क्यों फल-फूल रहा है बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थ?

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पिछले कुछ वर्षों में बांग्‍लादेश में मारे गये नास्तिक या सेकुलर लेखक
, ऊपर बायें से, घड़ी की सुई अनुसार – फैसल दीपन, शैफुल इस्‍लाम, ओयेसिकुर रहमान, अहमद हैदर, अविजीत रॉय, अनंत बिजॉय दास, निलोय नील

by — अखिल

पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में नास्तिक ब्लॉगरों, सेक्युलर बुद्धिजीवियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों व समलैंगिकों की सिलसिलेवार ढंग से हत्या के बाद 1 जुलाई 2016 को ढाका के राजनयिक क्षेत्र में हुए इस्लामिक कट्टरपन्थी हमले ने पूरी दुनिया का ध्यान बांग्लादेश में तेज़ी से बढ़ते इस्लामिक कट्टरपन्थ की ओर खींचा। ग़ौरतलब है कि 1 जुलाई को इस्लामिक कट्टरपन्थियों ने ढाका के गुलशन 2 क्षेत्र में स्थित होली आर्टिसन बेकरी और ओ किचेन पर हमला बोल दिया। इस हमले में 6 कट्टरपन्थियों समेत 26 लोग मारे गये थे। मारे गये लोगों में से अधिकांश विदेशी नागरिक थे। हालाँकि इस हमले की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आयी.एस.) ने ली थी, लेकिन बांग्लादेश की सरकार इस हमले में बांग्लादेश के प्रतिबन्धित इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन जमात-उल-मुज़ाहिदीन बांग्लादेश (जे.एम.बी) का हाथ होने की बात कर रही है।

हालाँकि आयी. एस. का नाम आने और विदेशियों को निशाना बनाने की वजह से 1 जुलाई का हमला पूरी दुनिया की मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा, लेकिन बांग्लादेश के इतिहास के वाकिफ़ लोग जानते हैं कि इस्लामिक कट्टरपन्थियों द्वारा बांग्लादेश में किया गया यह कोई पहला हमला नहीं था। इससे पहले भी वहाँ ऐसे हमले होते रहे हैं। हाल के वर्षों में बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपन्थी सेक्युलर व नास्तिक लेखकों और ब्लॉगरों पर हमलों के लिये कुख़्यात रहे हैं। वे सेक्युलर लेखकों और ब्लॉगरों को इस्लाम का दुश्मन बताकर उन्हें मारते रहे हैं और आम मुसलमानों को उनके ख़िलाफ़ हिंसा के लिये उकसाते रहे हैं।

2013 में इस्लामिक कट्टरपन्थियों के ख़िलाफ़ ‍हुए शाहबाग जनान्दोलनों के बाद से ऐसे हमलों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। बांग्लादेश के अंग्रेज़ी अख़बार ‘द‍ि डेली स्टार’ में प्रकाशित एक ख़बर के मुताबिक पिछले 18 महीनों में इस्लामिक कट्टरपन्थियों ने कम से कम 47 लोगों को मौत के घाट उतारा है। इन हमलों के निशाने पर नास्तिक ब्लॉगरों के अलावा अल्पसंख्यक समुदाय के धर्म गुरुओं, विश्वविद्यालय के अध्यापकों, समलैंगिकों, सूफ़ियों, पीरों और शिया मुसलमानों को निशाना बनाया गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश हमले पेशेवर आतंकवादियों द्वारा नहीं किये गये, बल्कि इनमें से कई मामलों में तो विश्वविद्यालय के छात्रों की भागीदारी पायी गयी है। मसलन नास्तिक ब्लॉगर अहमद रजीब हैदर का उदाहरण लें, तो उसके क़त्ल में ढाका के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक नॉर्थ साउथ विश्वविद्यालय के छात्रों का हाथ था। यह बांग्लादेश के समाज में क्षरित होते सेक्युलर मूल्यों और तेज़ी से बढ़ते इस्लामिक कट्टरपन्थ की ओर साफ़ इशारा करता है। ऐसे में सभी तरक्की-पसन्द इंसानों को यह सवाल ज़रूर परेशान करता होगा कि आख़िर जो मुल्क इस्लाम के नाम पर बने राष्ट्र पाकिस्तान के ‍ख़िलाफ़ मुक्ति युद्ध करके आज़ाद हुआ और जिसने टैगोर के ‘अमार शोनार बांग्ला’ को अपना राष्ट्रीय गीत व विद्रोही कवि काज़ी नज़रूल इस्लाम को अपना राष्ट्रीय कवि चुना, उसमें इस्लामिक कट्टरपन्थियों का इतना दबदबा कैसे बढ़ा?

ऐतिहासिक पृष्ठमभूमि

बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थ के शैतान के इतने विशालकाय रूप अख्तियार करने के पीछे के कारणों को समझने के लिये हमें बांग्लादेश के इतिहास पर एक नज़र दौड़ानी पड़ेगी। 1947 में भारत के विभाजन की त्रासदी का दंश बंगाल को भी झेलना पड़ा था क्योंकि उसे भी धार्मिक आधार पर विभाजित कर दिया गया था। बंगाल के मुस्लिम बहुसंख्या वाला पूर्वी इलाका पाकिस्तान में चला गया था और इस प्रकार पूर्वी बंगाल पूर्वी पाकिस्तान बन गया था। ग़ौरतलब है कि ऐसा बंगाल की जनता की मर्जी से नहीं बल्कि साम्प्रदायिक आधार पर ‘टू नेशन थियरी’ के तहत किया गया था। पूर्वी पाकिस्तान की जनता का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में शामिल होने से नाखुश था। पूर्वी पाकिस्तान की जनसंख्या पाकिस्तान की कुल जनसंख्या का 55 फ़ीसदी हिस्सा होने के बावजूद पाकिस्तान के आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में उसकी नुमाइन्दगी बहुत कम थी क्योंकि राजस्व आवण्टन, औद्योगिक व कृषि के विकास एवं नौकरशाही व सेना में पश्चिमी पाकिस्तान का वर्चस्व था। पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबियों, मुहाजिरों और पश्तूनों के वर्चस्व की वजह से पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को यह एहसास होने लगा कि वे पाकिस्तान में दोयम दर्जे के नागरिक हैं। ब्रिटिश गुलामी से आज़ादी मिलने के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान में बढ़ रही ग़रीबी-बेरोज़गारी तथा पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की वजह से वहाँ की जनता में पश्चिमी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ असंतोष की भावना पनप रही थी और उनमें पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की चेतना पैदा कर रही थी।1950 के दशक में ही उर्दू को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा के रूप में थोपने के ख़िलाफ़ ‍ज़बर्दस्त जनान्दोलन चला था जिसके बर्बर दमन के बावजूद अन्तत: 1956 में पाकिस्तानी हुक्मरानों को बंगाली को भी राष्ट्रभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस आन्दो‍लन का नेतृत्व अवामी मुस्लिम लीग कर रही थी जिसका धर्मनिरपेक्ष धड़ा बाद में अलग होकर अवामी लीग के नाम से जाना जाने लगा जिसका नेतृत्व शेख मुजीबुर रहमान कर रहे थे।

1960 के दशक में पाकिस्तान में पहले अयूब खान और बाद में याहया खान के नेतृत्व वाले सैन्य शासन के दौर में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर ज़बर्दस्त जुल्म ढाये गये जिसकी वजह से वहाँ की जनता का अलगाव और बढ़ा। 1970 में हुए चुनावों के नतीजों में अवामी लीग के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद याहया खान ने उसको सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करने से साफ़ इनकार कर दिया। ग़ौरतलब है कि लोकतंत्र की क़समें खाने वाले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फि़कार अली भुट्टो ने भी इस अलोकतांत्रिक क़दम में याहया खान का समर्थन किया था। इस घोर नाइंसाफ़ी के बाद पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में अलगाव की भावना अपने चरम पर पहुँच गयी। राजनीतिक व आर्थिक स्वतंत्रता, बेहतर जीवन और एक सेक्युलर मूल्य-मान्यताओं वाले समाज के गठन के मक़सद से बंगाली जनता ने शेख मुजीबुर रहमान और अवामी लीग के नेतृत्व में बहादुराना मुक्ति युद्ध लड़ा जिसमेंं लाखों लोगों ने कुर्बानी दी जिसके फलस्वरूप 1971 में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश का जन्म हुआ। पाकिस्तानी जेल से छूटने के बाद शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के पहले प्रधान मन्त्री बने। बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष बहुदलीय बुर्जुआ संसदीय लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण हुआ और चूँकि उस वक्त समाजवाद के अस्तित्वमान होने और राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की ऊष्मा के कारण बांग्लादेश के संविधान में कुछ समाजवादी सिद्धान्तों को भी जगह दी गयी। स्वतंत्र बांग्लादेश में भी शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में भारत के नेहरूवादी समाजवाद की तर्ज़ पर पब्लिक सेक्टर पूँजीवाद स्थापित हुआ।

मुक्ति युद्ध के वक्त पाकिस्तान ने अपनी सेना के अलावा पूर्वी पाकिस्तान के स्थानीय लोगों के बीच से रज़ाकार, अल बदर और अल शम्स जैसे लड़ाकू संगठन खड़े किये थे, जिनमें जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन के लोग शामिल थे। इन लड़ाकों ने मुक्ति युद्ध के दौरान बहुत बड़े पैमाने पर नरसंहार को अंजाम दिया था, लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था और लाखों औरतों का बलात्कार किया था। जनता में इनके ख़िलाफ़ घोर नफ़रत थी और शेख मुजीबुर रहमान की सरकार से यह उम्मीद थी कि वह उन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा देगी। बांग्लादेश में इन युद्ध अपराधियों के ख़िलाफ़ एक ट्रिब्यूनल भी बना। इनमें से कई के ख़िलाफ़ अपराध भी तय हुए, कई को उम्र कैद की सज़ा हुई, लेकिन बाद में इनमें से ज़्यादातर को आम माफ़ी दे दी गयी। युद्ध अपराधियों को माकूल सज़ा न दिया जाना एक बहुत भयंकर ग़लती थी क्यों कि इससे इस्लामिक कट्टरपन्थ को बांग्लादेश के समाज में जड़ जमाने का मौका मिला। इस ग़लती का ख़ामियाजा बांग्लादेश आज तक भुगत रहा है।

बांग्लादेश बनने के बाद वहाँ की जनता को यह उम्मीद थी कि उनके जीवन में बेहतरी आयेगी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी वहाँ की जनता को ग़रीबी, महँगाई और बेरोज़गारी से निजात न मिली। जनता की आकांक्षाओं को पूरा न होने की वजह से वहाँ मज़दूरों और आम मेहनतकशों के आन्दोलन शुरू हो गये जिससे निपटने के लिये मुजीबुर रहमान ने दिसम्बर 1974 में सभी विपक्षी दलों को प्रतिबन्धित कर दिया और आपातकाल की घोषणा कर दी। इसके बाद 1975 में सेना द्वारा मुजीबुर रहमान की हत्या करके सरकार का तख़्तापलट किया गया और उसके बाद से बांग्लादेश में सैन्य शासन के एक लम्बे सिलसिले की शुरुआत हुई। 1975-1990 तक अधिकांश समय वहाँ सैन्य शासन रहा। इस दौरान इस्लामिक कट्टरपन्थ को बांग्लादेशी समाज में अपनी जड़ जमाने का भरपूर मौका मिला। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के संस्थापक और 1977 में तख़्तापलट के फलस्वरूप बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने ज़िया उर रहमान ने बांग्लादेश के संविधान में धर्म-निरपेक्षता के प्रावधानों से छेड़छाड़ करने की शुरुआत की। जमात-ए-इस्लामी के जो लोग बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान चले गये थे, वे भी ज़िया उर रहमान के शासन के दौरान वापस लौटने लगे। हुसैन मोहम्मद इरशाद के शासन (1982-1990) में तो इस्लामिक कट्टरपन्थियों को खुली छूट दे दी गयी। यह इसी बात से समझा जा सकता है कि 1989 में इरशाद ने संविधान में संशोधन के ज़रिये इस्लाम को बांग्लादेश का राज्य धर्म बना दिया।

1990 में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बाद इरशाद को अपदस्थ कर दिया गया। इसके बाद 1991 में पूर्व राष्ट्रपति ज़िया उर रहमान की विधवा और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बी.एन.पी.) की नई नेता खालिदा ज़िया प्रधानमन्त्री बनी। इस दौरान इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तों ने खुद को संगठित करना शुरू किया और बांग्लादेश की राजनीति में सक्रिय दख़ल देना शुरू किया। उनकी इन कोशिशों और बी.एन.पी. द्वारा उन्हें खुली छूट दिये जाने का ही नतीजा था कि 2001 के चुनाव में जमात-ए-इस्लामी 17 सीटों पर विजयी रही थी और सीटों के लिहाज़ से बांग्लादेश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी थी। बी.एन.पी. के नेतृत्व में बनी चार पार्टियों के गठबन्धन वाली सरकार में जमात-ए-इस्लामी भी शामिल थी और उसके दो ऐसे सदस्य मन्त्री बने जिन्होंने मुक्ति युद्ध के दौरान हुए नरसंहारों में भागीदारी की थी। इस दौरान इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तों ने सेना से लेकर नौकरशाही, शिक्षा, उद्योग आदि में अपनी गहरी पैठ बनायी। उद्योग मंत्रालय तो जमात-ए-इस्लामी के पास ही था। 2001-2006 का दौर इस्लामिक कट्टरपन्थियों की आतंकी कार्रवाइयों में अभूतपूर्व तेज़ी का दौर था। इसी दौरान 2005 में बांग्लादेश के 64 जिलों में से 63 में सिलसिलेवार बम विस्फ़ोट हुए जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन जमात-उल-मुज़ाहिदीन बांग्लादेश (जे.एम.बी.) ने ली थी जिसे जमात-ए-इस्ला़मी की सरपरस्ती हासिल है।

नवउदारवादी नीतियों की वजह से पुख्ता होती इस्लामिक कट्टरपन्थ की ज़मीन

बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थियों के फलने-फूलने के विशिष्ट ऐतिहासिक कारणों के अलावा नवउदारवादी नीतियों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही है। हालाँकि ज़िया उर रहमान के दौर से ही पब्लिक सेक्टर पूँजीवाद की बजाय मुक्त बाज़ार वाले पूँजीवाद की ओर रुझान साफ़ दिखने लगा था, लेकिन सुसंगत ढंग से नवउदारवादी नीतियों को लागू करने की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में हुई। तीसरी दुनिया के तमाम मुल्कों की ही तरह बांग्लादेश में भी इन नीतियों का नतीजा भयंकर आर्थिक असमानता, ग़रीबी, भुखमरी एवं बेरोज़गारी के रूप में सामने आया है। इनकी वजह से पिछले ढाई दशकों में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अधिकाधिक रूप से निर्यात पर आधारित होती गयी है। गारमेण्ट उद्योग बांग्लादेश की अर्थव्यथवस्था का आधार स्तम्भ बनकर उभरा है। पश्चिम की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आउटसोर्सिंग के ज़रिये बेहद सस्ते श्रम की लालच में निहायत ही अमानवीय हालातों में उत्पादन करवाती हैं जिसका खौ़फ़नाक नज़ारा हमें 2013 में राणा प्लाज़ा इमारत के ढहने के रूप में दिखा था जिसमेंं 1100 से भी अधिक मज़दूर मारे गये थे। विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी के दौर में निर्यात पर टिकी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में आम जनता का जीवन और भी ज्यादा असुरिक्षत कर दिया है।

इस प्रकार नवउदारवादी नीतियों ने बांग्लादेश में वे भौतिक परिस्थितियाँ तैयार की हैं जो इस्लामिक कट्टरपन्थी फ़ासिस्ट ताक़तों को फलने-फूलने के लिये खाद-पानी देती हैं। नवउदारवादी नीतियों से उत्पन्न सामाजिक असुरक्षा का लाभ उठाकर इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठनों ने भाँति-भाँति के गैर-सरकारी संगठनों के ज़रिये बांग्लादेशी समाज में अपने आधार को मज़बूत किया है। इस दौरान जमात-ए-इस्लामी ने ‘राज्य के भीतर राज्य’ और ‘अर्थव्यवस्था के भीतर अर्थव्यवस्था’ क़ायम की है। बड़े वित्तीय संस्थानों से लेकर छोटी माइक्रो-क्रेडिट संस्थाओं तक, मदरसों से लेकर मीडिया तक, और बड़े व्यापार घरानों से लेकर गैर-सरकारी संस्थानों तक हर जगह उन्होंने खुद को मजबूती से स्थापित किया है। इस्लामिक कट्टरपन्थियों की आर्थिक ताक़त का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जमात-ए-इस्लामी का सालाना मुनाफ़ा 278 मिलियन डॉलर से भी अधिक है और जमात-ए-इस्लामी के मुनाफ़े की वृद्धि दर बांग्लादेश की जी.डी.पी. की वृद्धि दर से भी अधिक है। इसी मुनाफ़े का एक हिस्सा इस्लामिक कट्टरपन्थी विचारों को फैलाने और आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देने के काम आता है।

जहाँ एक ओर जमात-ए-इस्लामी और जमात-उल-मुज़ाहिदीन बांग्लादेश जैसे स्थानीय इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठनों ने बांग्लादेश के निम्नवर्गों के बीच अपना आधार बनाया है वहीं दूसरी ओर हाल के कुछ वर्षों में वहाँ के खुशहाल मध्यवर्ग के बीच इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे विदेशी इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठनों के विचारों की पहुँच बढ़ी है। इण्टरनेट और सोशल मीडिया ने इन विचारों को फैलाने में अहम भूमिका अदा की है। 1 जुलाई के हमले में अधिकांश हमलावर पढ़े-लिखे मध्यमवर्ग या उच्च वर्ग से आते थे।

हाल के वर्षों में बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थी हमलों में तेज़ी 2013 के बाद से आयी जब अवामी लीग की सरकार द्वारा युद्ध अपराधियों को सज़ा देने के लिये स्थापित किये गये इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्युनल ने युद्ध अपराधियों को सज़ा सुनाना शुरू किया। 2013 में ही सेक्युलर ताक़तों ने युद्ध अपराधियों को सख़्त सज़ा देने और जमात-ए-इस्लामी जैसे धार्मिक कट्टरपन्थी संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाने जैसी माँगों के साथ शाहबाग ‍जनान्दोलनों की शुरुआत की। शाहबाग ‍जनान्दोलनों के दबाव की वजह से ही जमात-ए-इस्लामी के अब्दुल कादिर मुल्लाह और 11 अन्य को फाँसी की सज़ा सुनायी गयी। शाहबाग आन्दोलन से इस्लामिक कट्टरपन्थियों को अपना अस्तित्व ख़तरे में नज़र आने लगा। उन्होंने लोगों के बीच यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि शाहबाग आन्दोलन नास्तिकों द्वारा संगठित किया गया है और वह इस्लाम के ‍ख़िलाफ़ है। उसके बाद से ही नास्तिकों और सेक्युलर लोगों पर हमलों की बाढ़ सी आ गयी।

दक्षिण एशिया के लिये निहितार्थ

बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थ के फैलाव के निहितार्थ समूचे दक्षिण एशिया के लिये बेहद ख़तरनाक हैं। बांग्लादेश (और पाकिस्तान) में इस्लामिक कट्टरपन्थ की राजनीति और भारत में हिन्दू कट्टरपन्थ की राजनीति एक दूसरे के लिये पूरक का काम करती है। दक्षिण एशिया में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार आने वाले दिनों में समूचे क्षेत्र को हिंसा की चपेट में लेने वाला है। ‍विडम्बना यह है कि बांग्लादेश में सेक्युलर ताक़तों की नुमाइन्दगी करने का दम भरने वाली अवामी लीग इस्लामिक कट्टरपन्थ के इस हिंसक उभार को रोक पाने में नितान्त अक्षम है। हालाँकि शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की सरकार ने जनदबाव में आकर जमात-ए-इस्लामी के कुछ नेताओं को सख्त सज़ाएँ दी हैं, लेकिन वह वोट बैंक खोने के भय से फैसलाकुन ढंग से इस्लामिक कट्टरपन्थ से निपटने में आनाकानी करती रही है और इस्लामिक कट्टरपन्थियों के नरम हिस्से का तुष्टीकरण भी करती रही है। कट्टरपन्थियों को फलने-फूलने के लिये उपजाऊ ज़मीन मुहैया करवाने वाली नवउदारवादी नीतियों को उसने मुस्तैदी से लागू किया है। ज़ाहिरा तौर पर अवामी लीग जैसी बुर्जुआ पार्टी से इस्लामिक कट्टरपन्थियों पर काबू पाने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। समूचे दक्षिण एशिया में समाजवादी क्रान्ति की लहर ही इंसानियत के इन दु‍श्मनों को नेस्त नाबूद कर सकती है।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-अगस्‍त 2017
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4 thoughts on “क्यों फल-फूल रहा है बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थ?

  1. सिकंदर हयात

    Sanjay Mishra जी
    ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन क्या है??
    ग्रीक भाषा मे क्रिप्टो शब्द का अर्थ हुआ छुपा हुआ या गुप्त; क्रिप्टो-क्रिस्चियन का अर्थ हुआ गुप्त-ईसाई।
    इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि क्रिप्टो-क्रिस्चियन कोई गाली या नकारात्मक शब्द नहीं हैं।Sanjay Mishra.
    क्रिप्टो-क्रिस्चियानिटी ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। क्रिप्टो-क्रिस्चियनिटी के मूल सिद्धांत के अंर्तगत क्रिस्चियन जिस देश मे रहतें है…वहाँ वे दिखावे के तौर पर तो उस देश के ईश्वर की पूजा करते है, वहाँ का धर्म मानतें हैं जो कि उनका छद्मावरण होता है, पर वास्तव में अंदर से वे ईसाई होते हैं और निरंतर ईसाई धर्म का प्रचार करते रहतें है।
    क्रिप्टो-क्रिस्चियन का सबसे पहला उदाहरण रोमन सामाज्य में मिलता है..जब ईसाईयत ने शुरुआती दौर में रोम में अपने पैर रखे थे।
    तत्काल महान रोमन सम्राट ट्रॉजन ने ईसाईयत को रोमन संस्कृति के लिए खतरा समझा और जितने रोमन ईसाई बने थे उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो वे ईसाईयत छोड़ें या मृत्यु-दंड भुगतें।
    रोमन ईसाईयों ने मृत्यु-दंड से बचने के लिए ईसाई धर्म छोड़ने का नाटक किया और उसके बाद ऊपर से वे रोमन देवी देवताओं की पूजा करते रहे, पर अंदर से ईसाईयत को मानते थे।
    जिस तरह मुसलमान 05-10 प्रतिशत होते ह तब उस देश के कानून को मनातें है…पर जब 20-30 प्रतिशत होते हैं…तब शरीयत की माँग शुरू होती है, दंगे होते हैं।
    आबादी और अधिके बढ़ने पर गैर-मुसलमानों की Ethnic cleansing शुरू हो जाती है।
    पर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन, मुसलमानों जैसी हिंसा नहीं करते।
    जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन 01 प्रतिशत से कम होते हैं.. तब वह उस देश के ईश्वर को अपना कर अपना काम करते रहतें है…जैसा कि और जब अधिक संख्या में हो जाते हैं तो उन्ही देवी-देवताओं का अपमान करने लगते हैं।
    Hollywood की मशहूर फिल्म Agora(2009) हर हिन्दू को देखनी चाहिए।
    इसमें दिखाया गया है कि जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन रोम में संख्या में अधिक हुए तब उन्होंने रोमन देवी-देवताओं का अपमान करना शुरू कर दिया।
    वर्तमान में भारत मे भी क्रिप्टो-क्रिस्चियन ने पकड़ बनानी शुरू की तो यहाँ भी हिन्दू देवी-देवताओं, ब्राह्मणों को गाली देने का काम शुरू कर दिया।
    मतलब, जो काम यूरोप में 2000 साल पहले हुआ वह भारत में आज हो रहा है।
    हाल में प्रोफेसर केदार मंडल द्वारा देवी दुर्गा को वेश्या कहा जो कि दूसरी सदी के रोम की याद दिलाता है।
    क्रिप्टो-क्रिस्चियन के बहुत से उदाहरण हैं पर सबसे रोचक उदाहरण जापान से है।
    मिशनिरियों का तथाकथित-संत ज़ेवियर जो भारत आया था वह 1550 में धर्मान्तरण के लिए जापान गया और उसने कई बौद्धों को ईसाई बनाया।
    1643 में जापान के राष्ट्रवादी राजा शोगुन(Shogun) ने ईसाई धर्म का प्रचार जापान की सामाजिक एकता के लिए खतरा समझा।
    शोगुन ने बल का प्रयोग किया और कई चर्चो को तोड़ा गया; जीसस-मैरी की मूर्तियाँ जब्त करके तोड़ दी गईं; बाईबल समेत ईसाई धर्म की कई किताबें खुलेआम जलायीं गईं।
    जितने जापानियों ने ईसाई धर्म अपना लिया था उनको प्रताड़ित किया गया, उनकी बलपूर्वक बुद्ध धर्म मे घर वापसी कराई गई।
    जिन्होंने मना किया, उनके सर काट दिए गए।
    कई ईसाईयों ने बौद्ध धर्म मे घर वापसी का नाटक किया और क्रिप्टो-क्रिस्चियन बने रहे।
    जापान में इन क्रिप्टो-क्रिस्चियन को “काकूरे-क्रिस्चियन” कहा गया।
    काकूरे-क्रिस्चियन ने बौद्धों के डर से ईसाई धर्म से संबधित कोई भी किताब रखनी बन्द कर दी।
    जीसस और मैरी की पूजा करने के लिए इन्होंने प्रार्थना बनायी जो सुनने में बौद्ध मंत्र लगती पर इसमें बाइबल के शब्द होते थे।
    ये ईसाई प्रार्थनाएँ काकूरे-क्रिस्चियनों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित करनी शुरू कर दी।
    1550 से ले कर अगले 400 सालों तक काकूरे-क्रिस्चियन बुद्ध धर्म के छद्मावरण में रहे।
    20वी शताब्दी में जब जापान औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ा और बौद्धों के धार्मिक कट्टरवाद में कमी आई तो इन काकूरे-क्रिस्चियन बौद्ध धर्म के मुखौटे से बाहर निकल अपनी ईसाई पहचान उजागर की।
    भारत मे ऐसे बहुत से काकूरे-क्रिस्चियन हैं जो सेक्युलरवाद, वामपंथ और बौद्ध धर्म का मुखौटा पहन कर हमारे बीच हैं।
    भारत मे ईसाई आबादी आधिकारिक रूप से 02 करोड़ है और अचंभे की बात नहीं होगी अगर भारत मे 10 करोड़ ईसाई निकलें।
    अकेले पंजाब में अनुमानित ईसाई आबादी 10 प्रतिशत से ऊपर है।
    पंजाब के कई ईसाई, सिख धर्म के छद्मावरण में है, पगड़ी पहनतें है, दाड़ी, कृपाण, कड़ा भी पहनतें हैं पर सिख धर्म को मानते हैं पर ये सभी गुप्त-ईसाई हैं।
    बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन आरक्षण लेने के लिए हिन्दू नाम रखे हैं।
    इनमें कइयों के नाम राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि भगवानों पर होतें है…जिन्हें संघ के लोग भी सपने में गैर-हिन्दू नहीं समझ सकते…जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन जिंदगी भर दलित बन के मलाई खाता रहा और जब मरने पर ईसाई धर्म के अनुसार दफनाने की प्रक्रिया देखी तो समझ मे आया कि ये तो क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
    देश मे ऐसे बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं जो हिन्दू नामों में हिन्दू धर्म पर हमला करके सिर्फ वेटिकन का एजेंडा बढ़ा रहे हैं।
    हम रोजमर्रा की ज़िंदगी मे हर दिन क्रिप्टो-क्रिस्चियनों को देखते हैं…पर उन्हें समझ नहीं पाते क्योंकि वे हिन्दू नामों के छद्मावरण में छुपे रहतें हैं।
    जैसे कि…..
    राम को काल्पनिक बताने वाली काँग्रेसी नेता अम्बिका सोनी क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
    NDTV का अधिकतर स्टाफ क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
    हिन्दू नामों वाले नक्सली जिन्होंने स्वामी लक्ष्मणानन्द को मारा, वे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    गौरी लंकेश, जो ब्राह्मणों को केरला से बाहर उठा कर फेंकने का चित्र अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लगाये थी, क्रिप्टो-क्रिस्चियन थी।
    JNU में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले और फिर उनके ऊपर भारत सरकार द्वारा कार्यवाही को ब्राह्मणवादी अत्याचार बताने वाले वामी नहीं, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    फेसबुक पर ब्राह्मणों को गाली देने वाले, हनुमान को बंदर, गणेश को हाथी बताने वाले खालिस्तानी सिख, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    तमिलनाडु में द्रविड़ियन पहचान में छुप कर उत्तर भारतीयों पर हमला करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    जिस राज्य ने सबसे अधिक हिंदी गायक दिए उस राज्य बंगाल में हिंदी का विरोध करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    अंधश्रद्धा के नाम हिन्दू त्योहारों के खिलाफ एजेंडे चलाने वाला और बकरीद पर निर्दोष जानवरों की बलि और ईस्टर के दिन मरा हुआ आदमी जीसस जिंदा होने को अंधश्रध्दा न बोलने वाला दाभोलकर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन था।
    देवी दुर्गा के वेश्या बोलने वाला केदार मंडल और रात दिन फेसबुक पर ब्राह्मणों के खिलाफ बोलने वाले दिलीप मंडल, वामन मेश्राम क्रिप्टो-क्रिस्चियन।
    महिषासुर को अपना पूर्वज बताने वाले जितेंद्र यादव और सुनील जनार्दन यादव जैसे कई यादव सरनेम में छुपे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    जब किसी के लिवर में समस्या होती है तो उसकी त्वचा में खुजली, जी मचलाना और आंखों पीलापन आ जाता है पर ये सब सिर्फ symptoms हैं इनकी दवा करने से मूल समस्या हल नहीं होगी।
    अगर लिवर की समस्या को हल कर लिया तो ये symptoms अपने आप गायब हो जाएंगे।
    बिना विश्लेषण के देखेंगे तो हिंदुओं के लिए तमाम समस्याएं दिखेंगी वामी, कांग्रेस, खालिस्तानी, नक्सली, दलित आंदोलन, JNU इत्यादि है, पर ये सब समस्याएं symptoms मात्र हैं जिसका मूल है क्रिप्टो-क्रिस्चियन।।।
    .
    यादवों के surname में कई क्रिप्टो-क्रिस्चियन (गुप्त-ईसाई) हैं।
    इसका एक उदाहरण कुछ दिनों पहले देखने को मिला।
    कानपुर में धर्म परिवर्तन का कुछ ईसाइयों ने कार्यक्रम प्रायोजित किया…पुलिस की रेड पर जितने पकड़े गए…उनमे से 02 ईसाई यादव निकले…पादरी पप्पू यादव और शीला यादव।
    फेसबुक पर जितने भी यादव संघ, ब्राह्मणों और भाजपा को गाली देते है;
    महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं;
    मुख्यतः Kiran Yadav, Jitendra Yadav, Kavyah Yadav, सुनील जनार्दन यादव(BMP), Ajay Yadav; इन्हें हमारे भोले-भाले संघी और भाजपाई वामी या कम्युनिस्ट समझतें हैं, पर कम्युनिज्म इनका ऊपरी चोला है और वास्तव में ये सभी “यादव सरनेम” में छुपे हुए क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
    Sanjay Mishra.Sanjay Mishra added 2 new photos.
    2 hrs ·
    आशीष खेतान, क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।Sanjay Mishra
    Yesterday at 12:31 ·
    कर्नाटक के मुख्य मंत्री सिद्धिरमैय्या ने कहा sc, st के लिए आरक्षण 70 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया है।
    आप गजवा ए हिन्द से लड़ने में इतने मदहोश न हो जाएं कि आपके अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल और जीविका के लिए नौकरी मिलने मुश्किल हो जाये।
    (लिंक कमेंट बॉक्स में)
    — Sanjay Mishra———————————————————————————-ऐसे तो नहीं खेर , मगर इसी से थोड़े से कुछ मिलते जुलते आरोप मुसलमानो में भी कुछ लोग – शियाओ अहमदियों आदि पर लगाते हे

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  2. Shadab saharai

    अपने गिरेबान में झांके बगैर हिन्दू राष्ट्र की कल्पना पाले बैठे हमारे देश के कई संगठन और राजनैतिक पार्टियां तथा व्यक्ति विशेष यह जान लें कि ऐसा हिंदुत्व तालिबान से भी खतरनाक है दलितों, मुस्लिमॊ और देश की आम जनता के लिए। आतंकवादी गतिविधियों से जितने पुरे विश्व में बेगुनाह मारे जाते हैं वह भारत में हिंदुत्व की वजह से मरने वाले बेगुनाहों का एक चौथाई हिस्सा है। अब सोचिये की यह कैसा हिंदुत्व है? कैसी विचारधारा और संस्कार, धर्म?

    सबसे गंधी बात तो यह है कि कोई भी हिन्दू संगठन, हिन्दू
    नेता इन गंदे कृत्यों पर दो शब्द बोलने को तैयार नही यह
    शुद्रो का इस्तेमाल सिर्फ बोट बैंक के लिये करते है।

    जागो 85 जय मूलनिवासी
    प्रताप कन्नौज

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  3. सिकंदर हयात

    Girish Malviya
    Yesterday at 09:31 ·
    कुछ मित्र का कहना है कि आपको सुप्रीम कोर्ट के दीवाली पर दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध के बारे में कुछ लिखना चाहिए था, इस से पहले कुछ मित्रो का कहना था कि आपने रोहिंग्या मुसलमानों के विस्थापन पर भी कोई टिप्पणी नही की ?
    दरअसल दोनो ही बाते ऐसी है जिसमे समस्या से सम्बंधित कोई चर्चा नही होगी सिर्फ हिन्दू मुस्लिम को लेकर भसड़ शुरू हो जाएगी, दिल्ली मे पटाखों पर प्रतिबंध का निर्णय न्यायालय ने पिछले साल दीवाली के बाद पैदा हुए प्रदूषण को देखते हुए ही लिया होगा, लेकिन गिन गिन कर ऐसे तथ्य सामने लाये जाएंगे कि न्यायालय का रवैया हिन्दू त्योहारों का विरोध करना ही है,
    रोहिंग्या में यदि मुसलमान शब्द नही लगा होता न तो कोई इसकी चर्चा तक नही करता, इस समस्या को शरणार्थी समस्या के बर अक्स नही देखा जा रहा हैं, इसे सिर्फ इसलिए मीडिया में इतना महत्व दिया गया, ताकि एक नए सिरे से पोलोराइजेशन पैदा किया जा सके,
    दरअसल उग्र हिंदुत्व की झंडाबरदार शक्तियां अच्छी तरह से जानते है कि भारतीय कट्टरपंथी मुसलमानों में पैन इस्लाम का कीड़ा अभी मरा नही है वह रह रह कर अपना सिर उठाता रहता है, उन्हें फिलिस्तीन के, सीरिया के मुसलमानों से हमदर्दी का इजहार करने मे दिली सुकून मिलता हैं, चाहे उनके पड़ोस में रहने वाला मुस्लिम परिवार कही अधिक परेशान हो, उग्र हिंदुत्ववादी इसी बात का पूरा फायदा उठाते हैं, आवेश में आकर मुस्लिम कुछ बोल देते हैं और दोनों तरफ की कट्टरपंथी ताकतों को बल मिल जाता है
    लगभग एक से डेढ़ साल इस फेसबुक पर गुजारने के बाद मैं इस तथ्य को भलीभांति समझ गया हूँ कि समाज मे विद्वेष फैलाने में बड़ी चतुराई से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है, ओर इसके लिए हथियार आप ओर हम बन जाते हैं, हम जानते बुझते हुए कुछ ऐसी बाते कर जाते हैं जिन्हें ये ध्रुवीकरण करने वाली ताकते झट से पकड़ लेती है और अपनी फैलाई हुई गंदगी में हमे घसीट लेती हैं
    यह सोशल मीडिया साधारण समझ रखने वालों को आसान शिकार समझता है, गोयबल्स ने जो बात कही थी उसके अर्थ बहुत गहरे है कि एक झूठ को आप सौ बार दुहराओ तो जनता उसे सच मान लेती है मुख्य मीडिया किसी एक मुद्दे से जुड़ी विशिष्ट बातों को लेकर लगातार कई दिनों तक पेनिट्रेट करती है और इतना अधिक करती है कि हमारे अनकांशस में वह बात खुद ब खुद शामिल हो जाती हैं और हम भी उसी के बनाये मुद्दों को उठाने में लग जाते हैं, यह सोशल मीडिया की कड़वी सच्चाई है जिसे सब मानने से इंकार कर देते हैं लेकिन यही सच है ओर ,इसे एकेडेमिक भाषा मे जनसंचार यानी मीडिया एजेंडा सेटिंग थ्योरी कहते हैं
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    भावेश जयंत वालवेकर
    भावेश जयंत वालवेकर उत्तम
    भावेश जयंत वालवेकर
    भावेश जयंत वालवेकर दिल्ली में रहने वाले एक पत्रकार बंधु से भेंट हुई उनका यहाँ तक कहना था ये मुस्लिम, शरीया, ट्रिपल तलाक, लाऊडस्पीकर और फतवे जैसे विषयों पर गर्मागर्म टीवी डिबेट के लिए ऐसे मौलानाओं को बुलाया जाता है जो बेहूदा तर्क देकर डिबेट में मुस्लिम पक्ष को अज्ञानी और हल्का बताने के बदले बकायदा पैसे लेते है उग्र हिंदुत्व वाले संगठनों से

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  4. सिकंदर हयात

    Dilip C Mandal added 4 new photos.
    8 hrs ·
    फेसबुक, सोशल मीडिया और वास्तविक जिंदगी में विचार बदलने की कोशिश का बड़ा खेल चलता है.
    बहुत लोगों को भ्रम है कि वे दूसरों के विचारों को बदल सकते हैं. इसके लिए वे तर्क से लेकर अफवाह और तथ्य से लेकर झूठ तक का सहारा लेते हैं. लाखों लोग इस कोशिश में लगे रहते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं.
    लेकिन ठहरकर सोचूं तो मेरा मानना है कि हममें से ज्यादातर लोगों के विचार बचपन में ही फिक्स हो चुके होते हैं.
    ऐसा बहुत कम होता है कि हम बड़े होने के बाद अपने विचार बदलते हैं. सामान्य स्थितियों में ऐसा ही होता है. विशेष क्रांतिकारी स्थितियों में या किसी ऐतिहासिक घटनाक्रम के समय ही बहुत बड़ी आबादी अपने विचार बदलती हैं.
    तो मुद्दे की बात है कि हममें से लगभग हर आदमी बचपन में अपने विचार बना लेता हैं.
    इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बचपन में बच्चा किस तरह की कहानियां सुनता है, कैसा सिनेमा देखता है, कैसे सीरियल देखता है, परिवार में उस पर कैसे बातचीत होती है, टीचर क्या सिखाता है, दोस्त क्या बताते हैं, लोग एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते है.
    बचपन में अगर बच्चे ने यह सुना है कि गाय में देवता रहते हैं और नाना ने अगर सुनाया है कि मुसलमान लोग गाय खाते हैं और दोस्तों से अगर उसने सुना है कि मुसलमान बहुत क्रूर होते हैं और स्कूल में अगर उसने सुना है कि मुसलमानों की जिद की वजह से भारत के टुकड़े हुए, तो बड़े होने पर एक दिन अगर उसके गांव की मंदिर से घोषणा होता है कि अखलाक के घर में फ्रिज में गोमांस है, तो वह आदमी बाकी सौ लोगों के साथ अखलाक के घर पर हमला कर ही सकता है.
    इसके हमारे ‘प्राइमरी सोशलाइजेशन’ का असर माना जाएगा. दरअसल गाय, गोमांस और मुसलमान के बारे में हमारी कहानी बचपन में लिखी जा चुकी है. अखलाक दो Dots के बीच का खाली स्पेस है, जिसे किसी भी समय भरा दिया जा सकता है.
    इसे Stock of knowledge at hand भी कह सकते हैं. ऐसी चीजें दिमाग में जमती रहती हैं और यह नॉर्मल होता चला जाता है.
    कई स्टीरियोटाइप्स ऐसे ही बनते हैं., जैसे कि भारत में सबसे हिंसक दंगा करने वाले बंगाली कमजोर और नर्मदिल मान लिए जा सकते हैं, यह मान लिया जाता है कि सारे “मद्रासी” इडली, डोसा और इमली खाते हैं, या कि बिहारी गंदे होते हैं या कि सिंधी शातिर होते हैं, या कि ठाकुर लोग साहसी होते हैं, ब्राह्मण समझदार होता है…यह सब सोच हमारे प्राइमरी सोशलाइजेशन से आती है.
    भारत जैसे देश में कम से कम सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह बच्चों के अंदर लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और सेकुलर जीवन मूल्य स्थापित करने की कोशिश करेेगी. यह सरकार का संवैधानिक दायित्व है. नीति निर्देशक तत्वों के अध्याय में इसका बाकायदा जिक्र है.
    लेकिन हमारी सरकार करती क्या है?
    करोड़ों बच्चों में जीवन मूल्य स्थापित करने का सबसे ताकतवर तरीका टेक्स्ट बुक हैं. लेकिन उनमें क्या पढ़ाया जा रहा है?
    एक उदाहरण देखिए.
    छठी क्लास में बच्चों को रामकथा पढ़ाई जा रही है., इसमें बच्चों को एक धार्मिक टेक्स्ट को इतिहास या तथ्य की तरह पढ़ाया जाता है.
    इसमें राम का जन्म अगर अयोध्या में होने को तथ्य के तौर पर पढ़ाया जाता है, तो वह बच्चा क्यों नहीं कहेगा कि रामजन्मभूमि पर बनी बाबरी मस्जिद को तोड़ देना चाहिए.
    इस किताब में शूर्पनखा की नाक काटी जाती है और तमाम मिथकीय कार्य किए जाते हैं. स्त्री के प्रति व्यवहार का पहला सबक बच्चा इस तरह सीख रहा है.
    अब सवाल उठता है कि छठी के बच्चे को, जब उसके विचार बन रहे हैं, तब रामकथा की पूरी किताब पढ़ाई जाए और कबीर और नानक न पढ़ाया जाए, यह फैसला किसने किया?
    सॉरी, आप अगर सोच रहे हैं कि यह काम किसी भाजपाई सरकार ने किया या किन्हीं सांप्रदायिक मास्टरों और विचारकों ने यह काम किया है, तो आप गलत हैं.
    छठी के बच्चों को कबीर की जगह राम पढ़ाने का फैसला कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का है और इस किताब को लाने वाली कमेटी के चेयरमैन तथाकथित वामपंथी-सेकुलर नामवर सिंह हैं. पूरी कमेटी घनघोर सेकुलर लोगों से भरी पड़ी है.
    बच्चों को बचाओ! उनके दिमाग पर हमला चौतरफा है.

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