लव कुमार सिंह

आरुषि-हेमराज मर्डर केस- निचली अदालत बनाम ऊपरी अदालत!

Category: लव कुमार सिंह, सामाजिक 327 views 0

फिल्म “जॉली एलएलबी” में जज सुंदर लाल त्रिपाठी बने सौरभ शुक्ला अपने सामने चल रहे मुकदमे की सुनवाई के दौरान यह जान जाते हैं कि बेशक आरोपी रईसजादे के खिलाफ बहुत पुख्ता सुबूत नहीं हैं, लेकिन सड़क पर कार से कुचलकर जो लोग मारे गए हैं, उसका जिम्मेदार आरोपी रईसजादा ही है।

वह यह भी जानते हैं कि उनका फैसला अंतिम फैसला नहीं होगा और आरोपी के पास उच्च अदालत में जाने का विकल्प मौजूद होगा। वह अकाट्य सुबूत न होने के वावजूद अन्य उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थिजन्य साक्ष्यों के अाधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हैं और सजा सुनाते हैं। साथ में उनकी एक टिप्पणी भी सुनाई देती है, जिसका सार यह है कि भईया अब तुम चाहे हाईकोर्ट जाओ या सुप्रीम कोर्ट, मेरा फैसला तो यही है। मुझे तो यही सही लग रहा है।

अब जरा फिल्म के जज साहब की तुलना नोएडा के आरुषी और हेमराज मर्डर केस में राजेश तलवार और नूपुर तलवार को उम्र कैद की सजा सुनाने वाले सीबीआई अदालत के जज श्यामलाल से करें तो कई साम्य नजर आते हैं।

तलवार दंपति को उम्र कैद की सजा सुनाने वाले जज श्यामलाल को भी यह पता ही था कि उनका दिया गया फैसला अंतिम नहीं है और आरोपियों के पास उच्च अदालत में जाने का विकल्प होगा। जज के ओहदे पर बैठे व्यक्ति की विद्वता के मद्देनजर उन्हें यह भी पता ही था कि वह जो फैसला सुना रहे हैं, वह उच्च अदालत में पलट भी सकता है। इसके बावजूद उन्होंने परिस्थिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तलवार दंपति को सजा सुनाई।

उस समय जज श्यामलाल की वाहवाही हो रही थी और पूरा देश इस बात पर यकीन भी कर रहा था कि यह केस अब सही अंजाम तक पहुंच गया। लेकिन आज वही जज श्यामलाल आलोचनाओं के घेरे में हैं। उच्च न्यायालय ने उनके फैसले सुनाने के तरीके की तीखी आलोचना की है।

“जॉली एलएलबी” एक फिल्म थी और फिल्म में नाटकीयता के लिए बहुत सी ऐसी चीजें भी डाली जाती हैं जो यथार्थ में नहीं होती हैं, लेकिन फिल्म में मुकदमे की सुनवाई और सजा सुनाने के पैटर्न को देखने, आरुषि-हेमराज मर्डर केस में सीबाईआई कोर्ट के फैसले और देशभर में कई अन्य चर्चित मामलों में निचली अदालतों के फैसलों को पढ़ने-सुनने के बाद ऐसा महसूस होता है कि अनेक चर्चित मामलों में निचली अदालतों के न्यायाधीश संभवतः दिल से फैसला करते हैं, जबकि उच्च अदालतों के न्यायाधीश दिमाग को दिल से ऊपर रखते हैं। यह भी तब होता है जब कोई केस शीशे की तरह साफ नहीं होता है और कहीं न कहीं, कोई न कोई कन्फ्यूजन बना रहता है कि आखिर सच क्या है?

निचली अदालत में फैसला होते वक्त संभवतः न्यायाधीश के मस्तिष्क में यह बात हर समय मौजूद रहती है कि आरोपी के पास ऊपर जाने का विकल्प है यानी यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा। ऐसे में हो सकता है कि शीशे की तरह साफ नजर नहीं आने वाले केसों में उनके मन में जॉली एलएलबी के जज सुंदर लाल त्रिपाठी की तरह यह विचार भी आते हों कि संभव है कि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अभियुक्त ऊपरी अदालत से छूट जाए लेकिन मैं तो वह काम कर ही दूं जो मेरा दिल कह रहा है।

अब दिल तो दिल है। कई बार वह, वो भी देख लेता है जो दिमाग नहीं देख पाता, लेकिन कई बार दिल भावनाओं में भी बह सकता है।

हमें नहीं पता कि सीबीआई कोर्ट के जज ने वह (सच) देख लिया था, जो दिमाग नहीं देख पाता या वह भावनाओं में बह गए थे, लेकिन हमें कानून के जानकारों की यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि अभी तक उच्च न्यायालय का जो फैसला जानकारी में आया है, उसके अनुसार उच्च न्यायालय ने भी तलवार दंपति को “बाइज्जत बरी” नहीं किया है। उसने उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी किया है।

अर्थात उन्हें संदेह का लाभ जरूर मिला है, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह भी नहीं कहा है कि वह बिल्कुल पाक-साफ हैं। अगर वह पाक-साफ होते तो उच्च न्यायालय उन्हें “बाइज्जत बरी” करने का आदेश देता।

बहरहाल, अब सबकी नजर इस पर रहेगी कि सीबीआई इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाती है या नहीं। यदि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी वही रहता है जो हाईकोर्ट का है तब तो ज्यादा कुछ नहीं होगा, लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय का फैसला पलट जाता है तो कुछ समय के लिए यह केस फिर से देश में विचारों का भूचाल ला देगा।
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