क्या बीएचयू और भारत के अन्य विश्वविद्यालय अब तेहरान युनिवर्सिटी बनने की ओर बढ़ रहे हैं?

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by — सत्येन्द्र पीएस

ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई। बड़े बड़े आंदोलन हुए। खोमैनी का शासन आ गया। ईरान इस्लामिक स्टेट बन गया। वहां सब कुछ बदल गया। ड्रेस कोड बना। विश्वविद्यालयों में इस्लामी पहनावा लागू हो गया। तरह-तरह के प्रतिबंध लग गए। अब हालात यह हैं कि जिस तेहरान युनिवर्सिटी को अमेरिका या ब्रिटेन के तमाम नामी गिरामी विश्वविद्यालयों के साथ मुकाबले के लिए जाना जाता था, उसका कोई नामलेवा नहीं है। क्या आपने सुना है कि आपका कोई परिचित कह रहा हो कि उसका सपना तेहरान युनिवर्सिटी में अपने बच्चे को पढ़ाने का है? ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं हैं कि ईरान या तेहरान में कोई युनिवर्सिटी भी है, या वहां के स्कूल कॉलेज को मदरसा वगैरा ही कहते हैं।

भारत में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद तमाम बदलाव हुए। सरकार ने विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के कुलपति रखे। उन्हीं में से एक काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को मैं हरि गौतम के जमाने से जानता हूं। उस समय कैंपस अशांत थे। तरह तरह के आंदोलन होते थे। गुंडे न केवल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दखल करते थे, बल्कि वहां के तमाम प्रोफेसर राजनीतिक रूप से ताकतवर जातीय गुंडा राजनेताओं के आदमी बन चुके थे और विद्यार्थियों को भड़काते थे। आए दिन विश्वविद्यालय में मारपीट, गुंडागर्दी, बमबाजी होती थी।
हरि गौतम के समय से सख्ती शुरू हुई। कैंपस शांत हो गया। उसके बाद वाई सी सिम्हाद्री, पंजाब सिंह, लालजी सिंह कुलपति बने। सभी अपने ज्ञान क्षेत्र में अव्वल थे। पहले भी वाइस चांसलर या तमाम बड़े पदों पर रहने के बाद बीएचयू पहुंचे थे।
केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी कुलपति बने। उस समय तक मैंने कभी इनका नाम नहीं सुना था। नाम न सुनना कोई बड़ी बात नहीं। देश में तमाम ऐसे विद्वान हैं, जिनका हम नाम नहीं सुने हुए होते हैं। लेकिन बाद में पता करने पर जानकारी मिल जाती है कि संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि क्या है। मुझे याद है कि सबसे पहली जानकारी प्रोफेसर त्रिपाठी के बारे में यही मिली थी कि वह पंडित मदन मोहन मालवीय के नाती के बहुत खास हैं। उसके बाद मैंने कई स्रोतों से पता करने की कोशिश की कि त्रिपाठी की एकेडमिक या प्रशासनिक उपलब्धि क्या रही, लेकिन कुछ भी जानकारी नहीं मिल सकी।
त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद उनके एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आने लगे। बयान तो किसी विकृत मानसिकता के पुरबिया क्षुद्र व्यक्ति से नीचे।
विश्वविद्यालय के परिसर में लाइब्रेरी को 24 घंटे खोले जाने के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उनके बयानों को देखें। उन्होंने कहा, “लड़के बदमाश हैं, कॉपर वायर तोड़ ले जात्ते हैं, माउस चुरा ले जाते हैं, हार्डडिस्क निकालकर ले जाते हैं। पेन ड्राइव में अश्लील फ़िल्में देखते हैं। इन सबसे अलग उनके वहां रहने से एकदम दूसरी समस्या पैदा हो सकती है कि वे वहां क्या कर रहे हैं?”

शायद प्रोफेसर त्रिपाठी को अपने देश के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के बारे में ही जानकारी नहीं है, जहां विद्यार्थियों को 24 घंटे पढ़ने की सुविधा दी जाती है। वहां सेक्सुअल क्राइम के केसेज बहुत कम सामने आते हैं। आप कैंपस में घूमिए। तमाम झाड़ियां हैं। पहाड़ी विश्वविद्यालय बना है और आधे से ज्यादा छात्राएं हैं। लेकिन कहीं कुछ भी आपत्तिजनक या अश्लील या सेक्सुअल क्राइम नहीं मिलता, जबकि प्रोफेसर त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय कैंपस में क्या ढूंढा, उनके इस बयान से अंदाज लगा सकते हैं। उन्होंने कहा, “एक बात मैंने यहां सघन तलाशी करायी। रात नौ बजे के बाद शहर के तमाम लड़के और लड़कियां यहां बैठे रहते हैं। अपनी कार से रात में निकला, लोगों ने कहा कि अरे आप वीसी हैं, हम ले चलते हैं। लेकिन मैं अध्यापक हूं। मैं निकला और मैंने देखा कि एक लड़का और लड़की ऐसी अवस्था में बैठे थे कि क्या बताऊं. मैंने गाड़ी रोकी। मैंने बैठा लिया गाड़ी में, कुछ और नहीं किया. मैंने केवल इतना कहा कि चलो तुम्हारे गार्जियन से बात करें. वे गिडगिडाने लगे, अरे नहीं सर, गलती हो गयी सर। फिर मैंने उन्हें छोड़ भी दिया।”

यह है काशी हिंदू विश्वविद्यालय का माहौल। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कंडोम गिनने का ठेका तो भारतीय जनता पार्टी के विधायक को दिया गया है, लेकिन बीएचयू में कंडोम बीनने खुद कुलपति निकल चुके हैं। उनका यह मकसद कतई नहीं रह गया है कि विश्वविद्यालय में ऐसा माहौल बना दिया जाए, जहां बच्चों के दिमाग में विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी बनने और लगातार पठन पाठन, शोध में रहे बल्कि वह विद्यार्थियों को किसी अलग ही नियम में बांधने को आतुर नजर आते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय में श्रेष्ठ विद्यार्थियों का एडमिशन होता है, जिनका पहले से एकेडमिक रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा होता है। विश्वविद्यालय कड़ी परीक्षा लेने के बाद विद्यार्थियों को एडमिशन देता है। वाराणसी में कुल मिलाकर 4 विश्वविद्यालय हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, उदय प्रताप स्वायत्तशासी कॉलेज के अलावा पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के डिग्री कॉलेज भी शहर में हैं। इसके अलावा बौद्ध विश्वविद्यालय़ भी सारनाथ में उपस्थित है। इन सबकी मौजूदगी के बीच विद्यार्थियों का सपना होता है कि वह अगर वाराणसी में पढ़ें तो बीएचयू में ही पढ़ें। बाहरी दुनिया के बच्चे भी बीएचयू में ही पढ़ने आते हैं। इस स्थिति में स्वाभाविक रूप से विश्वविद्यालय में क्रीम स्टूडेंट्स को ही जगह मिल पाती है।

हालांकि जेएनयू को भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालय नहीं माना जा सकता। वैश्विक दुनिया में जेएनयू का कोई खास मुकाम नहीं है। लेकिन बमुश्किल 10,000 विद्यार्थियों के कैंपस का भारत के स्तर पर सफलता का अनुपात जबरदस्त है। वहां से आईएएस निकलते हैं, ब्यूरोक्रेट्स निकलते हैं, राष्ट्रीय स्तर के नेता निकलते हैं। वहीं अगर मौजूदा बीएचयू को देखें तो देश के प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अक्सर बीएचयू का नाम गायब रहता है, जो एक लाख विद्यार्थियों का कैंपस है। वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालय की स्थिति तो जाने ही दें।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जातीय लंपटई का इतिहास पुराना है। यह देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां 80 के दशक तक एडमिशन के लिए फार्म भरने वाले विद्यार्थियों से यह पूछा जाता था कि आप ब्राह्मण हैं या गैर ब्राह्मण। मोटे तौर पर इस समय भी विश्वविद्यालय में 70-80 प्रतिशत ब्राह्मण टीचिंग स्टाफ है। इतना ही नहीं, तमाम प्रोफेसर तो खानदानी हैं, जो वहां कई पीढ़ियों से पढ़ाए जाने के योग्य पाए जा रहे हैं। ऐसे में जातीय बजबजाहट यहां नई बात नहीं है।

इन सबके बावजूद हाल के वर्षों में ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण पूछा जाना बंद हुआ। जातीय कुंठा भी कुछ घटी और अध्यापक नहीं तो विद्यार्थियों में जातीय विविधता आई। आरएसएस के स्वयंसेवक प्रोफेसर त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर ब्राह्मणवादी कुंठा में फंसता नजर आ रहा है।

(बीएचयू बज, फेसबुक से ली गई तस्वीर। लड़कियों पर लाठी चार्ज के बाद)
विश्वविद्यालय में कुलपति अपने को गैर राजनीतिक होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन मामला इससे उलट है। अगर विश्वविद्यालय की छात्राएं छेड़खानी का विरोध कर रही हैं तो उन पर लाठियां चल रही हैं। विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों की लंबी चौड़ी फौज है, जिनकी कैंपस में जबरदस्त गुंडागर्दी चलती है। वह मामला नहीं संभाल पाते हैं तो बाहर से पुलिस और पीएसी बुलाई जाती है। रात रात भर कैंपस में बवाल चलता है। लड़कियों को पीट पीटकर पुलिस हाथ पैर तोड़ देती है।

यह मामला काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति परिसर में टैंक रखवाना चाहते हैं, जिससे विद्यार्थियों में देशभक्ति आए। विश्वविद्यालय के कुलपति को टैंक में देशभक्ति दिखती है।

इसमें सबसे ज्यादा बुरा हाल छात्राओं का होने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महराज बयान देते हैं कि लड़कियां मोटरसाइकिल पर बैठकर चलती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्कार हो जाता है।

सवाल यह है कि हम किस दौर की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हम इस्लामिक स्टेट की तरह भारत को हिंदू स्टेट बनाकर बर्बादी की ओर ले जाना चाहते हैं या रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन की तरह समृद्ध और खुला समाज चाहते हैं? भारत में तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई लड़की या महिला रात के सुनसान में अपने घर से निकलकर अकेले कहीं सड़क पर घूम सकती है, या किसी अपने परिचित की मदद के लिए पैदल निकल सकती है। महिला ही क्या, पुरुष भी यह सोचकर नहीं निकल सकते कि दो बजे रात को अगर वह सड़क पर जा रहे हों तो सुरक्षित घर लौटेंगे या नहीं। लेकिन किसी भी सभ्य, विकसित देश में यह आम बात है। फैसला हमें करना है कि हम देश को किस तरफ ले जाना चाहते हैं। विकसित, समृद्ध, सुरक्षित देश बनना चाहते हैं जहां ज्ञान विज्ञान और सुविधाओं के साथ सुरक्षा हो, या इस्लामिक स्टेट आफ ईरान की तरह हिंदू स्टेट आफ इंडिया बनना चाहते हैं।

फोटो क्रेडिट -1 और 2
http://www.dailymail.co.uk/travel/travel_news/article-4148684/Stunning-photos-reveal-life-Iran-revolution.html
फोटो क्रेडिट-3
http://www.payvand.com/news/17/sep/1083.html
sources- https://satyendrapratap.blogspot.ae

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4 thoughts on “क्या बीएचयू और भारत के अन्य विश्वविद्यालय अब तेहरान युनिवर्सिटी बनने की ओर बढ़ रहे हैं?

  1. सिकंदर हयात

    उमाशंकर सिंह
    23 September at 15:26 · Mumbai ·
    बीएचयू किशोरों को मादाभक्षी मर्द बनाने की प्रयोगशाला है।
    बीएचयू में लड़के-लड़की जब 12 वीं पास करके आते हैं तब वे टीनएजर ही होते हैं। ठीक से युवा भी नहीं बने होते। वे अपने-अपने परिवेश और अपनी-अपनी सामाजिक बुराई के साथ आते। बीएचयू अपने छात्रों के कास्ट, जेंडर और दूसरे पूवग्रहों वाली उनकी बुराई से ठीक से डील नहीं करता, बल्कि उन्हें और बढ़ावा देता है। वे लड़कों को और लड़का (मर्द), लड़कियों को और लड़की (औरत), ब्राह्मणों को और ब्राह्मण और राजपूतों को और राजपूत बनाता है। दलितों को और दबा हुआ बनाने पर जोर देता। वहां छात्रों से लेके अध्यापकों तक के हर जाति के अलग अलग गुट हैं। अपनी खास जाति के वजह से, जिनसे आप मिले भी नहीं हो, आप उनके करीब होते हैं, उनकी सुरक्षा में होते है। जो इनसे बाहर ऑपरेट करते उन्हें तरह-तरह के व्यंग्य बाणों से घायल किया जाता है। निशाने पर लिया जाता है। बीएचयू प्रशासन लड़कियों को लड़कों और लड़कों को लड़कियों से अलग रखने का पूरा इंतजाम रखता है। कुछ कोर्सों को छोड़ दें तो कोएड एजुकेशन बीए के लेवल पर बीएचयू में नहीं है। बीएचयू के भीतर लड़कियों के अलग कॉलेज हैं। इसके बाहर लड़के-लड़कियों के जो कॉमन प्लेटफार्म हो सकते हैं वहां लड़के-लड़की अलग-अलग रो में एक सुरक्षित दूरी पे नजर आते। लड़के-लड़की का साथ होना आज भी बीएचयू में एक सहज दृश्य नहीं है। लेकिन लड़कियों को छेड़ना बीएयचू में एक स्वभाविक बात है। तीसके हजार छात्रों वाले बीएचयू में आज भी सबसे ज्यादा झगड़ा लड़के लड़कियों के लिए करते हैं। किसी दूसरे शहर से आई लड़की के साथ यदि कोई लड़का घूमता पाया जाता है तो यह काफी है कि उस लड़की के शहर के दूसरे लड़के, जिसे वो लड़की जानती भी नहीं है, उसके साथ पाए जाने वाले लड़के का सर फोड़ दें। बीएचयू में सामान्यतः स्त्रियां समग्र रूप में ‘देवी’ होती हैं। हॉस्टल के बाहर साइकिल से गुजर रही लड़की ‘माल’ होती है और लड़कों का प्रपोजल ठुकराने वाली लड़की ‘साली रंडी’ होती है। अव्वल तो बीएचयू में लड़कियां गर्ल फ्रेंड बनती नहीं, बनती तो वह लड़कों के लिए एक दोस्त से ज्यादा शील्ड होतीं जिसे लड़के शान से चमकाते हैं। बीएचयू का आधुनिकता से संघर्ष का रिश्ता है। 2000 के आसपास जब हम बीएचयू में बीए में थे तब क्लीन शेव वाले लड़कों को ‘मकालू’ कहने का चलन था। बीएचयू में लड़कियां छेड़ना कोई वैयक्तिक उद्यम नहीं, बल्कि सामूहिक कार्रवाई है। कलेक्टिव अफर्ट है। लड़के शाम को समूह बनाके, तैयार होके, कॉम्बिंग करके, डियो लगा के लड़कियां छेड़ने लंका निकलते हैं जिसे लंकेटिंग कहा जाता है। इस तरह आप बीएचयू में सहमे हुए किशोर की तरह भले ही घुसते हों पर निकलते मादा भक्षी मर्द बनकर ही हैं। बीच में कुछ अच्छे अध्यापक, कुछ अच्छे साथी मिल जाएं तो आपको जीवन जीने की नई दृष्टि मिलती हैं वर्ना बीएचयू मोटा मोटी आपको ऐसा सोशल प्रोडक्ट बना देता है जो सोसाइटी तो छोड़िये अपने घर वालों के लिए भी हानिकारक होता है। इसलिए बीएचयू की लड़कियों का ये आंदोलन भले ही अपन सुरक्षा के लिए हो, पर ये लड़कियों से ज्यादा लड़को के हित का अांदोलन है। क्योंकि ये लड़कों को जानवर से इंसान बनाने का भी आंदोलन है और मेरा इस आंदोलन को इसलिए पुरजोर समर्थन है।
    – उमाशंकर सिंह, एक पूर्व बीएचयू छात्रAbhishek Srivastava
    23 September at 22:16 ·
    इसमें कोई दो राय नहीं कि महामना मालवीय की बगिया मधुर मनोहर अतीव सुंदर है जहां हर किस्‍म के फूल खिलते रहे हैं, लेकिन इन सब का जेंडर एक होता है- पुरुष। इन सब की जाति भी एक होती है- द्विज। बीएचयू का दोहरा सनातन रोग है जाति और पितृसत्‍ता। जाति का रोग हमेशा ऊपर से साफ़ दिखता था। पितृसत्‍ता अपनी बर्बरता में कभी-कभी प्रकट होती थी, वरना सतह के नीचे वह शांत सोते की तरह बहती रहती थी जिससे उसका आरोप लगाना थोड़ा मुश्किल हो जाता था। अभी जब मैंने Rangnath Singh का स्‍टेटस पढ़ा, तो दूसरा आयाम भी समझ में आया कि आखिर क्‍यों अपने जैसे कुछ अंतर्मुखी टाइप लड़कों को महिलाओं के हॉस्‍टल के सामने से मुंह छुपाकर निकलने की मजबूरी होती थी।
    दरअसल, बीएचयू में मोटे तौर पर हिंदीपट्टी के खांटी पूर्वांचली लड़के पढ़ने-रहने आते हैं। जो थोड़ा शहरी एक्‍सपोज़र वाले होते हैं, कोएड में प्रशिक्षित, उनका व्‍यवहार लड़कियों के प्रति शुरुआत से दोस्‍ताना होता है वरना अधिकतर पुरबिया लहजे के ही होते हैं। ये लड़के लग्‍घी से पानी पीते-पिलाते हैं। लड़की सामने आती है तो भौंचक रह जाते हैं। लटपटाने लग जाते हैं। व्‍यवहार में यह विसंगति कोई भी रूप ले सकती है- अगर उसमें थोड़ा विवेक है तो लड़का सामने से सिर झुका कर निकल लेगा वरना ढेला उठाकर बालकनी में सूखते कपड़े पर मार देगा। बीएचयू में दशकों से अं‍तर्निहित जो सांस्‍कृतिक मूल्‍य पोषित किया गया है, वह ढेला मारने को प्रश्रय देता है।
    इसका एक उदाहरण देता हूं। सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं, किताब बन जाएगी। सन् 98-99 में एक रूसी चैनल आता था- टीबी6 या 7 जैसा कोई नाम था। रात दो बजे से उस पर प्‍लेबॉय नाम का कार्यक्रम चलता था। सारे हॉस्‍टलों में टीवी नहीं होता था, तो जेसी बोस के कॉमन हॉल में टीवी देखने के लिए आस पड़ोस के हॉस्‍टलों में रात एक बजे से हरकारा लगना शुरू हो जाता था। रात दो बजे के बाद जेसी बोस का कॉमन हॉल फुल होता। फुल का मतलब? पांच साल के मेसबॉय से लेकर साठ साल के महाराज तक पूरी रेंज, इसके अलावा बीएससी पार्ट 1, 2 और 3 तक सब छात्र। कुछ एमएससी के भी, अपना हॉस्‍टल होने के नाते। प्‍लेबॉय रात दो बजे यौन क्रांति का सबब हुआ करता था जहां देवरिया के महाराजों और उनके पोतों से लेकर महाराष्‍ट्र के छात्रों तक समाजवाद की हवा चलती थी। भला हो सुषमा स्‍वराज का कि 1999 में एनडीए सरकार आने के बाद उन्‍होंने काफी बाद में इसे बैन करवा दिया।
    महामना की बगिया रात को जवान होती थी। और यह बात मैं तब की कर रहा हूं जब लड़कों के हाथ में मोबाइल नहीं था, कमरे में लैपटॉप कनेक्‍शन नहीं और सर्फिंग का चार्ज लंका पर पचास रुपया घंटा होता था। सोचिए, कि आखिर ऐसी संस्‍कृति पर किसी ने कोई लगाम लगाने की कोशिश क्‍यों नहीं की? सिर्फ इसलिए क्‍योंकि इससे विश्‍वविद्यालय की हिंदू संस्‍कृति को प्रत्‍यक्षत: कोई खतरा नहीं दिखता था। आज जो सीधे सरेराह कपड़ों में हाथ डालने की आदिम हिमाकत हो रही है, उसी का विस्‍तार है। इसीलिए मैं बार-बार बरसों से कहता रहा हूं कि प्रॉब्‍लम कहीं और नहीं, काशी ‘हिंदू’ विश्‍वविद्यालय में है। पुरुष-सत्‍ता और सवर्ण सामंतवाद के घातक मिश्रण से बने इस ‘हिंदू’ को जब तक विखंडित नहीं करेंगे, महामना की बगिया ऐसे ही फलती-फूलती रहेगी।
    See TranslationAbhishek Srivastava
    23 September at 14:45 · Ghaziabad ·
    बीएचयू यानी महामना की बगिया बदनाम हो रही है, कुछ लोगों को यह चिंता सता रही है। क्‍यों? मैं पांचवीं कक्षा में जब बिड़ला के ग्राउंड में फुटबॉल टूर्नामेंट खेलने गया था, तब पहली बार बीएचयू से परिचय हुआ। उस वक्‍त बिड़ला-ब्रोचा छात्रावासों के बाहर तार पर औरतों के साड़ी-साया सूखा करते थे। इसे कभी बदनामी नहीं समझा गया। फिर एक कुख्‍यात घटना हुई। किसी लड़की को लाकर हफ्ते भर बंद कर के छात्रावास में बलात्‍कार किया गया। यह भी बदनामी नहीं थी। फिर कुछ साल बाद गोली चली। दो छात्र मारे गए। उस वक्‍त मैं विवेकानंद में अवैध रूप से रहकर तैयारी करता था। संजोग से पुलिस की रेड पड़ी तो बिड़ला में था। भागने के प्रयास में लाठी पड़ी तो छत से कूदने में पैर गया। महामना की बगिया तब भी हरी रही।
    फिर किसी छात्र ने किसी को बिड़ला-ब्रोचा के चौराहे पर ईंटों से कूंच कर मार डाला। बीएचयू आबाद रहा। मारने वाले छात्र को पुलिस ने घेर कर एनकाउंटर कर दिया। तब भी किसी को बदनामी फील नहीं हुई। फिर लड़कों ने दांय-दांय बम मारा। जीप फूंक दी। कोई बदनाम नहीं हुआ। फिर आए हरिगौतम। लिंगदोह का ज़माना आया। अनुशासन आया। छात्रसंघ गया। लगा कि बगिया फलेगी-फूलेगी, लेकिन होली और वसंत पंचमी पर सारा अश्‍लील कर्म यथावत रहा। एक बार इंटर-युनिवर्सिटी खेलों की मेजबानी मिली। पंजाबी युनिवर्सिटी की लड़कियां मेहमान बनकर आईं। हिंदू विश्‍वविद्यालय के माहौल से बेखबर एक लड़की तड़के ब्रोचा पहुंच गई अपने किसी साथी से मिलने। पूरा हॉस्‍टल ट्रोल बन गया। फिजि़कल ट्रोल।
    कुछ नहीं मिलता तो लड़के परिसर के चपरासियों की बेटियों को ही ले देकर पकड़ लेते, जो घास काटने आया करती थीं। यह अनुशासन का दौर था। इसे कभी भी बदनामी नहीं माना गया। बेचारे बाप अपनी बेटियों को घास काटने से भेजने में डरने लगे। ब्रोचा के वार्डन को चिढ़ाने के लिए ”भीमबलिया भों…के…” का एक नारा लगता था। भीमबली वाकई बली थे सो सब सहते थे, लेकिन एक दिन लड़कों ने उनकी बेटी के नाम संबोधन भेज दिया। इस पर भी महामना बदनाम नहीं हुए। मधुर मनोहर अतीव सुंदर बनी रही मालवीयजी की बगिया…। क्‍यों? क्‍योंकि यह हिंदू विश्‍वविद्यालय है मितरों…। यहां जब तक कर्ता पुरुष है, कर्म पर प्रश्‍न नहीं है। अबकी पहली बार कर्ता पुरुष नहीं है, महिलाएं हैं इसलिए हिंदुओं की भावनाएं आहत हैं। उन्‍हें बदनामी फील हो रही है।
    See TranslationAwesh Tiwari
    32 mins ·
    चौंकिए मत BHU के कुलपति को बर्खास्त करने की मांग कर रही यह महिलाएं बनारस के पास के हरसोस गांव की है। पीएम के गोद लिए आदर्श गांव नागेपुर में भी ग्रामीण किसानों ने लाठीचार्ज के विरोध में जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की है।आप जहां कही भी हों ,जिस जगह हों अपने मोहल्ले अपने गांव,अपनी सोसायटी में विरोध सभाएं करें और तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालें और अखबारों में छपने को दे। याद रखें यह विरोध किसी सरकार का नही है उस सिस्टम का है जिसमे लड़की जब आवाज उठाती है उसकी आवाज को कुचल दिया जाता हैं।——————–Nitin Thakur
    1 hr ·
    अगर तुम BHU की लड़कियों के आंदोलन में वामपंथ ढूंढ रहे हो तो मान भी लो मित्र कि तुम इंसानियत के बेसिक्स से चूकने लगे हो. होना तो ये चाहिए था कि भले इस आंदोलन को ऊपर से कोई लीड करता दिखे पर आपको अपना रुझान छोड़कर लिखना चाहिए था कि लड़कियों की सुरक्षा अहम है तो इस अहम मांग के लिए चाहे जो पॉलिटिकल विंग जूझ रही हो इस पर्टिकुलर मुद्दे पर मैं उनके साथ हूं. तुम्हारे मकान पर कब्ज़ा छुड़ाने या कंगाली में मदद करने के लिए जो आ जाए तुम सेकेंड भर का धैर्य रखकर उसकी पार्टी ना पूछोगे लेकिन यहां तुम्हें मांगों से नहीं नेतृत्व की पहचान से मतलब है. आखिर तुम पर तो कुछ बीत नहीं रही. मरते-गिरते-रेप से बचने की कोशिश करती लड़कियों में तुम पंथ खोजकर बौद्धिक बनने का ढोंग रच रहे हो. वैसे एबीवीपी ने भी लड़कियों का समर्थन कर दिया है. अब तो संकट से मुक्ति मिल गई होगी!! वादों और पंथों के हिसाब से तुम अब तक घुमा फिराकर जो वीसी और सरकार की फील्डिंग कर रहे थे.. कुछ वक्त के लिए स्थगित कर दो. बस तब तक के लिए कर दो जब तक सरकार हॉस्टल के पास अदनी सी चौकी ना बना दे. इतना मुश्किल है क्या अपनी दोस्तों,बहनों और बेटियों का साथ देना??

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Sanjay Shraman Jothe
    1 hr · एक सलवार एक बाबा पहनकर भागे थेएक सलवार में बीएचयू की विरांगनाएँ दमन से लोहा ले रही हैं।
    See TranslationShankar Singh
    2 hrs · सलवार का शौर्यपूर्ण इतिहास तो जान लेते वैशाखनंदन ! छेड़ने और हाथ डालने के पहले यह समझ लेना कि यह गुरु गोविंद सिंह का पहनाया बाना है और अब पूरे भारत की बेटियाँ पहनती है। ये भागेगी नहीं तुम्हारा निशान मिटा देंगी।
    “सलवार पहनकर भागने वालों के प्रजातंत्र में बेटियां! ”
    त्रिभुवन
    पुलिस की लाठी बाबा रामदेवपर पड़ी तो वे सलवार पहनकर कायरों की तरह भागे। उन्होंने सलवार के शौर्यशाली इतिहास को अपमानित किया। ये भारतीय पुलिस दमन का एक पन्ना है। ये एक संन्यासी की कायरता का भी नमूना है। दरअसल वे एक संन्यासी नहीं, कारोबारी थे। उन्होंने यादवी प्रतिष्ठा को भी कलंकित किया।और अब आप दूसरी बीएचयू की घटना को देखिए। पुलिस की लाठियां बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं के सिर और बदन पर भी पड़ीं। लेकिन वे भारतीय वीरांगनाएं साबित हुईं और बाबा की तरह कायरता दिखाते हुए भागी नहीं। उन्होंने सलवार के इतिहास को प्रमाणित किया कि सलवार युद्ध की वेशभूषा का हिस्सा है, जो गुरु गोविंद सिंह जी ने सबसे पहले नारी को सैनिक के रूप में पहनाया था। बीएचयू की तरुणियों ने अपने साहस की ही नहीं, भारतीय नारी के गौरव को प्रतिष्ठापित किया है।
    आप देखिए , सभी स्त्री विरोधी और समस्त कायर इस समग्र घटनाक्रम पर वैसे ही चुप हैं, जैसे महाभारत में दुर्योधन के समर्थन में द्रोपदी का अपमान करने वाले भीष्म पितामह और ऋषिकुल के बाकी लोग मौन हो गए थे। लेकिन वे आज भी कलंकित ही हैं। बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय की बेटियों पर ऐसे समय ज़ुल्म हुआ है, जब नवरात्र चल रहे हैं और समस्त हिन्दू समाज में देवियों की गौरव गाथा हर दिन गाई जाती है।

    सत्ता के इस महाभारत में सभी दल समान रूप से कौरव साबित हो रहे हैं। लेकिन तीन साल पहले तक देश में और छह महीने पहले यूपी में नारी अपमान की घटनाओं पर आसमान सिर पर उठा लेने वाले अब अचानक नदारद और मौन हैं। उन सबकी स्थिति उन मौकापरस्तों जैसी है, जैसी दुर्योधन के दरबार में दरबारी लोगों की थी।

    हर सत्ता महाभारत का एक अध्याय होती है और सब दलों के अपने अपने दुर्योधन। हर सत्ता में द्रोपदी ऐसे ही लांछित होती है और कायर अपनी अपनी सुविधाओं और दलपरस्ती के हिसाब से चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। कहीं आपकी भी कोई दुर्योधन परस्ती तो नहीं है?
    Sanjay Shraman Jothe
    6 hrs · सद्गुरु जी कह रहे हैं कि आज के राजनेताओं को आध्यात्मिक गुरुओं से मार्गदर्शन लेना चाहिए, अतीत में राजाओं ने भी राजुरूओं से मार्गदर्शन लिया है।देश समाज को ये भी बताया जाना चाहिए ऐसे राजाओं और राजगुरुओं ने ही वो भारत बनाया था जो एक हजार साल गुलाम रहा, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डी रहा और “शूद्र,गंवार पशु नारी” जैसी बातें लिखकर सभ्यता से दूर बना रहा।
    क्या आध्यात्मिक गुरुओं और राजगुरुओं से मार्गदर्शन लेकर वापस पाषाण काल मे जाना है?————-Prakash Govind
    20 September at 11:46 ·
    आम आदमी पार्टी की नेता हैं, अलका लाम्बा जी। वे जब भी कोई स्टेटस लिखती है तो RSS, बीजेपी और मोदी भक्त उन्हें इतनी गन्दी-गन्दी गालिया लिखते है कि ऐसा लगता है, जैसे निर्भया काण्ड के अपराधियों से भी ज्यादा ये खतरनाक “बलात्कारी” लोग हैं।
    कल अलका जी ने मोदी जी को लेकर लिखा था कि माँ का आशीर्वाद लेना था तो घर के अंदर चले जाते, उन्हें बाहर बुला कर पब्लिसिटी करने की क्या जरुरत क्यों ?
    ओह माय गॉड .. कुल 400 कमेंट में भक्तो के कम से कम 300 कमेंट इतनी गन्दी और वहशी भाषा में गालिया लिखी हैं कि मै लिख नहीं सकता। बहराल एक कमेंट लिखा जो श्रीमान आशुतोष तिवारी – भगवा राष्ट्रवादी है उनकी टिपण्णी आप पढ लीजिये —
    “बहुत नीच लड़की हो। पब्लिसिटी के लिए और क्या-क्या कर सकती हो? अभिषेक मनु सिंघवी के पास जाओ जज बना देगा ज्यादा पब्लिसिटी मिल जायेगी।
    थू है तेरी हरामखोरी पर। अब तू पोलिटिकल राखी सावंत बनना चाहती है। मोदी तो इतने ऊँचे व्यक्तित्व के है कि तुम सिर्फ इसी प्रकार भौंक-भौंक के एक दिन केजरीवाल की तरह समाप्त हो के लाहौर के बाजार में चली जाएगी।”
    ये उन 250 टिप्पणियों में से मैंने छांटी है जिसकी हिम्मत में कर पाया हु कॉपी करने की। बाकी की टिपण्णियां तो इतनी घिनोनी गालियों में हैं कि पढ़ने की हिम्मत नहीं होती है।
    अब आप समझ सकते है की मै इस “फासिस्टवादी विचारधारा” के खिलाफ क्यों हूँ।
    .
    .
    (उमेश द्विवेदी)
    See Translation———————–Shambhunath Shukla
    Yesterday at 10:30 ·
    आज सुबह चार बजे नींद खुली। नित्यक्रिया से निपटकर वाक पर जाने की तैयारी करने लगा। लेकिन सोफे पर बैठे-बैठे आँख लग गई। क्या देखता हूँ कि लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुआ और भाजपा को 180 तथा कांग्रेस को 195 सीटें मिली हैं। सपा, बसपा, राजद, तृणमूल कांग्रेस, रालोद और नवीन पटनायक की बीजू जनता दल को 80 सीटों पर जीत मिली है। कांग्रेस ने नई यूपीए बनाई है। और इन सब को मिलाकर यूपीए की संख्या 275 हो गई है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने हैं। बनते ही उन्होंने दो हज़ार और दो सौ के नोट बंद कर दिए हैं और पुराने हज़ार, पांच सौ के नोट बहाल कर दिए हैं। जीएसटी को वापस ले लिया है और पेट्रोल 50 रुपये तथा डीज़ल 30 में बिकने लगा है। गाय के मांस की बिक्री खोल दी गई है। और तीन तलाक़ की बहाली के मामले पर संसद में बहस आहूत की गई है।
    अब था यह सपना ही इसलिए कृपया दढ़ियल और चुटियल लोगों से करबद्ध प्रार्थना है कि सैंटी होकर मुझे न कोसें। कोसना है तो सपने को कोसें।

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  3. सिकंदर हयात

    Awesh Tiwari
    19 mins ·
    महानगरों में बैठकर बनारस को बीएचयू प्रकरण के बहाने लिविंग कल्चर मत सिखाईये। बनारस के थानों में रेप,छेड़खानी, घरेलू हिंसा के मामले ढूंढेंगे तो आपको सच्चाई समझ में आ जायेगी कि इन बनारसियों से ज्यादा स्त्रियों का सम्मान कोई नही करता। रंगबाजी करने ,भांग छानने, टहलानी मारने ,अखाड़ेबाजी करने वाले बनारसी स्त्रियों का सम्मान करना किसी आम शाहरीं से ज्यादा जानते हैं। छेड़कर देखिए बनारस की सड़क पर किसो लड़की को वो आपका मुँहवा तो थुर देगी आपको वो गाली देगी कि आपको जिंदगी भर याद रहेगा पब्लिक जो बहती गंगा में हाथ धोएगी वो अलग से। जो लोग बनारसी गालियों को अपसंस्कृति बताते हैं पहले आम बनारसियों की तरह रहना और स्त्री का सम्मान करना सीख लें उसके बाद उपदेश दीजियेग। यह वो शहर है जहां एक छात्रा के सरः छेड़खानी होती है निपढ ग्रामीण महिलाएं राशन लेकर खड़ी हो जाती हैं। जहां तक बीएचयू के सवाल है वाहः एक हिन्दू राष्ट्र बन चुका है। इस राष्ट्र का बनारसी संस्कृति से कोई लेना देना नही है।
    See TranslationAwesh Tiwari
    3 hrs ·
    BHU मामले के अनसुने सच-
    1- छात्राओं पर हुआ पहला हमला यूनिवर्सिटी के सुरक्षाकर्मियों ने वीसी लॉज के सामने किया था ,यह सुरक्षाकर्मी पुलिस जैसी वर्दी पहने होते हैं इस लाठी चार्ज के बाद ही मुख्यद्वार पर भगदड़ सी स्थिति हो गई और फिर पुलिस की कारवाई हुई। अब बनारस के एसएसपी ने बीएचयू के वीसी को अपने सुरक्षाकर्मियों की वर्दी को बदलने का अल्टीमेटम दिया है।
    2- विश्विद्यालय में वीसी समर्थक लड़कों का एक गैंग है इस गैंग के सदस्य आंदोलनकारियों में शामिल हो गए थे। यह वही गैंग है जो जेएनयू के प्रोफेसर की सभा मे घुसकर हंगामा करते हैं। साइबर लाइब्रेरी 24 घंटे खोलने के सवाल पर आन्दोलनरत छात्रों को मारता पीटता है,यह गैंग अभी भी कैम्पस में हैं।
    3- इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि इस सारे प्रकरण में वीसी द्वारा अपना कार्यकाल बढ़ाने को लेकर मिनिस्ट्री पर दबाव बनाने की रणनीति भी थी । जानकारी है कि पीएम के बनारस दौरे के दौरान भी उनको यह सूचना दी गई कि जेएनयू के छात्रों के समर्थन से यह आंदोलन चल रहा है।
    4-बनारस का जिला प्रशासन अंत तक चाहता रहा कि वीसी छात्रों से बात कर ले उन्हें मनाने की तीन कोशिशें भी हुई मगर वो नही माने।
    5- इस प्रकरण में छात्रा को एफआईआर करने से रोका गया यहां तक कि उससे दरख्वास्त भी नही ली गई और छात्रा शहर छोड़ कर चली गई।Awesh Tiwari
    4 hrs ·
    चौंकिए मत BHU के कुलपति को बर्खास्त करने की मांग कर रही यह महिलाएं बनारस के पास के हरसोस गांव की है। पीएम के गोद लिए आदर्श गांव नागेपुर में भी ग्रामीण किसानों ने लाठीचार्ज के विरोध में जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की है।आप जहां कही भी हों ,जिस जगह हों अपने मोहल्ले अपने गांव,अपनी सोसायटी में विरोध सभाएं करें और तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालें और अखबारों में छपने को दे। याद रखें यह विरोध किसी सरकार का नही है उस सिस्टम का है जिसमे लड़की जब आवाज उठाती है उसकी आवाज को कुचल दिया जाता हैं।———————–Rakesh Kayasth is with Sopan Joshi.
    Yesterday at 16:43 ·
    हिंसा, हाहाकार और बनारस में लड़कियों की पिटाई की ख़बरों से मन बहुत अशांत था। नज़र टेबल पर रखी एक किताब पर पड़ी, जिसे मैने दो महीने पहले खत्म की थी। कई बार सोचा कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन वक्त नहीं निकाल पाया। किताब का नाम है, जल थल मल। किताब गांधी शांति प्रतिष्ठान ने छापी है और लेखक का नाम अंदर कहीं जाकर ढूंढने पर मिलता है। लेखक है- सोपान जोशी।
    लेखक के नाम के ठीक नीचे लिखा है— इस पुस्तक की किसी भी सामग्री का उपयोग किसी भी रूप में किया जा सकता है, स्रोत का उल्लेख कर देंगे तो अच्छा लगेगा। दुनिया में ऐसी बहुत कम किताबे होंगी जिसके लेखक यह दावा करें कि मैने जो कुछ लिया है, समाज से लिया है, इसलिए आप इसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं।
    जल थल मल को पिछले दस साल में पढ़ी गई अपनी कुछ पसंदीदा किताबों में रखना चाहूंगा। विज्ञान, पर्यावरण, दर्शन और समाजशास्त्र के अलग-अलग सिरे जिस खूबसूरती से एक दूसरे से इस किताब में आकर मिलते हैं, वह वाकई कमाल है। पर्यावरण के सवाल को सहज लेकिन समग्र रूप से देखने का एक अनोखा नज़रिया देती है यह किताब।
    किताब यह बताती है कि हम जिसे अज्ञान समझते हैं, दरअसल वही असली ज्ञान है। इंसान अपनी परंपरागत समझ से अपनी ज़मीन, अपने जल स्रोत और अपने पेड़ किस तरह बचाता आया है, इससे जुड़ी कई विलक्षण कहानियां इस किताब हैं। ऐसी एक कहानी पूर्वी कोलकाता की जलभूमि की है। कोलकाता के बड़े हिस्से के सीवर का पानी यहां आकर जमा होता है। गंदगी इतनी कि रिहाइशी बस्तियां इससे बहुत दूर बसाई गई हैं।
    लेकिन यहां आकर बसे मछुआरो ने अपने परंपरागत ज्ञान से यह साबित कर दिया कि मैला पानी भी वरदान बन सकता है। कचरे से खाद बनाकर खेती करने और मछली पालन से ना सिर्फ यहां का पर्यावरण बदला बल्कि हज़ारो लोगो को रोजगार भी मिला।मछुआरो के परंपरागत ज्ञान और ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को बिल्डरों से बचाकर उसे संयुक्त राष्ट्र से मान्यता दिलाने की लड़ाई लड़ने वाले सरकारी अधिकारी ध्रुबोज्योति घोष के संघर्ष की कहानी अपने आप में एक बेहतरीन फिल्म का कंटेट है।
    चकित कर देने वाली बहुत सी बाते हैं, इस किताब में। भारत में वेस्ट मैनजमेंट के वैज्ञानिक, आर्थिक और समाजशास्त्रीय पहलुओं पर यह किताब एक अलग रौशनी डालती है। सोपान जोशी ने चर्चित पर्यावरणविद और `अब भी खरे हैं तालाब’ जैसी कालजयी कृति के लेखक अनुपम मिश्र के साथ लंबे समय तक काम किया है। सोपान का ज्यादातर लेखन अंग्रेजी में है। लेकिन यह किताब उन्होने बहुत सुंदर और सहज हिंदी में लिखी है। मैने पुस्तक के एक बहुत छोटे से हिस्से का जिक्र किया है। यह एक बहुत बड़े फलक की किताब है। आखिर में दी गई संदर्भ सूची पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि इसे लिखने में कितनी मेहनत की गई है। विषय गंभीर है, लेकिन किताब दिलचस्प है। किताब ऑन लाइन मंगाई जा सकती है। अगर कुछ अच्छा पढ़ना चाहते हैं तो जल थल मल ज़रूर पढ़िये।Rakesh Kayasth
    23 September at 05:56 ·
    पुरानी हिंदी फिल्मों में पतिता किस्म का एक कैरेक्टर अनिवार्यत: हुआ करता था, जो आमतौर पर हेलेन, बिंदु या कभी-कभी अरुणा ईरानी के हिस्से में आता था। वह जमाना कुछ ऐसा था, जब यह माना जाता था कि नायिका को गंगाजल की तरह पवित्र होना चाहिए। मतलब जो करना है, हीरो के सामने करे, पब्लिकली कुछ भी नहीं।
    इसलिए अंग प्रदर्शन जैसे पापकर्म उसी `नीच’ औरत से करवाये जाते थे। वह औरत दर्शकों की दमित यौनच्छाओं का शमन करती थी और क्लाइमेक्स सीन में जब हीरो पर गोली चलती थी तो बीच में आ जाती थी। इस तरह नायक को बचाती हुई वह बुरी औरत दुनिया से विदा ले लेती थी। पतिता को जीने का हक नहीं होना चाहिए, इसलिए दर्शकों का भरपूर मन बहलाने के बाद आखिर में उसे मरना ही पड़ता था।
    इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हनीप्रीत में वही बुरी औरत ढूंढ ली है। एक आदमी जिसे वह बाप कहती थी, उसके साथ उसके शारीरिक संबंध थे। छी.. छी.. घोर कलियुग एक बार फिर से देखिये। … कितनी शर्मनाक बात है, बात करते भी शर्म आती है.. कहीं मत जाइयेगा आते हैं, ब्रेक के बाद।
    क्या जमाना आ गया है.. वह कितनी बार बाबा के साथ सोई एक्सक्लूसिव जानकारी सिर्फ हमारे चैनल पर।
    `कुलटा’ की एक्सक्लूसिव कहानियां हॉट केक की तरह बिक रही हैं। पब्लिक को गुस्सा आ रहा है तो गुस्से में आकर गालियां बक रही है और फिर दोबारा देख रही है। सुघड़ गृहणियां रोटी बेलना छोड़कर दौड़ी आ रही हैं, उस कुलच्छनी के एक झलक देखने के लिए। डिजिटल इंडिया वाले भारत के नौजवान एक-दूसरे से पूछ रहा है– कोई एमएमएस नहीं आया है बे?
    क्या अब भी किसी को शक है कि भारत प्रचंड यौन कुंठाओं वाला देश है। सेक्स चाहे जिस रूप में हो, बिकता ज़रूर है। राम रहीम ने जो कुछ किया अदालत ने उसे उसकी सजा दे दी। नये मुकदमे खुलेगे तो उसके बाकी कर्मों का भी हिसाब-किताब भी होगा। लेकिन अगर हनीप्रीत के पूर्व पति उस पर इल्जाम लगाया कि बाबा के साथ उसके संबंध थे, इससे मीडिया का क्या लेना-देना? एकाध लाइन में जानकारी देना फिर भी समझ में आता है। लेकिन एक औरत को वेश्या से बदतर बनाकर सरेआम स्क्रीन पर उसके कपड़े उतारने का अधिकार किसने दिया?
    हनीप्रीत और राम रहीम प्रकरण जिस तरह कवर किया जा रहा है, वह गैर-कानूनी होने के साथ अनैतिक भी है। दो बालिग लोगो के बीच स्वेच्छा से बने संबंधों पर इतने विस्तार में बात करना सीधे-सीधे उनकी निजता का हनन है, भले ही उनपर कितने भी संगीन इल्जाम क्यों ना हों। उम्मीद करता हूं कि संपादक गण इस बात पर गौर करेंगे।
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