प्राचीन भारत में मिट जाने के बाद हिंसक हो गये बौद्ध!

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by — तुषार श्रीवास्तव

अगर दुनिया के सभी प्रमुख धर्मो की बात की जाए फिर बौद्ध धर्म में अहिंसा का पाठ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है,सबसे बड़ी बात है बौद्ध भिक्षु किसी की हत्या ना करने की शिक्षा लेते है और वही भिक्षु धर्म के मानने वालो को अहिंसा का पाठ देते है.बौद्ध के अलावा किसी अन्य धर्म में इस प्रकार की शिक्षा नही है लेकिन म्यांमार में और पिछले साल श्री लंका में बौद्ध भिक्षु ही हिंसा के मास्टरमाइंड माने जा रहे है,आखिर ऐसा क्यों हो रहा है जो धर्म अहिंसा का प्रतीक माना जाता है वही हिंसा से ग्रस्त है.

लेकिन अगर इतिहास का अवलोकन किया जाए फिर ये बात साफ है कि बौद्ध धर्म का हिंसा से नाता हज़ार साल से अधिक पुराना है.इतिहास के अनुसार सम्राट अशोक के समय भारत में बौद्ध धर्म का बोलबाला था.
आज के अफगानिस्तान से लेकर सम्पूर्ण भारत में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक था लेकिन सम्राट अशोक के इस धर्म के मानने वालो की संख्या कम हो गयी और एक समय ऐसा आया जब भारत में इनकी संख्या नगण्य हो गयी लेकिन दलितों के द्वारा इस धर्म के ग्रहण करने से आज फिर ये धर्म अस्तित्व में है.
अशोक की मौत के सिर्फ बीस वर्षो के बाद ही बौद्ध धर्म में बड़ी गिरावट दर्ज हुई,इतिहासकारो का कहना है अशोक के समय में बौद्ध धर्म की अहिंसा की शिक्षा जिससे करोडो लोग उस समय प्रभावित हुए थे और उस समय के वैदिक धर्म (आज का हिन्दू धर्म) को छोड़कर बौद्ध बने थे.
लेकिन बौद्ध धर्म का अहिंसक रूप प्राचीन काल में शुरूआती दौर के बाद उस समय के हिंसक समाज में अपने लिए ज़गह मुश्किल होती देख रहा था.
कई इतिहासकारों का दावा है कि (वैदिक)हिन्दू धर्म के दुबारा उदय के बाद बौद्ध धर्म को भी हिंसक विरोध का सामना करना पड़ा आखिरकार अधिकतर बौद्धों को हिंदुस्तान से भागना पड़ा क्युकी वो अपने धर्म की शिक्षा के अनुसार हिंसक हो के जबाब नही दे सकते थे.
ऐसे कई इतिहास के पन्ने है जहाँ भारत में बौद्ध भिक्षुओं को हिंसा के वज़ह से भागना पड़ा था.भारत में बौद्ध धर्म के विनाश के बाद पूर्वी दुनिया के देशो में बौद्ध धर्म ने अपनी जड़े मजबूत की.आज जापान,मंगोलिया,दक्षिणी कोरिया,थाईलैंड,म्यांमार आदि देशो में बौद्ध धर्म ही अधिकतर आबादी का धर्म है.
बहुत संभव है भारत में अहिंसावादी होने के बाद बौद्ध धर्म के भिक्षु ने अहिंसक होना अपने भारत से सफाए की बड़ी वज़ह माना होगा जिससे सबक
लेकर ज़रूरत पड़ने पर हिंसा का सहारा लेकर अपना बचाव करने के नाम पर हिंसा को उचित ठहराने का नयी शिक्षा भारत में विनाश के बाद आई होगी.चीन के बौद्ध धर्म के भिक्षुओं का आत्मरक्षा की ट्रेंनिंग की परम्परा तो 15०0 साल पुरानी है इनको शओलिंक भिक्षु कहा जाता है .

बौद्ध होते हुए क्रूर और लूटपाट करते थे मंगोल
अगर दुनिया में किसी एक सम्राज्य के दौरान मौतों को आधार माना जाए तो लम्बे समय तक बौद्ध धर्म के अनुवाई रहे मंगोल शासक सबसे खूंखार हत्यारे माने जा सकते है,इन लोगो की दहशत के डर से लोग पहले ही अपनी बस्ती छोड़कर भाग जाते थे.
करीब चार करोड़ हत्याओं करने का आरोप इसी सम्राज्य के चंगेज़ खान को जाता है इनके निशाने पर मुख्य रूप से मिडल ईस्ट के मुल्क रहे है.इनकी दहशत ऐसी थी कि मुस्लिम इन्हें ‘अल्लाह का अजाब’ कहते थे.
दुसरे विश्व युद्द में जर्मनी के साथ जापान भी मुख्य रूप से मित्र देशो के खिलाफ आखिर तक लड़ता रहां,बता दे जापान के शासक बौद्ध धर्म का ही पालन करते है और वहां की जनता भी बौद्ध है लेकिन जापानी सेना ने जो अत्याचार चीन,म्यांमार के राखाइन में किये वो भी एक मानवीय त्रासदी ही मानी जाएगी.
बौद्ध की हिंसा म्यांमार,थाईलैंड और श्रीलंका
म्यांमार में आशीन रिथातु समेत सैकड़ो बौद्ध धर्म के मानने वाले दुसरे समुदाय के खिलाफ हिंसा के लिए बौद्धों को भड़का रहे है.म्यांमार की हालत चिंताजनक है. यहां 969 ग्रुप नाम का एक संगठन कथित तौर पर धार्मिक दुर्भावनाएं फैला रहा है.

इसका नेतृत्व आसिन बेराथु नाम के एक बौद्ध भिक्षु करते हैं. उन्हें धार्मिक घृणा फैलाने के आरोप में 2003 में जेल की सजा हुई थी. वो 2012 में रिहा हुए थे. वो ख़ुद को म्यांमार का ओसामा बिन लादेन बताते हैं.

थाईलैंड में ऐसी कोशिशे हुयी लेकिन वहां की सरकार ने लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा की और बौद्ध भिक्षुओं को अनियंत्रित नही होने दिया.वही श्री लंका में बौद्ध भिक्षु पहले तमिलो के खिलाफ हिंसा और धार्मिक दुर्भावना फैलाने में आगे रहे है लेकिन लिट्टे के खतमे के बाद अब श्रीलंका में पशुओं को हलाल करने का मुद्दा प्रमुख बन गया था.
बौद्धों के संगठन बोदु बाला सेना के सदस्य बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में रैलियां निकाली गईं, मुसलमानों के ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई का आह्वान किया गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बहिष्कार की अपील की गई.
बरहाल श्री लंका सरकार ने भी पिछले साल कोलबो में मुस्लिमो के खिलाफ हिंसा फैलाने वाले बौद्धों को गिरफ्तार करके वहां इनके हौसले बढने नही दिए.
हिंसक बौद्ध भिक्षु को शांत करने और उनके विचारो को समाज में अप्रभावी बनाने के लिए कई बौद्ध भिक्षु प्रयासरत है लेकिन इनकी संख्या उन बौद्ध भिक्षु से कम है जो हिंसा को बचाव का रास्ता मानते है!

Sources– http://headline24hindi.com

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