पुण्य प्रसून बाजपेयी

राहुल का सॉफ्ट हिन्दुत्व तो मोहन भागवत का मुस्लिम प्रेम


शहर इलाहाबाद के रहने वाले कश्मीरी पंडित राहुल गांधी । इन्हीं शब्दों के साथ द्वारका के मंदिर में पंडितों ने राहुल गांधी से पूजा करायी और करीब आधे घंटे तक राहुल गांधी द्वारकाधीश के मंदिर में पूजा कर निकले । और मंदिर में पूजा अर्चना के बाद राजनीतिक सफलता के लिये चुनावी प्रचार में राहुल गांधी निकल पड़े। तो दूसरी तरफ रविवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दशहरा कार्यक्रम में पहली बार किसी मुस्लिम को मुख्य अतिथि बनाया गया । दरअसल रविवार को बाल स्वयंसेवकों की मौजूदगी में आरएसएस के बैनर तले हुये कार्यक्रम में वोहरा समाज से जुडे होम्योपैथ डाक्टर के रुप में पहचान पाये मुन्नवर युसुफ को मुख्य अतिथि बनाया गया । तो सियासत कैसे कैसे रंग धर्म के आसरे ही सही लेकिन दिखला रही है उसी की ये दो तस्वीर अपने आप में काफी है कि बदलाव आ रहा है । एक तरफ कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप से पीछा छुड़ाना चाहती है । तो राहुल गांधी द्वारका मंदिर के रंग में है और संघ परिवार हिन्दू राष्ट्र की सोच तले मुस्लिम विरोधी होने के दाग को धोना चाहती है। तो पहली बार मुन्नवर युसुफ को मुख्यअतिथि बना रही है । तो सवाल दो है । पहला , सॉफ्ट हिन्दुत्व के आसरे कांग्रेस अपने पुराने दौर में लौटना चाह रही है । यानी अब कांग्रेस समझ रही है कि जब इंदिरा की सत्ता थी । तब कांग्रेस ने सॉफ्ट हिन्दुत्व अपना कर जनसंघ और संघ परिवार को कभी राजनीति तौर पर मजबूत होने नहीं दिया ।

और आज जब राहुल गांधी द्वारका मंदिर पहुंचे तो पंडितों ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के साइन किये हुये उन पत्रों को दिखाया जब वह भी मंदिर पहुंचे थे । इंदिरा गांधी 18 मई 1980 को द्वारका मंदिर पहुंची थी । तो राजीव गांधी 10 फरवरी 1990 तो द्वारका मंदिर पहुंचे थे । तो कह सकते हैं राहुल गांधी ने लंबा लंबा वक्त लगा दिया सॉफ्ट हिन्दुत्व के रास्ते पर चलने में । या फिर 2004 में राजनीति में कदम रखने के बाद राहुल ने सिर्फ सत्ता ही देखी तो विपक्ष में रहते हुये पहली बार राहुल गांधी धर्म की सियासत को भी समझ रहे है । तो राहुल गांधी अतित की काग्रेस को फिर से बनाने के लिये साफ्ट हिन्दुत्व की छूट चुकी लकीर को खिंचने निकल पडे है । लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो अतीत की लकीर मिटाकर पहली बार मुस्लिमों के प्रति साफ्ट रुख अपनाते हुये दिल से लगाने को खुलेतौर पर दिखायी देने के लिये मचल रहा है । तो क्या कांग्रेस के साफ्टहिन्दुत्व से कही बड़ा सवाल आरएसएस का है । और पहली बार संघ अगर दशहरे के कार्यक्रम में किसी मुस्लिम को मुख्यअतिथि बना रही है तो ये सवाल जायज है कि संघ अपने हिन्दू राष्ट्र में मुसलिमों के लिये भी जगह है ये बताना चाहता है ।

या फिर बीजेपी की राजनीतिक सफलता के लिये संघ ने अपना एजेंडा परिवर्तित किया है। ये दोनों सवाल महत्वपूर्ण इसलिये है क्योकि संघ परिवार इससे बाखूबी वाकिफ है कि संघ के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमों को
सीधे खारिज नहीं किया । पर सावरकर के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमो को मान्यता भी नहीं दी । और संघ ने हिन्दुओ के विभाजन को रोकने के लिये सावरकर के हिन्दुत्व का विरोध नहीं किया । यानी चाहे अनचाहे पहली बार संघ को लगने लगा है कि जब उसके प्रचारको के हाथ में ही सत्ता है तो फिर अब सावरकर के हिन्दुत्व को दरकिनार कर संघ के व्यापक हिन्दुत्व की सोच को रखा जाये। या फिर काग्रेस साफ्ट हिन्दुत्व पर लौटे उससे पहले बीजेपी चाहती है कि संघ कट्टर हिन्दुत्व वाली सोच को खारिज कर मुस्लिमों के साथ खडे होते हुये दिखायी देंम । जिससे मोदी के विकास का राग असर डाल सके । क्योकि अतीत के पन्नों को पलटे तो कांग्रेस और हिन्दू सभा 1937 तक एक साथ हुआ करते थे । मदनमोहन मालवीय कांग्रेस के साथ साथ हिन्दू सभा के भीअध्यक्ष रहे । लेकिन 1937 में करणावती में हुये हिन्दुसभा की बैठक में जब सावरकर अध्यक्ष चुन लिये गये तो हिन्दू सभा , हिन्दू महासभा हो गई । और उसी वक्त काग्रेस और हिन्दु महासाभा में दूरी आ गई पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिन्दू महसभा यानी हेडगेवार और सावरकर नजदीक आ गये . तो क्या 80 बरस पुराने हिन्दुत्व फिर से मुख्यधारा की राजनीति को परिभाषित कर रही है । क्योकि 80 बरस पहले संघ ये जानते समझते हुये सावरकर यानी हिन्दु महासभा के पीछे खडी हो गई कि सावरकर के हिन्दुत्व में मुस्लिम-इसाई के लिये कोई जगह नहीं थी । सावरकर ने बकायदा अलग हिन्दु राष्ट्र और अलग मुस्लिम राष्टे्र का भाषण भी दिया और 1923 में हिन्दुत्व की किताब में भी मुस्लिमो को जगह नहीं दी ।

पर संघ इसलिये सावरकर के हिन्दुत्व की आलोचना ना कर सका क्योंकि सावरकर का जहा भाषण होता वहा अगले दिन से संघ की शाखा शुरु हो जाती । क्योंकि हिन्दु महासाभा के पीछे सेघ सकी तरह कोई संगठन या कैडर नहीं था । तो संघ सावरकर के हिन्दुत्व की सोच के साये में अपना विस्तार करता रहा और जब जनसंघ बनाने का वक्त आया तो हिन्दु महासभा से निकले श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ही जनसंघ की स्थापना की । तो इतिहास अपने को दोहरा रहा है या नये तरीके से परिभाषित कर रहा है । या फिर मौजूदा हालात ने समाज के भीतर ही इतनी मोटी लकीर खींच दी है कि अब सियासत- सत्ता में लकीर मिटाने के दौर शुरु हो रहे हैं।

Related Articles

2 thoughts on “राहुल का सॉफ्ट हिन्दुत्व तो मोहन भागवत का मुस्लिम प्रेम

  1. सिकंदर हयात

    Rajendra Prakash Agarwal
    · Bareilly ·
    मुझे किसी इज्म, व्यवस्था या मजहब से कोई परहेज नहीं है बस आर्थिक विकास व भौतिक सुख सुविधाएँ और अपनी मनमानी करने की छूट मिलना चाहिए आम आदमी को.
    मनमानी से मेरा अभिप्राय आजादी से है ऐसी आजादी जिसमे हम कुछ भी कर सकें उस हद तक जहाँ तक किसी की आजादी में खलल न पड़े.Rajendra Prakash Agarwal
    Yesterday at 10:16 ·
    Rekha Gulati केरल में दुनिया की सबसे पहली सावर्जनिक निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार है ! 1957 में केरल दुनिया का पहला राज्य था जो क्रांति के बजाय लोकतांत्रिक चुनाव के माध्यम से एक कम्युनिस्ट सरकार के सत्ता में लाने के लिए किया गया था !
    केरल के 97% लोगो के पास अपनी ज़मीन है , और इसी ज़मीन में उन लोगो ने अपना घर खड़ा किया है जबकि भाजपा शासित बिहार, गुजरात और यूपी में ये आंकड़ा 80 % के आसपास है !
    2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 933 और केरल में 1000 पुरुषों के मुकाबले 1058 महिलाये हैं, जबकि भाजपा शासित हरियाणा में केवल 861 !
    केरल भारत के सबसे उन्नत समाज का घर है ! 100% साक्षर, राज्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी कर्मियों, जीवन सूचकांक (PQLI), उच्चतम जीवन प्रत्याशा और सबसे कम शिशु मृत्यु दर (यूके के बराबर ) जबकि भाजपाई शासित गुजरात और यूपी में शिशु म्रत्यु दर सबसे ज्यादा है (अफ्रीकी देश घाना से भी ज्यादा )
    केरल की पहचान रबर, काली मिर्च, इलायची, अदरक, कॉफी, चाय ,काजू , डॉक्टर ,इन्जीनिर हैं जबकि भाजपाई राज्यों में सिर्फ गोबर और गौमूत्र !
    डब्ल्यूएचओ और यूनीसेफ की रीसर्च के अनुसार केरल दुनिया का पहला इस राज्य है जो “बच्चे के लिए अनुकूल राज्य” है ! 98% बच्चे का जन्म यहाँ अस्पताल में ही होता है जबकि भाजपाई राज्यों में ये आकड़ा बेहद शर्मनाक है !
    भारत के राज्यों में केरल का साक्षरता दर में पहला स्थान है जबकि भाजपा शासित गुजरात, राजस्थान, यूपी, बिहार , छत्तीसगढ़ सबसे पीछे !
    प्रति व्यक्ति मासिक खर्च में केरल सबसे अव्वल है !
    देश में जीवन प्रत्याशा में केरल नम्बर एक पर है !
    केरल मे 95% स्कूल सरकारी है !
    सब के लिए शिक्षा फ्री है ! 100% नागरिक पढे लिखे है !
    98% लोग सरकारी अस्पताल मे इलाज करवाते है जो बिल्कुल मुफ्त है !
    एक भी किसान ने आत्महत्या नही की है !केन्द्र सरकार द्वारा फर्टिलाइजर सब्बसीडी खत्म करने व कम करने के बाद भी केरल सरकार किसानो को पूरी सब्सिडी दे रही है !
    नहरी पानी व बिजली व सिंचाई व्यसस्था किसानो के लिए बिल्कुल मुफ्त है !
    साक्षरता में बचपन से पढ़ते आये हैं की केरल सबसे अव्वल है !
    दंगाई गैंग दरअसल यही सब देख कर परेशान है !!——————Rajendra Prakash Agarwal
    Yesterday at 09:47 ·
    हमारे धर्म ग्रंथों में भी जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है. चार आश्रम थे- (१) ब्रह्मचर्य, जन्म से 25 वर्ष आयु तक(२) गार्हस्थ्य, 26 से 50 वर्ष की आयु तक(३) वानप्रस्थ 51 से 75 वर्ष की आयु तक और (४) संन्यास 75 वर्ष से अधिक आयु पर। इस विभाजन का आधार सेक्स ही था. इनकी माने तो गृहस्थ आश्रम के अतिरिक्त अन्य तीनों आश्रमों में सेक्स वर्जित है.
    इस तरह से बचपन से ही सेक्स के प्रति आकर्षण जिज्ञासा बढ़ जाती है. जिस को जितना छिपाओ, ढँक कर रखो. उतना ही से उसे जानने के लिए उत्सुकता बढ़ जाती है. इस तरह युवा मन सेक्स के गिर्द घूमता रहता है. कोई नयी बात सोच ही नहीं पाता. इसीलिए किसी नयी खोज के बारे में सोच ही नहीं पाते.
    सच कहूँ तो देश की सारी व्यवस्था धर्म और सेक्स के गिर्द ही घूम रही है.
    See TranslationGyan Prakash Aggarwal
    5 October at 21:08 ·
    जब आतंकी संगठनों ने इस्लाम को हाईजेक किया और इस्लाम की रक्षा के नाम पर उत्पात मचाना शुरू किया, तब इस्लामिक समाज ख़ामोशी से देखता रहा |
    जब हिन्दू संस्कृतियों व संस्कारों का हाईजेक हुआ हिंदुत्व के नाम पर और देवी-देवताओं ने नाम पर गुंडे-बदमाशों और सड़कछाप लफंगों की सेनायें बनाकर उत्पात करें लगे, तब हिन्दू समाज खामोश रहा |
    क्यों ?
    क्योंकि भेड़ों और भेड़ियों की यह जुगलबंदी इस भ्रम में जी रहे हैं कि ये लोग कोई महान कार्य कर रहे हैं | ये लोग शायद कोई धर्मरक्षक हैं |
    ये मूर्ख धार्मिक यह नहीं जान पाए कि धर्म की रक्षा करने की बात करना कुछ ऐसा है ही जैसे सूर्य की रक्षा करना | इनमें से कोई माई का लाल ऐसा नहीं होगा जो सूर्य की रक्षा करने की कल्पना भी कर सके | लेकिन निकले हैं धर्म की रक्षा करने |
    परिणाम यह हुआ कि इस्लाम कलंकित हुआ, हिंदुत्व कलंकित हुआ और कलंकित हुआ इससे जुड़ा समाज | अब डायलॉग मारते फिर रहे हैं कि आतंकियों, दंगाइयों का कोई धर्म नहीं होता !!!
    होता है इनका भी धर्म होता है…अपने ही धर्मो को कलंकित करना, अपने ही समाज को संदिग्ध बनाना ही इनका धर्म है | और ऐसा करके ही इनको असीम शांति मिलती है | और जब सब कुछ तहस-नहस कर देंगे, तब आराम से धार्मिकों की भीड़ में छुप जायेंगे सच्चे धार्मिक बनकर और दो सम्प्रादयों की आपसी लड़ाई में गिरती लाशों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकेंगे |
    ~विशुद्ध चैतन्य——————————————–Rakesh Kayasth added 2 new photos.
    20 hrs ·
    मांगो मत दो
    ————-
    नेताओं के बयान अक्सर तोड़े-मरोड़े जाते हैं। नेता तो बेचारे निर्मल ह्रदय होते हैं। दुष्ट मीडिया बात को घुमा देता है और भोली जनता कुछ और समझ बैठती है। बढ़ रही बेरोजगारी पर मोदी सरकार के सबसे काबिल मंत्री पीयूष गोयल का बयान आया— यह एक बहुत अच्छा संकेत है। जनता को नौकरी मांगने वाला नहीं बल्कि नौकरी देनेवाला बनना चाहिए।
    बयान सुनते ही मैं समझ गया कि पाप मेरे मन में है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे योग्य मंत्री ऐसी बात कर ही नहीं सकता। फ्रांस के शासक लुई सिक्सटींन की पत्नी ने देश की गरीब जनता से पूछा था— रोटी नहीं है तो केक क्यों नहीं खा लेते? इसे मानव जाति के इतिहास का सबसे मूर्खतापूर्ण बयान माना जाता है।
    गोयल जी का बयान भी इसी के टक्कर का है। इतिहास में `मांगो मत दो’ बयान भी उसी तरह अमर होगा जैसे `रोटी नहीं तो केक’ अमर हुआ था। शुरू में मुझे गोयल जी के बयान की सत्यता पर संदेह हुआ। इसका कारण यह था कि मैं यह मानता हूं कि बीजेपी जब भी मूर्खता करेगी तो स्वदेशी किस्म की करेगी। फ्रांस की महारानी की नकल कोई बीजेपी नेता नहीं कर सकता। लेकिन जब वीडियो देखा तो संशय दूर हो गया।Rakesh Kayasth
    फिर याद आया कि मोदीजी इससे मिलते-जुलते कई बयान पहले दाग चुके हैं। मोदीजी अक्सर कहते हैं, नौकरी मांगो मत देने वाला बनो। पूरा देश अगर उनकी सलाह पर चल पड़ा तो फिर नौकरी करने वाला बचेगा कौन? लालकृष्ण आडवाणी भी मोदीजी की इसी सलाह पर चलना चाहते थे। वे पीएम बनकर नौकरियां देना चाहते थे। बदले में मोदीजी ने उन्हे पेंशन देकर मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया।Rakesh Kayasth
    वैसे पीयूष गोयल ने एक बहुत गंभीर बात कही है। मोदीजी या उनके किसी मंत्री की बुद्धिमता पर संदेह करना नर्क का टिकट कनफर्म करवाना है। इसलिए आप ये मान लीजिये कि उन्होने कहा है तो इसका असर भी देश में दिखेगा। आनेवाले बरसो में देश में सिर्फ नौकरी देनेवाले होंगे, नौकरी करने वाला कोई नहीं होगा। हर जगह स्टार्ट अप ही स्टार्ट अप नज़र आएगा। नौकरी से निकाला गया ड्राइवर रिक्शा खरीदकर चला रहा होगा और पंक्चर बनाने वाले छोटू को नौकरी दे रहा होगा। फाइव स्टार होटल का बेरोजगार हो चुका शेफ चाय की टपरी लगाकर वहीं खड़ा इस बात की चर्चा कर रहा होगा कि बेरोजगार हूं तो क्या हुआ, एक दिन मैं भी पीएम बन सकता हूं। धंधा चल गया तो ग्लास धोनेवालों के कुछ जॉब पक्के तौर पर क्रियेट होंगे।नौकरी से निकाला गया पत्रकार एक छोटी-मोटी कंपनी बनाकर सोशल मीडिया विंग के ठेके उठा रहा होगा और नये बच्चो को व्हाट्स ऐप पत्रकारिता में लगाकार उनका भविष्य बना रहा होगा।Rakesh Kayasth

    सवाल पूछना पाप है। लेकिन ये मन बड़ा पापी है। पूछ रहा है कि आखिर रोजगार मांगने के बदले रोजगार देनेवाला बनने की शिक्षा बीजेपी ने अपने त्रिपुंडधारी प्रवक्ता संबित पात्रा को क्यों नहीं दी? उन्हे तो रोजगार दे दिया वो भी ओएनजीसी का डायरेक्टर बनाकर। पात्रा जी के पास रोजगार के ढेरो विकल्प थे और कुछ नहीं तो कर्मकांडी ब्राहण होने के नाते मेरठ में बन रहे मोदीजी के भव्य मंदिर के मुख्य पुजारी नियुक्त हो सकते थे। चढ़ावा इतना मिलता कि दोबारा नोटबंदी भी होती तो कोई टेंशन नहीं होता। फिर पात्रा जी को किसी सरकारी कंपनी में एक पद घेरने की क्या ज़रूरत थी?
    बीजेपी यही शिक्षा पहलाज निहलानी और गजेंद्र चौहान जैसे अपने दर्जनों समर्थकों को भी दे सकती थी, जो नागपुर से चिट्टी लिखावकर लाये और बिना किसी योग्यता के ऊंचे सरकारी ओहदो पर जा बैठे। अपनी भरपूर जगहंसाई करवाई और जिन संस्थानों में गये उनका भी बेड़ा गर्क किया। जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे चलने वाली निर्जीव संस्थाओं में राजनीतिक सिफारिशों से कितने लोग बैठे हैं, ज़रा इसका पता कर लीजिये। यह भी देख लीजिये कि बैंको ने जो खरबो के लोन बांटे हैं और उनमें से लाखो करोड़ के जो लोन डूबत खाते हैं, वे किन लोगो को दिये गये हैं। मलाईदार नौकरियां अपने लोगो को, लोन बड़े उद्योगपतियों को और स्टार्ट अप शुरू करने का ज्ञान बेरोजगार हो रहे भारतवासियों को। इससे अच्छे दिन भला और क्या हो सकते हैं?

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Pawan Saxena
    12 November at 10:27 ·
    हुंकार !!
    क्या व्रत,कथा,मंदिर,घंटे, तीरथ यात्रा और प्रवचनों से सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा होगी ? क्या कोई नरेंद्र मोदी,तोगड़िया,अशोक सिंघल,राम कोठारी-शरद कोठारी इस सनातन धर्म को बचा पाएगा ? इस्लाम के प्रचार,प्रसार और विकास की प्रक्रिया की समीक्षा कीजिए, कहीं गर्म,कहीं नर्म और कहीं सख्त ,बदलते वक्त की मानिंद अमीबा बन यह मज़हब 56 देशों में इस्लामिक सत्ता स्थापित कर चुका है ! दो बातें विशिष्ट हैं ,पहली इस्लाम मने अल्लाह से बड़ा कुछ नहीं , दूसरा आदर्शवाद को कोसो दूर से सलाम करता है पूरी दुनिया को जीतने उतरा इस्लाम ! कहिए कुछ भी,कुरान आपकी निगाह में कैसी भी हो ,मगर दुनिया को कैसे फतह करना है,इससे बढ़िया मनोवैज्ञानिक, कुटनीतिक,छल-बल और शस्त्रों के बेमिसाल सममिश्रण की कोई किताब ज़मीन पर उपलब्ध नहीं है !
    कुरान कोई आध्यात्मिक ज्ञान दिखाने वालों की रचना नहीं है ! मानव मन जिन कारकों से प्रभावित होता है,आक्रमक,प्रेरित और मर्माहत होता है, उन कारकों का सम्मिश्रण कर कुरान को लिखा गया है ! सर्वधर्म -समभाव जैसी मूर्खताओं से पूर्णतया दूर है कुरान और इस्लाम ! आज वक्त का तकाजा है कि हिन्दू धर्म से निःस्वार्थ मोहब्बत करने वाला कुरान जैसा कोई सामान्य भाषा मे कोई दिशा-निर्देशक ग्रंथ लिखा जाए !! धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-भोग-त्याग पर ही कोई अपनी पीपनी न बजाता रहे !
    यह कुरान का ही जलवा है कि मुस्लिम लड़कियां किसी और धर्म के व्यक्ति से बेशक प्रभावित हो जाएं,मगर विवाह मुस्लिम से ही करती हैं,अपवाद स्वरूप विवाह भी कर लेती हैं तब भी अपना धर्म नहीं छोड़ती जैसे नरगिस और मान्यता इत्यादि !
    दरअसल सिख धर्म और आर्य समाज की स्थापना ही कुरान जनित इस्लाम की सफलता से प्रेरित हो कर की गई थी !आर्यसमाज को सनातन-हिन्दू धर्म की प्रचलित परंपराओं से दूर नहीं किया जा सका, इसलिए समाप्त प्रायः हैं ,परंतु सिखों ने खुल कर मूर्ति पूजा का निषेध किया ,गुरुग्रंथ साहिब को अंतःकरण में स्थान दिया ,आज सिख धर्म, विश्व के बेहद सक्षम और सफल धर्मों में से एक है ! क्या कारण है जो सनातन धर्म से निकल गया,बेहद मजबूत होकर निकला,जैसे-जैन,बौद्ध,सिख ! हिन्दू विचार करें !
    वेद,उपनिषद,श्रीरामचरितमानस,गीता कोई भी ग्रंथ उठा लीजिए अंततः आदर्शवाद, बहुमूर्ति पूजा और सर्वधर्म-समभाव जैसी ज्ञात मूर्खताएं ही निष्कर्ष रूप में दिखाई देतीं हैं ! मंदिर आध्यात्मिक विलासिताओं के अड्डे हैं ! किसी मंदिर ने किसी हिन्दू को सनातन धर्म के लिए खड़ग उठाकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित नहीं किया ! मंदिर की मूर्ति के सोने,चांदी,अष्ट-धातु की होने के क्या प्रयोजन हैं ? एक-एक मंदिर में हज़ारों मूर्तियां होने का क्या उद्देश्य होता है ? मेरा सपना है कि हमारे मंदिरों की संख्या भी मस्जिदों की संख्या की भांति 3 लाख से ऊपर होती और मंदिर भी हिंदुओं के लिए वह ही कार्य करते,जो मस्जिदे और मदरसे, मुस्लिमों के लिए करते हैं !
    पिछले महीने केरल सरकार ने गुरुवायुर मंदिर को श्रद्धालुओं और पूजा कराने वाले पंडितों से खाली करा कर अधिग्रहण कर लिया !! उत्तर,दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत के किसी मंदिर के पुजारी,श्रद्धालुओं और हिन्दू संस्थाओं में कोई रोष दिखा,आंदोलन हुआ ? रोष तो छोड़िए कहीं कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई !
    हिंदुओं छोड़ दो मूर्ति पूजा सिर्फ दस बरस के लिए ! मात्र हिन्दू सनातन धर्म को अपना भगवान बना लो, उसकी रक्षा के लिए तन-मन-धन से अर्पित हो जाओ ! मंदिरों को नाच-गाना-मनोरंजन का केंद्र मत बनाओ ! मंदिरों को शक्ति और धर्म रक्षा का केंद्र बनाओं !! पुजारी बेशक हों मगर सेना नायक जैसे मज़बूत धर्म-रक्षा के लिए जान देने-लेने वाले प्रबुद्ध वीरजन !!
    जयश्रीराम -जय हिन्दू राष्ट्र !!———————————————————————————————————————————विजय कुमार सिंघल
    11 November at 05:16 ·
    मूर्तिपूजा का सकारात्मक पक्ष
    कई वैदिक धर्मी विद्वान्, जैसा कि स्वाभाविक है, मूर्तिपूजा के घोर और उग्रविरोधी हैं, पर वे अपने जोश में यह बात भूल जाते हैं कि अपने इस रवैये से वे देश, हिन्दू समाज और स्वयं आर्य समाज को भयंकर हानि पहुँचा रहे हैं। मैं भी कभी मन्दिरों में मूर्तिपूजा नहीं करता, लेकिन उतना उग्र विरोधी नहीं हूँ। कुछ हद तक हमें इस बारे में सहनशील होना चाहिए कि हम अन्य हिन्दू बंधुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान कर सकें। मैं इस बारे में कुछ विस्तार से लिखना चाहता हूँ, जो सम्भव है कि उनकी आँखें खोल सके।
    सभी को ज्ञात है कि आदि शंकराचार्य ने चारों दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम) में देश के चारों कोनों पर चार विशाल मठ स्थापित किये थे, जिनमें शिव के विभिन्न रूपों की मूर्तियों की पूजा की जाती है। इस महान् कार्य का उद्देश्य केवल मूर्तिपूजा को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना था। चारों भौगोलिक कोनों पर चार मठ बनाकर उन्होंने एक प्रकार से यह घोषित कर दिया था कि यह हिन्दू राष्ट्र है और इस देश के प्रत्येक भाग पर प्रत्येक हिन्दू का जन्मसिद्ध अधिकार है।
    उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि इन मठों में किसी भी जाति-सम्प्रदाय के हिन्दू को आने और पूजा-अर्चना करने से न रोका जाये। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि आज भी प्रत्येक हिन्दू चाहे वह शैव हो, वैष्णव हो, सिख हो, बौद्ध हो, जैन हो, कबीरपंथी हो या अन्य किसी भी हिन्दू सम्प्रदाय का हो, इन मठों तथा अन्य हजारों मन्दिरों में चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के हों, बेरोकटोक जा सकता है और अपनी इच्छा के अनुसार पूजा-अर्चना कर सकता है।
    आज हम देख सकते हैं कि चाहे दिल्ली के बिरला मंदिर और अक्षरधाम मंदिर, अयोध्या के राम मन्दिर, मथुरा के कृष्ण मन्दिर, अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर, सारनाथ और बोध गया के बौद्ध मंदिर, रणकपुर तथा अन्य स्थानों के जैन मंदिर, कलकत्ता के काली मंदिर तथा अन्य अनगिनत मन्दिरों में हर हिन्दू जाकर पूजा अर्चना करता है और अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है। कुछ अपवादों को छोड़कर अन्य सभी मंदिरों में तो अहिन्दुओं के जाने पर भी कोई रोक नहीं है।
    यह कोई साधारण बात नहीं है। इसकी महानता का पता हमें तब चलता है, जब हम ऐसे समाचार पढ़ते हैं कि नमाज पढ़ते हुए शियाओं पर सुन्नियों ने गोली चलाकर अनेकों के प्राण ले लिये या नमाज पढ़कर निकलते अहमदियों के बीच बम फोड़कर कई लोग मार दिये गये। मुसलमानों के कई सम्प्रदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। हिन्दुओं में ऐसा कभी नहीं हुआ, कभी हो भी नहीं सकता। यह मूर्तिपूजा का सकारात्मक पक्ष है। जिसको हमें खुले हृदय से स्वीकार करना चाहिए, भले ही हम स्वयं मूर्तिपूजा न करें।
    हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में इस बात पर बहुत बल दिया जाता है कि प्रत्येक हिन्दू को अपनी-अपनी धार्मिक मान्यता और परम्परा के अनुसार किसी भी रूप में पूजा-अर्चना करने का अधिकार है। द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य श्री गुरुजी से एक बार पूछा गया था कि किस पद्धति से ईश आराधना करना सबसे अच्छा है। श्री गुरुजी का धार्मिक ज्ञान अगाध था, वे चाहते तो किसी भी पद्धति की ओर संकेत कर सकते थे, लेकिन ऐसा न करके उन्होंने केवल इतना कहा- चाहे किसी भी को भी अपना इष्ट मानो, लेकिन पूरे हृदय से मानिए।
    हमें भी देश और हिन्दू समाज के हित में यही धारणा रखनी चाहिए। सबको अपने अपने विश्वास के अनुसार अपने अपने इष्ट की किसी भी रूप में उपासना की छूट हिन्दू समाज ने ही दी है। मूर्तिपूजा भी उनमें से एक है। भले ही यह अंधविश्वास हो, लेकिन हमें इसका अंधविरोध नहीं करना चाहिए। आपसे मूर्तिपूजा करने के लिए कोई नहीं कह रहा, आप अपने विश्वास के अनुसार निराकार की आराधना करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं।
    — विजय कुमार सिंघल

    Reply

Add Comment