मोदी को भगवान न बनाओ!

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by आशीष वशिष्ठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200
E-mail : avjournalist@gmail.com

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4 thoughts on “मोदी को भगवान न बनाओ!

  1. सिकंदर हयात

    Deepak Sharma
    9 hrs ·
    गांधी, नेहरु, बोस, अरबिंदो,अम्बेडकर,पटेल…क्या ये लोग फिर कभी लौटेंगे इस धरती पर।
    या वो कालखंड …1860 से 1920 के आस पास का, आने वाले भारत के सदियों के इतिहास का एक स्वर्ण काल बनकर सिमट जाएगा।
    आख़िर क्या दौर था …उद्योगपति मिला तो घनश्याम दास बिरला या जमना लाल बजाज जैसा, खिलाड़ी मिला तो ध्यानचंद, साहित्यकार मिला तो टेगौर, वैज्ञानिक मिला तो होमी जहांगीर भाभा, सत्येन्द्र नाथ बोस और हिंदुत्व का स्वामी मिला तो स्वामी विवेकानंद। ओह माई गॉड ! क्या लोग थे ? क्या वक़्त था ?
    कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे इस कालखंड में तारे ज़मीन पर उतरे थे या भगवान ने समूची सहस्त्राब्दी के महापुरुष कुछ ही दशक के अंतराल में हमें दे दिए। जैसे देश के लिए कोई गोल्डन पैकिज डील की हो ईश्वर ने। सारा टैलेंट एक ही वक़्त में दे दिया।
    सच बोलूँ …तो आज उस दौर के आगे हम कहीं टिकते ही नही। सच बताईए, क्या आज के किसी एक भी स्वामी में आपको विवेकानंद का एक कण भी कहीं दिखता है? क्या देश में आज अरबिंदो का सब्सिट्यूट कहीं है? बात उद्योग की करें तो जमशेदजी टाटा कहाँ से लाएँगे? क्या अडानी या अम्बानी में आपको जमना लाल बजाज की एक इंच छवि दिखती हे ? या किसी आई ए एस की रगों में आपको सुभाष चंद्रा बोस का एक चुटकी ख़ून कभी दौड़ता हुआ महसूस हुआ ? क्या सरदार पटेल के हिमालय जैसे व्यक्तित्व में आपको मोदी कहीं छुपे नज़र आते हें ? क्या आज के किसी गीतकार की क़लम से जन गण मन का गीत काग़ज़ पर उतर सकता सकता है ? शायद जितना अंतर अम्बेडकर और मायावती के मत और मेधा में होगा उससे कहीं ज़्यादा अंतर सावरकर और अमित शाह के चरित्र और सत्यनिष्ठा में होगा ? जितना अंतर लोहिया और मुलायम के समाजवाद में है उतना ही अंतर नेहरू और राहुल की डिस्कवरी आफ इंडिया में भी है । नेहरू ने वेद और उपनिषद को खंगाला था, राहुल ने फ़ैक्टरी से आलू खंगाले है। ये पतन की पैमाईश नही, पतन की अंधी गहरायी है।
    आप में से किसी को हेगडेवार की संघी विचारधारा से गहरे मतभेद हो सकते हैं लेकिन फिर भी आपको ये स्वीकार करना होगा कि बीती एक सदी में लाखों लाख स्वयं सेवक जब अपनी सादगी पर क़ुर्बान हुए तब कहीं जाकर लालक़िले ने ध्वज को नमन किया है। लेकिन आज लखनऊ से लेकर मुंबई तक संघ के कौन से प्रचारक ट्रान्स्फ़र पोस्टिंग और दलाली का गिरोह चला रहे हैं ये मोटाभाई भी जानते है । मायावती और शिवपाल के दौर से ज़्यादा भ्रष्टाचार आज यूपी में है। जितनी रिश्वत गायत्री प्रजापति ने नही ली होगी उतनी रिश्वत सादगी के छद्म पर्याय यानी कलयुग के प्रचारक आज विधान सभा मार्ग पर ले रहे हैं। थोड़ा और इंतज़ार करिए, लखनऊ के बंगारू लक्ष्मण का चेहरा सार्वजनिक होगा।
    मित्रों, तुलसीदास ने कहा था, हरि अनंत हरि कथा अनंता। लेकिन अवध में आज राम की ही नही , हमारे नैतिक पतन की कथा भी अनंत है। इसलिए बात बढ़ाना नही चाहता। सिर्फ़ इतना कहना है कि पतन केवल कांग्रेस या भाजपा में नही , उद्योग, व्यापार, नौकरशाही में नही …..पतन हमारे सम्पूर्ण, सर्वस्व राष्ट्रीय चरित्र में है । ऑल अराउंड एंड एवरी व्हेर। इसलिए वो अख़बार भूल जाईए जिनके नाम इंक़लाब होते थे। जिन छापेखानो में ‘गांडीव ‘ छपते थे वो कब के बंद हो गये। आज तो 100-100 करोड़ की डील करने वाले दलाल देश के सबसे बड़े चैनल के मुख्य सम्पादक है। आज चार चार गुरुओं का गला दबाकर महंत बने बाबा दस हज़ार करोड़ के साम्राज्य के मालिक हैं।
    और जिस नम्बर दो के व्यापारी ने कभी बबलू श्रीवास्तव जैसे गुंडे के हाथ जोड़े हों आज वो दिल्ली के राजपथ का सबसे रसूखदार उद्योगपति है। मोटा भाई जानते है।
    मित्रों, दुर्भाग्य अब यही है कि ये लक्षण महाशक्ति का सपना देखने वाले देश के क़तई नही है। जिस देश के लिए १९६६ में माधव सदाशिव गोलवलकर ने लिखा था
    हिमालय समारभ्य यावदिंदू सरोवरम ।
    तम देवनिर्मितम देशम हिंदुस्थाना प्रचक्षयते ।।
    (The Land created by the Gods and stretching from Himalayas to Indu Ocean is called Hindusthan.)
    निसंदेह ये लक्षण अब उस हिन्दुस्तान के नही बल्कि उस देश के है जिसे अहंकार, आत्मुग्धता और छद्म ज्ञान में डूबे एक गिरोह ने जकड़ लिया है। ये गिरोह हमें और आपके साथ इस देश को रसातल में ले जा रहा है। जिन्हें टोकना था, जिन्हें रोकना था वो चुप हैं, इसलिए अब आप ही इस गिरोह के मुट्ठी भर सदस्यों को चिन्हित करिए। समय कम है और प्रश्न अब विचारधारा का नही, देश का है।
    और हाँ ध्यान रहे
    जो तारे पिछली सदी में हमें रोशन करने के लिए ज़मीन पर उतरे थे
    वो अब दुबारा आने वाले नही है।
    इसलिए अपने अंधेरे अब हमें ख़ुद दूर करने है।
    पहचानिये इस गिरोह को।Deepak SharmaFORMER EDITOR at Aajtak News Channel————————————-Rakesh Kayasth
    5 hrs ·
    अमित शाह के बेटे जय शाह की ओर से न्यूज़ पोर्टल द वायर के खिलाफ दायर किये गये आपराधिक मानहानि मुकदमे की पहली सुनवाई खासी दिलचस्प रही। जय शाह की ओर से पेश हुए वकील ने माननीय मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट से कहा कि हमारे बड़े वाले एडवोकेट हाई कोर्ट के एक दूसरे मुकदमे में व्यस्त हैं, इसलिए आ नहीं पाएंगे, कोई और तारीख दे दीजिये।
    बीजेपी ने जिस मामले को राष्ट्रीय मानहानि का सवाल बना दिया हो, उसकी पैरवी के लिए बड़े वाले वकील साहब वक्त तक नहीं निकाल पाये! मजिस्ट्रेट साहब ने भी वकील साहब की व्यस्तता को समझा और सुनवाई 16 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी।
    पेशेवर वकीलों के पास दस काम होते हैं। वे रेल मंत्री पीयूष गोयल या यूपी के हेल्थ मिनिस्टर सिद्धार्थनाथ सिंह की तरह फुर्सत में नहीं होते कि इधर खबर छपी, उधर एक प्राइवेट सिटिजन की कंपनी का बैलेंस शीट लेकर बचाव के लिए प्रेस कांफ्रेंस करने दौड़ पड़े।
    आखिर बीजेपी और केंद्र सरकार को जय शाह के बचाव की इतनी जल्दी क्यों थी? क्या वायर ने वाकई कोई ऐसा इल्जाम लगाया है, जिससे उनकी मानहानि होती हो? वायर के संचालक और जाने-माने पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि उन्होने सरकारी वेबसाइट पर पड़ी सूचना को सिर्फ सार्वजनिक किया है, ताकि उस पर चर्चा हो सके।
    वायर ने जय शाह का पक्ष जानने के लिए एक प्रश्नावली भी भेजी थी। जिसके जवाब में उनके वकील ने 100 करोड़ रूपये की मानहानि का सिविल सूट दायर करने धमकी दी और बाद में मानहानि का क्रिमिनल केस दर्ज करवा दिया।
    सत्ता के शीर्ष पर बैठे किसी भी ताकतवर आदमी के करीबी रिश्तेदार की संपत्ति रातो-रात और संदेहास्पद तरीके से बढ़ती है, तो उसपर सवाल उठते हैं। क्या इसमें कुछ अजूबा है?
    मुझे याद है, जब मोदी सरकार नई थी, तब अर्णब गोस्वामी के टाइम्स नाऊ ने छाती पीट-पीटकर सुषमा स्वराज पर इल्जाम लगाया था कि उन्होने ललित मोदी को निजी रिश्तों के आधार पर मदद पहुंचाई है और बदले में सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज को आर्थिक फायदा मिला है। टाइम्स नाऊ ने सुषमा स्वराज का इस्तीफा मांगने का कैंपेन तक चलाया था। क्या किसी ने टाइम्स नाऊ पर मुकदमा किया?
    फर्क कहां है? फर्क सुषमा स्वराज और अमित शाह होने का है। फर्क अर्णब गोस्वामी और सिद्धार्थ वरदराजन का है। लेकिन सबसे बड़ा फर्क 2014 और 2017 का है। मीडिया संस्थानों का बिकना उस समय शुरू हुआ था, अब शायद कोई बचा नहीं है, जिसे खरीदा जा सके।
    द वायर चंदे पर चलने वाला एक वेब पोर्टल है। यह ना तो तहलका की तरह स्टिंग ऑपरेशन करता है और ना किसी बड़े टीवी चैनल की तरह चीखता है कि उसने किसी भांडा फोड़ दिया है। पत्रकारिता का जो शास्त्रीय तरीका है, उस पर चलते हुए आरटीआई और दूसरे तरीकों से खबरें निकालता है, दूसरे पक्ष की बात हमेशा छापता है। यह सब करके भी अगर वह ताकतवर सत्ता प्रतिष्ठानों की आंख किरकिरी बन गया है तो इसका मतलब यही है कि भारत में पत्रकारिता अभी मरी नहीं है।
    वक्त कोई भी रहा हो, ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले मुट्ठी भर लोग ही होते हैं। गीदड़ भभकियों और बंदर घुड़कियों को इतिहास भी बहुत पुराना है। लेकिन अगर सच की ताकत है, तो बिगड़ता कुछ भी नहीं है। जय शाह अगर केवल यह कह देते हैं कि आरोप बेबुनियाद है, तो मामला खत्म हो जाता। आखिर सरकार उनके पप्पा की है, किसके बाप की मजाल थी कि मामले की जांच करवा लेता। लेकिन ताकतवर होने के गुमान में मोदी सरकार ने एक उड़ता तीर ले लिया। ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है। इसी सरकार के दौर में मीडिया को डराने की कोशिशों का नतीजा सबने देखा है। एनडीटीवी पर एक दिन के बैन का एलान हुआ। इतनी किरकिरी हुई कि फैसला वापस लेना पड़ा।
    इसी वायर ने महान देशभक्त कारोबारी सुभाष चंद्र गोयल की कंपनी की एक लॉटरी घोटाले में संलिप्तता की खबर छापी थी। इसी तरह 100 करोड़ का मुकदमा दायर हुआ था। मामला कोर्ट में पहुंचा, परते खुलनी शुरू हुई, छीछालेदर बढ़ती देखकर मुकदमा करने वाले ने चुपचाप केस वापस ले लिया।
    बीजेपी और केंद्र सरकार ने अपनी अकड़ में एक छोटे न्यूज़ पोर्टल की खबर को नेशनल हेडलाइन बनवा दिया। यह अंधकार और अहंकार का युग है। अहंकार गंदे पानी का तालाब है। जाने कितने बड़े-बड़े इसमें डूब गये लेकिन साहब पूछे कितना पानी?

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Abhishek Srivastava
    14 hrs · Ghaziabad ·
    मैं पिछले कुछ समय से लगातार कह रहा हूं कि भारतीय जनता पार्टी अगर 2019 में सत्‍ता में आ गई तो 2024 में चुनाव नहीं होगा। चुनाव नहीं होने का मतलब चुनाव आयोग नाम की संस्‍था के खत्‍म हो जाने से लगाइए। ठीक वैसे ही जैसे योजना आयोग निपट गया। हो सकता है कोई ऐप वैप आ जाए चुनाव करवाने के लिए… कुछ भी हो सकता है लेकिन अपने वर्तमान स्‍वरूप में चुनावी लोकतंत्र 2024 में काम नहीं करेगा। आज उसका सार्वजनिक ट्रेलर दिखा है। मुझे अहमद पटेल के चुनाव में दिखा था। तब मैंने यह बात चौथी बार कही थी।
    संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि एक ही महीने में दो राज्‍यों की विधानसभाओं का टर्म खत्‍म हो रहा है और दोनों के चुनाव परिणाम भी एक ही दिन आने हैं, लेकिन चुनाव की तारीख एक राज्‍य की ही घोषित की गई है। गुजरात अभी बाकी है। प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर रहे चुनाव आयुक्‍त का आपने चेहरा देखा होगा। पिछले कुछ वर्षों में मुझे इस पद पर बैठा यह सबसे कमज़ोर चेहरा नज़र आया। ऐसा लग रहा था कि दबाव में है। ज़ाहिर है, प्रधानजी के दबाव में, जिन्‍हें 16 तारीख को गुजरात जाना है। पिछले छह महीने में 34वीं बार शायद। कोई सही गिन कर बताए…।
    आज एक नया काम हुआ है। कल और नए काम होंगे। यह सरकार पहली बार उठाए जाने वाले कदमों के लिए जानी जाएगी। चौंकाने के लिए जानी जाएगी। पुराने के दुहराव का डर बड़ा नहीं होता। अचानक आई चीज़ का डर बड़ा होता है। नोटबंदी अचानक आई। चौंका गई। जीएसटी आधी रात आया। लोग अब तक सदमे में हैं। सब्सिडी अचानक चली गई। तेल का दाम अब रोज़ चौंकाता है। चौंकाना एक राजनीतिक रणनीति है। इससे पुरानी चीज़ें धुल जाती हैं। दिमाग सर्वाधिक नई बात से अतिव्‍याप्‍त हो जाता है। उसका सदमा खत्‍म नहीं होता कि कुछ और नया चौंका देता है। ये सरकार नहीं, टाइड डिटर्जेंट है। सट्ट से आता है और कपड़े को झक्‍क कर जाता है। नाओमी क्‍लीन इसी को Shock Doctrine कहती हैं।Abhishek Srivastava—————————————Hemant Kumar Jha
    6 October at 23:22 ·
    नरेंद्र मोदी जिस राजनीतिक धारा की उपज हैं, वह किसी युगांतरकारी आर्थिक चिंतन के लिये नहीं, अपने विशिष्ट सांस्कृतिक चिंतन के लिए जानी जाती है। यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।
    सत्ता में आने के बाद अर्थव्यवस्था में युगांतरकारी हस्तक्षेप का मोदी का दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है तो इसके पीछे मौलिक चिंतन का अभाव ही है। चाहे वह नोटबन्दी हो या जीएसटी, इसकी विफलता के मूल में पर्याप्त तैयारी के बिना कदम बढ़ा देना तो एक बड़ा कारण है ही, भारत नामक देश की विशिष्ट परिस्थितियां भी इसके लिये जिम्मेवार हैं।
    आश्चर्य होता है कि जो पार्टी सबसे अधिक देश देश की रट लगाती है, वह सही मायनों में देश को जानती ही नहीं। यही कारण है कि इतने सक्षम प्रचार तंत्र और निस्तेज विपक्ष के बावजूद मोदी सरकार अब आर्थिक मामलों में पूरी तरह बैकफुट पर आ गई लगती है। अरुण जेटली अब विरोधी ही नहीं, समर्थकों के निशाने पर भी हैं। कुछ हलकों में तो, जैसे छोटे व्यापारी वर्ग और मध्य वर्ग खास तौर पर, वे विलेन माने जाने लगे हैं। यह अकारण भी नहीं है। जीएसटी की जटिलता से व्यापारी वर्ग हलकान है तो तरह तरह के टैक्स और बैंक कटौतियों से मध्य वर्ग परेशान है। गरीब श्रमिकों को तो वैसे भी जेटली से कोई उम्मीद नहीं थी।
    जिनकी आकांक्षाओं के हेलीकॉप्टर पर सवार होकर भाजपा के नेतागण चुनावी अभियान में देश को नाप रहे थे, वे जरूर संतुष्ट होंगे। आज के ही अखबार में देखा कि देश के 100 सबसे अमीर लोगों की संपत्ति में बीते एक वर्ष में 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। अपने बड़े अंबानी इसमें भी टॉप पर हैं। उनकी संपत्ति में बीते महज एक वर्ष में 67 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह हैरतअंगेज है, लेकिन यही सत्य है।
    सरकार सुरक्षात्मक मुद्रा में है और आज ही जेटली जीएसटी में संशोधनों पर प्रेस कांफ्रेंस करते दिखे। अनेक सामग्रियों पर टैक्स में कटौती की गई है। लेकिन, यह कदम अपर्याप्त है, क्योंकि असंतोष बड़ा है। आज के ही अखबार में एक अन्य रिपोर्ट (दैनिक भास्कर) कहती है कि विश्व स्तर पर रोजगार की दर बढ़ रही है, लेकिन भारत में यह घट रही है, मंदी से जूझ रहे अन्य प्रमुख देशों में सुधार के लक्षण दिखने लगे हैं, लेकिन भारत मंदी की ओर बढ़ रहा है। यह आर्थिक विफलता मोदी सरकार की अन्य उपलब्धियों को, वो अगर कहीं हैं तो, हाशिये पर धकेल सकती है।
    दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ पर पालतू कुलपतियों के द्वारा सेमिनार तो करवाए जा सकते हैं, लेकिन आर्थिक नीतियों के निर्धारण में इसकी कोई भूमिका नजर नहीं आती। यह एक किताबी किस्म की अवास्तविक, आदर्शवादी अवधारणा लगती है, जिसमें हितों के परस्पर संघर्ष को विकृति का द्योतक माना गया है। एक ऐसे समाज में, ऐसे समय में, जब अमीर और अमीर हो रहे हों, गरीबों की गरीबी बढ़ती जा रही हो, हितों के परस्पर संघर्ष को विकृति का द्योतक मानना गरीबों के साथ छल है।
    आदर्शों और उदाहरणों की इसी दरिद्रता ने मोदी को जेटली के हाथों अर्थव्यवस्था की कमान सौंपने को विवश किया। चुनाव हार चुके जेटली जनता के नहीं, कॉरपोरेट के दिलों में बसते हैं। वे दशकों से उनके वकील रहे हैं और बतौर वित्त मंत्री, उन्होंने सबसे अधिक, बल्कि एकमात्र, कॉरपोरेट वर्ग का ही भला किया है।
    अब, जबकि चुनाव नजदीक हैं, सरकार के हाथ पांव फूल रहे हैं। वोट तो आखिर जनता ही देती है। लेकिन, मुश्किल यह है कि जिस रास्ते पर सरकार इतनी दूर निकल आई है, उसमें ‘जनोन्मुखी’ नीतियों की बात करना ही बेमानी है। कुछ लोक लुभावन कदम जरूर उठाए जा सकते हैं। बाकी, गोमाता, मंदिर-मस्जिद, विशिष्ट तरीके का राष्ट्रवाद, संस्कृतिवाद, जातिवाद आदि तो हैं ही। “माँ भारती के लालों” को ये सब मुद्दे बहुत आकर्षित करते हैं, और भाजपा इन मुद्दों को ‘यूज’ करने में तो माहिर है ही।———————————Narendra Nath
    Yesterday at 15:07 ·
    ‘ब्रांडिंग’ क्या कर सकती है वह तलवार फैमिली को बरी करने के फैसले से साबित होती है।
    दोनों की ‘इमेज’ खराब थी।सो,उन्हें कोई ‘राहत’ नहीं दे रहा था। फिर पीआर फर्म लिया गया। उसने इनके फेवर में ‘सहानुभूति’ की हवा बनाई गई।किताब आई।फ़िल्म बनी। लोगों ने बयान दिए। और फिर स्टेज सेट हुआ इनकी रिहाई के लिए।
    अभिनेता,नेता से लेकर हर कोई ‘ब्रांडिंग’ से मुकाम इसी तरह पाता है। नीचे ट्वीट देखये।सुबह में ही अंदाजा लगा दिया था कि क्या होने वाला है।
    मॉरल ऑफ स्टोरी-कुछ भी करें,’ब्रांडिंग’ पर सबसे अधिक ध्यान ने धारणा-भावना प्रधान देश-समाज मे।Narendra Nath
    11 October at 22:14 ·
    मोदी सरकार सबसे बड़ी दिक्कत है कि इनके नेता और लोग
    मीडिया में कई बार अहम मौकों पर कुछ और बोलते हैं,सोशल मीडिया पर कुछ और। मीटिंग में कुछ। फाइलों में कुछ और।
    और जब यह चारों घटनाक्रम एक साथ गुजरता है तो फिर इस हिप्पोक्रेसी पर हैरानी होती है

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  3. सिकंदर हयात

    Awesh Tiwari
    Yesterday at 21:03 ·
    अभी गुजरात के एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि बीजेपी को किसी अन्य पार्टी की तुलना में इलेक्शन इंजीनियरिंग ज्यादा बेहतर ढंग से आती है लेकिन इसे जीत में तब्दील कर पायेगी यह फिलहाल मुश्किल दिख रहा है। जो ख़बर मुझे मिल रही है उससे पता चलता है कि बीजेपी बड़े पैमाने पर सिटिंग विधायकों के टिकट काटेंगी। एंटी इंकवेंसिंग जबरदस्त है। आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट ठीक नही है। गौरव यात्रा को लेकर लोगों में खुशी कम गुस्सा ज्यादा है । योगी के रोड शो के पहलेभुज के पास के एक गांव में समर्थकों को लाने के लिए बस भेजी गई तो केवल 4 लोग ही आये।————–Rakesh Kayasth
    4 hrs ·
    जब जीडीपी ग्रोथ रेट, बेरोजगारी, जीएसटी की जटिलताएं और नोटबंदी के नतीजे जैसे सवालों पर पूरे देश में बहस गर्म हो, ठीक उसी वक्त संदीप सोम जैसे किसी छोटे स्तर के बीजेपी नेता का कोई भड़काऊ बयान क्यों आ जाता है?
    यह संयोग नहीं है बल्कि एक पैटर्न है। प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के जिन लोगो को फ्रिंज एलिमेंट बता चुके हैं, वे रणनीतिक व्यूह रचना में सबसे आगे खड़े सिपाही हैं। मुद्धा भटकना हो, विमर्श बदलना हो तो यह आसान तरीका है। कोई एक बयान आता है, सोशल मीडिया उसपर रियेक्ट करने लगता है और मेन स्ट्रीम मीडिया उसे हाथो-हाथ लपक लेता है। असली सवाल पीछे छूट जाते हैं।
    किसी प्यादे से वज़ीर का शिकार करने की बीजेपी की यह रणनीति अब तक बहुत हद तक कारगर साबित हुई है। पांच हज़ार साल की विहंगम भारतीय संस्कृति में जो बहुत से प्रतीक हैं, उनमें ताजमहल भी शामिल है। क्योंकि ताजमहल एक मुसलमान शासक ने बनवाया है, इसलिए उसके बारे में कुछ भी बोलना मुस्लिम अस्मिता पर चोट करने या मुसलमानों को भड़काने का आसान तरीका है।
    जब हिंदू-मुसलमान होगा, वहां बाकी सवाल अपने आप पीछे छूट जाएंगे। पिछले नौ दशक के अनुभव ने आरएसएस को यही सिखाया है। दूसरी या तीसरी जमात के बीजेपी नेताओं के ऐसे भड़काऊ बयानों पर रीयेक्ट करने का एक ही मतलब है, उन्हे उनके मकसद में कामयाब बनाना।Rakesh Kayasth———–Vishnu Nagar
    11 hrs ·
    हर स्तर पर चुनाव परिणामों को देखें तो मोदीजी के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं।अमित शाह का जोड़ -घटाओ-गुणा -भाग और मोदीजी के चमत्कारी भाषण फ़ेल हो रहे हैं क्योंकि जनता इनसे अब आजिज़ आ चुकी है।थैलीशाह भी इस बात को समझने लगे हैं और मोदीजी और शाह जी भी कोई मूर्ख नहीं हैं।कहेंगे नहीं (और कौन सी पार्टी अपनी असफलताओं को हार जाने से पहले सार्वजनिक रूप से स्वीकार करती है?)मगर वे भी सब समझ रहे हैं।मोदीजी के मंत्री भी सांसद -विधायक भी समझ रहे हैं।पलायन अभी शुरू होगा नहीं क्योंकि चुनाव में अभी देर है और जल्दी पार्टी छोड़नेवालों के साथ सरकार कुछ भी कर सकती है।
    लोग तो विपक्ष को जितना हो सकता है , संकेत दे रहे हैं।हिमाचल में ज़रूर भाजपा चुनाव जीत सकती है मगर गुजरात के हालात भी कुछ अच्छे नहीं लग रहे हैं।वोटिंग मशीन की टैंपरिंग तेरा सहारा है,चुनाव आयोग का भी बल है।इससे जितना खेल कर जाएँ, कर जाएँ। भाजपाई बौखलाए हुए हैं,हिंदू राष्ट्र का अभियान अधबीच में रुकने का डर संघ को भी है।इसलिए गुजरात हिमाचल चुनाव के बाद दमन और सांप्रदायिकता का खेल और तेज़ी से खेला जाएगा।वैसे इस चुनाव में भी खेला जाएगा क्योंकि विकास पगला गया है।विपक्ष को अलग -थलग करने, बाँटने, उनके नेताओं के ख़िलाफ़ केस तेज़ करने या नये खोलने का अभियान भी शुरू होगा।राहुल गाँधी -सोनिया गाँधी पर वार तेज़ होंगे क्योंकि मरी हुई लगनेवाली कांग्रेस अभी भी ख़तरा है।ऐसे में तमाम दबावों- षडयंत्रों के बीच विपक्ष को अपनी वास्तविक एकता के प्रयास तेज़ करने चाहिए।एक साझा एजेंडा बनाना चाहिए,अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं की बातें सुनकर, दलालों को छोड़कर।रोज़गार और खेती दो सबसे बड़ी, ज्वलंत समस्या है।मनरेगा को भाजपा ने त्याग दिया है ,उसे नये सिरे से जीवन देना बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।विपक्ष क्रांति न करे मगर बिना किये भी बहुत कुछ हो सकता है।शरद पावरों और मुलायम सिंहों को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए,जो सबके हैं, सब तरफ हैं और अंतत: पूँजीपतियों के प्रतिबद्ध सेवक हैं।ठोस एकता -जिस पर पाँच साल तक चलने का पक्का वायदा ये लोगों से करें और ऐसा तंत्र विकसित करें -कि बहुमत किसी एक पार्टी को मिले भी मगर चला उसी एजेंडे पर जाएगा वरना ये सुनहरा अवसर वे हमेशा खो देंगे , जो अभी खो गया तो वे भूल जाएँ कि फिर कभी आ सकता है।जनता उन्हें दुबारा माफ़ नहीं करेगी। शर्म हो तो कुछ करें क्योंकि अब समय है नहीं और लोग अधीर हैं।बड़े जन आंदोलनों का यह समय है।——————Himanshu Kumar added 2 new photos.
    1 hr ·
    जिस देश में नजीब की माँ फ़ातिमा शामिल नहीं हैं, उसमें मेरा दम घुटता है।
    नजीब की माँ को उस समय भी सड़कों पर घसीटे जाने का अहसास हुआ जब नजीब के वार्डन ने संघी गुंडों के साथ सख़्ती नहीं बरती,
    जब वीसी ने रोती-बिलखती माँ से मिलने से इनकार कर दिया,
    जब मीडिया ने नजीब का नाम आईएएस से जोड़ दिया,
    जब दिल्ली पुलिस ने नजीब के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया और जब सीबीआई ने भी दिल्ली पुलिस जैसी लापरवाही दिखाई।
    रोहित वेमुला की माँ राधिका वेमुला को भी दिल्ली की सड़क पर इसी तरह घसीटा गया था।
    भारत की माँओं का यह हाल करने वाले लोग जब भारत माता की जय बोलते हैं तो उल्टी आती है।
    ग़ुस्सा तो आता ही है।
    – सुयश सुप्रभ —————–Awesh Tiwari
    1 hr · Varanasi ·
    अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए, लेकिन वजह धार्मिक हरगिज नहीं है| अयोध्या के एक साथी बताते हैं कि दरअसल समूचे अयोध्या, फैजाबाद में न कोई उद्योग है न का रोजगार कोई और स्रोत, आम जनता की आय यहाँ लगने वाले पांच मेलों पर टिकी है, इन्ही मेलों से होने वाली कमाई से लोग बेटियों की शादियाँ करते हैं बच्चों को पढ़ाते हैं| हिन्दुओं- मुस्लिमों का एक तबका ऐसा है जो चाहता है कि जल्द से जल्द मंदिर बने , पर्यटन बढे और उनके घर के चूल्हे की आग की आंच और तेज हो| मुझे भी लगता है,रोजी रोटी के सवाल से बढ़कर आस्था से जुड़े सवाल नहीं हो सकते हैं, रोजी रोटी के लिए जो संभव हो सभी धर्मों को स्वीकार करना चाहिए|nil Pandey एक सवाल मेरा भी है ,मंदिर बनने के बाद मंदिर में जो चढ़ावा चढ़ेगा उस पर मालिकाना हक किसका रहेगा ?
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    Awesh Tiwari
    Awesh Tiwari पहले बने तो

    Anil Pandey
    Anil Pandey यही जवाब विहिप के एक बड़े नेता ने मुझे दिया था ।

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  4. सिकंदर हयात

    मुझे भी हमेशा यही महसूस होता था की ऐसे कैसे हो सकता हे की मोदी जैसा छोटी सोच का आदमी कम्युनल आत्मुगद न एजुकेटिड ना कोई अनुभव ही वो भला कैसे गुजरात का ही सही विकास कैसे कर सकते हे भला———— ? यकीं नहीं होता था पढ़े Arun Maheshwari
    29 mins ·
    गुजरात में विकास सचमुच पागल हो गया है, उसे होश में लाने का समय आ चुका है
    -अरुण माहेश्वरी
    राहुल गांधी ने मोदी के तथाकथित गुजरात मॉडल को पूरी तरह से ठुकराते हुए वहाँ के ‘पागल हो गये विकास’ को सुधारने का वादा किया है ।
    इस पर मोदी के सिपहसलार अमित शाह ने गुर्राते हुए कहा हैं कि राहुल की इतनी हिम्मत कि गुजरात में मोदी के अवदान पर सवाल उठाए !
    सचमुच हम जानना चाहते हैं कि गुजरात में मोदी का कौन सा ऐसा मौलिक अवदान है जिसके लिये उन्हें सराहा जा सकता ह ?
    1. गुजरात में कृषि क्षेत्र में खास तौर पर सहकार के आधार पर दूध क्रांति का पूरा श्रेय कांग्रेस के शासन को जाता है । अमुल का जन्म भाजपा के शासन में नहीं हुआ है ।
    2. गुजरात में रिलायंस का पेट्रोकेमिकल्स प्रकल्प सीधे तौर पर धीरू भाई अंबानी को इंदिरा गांधी की भेंट रहा हैं । हम उस इतिहास के साक्षी है जब लाइसेंस-परमिट राज के दिनों में इन्दिरा गांधी ने सीमाई प्रदेश की थोथी दलील पर हल्दिया में पेट्रोकेमिकल्स को अनुमति नहीं दी थी और इस क्षेत्र में रिलायंस की इजारेदारी को संरक्षण दिया था ।
    3. गुजरात का परवर्ती औद्योगिक विकास पेट्रोकेमिकल्स के एंसीलियरी प्रकल्पों के जरिये ही हुआ । यहाँ तक कि टैरीकॉटन के सर्टिंग सूटिंग के कारख़ानों की श्रृंखला और सूरत का साड़ी उद्योग भी उसी से जुड़े उत्पादों के रूप में कांग्रेस के ज़माने में ही फैल गया था ।
    4. जहाँ तक अहमदाबाद के कपड़ा उद्योग का सवाल है, उसके विकास के समय तक तो भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था ।
    5. यहाँ तक कि समुद्री तट पर शिप-ब्रेकिंग का काम भी कांग्रेस के ज़माने में जिस तरह फला-फूला, उसमें इधर गिरावट ही आई है ।
    और जहाँ तक गुजरात को मोदी की देन का सवाल है :
    1. उनका सबसे बड़ा योगदान गोधरा कांड की आड़ में 2002 का मुसलमानों का जन-संहार रहा है, जिसके बदनुमा दाग को गुजरात कभी नहीं धो पायेगा । इस जन-संहार से गुजराती समाज में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ, मोदी ने सिर्फ उसी की राजनीतिक फ़सल काटी है, किसी विकासमूलक काम की नहीं ।
    2. जहाँ तक विकास के काम का सवाल है, इवेंट्स मैनेजर मोदी ने हर साल ‘रिसर्जेंट गुजरात’ के भव्य आयोजनों और लंबी-चौड़ी भाषणबाजियों के अलावा यह किया कि किसानों की ज़मीन को छीन-छीन कर अपने क़रीबी उद्योगपतियों के बीच मुफ्त में बाँट दिया । अडानी और टाटा को तटवर्ती मुंद्रा इलाक़े में बिजली प्रकल्पों के लिये हज़ारों एकड़ ज़मीन लगभग मुफ्त में दी और आज उन दोनों बिजली प्रकल्पों की हालत इतनी ख़स्ता है कि वे गुजरात सरकार से राहत के पैकेज माँग रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी ख़ज़ाने से उनको धन सौंपने पर रोक लगा दी है, वर्ना मोदी जी तो इसकी हरी झंडी दिखा चुके थे । अडानी को रीयल इस्टेट के लिये कौड़ियों के दाम पर हज़ारों एकड़ ज़मीन दिला दी । और सिंगुर से टाटा को भगा कर नैनो के लिये जो हज़ार एकड़ से ज्यादा ज़मीन दी, वह कारख़ाना आज बंद सा पड़ा है ।
    3. इसके अलावा गुजरात की भलाई के नाम पर रिलायंस टेलिकम्युनिकेशन और उसके जिओ को इस प्रकार की छूटें दे दी हैं कि दूसरी सभी टेलीकॉम कंपनियों की हालत ख़राब है । टाटा ने तो अपनी टेलिकॉम कंपनी को बंद कर देने का निर्णय ले लिया है ।
    4. मोदी ने अदानी और अंबानी से 2014 के चुनाव के वक्त इतनी अधिक मदद ली थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी विदेश यात्राओं के दौरान देश के हितों की तुलना में इन दो पूँजीपतियों के हितों की रक्षा के लिये ज्यादा तत्पर रहे हैं ।
    यह है गुजरात को मोदी का अवदान ! उन्होंने राज्य की ओर से संगठित जन-संहार करवाया, किसानों को लूट कर, ग़रीब मज़दूरों की ज़िंदगी से हर प्रकार की सुरक्षा को ख़त्म करके दो-चार पूँजीपतियों की मुट्ठियाँ गर्म किया और नफरत के आधार पर वोटों की फ़सल काटी । बस ! इन सबका परिणाम आज सिर्फ गुजरात नहीं, पूरा देश भुगत रहा है । देश में तेजी से भुखमरी बढ़ रही है और उतनी ही तेजी से अंबानी अदानी की संपत्ति बढ़ रही है ।
    और, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अमित शाह आँखें तरेर कर कहते हैं – राहुल की इतनी हिम्मत कि गुजरात को मोदी के अवदान को चुनौती दें !
    राहुल ने बिल्कुल सही कहा है – गुजरात में विकास पागल हो गया है, उसे होश में लाना होगा ।Arun Maheshwari
    7 hrs ·
    ओम थानवी ने एक और संदेश में लिखा है :
    “गाँधीनगर में मोदी भाजपा के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित कर रहे थे। यह कोई जनसभा नहीं थी। फिर भी जीएसटी के पैसे से चलने वाले दूरदर्शन ने इसे लाइव दिखाया।
    “इतना ही नहीं, (चुनावी) भाषण के बाद दूरदर्शन के स्टूडियो में भाषण पर चर्चा (पढ़ें व्याख्या) के लिए सिर्फ़ एक “विशेषज्ञ” हाज़िर थे – राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अख़बार ऑर्गनाइज़र के सम्पादक।
    “संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के नागपुर से लाइव प्रसारण से लेकर भाजपा की सभा के आज के प्रसारण तक “स्वायत्त” लोकसेवा प्रसारण संगठन प्रसार भारती का पतन मीडिया संसार में चिंता का सबब होना चाहिए।
    आकाशवाणी-दूरदर्शन का राजनीतिक दुरुपयोग इंदिरा गांधी के ज़माने से होता आ रहा है। पर नागपुर में कैमरा, गाँधीनगर में कैमरे और स्टूडियो में ऑर्गनाइज़र को बिठाल कर इस सरकार ने तो दिखावे की मर्यादा भी नहीं रखी है।”
    हिटलरी तानाशाही के खिलाफ यह एक पुराना और सबसे लोकप्रिय नारा रहा है – ‘जो हिटलर की चाल चलेगा हिटलर की तरह मर जायेगा ।’
    मोदी-शाह कंपनी की दुर्गति 1977 में आंतरिक आपातकाल लगा ‭+91 88007 65856‬ ने वाली इंदिरा गांधी से भी ज्यादा बुरी होने वाली है । ये इतिहास में एक क्रूर जोकर से ज्यादा कुछ नहीं माने जायेंगे । अब तो इनको तुगलकी कहना तुग़लक़ का भी अपमान लगने लगा है ।—————-Urmilesh Urmil
    15 October at 11:26 ·
    एक सेमिनार में भाग लेने के लिए कल दोपहर बागडोगरा एयरपोर्ट पर उतरा। बागडोगरा रणनीतिक रूप से पूर्वोत्तर का बहुत महत्वपूर्ण सैन्य एयरपोर्ट है। इसी पर असैनिक विमान भी उतरते हैं। यहीं से पर्यटक, खास और आम लोग सिक्किम, दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और यहां तक कि पड़ोसी देश भूटान जाते हैं। दिल्ली से बागडोगरा की लगभग पौने दो घंटे की फ्लाइट के दौरान और फिर बागडोगरा उतरने पर तीन-चार लोगों से बातचीत हुई। ये सभी दार्जिलिंग, गैंगटोक या सिलीगुड़ी जाने वाले थे। उसी इलाके के नागरिक भी थे। सबने इलाके की बिगड़ती हालत पर चिंता जताई। पिछले तीन सालों में अंदरुनी तनाव और राजनीतिक टकराव में बढ़ोतरी होने से पर्यटन और इस इलाके के व्यापार पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इसके लिए वे केंद्र में सत्तारूढ़ दल को सर्वाधिक जिम्मेदार बता रहे थे। एक स्थानीय व्यापारी का कहना था कि हर पार्टी अपना राजनीतिक फायदा खोजती है। पर भाजपा कुछ ज्यादा ही खोज रही है और इसके लिए सारी हदें तोड़ रही है। इस इलाके में हाल तक भाजपा का कोई खास असर नहीं था। पर आज वह हर जगह सत्ता में आने के लिए तमाम तरह के दंद फंद किये जा रही है! सबको लड़ा रही है। समाज में टकराव बढ़ा रही है। और इस इलाके में पर्यटन और व्यापार चौपट हो रहा है!

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