तस्लीमा नसरीन का खत शैख़ हसीना के नाम !

Category: राजनीति 1147 views 6

by — तस्लीमा नसरीन

शेख हसीना जी, सुना है आप रोहिंग्या मुसलमानों के दुख से दुखी हैं। जब पूरे विश्व का कोई भी देश इस धरती के सबसे अधिक प्रताड़ित जनसमूह को अपने यहां आश्रय देने में हिचक रहा है, तब आप उन्हें शरण दे रही हैं। इसी कारण आपकी तुलना जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के साथ होने लगी है। भारत में तकरीबन 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों ने प्रवेश किया है। भारत सरकार का कहना है कि वे उसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं, इसलिए वह उन्हें बाहर करना चाहती है। रोहिंग्या को पाकिस्तान भी शरण देने को तैयार नहीं है। अमीर मुस्लिम देश भी उन्हें शरण नहीं दे रहे। जो देश मुसलमानों के लिए मातम मनाते हैं, उन्होंने भी उनसे मुंह फेर लिया है। मुस्लिम कट्टरपंथी देश रोहिंग्या को लेकर शोर तो मचा रहे हैं, पर वे उन्हें शरण नहीं दे रहे। बांग्लादेश जैसे गरीब देश को अंतिम घड़ी में आगे आना पड़ा।

शेख हसीना जी, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए आपको नोबेल पुरस्कार देने की मांग उठी है। वैसे नोबेल पुरस्कार मुझे मुग्ध नहीं करता। कई अयोग्य व्यक्तियों को नोबेल पुरस्कार दिया गया है। हेनरी किसिंजर जैसे अशांतिप्रिय शख्स को भी नोबेल दिया गया और आंग सान सू की जैसी मानवाधिकार में विश्वास न करने वाली महिला को भी। पुरस्कार पाने के उद्देश्य से कोई अच्छा कार्य करना और पुरस्कार पाने की अभिलाषा के बिना असहाय लोगों के साथ नि:स्वार्थ भाव से खड़ा होना, दोनों अलग बातें हैं। हम लोगों को विश्वास है कि आप पुरस्कार की उम्मीद लिए पीड़ित लोगों का साथ नहीं दे रही हैं। सच कहूं तो लोगों का प्रेम ही आपका सबसे बड़ा पुरस्कार है। धरती के सबसे उत्पीड़ित और निराश्रित लोगों का जो प्रेम आपको मिला है, उसके सामने नोबेल भी तुच्छ है।

आप कहती हैं, ‘मुल्क की 16 करोड़ जनता को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा चुकी है और म्यांमार से आए लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को भी बांग्लादेश भोजन दे सकता है। विपदा में फंसे पांच-सात लाख लोगों को खाना देने की क्षमता हममें है। ऐसी बातें विश्व के अमीर देश अब तक नहीं बोल सके हैं। ये बातें एक दरिद्र देश बांग्लादेश ने बोली हैं। आपने यह भी कहा कि ‘म्यांमार के शरणार्थियों की तब तक हरसंभव मदद करेंगे जब तक वे अपने देश नहीं लौट जाते। ऐसी बातें आज कौन बोलता है! रोहिंग्या में से कइयों के इस्लामिक आतंकी होने की बातें कही जा रही हैं। आज उन पर कोई विश्वास नहीं कर रहा। यहां तक कि मुसलमानों के लिए बना देश पाकिस्तान भी उन्हें नहीं चाहता। रोहिंग्या को आतंकी बनाने की मंशा लिए आतंकी आका बांग्लादेश में ही भूमिगत हैं, परंतु आपने कहा है कि यदि इन तत्वों ने मौके का फायदा उठाने का प्रयास किया तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

आपकी सहनशीलता का जवाब नहीं। जहां हर देश रोहिंग्या को दूर से ही भगा रहे हैं, वहीं आप उन्हें सीने से लगा रही हैं। मुस्लिम देश आम तौर पर अपने यहां शरणार्थियों को शरण नहीं देते। अरब के लाखों असहाय शरणार्थियों के लिए अरब देशों के ही दरवाजे बंद होने पर वे यूरोप के देशों में शरण ले रहे हैं। मुस्लिम शरणार्थियों को आश्रय गैर-इस्लामिक देश देते हैं, परंतु एक मुस्लिम देश की ओर से सिर्फ आपने ही यह दिखाया कि एक मुस्लिम देश भी लाखों प्रताड़ित मुसलमानों को आश्रय दे सकता है।आप कह रही हैं कि म्यांमार रोहिंग्या को वापस ले और उन्हें नागरिकता और सुरक्षा दे, परंतु आप भी जानती हैं कि कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें, म्यांमार रोहिंग्या को वापस नहीं लेगा। वे लोग बांग्लादेश में ही रहते हुए अपने वंश का विस्तार करेंगे। अभाव से जूझने वाला एक विशाल जनसमूह चोरी, डकैती, लूटमार और मादक पदार्थों की बिक्री करेगा या फिर आतंकी समूहों से जुड़ जाएगा। ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं और आने वाले वक्त में भी बदस्तूर होती रहेंगी।

आप कहती हैं कि 1975 में शरणार्थी के रूप में आपको विदेश में रहना पड़ा था, इसीलिए आप शरणार्थियों का दुख समझती हैं, किंतु मैं नहीं समझती कि आप मेरा दुख समझती हैं। मुझे आपने शरणार्थी बनाकर रखा है। 24 वर्षों से मैं एक मुल्क से दूसरे मुल्क में जीवन बिता रही हूं। मेरा अपना मुल्क है, परंतु मुझे अपने मुल्क में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा। मेरी किताब पर प्रतिबंध है। आप किताब पर भी प्रतिबंध समाप्त नहीं कर रही हैं। मैं अपनी बहन को पावर ऑफ एटॉर्नी देना चाहती हूं, लेकिन उस पर भी आपके विदेश सेवा के अधिकारी अड़ंगा डाल रहे हैं। एक जीवन में कोई व्यक्ति कितने अपमान, निषेधाज्ञा और अधिकारों से वंचित रह सकता है? जो उदार है, उसे तो सबके लिए उदार होना चाहिए। क्या आप सबके लिए उदार नहीं हो सकतीं?

मैंने कोई अपराध नहीं किया। किसी की हत्या नहीं की। कोई गड़बड़ी नहीं की। मैं तो मानवता और मानवाधिकार की ही बातें लंबे समय से कहती आ रही हूं। मुझे क्यों अछूत बना दिया? मानवता को किस ताक पर रखकर मेरे मुंह पर मुल्क का दरवाजा बंद कर दिया गया? क्या आप अभिव्यक्ति की आजादी में भी विश्वास नहीं करतीं? राजिब हैदर की हत्या का विरोध आपने किया था, परंतु आपने जब जाना कि राजिब नास्तिक था तो चुप हो गईं। देश में एक के बाद एक स्वतंत्र अभिव्यक्ति और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखने वाले प्रगतिशील ब्लॉगरों की हत्या हुई। आपने किसी की मौत पर शोक नहीं प्रकट किया। विदेश से आए मुस्लिमों के लिए आपकी आंखों में आंसू हैं, परंतु मुल्क में प्रगतिशील और प्रतिभावान युवकों की हत्या होने के बाद भी आपकी आंखों में आंसू नहीं। आपने भयावह हत्याकांडों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला। वे लोग नास्तिक थे, इसीलिए आपने हत्याकांड की निंदा तक नहीं की। माननीय प्रधानमंत्री, आप बार-बार यह बात भूल जा रही हैं कि आप आस्तिक और नास्तिक, दोनों की प्रधानमंत्री हैं। अमीर-गरीब, नारी-पुरुष, हिंदू-मुस्लिम, नास्तिक-आस्तिक सभी के प्रति प्रधानमंत्री होने के नाते आपका समान दायित्व है। आपको सबको समान निगाह से देखना चाहिए।

कुछ लोग कह रहे हैं कि आप वोटों की खातिर रोहिंग्या को शरण दे रही हैं। मुस्लिम वोट पाने का औजार हैं भी। रोहिंग्या यदि हिंदू या बौद्ध होते तो क्या आप उन्हें शरण देतीं? संभवत: नहीं। देश के भीतर ही हिंदू नागरिकों पर अत्याचार हो रहे हैं और वे अपनी जमीन से ही बेदखल हो रहे हैं। उनके घर-बार जलाकर उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्या आप इन हिंदुओं के पास गईं और आंखों से आंसू का एक कतरा भी बहाया? मुझे पता है कि बहुसंख्यकों का वोट पाने के लिए ही आप मुझे अपने देश में प्रवेश नहीं करने दे रही हैं और इसी कारण हिंदू अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति तक नहीं दिखाती हैं। आप ब्लॉगरों की हत्या पर संवेदना भी व्यक्त नहीं करतीं, लेकिन दूसरे देश से आए शरणार्थियों के लिए पूरा प्रेम छलका रही हैं। वे मुसलमान हैं, इसीलिए आप ऐसा कर रही हैं। आप सिर्फ चुनाव जीतना चाहती हैं। सिर्फ शासन करना चाहती हैं। आखिर जो छल-बल से सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, उन्हें मुक्त स्वर में मानवतावादी कैसे बोला जाए?
————————
तसलीमा नसरीन

Related Articles

6 thoughts on “तस्लीमा नसरीन का खत शैख़ हसीना के नाम !

  1. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan added 4 new photos.
    15 September at 15:56 ·
    मैं सरदार नहीं हूँ पर जैसे ही किसी सरदार को देखता हूँ बड़ी जोश आ जाती है अपने आप। उन पर गर्व होता है। मैं कई सालों तक इसका कारण ढूढ़ता रहा ,इसका कारण है उनका दूसरों के मदद के लिए दौड़ना। कुछ साल पहले अंबिकापुर कालीघाट में बाइक सवार पति ,पत्नी का बुरी तरह एक्सीडेंट हो गया वे सड़क पर पड़े हुए थे सामने से एक तेज रफ़्तार ट्रक आ रही थी ,ट्रक सरदार चला रहा था। सरदार ने खुद के ट्रक को नाले में गिरा दिया और खुद सड़क पर गिरकर उस पति पत्नी को बचाने दौड़े ,संयोग से मैं भी इस हादसे से बचा था और मेरे दोस्त उमेश तिवारी का सामने का दांत टूट गया था। आज जब रोहिंग्या मुसलमानों को कभी आतंकी बताया जा रहा है ,कभी भविष्य के लिए खतरा बताया जा रहा है तब सिख समाज के लोगों ने रोहिंग्या मुसलमानों को राहत पहुंचाने के लिए बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर ‘गुरू लंगर’ शुरू किया है। ‘द खालसा एड’ टीम ने सीमावर्ती शहर तेकनाफ में अपना कैंप लगा रखा है। सिख वॉलेंटियर्स भारत से वहां पहुंचे हैं। वे 35 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को रोज चावल, सब्जी खिला रहे हैं। यहां पर रोहिंग्या मुस्लिम कई दिनों तक टूटी नावों पर सफर करके म्यांमार से यहां पहुंच रहे हैं। किसी सरकार के पहले वहां लोगों की भूख मिटाने सरदार पहले पहुंचे हैं। सरदारों के पहुँचने से पहले रोहिंग्या मुसलमानों के बच्चे खाने के लिए सड़कों पर भीख मांगते घूम रहे थे। इसे कहते हैं इंसानियत ,इसे कहते है मानवता। अगर आपके पड़ोस में कोई सरदार रहता है या आपके मित्र सरदार हैं तो उन पर गर्व कीजिये। आपके मुसीबत में पहला आदमी जो खड़ा होगा वो सरदार होगा।—————————————–Sanjay Tiwari
    19 September at 09:05 ·
    जो लोग रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने की वकालत कर रहे हैं वो असल मकसद जानते हैं। उनका असल मकसद शमीउन रहमान की गिरफ्तारी से सामने आ गया है। शमीउन रहमान अलकायदा के लिए काम करता है और वह रोहिंग्या लोगों आतंक की ट्रेनिंग देने के लिए भर्ती अभियान पर निकला था।
    शरणार्थी मुसलमान ज्यादा समर्पित आतंकवादी होता है क्योंकि वह अपनी जड़ जमीन से उखड़ा होता है। ऐसे में कट्टरपंथी जमातें उन्हें चारे की तरह इस्तेमाल करती हैं और आतंकवाद फैलाती हैं। अलकायदा, जमात ए इस्लामी, लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद पहले से इस काम में लगे हुए हैं। बाकी उनके समर्थक टीवी पर बैठकर, रैली निकालकर मानवाधिकार और इंसानियत के नाम पर उनका बचाव करते हैं।–Vikram Singh Chauhan
    14 September at 10:00 ·
    अजीत डोभाल को एफबीआई या सीआईए का हेड होना था ,भारत में नाहक अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं यह महामानव। डोभाल साहब और मोदी के प्रधान सचिन नृपेंद्र मिश्रा ने भूखे ,प्यासे और बेघर रोहिंग्या मुसलमानों का लश्कर-ए-तैबा से आतंकी कनेक्शन ढूढ़ निकाला है। कहा गया है रोहिंग्या मुस्लिम समुदायों के बीच पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का बढ़ता प्रभाव एक गंभीर उभरता हुआ खतरा है और इसका इस्तेमाल भारत को निशाना बनाने के लिए किया जाएगा। अरे उन्हें शरण नहीं देना है तो मत दो कम से कम उनकी मज़बूरी का मजाक तो मत बनाओं। हर गरीब और बेघर में तुम्हें आतंकवादी ही नज़र आते हैं।——————-Nitin Thakur
    Yesterday at 10:45 ·
    अभी तक तो किसी रोहिंग्या के आतंकवादी होने का सबूत नहीं था. मोदी के सू की से मिलते ही पके आम की तरह रोहिंग्यों के आतंकी होने के सबूत रोज़ टपकने लगे. फिर आप कहते भी हैं कि हमें मुसलमानों से दिक्कत नहीं है. बाकी रहे भक्त, उन्हें तो रोहिंग्या के सामने “मुसलमान” लिखा दिखने के बाद तर्कों और तथ्यों की कोई खास ज़रूरत ही नहीं है. आप एशिया के लीडर बनना चाहते हैं और सू की से दोटूक कहकर नहीं आ सके कि अपने यहां माहौल ठीक रखो ताकि पूरा एशिया इस तनाव से मुक्त रहे. अमेरिका बनने की इच्छा है तो उस जैसा रौब भी पैदा करो. सिर्फ कॉन्सर्ट करने से वर्ल्ड लीडर नहीं बना करते.. नेहरू की तरह ताल ठोक कर या तो शरणार्थियों को स्वीकार करने की हिम्मत दिखाओ या इंदिरा की तरह कमज़ोर का साथ देने के लिए आंखें तरेरो.Nitin Thakur
    1 hr ·
    पैसा पहले ही नहीं था,इज़्ज़त हाथों से फिसलती ही जा रही है और अब बात जान पर बन आई है। ऐसे माहौल में पत्रकार बनना कौन चाहेगा? बन गया तो सड़कों पर उतरकर रिपोर्टिंग का रिस्क आखिर क्यों ले? सरकार बचाव के लिए हाथ में हथियार तो देती नहीं है। मरने पर सबको मुआवज़ा भी नहीं मिलता। नौकरियां प्राइवेट हैं तो पेंशन-वैंशन भूल जाइए। दिक्कत तो ये है कि जो जनता जंग और हनीप्रीत से अघाई हुई है उसे भी वो पत्रकार नहीं दिखते जिन्होंने खून देकर पेशा निभाया है। 28 साल का शांतनु भौमिक उम्र में मुझसे भी छोटा था। ज़ाहिर है, सपने बड़े ही रहे होंगे। त्रिपुरा के लोकल चैनल का रिपोर्टर था। अगरतला से 35 किलोमीटर दूर मंडई में IPFT और TRUGP नाम के संगठनों में हुई झड़प को कवर करने गया था। वो किसी की तरफ नहीं था। बस अपने चैनल के लिए फुटेज जुटा रहा था ताकि लोगों तक ग्राउंड रिपोर्ट पहुंचाई जा सके। गुस्साई भीड़ ने शांतनु पर हमला बोल दिया। बता रहे हैं कि पहले टांगों में मारा। जब गिर गया तो सिर पर डंडों से मार-मार कर जान निकाल ली। फिर लाश को खींचकर एक स्टेडियम के पीछे फेंक दिया।हिंसा करनेवालों में बीजेपी और वामपंथियों दोनों के साथी शामिल होने का शक है. त्रिपुरा में सरकार वामपंथियों की है. सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश भले कर दी हो पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं से होेते हुए पत्रकारों की मौत तक पहुंचने का सिलसिला ये कहने को मजबूर कर रहा है कि साथियों भले अपने घर चलाने को परचून की दुकान खोल लो पर पत्रकार मत बनना, और अगर बन जाओ तो दफ्तर में ही बैठकर बेवकूफ दर्शक- पाठक को मनोहर कहानियां लिखकर बेच देना मगर ना तो विचारोत्तेजक लेख लिखना और ना ही फील्ड में जाने का रिस्क लेना
    See Translation————————-

    Reply
    1. सिकंदर हयात

      Mohammad Anas
      5 hrs ·
      शब्दों की जादूगरी और भावनाओं को मनमर्जी रंग देकर इतिहास से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता ताबिश सिद्दीकी। हाल ही में ताबिश ने रोहंगिया मुद्दे पर कट्टरपंथी हिंदुओं तथा भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को खुश करने के लिए एक ऐसा लेख लिखा जिससे यह भ्रम बन गया कि रोहंगिया विस्थापितों की मदद जब मुस्लिम देश नहीं कर रहे तो भारत क्यों करे। ताबिश यहीं नहीं रूकते, वे भारत से रोहंगिया को खदेड़ देने की भी बात करते हैं। वे बताते हैं कि भारत में इनके रहने से आतंकवाद फैलेगा। वे इस्लामी मुल्कों की बिगड़ी तस्वीर के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराते हुए बताते हैं कि मुसलमानों की गलती की वजह से यह सब हो रहा है। रोहंगिया मसले के इतिहास, उसके राजनैतिक पक्ष तथा म्यांमार के सामाजिक/धार्मिक दृष्टिकोण आदि से पूरी तरह अंजान मोबाइल पर चिपके रहने वाले ताबिश इस गंभीर वैश्विक संकट का बड़ी बेशर्मी से सामान्यीकरण कर देते हैं। ताबिश का लिखा हुआ वह पोस्ट ‘दी लल्लनटॉप’ ने अपने यहां पब्लिश किया, जिसे पढ़ कर जेएनयू के रिसर्चर सरफराज़ कटिहारी ने अपनी वॉल पर उसका काउंटर नरेटिव दिया। वह पोस्ट दी लल्लनटॉप ने पब्लिश की, यह अच्छा रहा। कम से कम संपादक सौरभ द्विवेदी को थोड़ी सी अक्ल तो आई कि प्रोपगेंडा पर रियलिटी भारी पड़ती है। यह जगह तभी बनी है।
      बहुत अच्छा सरफराज़। लिखते रहो। बर्बर तरीके से लिखोगे तो कोई काट नहीं पाएगा। लोग छापने पर मजबूर होंगे।
      ताबिश, कर लो सरफराज़ से डिबेट। हम भी तो देखें कित्ती राजनीतिक और सामाजिक समझ है आपकी रोहंगिया मुद्दे पर।
      (सरफराज़ का यह पोस्ट वॉयरल हो चुका है। वॉयरल होने के बाद प्रोपगेंडा वेबसाइट दी लल्लनटॉप की विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा। उन्होंने ताबिश की जिस पोस्ट को अपने यहां जगह दी वह उनकी मूर्खता तथा अज्ञानता ही दर्शाता है।)
      See Translation

      Sarfraz Katihari
      17 September at 06:17 ·
      डिअर, लल्लनटॉप छाप होशियार,

      तुमने नही सुना होगा के कभी यहूदियों ने मुस्लिम राष्ट्र में शरण ली क्यूके तुम्हारी जानकारी सीमित है , तुमने ये भी नही सुना होगा के कभी किसी इसाई ने भाग के किसी इस्लामिक लैंड में शरण ली तो इसमें तुम्हारी गलती है क्यूके तुम कम पढ़े लिखे हो , तुमने ये भी नही सुना है के कभी किसी हिन्दू ने भाग के मुस्लिम देश में शरण ली तो ये भी तुम्हारी कमी है ।

      अब तुम्हारी नादानी या जाहिलपन का जिम्मेदार कोई शिक्षित और सभ्य व्यक्ति थोड़े ही है ।

      वैसे सुन लो ,

      आज भले ही मुस्लिम, इस्लामिक राष्ट्र सहित यूरोप सहित दुनिया भर में शरण लिया है जिनमे 90% से ज्यादा मुस्लिम अपने पड़ोस के मुस्लिम देश में ही शरण लिए हुए है ,लेकिन इतिहास में झाकोगे तो मुस्लिम राष्ट्र और मुस्लिम विपत्ति में फसे लोगो की मदद और बचाव में हमेशा खड़ा रहा है ।

      जब स्पेन के सेविल्ले को इसाई द्वारा जीतने के बाद जब 1391 में जब यहूदी को खदेरा गया तब वो मजलूम meditarian साहिल को पार करके अफ्रीका के मुस्लिम इलाको नार्थ अफ्रीका (अल्जीरिया , मोरक्को , तंजानिया ) में बसे थे , फिर जब इबेरियन प्रायद्वीप की जीत मतलब reconquista के बाद बादशाह फर्डीनांड और रानी इसाबेला ने जब 1492 में स्पेन से और 1496 में पुर्तगाल से भगाया था तब भी यहूदी समुन्द्र को पार करके मुस्लिम अफ्रीका के मुस्लिम इलाको और टर्की में बसे थे । खलीफा बायेजिद द्वितीय ने उनके बसने की जरुरत को मुहैया कराने और उनमे मदद के लिए बजाप्ता अपना फरमान (राजाज्ञा ) निकाला था , सिर्फ 1492 में स्पेन से लगभग १ लाख 50 हजार लोग टर्की खिलाफत में बसे थे , इतना ही नही बलके उन मजलूम यहूदी को समुन्द्र के उस पार से इस पार लाने के जहाज भी भेजा था। फिर आते है दुसरे विश्वयुद्ध के वक़्त जब हिटलर के आदेश पे फ्रांस की विची हुकूमत ने जब यहूदी की हत्या का आदेश पारित किया तो मोरक्को के सुल्तान मोहम्मद पांचवा ने न सिर्फ अपने यहूदियों को बचाया बलके कई फ्रेंच यहूदी भी भाग के आये ( उस वक़्त हिटलर की हुकूमत फ्रांस पे थी , फ्रांस की विची सरकार उसकी मुखौटा वाली सरकार थी और मोरक्को फ्रांस का protectarate मतलब मातहत थी ) दुसरे विश्वयुद्द के वक़्त काफी इसाई और यहूदी मिडिल ईस्ट में बसे थे , सिर्फ पोलैंड के ही ३ लाख से ज्यादा इसाई ईरान में बसे थे । फिलिस्तीन , सीरिया के इलाको में भी लाखो यूरोपीय बसे थे, तबके यूरोप का एकलौता मुस्लिम मुल्क अल्बानिया में भी मुस्लिमो और उनके साथ इसाइयों ने मिलके वहा रहने वाले अति अल्पसंख्यक यहूदियों (हिटलर के दाहिना हाथ एइच्मान के अनुसार २०० यहूदी थे अल्बानिया में ) की जान बचायी थी ,बलके कुछेक यहूदी दुसरे इलाके से भी आ के जान बचाए थे । ( दुसरे विश्वयुद्ध के बाद अल्बानिया में 2000 यहूदी हो गये थे )

      फिर आते है आधुनिक इतिहास में श्रीलंका से जब तमिल हिन्दू भागना शुरू हुए तो कई भारत में आये तो कई मलेशिया में भी गये थे, अभी ही सीरिया की जंग के दौरान कई ईसाई ने टर्की में शरण ली हुई है, अभी बांग्लादेश में ही रोहिंग्या मुस्लिम के साथ रोहिंग्या हिन्दू ने भी शरण लिया हुआ है , अराकान में हिन्दू काफी कम है इसलिए वहा से भागने वाले हिन्दू की भी संख्या कम है लेकिन भागे तो बांग्लादेश में शरण मिला हुआ है ।

      अफ्रीका में अक्सर सिविल वार चलता रहता है तो लोग बगल के शांति वाले में देश में भाग के शरण लेते रहते है जिसमे कई बार ईसाई , मुस्लिम बहुल राष्ट्र में शरण लेते है तो कई बार मुस्लिम ईसाई बहुल राष्ट्र में शरण लेते है ।

      हा , अंत में एक बात और ज्यादातर लोग अपने अशांत देश को छोड़ के शांति वाले पड़ोसी देश में शरण लेते है जिससे वो हिंसा से बच सके , हा , समुन्द्र के पार वाले मुल्क को भी पडोसी ही बोला जाता है ,अफ़सोस अभी आतंकवाद के नाटक के बाद 2001 से मुस्लिम देश अशांत है तो लोग भूमि की सीमा या समुंदरी सीमा को पार करके अपने पड़ोस के मुल्क में जाते है, अभी यूनाइटेड नेशन द्वारा रिफ्यूजी का बटवारा या बसाव दुसरे मुल्क में भी होता है जिससे के पडोसी देश पे ही सारा बोझ न पढ़ जाए, बाकि रिफ्यूजी का यही इतिहास का भी सत्य है तो यही सत्य वर्तमान का भी है तो भविष्य का भी भी यही सत्य होगा ।

      वैसे अंत में सुन लो मैंने मुस्लिम का मुस्लिम देश में रिफ्यूजी का इसमें जिक्र नही किया वरना आज भी 90 % से ज्यादा मुस्लिम , मुस्लिम राष्ट्र की सीमा में ही बसे है चाहे सीरिया के रिफ्यूजी हो या अफ़ग़ान के रिफ्यूजी या अभी अराकान के रोहिंग्या रिफ्यूजी हो ।

      बाकि तुमने मदद की भी बात की थी तो सुन लो आज कई सारे मुस्लिम के इंटरनेशनल ऐड ग्रुप है जो दुनिया भर में विपत्ति के वक़्त चाहे युद्ध के कारण हो , या प्राकृतिक आपदा या फिर आंतरिक युद्ध या फिर बीमारी और अकाल से पीड़ित लोग के बीच में काम कर रहे है , जिसमे वो धर्म , नस्ल नही देख रहे है , खैर ,भारत में किसी भी समूह के इंटरनेशनल ऐड ग्रुप नही है लेकिन दुनिया भर के विभिन्न धर्म के लोग अभी सारी दुनिया में विपत्ति में मदद करते है तो एक देश की सरकार भी विपत्ति में फसे देश की आर्थिक और अनाज से मदद करती है अभी ये आम बात है लेकिन ओस्मानिया खलीफा ने 19th शताब्दी में भी सुदूर देश आयरलैंड में जब भयानक अकाल पड़ा था तब आर्थिक मदद के साथ साथ तीन जहाज खाद्य पदार्थ भी भेजा था ।

      तुम्हारा प्यारा ,
      तुम्हारे शब्दों में फेसबुक का सबसे नेगेटिव इंसान http://millattimes.com/2017/09/डियर-लल्लनटॉप-छाप-होशिया/

      Reply
  2. सिकंदर हयात

    प्रसन्न प्रभाकर
    13 September at 09:55 ·
    आज के म्यानमार में कई मुस्लिम समुदाय हैं जिन्हें नागरिकता व अन्य सारे अधिकार मिले हुए हैं। इनमें से एक कम्युनिटी है जिसे “कमान” कहा जाता है।
    औरंगजेब के भय से उसका सहोदर शाह शुजा भागकर अराकान/ Rakhine)पहुंचा था। उसने वहां के स्थानीय शासक से पहले से ही यह बात कर ली थी कि वो उसे मक्का जाने के लिए एक जहाज मुहैया कराएंगे।
    महीनों हो गए। जहाज न मिला। वो राजा मुकरने लगा था। यहां कई एकाउंट्स हैं।
    एक कहता है कि राजा ने शुजा से उसकी बेटी मांगी थी विवाह के लिए। शुजा ने इनकार कर दिया। खटपट शुरू हो गई। शुजा ने स्थानीय मुस्लिमों के साथ तख्तापलट करना चाहा। महल पर हमला बोल दिया। पराजित हुआ और उसके सारे पुत्रों को मार दिया गया। पुत्रियों का रेप हुआ। बर्नियर का एकाउंट है यह।
    एक एकाउंट कहता है कि शुजा इस विवाह के लिए तैयार हो गया था। विवाह हुआ भी। मगर बाद में अराकान के राजा ने उसकी असीम संपत्ति का कुछ हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया। दो बार शुजा ने , उसके अनुचरों ने विद्रोह किया। अंत में मारा गया।
    तीसरा एकाउंट भी है जो ज्यादा सही प्रतीत होता है। परिवार के कत्लेआम के बाद शुजा वहां से भाग निकला। वो त्रिपुरा के राजा के यहां चला गया जहाँ से औरंगजेब के गुप्तचरों के भय से फिर से निकल लिया और मणिपुर चला गया। चिह्न आज भी मिलते हैं।
    शुजा लोक ( शुजा गुफा में उसकी मृत्यु हुई)
    कुछ सैनिक वहीं अराकान में रह गए थे जो कमान( धनुष) कहलाये। कालांतर में इन्होंने अराकान के सत्ता संघर्षों में बड़ी हिस्सेदारी निभाई। कोई भी राजा इनके सामने कुछ भी नहीं था। अन्त में एक राजा ने इन्हें बर्मा की मुख्य भूमि का निर्वासन दिया।
    आज ये म्यांमार के लीगल और ऑथेंटिक नागरिक हैं।
    ……………………………………………….

    जो मुस्लिम या भारतीय पुरातन में बर्मा गए थे वो वहां से ऐसे घुलमिल गए कि अंतर पता ही नहीं चलता था। विवाह संबंध तक हुए। बहुत सत्ता के बड़े-बड़े पदों पर पहुंचे। कोई भेदभाव नहीं रहा। इसे स्वयं वहां के वर्तमानकालीन रोहिंग्या( म्यांमार के आधिकारिक बयान के अनुसार बंगाली) स्वीकार करते हैं।
    मगर ब्रिटिश आधिपत्य के उपरांत कहानी बदलने लगी। भारत से थोक भाव से कामगर, क्लर्क, अफसर आदि वहाँ पहुंचने लगे। इसमें से अधिसंख्य मुस्लिम थे क्योंकि पूर्वी बंगाल (आज बांग्लादेश) के मुस्लिम बहुल होने के कारण वह आसान डेस्टिनेशन था। अराकान प्रदेश सीमा पर होने के कारण सबसे अधिक आक्रांत हुआ। डेमोग्राफी बदल गई। ब्रिटिश हुकूमत के संरक्षण में अब ये मुस्लिम अपने बिरादरों को पदों से नवाजने लगे। स्थानीय रेखान कहीं भी नहीं थे। यह प्रवृत्ति तबतक बनी रही जबतक ब्रिटिश मौजूद रहे। यह कहानी सारे बर्मा की थी। 5 साल के अंतराल में अकेले रंगून शहर में बाहर से आनेवाले लोगों की संख्या में 30% वृद्धि हो चुकी थी।
    इस समय तक अराकान में मुस्लिमो के विरुद्ध क्षोभ था जो बर्मा की मुख्य भूमि पहुंचते-पहुंचते सम्पूर्ण भारतीयों के प्रति बन जाता था।
    औपनिवेशिक संघर्ष की पहचान बन चुका था ये भारतीयों का विरोध। आगे दिखा भी जब 60 के दशक में सम्पूर्ण भारतीयों को वहां से भागने को विवश कर दिया गया।
    ……………………………………………
    आनेवाले भारतीय हिन्दू तो वहां घुलमिल गए। वहीं के होकर रह गये(यगार मोशे). अधिकांश बौद्ध बन गए। हालांकि कुछ विपरीत उदाहरणों का संकेत शरतचन्द्र अपने महत उपन्यास ‘श्रीकांत” में करते हैं। नायक श्रीकांत बर्मा प्रवास करता है। मगर भारतीय मुस्लिम समुदाय ही वहां की संस्कृति से अलग रहा और पुराने मुस्लिम जो वहां की संस्कृति में विलीन हो चुके थे, को मजहब के नाम पर अपने साथ करने की कोशिश की।
    1948 के पहले दो बड़े दंगे हुए थे। एक समस्त भारतीयों के प्रति थे जो एक तरह से औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक थे और उनकी जॉब आदि को खा रहे थे। दूसरा, 1938 वाला मुस्लिमों के प्रति था।
    1931 में भारतीय मुस्लिमों की एक संस्था ने एक किताब प्रकाशित की थी जिसकी हज़ार प्रतियां मुस्लिमों के बीच वितरित की गईं। यह एक मौलवी और एक बौद्ध भिक्षु के बीच हुई चर्चा पर आधारित थी। इसमें बुद्ध के प्रति बहुत कुछ अनर्गल कहा गया था। इसके जबाब में बुद्धिस्ट कम्युनिटी ने भी एक पर्चा प्रकाशित किया।
    1938 तक यह मसला ठंडे बस्ते में था । 1938 में एक भारतीय मुस्लिम ने इसे पुनर्प्रकाशित कराकर 2500 प्रतियां वितरित करवाईं। मामला भड़क गया। दंगा फैल चुका था। सरकार ने एक जांच आयोग बिठाया। जिसकी रिपोर्ट यह कहती थी कि यह किताब मात्र तात्कालिक कारण है। इसके पीछे बड़ा विक्षोभ छुपा है। इस आयोग ने अनुशंसा की कि सर्वप्रथम भारतीयों को बर्मा आने से रोक दिया जाए। इसी रिपोर्ट के आधार पर वहां विवाह को लेकर एक कानून बना जो यह निर्देशित करता था कि नॉन – बुद्धिस्ट से विवाह होने की सूरत में भी महिलाओं को संपत्ति और इनहेरिटेंस में बराबर की हिस्सेदारी मिलेगी। तलाक का समान अधिकार मिलेगा। कई और ऐसे क्लाउज थे जो सिर्फ नॉन-बुद्धिस्ट के साथ विवाह को लेकर थे।
    इसके पीछे कारण था। म्यांमार में स्त्रियों को संपत्ति से लेकर उत्तराधिकार में समान अधिकार प्राप्त थे। भारत से आये मुस्लिम इसे प्रैक्टिस नहीं करते थे। दूसरी बात, बर्मा में विवाह एक प्राइवेट अफेयर था। इस समाज को अबतक किसी गवाह की जरूरत नहीं पड़ी थी। एक दूसरे का फेथ भी राह में नहीं आता था। वहां के पुरातन बर्मी मुस्लिम भी इसी को फॉलो करते थे। जब भारतीय वहां गए तो बर्मियों ने देखा कि जो उनके मत से अलग मुस्लिमो से विवाह करती है उसका फेथ भी बदल जाता है। चौथी बात- तब के बर्मा में पुरुष और स्त्री के एक साथ रहने का अर्थ विवाह ही माना जाता था। ओपन सोसाइटी थी। भारतीय साथ रहते, बच्चे पैदा करते और छोड़कर फिर अपने देश निकल लेते।
    यह सब उस जांच आयोग की रिपोर्ट का विस्तार था।
    विक्षोभ पनपना अब शुरू हुआ… अबतक कोई छोटा मुद्दा तक न माना जानेवाला “विवाह” अब चिंगारी लिए हुए था।
    ………………………………..
    कितना खुला समाज होगा वह जो द्विजातीय, वर्णशंकरों को खुले दिल से बिना भेदभाव के अपनाता होगा। बर्मा के ज़रबादी निश्चित रूप से नृविज्ञानियों के लिए शोध का विषय हैं।
    अस्पष्ट तौर पर तो यह कम्युनिटी 19 वीं सदी से ही विद्यमान थी मगर बाद की जनगणनाओं ने जब इसे एक अलग श्रेणी में डाल दिया तो यह देखने को मिला कि इनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। ये ज़रबादी बाहरी मुस्लिमों और स्थानीय बौद्धों की संतानें थीं। इनके भीतर भी कई उपकोटियाँ थीं जैसे किसी के एक पैरेंट मुस्लिम हों और दूसरे बौद्ध, दोनों मुस्लिम हों मगर एक या दोनों के पैरेंट ज़रबादी हों।
    बर्मियों ने इन्हें आत्मसात कर लिया था। इनकी नागरिकता पर तबतक प्रश्न नहीं उठाए जबतक ये भारतीयों के प्रभाव से मुक्त रहे।
    आज इनकी स्थिति अच्छी नहीं।
    …………………………………..
    बर्मा एन्टीकोलोनियल मूवमेंट शुरुआत से ही “बर्मा बर्मियों के लिए” पर टिका था। अंग्रेजी राज में भारत से आनेवाले लोग जब उनकी भूमि, रोजगार आदि पर आधिपत्य जमाने लगे तो उनका एक औपनिवेशिक प्रतीक के रूप में चित्रण स्वाभाविक था।
    सम्पूर्ण भारत से लोग गए थे। तमिलनाडु, मालाबार, गुजरात के बोहरा- इस्माइली, संयुक्त प्रांत और सबसे अधिक बंगाल से। अराकान प्रदेश बंगालियों से भरा पड़ा था।
    डेमोग्राफी बदल रही थी और उनका सबकुछ उनसे ही छिन रहा था।
    भारतीय राजनीति से ऐसे में बर्मा भी अछूता न राह सका। 1909 में ही मुस्लिम लीग के बर्मा ब्रांच की स्थापना की गई। पीछे से कांग्रेस भी आई। भारत के क्षेत्रों के आधार पर कई और संगठन बने।
    इन सभी का स्वार्थ इसी में था कि बर्मा में ब्रिटिश बने रहें और इस तरह से पुनः ये लोग बर्मा नेशनल मूवमेंट के निशाने पर गए।
    वहां कर पुराने स्थानीय मुस्लिम कभी भी भेदभावकारी नीतियों का शिकार नहीं हुए थे। किंतु जब भारत में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार हुए तो भारतीय मुस्लिम बर्मा में भी सेपरेट एलेक्टरेट की मांग करने लगे। साइमन कमीशन के सामने अपने लिए विशेषाधिकारों की मांग की।
    स्थानीय बर्मी मुस्लिम भी इनके साथ-साथ आने लगे।
    हालांकि भारतीय और स्थानीय मुस्लिमो के मध्य भी कुछ विवाद हुए जिनमें भाषा का मामला सर्वोपरि था। भारतीय उर्दू के हिमायती थे जो बर्मियों के लिए एक अबूझ भाषा थी। विवाद इस बात पर भी था कि भारतीयों के चक्कर में बर्मी मुस्लिम भी पिसे जा रहे थे। ऐसे में उन्होंने अपना एक अलग संगठन खड़ा किया।
    ………………………………..
    द्वितीय विश्व युद्ध, जापान ऑक्यूपेशन
    जापानीज बर्मा पहुंच चुके थे। सुभाष की आज़ाद हिंद फौज भी साथ थी। ऐसे में बर्मा की मुख्य भूमि के कई भारतीय आज़ाद हिंद फौज के लिए काम करने लगे । हिन्दू-मुस्लिम दोनों समान रूप से शामिल रहे। हालांकि बहुत सारे भागकर भारत आ गए थे।
    Rakhine एक बॉर्डर स्टेट है। भारत(आज बांग्लादेश) में प्रवेश का द्वार। ब्रिटिश ने यहां एक V-फ़ोर्स का गठन किया जिसमें रोहिंग्या / बंगाली मुस्लिमों को हथियार देकर एक रिज़र्व फ़ोर्स के रूप में रखा जो जापानियों के भारत प्रवेश करने को दशा में उनकी रसद आदि की लाइन काटती।
    इन हथियारों का रोहिंग्या ने जापानियों के विरुद्ध प्रयोग तो न किया मगर इलाके में कत्लेआम मचा दिया। अनुमानतः न्यूनतम 20,000 और अधिकतम 50,000 RAKHINE बौद्ध इस नरसंहार में मौत के घाट उतार दिए गए। बौद्धों ने भी कहीं से कम हिंसा नहीं की। गांव के गांव साफ कर दिए।
    बाद में कुछ को जापानियों के आने से राहत मिली। मगर यह राहत दरअसल आनेवाले समय में एक अमिट दाग बनकर रह जानेवाली थी।
    जापानी सैनिकों ने मुख्यभूमि बर्मा में लूट-हत्या-बलात्कार से आतंक मचा रखा था। उनकी छवि बहुत ही खराब है आज के म्यानमार में भी।
    जापानियों द्वारा राहत मिलना Rakhine बौद्धों के लिए नासूर बन गया। एक तरफ रोहिंग्या उन्हें मारते थे तो दूसरी तरफ बर्मा की राष्ट्रीय सोंच उन्हें किनारे करती थी। आज भी यह स्थिति बनी हुई है। हालांकि मुस्लिम के ही विरुद्ध हो जाने के कारण कुछ परिवर्तन आये हैं।
    …………………………..
    भारत का विभाजन और म्यानमार
    यह ज्ञात है कि भारतीय राजनीति का असर बर्मा पर बहुत ही अधिक पड़ा था। जापानीज आधिपत्य हटने के बाद ब्रिटिश पुनः आ गए। मगर माहौल बहुत बदल चुका था। INA में शामिल हुए लोगों पर मुकदमा यहां भी चला। लेकिन जैसा भारत में हुआ, उसकी यहां भी पुनरावृति हुई।
    “सहगल-ढिल्लो-साहनबाज़” का नारा भारत में लगता था। इस आवाज में यह बात दब जाती है कि साम्प्रदायिक तौर पर विभाजित भारत में कई मुस्लिम सैनिकों ने कांग्रेस की सहायता लेने से इनकार करते हुए सिर्फ मुस्लिम लीग पर भरोसा रखा। कहना न होगा कि ये सभी अपनी नियति को प्राप्त हुए। बर्मा में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
    भारत भागे कई लोग वापस बर्मा पहुंचे । अबतक बर्मी राष्ट्रीयता युद्धपूर्व स्थिति से कहीं आगे जा चुकी थी। ब्रिटिश समर्थक लोगों की आवाज की अब कोई पूछ नहीं थी। वो अब द्रोही थे।
    विभाजन के दौरान ही बर्मा के अधिकांश मुस्लिम संगठन एक हो गए और एक एकीकृत अखिल बर्मा पाकिस्तान मुस्लिम संगठन का गठन किया। इसमें स्थानीय मुस्लिम शामिल नहीं थे।
    ………………………………..
    यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत का विभाजन होना ही है। बर्मीज भारतीय समुदाय भी ध्रुवित हो गया था।
    पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर लगे Rakhine स्टेट के रोहिंग्या नेताओं ने जिन्ना से संपर्क स्थापित किया और प्रस्ताव दिया कि उनके इलाके को भी प्रस्तावित पाकिस्तान में शामिल कर लिया जाए। हालांकि जिन्नाह ने बर्मी मामले में पड़ने से इनकार कर दिया मगर वहां के स्थानीय रोहिंग्या नेताओं ने एक अलग मुस्लिम राज्य के लिए संघर्ष शुरू किया जिसमें आज के Rakhine प्रदेश के कई क्षेत्र होते ।
    पूर्वी पाकिस्तान के कॉक्स बाजार से संचालित रोहिंग्या के हिंसक संगठन ने हत्याओं के दौर शुरू किया। बर्मा में ये उस वक्त मुहाजिद कहलाते थे। कई बाहरी लोग इस समय बर्मा में दाखिल हो गए। मीर कासिम उनका नेता था। Rakhine बौद्ध मारे जाने लगे।
    प्रारंभ में रोहिंग्या के इन संगठनों में स्थानीय रोहिंग्या न के बराबर थे। स्थानीय रोहिंग्या के कुछ लोगों ने तत्कालीन सरकार से अपने को हथियार देने की बात की जिसका वो भारतीय चिटगांव प्रदेश से आनेवाले मुहजिदों के विरुद्ध प्रयोग कर सकें। मगर किसी भी प्रकार की सहायता न दी गई। न सुरक्षा और न ही उन्हें स्वयं सुरक्षित किया गया। बहुत सारे रोहिंग्या ऐसे में कोई और विकल्प न होने के कारण उन चिट्गॉंव वालों के साथ हो गए। इसमें पाकिस्तानी हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता, कम से कम सिविल स्तर पर।
    चिंतित बर्मा और पाकिस्तान में एक संधि हुई। पाकिस्तान ने मीर कासिम को गिरफ्तार कर लिया।
    मगर उनकी गतिविधियां लगातार चल ही रही थीं। पूर्वी पाकिस्तान के जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों का समर्थन प्राप्त था उन्हें। ऐसे में पहली बार रोहिंग्या के संगठनों के विरूद्ध स्वतंत्र बर्मी सरकार ने सैनिक कार्यवाही की।
    यह बात ध्यान देने योग्य है कि अबतक रोहिंग्या को बर्मा के नागरिक के रूप में स्वीकृति मिली हुई थी। यह स्थिति 1982 तक बनी रही। इस दौरान हिंसक संघर्ष चलते रहे जो 1962 तक अपने चरम पर थे।
    ……………………………….
    पूर्वी पाकिस्तान की तरफ से आते मुहाजिदों को सेना के द्वारा कुचल दिया गया। इसी समय पहली बार हज़ारों रोहिंग्या को निर्वासित किया गया। कई मजबूरी में स्वयं अपनी भूमि छोड़ गए।
    लगभग इसी समय केंद्र ने एक अलग अराकान राज्य का प्रस्ताव दिया था। जाहिर है कि बौद्ध बहुसंख्यक रहते। रोहिंग्या संगठन इस बात पर विभाजित थे। कुछ यह कह रहे थे कि मुस्लिम बहुल इलाकों को( पूर्वी बंगाल की सीमा वाले) अलग रखा जाए । इस परिस्थिति में बौद्ध बहुसंख्यक इलाक़ों में पढ़नेवाले रोहिंग्या मुस्लिम पेशोपेश में पड़ गए। उन्होंने इस विभाजन का विरोध किया।
    हालांकि राज्य अस्तित्व में नहीं आया तब भी प्रशासन अब बौद्धों के हाथों में था। हर जगह भेदभावकारी नीतियां अपनाई गईं।
    इस अवस्था ने अपने को भारतीय मुस्लिमों से अलग माननेवाले रोहिंग्या को उनके करीब ला दिया।
    उधर मुख्यभूमि में बहुत कुछ ऐसा चल रहा था जो जनमानस की सोंच हर मुस्लिम के प्रति प्रभावित करता था।
    ……………………….
    भारतीय एवं बर्मी मुस्लिम
    बर्मी मुस्लिम वहां के बहुसंख्यक मत के बहुत ही करीब थे। दोनों की संस्कृतियों में विभेद करना एक तरह से असंभव था। बदलाव तब आने लगा जब भारतीय वहां थोक भाव से आने लगे।
    इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क था। भारतीय अधिक रिलीजियस थे , अपनी संस्कृति के प्रति अधिक सजग। अलग वेशभूषा , अलग अरबी नाम( बर्मी मुस्लिम स्थानीय नाम ही रखते थे), अलग भाषा।
    बर्मी मुस्लिम राष्ट्रीय आंदोलन के करीब थे जो एक तरह से एक स्वतंत्र राष्ट्र की प्राप्ति हेतु बुद्धिज़्म की नाभि से जुड़ा हुआ था। यह वक्त बुद्धिज़्म के पुनरुत्थान का था।प्रसन्न प्रभाकर
    इसके अलावा भारतीयों ने स्थानीयों को निम्न समझा। उन्हें ट्रेनिंग देनी चाही। भारतीय मुस्लिम भारत में हो रही राजनैतिक गतिविधियों के कारण, अपने को सकल विश्व के मुस्लिम ब्रदरहुड से जोड़ने के कारण एवं बर्मा में ब्रिटिश के समर्थक होने के कारण स्वतः ही स्थानीयों से भिन्न हो जाते थे जिनको सिर्फ और सिर्फ बर्मा की स्वतंत्रता से मतलब था। इन बर्मियों ने माइनॉरिटी के नाम पर सेपरेट एलेक्टरेट एवं स्पेशल प्रिविलेज की की मांग जो भारतीय मुस्लिमों द्वारा उठाई गई थी, का विरोध किया। यह बौद्धों के अनुकूल था जिनका कहना था कि रिलिजन जब एक प्राइवेट अफेयर है तो राजनीति में इसके बिनाह पर प्रतिनिधित्व और सुविधाएं क्यों ?
    (यहाँ यह बात समझी जा सकती है कि आज के म्यांमार में भी कानूनन मुस्लिम कोई एक एकल समुदाय नहीं । क्षेत्रीयता या अपने विशेष उद्गम (समय रेखा के साथ) को लेकर विभाजित किया गया है। इसी को मजहब के आधार पर एक करने की मांग ठुकरा दी गई। )
    शुरुआत में दोनों साथ हो गए मगर 1938 के दंगों ने बर्मी मुस्लिमों की आंखें एक तरह से खोल दीं जब भारतीय मुस्लिमों के विरुद्ध भड़का क्षोभ उनपर भी समान रूप से बरस पड़ा।
    बर्मी मुस्लिमों का बर्मा में कोई रिलीजियस सेंटर नहीं था जबकि भारतीयों ने आने के साथ ही जमायत उल उलेमा को स्थापित किया। उच्च शिक्षा के लिए भारत के देवबंद आदि रिलीजियस केंद्रों पर भेजने का चलन आया।
    आगे चलकर बर्मी मुस्लिमों ने शिक्षा हेतु भारत जाने का विरोध किया। वह स्वयं को अधिक बर्मी दिखलाना चाहते थे। उर्दू को लेकर विरोध हुआ जिसे भारतीय हर हाल में बनाये रखना चाहते थे। भारतीय वहां बर्मियों की तुलना में अधिक प्रभावकारी थे क्योंकि तब के राजधानी क्षेत्र रंगून में उनकी बहुतायत थी।
    आज़ादी के बाद परिस्थितियां बदलीं। नागरिकता के नियम कठोर कर दिए गए। बर्मी-बौद्ध राष्ट्रवाद चरम पर था। म्यानमार को एक बौद्ध राष्ट्र बनाने की बातें हो रही थीं। सिवाय एक मुस्लिम संगठन के सबने इसका विरोध किया।
    इसी बीच एक कानून आया था जो अपनी बीबी-बच्चे छोड़कर वापस भारत-पाकिस्तान जानेवाले मुस्लिमों को लेकर था। इसके अनुसार ये औरतें “स्वयं” तलाक ले सकती थीं। उनकी संपत्ति पूर्णतः अपना सकती थीं। इसका बहुत विरोध हुआ। मुद्दा यह था कि औरतों को तलाक का अधिकार कैसे? यह तो मजहबी मामले में हस्तक्षेप हुआ। यह तो स्थानीय बौद्ध प्रथा का मुस्लिम रीतियों पर अतिक्रमण हुआ !
    स्थानीय बर्मी मुस्लिम बहुत हद तक इससे अलग रहे।
    इधर बौद्ध जनता अब भारतीयों और स्थानीय मुस्लिमो में फर्क करना भूल रही थी… स्थानीयों की लाख कोशिशों के बावजूद। समय के साथ वर्तमान में यह फर्क मिट चुका है।
    बहुत भारतीयों को नागरिकता तो मिल गई थी मगर उनका भारत और पाकिस्तान से लिंक बना हुआ था। भारतीयों को गुलामी का प्रतीक माननेवाले बर्मी कब तक यह स्वीकारते !
    डिस्क्रिमिनेशन तो शुरू हो ही चुका था मगर आवाज तक को सुनना 1962 के सैन्य तख्तापलट के बाद बन्द हो गया।प्रसन्न प्रभाकर

    Reply
  3. सिकंदर हयात

    रोहिंग्या मुद्दे पर दो विचार ——————————————————————————————————————————————– रोहिंग्या भी हमारे अपने हे सरफ़राज़ कटिहारी Sarfraz Katihari
    2 hrs ·
    मेरा लेख आज के nbt पे ।
    Original article ये था ।
    ……………………………
    प्यारे अति विद्धवान मीडियाकर्मी,
    आपकी जानकारी की कमी है या आपका बदमाशी या आपकी ऐय्याश पसंद जिंदगी की जरूरत जिस कारण आपको बिना मोटी ऊपरी कमाई जिसको दलाली भी कहते है या कानून को ठेंगा दिखाने को आदत या कोई और कारण है , वो तो आप बेहतर जान सकते है । खैर, इनमे कोई से एक बात तो होगी ही जो आप मीडिया में लगातार रोहिंग्या वो भी भारत में रहने वाले रोहिंग्या को आतंकवाद से जोड़ के आप इनको भारत से बाहर करने की मुहीम चलाये हुए हो।
    इन सारे कटु लेकिन सत्य बात कहने का अपना अपना आधार है । हा तो आधार बताने के पहले थोडा थोडा इतिहास, कानून , अंतर्राष्टीय और भारतीय कानून दोनों पे ही बात कर लेते है ।
    रोहिंग्या का इतिहास :
    मुझे उम्मीद है के रोहिंग्या के बारे में सतही ज्ञान तो होगा ही के रोहिंग्या भारत की भूमि से अराकान में बसे भारतीय मूल के बंगाली को कहा जाता है। हा, भारतीय मूल के बंगाली इसलिए कह रहा हु क्यूके रोहिंग्या जिन दो काल (पहला 16वी से 18वी सदी के अंत तक , दूसरा 20 वी सदी के शुरुवात ) में अराकान में बसे थे तब समस्त बंगाल भारत का हिस्सा था, अगर म्यांमार को संघी के तरह अखंड भारत का हिस्सा जो के 20वी सदी में अलग देश ना भी मानु तब भी ब्रिटिश हुकूमत के वक़्त तो बर्मा इंडिया का हिस्सा था ही जिसको कोई इनकार नही कर सकता । हा, तो इस तरह दो बात हुई
    1) ये भारतीय मूल के है के जो सदियो पहले उस इलाके में बस गए थे ।
    2)अखंड भारत के विचार को ख़ारिज भी कर दिया जाए तो भी ब्रिटिश काल में वो उस हिस्से में बस गए थे , जब वो ब्रिटिश इंडिया के तहत इंडिया का हिस्सा था , अगर पहले बसावट की बात हो तब भी अराकान का राजा इंडिया राजा का मातहत था , मतलब इंडिया का ही हिस्सा था टेक्निकली और इंडियन बंगाली उस राजा के अनुरोध पे बसे थे ।
    वो बंगाली मुस्लिम कुछ आजके भारतीय बंगाल, उड़ीसा के हिस्से के थे तो कुछ आज के बांग्लादेश के , अगर एक मिनट के लिए (मिथ्या तौर पे ) मान भी लिए के वो सभी आज के बांग्लादेश के हिस्से से उस तरफ गये थे और आज वो अलग देश है , तब भी वो भारतीय मूल के ही कहलायेंगे वरना लाहौर के नजदीक लरकाना में पैदा हुए सूफी फ़कीर बाबा गुरु नानक देव साहेब , बांग्लादेश में पैदा हुए चैतन्य महाप्रभु, पेशावर के नजदीक पैदा हुए, पतंजलि महाभाष्य के रचयिता संस्कृत का प्रकांड विद्वान पाणिनि और नेपाल में पैदा हुए गौतम बुद्ध और कइयो को भी भारतीय कहना छोड़ना पड़ेगा ।
    छोड़ोगे इन सबको भारतीय कहना? अपने गुजरात का बीजेपी का वर्तमान मुख्यमंत्री रुपाणी भी तो बर्मा में पैदा हुए थे जो के बर्मा की आजादी के बाद भारतीय पे शुरू हुई हिंसा के बाद परिवार भारत वापस आये । पूर्व काल में भारतीय मूल के लोग बर्मा, श्रीलंका में ही नही बलके अफ्रीका ,सूरीनाम ,फिजी ,मौरीसस सहित कई देशो में गये थे इनमे से ज्यादातर ब्रिटिश काल में भारत के सभी हिस्सों से गये थे , और उन सबको भारतीय मूल के नागरिक कहते हो ना ?
    कानून :
    कानून पे चर्चा करना इसलिए जरूरी है के आजकल अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) के दो हमलो को आधार बना के आतंकवाद की चर्चा हो रही है , पागलपन का हद तो ये है के ARSA को ही नही बलके सभी रोहिंग्या को ही आतंकवादी से जोड़ के एक गन्दा कैंपेन चला रखे है तो पहली बात मान लेता हु के ARSA एक आतंकवादी संस्था है तो भी सभी रोहिंग्या आतंकवादी नही हुए जब कोई रोहिंग्या गलत करे तब उसपे कार्यवाही होगी ही , वरना तब तो दुर्दांत आतंकवादी संगठन LTTE, जिसके आतंकी ने भारत के प्रधानमंत्री सहित श्रीलंका के राष्ट्रपति और कई अहम ओहदेदारों और राजनेताओ की हत्या की थी , उनके खुले समर्थक तमिल आज भी बड़ी संख्या में भारत में शरण लिए हुए है । जिनमे से कई वापस जाने पे शायद गिरफतार भी हो जाए ।
    तो इस तरह अगर ARSA को अगर आतंकी संघटन मान भी लिया जाए तो भी रोहिंग्या पे कार्यवाही का कोई तुक नही होता है जब तक के सीधे तौर पे मुलव्विस ना हो , दूसरी महत्वपूर्ण बात है के भारत सरकार के कानून मंत्रालय के अनुसार रोहिंग्या की आतंकी गतिविधि में लिप्त होने का पुख्ता प्रमाण भी नही है ।
    लेकिन उससे बड़ी बात है शब्द आतंकवादी पे , क्या ARSA आतंकवादी संगठन है भी या नही ? क्या अराकान में अरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) के दो हमले जिसमे उसने अपनी पहली कार्यवाही अक्टूबर 2016 में किया तो दूसरी बार हमला इसी साल 2017 के अगस्त माह में किया । इसी दो हमले के आधार पे भारत की मीडिया और सत्तारूढ़ दल का एक धड़ा इसको आतंकी संगठन मानता है ।
    क्या कहता है संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार का सरकारी वक्तव्य?
    संयुक्त राष्ट्र का कानून आतंकवाद पे बहुत ही उलझा हुआ है , म्यांमार की सरकार जिसपे नस्लकुशी (ethnic cleansing) का आरोप है छोड़ के भारत सहित दुनिया की सभी सरकार इसको मिलिटेंट संस्था के तौर पे देखती है, खुद भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में ARSA की कार्यवाही को चरमपंथी घटना कहा था ना के आतंकी घटना इसके पीछे रक्षा का दायित्व ( Responsibility to protect , RtoP ) नामक एक वैश्विक राजनितिक प्रतिबद्धता है, जिसको संयुक्त राष्ट्र संघ के भारत सहित सभी राष्ट्रों ने 2005 के वैश्विक सम्मलेन में समर्थन किया था जिसमे नरसंहार , युद्ध अपराध , नस्लकुशी और मानवता के खिलाफ अपराध की स्तिथि में अभियुक्त के साथ पहले मध्यस्ता , फिर पूर्व चेतावनी , फिर आर्थिक प्रतिबन्ध और अंत में सैन्य कार्यवाही की अनुसंशा है । इसी RtoP की नीति में पीड़ित को शस्त्र द्वारा रक्षा करने का हक भी हासिल है । संयुक्त राष्ट्र संघ रोहिंग्या के मुद्दे को नस्लकुशी मान चुकी है , इस कारन रोहिंग्या को अपनी रक्षा करने का हक संयुक्त राष्ट्र संघ के कानून, जिसका समर्थन भारत सरकार ने भी किया था , के अनुसार मिल जाता है । इस बात के आधार पे ही ARSA को दुनिया फिलहाल आतंकी के बदले मिलिटेंट मानती है ।
    मतलब आप ना तो संयुक्त राष्ट्र संघ और दुनिया के कानून मानते है और नफरत में जिस प्रधानमंत्री के चारण-भाट की तरह गुणगान करते है उसके वक्तव्य और भारत सरकार के स्टैंड को को भी नही मानते है लेकिन इस मीडिया जंग जो के ख़ास मकसद से शुरू किया गया से सरकार पे दबाव पड़ा है लेकिन सरकार का दो विभाग, गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय दोनों में खुद ही इक्तेलाफ है । गृह मंत्रालय अपने हलफनामे में रोहिंग्या के आतंकवादियों और isi से जुड़े होने की बात किया है लेकिन जिस जम्मू कश्मीर में ये जुडाव खोजा गया है वहा अब तक कोई भी FIR ही दर्ज नही है ना ही भारत के किसी कोने में । इस कारण कानून मंत्रालय बोलता है के अभी इसके पुख्ता सबूत नही है ।
    रोहिंग्या के भारत द्वारा निष्काशन पे वर्तमान स्टैंड :
    भारत भले ही अंतर्राष्ट्रीय रिफ्यूजी कानून के किसी भी सहमती पत्र पे हस्ताक्षर नही किया है लेकिन सुप्रीम ने अपने इंटरप्रिटेशन में माना है के भारत का संविधान रिफ्यूजी के पक्ष में है इसलिए चकमा शरणार्थी को तो नागरिकता देने की बात सुप्रीम कोर्ट ने किया जबके उन चकमा को बांग्लादेश वापस अपने देश में बसाने को 1997 में सहमत हो चूका था , इसी कारण गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को इस मसले में हस्तक्षेप करने से मना किया है जो के केंद्र का कोई भी इदारा कानूनी मामलो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप से मना नही कर सकता है । केंद्र का कई तर्क में एक तर्क मनी लोंडडेरिंग और भारतीय बुद्दिस्त पे हमला का पूर्वानुमान है जो पूर्वानुमान कोई भी नही कर सकता है (हा ARSA से जुड़े है रोहिंग्या ये गृह मंत्रालय ने भी हलफनामे में नही डाला है क्यूके भारत सरकार ARSA को आतंकी मतलब टेररिस्ट नही बलके अतिवादी मतलब मिलिटेंट मानती है ) और अगर कोई ऐसा भविष्य में करता पाया गया तो उसपे कार्यवाही का प्रावधान भी है। बाकी मीडिया के ये महात्मा इस आधार पे केंद्र की मान्यता मान सकते है , तो इन महात्माओं को जान लेना चाहिए अभी कोर्ट में गृहमंत्रालय एक पक्ष है , केंद्र के संस्था को प्रूफ करना होगा ये बात , सुप्रीम कोर्ट ने कई बार केंद्र को गलत माना है , दुनिया और देश का कानून सामूहिक दंड के खिलाफ भी है , इसलिए भी अगर कुछेक घटना गृहमंत्रालय साबित भी कर दे (अब तक तो एक FIR भी दर्ज नही है, तो साबित क्या करेगी , ये एक बड़ा सवाल है ) तो भी दोषी पे कार्यवाही होती है ना के सामूहिक दंड , दूसरी बात केंद्र सरकार के अहम मंत्री और बीजेपी प्रवक्ता भी मीडिया में कहते आये है पहले बर्मा सरकार से बात होगी फिर उनको वहा भेजा जाएगा , जैसे बांग्लादेश से चकमा के लिए बात हुई थी भले ही बांग्लादेश सरकार के द्वारा ये बात मान लेने के बाद भी भारत सरकार ने उनको वापस नही भेजा और अंत में शरणार्थी से भारत नागरिक बना दिया जिसका उत्तर-पूर्व के राज्यों में कड़ा विरोध हो रहा है मुख्य सवाल है के बर्मा की हुकूमत ये बात मानेगी ? अगर बर्मा ने ये बात मान लिया तो फिर वापस भेजे जाने का कोई विरोध क्यू करेगा? भारत सरकार को बर्मा से पूर्व में भाग के आये हुए बर्मीज़ चाहे भारतीय मूल के कारण भगाए गये हो या धर्म के कारण जैसे के काचिन ईसाई , जो के बड़ी संख्या में दिल्ली के उत्तम नगर के पास काफी समय से बसे हुए है , सबके वापसी के लिए बात करनी चाहिए ।
    रोहिंग्या के भारत द्वारा निष्काशन पे क्या बदलाव होगा भारत की वैश्विक स्तिथि पे ?
    भले ही भारत किसी भी रिफ्यूजी कानून पे हस्ताक्षर नही किया है लेकिन आज भी भारत में लाखो रिफ्यूजी रह रहे है जिनकी देख भाल UNHCR कर रहा है । दुनिया के कई देश रिफ्यूजी के सेटलमेंट में आना कानी करते है लेकिन वो भी देश रिफ्यूजी के आ जाने पे उनको नही भगाते है क्यूके इससे उनके इमेज पे एक सवाल खड़ा हो जाता है । इसलिए, रिफ्यूजी से बचने के लिए अपने बॉर्डर को अच्छी तरह सील कर देते है , भारत में ये रोहिंग्या पहले से मौजूद है , इसलिए भारत सरकार निंदा का पात्र बनेगा । UNHCR रोहिंग्या के मसले पे पहले ही भारत सरकार की निंदा कर चूका है , भारत के इस कदम को रिफ्यूजी के साथ अमानवीयता के साथ धार्मिक आधार पे अल्पसंख्यक रिफ्यूजी के साथ भी भेदभाव के तौर पे देखा जाएगा और धार्मिक अल्पसंख्यक ख़ास के मुस्लिम और कुछ हद तक ईसाई विरोधी के तौर पे भारत का इमेज वर्तमान सरकार ने पहले ही दागदार कर चूका है । भारत से बाहर बसे हुए सिख संघटन भी दुनिया भर अपने सिखों के साथ धार्मिक भेदभाव का मुद्दा को उठा रहे है और मान्यता दिलवा रहे है । फिर ये एक नया मुद्दा ना सिर्फ भारत के नैतिक पक्ष जिस आधार पे भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के वीटो पॉवर राष्ट्र के लिए समर्थन जूटा रहा है , उसपे कुठाराघात करेगा बलके भारत के कई सारे सॉफ्ट पॉवर मसलन मानवता , धार्मिक सहिस्नुता इत्यादि पे भी सवाल उठायेगा । पहले भी संयुक्त राष्ट्र संघ धार्मिक भेदभाव पे टिपण्णी कर चूका है , अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो कूटनीति को परे रखते हुए भारत में ही भारत सरकार से इस मुद्दे पे चिंता जता चूका है रोहिंग्या मुद्दे पे सारी दुनिया रोहिंग्या के साथ खड़ी है , चीन जो के शुरुवात में म्यांमार सरकार के पक्ष में थी उसने भी वर्तमान स्तिथि में अपना स्टैंड को बदल लिया है । इस का बर्मा आज लगभग अकेला पढ चूका है ।
    क्या बीजेपी सरकार वाकई रोहिंग्या के विस्थापित कर सकती है ?
    अंग्रेजी में जवाब है BIG NO मतलब बिलकुल नही , इसलिए भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय और सत्तारूढ़ दल के नेतागण भी अलग अलग तरह के बात कर रहे है , प्रधानमंत्री की भी चुप्पी है । फिर ये कानूनी लड़ाई है और कोर्ट में केंद्र का गृहमंत्रालय ने बहुत ही बचकाने तर्क रखे है मतलब पूर्वानुमान , बिना FIR के क्राइम में संलग्न बता देना , FIR के बाद भी अपराध को साबित करना पड़ता है । दूसरी तरफ कानून मंत्रालय बोलता है के गृह मंत्रालय दावा पे वो पूरी तरह सहमत नही है उसके पास ऐसा कोई तथ्य या साक्ष्य नही है जिसके आधार पे ये बात पूरी गंभीरता से वो कह सके । गृह मंत्रालय ये भी जानता है के सुप्रीम कोर्ट को कानूनी चीज़ पे पूर्वानुमान के आधार या बिना साबित ( वो भी साबित कोर्ट को ही करना पड़ेगा ) के कोर्ट को सुनवाई से नही रोक सकता फिर भी ये बात वो उसी कोर्ट में कह रहा है और सुनवाई को सिर्फ टाल के वक़्त ले रहा है और कानून भी सामूहिक दंड के खिलाफ है । गृह मंत्रालय की बात की बात को कोर्ट शायद ही कभी माने क्यूके इससे उसकी विश्वसनीयता पे कुठाराघात होगा ।
    फिर बीजेपी सरकार इस मुद्दे को खत्म क्यू नही कर रही है ?
    दरअसल , वो इस मुद्दे के आधार पे अभी होने चुनाव में कैश करना चाहती है , अगर कुछ वक़्त के लिए इसको गरमाए रख के फायदा लेना चाहती है और बाद में मुकदमा हार जाने के बाद भी इसका फायदा उठाना चाहती है और भारत और भारतीय मुस्लिम के विद्वेष पैदा करके सत्ता पे पकड़ मजबूत रखना चाहती है , बीजेपी की मजबूती उसका मुस्लिम के साथ विद्वेष की भावना है
    साथ ही दुनिया में ये सन्देश भी देना चाहती है के भारत में भारत में हिंदूवादी सरकार की नीति भले ही चिंताजनक है लेकिन भारत का सेकुलरिज्म, सिविल सोसाइटी और कानून व्यवस्था काफी मजबूत है मतलब दो तरफा फायदा उठाना चाहती है, अगर मुद्दा को बनाता ही नही दोनों में कोई भी एक सन्देश नए ढंग से नही जाता है , अगर चर्चा पे विराम लगा देता तो दुनिया में सन्देश तो अच्छा जाता के भारत की सिविल सोसाइटी और कोर्ट मजबूत है लेकिन चुनावी फायदा नही होता , चुनावी फायदा के लिए दुनिया में भारत के इमेज का थोडा नुकसान तो पहुचा रही है , लेकिन बीजेपी देश के इमेज का सोचा ही कब है ? अगर इमेज का सोचा होता तो बाबरी मस्जिद हो या गुजरात का नरसंहार या उल जुलूल मुद्दों को कभी नही उठाती , गौ आतंकी पे कड़ी कार्यवाही भी करती । हा , एक लक्ष्य और भी है वो बंगलादेशी घुसपैठिये वाले प्रोपगंडा से अपने वोटर को डाइवर्ट कर देना । पहली बात की बीजेपी या देश के भद्रजन जितनी संख्या बताते उसका 1% भी अवैध बंगलादेशी मुस्लिम भारत में नही रहते है और जो रहते है उनको रेखांकित करके वापस भेजना तो लगभग असंभव है , इससे बांग्लादेश के साथ सम्बन्ध बिगड़ भी सकती है , जो भारत के हित के खिलाफ भी होगा । रोहिंग्या के मुद्दे को उठवा बंगलादेशी घुसपैठिये जो के 2014 के चुनाव के साथ साथ असम के विधानसभा चुनाव का भी मुख्य मुद्दा था । अब बीजेपी का वोटर चुनावी घोषणापत्र पे जवाब मांगने के लिए तैयार है और बीजेपी धारा 370 हो या राम मंदिर या बगलादेशी मुद्दा, सामान नागरिक संहिता सभी में फ़ैल साबित हो चुकी है । ये सब उसके कोर वोटर का मुख्य मुद्दा था बाकी महगाई , विकास इत्यादि मुद्दे पे भी सरकार का परफॉरमेंस संतोषजनक नही है , इसी तरह धारा 370 के बदले बीजेपी 35 A की बात की , सामान नागरिक संहिता जो के गोलवरकर के अनुसार भी भारत में असंभव है को डाइवर्ट करके तीन तलाक पे ले के आई , उसी तरह रोहिंग्या मुद्दा बंगलादेशी घुसपैठ को बदलने का एक सोचा समझा चाल है। रोहिंग्या मुद्दा उस समूह को कुछ संतोष प्रदान कर सकता है के सरकार कुछ कर रही है ।
    तो मीडिया के महात्मा अब कहो के तुम्हे क्या कहू ?
    उपरोक्त में कौन से टाइप के हो तुम या कोई और ढंग के हो तो वो वो भी साफ़ साफ़ कर देना , बाकी तुम्हारी महत्मगिरी से दुनिया भर में भारतीय मीडिया का इमेज भी कबाड़ा हो चूका है , वर्तमान सरकार के वक़्त दुनिया भर लोकतंत्र के दो स्तम्भ के इमेज का पहले ही कबाड़ा हो चूका है , तीसरे स्तम्भ मतलब भारतीय न्यायपालिका का इमेज अब भी दुनिया में बहाल है लेकिन चौथे स्तम्भ मतलब मीडिया अपनी क्रेडिबिलिटी भी निम्न स्तर पे पहुच चुकी है अगर अब और भी निम्न कर दोगे तो भारत की मीडिया को दुनिया मजाक का पात्र बन जायेगा वैसे भी भारतीय मीडिया फ्री मीडिया इंडेक्स में दिन ब दिन निचे होती जा रही है ।
    हा ,एक बात और जो मीडिया में ये कह रहे हो ना के मौलाना मसूद अजहर जैसा आतंकी जब रोहिंगिया मुस्लिमों के पक्ष में बोल रहा है तो रोहिंगिया मुस्लिम आतंकवादी हुए कि नहीं हुए ?
    तो महात्माओ ये सुन लो , रोहिंग्या के पक्ष में मसूद अजहर वो भी छदम नाम से पक्ष में बोल रहा है लेकिन रोहिंग्या के लिए खुल के सारी दुनिया बोल रही है जिसमे कई देश के राष्ट्राध्यक्ष से ले के शांति के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति भी बोल रहे है जिनकी संख्या काफी ज्यादा है।
    इसलिए ये चारण बनना छोड़ के मीडिया के दायित्व को समझो और भारत का इमेज बर्बाद मत करो । वैसे भी न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए गृह मंत्रालय का आज्ञा के तौर पे अनुरोध, के रोहिंग्या मुद्दे पे सुनवाई नही करे को कचरे के डब्बे में फेकने ही वाला है । कुछ नही तो कम से कम प्रधानमंत्री मोदी से ही सीख लो, जो के अपने और देश के इमेज के लिए हिन्दू ह्रदय सम्राट को पीछे छोड़ते हुए सभी लोगो को साथ ले के चलने की बात से भी ऊपर उठ के सांकेतिक स्तर पे पहुच चुके है जैसे के अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के मजार पे जाने के बाद जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ मस्जिद दर्शन पे भी पहुच चुके है , जिसका विरोध अब उनके कई अंध भक्त भी करने लगे । लेकिन ये मज़बूरी है मोदी की। इसलिए, अब भी वक़्त है सुधर जाओ, इतना ही कह ही सकता हु । बाकी चीज़ मीडिया के महात्मा तुम पे ही निर्भर करता है ।
    एक चिंतित भारतीय
    सरफराज कटिहारी——————————————————————————————————————Tufail Chaturvedi is with
    15 September at 19:24 ·
    रोहिंग्या मुसलमानों पर पांचजन्य में प्रकाशित यह लेख कुछ वर्ष पहले का है लेकिन वर्तमान में काफी प्रासंगिक है।)
    गजवा-ए-हिन्द यानी भारत को जीतने का पुराना स्वप्न, कुत्सित आंखों की विभिन्न चरणों की योजना सदियों से चल रही है। खासी सफल भी हुई है। वृहद् भारत की बहुत सारी धरती भारत से अलग की जा चुकी है। बंगलादेश को विराट भारत से अलग करने के षड्यंत्र के बारे में पिछले अंक में चर्चा हो चुकी है। उसी षड्यंत्र के एक और भाग म्यांमार की बातचीत आज करना चाहता हूं।
    मूर्ति पूजक, प्रकृति पूजक, बौद्ध तंत्र तथा बौद्ध मत की महायान शाखा को मानने वाला म्यांमार या बर्मा भारत, थाईलैंड, लाओस, बंगलादेश और चीन से घिरा हुआ देश है। इसका क्षेत्र 6,76,578 वर्ग किलोमीटर का है। इसकी धरती रत्नगर्भा है। माणिक जैसे कीमत जवाहरात, तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध यह देश बहुत समय से उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। यहां सैन्य शासन लगातार उपस्थिति बनाये हुए है। सैन्य शासन समाप्त होने के बाद भी राजनीतिक दल सैन्य अधिकारियों से भरे हुए हैं।
    बर्मा में भी मुस्लिम कन्वर्जन के साथ संसार के अन्य सभी देशों में होने वाली उथल-पुथल शुरू से है। सभी अमुस्लिम देशों, जिनमें इस्लाम का प्रवेश हो गया हो, में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने पर एक विशेष प्रवृत्ति पायी जाती है। हम मुसलमान अब अधिक संख्या में हैं और अन्य मतावालंबियों की जीवनशैली हमसे भिन्न है। अत: हम उनके साथ नहीं रह सकते। हमें अलग देश चाहिए। ये हाय-हत्या अन्य देशों में जैसे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने के साथ होने लगती है, वैसी ही बर्मा में भी होती आई थी। मगर इसकी स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के काल में विस्फोटक हुई। ब्रिटिश उपनिवेश रहे बर्मा पर द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सेना ने हमला बोला। ब्रिटेन के पांव उखड़ने लगे। पीछे हटते हुए ब्रिटिश राज ने बर्मा में जापानियों के खिलाफ अपने छिपे दस्ते बनाने की कोशिश में रोहिंग्या मुसलमानों को ढेरों शस्त्र उपलब्ध कराये। इन लोगों ने रोहिंग्या मुसलमानों को आश्वासन दिया कि इस युद्ध में यदि उन्होंने ब्रिटेन का साथ दिया तो उन्हें इस्लामी राष्ट्र दे दिया जाएगा।
    हथियार पाकर रोहिंग्या मुसलमान भारत के मोपला मुसलमानों की तरह उपद्रव पर उत्तर आये और उन्होंने जापानियों से लड़ने की जगह अरकान के बौद्धों पर हमला बोल दिया। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा भारत में गांधी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन के समय हुआ। जैसे अंग्रेजों के खिलाफ और तुर्की के खलीफा के पक्ष में आंदोलन करते मोपला मुसलमान हिन्दुओं पर क्रोध उतारने लगे और उन्होंने लाखों हिन्दुओं की हत्या की, उसी तरह रोहिंग्या मुसलमान अंग्रेजों की कृपा से अपना राज्य पाने की जगह स्वयं ही बौद्धों को मिटा कर इस्लामिक राष्ट्र पाने की दिशा में चल पड़े । जिस तरह 1946 में कलकत्ता में किये गए डायरेक्ट एक्शन में एक दिन में मुस्लिम गुंडों ने 10,000 हिन्दुओं को मार डाला था, उसी तरह 28 मार्च 1942 को रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा के मुस्लिम-बहुल उत्तरी अराकान क्षेत्र में 20,000 से अधिक बौद्धों को मार डाला।
    मई, 1946 में बर्मा की स्वतंत्रता से पहले अराकानी मुस्लिम नेताओं ने भारत में मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और मायू क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कराने के लिए उनकी सहायता मांगी। इसके पूर्व अराकान में जमीयतुल उलेमा ए इस्लाम नामक एक संगठन की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य भी अराकान के सीमांत जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना था। स्वाभाविक था बर्मा सरकार ने मायू को स्वतंत्र इस्लामी राज्य बनाने या उस पुर्वी पाकिस्तान में शामिल करने से इनकार कर दिया। इससे क्रुद्ध उत्तरी अराकान के मुजाहिदों ने बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी। मायू क्षेत्र के दोनों मुस्लिम-बहुल शहरों ब्रथीडौंग एवं मौंगडाऊ में अब्दुल कासिम के नेतृत्व में लूट, हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का भयावह खेल शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में इन दोनों शहरों से बौद्धों को या तो मार डाला गया अथवा भगा दिया गया। अपनी जीत से उत्साहित होकर सन् 1947 तक पूरे देश के प्राय: सभी मुसलमान एकजुट हो गये एवं मुजाहिदीन मूवमेंट के नाम से बर्मा पर लगभग आंतरिक आक्रमण ही कर दिया गया। स्थिति इतनी भयानक हो गयी कि 1949 में तो बर्मा सरकार का नियंत्रण अराकान के केवल अकयाब शहर तक सीमित रह गया, बाकी पूरे अराकान पर जिहादी मुसलमानों का कब्जा हो गया। हजारों बंगाली मुस्लिम उस क्षेत्र में लाकर बसाए गए। इस घुसपैठ से क्षेत्र में मुस्लिम आबादी काफी बढ़ गई। मुजाहिदीन यहीं नहीं रुके। अराकान से सटे अन्य प्रांतों में भी यही नीति अपनायी जाने लगी और ये पूरा क्षेत्र म्यांमार के लिए कोढ़ बन गया।
    बर्मा ने 1946 में स्वतंत्रता प्राप्त की और तभी से वहां उपद्रव प्रचंड हो गया। रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही बर्मा से अलग होकर पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बंगलादेश बन गया है) में शामिल होने का संघर्ष छेड़ दिया। रात-दिन हिंसा की घटनाएं होने लगीं। विवश होकर बर्मा सरकार ने सैन्य कार्रवाही के आदेश दिये। विश्व के लगभग प्रत्येक मुस्लिम देश ने बर्मा सरकार के इस अभियान की निंदा की परन्तु सरकार पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और सेना ने पूरे क्षेत्र में जबरदस्त रूप से आतंकवादियों को पकड़ना शुरू कर दिया। हजारों धावे किये गए। जिहादियों की कमर तोड़ दी गयी और अधिकतर जिहादी जान बचाकर पूर्वी पाकिस्तान भाग गये, कुछ भूमिगत हो गये और अन्दर ही अन्दर विश्व के कट्टरपंथी इस्लामी गुटों के सम्पर्क में रहे। अपनी शक्ति बढ़ाते रहे और जिहाद के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा करते रहे।
    ये अवसर उन्हें 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश के रूप में उदय के बाद फिर से मिला। बचे खुचे जिहादियों में फिर छटपटाहट शुरू हुई और 1972 में जिहादी नेता जफ्फार ने रोहिंग्या लिबरेशन पार्टी (आऱएल़पी़) बनाई और बिखरे जिहादियों को इकट्ठा करना शुरू किया। हथियार बंगलादेश से मिल गए और जिहाद फिर शुरू हो गया। परन्तु 1974 में फिर से बर्मी सेना की कार्रवाई के आगे पार्टी बिखर गई और इसका नेता जफ्फार पिट-छित कर बंगलादेश भाग गया। इस हार के बाद पार्टी का सचिव मोहम्मद जफर हबीब सामने आया और उसने मुस्लिम जिहादियों के साथ रोहिंग्या पैट्रियाटिक फ्रंट का गठन किया। इसी फ्रंट के सी़ई़ओ़ रहे मोहम्मद यूनुस ने रोहिंग्या सोलिडेरिटी आर्गनाइजेशन (आऱएस़ओ़) बनाया और उपाध्यक्ष रहे नूरुल इस्लाम ने अराकान रोहिंग्या इस्लामिक फ्रंट (ए़आऱआई.एफ) का गठन किया।
    इन जिहादी संगठनों की मदद के लिए पूरा इस्लामी जगत सामने आ गया। इनमें बंगलादेश एवं पाकिस्तान के सभी इस्लामी संगठन, अफगानिस्तान का हिजबे-इस्लामी, भारत के जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन, मलेशिया के अंकातन बेलिया इस्लाम मलेशिया ( ए़बी़आई़एम) तथा इस्लामिक यूथ आर्गनाइजेशन ऑफ मलेशिया मुख्य रूप से शामिल थे। पैसा अरब राष्ट्रों से आता रहा। पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आई़ एस़ आई़ ने रोहिंग्या मुसलमानों को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें अपने प्रशिक्षण केन्द्रों में उच्च स्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान किया। इसके बाद ये लड़ाई और भी हिंसक हो गयी। पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे। फिर भी बर्मा का सामान्य नागरिक अपनी सुरक्षा के प्रति उदासीन बना रहा। भारत की तरह वहां भी कायरतापूर्ण शान्ति और झूठी एकता का पाठ पढ़ाने वाले नेताओं का कुचक्र चल रहा था।

    ऐसे में मांडले के बौद्ध भिक्षु पूज्यचरण अशीन विराथु सामने आये। जिन्होंने अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को समझाया कि यदि अब भी वे नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसी दौरान कुछ हिंसक झड़पें हुईं कई बौद्ध मारे गये। शनै: -शनै: जनता इन झगड़ों का मूल कारण जिहाद और उसके कारण होने वाली दुर्दशा को समझने लगी। जब अपनी जिन्दगी पर प्रभाव पड़ता है तो स्वाभाविक ही नींद खुल जाती है। अंततोगत्वा जनता का धैर्य टूट गया और लोग भड़क उठे। यहां तक कि दुनिया में सबसे शान्तिप्रिय माने जाने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिया। फिर तो बर्मा की तस्वीर ही बदलने लगी। इस्लामी आतंकवाद की पैदावार हिंसक झड़पों एवं उनके भड़काऊ भाषणों पर पूज्य अशीन विराथु के तेजस्वी भाषणों से बर्मा की सरकार ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए विराथु को 25 वर्ष की सजा सुनायी थी। लेकिन देश जाग चुका था और विराथु के जेल जाने के बाद भी देश जलता रहा और जनता के जबरदस्त दबाव में सरकार को उन्हें उनकी सजा घटाकर केवल सात साल बाद 2011 में ही जेल से रिहा करना पड़ा। रिहा होने के पश्चात भी विराथु की कट्टर राष्ट्रवादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। और वे अनवरत रूप से अपने अभियान में लगे रहे।
    28 मई, 2012 को मुस्लिम गुंडों ने एक बौद्ध महिला का बलात्कार करके हत्या कर दी। इसके बाद पूरे बर्मा के बौद्ध अत्यंत उग्र हो गये और फिर तो वहां ऐसी आग लगी कि पूरा देश जल उठा। म्यांमार के दंगों में विराथु के भड़काऊ भाषणों ने आग में घी का काम किया। उन्होंने साफ कहा कि अब यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो अब शांत रहने का समय नहीं है। उन्होंने बुद्ध के अहिंसा-शांति के उपदेशों के रास्ते को छोड़कर आक्रमण की नीति अपनाने के उपदेश दिए। मोक्ष की साधना आखिर शांतिमय वातावरण चाहती है। रात-दिन हमलों, बम विस्फोटों से देश को बचाना शांति-अहिंसा के पालन के लिए ही आवश्यक है।
    उन्होने म्यांमार की जनता को साफ कहा कि अगर हमने इनको छोड़ा तो देश से बौद्धों का सफाया हो जाएगा और बर्मा मुस्लिम देश हो जायेगा।
    विराथु ने जनगणना के आंकड़ों से तथ्यात्मक रूप से सिद्ध किया कि मुस्लिम अल्पसंख्यक बौद्ध लड़कियों को फंसाकर शादियां कर रहे हैं एवं बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करके पूरे देश के जनसंख्या-संतुलन को बिगाड़ने के मिशन में दिन-रात लगे हुए हैं। जिसके कारण बर्मा की आन्तरिक सुरक्षा के लिये भारी संकट पैदा हो गया है। इनका कहना है कि मुसलमान एक दिन पूरे देश में फैल जाएंगे और बर्मा में बौद्धों का नरसंहार शुरू हो जाएगा। विराथु के विचारों का जनसाधारण में प्रचंड समर्थन देखकर वहां की सरकार भी झुकी और वहां की राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से कहा- इस्लामी आतंकियों को अब अपना रास्ता देख लेना चाहिए।
    मेरे लिए महत्वपूर्ण हमारे देश के मूलनिवासी हैं। मुस्लिम चाहें तो शिविरों में ही रहे या बंगलादेश जाएं।
    विराथु ने अपने देश से लाखों आतंकवाद के समर्थकों, प्रेरकों को भागने पर मजबूर कर दिया। वे अपनी बातें अधिकांशत: डीवीडी और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं। धीर-गंभीर विराथु दृष्टि नीचे किए शांत स्वर में अपने हर उपदेश में बौद्धों के संगठित होने और हिंसा का जवाब हिंसा से देने का उपदेश देते हैं। मंडाले के अपने मासोयिन मठ से लगभग दो हजार पांच सौ भिक्षुओं की अगुआई करने वाले विराथु के फेसबुक पर हजारों फालोअर्स हैं और यूट्यूब पर उनके वीडियो को लाखों बार देखा जा चुका है। छह करोड़ की बौद्ध आबादी वाले म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना तेजी से गति पकड़ रही है। बौद्ध भिक्षुओं को शांति और समभाव का आचरण करने के लिए जाना जाता है किंतु म्यांमार के अधिकांश बौद्ध आत्मरक्षा के लिए अब जिहादियों का तौर-तरीका अपनाने में भी कोई संकोच नहीं कर रहे हैं।
    म्यांमार में हुए कई सर्वेक्षणों के बाद ये प्रमाणित हो चुका है कि जनता एवं बौद्ध भिक्षु विराथु के साथ हैं। विराथु का स्वयं भी कहना है कि वह न तो घृणा फैलाने में विश्वास रखते हैं और न हिंसा के समर्थक हैं, लेकिन हम कब तक मौन रहकर सारी हिंसा और अत्याचार को झेलते रह सकते हैं? इसलिए वह अब पूरे देश में घूम-घूम कर भिक्षुओं तथा सामान्यजनों को उपदेश दे रहे हैं कि यदि हम आज कमजोर पड़े, तो अपने ही देश में हम शरणार्थी हो जाएंगे। म्यांमार के बौद्घों के इस नये तेवर से पूरी दुनिया में खलबली मच गई है। दुनिया भर के अखबारों में उनकी निंदा में लेख छापे जा रहे हैं परन्तु पूज्य चरण अशीन विराथु को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। वे पूर्ववत असली राष्ट्र आराधन में लगे हुए हैं।
    तुफ़ैल चतुर्वेदी

    Reply

Add Comment