पुण्य प्रसून बाजपेयी

आखिर भाजपा ने देश की लुटिया डुबो दी!

सबसे बडी चुनौती इकनॉमी की है । और बिगडी इकनॉमी को कैसे नये आयाम दिये जाये जिससे राजनीतिक लाभ भी मिले अब नजर इसी बात को लेकर है । तो एक तरफ नीति आयोग देश के 100 पिछडे जिलों को चिन्हित करने में लग गया है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय इकनॉमी को पटरी पर लाने के लिये ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है । नीति आयोग के सामने चुनौती है कि 100 पिछड़े जिलों को चिन्हित कर खेती, पीने का पानी , हेल्थ सर्विस और शिक्षा को ठीक-ठाक कर राष्ट्रीय औसम के करीब लेकर आये तो वित्त मंत्रालय के ब्लू प्रिंट में विकास दर कैसे बढे और रोजगार कैसे पैदा हो। नजर इसी पर जा टिकी है। और इन सबके लिये मशक्कत उघोग क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र , रियल स्टेट और खनन के क्षेत्र में होनी चाहिये इसे सभी मान रहे हैं। यानी चकाचौंध की लेकर जो भी लकीर साउथ-नार्थ ब्लाक से लेकर हर मंत्रालय में खिंची जा रही हो, उसके अक्स में अब सरकार को लगने लगा है कि प्रथामिकता इकनॉमी की रखनी होगी इसीलिये अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है । जिससे जीडीपी में तेजी आये , रोजगार बढ़े। और बंटाधार हो चुके रियल इस्टेट और खनन क्षेत्र को पटरी पर लाया सके । लेकिन सवाल इतना भर नहीं । इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह सत्ता में रहते हुये इकनॉमी को लेकर फेल मान लिये गये । और जनता की नब्ज को समझने वाले मोदी सत्ता संभालने के बाद इकनॉमी संबालने से जूझ रहे हैं। और देश का सच ये है कि नेहरु ने 1960 में सौ पिछडे जिले चिन्हित किया । मोदी 2017 में 100 पिछडे जिलों के चिन्हित कर रहे हैं । 1960 से 1983 तक नौ कमेटियों ने सौ पिछड़े जिलों पर रिपोर्ट सौपी । कितना खर्च हुआ । या रिपोर्ट कितनी अमल में लायी गई ये तो दूर की गोटी है ।

सोचिये कि जो सवाल आजादी के बाद थे, वही सवाल 70 बरस बाद है । क्योकि जिन सौ जिलों को चिन्हित कर काम शुरु करने की तैयारी हो रही है उसमें कहा तो यही जा रहा है कि हर क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत के समकक्ष 100 पिछडे जिलो को लाया जाये । लेकिन जरुरत कितनी न्यूनतम है किसान की आय बढ जाये । पीने का साफ पानी मिलने लगे ।शिक्षा घर घर पहुंच जाये । हेल्थ सर्विस हर किसी को मुहैया हो जाये ।और इसके लिये तमाम मंत्रालयों या केन्द्र राज्य के घोषित बजट के अलावे प्रचार के लिये 1000 करोड़ देने की बात है । यानी हर जिले के हिस्से में 10 करोड । तो हो सकता है पीएम का अगला एलान देश में सौ पिछडे जिलों का शुरु हो जाये । यानी संघर्ष न्यूनतम का है । और सवाल चकाचौंध की उस इकनॉमी तले टटोला जा रहा है जहां देस का एक छोटा सा हिस्सा हर सुविधाओ से लैस हो । बाकि हिस्सों पर आंख कैसे मूंदी जा रही है ये मनरेगा के बिगडते हालात से भी समझा जा सकता है । क्योंकि मानिये या ना मानिये । लेकिन मनरेगा अब दफ्न होकर स्मारक बनने की दिशा में जाने लगा है । क्योकि 16 राज्यो की रिपोर्ट बताती है मनरेगा बजट बढते बढते चाहे 48 हजार करोड पार कर गया लेकिन रोजगार पाने वालो की तादाद में 7 लाख परिवारो की कमी आ गई । क्योंकि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है कि 2013-14 में पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी,। जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई । तो मुश्किल ये नहीं कि सात लाख परिवार जिन्हे काम नहीं मिला वह क्या कर रहे होंगे । मुश्किल दोहरी है , एक तरफ नोटबंदी के बाद मनरेगा मजदूरों में 30 फिसदी की बढोतरी हो गई । करीब 12 लाख परिवारों की तादाद बढ गई । दूसरी तरफ जिन 39 लाख परिवारों को काम मिला उनकी दिहाड़ी नही बढ़ी। आलम ये है कि इस वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2017 के बाद से यूपी, बिहार,असम और उत्तराखंड में मनरेगा कामगारों की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की वृद्धि हुई । ओडिशा में यह मजदूरी दो रुपये और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई ।

और दूसरी तरफ -बीते साल नवंबर से इस साल मार्च तक बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो काम मांगने वालों की संख्या में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज हुई । तो मनरेगा का बजट 48000 करोड़ कर सरकार ने अपनी पीढ जरुर ठोकी । लेकिन हालात तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लागू ना करा पाने तक के है । एक तरफ 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा , मनरेगा की मजदूरी को राज्यों के न्यूनतम वेतन के बराबर लाया जाए । लेकिन इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने मनरेगा के तहत दी जानी वाली मजदूरी को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ने को गैर-जरूरी करार दे दिया जबकि खुद समिति मानती है कि 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी खेत मजदूरों को दी जाने वाली रकम से भी कम है। तो फिर पटरी से उतरते देश को राजनीति संभालेगी कैसे । और इसी लिये जिक्र युवाओ का हो रहा है । बेरोजगारी का हो रहा है । और ध्यान दीजिये राहुल के निशाने पर रोजगार का संकट है। पीएम मोदी के निशाने पर युवा भारत है। और दोनों की ही राजनीति का सच यही है कि देश में मौजूदा वक्त में सबसे ज्यादा युवा है । सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार है। और अगर युवा ने तय कर लिया कि सियासतकी डोर किसके हाथ में होगी तो 2019 की राजनीति अभी से पंतग की हवा में उड़ने लगेगी । क्योकि 2014 के चुनाव में जितने वोट बीजेपी और काग्रेस दोनो को मिले थे अगर दोनों को जोड़ भी दिया जाये उससे ज्यादा युवाओ की तादाद मौजूद वक्त में है । मसलन 2011 के सेंसस के मुताबिक 18 से 35 बरस के युवाओ की तादाद 37,87,90,541 थी । जबकि बीजेपी और काग्रेस को कुल मिलाकर भी 28 करोड़ वोट नहीं मिले । मसलन 2014 के चुनाव में बीजेपी को 17,14,36,400 वोट मिले । तो कांग्रेस को 10,17,32,985 वोट मिले और देश का

सच ये है कि 2019 में पहली बार बोटर के तौर पर 18 बरस के युवाओ की तादाद 13,30,00,000 होगी यानी जो सवाल राहुल गांधी विदेश में बैठ कर उठा रहे हैं उसके पीछे का मर्म यही है कि 2014 के चुनाव में युवाओं की एक बडी तादाद कांग्रेस से खिसक गई थी । क्योकि दो करोड रोजगार देने का वादा हवा हवाई होगया था और याद किजिये तब बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रोजगार कामुद्दा ये कहकर उठाया था कि “कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बीते दस साल के दौरान कोई रोजगार पैदा नहीं कर सकी, जिससे देश का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ”। तो मोदी ने सत्ता में आने के लिये नंवबर 2013 को आगरा की चुनावी रैली में पांच बरस में एक करोड रोजगार देने का वादा किया था । पर रोजगार का संकट किस तरह गहरा रहा है और हालात मनमोहन के दौर से भी बुरे हो जायेंगे ये जानते समझते हुये अब ये सवाल राहुल गांधी , मोदी सरकारको घेरने के लिये उठा रहे हैं । यानी मुश्किल ये नहीं कि बेरोजगारी बढ़ रही है संकट ये है कि रोजगार देने के नाम पर अगर युवाओं को 4 बरस पहले बीजेपी बहका रही थी और अब नजदीक आते 2019 को लेकर कांग्रेस वही सवाल उठा रही तो अगला सवाल यही है कि बिगडी इकनॉमी , मनरेगा का ढहना और रोजगार संकट
सबसे बडा मुद्दा तो 2019 तक हो जायेगा लेकिन क्या वाकई कोई विजन किसी के पास है की हालात सुधर जाये ।

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6 thoughts on “आखिर भाजपा ने देश की लुटिया डुबो दी!

  1. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar added 13 new photos.
    7 hrs ·
    एक व्हाट्स अप ग्रुप है ऊँ धर्म रक्षति रक्षित: । इसमें से कई लोग ख़ुद को आर एस एस के होने का दावा करते हैं। जब भी कुछ विवाद होता है, ये एक्टिवेट होता है और मुझे अनाप शनाप कहने लगता है। हर तरह की धमकी और गाली दी जाती है। मुझे पता नहीं क्या करना चाहिए। डिलिट करता हूँ तो फिर जोड़ लेते हैं। Dharm RSS Dharm 2 RSS और आकाश सोनी इसके ग्रुप एडमिन हैं। कई हैं । क्या कोई संघ प्रमुख मोहन भागवत तक ये मेसेज पहुँचा सकता है कि क्या उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को ऐसी भाषा की अनुमति दी है? वैसे ग्रुप के लोगों को किसी बात से फर्क नहीं पड़ता। आप इस ग्रुप की भाषा पढ़ेंगे तो काँप जायेंगे। इतनी नफरत कौन भर रहा है इनमें । ‘लिंच मॉब’ की तरह बर्ताव करते हैं। मैं संघ के कई लोगों को जानता हूँ । पहले भी बताया था पर अब लगता है सार्वजनिक कर देना चाहिए। ताकि आपको पता रहे कि हम किस हालात में काम कर रहे हैं। गुज़ारिश है कि आप एक एक तस्वीर देखें और अपने देश के बारे में सोचें । भाषा की शालीनता अनुमति नहीं देती कि इन्हें यहाँ पोस्ट करूँ लेकिन आप जानेंगे कैसे कि हम क्या क्या झेल रहे हैं? ये लोग फोन करके गालियाँ भी देते रहते हैं। कोई मोहन भागवत को जानता है ? पता करके बता सकता है कि क्या इसी भाषा से धर्म की रक्षा होगी या उन्हें यही बता दे कि कोई संघ का नाम बदनाम कर रहा है। क्या इसी संस्कृति के लिए हम बौराए हुए हैं ? क्या इन्हीं लोगों के दम से भारत विश्व गुरु बनेगा? क्या ये आकाश सोनी संघ का नहीं है? जब मैंने इस पोस्ट में आकाश का नाम लिया तो झट से ग्रुप से हटा दिया। चर्चा चल रही थी कि आकाश सोनी का नंबर किसने सेव कर दिया तो एक कहता है कि उससे सेव हो गया था। उसके भी स्क्रीन शॉट दे रहा हूँ Ravish Kumar
    14 hrs ·
    30 लाख से भी कम लोगों ने अगस्त महीने की जीएसटी जमा कराई है। जुलाई में 46 लाख लोगों ने जीएसटी भरा था।
    जबकि जुलाई तक 60 लाख रजिस्ट्रेशन ही हुआ था। अगस्त तक करीब 90 लाख रजिस्ट्रेशन हुआ था। एक महीने में तीस लाख पंजीकरण भरा लेकिन इसके बाद भी जीएसटी भरने वालों की संख्या में सोलह लाख की कमी हो गई ।
    क्या व्यापारियों ने जीएसटी को लेकर हाथ खड़े कर दिए ? इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं।
    जीएसटी भरने में देरी होने पर दो सौ रुपये प्रति दिन दंड देने होते हैं। इसके अलावा 18 प्रतिशत का ब्याज़ भी लग सकता है। इसके बाद भी सोलह लाख जीएसटी कम भरी गई है।
    हर व्यापारी जीएसटी के पोर्टल और जटिलता को लेकर शिकायत कर रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड में जीएसटी प्रमुख अजय भूषण पांडे के बयान से लगता नहीं कि कोई बड़ी दिक्क्त है।
    वित्त मंत्री ने कहा था कि आख़िरी दिन 75 फीसदी लोग जीएसटी भरते हैं। उन्हें पहले भरना चाहिए लेकिन आँकड़े बताते हैं कि सिर्फ 46 प्रतिशत लोगों ने अंतिम दिन भरा। अब इतने लोग आख़िर में तो आएँगे ही। इस सुधार के बाद भी सोलह लाख कम जीएसटी भरी गई है। जबकि इसे बढ़ना चाहिए था।
    सरकार अब मान रही है कि अर्थव्यवस्था को revive करने की ज़रूरत है। इसके लिए वो चालीस हज़ार करोड़ ख़र्च करे या पचास हज़ार करोड़ इस पर विचार हो रहा है। इससे वित्तीय घाटा काफी बढ़ेगा। बिजनेस स्टैंडर्ड की यह पहली ख़बर है।
    लगातार छह तिमाही से अर्थव्यवस्था में मंदी आ रही थी। अब जाकर सरकार मानी है। उस वक्त मानती तो हंगामा होता और नोटबंदी को मूर्खतापूर्ण स्वीकार करना होता। नोटबंदी के दूरगामी परिणाम आ गए हैं और बेलग्रामी मिठाई खाइये। तब जब सवाल उठे तो जवाब देने के बजाए स्तरहीन मगर प्रभावशाली भाषण दिए गए। स्तरहीन इसलिए कहा क्योंकि एक भी भाषण में सवालों के जवाब नहीं दिए गए, प्रभावशाली इसलिए कहा क्योंकि लोगों ने कुछ सुना नहीं समझा नहीं मगर उसके टोन और शोर पर भरोसा किया। रोया गया और माँ तक को लाइन में लगा दिया गया। जो मर गए और जिनकी मेहनत की कमाई बर्बाद हो गई उनके लिए एक बूँद आँसू नहीं।
    वैसे तमाम तरह के ईंवेंट से यह तो हो गया है कि हम नोटबंदी से हुई बर्बादी की स्मृतियों से दूर आ गए हैं । फिर भी आप किसी ज़ोरदार परंतु तथ्यहीन भाषण के लिए तैयार रहिए जिस पर कई दिनों तक चर्चा होने वाली है। क्योंकि भाषण हमेशा अच्छा होता है।
    नोट: कहीं ऐसा तो नहीं कि अर्थव्यवस्था को लेकर मेरे तमाम पोस्ट सही साबित हुए और सरकार को भी समझ आया कि सही कह रहा हूँ ! मुग़ालता नहीं पालना चाहिए लेकिन सरकार को भी दिख रहा था कि कदम लड़खड़ा रहे हैं। बस उसे यक़ीन था कि भाषण, विज्ञापन से मनोवैज्ञानिक हालात बदल जाएँगे और लोग नौकरी सैलरी की चिंता छोड़ हिन्दू मुस्लिम टॉपिक में रम जाएँगे ।
    See TranslationRavish Kumar
    22 hrs ·
    पुराने पैटर्न को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही कोई बड़ा ईंवेंट लाँच होने वाला है। उसमें या तो भावुकता होगी या फिर आक्रामकता। आर्थिक तंगी से ध्यान भटकाने के लिए नए ईंवेंट का इंतज़ार करिए। बड़ा सपना, बड़ा ईंवेंट। टीवी एंकर तैयार रहें।।Ravish Kumar
    Yesterday at 11:28 ·
    त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या की ख़बर दर्दनाक है। शांतनु त्रिपुरा में अलग राज्य की मांग करने वाले संगठन IPTF और सीपीएम के संगठन TRUGP के बीच टकराव को कवर करने गए थे। पिछले कुछ दिनों में अलग राज्य की मांग को लेकर दोनों गुटों में जमकर संंघर्ष हुआ है। पुलिस ने IPTF के चार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है। दुखद घटना है। अगर यही हाल रहा तो कोई पत्रकार किसी पार्टी या संगठन का प्रदर्शन कवर करने नहीं जाएगा। बल्कि कुछ दिनों के बंद कर देना चाहिए ताकि संभी संगठन इस बारे में विचार करें और अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को निर्देश दें कि कोई पत्रकार हो तो उस पर गुस्सा नहीं निकालना है। संगठनों की इस गुंडई का जमकर विरोध होना चाहिए। राज्य सरकार को शांतनु के परिवार को एक करोड़ की राशि देनी चाहिए और चुनाव आयोग को इसका पैसा इस संगठन से चार्ज करना चाहिए। न दे तो चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दे।
    गूगल सर्च किया कि इस संगठन के बारे में जानकारी जुटाई जाए। इसका पूरा नाम INDIGENOUS PEOPLE’S FRONT OG TRIPURA एक दशक से भी पुराना संगठन है। समय समय पर इसके उग्र प्रदर्शन होते रहते हैं। एक ख़बर के मुताबिक बीजेपी के नेता देवधर का बयान है कि अलग राज्य की मांग का समर्थन नहीं करते हैं मगर अलग से काउंसिल बनाने की बात पर विचार किया जा सकता है। IPFT सीपीएम को ही ज़िम्मेदार ठहराती है कि उसकी नीतियों के कारण जनजाति समाज के लोग अलग थलग महसूस करते हैं।
    त्रिपुरा से एक पत्रकार ने मेसेज किया है कि राज्य में अलग काउंसिल दो दशक पहले से है। मगर एक दल बंगाली बनाम त्रिपुरा के बीच अलगाव को बढ़ावा दे रहा है ताकि वो अपना प्रभाव बढ़ा सके। आप खुद इस दल के बारे में पता कर लेंRavish Kumar
    20 September at 09:37 ·
    2002 के गुजरात दंगों के राजनीतिक पक्ष को ही उभारा गया जो बाद में 84 बनाम 2002 के कुतर्कों से समतल हो गया। क़ानूनी पक्ष गौण रहा। गुजरात दंगों में अंदाज़न सौ से भी अधिक हिन्दू और मुस्लिम दंगाइयों को सज़ा हुई है। मुमकिन है संख्या इससे भी अधिक हो। यह बात माननी पड़ेगी कि गुजरात दंगा अकेला दंगा है जिसमें बड़ी संख्या में दंगाइयों को सज़ा हुई मगर दंगों और एनकाउंटर में कथित रूप से भूमिका निभाने वाले बड़े और मंझोले पुलिस अधिकारी और नेता बच निकले या बचा लिए गए।
    भीड़ में शामिल जिन आम लोगों को सज़ा हुई उनकी कहानी भी गौण रही कि कैसे वे नेताओं के बहकावे में आकर हत्यारा बने और मुक़दमा लड़ने में बर्बाद हुए। हिन्दू सज़ायाफ़्ता भी और मुस्लिम सज़ायाफ़्ता भी। हमें नहीं मालूम वकील करने और तारीखों में पिस कर उनका परिवार कैसे बर्बाद हुआ। कभी किसी नेता को उनकी मदद के बारे में तो नहीं सुना। वो विराट सांप्रदायिक हिन्दू और सांप्रदायिक मुस्लिम विचारधारा के लिए अब किसी काम के नहीं रहे। झुंड में नए लोगों की भर्ती हो चुकी है। नई पीढ़ी के सांप्रदायिक युवाओं और युवतियों के लिए काम की किताब है। उल्लू बनने से बचेंगे।
    राना अय्यूब की किताब गुजरात फाइल्स को 2002 में मूर्ख बनकर हत्या कर बैठे लोगों को भी पढ़ानी चाहिए। जेलों में भिजवा देनी चाहिए। आरोपी भी ज़रूर पढ़ें । अब यह किताब हिन्दी में है। उर्दू, मराठी,पंजाबी,अंग्रेजी, कन्नड में तो है ही। वैसे यह किताब दंगों पर नहीं फ़र्ज़ी एनकाउंटर पर है। इसे अंतिम सत्य
    की जगह तथ्यों और संदर्भों के करीब समझ कर पढ़िए। दंगोँ के लिए आप मनोज मिट्टा की किताब Modi and Godhra: the fiction of fact finding पढ़ सकते हैं।
    इस किताब को छापने से कई प्रकाशक डर गए। कई मीडिया हाउस ने समीक्षा नहीं छापी। आई टी सेल वाले भी चुप रहते हैं। राना को भद्दी गालियाँ देते हैं मगर किताब को लेकर चुप रहते हैं। हंगामा करेंगे या बैन करेंगे तो ज़्यादा लोग न पढ़ लें । राना अय्यूब का कहना है कि किसी ने मानहानि का मुक़दमा भी नहीं किया। वैसे ये सब न करने के लिए सरकार की तारीफ करनी चाहिए। मुझे पूरा भरोसा है एनडीए सरकार इस किताब को कोर्स में शामिल करेगी। हिन्दी पत्रकारिता के छात्र इसे अवश्य पढ़ें और प्रोजेक्ट बना कर वाइस चांसलर को गुप्त नाम से भेज दें ।
    गुजरात फाइल्स गुलमोहर किताब ने छापी है। प्राप्त करने का पता भी दे रहा हूँ । gulmohar.kitaab@gmail.com
    99580701, 9818755922 । कीमत 250 से कम है।
    See Translation
    ।Himanshu Kumar
    Yesterday at 21:24 ·
    देश भर में किसान आन्दोलन कर रहे हैं,
    अभी राजस्थान में लाखों किसानों ने हफ़्तों तक सड़क पर रह कर आन्दोलन चलाया है,
    उससे पहले मध्य प्रदेश में किसानों का जबर्दस्त आन्दोलन हुआ जिसमें भाजपा सरकार ने गोली चलाई जिसमें कई किसान मारे गए,
    छत्तीसगढ़ में किसानों की यात्रा को सरकार ने दमन पूर्वक रोक दिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया है,
    पंजाब में कल (22 सितंबर) से किसानों का धरना शुरू होने वाला है,
    इसे रोकने के लिए पंजाब में अभी तक चार सौ से ज्यादा किसानों को जेल में डाला जा चुका है,
    किसानों को डराने के लिए पुलिस उनके घरों में रात को दीवार फांद कर घुस रही है,
    ताकि महिलायें डर कर अपने घर के पुरुष सदस्यों को इस आन्दोलन में भाग लेने से रोक दें,
    परसों यानी 19 सितम्बर को पंजाब के लोंगोवाल कस्बे में थानेदार और सिपाही एक किसान के घर में दीवार फांद कर रात को घुसे जहां महिलायें आंगन में नहा रही थीं,
    जब घर वालों ने शोर मचाया तो पड़ोसी इकट्ठे हो गये और सब ने मिलकर थानेदार की पिटाई कर दी,
    अब पुलिस ने इन चालीस ग्रामीणों पर हत्या की कोशिश का केस बना दिया है,
    महिलाओं पर हमला कर के पूरे परिवार को डराने का खेल सारी दुनिया में खेला जाता है,
    बस्तर में तो सुरक्षा बल आदिवासी किसानों को डराने के लिए सीधे बलात्कार ही करते हैं,
    क्योंकि बस्तर की आवाज़ वहीं दब जाती है और पूरे देश में उसके लिए कोई बेचैनी नहीं होती,
    असल में किसानों की इस बेचैनी और गुस्से के लिए हमारी राजनीति ज़िम्मेदार है,
    सरकार वर्ल्ड बैंक की सलाह पर चल रही है,
    वर्ल्ड बैंक का मानना है कि जितने कम लोग खेती में रहेंगे अर्थव्यवस्था उतनी ही विकसित मानी जायेगी,
    वर्ल्ड बैंक की सोच अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं से निकली है,
    लेकिन इन अर्थव्यवस्थाओं की दो चीज़ें भारत से अलग हैं,
    एक तो वह अर्थव्यवस्थाएं बहुत अधिक संसाधन और कम आबादी वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं,
    इसलिए वह मशीनों से उत्पादन करके फायदे में रहती हैं,
    हालांकि अब इसके कारण उन देशों में समस्याएं आ रही हैं क्योंकि सभी उत्पादन मशीनों से होने के कारण लोगों को रोज़गार नहीं मिला,
    इसलिए बाज़ार में माल खरीदने वाला ही कोई नहीं मिल रहा,
    इसकी वजह से इन अर्थव्यवस्थाओं में मंदी छाई हुई है,
    भारत में भी सरकार कारपोरेट खेती का प्लान दिमाग में रख कर चल रही है,
    इस योजना में कांग्रेस और भाजपा एक साथ हैं,
    छोटे किसानों को जानबूझ कर खत्म किया जा रहा है ताकि वह खेती छोड़ कर मजदूर बन जाए और उद्योगपतियों को सस्ते मजदूर मिल सकें,
    मोदी सरकार ने चुनाव घोषणा पत्र में कहा था कि वह फसल की लागत का दोगुना मूल्य पर किसानों से फसल खरीदेगी,
    लेकिन भाजपा सरकार अपने इस वादे से मुकर गई, यहाँ तक कि भाजपा ने अपनी वेबसाईट से इस वादे को ही मिटा दिया,
    सारे देश में किसान हर साल घाटे में खेती कर रहे हैं,
    वह जो लागत लगाते हैं वह उन्हें वापस ही नहीं मिलती,
    इसकी वजह से वह कर्ज़ लेते हैं,
    सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपया पूंजीपतियों का माफ़ कर देती है,
    इसे सरकार देश के विकास में लिया हुआ कदम कहती है,
    लेकिन किसान के कर्ज़ की माफी को देश को डुबाने वाला कदम बताती है,
    असली बात यह ही है सरकार जिनके चंदे से चुनाव जीतती है उन्हीं को पूरा देश का खजाना लुटा रही है,
    अब किसान आवाज़ उठाने के लिए मजबूर हैं,
    सारा देश अगर खाना खाता है तो किसानों का कर्जा इस देश के हर नागरिक के ऊपर चढ़ा हुआ कर्जा है,
    क्योंकि किसान ने यह कर्जा हमें खाना खिलाने के लिए ही लिया है,
    सरकार को किसानों का पूरा का पूरा कर्जा बिना किसी बहानेबाज़ी के तुरंत माफ़ कर देना चाहिए।

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar added 2 new photos.
    11 hrs ·
    क्या स्टार्ट अप इंडिया भी बोगस निकला?
    23 सितंबर के इंडियन एक्सप्रेस में एक ख़बर है।
    जनवरी 2016 में यह स्लोगन लांच हुआ था स्टार्ट अप इंडिया। भारत सरकार ने नए उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए दस हज़ार करोड़ का फंड बनाने का एलान किया था। इसकी सबने सराहना की थी और यह वाकई अच्छा कदम था।
    क्या आपको पता है कि इस दस हज़ार करोड़ में से मात्र 62 स्टार्ट अप को मात्र 70 करोड़ का फंड दिया गया है।
    इंडियन एक्सप्रेस के अनिल ससी लिखते हैं कि इस योजना के तहत डिपार्टमेंट आफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी और प्रमोशन ने सिडबी संस्था को मात्र 600 करोड़ का फंड दिया है। इसमें से 62 स्टार्ट अप को मात्र 33.63 करोड़ ही मार्च 2017 तक वितरित किए गए हैं। सितंबर तक 69.5 करोड़ ही दिए गए हैं।
    आप कहेंगे कि मंशा अच्छी थी। बिल्कुल अच्छी थी। मगर नतीजा क्या निकला? आप मीडिया स्पेस देखिए, स्टार्ट अप के नाम पर कितने लोग फोटो खींचा रहे हैं। एक अफसर तो हीरो ही बन गए हैं। कोट के पाकेट में रूमाल डाले बिना तो वे बात नहीं करते। बाकी एक्सप्रेस की रिपोर्ट आप ख़ुद भी पढ़ें।
    आज के बिजनेस स्टैडर्ड में पहली ख़बर यह है कि सरकार ब्याज़ दरें कम करने की बैटिंग करने जा रही है। सरकार बैटिंग ही कर रही है मगर रन नहीं बन रहा है। कहीं ये अंशुमन गायकवाड की तरह बल्लेबाज़ न निकले तो कई दिनों तक क्रीज़ पर रहते थे मगर रन नहीं बनाते थे। इस बल्लेबाज़ी का एक ही मक़सद है, क्रीज़ पर टिके रहने का सारा इंतज़ाम कर लो। सीबीआई आयकर लगाकर विपक्ष को ख़त्म कर दो और डरा दो। फिर कहलवाओं कि विपक्ष कहां है। जांच एजेंसियों को सत्ता पक्ष के भीतर से कोई मिलता ही नहीं है। वहां सारे साधु संत हैं।
    आर्थिक स्थिति हमेशा एक समान नहीं रहती। बदलती भी है। अभी जो नहीं हो रहा है, वो तीन साल की नारेबाज़ी और विज्ञापनबाज़ी का नतीजा है। ये हम सबके लिए ठीक नहीं है। किसी सेक्टर से तो अच्छी ख़बर आए। कहां तो 9 फीसदी जीडीपी से कम के दावे नहीं होते थे, कहां अब बात आर्थिक पैकेज देकर अर्थव्यवस्था को धक्का देने की होने लगी है।
    इसीलिए कह रहा हूं कि किसी बड़े ईवेंट, भाषण या आस्था आहत वाले मुद्दों के लिए तैयार रहिए। बिना उसके कुछ नहीं होगा। जो बेरोज़गार हैं, वो टीवी देखें और विज्ञापन तो ज़रूर देखें क्योंकि पिछली सरकार की तुलना में इस सरकार के विज्ञापन बहुत अच्छे होते हैं।Ravish Kumar
    13 hrs ·
    आवश्यकता है ढंग के वाइस चांसलरों की
    वाइस चांसलरों का भरोसा पुलिस और तोप में बढ़ता जा रहा है। बीएचयू की छात्राओं ने छेड़खानी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो ये कौन सा केमिस्ट्री का सवाल था कि वीसी ने बात करना बंद कर दिया। लाठीचार्ज शर्मनाक घटना है। क्या सत्ता के दम पर वाइस चांसलर ये बताना चाहते हैं कि लड़कियों का कोई हक नहीं इस लोकतंत्र में ? लड़कियों से कहा गया कि तुम रेप कराने के लिए रात में बाहर जाती हो । तुम जे एन यू बना देना चाहती हो। मतलब छेड़खानी सहो और उसके ख़िलाफ़ बोले तो ऊपर से चरित्रहनन।
    बावन घंटे तक धरना चला और वीसी बात नहीं कर सके। प्रोक्टोरियल बोर्ड के दफ्तर के सामने किसी लड़की के कपड़े फाड़ने के प्रयास हुए, दबोचा गया, क्या इसे कोई भी समाज इसलिए सहन करेगा क्योंकि वे ‘तेज’ हो गई हैं ! शर्मनाक है। कमाल ख़ान से लड़कियों ने कहा कि क्या हमें कोई भी छू सकता है, कहीं भी दबोच सकता है? इन सवालों को टालने की जगह के लिए राजनीति बताना और भी शर्मनाक है। आप जाँच करते, बात करते। लाठीचार्ज वो भी लड़कियों पर? क्या हिन्दू मुस्लिम टापिक पर इतना भरोसा हो गया है कि आप समाज को कैसे भी रौंदते चलेंगे और लोग सहन कर लेंगे?
    ये नारा किस लिए है? बेटी बचाओ बेटी बढ़ाओ। संसद विधान सभा में महिला आरक्षण की याद आई है, इसलिए नहीं कि देना था, इसलिए कि आर्थिक बर्बादी से ध्यान हटाने के लिए ये मुद्दा काम आ सकता है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ कराने का मुद्दा भी यही है। ध्यान हटाने को लिए बड़ा मुद्दा लाओ। तो इस लिहाज़ से भी बीएचयू की लड़कियाँ सही काम कर रही हैं। वो छेड़खानी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा कर बता रही है कि रायसीना हिल्स सिर्फ दिल्ली में नहीं है। वो कहीं भी हो सकता है।
    भूल गए आप हरियाणा की दसवीं क्लास की छात्राओं के आंदोलन को? इसी मई में 95 लड़कियाँ अनशन पर बैठ गईं थीं। बड़ा स्कूल दूर था और रास्ते में उनसे छेड़खानी होती थी। इसलिए धरने पर बैठ गई। क्या वे भी वामपंथी थीं ? क्या निर्भया के हत्यारों के ख़िलाफ़ वारंटी रायसीना पहुँचे थे? वैसे रायसीना पर पहुँचने की शुरूआत वामपंथी संगठनों ने की थी लेकिन बाद में जो हज़ारों लड़कियाँ पहुँचती कहीं क्या वे भी वामपंथी थीं ?
    वामपंथी होंगी तो भी किस तर्क से रात में कैंपस में घूमना रेप कराने के लिए घूमना है। ये कोई वीसी बोल सकता है? क़ायदे से प्रधानमंत्री को बनारस छोड़ने से पहले इस वाइस चांसलर को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए। छात्राओं से बात करने का साहस नहीं जुटा सके तो कोई बात नहीं, बर्ख़ास्त तो कर सकते हैं। कुछ नहीं कर सकते तो तोप ही रखवा दें ताकि लगे तो कि कुछ कर रहे हैं। कुछ सुन रहे हैं ।
    मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ज़िला प्रशासन
    ने कई बार वीसी से कहा कि बात कीजिये। प्रधानमंत्री को इसी की रिपोर्ट माँगनी चाहिए कि वीसी ने क्या क्या किया। लड़कियों का धरना स्वत:स्फ़ूर्त था। कोई समर्थन करने आ गया तो राजनीतिक हो गया? वीसी ने राजनीतिक
    बता कर बात करने से इंकार किया तो क्या वे ख़ुद पक्षकार नहीं बन गए? वे किस राजनीति के साथ हैं?
    बहाने मत बनाइये । साफ साफ कहिए कि आप लड़कियों को मुखर होते नहीं देखना चाहते। लड़कियों की आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी के ख़िलाफ़ सामंती घृणा फैलाते रहिए। उनमें इतनी हिम्मत और समझ है कि अपनी बेहतरी का रास्ता चुन लेंगी। बाहरी का बहाना नहीं चलेगा।
    वैसे बीएचयू के प्रोफेसर क्या कर रहे हैं?
    नोट: आई टी सेल का शिफ़्ट शुरू होता है अब। आओ। तुम जो कर लो, माँ बाप को नहीं बता सकते कि थर्ड क्लास नेताओं के लिए तुम सवाल करने वालों को गालियाँ देते हो। उन्हें पता चल गया तो कान धर लेंगे। तुम जिस नेता के लिए ये सब कर रहे है, वो जल्दी ही तुमको फेंकने वाला है। अपनी छवि चमकाने के लिए वो कुछ और करने वाला है।
    अलग से: बहुत नीचे तक कमेंट पढ़ता रहा। ज़्यादातर लड़कों के ही कमेंट हैं ।
    See Translation——————————————————-Sanjay Tiwari
    10 hrs ·
    कम्युनिस्टों ने साजिश के तहत बीएचयू को बदनाम करने की कोशिश की लेकिन बीएचयू के छात्रों ने उनकी पोल खोल दी।-Sanjay Tiwari

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  3. सिकंदर हयात

    Arun Maheshwari
    Yesterday at 03:51 ·
    ‘सौभाग्य’ किसका ? ग़रीबों का या पश्चिमी साम्राज्यवादियों का !
    -अरुण माहेश्वरी
    मोदी ने ग़रीबों को मुफ्त बिजली देने का एक नया धोखा रचा है । ‘सौभाग्य’ नाम की इस योजना को रखते वक़्त उन्होंने अपनी सरकार के ग़रीब-प्रेम की लफ्फाजी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी । भारत में बिजली की अवस्था का जानकार हर व्यक्ति जानता है कि यह सरासर एक धोखा है । इसमें धोखे की इंतिहा तो तब और साफ हो गई जब मोदी ने बिजली न होने पर सबको सोलर पावर की सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही ।
    मोदी-जेटली के ग़रीब-प्रेम के धोखे की सचाई को आज अंधा आदमी भी देख सकता है । बिजली को छोड़िये, यह तो एक चुनावी शोशा है, इनकी असलियत जाननी है तो जरा गहराई से देखिये, इन्होंने जीएसटी में सबसे ज्यादा निशाना किन चीज़ों को बनाया है ?
    रोटी, कपड़ा और मकान को । उन चीज़ों को जिनके बिना आदमी जी नहीं सकता है ।
    भारत के इतिहास में पहली बार अनाज पर कर लगाया गया है । अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाया था, उसके प्रतिवाद में पूरा देश उठ खड़ा हुआ था । गांधी जी ने दांडी मार्च और प्रतीकी तौर पर नमक का उत्पादन करके अंग्रेज़ों के उस कर को खुली चुनौती दी थी । मोदी-जेटली ने खाने-पीने की तमाम चीजों पर कर लगा कर उससे कम बड़ा अपराध नहीं किया है । इस मामले में ये अंग्रेज़ों के भी बाप निकले हैं ।
    इसी प्रकार, कपड़े के व्यापार पर भी जीएसटी के रूप में पहली बार कोई कर लगा है । बीच में एक बार तैयारशुदा कपड़ों पर पिछली एनडीए सरकार ने उत्पाद-शुल्क लगाया था जिसे उसे बाद में वापस लेना पड़ा था ।
    इन्हीं कारणों से जीएसटी के खिलाफ देश भर के अनाज और कपड़ा व्यापारी लगातार आवाज उठा रहे हैं । यह कर भारत के प्रत्येक आदमी से वसूला जायेगा, भले वह अमीर हो या ग़रीब ।
    इसी प्रकार मकान का भी विषय है । रीयल इस्टेट के नाम से बदनाम इस क्षेत्र का बोझ भी हर आदमी पर पड़ेगा ।
    और सर्वोपरि, तेल और रसोई गैस के दामों में मनमानी वृद्धि । इसके बारे में अलग से कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है ।
    ये वे बुनियादी कारण है जिनके कारण भारी मंदी में फँस चुकी अर्थ-व्यवस्था में भी महँगाई अर्थात मुद्रा-स्फीति की बीमारी भी दिखाई दे रही है ।
    इनके विपरीत, इस सरकार ने लग्ज़री की चीज़ों पर कर कम किया है ।
    जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की चीज़ों से अधिकतम कर वसूली की नीति पर चलने वाली एक सरकार अपने को ग़रीब-हितैषी बताए, इससे बड़ा ढकोसला और क्या हो सकता है !
    इन करों से ही यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार ने अर्थ-व्यवस्था का जो भट्टा बैठाया है, उसके सारे बोझ को वह भारत के ग़रीबों पर लाद दे रही है ।
    मोदी की नोटबंदी के कारण जीडीपी में लगातार गिरावट से सामान्य अार्थिक गतिविधियों से कर वसूलने की इनकी क्षमता बुरी तरह से कम होती जा रही है । अब वे सीधे ग़रीबों पर डाका डाल कर इसकी कमी को पूरा कर रहे हैं ।
    और, सबसे मजे की बात यह है कि इनके सारे भक्त इस प्रकार ग़रीब जनता से वसूले गये राजस्व को मोदी-जेटली जुगल जोड़ी की आर्थिक नीतियों की सफलता बता रहे हैं !
    जिस बिबेक देबराय ने नोटबंदी के समय कहा था कि इससे 2 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आयेंगे और कालाधन पर कर से अतिरिक्त 50 हज़ार करोड़ का आयकर वसूला जा सकेगा, ऐसा गप्पबाज अर्थशास्त्री अब प्रधानमंत्री का प्रमुख आर्थिक सलाहकार बन गया है ।
    कोई भी अनुमान लगा सकता है, आगे और क्या-क्या होने वाला है ।
    अभी विश्व अर्थ-व्यवस्था का वह काल चल रहा है जब ‘पहले अमेरिका’ का नारा दे रहा डोनाल्ड ट्रंप हर संभव कोशिश करेगा कि वह अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में निवेश को बढ़वाये । इसके लिये वह अपने यहाँ ब्याज की दरों को बढ़ायेगा जो वहाँ अभी लगभग शून्य के स्तर पर चल रही है । अमेरिका में ब्याज की दरों में वृद्धि भारत से विदेशी पूँजी के पलायन का रास्ता खोलेगी, जिसके बल पर मोदी सरकार अभी तक किसी तरह अपना काम चला पा रही है ।
    देबराय घोषित रूप से विदेशी पूँजी का भक्त अर्थशास्त्री होने के नाते वह मोदी को ऐसी हर सलाह देगा जिससे भारत की तमाम संपत्तियाँ, इसके कल-कारख़ाने, खदान और कच्चा माल विदेशियों के हाथों बिक जाए । भारत के तेज़ी से गिर रहे जीडीपी को अब बढ़ाना किसी के वश का नहीं रह गया है, जब तक नोटबंदी के कुप्रभावों के साथ ही जीएसटी की अराजकता और तेल पर ज्यादा से ज्यादा कर के जरिये सरकार के चालू वित्तीय घाटे को पूरा करने की परिस्थिति ख़त्म नहीं होती है ।
    इसीलिये देबराय हो या दूसरा कोई आर्थिक सलाहकार, मोदी ने जो अराजकता पैदा कर रखी है, उसे बिना विदेशी पूँजी की सहायता के सम्हालना किसी के लिये मुमकिन नहीं होगा ।
    और, सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि मोदी के राजनीतिक डीएनए में विदेशियों को अपना सब कुछ लुटा देने की नीति के प्रतिरोध की कोई क्षमता नहीं है । वे भले सभी पर राष्ट्र-विरोधी होने का तक्मा लगाते रहे, लेकिन सचाई यही है कि आरएसएस और उनकी राजनीति का जन्म ही विदेशी शासकों की दलाली के बीच से हुआ है ।
    और, इस प्रकार आने वाला समय अर्थ-व्यवस्था में ऐसे असंतुलन का समय होगा जब भारत की आर्थिक सार्वभौमिकता पूरी तरह से दाव पर लगी हुई दिखाई देगी । मोदी जी अचकन पहन कर पश्चिम के नेताओं से जितनी ज्यादा गलबहिया करते दिखाई देंगे, भारत पर उतनी ही ज्यादा उनकी जकड़बंदी बढ़ती जायेगी । देबराय इस काम में जरूर मोदी के सहयोगी बनेंगे ।
    सच कहा जाए तो मोदी आज भारत में पश्चिमी साम्राज्यवादियों के दूत का काम कर रहे हैं । और ये अपने को ग़रीब-हितैषी बता रहे है !Arun Maheshwari————————-Ravish Kumar
    7 hrs ·
    बीमा से कौन है बमबम: किसान या बीमा कंपनी
    the wire पर ख़बर छपी है कि टाइम्स आफ इंडिया के जयपुर संस्करण ने फ़सल बीमा योजना पर अपनी ख़बर हटा ली। सरकार का दबाव? इस ख़बर में संवाददाता ने लिखा है कि फ़सल बीमा योजना से बीमा कंपनियों को कई हज़ार करोड़ का मुनाफ़ा हुआ है। किसानों को कुछ नहीं मिला। जब ये योजना लाँच हो रही थी तभी प्राइम टाइम के दो तीन शो तो किए ही होंगे कि किस तरह यह योजना बीमा कंपनियों को अमीर बनाने के लिए है। आप पुराने शो देख सकते हैं। ख़ैर किसानों के लिए नहीं है। तब लोगों ने सुना नहीं, उल्टा गालियाँ दी कि आप मोदी का विरोध कर रहे हैं।
    इस पोस्ट के कमेंट भी यही लोग कहेंगे मगर आप दस बीस किसानों को फोन करके पूछ सकते हैं। अपवाद छोड़ दें तो किसान ठगा ही गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश से कई ख़बरें आईं कि बीमा के नाम पर दस रुपये बीस रुपये मिले हैं। जबकि बीमा कंपनियों ने प्रीमियम जमकर वसूला है।
    आए दिन ख़बरें आ रही हैं कि कभी दबाव में संपादक को हटाया जा रहा है तो कभी ख़बरें हटाई और दबाई जा रही हैं। वायर पर ही हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को हटाए दिए गए। आप थोड़ी मेहनत कर इन ख़बरों को पढ़िए और समझिए तो। आपकी चुप्पी भी ग़ज़ब है।
    हमलोग फेसबुक पर लिख देते हैं, सरकार को पता है कि हम लोग लिखकर कितने लोगों तक पहुँचेंगे। मेनस्ट्रीम मीडिया क़ब्ज़े में है। सरकार उसके सहारे जो चाहे कर लेगी। वो अपना नैरेटिव फैला कर इन सवालों को आराम से कुचल देगी। किसानों के लिए तो जनता बोल सकती है, पत्रकारों के लिए भले न बोले।
    टाइम्स आफ इंडिया को ज़्यादा लोग पढ़ते होंगे, शायद इसलिए स्टोरी हटवाई गई होगी। कुछ दिन पहले डाउन टू अर्थ पत्रिका ने फ़सल बीमा के फ़र्ज़ीवाड़े पर विस्तार से रिपोर्ट छापी है। कवर की तस्वीर दे रहा हूँ ।—————————Ravish Kumar
    Yesterday at 08:41 ·
    बीएचयू के वीसी ही देश का सौभाग्य हैं ।
    सौभाग्य और नया इंडिया का ब्रांड अंबेसडर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को बना देना चाहिए। ये देश का सौभाग्य है कि बीएचयू को ऐसा योग्य वीसी मिला है। उन्हें ब्रांड अंबेसडर न बनाया जाना सौभाग्य के लिए दुर्भाग्य होगा। नया इंडिया के लिए उनके विचार ‘गया इंडिया’ का अहसास कराएँगे। नया ईंवेंट आ गया है। नया ब्रांड अंबेसडर भी आना चाहिए।
    भारत की लड़कियाँ अपना रास्ता तय करेंगी। उनके परिवार के लोग देखें कि नया इंडिया के नाम पर सारा ख़र्चा विज्ञापन में हो रहा है या ज़मीन पर भी कुछ हो रहा है। वाइस चांसलर की गरिमा गिराने का श्रेय पूर्ववर्ती और मौजूदा सरकार दोनों को जाना चाहिए। राज्य सरकारें भी चापलूस भरने में कम नहीं हैं। एक ही वीसी क्यों, आप लाइन से देखिए, क्या हालत हो गई शिक्षा संस्थानों की। जानबूझ कर यूनिवर्सिटी को बर्बाद किया जा रहा है ताकि नौजवान राष्ट्रवाद की आड़ में हिन्दू मुस्लिम टॉपिक खेलते रहें। आप पास के किसी भी यूनिवर्सिटी चले जाइये, नया इंडिया गया इंडिया लगेगा। बोगस स्लोगन से राष्ट्र का निर्माण नहीं होता है।
    आप जिन थर्ड क्लास नेताओं की भक्ति में झोंटा झोंटी करते रहते हैं, उनकी पूजा ख़त्म हो गई हो तो ज़रा अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए सोचें। क्या यूनीवर्सिटी को बर्बाद कर देने में भी आप अपना भला समझ रहे हैं? लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी का मामला इतना बड़ा तो था कि वीसी तुरंत हस्तक्षेप कर सकते थे। इससे उनकी तारीफ ही होती। बाहरी बाहरी ऐसे किये जा रहे हैं जैसे अपने छात्रों को कम बाहरी को ही ज़्यादा जानते हों। कई बार कहा कि बीएचयू में पेट्रोल बम चलते हैं, जिस तरह से बम बम कर रहे थे, लगा कि पेशावर यूनिवर्सिटी के वीसी से बात कर रहा हूँ। अगर बीएचयू में इतनी आसानी से बम चलते हैँ तो इसे देशहित में जेएनयू बनाना अपरिहार्य हो जाता है। जेएनयू में छात्र पढ़ाई के साथ राजनीति भी करते हैं। कोई बम नहीं चलाता। टैंक की सबसे अधिक ज़रूरत बीएचयू को है। सरकार तत्काल टैंक उपलब्ध कराए ताकि जब बीएचयू में पेट्रोल बम चले तो वीसी साहब टैंक में बैठकर मोर्चे पर जा सकें।
    ये तर्क और कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ हिन्दू मुस्लिम ज़हर में गहरे यक़ीन से आते हैं। चाहें अपने बच्चे बर्बाद हो जाएँ , पुलिस लाठियों से लड़कियों को पीट दे, जनता हिन्दू मुस्लिम नफरत से बाहर निकलकर इसे नोटिस भी नहीं करेगी। जब आप चुनाव के लिए राजनीति नहीं करते तो यही बता दीजिए कि ये एक से एक वीसी कहाँ से और किसलिए लाए हैं। किस बात का गुस्सा है जो आप देश के नौजवानों से निकाल रहे हैं। नौजवान बता दें कि ये कौन सा फ़िज़िक्स का सवाल है कि विनाश का खेल समझ नहीं आ रहा है।

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  4. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari
    13 hrs ·
    नोटबंदी और जीएसटी में कौन मरा? लालाजी। वही भारत के सबसे भ्रष्ट आदमी थे क्योंकि दस बीस करोड़ कमाकर लोगों को नौकरी तो दे देते थे लेकिन पूरा टैक्स नहीं देते थे। इसलिए मोदी जी ने कहा पहले इस लाला को लाल करो। सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी और काला कारोबारी यही है। जो लुंगी धोती और शर्ट पैण्ट वाला है वह इसी बात से खुश हो गया कि मोदी जी ने लाला को लाल कर दिया क्योंकि उसकी नजर में सबसे बड़ा पूंजीपति तो वही है।
    लेकिन उनके इस दोहरे सर्जिकल स्ट्राइक से बड़े वाला लाला जैसे मुकेश अंबानी, टाटा समूह, अजीम प्रेमजी, गौतम अडानी आदि तो लाल टमाटर ही हो गये। एक साल में इतना फायदा कमाया है जितना मनमोहन के दस साल में नहीं कमा पाये थे। यकीन न हो तो फोर्ब्स की १०० अरबपतियों वाली लिस्ट देख लीजिए।
    आप ही बताइये “प्यारे गरीबों” के लिए और कितना काम करें मोदीजी?
    See TranslationSanjay Tiwari
    14 hrs ·
    भारत में जो शीर्ष के सौ उद्योगपति हैं उनकी पूंजी है ३१ लाख करोड़। भारत सरकार के कुल बजट का दोगुना। ऐसे दौर में जब नोटबंदी और जीएसटी के कारण छोटे व्यापारी बदहाल हैं, शीर्ष के सौ उद्योगपति मालामाल हैं।
    जाहिर है, जिनके फायदे के लिए नोटबंदी और जीएसटी का षण्यंत्र रचा गया उनको फायदा पहुंच चुका है। जब तक सरकार में प्यारे गरीबों के मालिक मोदी मौजूद हैं अमीरों की माली हालत में लगातार सुधार होता रहेगा। लेकिन इस बात की पूरी गारंटी है कि उनकी हालत में कोई सुधार नहीं होगा जो फेसबुक पर बैठकर मोदी मोदी करते रहते हैं।Sanjay Tiwari
    Yesterday at 09:46 ·
    Gst में वादा किया गया था कि सभी राज्य टोल नाका खत्म कर देंगे। लेकिन खत्म नहीं हुआ। ट्रकों को राज्य में प्रवेश का कर अभी भी देना पड़ रहा है और जीएसटी ऊपर से अलग लद गयी। लिहाजा, ट्रक यूनियन दो दिन के हड़ताल पर जा रही है।
    महत्वपूर्ण बात ये भी है कि इस समय १८ राज्यों में बीजेपी की सरकार है जो मोदी की जीएसटी के बाद भी ट्रकों से टोकन मनी वसूल रहे हैं।Sanjay Tiwari
    Yesterday at 09:13 ·
    राष्ट्र के नाम पर मोदी सरकार द्वारा प्यारे गरीबों से जो वसूली हो रही है उसमें से तीन सौ अरब रूपये कल बांग्लादेश को कर्ज के रूप में दिये गये हैं। इन पैसों का इस्तेमाल बांग्लादेश में औद्योगिक क्षेत्र बनाने, सड़क दुरुस्त करने, परमाणु बिजलीघर लगाने और पोर्ट दुरुस्त करने के लिए किया जाएगा। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत के उद्योगपतियों को बांग्लादेश में व्यापार मिल सके।—————-Arun Maheshwari
    3 hrs ·
    गौरी लंकेश की हत्या में ‘सनातन संस्था’ नामक उसी हिंदू आतंकवादी संगठन का हाथ है जिसने एम एम कलबुर्गी, पानसारे और डाभोलकर की हत्या की थी । कर्नाटक के गृहमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राज्य पुलिस की एसआईटी के हाथ इसके पक्के सबूत लग गये हैं । ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की आज की इस खबर में इन हत्याओं में शामिल पाँचों अपराधियों के नाम प्रकाशित किये गये हैं । यही संस्था गोवा में मडगाँव बम विस्फोट के लिये भी ज़िम्मेदार रही है ।Arun Maheshwari
    9 hrs ·
    आजादी के इन सत्तर साल में पहली बार, मोदी के तुगलकी शासन की बदौलत, भारत में रोज़गारों में वृद्धि तो दूर की बात, उनमें कमी आई है । 2013-14 से लेकर 15-16 के बीच लाखों लोग रोजगार गँवा चुके हैं । ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वकीली’ के 23 सितंबर के अंक में विनोज अब्राहम के इस अध्ययन को पढ़िये । यह किसी भी सरकार के लिये डूब मरने की बात है । मोदी अकेले इसी अपराध के कारण सत्ता पर रहने के नैतिक अधिकार को गँवा चुके हैं ।सरकार में आ कर एक भी आदमी को नौकरी देना तो दूर की बात, ये सीधे तौर पर नौकरियाँ छीन रहे है ।Arun Maheshwari
    10 hrs ·
    जीएसटी कौंसिल की कल की बैठक दिलचस्प होगी
    कहते है कि कल जीएसटी कौंसिल की बैठक में व्यापारियों को कुछ छूट दी जायेगी, क्योंकि मोदी जी ऐसा चाहते हैं । उन्हें तत्काल गुजरात की यात्रा पर जाना है । बिना ऐसा किये वे जा नहीं पा रहे हैं ।
    सवाल है कि जीएसटी कौंसिल को क्या जन्म के साथ ही प्रधानमंत्री की मुट्ठी में क़ैद कर दिया गया है ? जीएसटी कौंसिल के नियम के अनुसार उसे हर कदम सर्व-सम्मति से करने होंगे । अर्थात कोई भी एक राज्य यदि किसी कदम का विरोध करता है तो उसे लागू नहीं किया जा सकेगा ।
    देखना है, कल क्या होता है ? क्या सभी राज्य मोदी के रबड़ स्टैम्प की तरह काम करेंगे ? अगर नहीं, तो देखना है कि मोदी कैसे अपनी मर्ज़ी को जीएसटी कौंसिल से मनवाते हैं ? या क्या यह सारा मामला एक और राजनीतिक स्टंट का रूप लेने वाला है ? या जीएसटी कौंसिल को उसके जन्म के साथ ही मौत के घाट उतार दिया जायेगा ?
    See TranslationArun Maheshwari
    22 hrs ·
    मोदी जी की मुद्रा-ग्रंथी
    मोदी जी अक्सर मुद्रा के बारे में चर्चा करते हुए बेहद उत्साही दिखाई देते हैं ।
    हमने रुपये का रूप बदल दिया ; हजार के नोट को बंद करके दो हजार और दो सौ के नये नोट जारी कर दिये ; पांच सौ और पचास के नोटों को चमका दिया । इसके अलावा उनकी उपलब्धता में भी कमी कर दी ।
    इस विषय पर प्रधानमंत्री के उत्साह को देख कर ऐसा लगता है जैसे मुद्रा महज मुद्रा नहीं, पूरी अर्थ-व्यवस्था का पर्याय हो ! मुद्रा के रंग-रूप अर्थात उसकी शक्ल-सूरत में ही किसी देश की समृद्धि और गरीबी के सारे राज छिपे हुए हो ! वह जितनी सुंदर होगी और जितनी विरल होगी और सर्वोपरि यदि वह ईश्वर की तरह अमूर्त, अदृश्य होगी तो फिर तो कहना ही क्या ! वह ईश्वरीय सत्ता की तरह सारे ब्रह्मांड पर राज करेगी ।
    प्रधानमंत्री समझते है कि अर्थ-व्यवस्था को टन-टनाटन करने, एकदम चमका देने का इससे अच्छा और क्या रास्ता होगा ! लोग सुंदर और नये-नये नोटों को हसरत भरी नजरों से निहारेंगे, अमूर्त मुद्रा (कैशलेस) की पूजा करेंगे — बस सबके चेहरे चमकने लगेंगे ! जीवन में अर्थशास्त्र की इससे इतर और बेहतर भला क्या भूमिका हो सकती है ! स्वच्छता से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा, जन-कल्याण के सभी मामलों में जब कोरे प्रचार से काम चल जाता है, तब फिर अर्थशास्त्र में यह प्रतीकात्मकता क्यों नहीं चलेगी !
    प्रधानमंत्री इसीलिये मुद्रा के विषय में आंखें टमकाते हुए जितना मठार-मठार कर बोला करते हैं, उनकी खुशी और उनका चमकता हुआ चेहरा सचमुच देखते बनता है !
    मुद्रा के ऐसे महात्म्य के उनके बखानों को सुन कर मानना पड़ता है कि कोई माने या न माने, वे वास्तव में विश्व गुरू हैं । अपने मंत्रों से विनिमय के काम में आने वाले इस मामूली औजार को उन्होंने अर्थनीति का पर्याय बना डाला ।
    मन में सवाल आता है कि प्रधानमंत्री ने इन मंत्रों को किस गुरू की सोहबत से सीखा ? क्या यह मनि लांड्रिंग करने वालों की शागिर्दी का परिणाम है कि उन्हें मुद्रा का व्यापार ही दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार दिखाई देने लगा है ? हाल में ही अडानियों की बेइंतहा मनि-लांड्रिंग के बारे में ढेर सारे तथ्य सामने आ रहे हैं ।
    क्या कहा जाए एक देश के प्रधानमंत्री के अर्थनीति के बारे में इस ‘महाज्ञान’ को ?
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    Top commentsUrmilesh Urmil
    2 hrs ·
    पहले ‘बोट क्लब’ से हटाया गया। अब आदेश हुआ है कि देश भर से आने वाले प्रदर्शनकारी ‘जंतर मंतर’ पर भी डेरा-डंडा नहीं डाल सकते! यमुना को बर्बाद करने वाले अमीर ‘श्री संत महराजों’ का ‘वैश्विक जलसा’ तो रोक नहीं पाते, गरीब जनता और आम लोगों पर बंदिश लगा रहे हो! अब लोगों को सत्ता-केंद्र से कोसों दूर ‘रामलीला मैदान’ जाने को कहा जा रहा है, जहां पास में ही एक बड़ा शिक्षा केंद्र और आसपास बाजार है। Urmilesh Urmil
    16 hrs ·
    इन दिनों ज्यादातर ‘संत, स्वामी, गुरु, महाराज और आचार्य लोग’ प्रकृति और ईश्वर की नजदीकियां नहीं तलाशते। वे राजनेताओं, कारपोरेट और ‘मीडिया-मुगलों’ से दोस्ती गांठते हैं! इन तीनों की नजदीकी और कृपा से ‘उनका ईश्वर’ उन्हें आसानी से मिल जाता है! बदले में वे भी इन तीनों पर कृपा करते हैं! कितने दिव्य हैं इक्कीसवीं सदी के ‘संत, स्वामी, गुरु और महराज!’
    जय जनतंत्र!Urmilesh Urmil
    20 hrs ·
    क्या अनोखा जनतंत्र है? कोई आलोचना करने या असहमति जताने पर मारा जाता है(प्रो कलबुरगी और गौरी लंकेश आदि), किसी न किसी बहाने कोई जेल में डाल दिया जाता है(चंद्रशेखर रावण, अखिल गोगोई आदि) और किसी पर शासकीय या निजी मामले थोप दिये जाते हैं(अनेक प्रोफेसर, छात्र और पत्रकार आदि)! अब देखिए न, मशहूर कन्नड़ फिल्म स्टार प्रकाश राज पर लखनऊ में एक मामला ठोंका गया है! Link:
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  5. सिकंदर हयात

    Sheetal P Singh
    6 hrs ·
    तरक़्क़ी
    बीएसएनएल कहीं दिखता है अब ? तीन बरस में सरकारी टेलीकाम को रिलायंस के सामने आत्महत्या के लिये मजबूर कर दिया गया है । तिल तिल कर मर रहा है । फ़ोर जी के सारे इक्विपमेंट्स बीएसएन एल के गोदामों में जंग खा रहे हैं क्योंकि “जियो” के हाथ बाज़ार लुटवाना जो है !
    रेलवे को इतना तबाह किया जा रहा है कि पबलिक ख़ुद चीख पड़े कि इसे प्राइवेट कर दो मोदी जी ! रोज़ एक्सीडेंट्स , एक एक दिन में कई कई पर लोग बड़े चीकट हैं अब भी नहीं मान रहे !
    एयर इंडिया तो बाज़ार में For Sale का बोर्ड लगाकर ख़ुद ही खड़ा हो गया है !
    शिक्षा पहले ही नर्सरी प्रायमरी और सेकंडरी छेत्र में पूरी तरह प्रायवेट कलाकारों के रहम पर जा चुकी है अब इमारतें और जमीन जो सरकार के पास बची है वह भी नीलामी करने की योजनाएँ विभिन्न राज्यों में बन रही हैं ।
    स्वास्थ्य के छेत्र में सरकार का मतलब सिर्फ स्वास्थ्य का बीमा करवाने के एजेंट का बच रहा है जो प्रायवेट बीमा कंपनियों की लार टपकाती जीभ की प्यास बुझाने में ख़र्च हो रहा है ।रक्षा का सरकारी क्षेत्र बीते सत्तर साल से कुबेरों की आँखों में खटक रहा था अब खुला मैदान है जिसे अंबानी अडानी चर रहे हैं !वे मुझसे पूछते हैं कि इस सरकार ने कुछ उल्लेखनीय नहीं किया ? उन्हीं को अर्पित हैं यह चंद पंक्तियाँ ! कितना कुछ तो किया है !Sheetal P Singh
    Yesterday at 18:28 ·
    रामगढ़ झारखंड
    बीजेपी ने केंद्र और राज्यों में क़ानून के राज को टारगेटेड जंगल राज में बदल दिया है और जिन राज्यों में वह विपक्ष में है वहाँ खुलेआम सांप्रदायिकता और हिंसक घटनाओं में शामिल पाई जा रही है ।
    देश भर में वामपंथियों /धर्मनिरेपेक्ष और मानवतावादी लोगों / दलितों और पिछड़ों और ख़ासकर मुसलमानों को हमलों का निशाना बनाया जा रहा है अब हालत यह हो गई है कि बीजेपी वालों के खिलाफ दर्ज मामलों के गवाहों की जान ख़तरे में पड़ गई है । रामगढ़ (झारखंड) से ऐसी ही सूचना मिली है ।
    रामगढ़ में मॉब लिन्चिंग से शिकार हुए अलीमुद्दीन अंसारी के केस के गवाह जलील अंसारी की पत्नी की हत्या की खबर आ रही है. आज उस केस में कोर्ट में जलील की गवाही थी.
    उनका कहना है कि बजरंग दल और भाजपा के लोगों ने उन्हें और उनकी पत्नी को गवाही न देने के लिए कोर्ट परिसर में ही जान से मारने की धमकी दी. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब उनकी पत्नी बेटे के साथ पहचान पत्र ले आने के लिए कोर्ट से घर को निकलीं तो करीब एक किमी दूर तक उनका पीछा करके गाड़ी के धक्का मारा गया, जिसमें जलील की पत्नी की मौत हो गई है और बेटा अस्पताल में भर्ती है.—————–Awesh Tiwari
    3 hrs · Varanasi ·
    यह खबर बनारस से है और चौंकाती है| जय शाह के खिलाफ खबर लिखने वाली रोहिणी सिंह ने अपनी सुरक्षा के लिए काशी के काल भैरव मंदिर में “शत्रु शमन अनुष्ठान” शुरू करवाया है | इस बात में कोई दो राय नहीं है कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद देश भर में पत्रकारों की सुरक्षा खतरे में हैं| यह अनुष्ठान करा रहे काल भैरव मंदिर के पंडित राजेश मिश्र ने बताया है कि तीन दिन पहले रोहिणी ने उनसे संपर्क किया था जिसके बाद उन्होंने 8 दिनों का अनुष्ठान शुरू किया है| मुझे नहीं लगता किसी पत्रकार को ऐसे अनुष्ठान कराने चाहिए, आस्था की बात अलग है| \क्या यह मुमकिन है कि पत्रकारों को धमकी देने का यह नया अंदाज है कहीं ऐसा तो नहीं कि रोहिणी सिंह के विरोधी उनकी सुरक्षा के नाम पर सोची समझी साजिश के तहत वितंडावाद खड़ा करवा रहे हैं ? इन सबका जवाब रोहिणी सिंह को ही देना होगा|———————————-
    See Translation—-अपने बड़े अंबानी सर के लिये बहुत दुखी फील कर रहा हूँ। इतनी बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि, लेकिन कहीं कोई शोर नहीं, न अभिनंदन समारोहों का कोई सिलसिला।
    मात्र एक वर्ष में उनकी संपत्ति में 67 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उद्योगपतियों के संदर्भ में शायद यह वर्ल्ड रिकार्ड ही हो, क्यों कि सत्ता को अपनी जेब में रख कर नीतियों की ऐसी उलट पुलट अन्य किसी ज़िंदा देश में संभव नहीं।
    उन्हें ही क्यों, भारत वासियों को अपने देश के 100 सबसे अमीर लोगों की मूर्त्तियां अपने गांव-शहरों के चौराहे पर लगा कर उन्हें फूल मालाओं से लाद देना चाहिये। जिस देश की वृद्धि दर 5-6 प्रतिशत के आसपास चक्कर लगा रही हो, उसमें इन 100 लोगों की संपत्ति औसतन 26 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।
    यानी, अंबानी के नेतृत्व में इन अमीरों ने भारत की वृद्धि दर के लाभों पर डाका डाल कर सारा माल अपने गोदामों में भर लिया। इन पुण्यात्माओं का सार्वजनिक सम्मान तो होना चाहिये था न।
    ‘नेशन फर्स्ट’ का राग अलापने वाले बड़े अंबानी के इस विश्व रिकार्ड पर मीडिया बावला क्यों नहीं हो रहा? नीता मैम की शानदार, सदाबहार मुस्कुराहट के साथ सहज, सौम्य दिखने वाले बड़े अंबानी की फोटो अखबारों में आनी चाहिये थी न…इस संदेश के साथ…कि “शुक्रिया मेरे देश, हम तुम्हें लूटते रहे, लेकिन तुम कुछ नहीं बोले…।”
    मुझे तो आश्चर्य हो रहा है साहब पर। अक्सर ट्वीट का जादू बिखेरने वाले साहब ने इस विश्व रिकार्ड पर कोई ट्वीट क्यों नहीं किया? क्या है ऐसा, जो साहब छुपाना चाहते हैं, मीडिया छुपाना चाहती है?
    -Hemant Kumar Jha

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  6. सिकंदर हयात

    Satyendra PS
    1 hr · Ghaziabad ·
    रेल मंत्री रेल में घूम घूमकर पूछ रहे हैं कि बताइए, आपको कोई कष्ट तो नहीं है!
    पीयूष गोयल की यह पहल अच्छी है। पीयूष गोयल खानदानी नेता हैं। उनके बाप भी भाजपा के बड़े नेता और मंत्री भी रहे हैं। स्वाभाविक है कि उन्होंने कभी ट्रेन में यात्रा नहीं की होगी और अगर की होगी तो एसी फर्स्ट क्लास से नीचे न उतरे होंगे।
    ऐसे में अगर वह सचमुच यात्रियों की तकलीफ समझना चाहते हैं तो अच्छी बात है। लेकिन उनके चरित्र पर शक होता है।
    शक की वजह यह है कि यह पूरी सरकार ही नाटकबाजों और फर्जीवाड़ों की सरकार है। इसके पहले रेल मंत्री सुरेश प्रभु ट्वीट करने पर बच्चों को दूध पहुंचाते थे! मीडिया में खूब खबरें आईं। मुझे समझ मे न आया कि यह क्या नौटंकी है?
    आखिरकार एक बार स्लीपर क्लास में यात्रा करते हुए मैंने सुरेश प्रभु को 5-7 ट्वीट किया कि मेरी रिजर्व सीट पर ढेर सारे लोग कब्जा किये हुए हैं कम से कम मेरी सीट ही खाली करा दें, मुझे डर लग रहा है कि यह लोग जबरी खाली करने की मेरी कवायद पर मुझे पीट सकते हैं! प्रभु जी का कोई जवाब न आया। बहरहाल जब बहुत रात हो गई तो सीट पर बैठे लोगों से कुछ प्यार से बातकर और कुछ हड़काकर मैंने ही सीट खाली कराई और शेष रात की यात्रा किसी तरह काट ली।
    दिव्य ज्ञान तो पहले से था कि रेल यात्रा बहुत पीड़ादायक है और ट्वीट से समस्या हल करना सम्भव नहीं है। रेलमंत्री अखबार में जगह पाने के लिए सिर्फ नौटंकी कर रहा है। उसे प्रायोगिक तौर पर भी आजमाया।
    रेल के जनरल बोगी में हजार समस्या है। पहली तो पीयूष गोयल के पीछे सुरक्षा कर्मी दिख रहा है और इससे लगता है कि रेल अधिकारियों ने इस कथित यात्रा का प्लान बनाया होगा, उस बोगी में सीमित यात्रियों को ही सिपाहियों ने घुसने दिया होगा, तब मंत्री साहब जनरल बोगी में घुस पाए।
    अगर किसी सामान्य ट्रेन में देखें तो नई दिल्ली स्टेशन पर जनरल बोगी में घुसने के लिए 400- 500 लोगों की लाइन लगती है। कुली और पुलिस वाले लाइन लगने से बचाने और सीट दिलाने के लिए पैसे लेते हैं। मंत्री जी बताएं कि उन्होंने जनरल बोगी में घुसने के लिए कितने रुपये दिए ?
    जनरल बोगी में बैठने के आधे घण्टे के भीतर ट्रेन में हिजड़े पहुंचते हैं जो ताली बजाकर पैसे मांगते हैं। न देने पर गालियां देते हैं, गाल वगैरा नोचने लगते हैं, थप्पड़ तक मार देते हैं। गोयल जी बताएं कि उन्होंने थप्पड़ खाने के बाद पैसे दिए या ताली बजाने वाले स्टेप पर ही दे दिया ? यह दिल्ली से लेकर मुम्बई लोकल तक मे हाल में मैंने देखा है।
    थोड़ी रात होने पर पुलिस/ आर पी एफ के सिपाही पहुंचते हैं। वह यात्रियों से पैसे वसूलते हैं। स्वाभाविक रूप से पैसे न देने या हीलाहवाली करने वाले को मारते हैं और उसकी जेब से पैसे निकाल लेते हैं जिससे टेरर हो जाता है और यात्री खुद ब खुद पैसे देने लग जाते हैं। गोयल साहब के साथ कैसी गुजरी ?
    कैंटीन वाले 40 रुपये दाम वाला खाना 80 रुपये में देते हैं जिसमें दो पराठे, घटिया सी दो सब्जियां, दाल और अचार का एक टुकड़ा होता है। अगर भूख लगी हो तो दो प्लेट खाने पर ही पेट भरता है। गोयल साहब को खाना कितने में मिला ? मैं तो अक्सर 80 रुपये बचाने के लिए भूखे ही रात काटता हूँ सिर्फ एक थाली खाकर। गोयल साहब ने क्या तरीका अपनाया ?
    यह मेरे जैसे लाखों यात्रियों का सवाल है। इसे दुखड़ा या तकलीफ मानें ही नहीं, क्योंकि रेल यात्रियों की मजबूरी बन गई है इसे झेलना। उसे लोगों ने यात्रा लाइफ का हिस्सा बना लिया है। “कोई दिक्कत तो नहीं है” यह सब ?Satyendra PS—————————–Mohd Zahid is with Mohd Zahid.
    4 hrs ·
    FBP/17-216
    मोदी-योगी का फ्लाप शो :-
    कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार के लिए कट्टर हिन्दुत्व के पुरेधा बनकर गुजरात गये थे , उनको देखने सड़कों पर चंद आवारा कुत्तों , उनकी पार्टी के 10-12 कार्यकर्ता और उनके सुरक्षाबल ही मौजूद थे , योगी जी की गुजरात में 30 रैलियाँ करने का भूत उस 1 रैली में ही उतर गया। वह वापस उत्तर प्रदेश आकर दिया जलाने लगे।
    कल वडोदरा में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हाल उससे भी बुरा हुआ , अपने 12 किमी के रोड शो में उनको गुजरात का मूड बदला है यह महसूस हो गया होगा।
    देश का प्रधानमंत्री , देश का कम संघ और भाजपा का प्रधानमंत्री अधिक लगता है , पूरे साल देश का राजकाज छोड़कर या तो चुनाव प्रचार करता रहता है या विदेशी दौरे का अपना शौक पूरा करता है।
    ऐसे समाचार हैं कि पीएमओ आफिस में 36000 महत्वपुर्ण फाइल उनके हस्ताक्षर के लिए रखी हुई है जो समयाभाव के कारण वहीं धूल खा रहीं हैं , विभिन्न मंत्रालयों से संबन्धित महत्वपुर्ण फाइलों पर मंत्रालयों के मंत्री हस्ताक्षर करके देश के कार्य को आगे बढ़ाएँ ऐसी उनकी हिम्मत भी नहीं है।
    सरकार एकिकृत व्यवस्था से चल रही है , जहाँ मंत्री पद केवल नाम का रह गया है और प्रधानमंत्री या तो अपने शौक पूरा कर रहा है या प्रचार कर रहा है।
    पिछले 37 दिन में प्रधानमंत्री 5 बार 9 दिनों के लिए गुजरात में अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार करने जा चुके हैं , इतना वह अपने प्रधानमंत्री बनने के 43 महीने में भी नहीं गये , और गये भी तो शायद एक या दो बार।
    दरअसल भाजपा और प्रधानमंत्री की आत्मा गुजरात है , गुजरात हिन्दुत्व का वह लैब बनाया गया जिसे इनको छल धन साम दाम दंड भेद से जीतना ही है। चाहे प्रधानमंत्री गली गली घूमें या दरवाज़े दरवाज़े।
    इसके बावजूद योगी और मोदी की लगातार फ्लाप होतीं रैलियाँ और रोडशो गुजरात की जनता का मानस बता रही हैं। देश के प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर गुजरात में चंद लोग ही सड़कों पर दिखें तो कोई कुछ भी बहाने दे पर यह बुरी तरह नाराजगी के कारण पैदा विफलता है और कुछ नहीं।
    मोदी की रैली या रोडशो की तुलना यदि हम राहुल गाँधी की रैलियों और रोडशो से करें तो आप के सामने स्थितियाँ और स्पष्ट हो जाएँगी। राहुल गाँधी की हर रैली मोदी योगी की रैलियों से कहीं ज़्यादा भीड़ समेटे हुए थीं।
    यह भी सच है कि गुजरात के कलैन्डर के हिसाब से दिपावली के दूसरे दिन से वहाँ नया वर्ष प्रारंभ होता है और सबकुछ 5 दिन बंद होता है , फिर पंच पूजा होती है और हर व्यापारी अपने पाँच खरीददार की पूजा करता है उससे आर्डर और पेमेन्ट लेता है। नये वर्ष में इस तरह कार्य प्रारंभ करता है। परन्तु इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि गुजरात में कर्फ्यू लग जाता है। कुछ धनाढ्य लोग इन 5 दिनों में घूमने जरूर जाते हैं तो ऐसे धनाढ्य लोग रैली या रोडशो में आते भी नहीं।
    सामान्य और गरीब जनता ही ऐसे कार्यक्रम में आती है और अल्पेश ठाकोर की मानें तो आज कांग्रेस और उनकी रैली में 5 लाख लोगों के आने की संभावना है जिसमें राहुल गाँधी भी शामिल होंगे।
    दोनों कार्यक्रमों में भीड़ का अंतर सबकुछ आज स्पष्ट कर देगा।
    कांग्रेस के लिए सबकुछ इतना आसान भी नहीं है , उसे महिसाससुर से लड़कर जीतना है क्युँकि इस सबके पीछे चुपचाप भाजपा के पक्ष में कुछ और भी गतिविधियाँ चलती हैं।
    दरअसल आपस में लड़ते भिड़ते संघ के 36 नाजायज़ संगठन चुनाव के समय एक होकर भाजपा के लिए ज़मीन पर काम करने लगते हैं और घर घर घूम घूम कर एक एक व्यक्ति से हाथ पैर तक जोड़ने लगते हैं। यह सब गुजरात में प्रारंभ हो चुका है।
    मोदी जी अपने मुख्यमंत्री रहते यहाँ से वहाँ बनाते एक अपने मुख्यसचिव को मुख्य चुनाव आयुक्त बना चुके हैं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता का गला घोंट चुके हैं , चुनाव आयोग उनका , नौकरशाही उनकी , सरकार उनकी , अदालत उनकी और सारे नाजायज़ संगठन उनके , कांग्रेस के पास कुछ भी नहीं।
    बस एक उम्मीद है कि इस बार नोटबंदी और जीएसटी से त्रस्त जनता मोदी और भाजपा को सबक सिखाएगी।
    रोडशो ऐसे ही आभास दे रहे हैं।—————————————————————————————-Abhishek Srivastava
    Yesterday at 00:01 ·
    मैं जब किसी से कहता हूं कि ‘हिंदू राष्‍ट्र’ के कथित प्रोजेक्‍ट वाले लोग असल में हिंदू विरोधी हैं, तो इसे समझाने में वक्‍त लगता है। फिर मैं कहता हूं कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ब्राह्मणवादी है, तो यह थोड़ा जल्‍दी समझ में आ जाता है। फिर मैं कहता हूं कि योगी आदित्‍यनाथ जिस परंपरा से आते हैं, वह परंपरा अपने मूल में आरएसएस विरोधी है, तो गड़बड़झाला हो जाता है। अपने गृहजिले यूपी के ग़ाज़ीपुर स्थित करंडा के ब्राह्मणपुर गांव में आज हुई एक संघ ब्‍लॉक कार्यवाह की हत्‍या इस जटिल जाले को साफ़ करती है। राजेश मिश्र पिछले चार-पांच साल की पैदाइश थे वरना बीसों साल से काम कर रहे इलाके के पत्रकारों ने उनका नाम नहीं सुना था। उनके पत्रकार होने का कुल मतलब और मकसद दैनिक जागरण में संघ के आयोजनों से जुड़ी खबरें छपवाना था। इसके लिए पैसे नहीं मिलते हैं। यह धर्मार्थ पत्रकारिता है।
    उन्‍हें तड़के मार दिया गया। ब्राह्मणपुर में ब्राह्मण की निर्मम हत्‍या! हत्‍या तो वैसे भी त्रासद और अतिनिंदनीय है ही, हत्‍यारे को कुम्‍भीपाक नरक का योग अलग से बनेगा। योगीराज में रायबरेली में बर्बर तरीके से मारे गए पांच ब्राह्मणों के बाद यह दूसरी ऐसी घटना है जो चौबीस घंटा बीतने से पहले राष्‍ट्रीय हो गई है। संघ के कार्यकर्ताओं ने ग़ाज़ीपुर जिला अस्‍पताल के बाहर जमकर बवाल काटा है। डैमेज कंट्रोल के लिए मनोज सिन्‍हा से लेकर आइजी, डीआइजी सब पहुंच गए। ऐसे कौन से खास शख्‍स थे राजेश मिश्रा? मामला आदमी के वज़न का नहीं है, संघ का है। आप ख़बरें देखिए। लुधियाना और केरल में संघ कार्यकर्ताओं की हत्‍या के साथ इसे जोड़ा जा रहा है। बड़ा नैरेटिव बन रहा है।
    यहां दो स्‍तरों पर अंतर्विरोध है। एक संघ के भीतर ब्राह्मण वर्चस्‍व बनाम सरकार के भीतर ठाकुर वर्चस्‍व का। दूसरा, योगी की हिंदू युवा वाहिनी बनाम संघ/बीजेपी का। हो सकता है उतना प्रत्‍यक्ष दिखता न हो, लेकिन भीतर-भीतर खड़बड़ाहट है। यूपी में बीजेपी की इकाइयां संकट में हैं। हिंदू युवा वाहिनी बीजेपी और संघ की कीमत पर मोटाती जा रही है। इसीलिए ग़ाज़ीपुर की एक मामूली (इस लिहाज से कि मामला सामान्‍य रंजिश आदि का होना चाहिए) घटना राजनीतिक रूप से दूर तक जाने की क्षमता रखती है। खींचने वाला मिल गया तो योगी भी कम जडि़यल नहीं हैं। भाजपा को ले डूबेंगे या फिर खुद मठ वापसी हो जाएगी।

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