क्या अमित शाह की नई मुसीबत के पीछे अहमद पटेल हैं?

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अमित शाह और उनके बेटे जय शाह के साथ जो हुआ उसके पीछे एक बेहद चौकाने वाली कहानी सामने आ रही है. दिल्ली से लेकर गुजरात तक एक खबर उड़ी हुई है कि अगस्त में गुजरात में हुए राज्यसभा चुनाव और अक्टूबर में जय शाह पर आई मुसीबत का सीधा रिश्ता है. कांग्रेस के एक बड़े नेता ने गुजरात के कुछ पत्रकारों को बताया कि जय शाह के कारोबार की खबर सभी नेताओं को थी, लेकिन उसे हेडलाइन बनवाया कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता ने.

जब गुजरात की इस सुनी-सुनाई खबर की कड़ियां दिल्ली में चल रही कानाफूसी से जोड़ी गई तो कांग्रेस के उस बहुत बड़े नेता का नाम सामने आया. 11 अशोक रोड से लेकर भाजपा की खबर रखने वाले पत्रकारों के बीच चर्चा गर्म है कि कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने दो महीने के अंदर दो बार अमित शाह से बदला ले लिया है. दो महीने में दूसरी बार वे बेहद बेचैन दिख रहे हैं. अगस्त महीने में हुए राज्यसभा चुनाव के वक्त उनका रतजगा टेलीविजन पर दिखा था. अब वे एक बार फिर से परेशान हैं.

अहमद पटेल को जानने वाले लोग कहते हैं कि अपने करीब 45 साल के सियासी करियर में उन्होंने कभी किसी के साथ ऐसा नहीं किया. अब अगर ऐसा हुआ है तो इसकी शुरुआत अमित शाह ने ही की थी. अहमद पटेल ने कभी किसी विपक्षी नेता पर निजी हमला नहीं किया, कभी किसी के परिवार पर आंच नहीं आने दी. उनके भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं से अच्छे रिश्ते रहे हैं, आज भी हैं. लोग तो यहां तक बताते हैं कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब अहमद पटेल की वजह से भाजपा के कई नेता कई तरह की मुसीबतों में फंसने से बचे.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि अहमद पटेल अब खुलकर अमित शाह के खिलाफ हमला बोल रहे हैं. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि अमित शाह ने अहमद पटेल को राज्यसभा चुनाव में हराने की कसम खा रखी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के बड़े नेताओं के न चाहने के बावजूद अमित शाह ने अपनी तरफ से अहमद पटेल को हराने के लिए सारे पासे फेंके. लेकिन पटेल इसके बावजूद चुनाव जीत गए. अब बारी अहमद की थी.

कांग्रेस की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अहमद पटेल दिल्ली के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिनके पास हर पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की गोपनीय बातें आसानी से पहुंच जाती है. अब तक पटेल राज़ों को राज़ ही रहने देते थे. लेकिन इस बार जय शाह से जुड़े राज़ अचानक बेपर्दा हो गए. अब भाजपा को लगता है कि इस काम के पीछे अहमद पटेल ही हैं.

दिल्ली में एक और ‘कांस्पिरेसी थ्योरी’ की चर्चा अंदरखाने चल रही है. जय शाह के बारे में खबर छपने से पहले ही भाजपा के कुछ नेताओं को इसकी खबर थी. भाजपा के भी कुछ नेताओं ने इस काम में पटेल की मदद की.

साल 2017 अमित शाह के लिए बुरी खबरें ज्यादा लेकर आया है. दूसरे को मुश्किल में फंसाने वाले शाह इस साल मात खा रहे हैं. धीरे-धीरे केंद्र सरकार के मामलों में अमित शाह का दखल घटता जा रहा है. सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री और शाह के बीच अब पहले जैसे भरोसे वाली बात नहीं रही. जय शाह के किस्से सामने आने के बाद अमित शाह के कहने पर ही रेल मंत्री पीयूष गोयल सामने आए थे. सुनी-सुनाई है कि पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस के बाद जिस तरह से सरकार को घेरा गया वह प्रधानमंत्री को पसंद नहीं आया. यह सवाल वाजिब था कि अमित शाह के बेटे का बचाव करने के लिए एक केंद्रीय मंत्री को क्यों लाया गया?

सुनी-सुनाई है कि इसके बाद पीएमओ से मंत्रियों को कहलवाया गया कि कोई मंत्री जय शाह पर प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेगा. पार्टी के एक दो प्रवक्ताओं को छोड़ दें तो बाकी सभी नेताओं को भी जय शाह से जुड़े सवालों पर चुप्पी साधने की हिदायत ही मिली थी. आखिरकार अमित शाह को खुद सामने आकर अपने बेटे पर सफाई देनी पड़ी. अब दिल्ली और गुजरात में खबर गर्म है कि विधानसभा चुनाव के बाद सीनियर शाह पर बड़ा फैसला हो सकता है. अमित शाह वक्त रहते जूनियर शाह को बचा लेना चाहते हैं.
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3 thoughts on “क्या अमित शाह की नई मुसीबत के पीछे अहमद पटेल हैं?

  1. Ramesh kumar

    HO SAKTA HAI KYOKE AMIT SHAH NE BHI PURI KOSHISH THI KE AHMAD PATEL CHUNAV JEET N SAKE HOSAKTA HAI USA KA BADLA LIYA HO

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Girish Malviya
    2 hrs ·
    जैसे इन तीन सालो में भाजपा के खाते में चंदा आया है वैसे ही आपके खाते में इस दिवाली में माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहे………..
    जैसे जय शाह का व्यापार में एक साल में टर्नओवर बढ़ा है वैसे ही इस साल आपके व्यापार की भी उन्नति हो………..
    जिस प्रकार मोदी जी की कृपा से इस साल 166 प्रतिशत बाबा बालकृष्ण की सम्पत्ति बढ़ी है वैसे ही आपकी संपत्ति में लक्ष्मी जी की कृपा से दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हो………
    जैसे मोदी जी के राज में बाबा रामदेव को मुफ्त के भाव देश भर में ज़मीन आवंटित हुई है इस साल आपको भी इसी तरह से भूमि लाभ हो……….
    जिस प्रकार चापलूसी कर अनुपम खेर, स्मृति ईरानी ओर अन्य को बड़े बड़े पदों की प्राप्ति हुई है आप को भी उसी प्रकार नाना प्रकार के पद और सम्मान मिले और समाज मे यशस्वी बने………..
    जिस प्रकार मोदी जी की कृपा से अडानी को विदेशों में बड़े बड़े कॉंट्रेक्ट मिले है उसी प्रकार आपको भी देश विदेश में ठेके मिले और आपकी यश कीर्ति सात समुंदरों तक फैल जाए………..
    जैसे मोदी जी की कृपादृष्टि से मुकेश अम्बानी का एकाधिकार टेलीकॉम क्षेत्र में हुआ है आप भी इस साल अपने व्यापार में इतना एकाधिकार स्थापित कर ले कि आपके विरोधी एयरटेल , आईडिया ओर वोडाफोन की तरह रोते रह जाये……..
    मोदी जी के कथनानुसार जैसे बुलेट ट्रेन के लिए जीरो प्रतिशत ब्याज पर कर्जा मिल रहा है उसी प्रकार आपको भी इस साल जीरो प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिले,…….
    जिस प्रकार मोदी जी बिहार के लिए पैकेज की घोषणा करते वक्त कहते हैं कि 40 हजार करोड़ दे दू, 50 हजार करोड़ दे दू, 70 हज़ार करोड़ दे दु ओर अंत मे सवा लाख करोड़ का जुमला उछाल देते है और उसके बाद भी धुर विरोधी रहे नीतीश कुमार आपकी वाह वाही करे …….उसी प्रकार आप भी जो मर्जी आए वो बोल दे,जो मर्जी आए वो कर गुजरे चाहे नोटबन्दी करवा दे चाहे जीएसटी लगा दे …..लेकिन जैसे भक्त मोदी जी की तारीफों के पुल बांधते रहते हैं ऐसी भक्त प्रजाति आप को भी नसीब हो……..
    इन्हीं शुभकामनाओ के साथ आपको ओर आपके परिवार को दीपावली की मंगल कामनाएं………..Arun Maheshwari
    17 hrs ·
    ‘हस्तक्षेप डाट कॉम ‘ पर हमारी टिप्पणी :
    अर्थ-व्यवस्था को मंदी से निकलना आने वाले कई सालों तक असंभव होगा
    -अरुण माहेश्वरी
    जिस बात का ख़तरा था और जिस पर हम नोटबंदी के पहले दिन से बार-बार कह रहे थे, वह अब शत-प्रतिशत सही साबित हो रहा है । इस बार बाजार में धन तेरस की बिक्री भी जितनी फीकी रही है, भारत के इतिहास में शायद कभी ऐसी नहीं रही ।पिछले साल की तुलना में सोना-चाँदी की बिक्री में चालीस प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि मोदी सरकार ने दो लाख तक की खरीद पर पैन नंबर की बाध्यता को ख़त्म करके काला धन लगा कर जेवहरात खरीदने की पूरी छूट दे दी थी । आगे भी त्यौहारों का पूरा मौसम इसी प्रकार बीतता हुआ दिखाई दे रहा है ।
    अर्थ-व्यवस्था में मंदी के पीछे सबसे बड़ा कारण वह जन-मनोविज्ञान होता है, जो किसी भी वजह से एक ग्राहक और उपभोक्ता के रूप में आम आदमी की स्वाभाविक गतिविधियों को व्याहत करता है । एक बार लोगों के अंदर अपने जीवन और आमदनी की अनिश्चयता का विचार घर कर लें, उसके बाद बाजार को चंगा करना सबसे असंभव काम हो जाता है ।निश्चिंत आदमी उधार लेकर भी ख़र्च करता है, लेकिन चिंताग्रस्त आदमी अपने बुरे समय की कल्पना करके पैसों पर कुंडली मार कर बैठ जाया करता है ।
    और अर्थ-व्यवस्था चलती है मूलत: बाजार में लोगों के उतरने से, उनकी खपत और उपभोग से ।
    मोदी के मूर्खतापूर्ण नोटबंदी के निर्णय ने लोगों के खुद पर विश्वास को भारी धक्का लगाया है । अपने ही पैसों को पाने के लिये बैंकों के सामने भिखारियों की तरह खड़े रहने के दर्दनाक अनुभवों ने बैंकों पर से भी उसकी आस्था की जड़ों को हिला दिया है ।
    और आज भी, नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार आम लोगों को रोज चोर घोषित किया करते हैं । आयकर के बारे में अपनी चरम अज्ञात का परिचय देते हुए रोज चीख़ते हैं कि सवा सौ करोड़ लोगों में मात्र चंद लाख लोग ही आयकर देते हैं । यह देश के प्रत्येक जन को अंदर से डरा दे रहा है । साधारण आदमी यह जानता है कि मोदी की तरह के शासकों के शासन की मार कभी भी बड़े-बड़े पूँजीपतियों, धन्ना सेठों पर नहीं पड़ती है। उनके तो ये सबसे क़रीबी दोस्त हैं जिनके निजी हवाई जहाज़ों में मौज करने के इनके पुराने अभ्यास हैं। ऐसे शासन का डंडा सिर्फ आम मासूम लोगों के सर पर ही पड़ा करता है ।
    इसीलिये आज किसी भी प्रकार का ख़र्च करने के पहले हर आदमी दस बार विचार कर रहा हैं ।
    नोटबंदी ने आम लोगों की घर में नगदी को जमा रखने की प्रवृत्ति को सबसे ज्यादा बल पहुँचाया हैं । आम आदमी समझता है कि किसी आपद-विपद के समय खुद के पास नगदी जमा पूँजी पर ही सबसे अधिक भरोसा किया जा सकता है । बैंकों और सोना-चाँदी पर भी लोगों की आस्था कम हो गई है ।
    हमें नहीं लगता कि इस प्रकार के एक कोरे लफ़्फ़ाज़ के शासन के रहते कभी भी भारत इस मंदी की स्थिति से निकल पायेगा । वैसे भी, भारत की अर्थ-व्यवस्था को अब अपनी पुरानी लय में लौटने में सालों-साल लग जायेंगे ।Arun Maheshwari—————————————- ( -सोच कर भी घिन आती हे की ऐसे घिनोने जीव हमारे आपके आस पास ही रहते हे पढ़े सारी दुनिया जानती हे की भारत तेरे टुकड़े होंगे नारे एडिट करे जे एन यु छात्रों के नाम लगाए गए थे फिर भी ये लिजलिजा जीव लिखता हे Sanjay Tiwari
    15 hrs ·
    जो सच्चे सेकुलर हैं वो आज और कल घर में अंधेरा रखें। दीपावली के विरोध में अमावस मनाएं ताकि उनके जीवन में घनघोर अंधकार बना रहे। हिन्दू सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में यही उनकी सबसे बड़ी जीत होगी।
    भारत के सभी सच्चे सेकुलरों को अशुभ अमावस।Sanjay Tiwari
    Yesterday at 11:18 ·
    नारा लगाना हो तो “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” का लगाती है लेकिन दीपावली की बधाई देनी हो तो चुपके से कनाडा के प्रधानमंत्री को दे आती है। कौन जाने कल कनाडा का वीजा मांगना पड़े? तो वहां जाने के लिए पहले से यह दिखाना पड़ेगा कि हम तो अपनी परंपरा का सम्मान करते हैं, हम वैसे कट्टरपंथी मुसलमान नहीं हैं जैसा आप लोग समझते हैं। वीजा अप्लाई करूंगी तो ये रिट्वीट याद रखना। थैंक्यू जस्टिन भाई। 🙂
    See TranslationSanjay Tiwari
    17 October at 12:04 ·
    मैंने कभी ताजमहल देखा नहीं। देखने की कोई इच्छा भी नहीं लेकिन फोटो में देखकर मुझे भुतहा महल जैसा आभास होता है तिवारि ।) ————————————————Apoorva Pratap Singh
    17 October at 23:05 ·
    जो यहां बैठ के ताजमहल पर पंचायत कर रहे हैं वो आगरा में खड़े हो के माइक पर यह सब बोल दें, हिन्दू-मुसलमान सब प्रकार के इतने जूते पड़ेंगे, कि बकलोली करने हेतु न ज़ुबान बचेगी न उंगलियां !
    आगरे वालों को बस इतना पता है कि आगरा का जो भी विकास हुआ है वो ताजमहल के कारण है, यहां के 60 प्रतिशत से भी ज्यादा गैर सरकारी लोगों को रोटी ताज देता है । ताजमहल पर निर्भरता यूं है कि यहां गरीब व्यक्ति भी नौकरी न पाने पर दुखी नही होता क्योंकि वो जानता है कि कुछ न किया तो ताजमहल पर बैठ जाएंगे।
    कानपुर के रिक्शे औऱ आगरे के रिक्शे वालों में मजूरी का जो फर्क है वो सारी कहानी कहता है । कानपुर कितना बड़ा जिसमें तीन आगरा आ जाएंगे, पूरब का मैनचेस्टर कानपुर, क्या दशा कर दी राजनीति ने उसकी !! आगरा पर राजनीति का उतना फर्क नहीं पड़ा क्योंकि ताज है यहां । ताज के कारण यहां कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है, प्रदूषण भी कम है । ताज खुद में बड़ी इंडस्ट्री है !
    एक बात यह भी कि आगरा में जानते भी हो कि कितने पुराने चर्चेस और कोनवेंट्स हैं, तुम्हारे नए बसे शहर से भी बहुत पुराने, दिल्ली के लगभग सभी कॉलेजों से भी पुराने कॉलेज। अंग्रेजों ने क्यों चुना आगरा ??? बुद्धि मोटी नहीं होगी तो पल्ले पड़ जायेगा । अपने यहां का सर्किट हाउस देखा है कभी ? और आगरा का देखा है ? कितना पुराना गोल्फ ग्राउंड है तुम्हारे शहरों में ? तुम्हारे बाज़ार, हमारे आगरे के बाज़ार की तरह इतिहास को समेटे खड़े हैं ? जब तुम्हारी पिछली पीढियां होटल के नाम पर सराय जानते थे, तब यहाँ पांच सितारा होटल खड़े हो चुके थे ! कोई पिछली से पिछली पीढ़ी में पढ़ा लिखा बचा हो तो उससे पूछना कि पहले नार्थ वेस्टटर्न इंडिया में उच्च पढ़ाई करने हेतु बच्चा कहां भेजा जाता था ?
    साल में कितनी इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस होती है यहां ? साल भर में कितने तरीके के विदेशी सरगना और अफ़सर आते हैं यहां ? कोई दिल्ली में भले लैंड करे लेकिन गिरता आगरा में ही क्यों है ! जगह जगह का हैंडीक्राफ्ट क्यों नष्ट हो रहा है लेकिन अब तक हमारा गोकुलपुरा आबाद क्यों है ?
    कितनी संस्कृतियां मिलेंगी यहां, जो बताएंगी कि कोई शहर इतना लकी कैसे हो गया कि जो भी आया वो इसको बनाता गया ! एक ऐसा शहर जो कुदरती रूप से खतरनाक जगह है, पानी खराब और कम है, ज़मीन और जगहों जैसी हर फसल के लिए उपजाऊ भी नहीं है, बड़ा प्रतिशत दलितों पिछड़ों का यहां रहता है जो बेचारे शुरू से पढ़े लिखे भी नहीं थे, उनको लेकर यह शहर सेल्फ सस्टेनेबल कैसे बन गया ?
    अब यह बन्द करो बकवास कि कौन कितनी मुहब्बत की निशानी है या शोषण की ।
    ताजमहल एक बेहद छोटे शहर, आगरा की तरक्की की निशानी है । अगर कोई कल उसे गिरा भी दे तो उसके टूटे टुकड़े देखने को भी यही लाइन लगेगी जो आज लग रही है । पर विदेशों में मानसिक रोगों के रिसर्च में तुम जैसों पर थीसिस चलेगी !
    अंतिम बात, अगर कभी दूर किसी देश जाना और कोई तुम्हारे शहर को न पहचाने तो बोल देना आगरा से इतना उतना किलोमीटर दूर ! आगे तो तुम खुद ही घाघ हो ।———–Mayank Saxena
    23 hrs ·
    अच्छा, दीवाली पर राम घर लौटे थे, तो पूजा गणेश लक्ष्मी की क्यों करते हो???
    बताऊं क्यों…क्योंकि ये राम के लौटने का नहीं, धान की फसल कटने का त्योहार है..गरीब का, किसान का त्योहार है..इसीलिए पूजा होती है लक्ष्मी की, कि धान प्राचीन समय में धन लाने वाली फसल थी (धन-धान्य की कहावत याद है?) गणेश मूलतः आदिम देवता हैं, जिनकी उत्पत्ति आदिवासी सभ्यता से होती है..फसल उजाड़ने वाला सबसे उग्र और शक्तिशाली पशु हाथी ही था..सो गणेश की पूजा, फसल की सुरक्षा के लिए…
    देवता को फसल काटने के उत्सव में धान, चिउड़ा, खील, चावल या लैया(मुड़ी) अर्पित करने की प्रथा है..
    अब इस पूरे त्योहार में राम कहां दिखते हैं, आपको? राम की तो मूर्ति तक आपको एलोरा या एलफंटा में नहीं मिलेगी…
    तो दरअसल आदिम सभ्यता, आदिवासी, दलित, किसानों के त्योहार को ब्राह्मणों ने कब्जा लिया…जी, एप्रोप्रियेट करना दक्षिणपंथियों की पुरानी राजनीति है…सवर्ण हिन्दू ऐसे ही जीतता रहा है!Mayank Saxena
    17 October at 19:35 ·
    सुनो संगीत सोम, तुम जो ये कुर्ता पहन के इतिहास लिख रहे हो न, ये भी मुसलमान का बनाया है! तुम्हारे हिन्दू पूर्वज (जिनको तुम अपना पुरखा बताते हो) कमर के ऊपर कुछ नहीं पहनते थे। उनको सिलाई भी अरबों ने सिखाई और कुर्ता आया फ़ारस से! फारसी के क़ुरतका लफ्ज़ से कुर्ता बना है तुम्हारा!!! इसको पहन कर मंदिर जाते हो, पूजा करते हो, नेतागिरी करते हो…तुम्हारे पुरखे नङ्गे घूमते थे!!
    चलो अब धोती (सिर्फ) पहन कर चुनाव लड़ो!! क्योंकि पतलून कमीज भी अंग्रेज़ी है!! अरे सॉरी संघी तो अंग्रेजों के साथ थे…Mayank Saxena
    16 October at 18:15 ·
    कुछ दफ्तरों में दीवाली की तैयारी है…लाखों के फूल-पत्ती, झाड़-फानूस, दीया और बाती (हम) लगा दिए गए हैं…कर्मचारियों के लिए खाने का इंतज़ाम है…रंगोली, गाने, हंसाने का कांटेस्ट रखा गया है…सबके लिए तोहफा आएगा…एचआर आपको ईमेल करेगा कि भई ऐसा है कि धनतेरस के दिन सब लोग (हो सके तो) पारम्परिक (ये क्या होता है?) परिधान में आएं…दीवाली मेला होगा, जहां से आप कम्पनी की सैलरी, वापस उसी को दे सकते हैं…
    फिर क्रिसमस आएगा…अब कम्पनी भी तो अमरीकी या अंग्रेजी होगी…तो सेंटा क्लॉज़ (येट अनदर क्लॉज़ एट ऑफिस…) आएगा…तोहफे बांटेगा…बच्चों को दफ्तर लाने की इजाज़त होगी, उनके खेल के सामान होंगे…फिर से कांटेस्ट होगा…इस बार रंगोली और दिया डेकोरेशन नहीं होगा…पारम्परिक परिधान की जगह सबसे वेस्टर्न परिधान पहनने की अपील होगी…(अपील इस देश की राजनीति का पुराना और दफ्तरों का नया फैशन है)
    फिर होली आएगी…दफ्तर में एक दिन आपके लिए रंग खेलने का इंतज़ाम होगा…सफेद टी-शर्ट्स बंटेंगी…मिठाई आएगी…खाने का फिर से इंतज़ाम होगा…फव्वारे लगा दिए जाएंगे…
    फिर नवरात्र आएंगे…दफ्तर की कैंटीन में दो जगह खाना बनेगा…एक जगह फलाहारी (जिसमें फल नहीं लपक के भारी-भरकम पकवान होंगे) और एक जगह बाकी…उपवास रखने वालों के लिए विशेष इंतज़ाम होगा…आपको 9 दिन तक 9 देवियों और आधुनिक दुनिया के नारीवाद में उनके योगदान की ईमेल आएगी…
    फिर ईद आएगी…रमज़ान में एक बार भी दफ्तर की ओर से इफ्तार नहीं होगा…कोई ई मेल नहीं आएगी…किसी तरह की दावत नहीं होगी…किसी से पारम्परिक परिधान में ईद के एक दिन पहले दफ्तर आने को नहीं कहा जाएगा…ईद के एक दिन बाद कोई दावत नहीं दी जाएगी…कोई सेंवई नहीं खिलाएगा दफ्तर…कोई तोहफा नहीं आएगा…कोई ईदी नहीं मिलेगी…बल्कि आप ईद के दो दिन पहले तक पूछेंगे कि ईद पर छुट्टी है क्या…और फिर आपके पास दो दिन पहले तस्दीक करती हुए बस एक ईमेल आ जाएगी कि फलां तारीख को ईद के कारण छुट्टी है…जो लोग मुस्लिम नहीं हैं…वो अगर बॉस बुलाए तो काम करने आ सकते हैं…वैसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं है….
    बाकी देश सेक्युलर है…कहीं कोई समस्या नहीं है…और कारपोरेट में काम करने वाले पढ़े-लिखे लोग तो वैसे भी सभ्य हो जाते हैं…वो तो कम्युनल होते ही नहीं…नो-नो…आई तो हैव मुस्लिम कुलीग्स…एंड आई ईवन शेयर मील्स विद दैम…एंड आई डोंट ईवेन बिलीव इन कास्ट…माई वाइफ इज़ का ठाकुर/पंडित एंड आई एम अ कायस्थ…वी डिंट हैव एनी डाउरी…जस्ट ए बंच ऑफ गिफ्ट्स फ्रॉम माई वाइफ्स साइड…नो-नो…दिस इज़ एक्चुएली नॉट गुड टू हेट मुस्लिम्स…एंड दैन यू आर सो एजुकेटेड…कहीं कोई समस्या नहीं है…इस देश में कहीं कोई भेदभाव नहीं है…कम से कम महानगरों में तो बिल्कुल भी नहीं…
    नोट – इस ऊंची इमारत की ईंटों में भेदभाव, अन्याय और खून की बूंदें हैं…इसमें से निकलने के बाद रगड़ कर हाथ धोएं…

    Reply
  3. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    1 hr ·
    हिमाचल में सुखराम आ रहे हैं, अयोध्या में श्री राम आ रहे हैं।
    21 वीं सदी के भारत की कल्पना का सारा ईंवेंट मैनेजमेंट हवा में उड़ गया है। उस पर सवाल होने लगे हैं। प्रमाण माँगे जा रहे हैं। नारे हारे-हारे लग रहे हैं। पुराने नारों का ही बैकलॉग इतना हो गया है कि नए नारे मिल नहीं रहे हैं। सौभाग्य-दुर्भाग्य, नसीब-बदनसीब जैसे विपरीतार्थक निरर्थक हो चुके हैं। इसलिए जनता की निगाहों को शिफ्ट किया जा रहा है। जनता दायें ताकती है तो उसे बायें तकाने के जुगाड़ किए जा रहे हैं। शहर में गंदगी है मगर स्वच्छता का ईवेंट है। करोड़ों की बेरोज़गारी है मगर स्किल इंडिया का ईवेंट है। हर समस्या के समानांंतर एक ईवेट की रेखा है।
    त्रेतायुग के ईवेंट का आयोजन शानदार था। आयोजन पर आप सवाल नहीं कर सकते हैं और न ही प्रमाण मांग सकते हैं। आयोजकों को पता है कि भगवान राम के नाम पर राजनीति को वॉकओवर मिल जाता है। हिमाचल में सुखराम आ रहे हैं, अयोध्या में श्री राम आ रहे हैं।आयोजन ही प्रयोजन है। ईवेंट ही डेवलपमेंट है। गर्वनमेंट अपने आप में एक ईवेंट है।
    जो काम मेले वाले ख़ुद कर लेते हैं, शहर की आयोजन समितियां कर लेती हैं, अब वही काम सरकारें भी करने लगी हैं। इस देश में एक से एक रामलीलाएं होती हैं। यह एक पैटर्न की तरह हो रहा है। अप्रैल में सूरत और जून में राजकोट में ख़ास रास्ते और चौराहों को प्रधानमंत्री के रोड शो के लिए सजाया गया। शहर को ही वर्चुअल रियालिटी का हिस्सा बना दिया गया। सूरत और राजकोट को सजाने वाली कंपनियों का अयोध्या में कोई रोल था या नहीं?
    यह परंपरा की पुनर्रचना नहीं है। यह फ़ेल होती राजनीतिक व्यवस्था को परंपराओं के वर्चुअल ईंवेंट से ढंक देने की विलासिता है। पहले शहर में सर्कस आता था तो लेज़र लाइट दूर दूर के मोहल्ले की छतों पर दौड़ती थी। उन्हें देख कर लोग सर्कस की तरफ भागते थे। सनसनी मच जाती थी। मैंने जून महीने में ब्लाग पर लिखा था कि 2019 की राजनीति में लेज़र सेट का बड़ा रोल होने वाला है। यह प्रचार का नया हथियार है जिसे सूरत, राजकोट और अयोध्या में आज़माया गया है। लोग चुनाव के समय सवाल नहीं करेंगे, मेला देखेंगे।
    धर्म राजनीति का कवच है। इस कवच को उतारकर राजनीति मैदान में नहीं जा सकती है। जाएगी तो लोगों के सवालों से घिर जाएगी। धर्म का कवच पहन कर जाएगी तो लोग सवा नहीं करेंगे, पूजा करेंगे। साधु संत तो अब दिखते भी नहीं हैं। उनके रोल में अब नेता ही दिख रहे हैं। जब नेता ही आध्यात्म से लेकर पूजन तक कर रहे हैं तो संत लोग क्या कर रहे हैं।
    राजनीति में जब पैसे का अतिरेक हुआ तो काला धन पैदा हुआ। अब राजनीति में धर्म का अतिरेक काला धर्म पैदा कर रहा है। काला धन की लड़ाई हार चुके हैं। काला धर्म की लड़ाई भी हारेंगे। बाकी आप समझदार हैं, नहीं भी हैं तो क्या ग़म है। एक तरफ सुखराम की जय बोलो, एक तरफ जय श्री राम बोलो। जीत तय है, बस इससे मतलब रखो।Ravish Kumar——————————Dhananjay Singh
    Yesterday at 15:35 ·
    सूत न कपास ,जोलाहों में लट्ठम लट्ठ !हवा उड़ी और दोनों पक्ष लगे तलवार भाँजने,एक दूसरे को भला बुरा कहने गोया इनके बाप का माल है।
    यूपी सरकार का हेरिटेज कैलेंडर आ गया ,जुलाई 18 के पन्ने पर ताज की तस्वीर है।….. टीवी और फेसबुक वाले कव्वों से सावधान।प्रदेश सरकार की प्रेस रिलीज के अनुसार 156 करोड़ रु. का बजट ताज और इसके इर्द गिर्द की जगहों के लिए प्रस्तावित है।…..
    ‘बाहर वाले’ संगीत सोम की गति स्थानीय स्तर पर अपनी पार्टी में ही ठीक नहीं है,यहां तक कि जिला पंचायत की राजनीति में भी वजूद नहीं है जिसकी छटपटाहट को दिल्ली की मीडिया ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ बना देती है।हाँ मीडिया की भूख के हिसाब से मसाला देने की कला मालूम है और पहले जो विमर्श नुक्कड़ पर दम तोड़ देते थे उन्हें राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बनाने में अब मीडिया माहिर है।…. ऐसे मुद्दे जनता के जरूरी मसलों को बहस से गायब रखने में कारगर होते हैं। …….दोनों पक्षों को शुभ दीपावली,रोशन रहिये,सफाई करिये।…. हाँ विपक्षी दल के नेता की तस्वीर राज्य सरकार के कैलन्डर पर नहीं छपती।Dhananjay Singh
    1 hr ·
    अभी ट्विटर और फेसबुक पर ndtv के फेक उदारवाद की बखिया उधेड़ रही बरखा दत्त आगे यह भी बतायेंगी कि यूपी चुनाव के वक्त उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग में हर जगह अखिलेश की वापसी जो दिख रही थी वह भी सेक्युलर पत्रकारिता नहीं, पर्सनल प्रोपगंडा था और टुंडे कबाबी का मुद्दा संस्कृति पर आघात नहीं वरन बूचड़खाने की भ्रष्ट लाइसेंसिंग प्रक्रिया से जुड़ा था।……. सेक्युलरिज्म एक राज्य की व्यवस्था होती,आदमी धार्मिक या अधार्मिक हो सकता है।सेक्युलर आदमी एक छलावा है।अपनी जगह पर मैं ठीकठाक धार्मिक हूँ और बचपन के शहर गाजीपुर में अभी भी बैठकी उन मुसलमानों के साथ ही होती है जो अजान सुनकर मस्जिद चले जाते हैं।यह सेक्युलर होना नहीं है,यह अपन लोगों की कल्चर है।……..बहुतों को समझ में नहीं आयेगा क्योंकि यहां सिस्टम के नहीं,नेता के सेक्युलर होने की बात होती है।Dhananjay Singh
    18 October at 19:44 ·
    फेसबुक पर एक बीमार समूह है होली, दिवाली, बकरीद, शबे बारात,मोहर्रम पर डिजटल मातम मनाने वालों का।
    उनके ईश्वर या बाबा मार्क्स उन्हें सद्बुद्धि दें,उनका भी जीवन रोशन करें।……..धर्म और संस्कृति में फर्क होता है,इतनी तो समझ होगी ही।
    दुनिया में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी(सुन्नी) वाले मुल्क इंडोनेशिया ने अमेरिका में अपनी एम्बेसी के बाहर देवी सरस्वती की मूर्ति लगाई है और उसकी सरकारी एयरलाइन का नाम गरुण है क्योंकि धर्म इस्लाम है लेकिन संस्कृति पर प्रभाव भारत से गयी हिन्दू परम्परा का है। हज के लिए जाने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या के मामले में भी इंडोनेशिया पहले स्थान पर है यानी ऐसा नहीं है कि वहां के मुसलमान बाहर की दुनिया नहीं देखते,हज करने नहीं जाते।…..वहां मर्क्सवादी नहीं हैं क्या भाई ?Dhananjay Singh
    18 October at 10:43 ·
    मोदी जी भी विपक्ष में थे तो आधार के विरोध में लंबे चौड़े भाषण देते थे।……… जैसा कि सामान्यतया भारत सरकार की जगह संकीर्ण सोच से मनमोहन या मोदी सरकार कहा जाता है,उस हिसाब से आधार मनमोहन सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।……… समय लगेगा लेकिन जिस तरह यह तमाम सरकारी योजनाओं में व्याप्त कदाचार रोकने में सहायक हो रहा है,कुछ वर्षों बाद केवल आधार ही काफी रहेगा मनमोहन युग की तारीफ के लिए।…… अंग्रेजों के समय से ही जड़ बना चुके कदाचरण को मिटने में अभी काफी वक्त है क्योंकि इतने बड़े मुल्क में सब की लिंकिंग आसान काम नहीं है,खासकर उनकी जिनके लिए दिल्ली बहुत दूर है या उनके शब्दकोश में है ही नहीं।…..विरोध के लिए विरोध अलग बात है।

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