करते हैं. कुछ नहीं होता है, तो अपना फ्रस्टेशन सोशल मीडिया में निकालते हैं. मीडिया हाउस भी हमें झेलता है, हम भी झेलते हैं. और संतुलन बनाये रखते हैं. हालांकि यह संतुलन कभी भी खत्म हो सकता है.तीसरा रास्ता है, आप इस सिस्टम से आजाद हो जायें, या फिर आपको खुद आपका हाउस आजाद कर दे. ऐसे में आपकी लाचारी है कि आप स्वतंत्र पत्रकारिता करें. मगर कोई मीडिया हाउस आपकी खबरों को जगह नहीं देगा. आपके पास दिल्ली के बड़े और पटना के छोटे ऑनलाइन पोर्टलों का विकल्प बचता है. मगर देखने वाली बात यह है कि वहां भी आपको कितना इंटरटेन किया जाता है. यह अच्छी बात है कि कुछ लोग फेसबुक पर भी लिखते हैं तो असर होता है. मगर रोजी-रोटी का क्या… यह बड़ा सवाल है. जाहिर है, इस सवाल पर हिंदी पत्रकारिता का भविष्य अटका हुआ है.
    हिंदी पत्रकारिता को दिल्ली के न्यूज चैनलों और पटना के अखबारों में मत तलाशिये. मीडिया हाउस की परिधि पर अटके और वहां से खारिज हो चुके स्वतंत्र पत्रकारों के अस्तित्व का इंतजाम कीजिये. देखिये, पत्रकारिता कैसे रंग लाती है. पाठकों को ऐसे पत्रकारों के सर्वाइवल का इंतजाम करना पड़ेगा. तभी हिंदी की पत्रकारिता बचेगी. वरना, सब देख, समझ और पढ़ ही रहे हैं…Pushya Mitra——————————————Urmilesh Urmil
    23 hrs ·
    अब उन्हें तमिल फिल्म Mersal पर आपत्ति है. उन्हें टीपू सुल्तान जैसे साम्राज्यवाद-विरोधी योद्धा को याद करने पर आपत्ति है. उन्हें ताजमहल से भी नफ़रत है. गालिब, फ़ैज़, कैफ़ी और साहिर, वे किसी को भी पसंद नहीं करते. कबीर, प्रेमचंद और रेणु भी उन्हें अपने नहीं लगते. शिक्षा, लोक-स्वास्थ्य और भूमि सुधार के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले केरल के विकास माडल से उन्हें चिढ़ है. एक शहीद फौजी की बहादुर बेटी गुरमेहर कौर उन्हें देशद्रोही लगती है. देश का श्रेष्ठ विश्वविद्यालय उन्हें देशद्रोहियों का अड्डा लगता है. जो भी उनसे असहमत हैं, जो भी उनकी आलोचना करने से डरते नहीं, वे पहले उसका चरित्र हनन शुरू करते हैं, फिर भी नहीं मानता तो उसे तरह तरह से डराते हैं, फिर भी नहीं मानता तो उसके खिलाफ कोई न कोई कुचक्र रचते हैं, फिर भी नहीं मानता तो उसे ‘निपटाने’ की योजना बनाते हैं. वे असहमति को कुचलने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं! पर यह बात वे अच्छी तरह जानते हैं कि वे अच्छे लोग नहीं हैं, उनके इरादे अच्छे नहीं! और इतिहास में नायक हमेशा अच्छे लोग बनते हैं। बुरे और बर्बर लोग इतिहास में खलनायक के रूप में दर्ज होते हैं!

    Reply
  6. सिकंदर हयात

    Jagadishwar Chaturvedi
    9 hrs ·
    मोदी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति –

    मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
    मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
    सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है
    मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।
    जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?
    वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।
    जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।
    कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।
    कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।
    मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।
    कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।
    मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
    बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
    मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
    आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
    एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि हैJagadishwar Chaturvedi————————Girish Malviya
    Yesterday at 18:00 ·
    ओवैसी फिर से चैनलो पर नजर आने लगा है , पहले रोहिंग्या, फिर ताजमहल फिर टीपू सुल्तान, मीडिया में गुजरात चुनाव के मद्देनजर हिंदुत्व को फिर मुख्यधारा में लाया जाएगा, कोई बहस इस बात पर नही होगी कि जीएसटी ओर नोटबन्दी ने व्यापार का भट्टा बिठा दिया है, सोशल मीडिया पर भी पेड लोगो की कोशिश यही रहती हैं कि हिंदू मुस्लिम जैसे इशू ज्यादा से ज्यादा चर्चा में रहे ओर मूल समस्याओं पर कोई बात न होने पाए,
    तीन तलाक निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने लिया पर सारा श्रेय मोदी सरकार को दिया गया, ओर उसी सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया तो गू की हांडी जज साहब पर फोड़ दी, सिर्फ इतनी सी घटना से आप समझ सकते है कि आपको विचारो को किस तरह से एक विशिष्ट दिशा मे मोड़ दिया जाता है,——————————————————-Vishnu Nagar
    6 hrs ·
    भूतपूर्व योग गुरू माननीय रामदेव जी पहले सारे रोगों का निदान योग में बताते थे।अब नहीं बताते।क्या योग ने वह शक्ति अचानक खो दी?अगर ऐसा हुआ है तो माननीय को इसका कारण बताना चाहिए।पतंजलि आया तो योग भूल गये,सारे रोगों का निदान पतंजलि आयुर्वेद में मिलने लगा।कल ऐलोपैथिक दवाएं बनाने लगेंगे तो सारे निदान वहाँ मिलने लगेंगे।आटा तक बनाने लगे,ब्यूटी प्राडक्ट तक बेचने लगे।पोल खोलू किताब पर रोक लगवाने लगे।वाह रे बाबा!और लगे हाथ यह भी बताते जाओ,अपने ब्यूटी प्राडक्ट का इस्तेमाल खुद भी करते हो या नहीं?या पर उपदेश कुशल बहुतेरे हो?Vishnu Nagar
    23 hrs ·
    हम मनुष्य आज तक यह बहस करते आ रहे हैं कि पहले रोटी या पहले स्वतंत्रता?कुछ कहते हैं पहले रोटी, कुछ कहते हैं पहले स्वतंत्रता।थोड़े ऐसे भी हैं, जो कहते हैं -रोटी और स्वतंत्रता, दोनों एक साथ।लेकिन मुझे लगता है कि चूहों(अन्य प्राणियों ने भी)ने बहुत पहले इस पहेली का सुलझा लिया है।वे पहले स्वतंत्रता चाहते हैं क्योंकि उनके लिए स्वतंत्रता ही रोटी है।वे दिनभर छुपते -छुपाते भटकते-लपकते हैं और कभी चुपड़ी , कभी सूखी रोटी हासिल कर ही लेते हैं।किसी दिन मेवा -मिष्ठान्न, किसी दिन खाली बासी रोटी।इसलिए जैसे ही किसी चूहे को आप रोटी के लालच में पिंजरे में बंद कर देते हैं,वह रोटी भूलकर, उसे छोड़कर, स्वतंत्रता के लिए छटपटाने लगता है।पिंजरे में बेचैन भागता- दौड़ता -उछलता है।उसे जंगल में भी छोड़ दो तो पिंजरे की क़ैद से निकलने को व्याकुल हो जाता है,पिंजरे में रहने की बजाय जंगल की तरफ भागने का खतरा उठाता है।
    इसके विपरीत मनुष्य की हालत है। जरूरी नहीं कि मनुष्य की स्वतंत्रता, उसकी स्वतंत्र -चेतना उसे रोटी मुहैया ही कराए , किसी दिन मेवा -मिष्ठान्न और किसी दिन सूखी रोटी ही दिलाए!वह भूखा भी मर सकता है बल्कि ऐसा मनुष्य भूखा ही मर सकता है इस देश में। इसलिए पिंजरे में बंद होने में वह सुरक्षा महसूस करता है। वह बहस ही करता रह जाता है और हल नहीं निकाल पाता, जबकि मनुष्य से निम्नतर प्राणी-जिसे मनुष्य पसंद नहीं करता-वह बहस कर नहीं सकता मगर अनुभव के आधार सही निष्कर्ष तक पहुँचा होता है।है न यह चमत्कार!Vishnu Nagar
    22 October at 15:31 ·
    हिंदू महिलाएँ अक्सर मंदिर ज्यादा जाती हैं और भजन गाने में आगे रहती हैं।मंदिर जाना उनके लिए कुछ देर के सिए स्वतंत्र रूप से घर से निकलने का बहाना है वरना जो कामकाजी नहीं हैं,वे निकल ही न पाएँ।शाम के समय अधेड़ और बूढ़ी औरतें पास ही पार्क में बहुत देर तक भजन करती हैं,जिनमें से कुछ पुरानी फ़िल्मों के तर्ज़ पर भी होते हैं।अच्छा तो नहीं लगता कि इतने सुंदर ढँग से गाये गए कई पुराने भजनों को भूलकर ये इस तरह से भजन गाती हैं।फिर धीरे धीरे उन्हें सुनते -सुनते-सुनते इसका कारण भी समझ में आया कि ऐसा क्यों है? हमारे समाज की जो दशा है -और जो कई मामलों में पहले अधिक बदतर थी-उसमें बेटी हो या पत्नी उसे घर में भी अपनी पसंद का गाना गुनगुनाने तक की छूट नहीं रही है।घर में कोई भी कोई अपमानजनक टिप्पणी कर सकता है।अब अधेड़ या बूढ़ा होने के अपने बंधन हैं।तो शायद वे अपनी गाने की वह अतृप्त इच्छा को भजनों का रूप देकर पूरी करती हैं।इसमें अपनी गायन क्षमता का भी परिचय दूसरों को देने का मौक़ा मिलता है और अपनी पसंद के स्त्री -समूह में होने का अपना सुख भी है और सुखों से अलग सुख!पता नहीं मैं कितना सही हूँ।
    See Translation————————————————————————Ashutosh KumarYesterday at 00:45 · 1955 का अमरीका। मैकार्थीवाद का शिखर वर्ष। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी शहरों में छुपे हुए कम्युनिस्टों की शिनाख़्त।
    तब प्रथम सेना मुख्यालय ने एक मैनुअल जारी किया। सफेदपोश कम्युनिस्टों को पहचानना कठिन है, क्योंकि वे किसी भी रंग , धर्म , जाति और लिंग के हो सकते हैं। किसी भी जगह पाए जा सकते हैं, ऐसी जगह भी जहां उनके होने की कोई आशंका न हो।
    फिर भी , सौभाग्य से, ऐसे तरीके हैं, जिनसे उन्हें पहचाना जा सकता है।
    1. वे अक्सर लंबे लंबे वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं।
    2. वे जब भी कुछ लिखते या बोलते हैं, कुछ तयशुदा शब्दों का जरूर इस्तेमाल करते हैं। जैसे -शोषण, अन्याय, पूंजीवाद, सामन्तवाद, साम्राज्यवाद, धर्मनिरपेक्षता, स्त्रीवाद, मजदूर, किसान, मजूरी, बेरोजगारी, गरीबी ,असमानता, मानवाधिकार, प्रतिक्रियावाद, रूढ़िवाद , भेदभाव, मैकार्थीवाद , शांति वगैरह।
    3 वे हमेशा अल्पसंख्यकों, दलितों और स्त्रियों का पक्ष लेते हैं।
    4 राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं।
    5 सरकार की आलोचना करते हैं।
    इनमें से एक से अधिक लक्षण किसी में मिलें तो उसके बारे में तुरन्त सेना को ख़बर करें।
    स्रोत: http://www.openculture.com/…/07/how_to_spot_a_communist.html–Ashutosh Kuma——————————————————-Tiwari·दुष्ट कम्युनिस्टों ने हमेशा शाहूकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई। उन्हें शोषणकारी व्यवस्था घोषित किया। आज भी इनके नारों में शाहूकार रोज मारे जा रहे हैं। मदर इंडिया का सुक्खी लाला विलेन आफ मिलेनियम बन गया। लेकिन यही कम्यनिष्ट कभी बैंकों की कर्ज व्यवस्था के खिलाफ नहीं बोलते। क्यों नहीं बोलते?
    क्योंकि ये बैंकिंग सिस्टम के दलाल है और बैंकिंग सिस्टम पूंजीवादी व्यवस्था की दलाल। लाखों किसान मर जाते हैं और कोई कम्युनिस्ट एक डाक्युमेन्ट्री तक नहीं बनाता कि कैसे बैंक के कर्जों के कारण किसानों का कत्लेआम हो रहा है। क्यों बनाएंगे? दलाल अपने मालिक के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाता।Tiwari
    9 hrs ·
    नौकरी कभी भारत के लोगों का स्वभाव नहीं रहा है। “उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिध चाकरी भीख निदान।” कवि घाघ की यह कहावत हमारे यहां गांव गांव प्रचलित है जिसका मतलब है कि सबसे उत्तम काम है खेती करना। मध्यम है व्यापार और नौकरी निकृष्ट कर्म है। भीख मांगना उन्होंने ऐसे लोगों का निदान बताया है जो उत्तम, मध्यम या निम्न कुछ नहीं कर सकते।
    अगर नौकरी चाकरी निषिद्ध है तो हम लोग इतने नौकरीखोर कैसे हो गये? आज क्यों पढ़ाई का मतलब सीधा सीधा नौकरी होता है? बहुत पीछे तो नहीं जाते लेकिन निषिद्ध नौकरी वाली मानसिकता भी कम्युनिज्म की देन है। नेहरू ने जिस सरकारीकरण को समाजवाद बताया असल में वह कम्युनिज्म का भारतीय संस्करण था। साठ सत्तर और अस्सी के दशक का साहित्य और फिल्म इन सबने नौकरी की प्रतिष्ठा करवाया। याद करिए धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र की फिल्में जिसमें वो मजदूर एकता की बात करते हैं। एक अदद नौकरी पाने के लिए दफ्तर दफ्तर चक्कर काटते हैं। नौकरी मिलने को अपने जीवन की सफलता मानते हैं।
    फिल्मों और साहित्य के जरिए जो लोग यह सांस्कृतिक हमला कर रहे थे वो जानते थे कि यह काम वो क्यों कर रहे हैं। यह इसलिए किया जा रहा था ताकि व्यक्ति का उत्पादन उससे छीनकर कंपनियों के हवाले कर दिया जाए। देश में ब्राह्मणवाद और जातिवाद की बहस भी इसी कड़ी का हिस्सा है ताकि लोगों को उनके अपने परंपरागत रोजगार से हटा दिया जाए और वो जो उत्पादन करते हैं उसे कंपनियों के हवाले कर दिया जाए। वरना इस देश में जब आजादी आई तो सरकारी कर्मचारी भर्ती नहीं होते थे। लोगों को पकड़ पकड़ कर सरकारी नौकरी दी जाती थी। लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट गये हैं।
    ये हालात इसलिए उलटे क्योंकि हमारे दिमाग को कम्सुनिस्ट दुष्टों ने संक्रमित करने का काम किया। उन्होंने समाजवाद के नाम पर ऐसे कंपनीराज का रोडमैप तैयार किया जिसे आज पूंजीवादी ताकते हाईवे बनाने में लगी हैं। और हम मानुष से अमानुष हो चुके लोग नौकरी नौकरी चिल्ला रहे हैं।
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  7. सिकंदर हयात

    Girish Malviya
    9 hrs ·
    पाकिस्तान से तो हमारी इतनी गहरी खुंदक हैं कि हम उससे क्रिकेट मैच तक खेलना पसन्द नहीं करते,
    यदि हमारी फिल्मों में कोई पाकिस्तानी कलाकार काम कर ले तो माफीनामे के रूप में फ़िल्म के प्रोड्यूसर से सेना को ज़बरन चन्दा दिलवाया जाता है
    हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रवादी पार्टी का अध्यक्ष जिसने अपने खून पसीने से पार्टी को जिंदा किया पाकिस्तान के जनक जिन्ना की तारीफ भर कर देने से जात बाहर कर दिया जाता है
    जहाँ जरा सी समझदारी की दो बातें कर लेने पर व्यक्ति को पाकिस्तान भेज दिए जाने का फतवा दे दिया जाता है,
    ऐसे महान ओर पाकिस्तान विरोधी दल के प्रमुख मोदी जी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पुत्र शौर्य डोभाल का बिजनेस पार्टनर एक पाकिस्तानी है यह सुन कर यदि आपका खून नही खोलता है तो वह खून नही है वह पानी है……..
    ओर यदि उनका पुत्र सिर्फ बिजनेस मैन ही होता तो भी बात गले उतर जाती शौर्य डोभाल ‘इंडिया फाउंडेशन’ चलाते हैं, यह समूह मोदी सरकार में सबसे अधिक ताकतवर थिंक टैंक है जिसके संचालन में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव प्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं जिसमे मोदी सरकार के 4 केंद्रीय मंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका है प्रसार भारती के चेयरमैन ए. सूर्यप्रकाश जिसके डायरेक्टर हैं
    प्रधानमंत्री के विदेश दौरों के कार्यक्रमों में यह इंडिया फाउंडेशन सबसे अहम भूमिका निभाता हैं। अमेरिका यात्रा के दौरान मैडिसन स्क्वेयर पर मोदी जिस कार्यक्रम में रॉक स्टार की तरह चमके थे, उसकी योजना भी इसी फाउंडेशन ने बनाई थी
    एक इंटरव्यू में शोर्य डोभाल ने खुद स्वीकार किया है कि आने वाले दिनों में हमारा थिंक टैंक सरकारी नीतियों के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने ये भी कहा कि अब तक उनके थिंक टैंक के कारण किन सरकारी नीतियों में बदलाव आया है ये बताना ठीक नहीं होगा
    फाउंडेशन के दबदबे के बारे में खुद राम माधव ने पीएम की बांग्लादेश यात्रा से ऐन पहले इंडिया हैबिटाट सेंटर में हुए एक कार्यक्रम में कहा था, ‘यह मत सोचिए कि यह (इंडिया फाउंडेशन के कार्यक्रम) बैक चैनल या ट्रैक टू है। ये कार्यक्रम सरकारी कार्यक्रमों जितने ही महत्वपूर्ण हैं। सरकार इन्हें बहुत गंभीरता से लेती हैं,
    एक जगह शोर्य डोभाल कहते हैं कि हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रवादी है अब सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की कोशिश कीजियेगा कि आखिर इस फाउंडेशन का खर्च चलता कैसे है , चूंकि यह एक अलाभकारी संस्था है इसलिए संस्था के कार्यक्रमों को कुछ कंपनियां स्पॉन्सर करती है, ओर उन कम्पनियों का रोज वास्ता जिन मंत्रालयों से पड़ता है उसी के मंत्री इस फाउंडेशन के सदस्य है, ……है न कमाल की बात
    अब इसका एक ओर पक्ष समझिए इन कम्पनियों में विदेशी कम्पनिया भी शामिल है यानी यह फाउंडेशन सिर्फ फंडिंग से ही चलता है फॉरेन कंट्रीब्यूनशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 की धारा (3) कहती है कि चुने हुए जन प्रतिनिधि, राजनैतिक दल के पदाधिकारी, मीडिया समूह या पत्रकार विदेशी फंडिंग नहीं ले सकते
    यानी विदेशी फंडिंग से राष्ट्रवादी उद्देश्यों की पूर्ति करना……….. शायद इसे ही कहते हैं न खाऊंगा न खाने दूंगाGirish Malviya—————Himanshu Kumar added 2 new photos.
    11 November at 23:10 ·
    सहारनपुर के युवा दलित नेता चंद्रशेखर कई वर्षों से दलित बच्चों की शिक्षा और दलित समुदाय के आत्म सम्मान के लिए काम कर रहे हैं,
    सहारनपुर में राणा प्रताप जयंती के मौके पर राजपूतों ने एक सभा करी,
    और उसमें फूलन देवी के हत्यारे शेर सिंह राणा को मुख्य अतिथि बनाया,
    और दलितों को परेशान करने के लिए और उनका अपमान करने के लिए उनके गांव में जाकर अंबेडकर मुर्दाबाद के नारे लगाए,
    दलितों ने पुलिस से शिकायत करी,
    पुलिस ने आकर बदमाशी कर रहे राजपूतों को वहां से बाहर निकाल दिया,
    राजपूतों ने बाकी के गुंडों को बुला लिया और दलितों की बस्ती पर पथराव उनके घरों में आग लगाना और महिलाओं की पिटाई और बेइज्जती करना शुरु कर दिया,
    आग लगाते समय एक राजपूत लड़का खुद ही धुआं और आग में फंसकर दम घुटने से मर गया,
    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उसके मरने की वजह दम घुटना बताया गया था,
    लेकिन राजपूतों ने हल्ला मचाया कि इसे दलितों ने मार दिया है,
    बदला लेने के लिए राजपूतों ने बड़ी संख्या में दलित बुजुर्गों बच्चों और औरतों को बुरी तरह से पीटा,
    2 दिन बाद दलित युवाओं ने खुद के ऊपर हुए हमले के विरोध में एक सभा करने का फैसला किया,
    लेकिन पुलिस ने दलित युवाओं को बुरी तरह पीटा और उनकी मोटरसाइकिलें छीन ली,
    इसके बाद दलित युवा भड़क गए और उन्होंने चक्का जाम कर दिया,
    मैं एक प्रतिनिधिमंडल के साथ सहारनपुर के डीएम और एसपी से जाकर मिले थे,
    सहारनपुर के डीएम ने हमें बताया तब तक चंद्रशेखर इस पूरे विरोध प्रदर्शन में कहीं भी शामिल नहीं हुए थे,
    DM ने चंद्रशेखर को फोन करके कहा कि आप आकर भीड़ को समझाइए और शांति स्थापना में मदद कीजिए,
    इसके बाद चंद्रशेखर मोटरसाइकिल पर वहां आए और उन्होंने चक्का जाम कर रहे क्रोधित दलित युवाओं को समझाया,
    उसके बाद चक्का जाम समाप्त हुआ और वहां पर शांति स्थापित हुई,
    लेकिन उत्तर प्रदेश के बदमाश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गुंडागर्दी देखिए,
    कि जिस चंद्रशेखर ने शांति स्थापना में प्रशासन की मदद करी,
    उन्हीं एडवोकेट चन्द्रशेखर को ही अनपढ़ गुण्डे योगी आदित्यनाथ ने जेल मे डाल दिया,
    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर को सभी मामलों में जमानत दे दी,
    और कहा कि सरकार ने चंदशेखर के खिलाफ सभी मामले राजनीति से प्रेरित होकर बनाए हैं,
    इसके बाद कोर्ट का आदेश मानकर चंद्रशेखर को रिहा करने की बजाए मुख्यमंत्री योगी ने चंद्रशेखर को जेल में ही रखने के लिए उनके ऊपर रासुका लगा दिया,
    इससे देश भर का दलित समुदाय बहुत गुस्से में है,
    युवा नेता चन्द्रशेखर पर रासुका लगाने के विरोध में कई गांवों में महिलाओं ने उपवास शुरू कर दिया है,
    एडवोकेट चन्द्रशेखर की रिहाई के लिये राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाया जायेगा,
    राजनैतिक हमले का जवाब राजनैतिक आंदोलन से दिया जाएगा,

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