अमित शाह और उनके बेटे जय शाह के साथ जो हुआ उसके पीछे एक बेहद चौकाने वाली कहानी सामने आ रही है. दिल्ली से लेकर गुजरात तक एक खबर उड़ी हुई है कि अगस्त में गुजरात में हुए राज्यसभा चुनाव और अक्टूबर में जय शाह पर आई मुसीबत का सीधा रिश्ता है. कांग्रेस के एक बड़े नेता ने गुजरात के कुछ पत्रकारों को बताया कि जय शाह के कारोबार की खबर सभी नेताओं को थी, लेकिन उसे हेडलाइन बनवाया कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता ने.

जब गुजरात की इस सुनी-सुनाई खबर की कड़ियां दिल्ली में चल रही कानाफूसी से जोड़ी गई तो कांग्रेस के उस बहुत बड़े नेता का नाम सामने आया. 11 अशोक रोड से लेकर भाजपा की खबर रखने वाले पत्रकारों के बीच चर्चा गर्म है कि कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने दो महीने के अंदर दो बार अमित शाह से बदला ले लिया है. दो महीने में दूसरी बार वे बेहद बेचैन दिख रहे हैं. अगस्त महीने में हुए राज्यसभा चुनाव के वक्त उनका रतजगा टेलीविजन पर दिखा था. अब वे एक बार फिर से परेशान हैं.

अहमद पटेल को जानने वाले लोग कहते हैं कि अपने करीब 45 साल के सियासी करियर में उन्होंने कभी किसी के साथ ऐसा नहीं किया. अब अगर ऐसा हुआ है तो इसकी शुरुआत अमित शाह ने ही की थी. अहमद पटेल ने कभी किसी विपक्षी नेता पर निजी हमला नहीं किया, कभी किसी के परिवार पर आंच नहीं आने दी. उनके भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं से अच्छे रिश्ते रहे हैं, आज भी हैं. लोग तो यहां तक बताते हैं कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब अहमद पटेल की वजह से भाजपा के कई नेता कई तरह की मुसीबतों में फंसने से बचे.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि अहमद पटेल अब खुलकर अमित शाह के खिलाफ हमला बोल रहे हैं. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि अमित शाह ने अहमद पटेल को राज्यसभा चुनाव में हराने की कसम खा रखी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के बड़े नेताओं के न चाहने के बावजूद अमित शाह ने अपनी तरफ से अहमद पटेल को हराने के लिए सारे पासे फेंके. लेकिन पटेल इसके बावजूद चुनाव जीत गए. अब बारी अहमद की थी.

कांग्रेस की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अहमद पटेल दिल्ली के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिनके पास हर पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की गोपनीय बातें आसानी से पहुंच जाती है. अब तक पटेल राज़ों को राज़ ही रहने देते थे. लेकिन इस बार जय शाह से जुड़े राज़ अचानक बेपर्दा हो गए. अब भाजपा को लगता है कि इस काम के पीछे अहमद पटेल ही हैं.

दिल्ली में एक और ‘कांस्पिरेसी थ्योरी’ की चर्चा अंदरखाने चल रही है. जय शाह के बारे में खबर छपने से पहले ही भाजपा के कुछ नेताओं को इसकी खबर थी. भाजपा के भी कुछ नेताओं ने इस काम में पटेल की मदद की.

साल 2017 अमित शाह के लिए बुरी खबरें ज्यादा लेकर आया है. दूसरे को मुश्किल में फंसाने वाले शाह इस साल मात खा रहे हैं. धीरे-धीरे केंद्र सरकार के मामलों में अमित शाह का दखल घटता जा रहा है. सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री और शाह के बीच अब पहले जैसे भरोसे वाली बात नहीं रही. जय शाह के किस्से सामने आने के बाद अमित शाह के कहने पर ही रेल मंत्री पीयूष गोयल सामने आए थे. सुनी-सुनाई है कि पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस के बाद जिस तरह से सरकार को घेरा गया वह प्रधानमंत्री को पसंद नहीं आया. यह सवाल वाजिब था कि अमित शाह के बेटे का बचाव करने के लिए एक केंद्रीय मंत्री को क्यों लाया गया?

सुनी-सुनाई है कि इसके बाद पीएमओ से मंत्रियों को कहलवाया गया कि कोई मंत्री जय शाह पर प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेगा. पार्टी के एक दो प्रवक्ताओं को छोड़ दें तो बाकी सभी नेताओं को भी जय शाह से जुड़े सवालों पर चुप्पी साधने की हिदायत ही मिली थी. आखिरकार अमित शाह को खुद सामने आकर अपने बेटे पर सफाई देनी पड़ी. अब दिल्ली और गुजरात में खबर गर्म है कि विधानसभा चुनाव के बाद सीनियर शाह पर बड़ा फैसला हो सकता है. अमित शाह वक्त रहते जूनियर शाह को बचा लेना चाहते हैं.
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