भारत में कल्चर बन चुका है भष्ट्राचार – न्यूजीलैंण्डवासी ब्रायन की कलम से

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by — लेखक-ब्रायन,

दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए सम्पादित और अनुवादित किया है। –

न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल।

भारतीय लोग होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)

भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती

ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।

भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पडता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नही देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।

जून 2009 मे द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नही जानते कि इसका करे क्या। अरबो की सम्पत्ति मंदिरो मे व्यर्थ पडी है।

जब यूरोपियन इंडिया आये तो उन्होने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।

भारतीयो को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ कुछ गलत नही है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।
भारतीय कल्चर इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि

1। नैतिक तौर पर इसमे कोई नैतिक दाग नही आता। कोई भी अति भ्रष्ट नेता सत्ता मे आ जाता है, जो आप पश्चिमी देशो मे सोच भी नही सकते ।

2। भारतीयो की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास मे स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियो को रक्षको को गेट खोलने के लिये और कमांडरो को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत मे है

भारतीयो के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप मे बेहद सीमित युद्ध हुये। ये चकित करने वाला है कि भारतीयो ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे कितने कम युद्ध लडे। नादिरशाह का तुर्को से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लडा गया था। भारत मे तो युद्ध की जरूरत ही नही थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था। कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना मे लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।

प्लासी के युद्ध मे भी भारतीय सैनिको ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिये और पूरी बंगाल सेना 3000 मे सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने मे हमेशा पैसो के लेनदेन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 मे पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलो ने मराठो और राजपूतो को मूलतः रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहाँ भारतीयो ने सिर्फ रिश्वत के लिये बडे पैमाने पर गद्दारी की।
सवाल है कि भारतीयो मे सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यो है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशो मे ये सौदेबाजी का कल्चर नही है

3- भारतीय इस सिद्धांत मे विश्वास नही करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका “विश्वास/धर्म” ये शिक्षा नही देता। उनका कास्ट सिस्टम उन्हे बांटता है। वो ये हरगिज नही मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस मे बंटे और दूसरे धर्मो मे भी गये। कई हिंदुओ ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाये। परिणामतः भारतीय एक दूसरे पर विश्वास नही करते। भारत मे कोई भारतीय नही है, वो हिंदू ईसाई मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज मे परिणित हुई, जिसमे हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास मे खुद रिश्वतखोर है।

लेखक-ब्रायन,

गाडजोन न्यूजीलैंड

www.madhyamarg.com/mudde/article-of-brian-on-corruption/

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10 thoughts on “भारत में कल्चर बन चुका है भष्ट्राचार – न्यूजीलैंण्डवासी ब्रायन की कलम से

  1. सिकंदर हयात

    Vishnu Nagar
    9 hrs ·
    हम मतदाता क्या करें,बहुत ख़राब और कम ख़राब में से एक को चुनते रहे हैं।२०१४ में सबको लग रहा था कि मनमोहन सिंह की सरकार फिर आई तो हालात बेहतर नहीं बनेंगे ,फिर भी सिर्फ़ ३२ प्रतिशत मतदाताओं ने देश के बड़े -बड़े धनपतियों की कृपा से संचालित तडकभडक वाले चुनाव अभियान से प्रभावित होकर मोदीजी को गद्दी सौंप दी।बड़े -बड़े सपने दिखाने में ,मनमोहन सिंह और कांग्रेस के ख़िलाफ़ जोश भरने में बंदे ने जरा कंजूसी नहीं की।लगा कि यह बंदा आया नहीं और चमत्कारी बाबा की तरह देश का नक़्शा पलटकर रख देगा।देश के जागरुक लोग जानते थे कि ऐसा नहीं क्ष
    होगा, कतई नहीं होगा।लेकिन देश की जनता से ढेर सारे झूठ बोलकर भाई साहब ने देश का प्रधानमंत्री बनने का चिरसिंचित सपना पूरा कर लिया और देश गया भाड़ में।अब लोगों को मनमोहन सिंह में अच्छाइयाँ दिखने लगी हैं, जो निश्चित रूप से व्यक्तिगत रूप से मोदीजी के मुक़ाबले हीरा आदमी हैं, जिसने कभी अपनी ग़रीबी का रोना रोकर लोगों के सामने बड़े -बड़े आँसू गिराकर वोट नहीं माँगे।उनकी किसी संतान ,किसी दामाद ने कोई ग़लत फ़ायदा नहीं उठाया मगर जो होने दिया, जिस आर्थिक रास्ते पर वह चल रहे थे , उसका लोगों की भलाई से कोई ख़ास सबंध नहीं था, वह जनता के आदमी दरअसल थे नहीं,विद्वान थे अपने विषय के।अब मोदीजी से भी निराशाएँ शुरू हो गई हैं और इधर राहुल गाँधी ने अमेरिकी मीडिया को ऐसा मोहित किया है कि भाजपा द्वारा बहुप्रचारित लल्लू की उनकी छवि धुलपुंछ गई है।इससे भाजपा बहुत परेशान है।रोज अंडबंड बक रहे हैं।अमित शाह ने जो बयान दिया है राहुल को लेकर उसमें तो ख़तरनाक संकेत छुपे हैं और लगता है कि भाजपा राहुल के चरित्र हनन से लेकर -जो उसका प्रिय शग़ल है-उससे आगे भी किसी भी सीमा तक जा सकती है।अगले पौने दो साल भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए बहुत चुनौती भरे हैं।भाजपा सत्ता यूँ ही नहीं छोड़ेगी।इस बार नहीं लगता कि मान लें भाजपा चुनाव हारी तो सत्ता आराम से छोड़ देगी।कम से कम दोबार इस पद पर रहने का उनका प्रण है।पहले तो सांप्रदायिक कार्ड सहित सारे कार्ड जमकर खेलेगी।समझदार नेता सत्ता में बने रहने के लिए मोदीजी और यहाँ तक कि भाजपा से इतर विकल्प अभी से ढूँढने लगे हैं।देखिये आगे -आगे होता है क्या?राहुल की अमेरिका यात्रा से संकेत मिलता है कि वह बेरोज़गारी को बड़ा मुद्दा बनाएँगे। सचमुच यह मुद्दा है और युवाओं को आकर्षित करेगा मगर सत्ता में अगर आप आ गए तो आप भी कहीं मोदीजी साबित मत हो जाना।सपना ऐसा ही दिखाना ,जो सचमुच पूरा कर सको।जहाँ तक हो सकता है बड़े -बड़े ख़्वाब मत दिखाओ,अब लोग इसीसे ख़ुश हो जाएँगे कि जहाँ तक हो सका, कांग्रेस लोगों का बुनियादी समस्याएँ दूर करेगी मगर पूँजीपति चतुर हैं। वे मोदीजी का साथ भी नहीं छोड़ेंगे मगर राहुल को जकड़ने की कोशिश भी पूरी करेंगे और उनकी जकड़ -पकड़ में आ गए-जो शायद आ ही जाएँ-क्योंकि कांग्रेस को पास चुनाव लड़ने का वैसा पैसा नहीं है ,जैसा और जितना भाजपा के पास है।देखिये आगे -आगे होता है क्या!उम्मीद तो करनी चाहिए, सब ठीक होगा लेकिन सबकुछ उम्मीद के सहारे कहाँ और कब होता है लेकिन उम्मीद छोड़ी भी नहीं जा सकती क्योंकि और है क्या हमारे पास!Vishnu Nagar
    Rakesh Kayasth
    7 hrs · डॉक्टर अमरापुरकर की मौत से उभरे सवालों के जवाब किसके पास हैं?
    —————————————————–मुंबई के मशहूर ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के एक डॉक्टर हुआ करते थे, जिनका नाम था दीपक अमरापुरकर। पिछले महीने मुंबई के एक खुले मेनहोल में गिरकर उनकी मौत हो गई थी। एक मशहूर शख्सियत का इस तरह मेनहोल में गिरकर मर जाना हर किसी को सन्न कर गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय तक ने इसमें दखल दिया। पीएमओ ने महाराष्ट्र के चीफ सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखकर डॉक्टर अमरापुरकर की मौत की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने को कहा।
    जब जांच शुरू हुई तो अधकचरे विकास, संसाधनों के असमान वितरण, भ्रष्टाचार और महानगर में चल रहे वर्ग संघर्ष की पुरानी कहानियां एक-एक करके फिर से याद आने लगीं। पुलिस ने परेल के एक चाल में रहने वाले पांच लोगो को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि इन्ही लोगो ने मेनहोल खोला था, ताकि इनके घरो में भर रहा पानी गटर के रास्ते से बाहर निकल जाये। सभी लोगो पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
    गिरफ्तार किये गये लोगो के परिवार वाले अलग कहानी बयान कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौत एक बड़े आदमी की हुई है। गलती बीएमसी की है और अपनी कमी पर्दा डालने के लिए गरीबों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। सच और झूठ का पता जांच के बाद चलेगा या फिर शायद कभी ना चले लेकिन भारत के शंघाई की हकीकत हर मानसून की तरह एक बार फिर सामने हैं।
    सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल करीब 11 हज़ार लोगो की मौत रोड पर बने गड्डो में गिरने से होती है। मुंबई के गड्ढे तो पूरी दुनिया में बदनाम हैं। म्यूनिसपल कॉरपोरेशन के अरबो के बजट और कोर्ट की लगातार फटकार के बावजूद ये गड्डे कभी पूरी तरह नहीं भरे जाते।
    ना जाने वो कौन सा तंत्र था, जो इन गड्डो को भरने नहीं देता या फिर भरते ही दोबारा फिर से खोद देता है? नतीजा ये कि हर साल कई लोगो को जान से हाथ धोना पड़ता है। ताजा हादसा एक महिला बाइकर के साथ हुआ। बाइक गड्डे में घुसी, चलाने वाली महिला सड़क पर जा गिरी और पीछे से आ रहे ट्रक ने उसे वहीं रौंद दिया। मरने वाली उस महिला के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।

    साल 2011 की जनगणना के मुताबिक मुंबई की आबादी करीब पौने दो करोड़ है। शहर का पुराना जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर इतनी विशाल आबादी को ढोने की हालत में नहीं है। मुंबई की आधी आबादी झुग्गियों में रहती है, जहां सामान्य जिंदगी जीने लायक हालात नहीं है। झुग्गियों मे रहने वाली ये आबादी शहर की करीब 8 फीसदी जमीन का इस्तेमाल करती है। यानी बाकी की 92 फीसदी ज़मीन शहर की 50 फीसदी आबादी के नियंत्रण में है। मुंबई में संसाधनों का यह गैर मुनासिब बंटवारा एक ऐसे वर्ग संघर्ष का आधार तैयार करता है, जिसका खत्म होना मुश्किल है। अपराध लेकर तरह-तरह के संघर्षों की बड़ी वजह यही असमानता है। सवाल ये है कि इसे दूर करने के लिए सरकारों ने अब तक क्या किया है?

    आदर्श स्थिति यह है कि झुग्गियों को हटाकर उस ज़मीन का इस्तेमाल ऐसी परियोजनाओं के लिए किया जाये जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो को घर मिल सके। लेकिन मुंबई के इतिहास में अब तक झुग्गियों में रहने वाले सिर्फ डेढ़ लाख लोगो को पुनर्वास हो पाया है और उसमें भी ढेर सारी शिकायतें हैं। री डेवलपमेंट परियोजनाओं के तहत लोगो को फिर से उसी जगह मकान दिये जाने का प्रावधान है, जहां वे पहले रहते थे। लेकिन इस मामले में गंभीर गड़बियों की कहानियां हमेशा से रही हैं। बिल्डर-नेता नेक्सस इन गरीब लोगो तक रीडवलमेंट का फायदा नहीं पहुंचने देता है। ये बार-बार कहा जाता है कि सरकारी तंत्र में बैठे लोग मिलीभगत करके बिल्डर्स को फायदा पहुंचाते हैं। कई बिल्लर्स सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि नेताओं और अफसरों की मनमानी वसूली से उनपर बहुत ज्यादा अार्थिक दबाव है। एक बिल्डर ने तो यह बात बकायदा अपने सुसाइड नोट में लिखी।
    बिल्डर्स के साथ मिलीभगत का ताजा इल्जाम महाराष्ट्र की फड़णवीस सरकार के आवास मंत्री प्रकाश मेहता पर है। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने विधानसभा तक में यह मुद्धा उठाया है। चौहान का आरोप है कि स्लम रीहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) एक स्वायत्त संस्था है, इसके बावजूद आवास मंत्री ने उसे मनमाना आदेश दिया ताकि वे ऐसे प्रावधान करे जिससे एक खास बिल्डर को फायदा पहुंचे। घोटाला सैकड़ो करोड़ रुपये का है। मेहता के इस्तीफे की मांग लगातार उठती रही है। लेकिन सच पूछा जाये तो ऐसे आरोप ना तो पहली बार आरोप किसी सरकार पर लगे हैं और ना बचाव मे दी जानेवाली सफाइयों में कुछ नया है।Rakesh Kayasth
    राजनीतिक दल शहरी विकास की हमेशा एक चमकदार तस्वीर पेश करते हैं। जिसमें चमचमाती सड़कें, बड़े मॉल और शानदार परिवहन व्यवस्था हो। लेकिन इन दावों के बावजूद भारत में एक भी ऐसा शहर नहीं है, जिसे बुनियादी मापदंडो पर एक आदर्श शहर माना जा सके। अगर ज्यादा बरसात हो मुंबई ही नहीं बल्कि दिल्ली के भी बहुत से पॉश इलाके डूब जाते हैं। ड्रेनेज से लेकर ट्रैफिक व्यवस्था तक एक भी ऐसा बुनियादी मसला नहीं है, जिसे किसी सरकार ने पूरी तरह हल करके दिखाया हो। लेकिन बेशुमार वायदे ज़रूर हैं और इन वायदों के साथ है, विकास के नाम पर बनने वाली एक काल्पनिक छवि।Rakesh Kayasth
    हाल में अंग्रेजी के एक मशहूर अख़बार ने दिलचस्प आंकड़ा जारी किया था। नवी मुंबई में लाखों की तादाद में बने आधे से ज्यादा फ्लैट खाली हैं। यानी फ्लैट का कब्जा मिल चुका है, लेकिन ना तो मकान मालिक खुद रहता है और ना ही कोई किरायेदार। आखिर यह कैसे संभव है? यह संसाधनों के असमान वितरण, ब्लैक मनी की ताकत और विकास की काल्पनिक छवि का कमाल है। भविष्य में बनने वाले किसी एयरपोर्ट की कोई कहानी या भावी स्मार्ट सिटी का कोई नारा इस तरह काम करता है कि सारे इनवेस्टर दौड़ पड़ते हैं। कई आंकड़े बताते हैं कि भारत के महानगरों में रीयल स्टेट की कीमत पूरी तरह आर्टिफिशियल है। यानी कीमत डिमांड और स्पलाई के आधार पर तय नहीं हो रही है बल्कि एक धारण बनाकर कीमत बढ़ाई गई है। सिर्फ मुंबई ही नहीं बल्कि दिल्ली, गुड़गांव और नोएडा की भी यही कहानी है। भारत बड़े सपनों में जी रहा है लेकिन पानी, बिजली सड़क और गटर के बुनियादी सवाल अब भी अनसुलझे हैं। यही सवाल एक बार फिर सामने आया और मुंबई में राह चलते एक मशहूर डॉक्टर की मौत का कारण बना।
    (फोटो क्रेडिट— इंडियन एक्सप्रेस)Rakesh Kayasth

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  2. सिकंदर हयात

    ये बात जायज़ हे जो सुशोभित ने ब्लू व्हेल गेम के संदर्भ में कही वास्तव में वो सभी जो नब्बे के बाद जितना लेट पैदा हुए वो सभी उतना ही अधिक अपना बचपन खो बैठे बहुत दुखद नब्बे के जो जितना पहले पैदा हुआ शायद उसने उतना ही बेहतर बचपन जिया हे Sushobhit Saktawat
    21 September at 20:37 ·
    “चाचा चौधरी” और नीली व्हेल!
    _________________________________________________
    यक़ीनन, “चाचा चौधरी” का दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता था!
    “चाचा चौधरी” लाल साफा बांधते थे और उनकी धनुष जैसी मूंछों के छोर तीर की तरह नुकीले थे।
    बलिष्ठ “साबू” उनका संगी-साथी था, जिसकी भुजाओं में तो मछलियां मचलतीं, लेकिन जिसकी अक़्ल उसके घुटनों में बसती थी।
    “बिल्लू” के बाल उसकी आंखों के सामने लहराते रहते थे। जिस दौर में हमारी नानियां हमें हिदायत देती थीं कि बाल इतने ही बड़े हों कि माथा दिखता रहे, तब “बिल्लू” एक शैतान लड़के का उपयुक्त प्रतीक था।
    फ्रॉक पहनने वाली “पिंकी” बॉब-कट बालों में नियमित हेयरक्लिप लगाती थी।
    “रमन” तब के मिडिल क्लास वेतनयाफ़्ता व्यक्ति का “प्रोटोटाइप” था। स्कूटर चलाने वाला। टेलीफ़ोन बिल भरने के लिए क़तार में लगने वाला। लौकियों के लिए मोल-भाव करने वाला कोई लिपिक!
    ये तमाम चरित्र कार्टूनिस्ट प्राण ने रचे थे।
    बाज़ार में अपनी प्रासंगिकता गंवा देने वाले ये चरित्र आज भी अगर हममें से बहुतों को याद हैं, तो इसका कारण यह नहीं है कि वे बहुत विलक्षण थे। वास्तव में, इसके ठीक उलट, इसका कारण यह है कि वे बहुत आमफ़हम थे। मानो चिमटियों की मदद से हमारे आस-पड़ोस से चुने गए चेहरे हों।
    कार्टूनिस्ट प्राण से जब एक बार उनके कार्टून-चरित्रों की लोकप्रियता का राज़ पूछा गया तो उन्होंने भी यही कहा था कि “वे इसलिए लोकप्रिय हैं, क्योंकि वे बहुत मामूली हैं। और बहुत विनम्र।”
    अख़बारों में कार्टूनिस्ट के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले प्राण कुमार शर्मा ने वर्ष 1969 में जब पहली बार “लोटपोट” के लिए चाचा चौधरी का किरदार रचा, तब हिंदी के पास अपना कोई लोकप्रिय “कार्टून स्ट्रिप” नहीं था।
    अख़बारों में “फैंटम” और “सुपरमैन” जैसे अतिमानवीय कॉमिक-स्ट्रिप छाए रहते थे। तब छपने वाली कॉमिक्सें भी विदेशी कॉमिक्सों का अनुवाद भर होती थीं। इन मायनों में प्राण को उचित ही भारतीय कॉमिक्स जगत का पितामह कहा जा सकता है। मॉरिस हॉर्न ने उन्हें अकारण ही “भारत के वॉल्ट डिज्नी” के खिताब से नहीं नवाज़ा था।
    1980 के दशक का वह दौर था, जब दूरदर्शन पर बुधवार को “चित्रहार” आता था और रोज़ शाम ठीक 7 बजकर 20 मिनट पर वेद प्रकाश या सलमा सुल्तान “समाचार” सुनाते थे, तब गर्मियों की छुट्टियों में “सितौलिये”, “बैठक-चांदी” या “लंगड़ी-पव्वे” से ऊबे बच्चे कॉमिक्सों से मन बहलाया करते थे।
    महज़ आठ आने में (डाइजेस्ट हों तो एक रुपया) में ये कॉमिक्सें चौबीस घंटों के लिए किराये पर मिल जाती थीं। तब गली, मोहल्लों, नुक्कड़ों पर जूट की रस्स‍ियों पर औंधे मुंह टंगी इन कॉमिक्सों का दृश्य आम था। आज वह मंज़र खो गया है।
    “सुपर कमांडो ध्रुव”, “नागराज”, “डोगा”, “हवलदार बहादुर”, “बांकेलाल”, “फ़ाइटर टोड्स”, “भेड़िया” इत्यादि तब बच्चों की कल्पनाओं में रचे-बसे होते थे, लेकिन सबसे लोकप्रिय थे कार्टूनिस्ट प्राण द्वारा रचे गए “चाचा चौधरी” और “साबू”।
    पुलक और प्रमोद के इस सहज-रंजक माध्यम से बच्चे पढ़ने में दिलचस्पी लेना सीखते, चित्र-भाषा के रहस्यलोक में विचरने के सुख से पहले-पहल परिचित होते और यथार्थ व फ़ंतासी के द्वैत को बड़े मासूम तरीक़े से बूझते।
    शायद उस पीढ़ी के बच्चे “पथेर पांचाली” के दुर्गा और अपु के अंतिम वंशज थे, जिनके लिए कांस के सफ़ेद फूलों की लहर के बीच काला धुंआ छोड़कर गुज़र रही रेलगाड़ी दुनिया का सबसे बड़ा विस्मय थी!
    बाद इसके, फिर भूमंडलीकरण की सर्वग्रासी सुनामी ने जिस चीज़ पर सबसे पहले मर्मांतक प्रहार किया, वह बच्चों का अबोध विस्मय ही था। कार्टूनिस्ट प्राण के मामूली और मध्यवर्गीय किरदारों को तो ऐसे में अप्रासंगिक और यहां तक कि “हास्यास्पद” भी हो ही जाना था।
    उस पीढ़ी की जगह अब एक उद्धत, उत्सुक, अस्थिर और सूचना-व्याकुल पीढ़ी चली आई है। हद है कि अब तो आत्मसंहार भी गूगल के एप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकने वाला “गेम” बनकर रह गया है, गोयाकि जवान होकर मर जाना महज़ एक अफ़साना हो, अफ़वाह हो, जिसके साथ हम अपने अंगूठों की जुम्बिश से खेलते हुए अपनी ऊबी हुई दोपहरों को भर सकते हैं, जैसे किसी ख़ाली सूटकेस में रद्दी अखबारों को ठूंसा जाता है!
    शायद, एक अबोध पीढ़ी के बदले में चतुर-चपल और सूचनाओं से लैस पीढ़ी अंतत: एक उपयोगी सौदा हो, लेकिन शायद यह एक महंगा सौदा है!
    यक़ीनन, “चाचा चौधरी” का दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता था! या शायद, आख़िरकार यह पूरी तरह सच नहीं ही हो।
    भूमंडलीकरण की कुशाग्रताओं के साथ ढाई दशक में “अढ़ाई कोस” चलने के बाद अंतत: शायद हमें समझ आए कि “चाचा चौधरी” उस कंप्यूटर से अधिक मेधावी नहीं हो सकते थे, जो युद्धों को एक खेल में तब्दील कर सकता है और आत्मनाश को नीली मछलियों के भुलावों में!
    फिर भी, ज़िंदगी के कई पहलू ऐसे होते हैं, जिनमें वक़्त से पिछड़ जाना ही बेहतर होता है। और यह बात इतनी साफ़-सरल है कि “साबू” भी इसे बड़ी आसानी से समझ सकता है, जिसकी अक़ल उसके घुटनों में बसती थी!
    Sushobhit Singh Saktawat

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  3. सिकंदर हयात

    ————- Tiwari
    8 mins ·
    जेएनयू से पढ़े लिखे और दयाल सिंह कालेज में आरक्षण कोटे से पढ़ा रहे एक दिव्यांग भीमटे ने देवी दुर्गा को वेश्या कहा है। कल ही किसी ने यह जानकारी दी थी शायद इस उम्मीद में कि मैं कोई टिप्पणी करुंगा। लेकिन इस पर कुछ टिप्पणी करने जैसा है नहीं।
    मनोरोगियों से आप क्या उम्मीद करते हैं कि वो स्वस्थ्य मनुष्य की तरह बात करेगा? ये २२ प्रतिज्ञा वाले बीमार और मनोरोगी हैं जो कुंठा में जी रहे हैं। इसलिए कुछ न कुछ ऐसा बोलते रहेंगे कि आप उत्तेजित होकर इनकी चर्चा करें। अगर आप इनकी चर्चा करते हैं तो ये सफल हैं, और अगर आप इनकी कही बात पर जोर का ठहाका लगाकर आगे बढ़ जाते हैं तो ये असफल हो जाते हैं। बीमार आदमी को दया की जरूरत होती है, गुस्सा की नहीं। मेरी नजर में यह दिव्यांग भीमटा गुस्से का नहीं, दया का पात्र है। इन पर दया करने की जरूरत है।———————————————————————- तिवारी ये कह रहा हे की ये लोग उल्टा सीधा बोलकर प्रचार चाहते हे वास्तव में सेम यही हरकत खुद तिवारी भी दो साल से कर रहा हे वो ही क्यों हर कोई आज प्रचार के पीछे पागल हे तिवारी सूफी संत आदि कुछ लोग बेहद चतुर भी होते हे वो खुद प्रचार लेते हे देते नहीं हे खेर प्रचार की इस बसड़ से होने वाले फ़ायदेबाज़ो की लिस्ट बनाई जाए तो सबसे ऊपर फायदे में हे नंबर वन पर मोदी और सबसे नीचे और नीचे हे हमारी विचारधारा

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  4. सिकंदर हयात

    भाजपा विधायक जोशी ने किया दलित के घर भोजन Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    25 September at 09:43 · Dehra Dun ·
    जिसका भी उल्लू टेढ़ा हो जाता है वह उसे सीधा करने के लिए मुंह उठा कर दलित के घर का रुख करता है । वहां हलवा , पूरी भकोस कर मीडिया वालों को लन्च , डिनर देता है । फिर अखबार tv में आ जाता है , छा जाता है । यह शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी । लेकिन वह भंगी बस्ती में रुक कर उनका मैला भी साफ करते थे । फिर राहुल गांधी को उसके किसी ट्रेनर ने यह जुगत बताई । वह कभी रात को भी दलित की झोपड़ी में सो जाता है , और उसके सुरक्षा कर्मियों की चहल कदमी और सीटियों से पूरा मोहल्ला रात भर हलकान रहता है । और अब हर ऐरा गैरा यह करने लगा । निदान :-
    1:- जिस दलित के घर ये जाते हैं , वह इन्हें फल , मेवा , खीर , हलवा की बजाए वह चीज़ ( अर्थात सुअर का मांस ) खिलाये , जिसे वे गरीब धनाभाव और मज़बूरी में खाते हैं ।
    2:- भोजन से पहले इनसे टट्टी सफवाई जाए , जैसा गांधी करते थे ।
    3:- इनके घर भी दलित किसी दिन सपरिवार भोजन पर अपने जानवरों के साथ जा धमके ।
    फिर देखते हैं इनका दलित प्रेम ।———————————————————————– गरीबो दलितों को चाहिए की वो खासकर इन संघियो जोशियो को इन्हे इस प्रकार की दावत दे ——————-साहित्य अकादमी दुवारा पुरुस्कृत मराठी आत्मकथा लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ अनुवादक सूर्यनारायण रणसुभे लिखते हे चूहे खरगोश मछली नेवला हिरन गोह लखापक्षी बदक बगुला कछुआ पांगली बिल्ली सूअर गीदड़ कबूतर केंकड़ा भेद बकरी मेना सरस मोर किते नाम गिनाऊ इन सबके मांस मेने खाये हे ————–हमारी बिरादरी के सम्भा भीमा और तुलसीराम हमे पड़ोस में रहते थे कभी कभार हमारे बीच झगडे होते थे और ये झगडे किसी एक का सर फूटने पर ही रुकते ——- कारण सूअर के पिल्ले तूक्या शशि नया हमारे सूअर के पिल्लो को चुरा कर ले जाते और भूनकर खाते ——– तुलसीराम पांडुरंग माणिक दादा भगवान अन्ना किसी बड़े त्यौहार के दूसरे दिन जवान सूअर या मादा सूअर को काटते इस समय हम छोटे बच्चे सूअर को पकड़ने में मदद करते तुलसीराम सूअर पकड़ने हेतु उनके पीछे जाल लेकर गलियों में दौड़ता जाल में फंसने के बाद सूअर के चार पैरो को वह रस्सी से बांधता और माणिक दादा के कंधो पर रखता झोपडी के पास ही सूअर को काटने की जगह बनाई गयी थी हमारी छोटी फौज पुरे गाँव में घूम घाम कर घास फुस लकड़ियाँ उपले आदि इकट्ठी करती सूअर भूनने की जगह पर हम इस जलावन को लेकर रख देते गाँव की सवर्ण औरते इसी स्थान पर शौच के लिए आती दादा अन्ना हम बच्चों को कहते देखो बच्चों हम तुम्हे सुर का सबसे बढ़िया मांस ( सूअर की पीठ के नीचे का मांस ) देंगे पहले किसी झाड़ू से पुरे मेले को हटाकर जमीं साफ करो हमारी फौज झाड़ू बनती और पुरे मैदान को साफ़ करती . फिर तुलसीराम लोहे की सब्ब्ल से उस सूअर को मारता धीरे धीरे सूअर निष्प्राण हो जाता उसके बाद उस सूअर के आस पास आग लगाकर उसे भून लिया जाता . उस समय गांव की सवर्ण औरते थोड़ी दूर शौच के लिए आती गाँव की सभी औरते दिशा मैदान के लिए हमारी झोपडी के पास आती . सवेरे सवेरे दर्जन औरते वहां आती सभी और मैल ही मैल हमें वहां से चलना भी मुश्किल हो जाता ऐसे में हम इस हगनहट को हम साफ़ करते यही सूअर भुनते और खाते सूअर को ठीक से भूनने के बाद तुलसीराम उसे काटता पहले पेट फाड़ उसकी अंतड़िया बाहर निकाल देता . माणिक दादा कलेजी निकाल कर उसके छोटे छोटे टुकड़े हम में बाँट देता हम बच्चे उस गरम कलेजी के टुकड़े को बगैर चबाय निगल लेते हाथ और मुंह खून से लाल हो जाता . बार बार हम हाथ फैलाते और कलेजा मांगते बस्ती के कुत्ते वहां इकट्टे हो जाते . वे अंतड़िया उठाने के लिए झगडते . तुलसी राम अंतड़िया दूर लेकर फेंकता . सभी कुत्ते इकठ्ठा होकर वह झपटते भोकते . तुलसीराम धीरे धीरे मांस के टुकड़े काटने लगता चर्बीदार मांस हम सीधे वाही कहना शुरू कर देते . कलेजा और चर्बी खाते समय मैदान में सवर्ण हगते हुए दिखती हमें यह सब खता देख वे नाक पर साडी औढ लेती . में सकता चर्बी और भी मिलती रही और में खाता रहू नारियल की तरह यह चर्बी जायकेदार लगती . सवर्ण औरतो को नाक पकड़ कर बैठना हमें कुछ न लगता अगर हमारे खाने से इतनी ही नफरत तो ये यहाँ हगने ही क्यों आती हे ऐसा में सोचता वैसे उनके हगने से हमारा फायदा ही होता था हमारे सूअर उनका गु खाकर ही तैयार होते थे इस कारण औरते यहाँ हमारे घर के आस पास हगती रहे ऐसा मुझे लगता लक्ष्मण गायकवाड़

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  5. सिकंदर हयात

    Pawan Saxena
    · अब गरबा एक निकृष्ट और अश्लील उत्सव है।
    गरबा का मूल आधार तो अम्बे माता की पूजा है पर आजकल जो गरबा चलता है उसमें पूजा कहां होती है। गरबा का परिवेश सनातन की पूजा पध्दतियों के प्रतिकूल है। आप गरबा में जाने वाली लड़कियों के कपड़े देखिए। कई लड़कियों की टॉप पीछे से पूरा खुला होता है सिर्फ एक डोरी होती है जो आपात स्थिति को बचाने के लिए लगी होती है। ऐसी अवस्था मे लड़कियां अजनबी लड़कों के साथ नाचतीं हैं। लड़कियों के लिए दुपट्टा तो तो ऐसे अप्रचलित हो गया जैसे कंप्यूटर में फ्लॉपी डिस्क। लड़कियों की चोली का साइज भी छोटा होता जा रहा है। ऐसे में डांडिया करती हुयीं अनजान लड़कों के बीच नाचते हुई झुकती हैं तो उनके वक्षस्थल तक दिख जातें है। जोश में नाचते हुए तेज पद-चापों पर वक्षस्थलों का ऊर्ध्वाधर आयाम भी छुपाए नहीं छुपता।
    आपने सोचा कि ये वामी हमेशा होली पर पानी, दीवाली पर प्रदूषण, गणेश उत्सव और काली पूजा पर विसर्जन के खिलाफ, रक्षा बंधन के खिलाफ लिखतें है पर किसी वामी ने कभी गरबा के खिलाफ नहीं लिखा? लिखेंगे भी क्यों, वहां तो दुश्मन का दिल भी बहलता है। कई मुसलमान आकर गरबा करते है हिन्दू लड़कियों के साथ। जिनके लिए मंदिर का प्रसाद या सीढ़ियां भी अछूत है उन्हें गरबा में आने कोई दिक्कत नहीं।
    कई अम्बेडकरवादी पूरे साल अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाएं मानते हैं, पर जब गरबा करने का मौका मिलता है तो अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाएं गटर में डाल कर अम्बे माता के सामने गरबा करते हैं।
    आप ही सोचिए कि ऐसे गन्दे उत्सव में आप अपनी बहन या बेटी को भेजेंगे जहाँ मुसलमान गरबा करने की प्रतीक्षा में बैठें हैं?
    हमारे हिंदुत्ववादी लोग गरबा में उमड़ी भीड़ को देख कर बहुत खुश होतें हैं कि इतने हिन्दू आ रहे है। जहाँ बटेगी खीर, वहां लगेगी भीड़। गुरुद्वारे में भीड़ मुफ्त में बंटने वाले खाने के लिए लगती है और गरबा में हिन्दू लड़कियों के लिए।
    हम हिंदूवादी खुद दोहरा चरित्र रखते है। वैलेंटाइन डे को अश्लीलता परोसने वाला त्योहार बतातें है, जिसका मैं भी समर्थन करता हूँ, पर गरबा की अश्लीलता पर होंठ सिले रहतें है। यद्यपि अधिकतर गुजराती भाजपा समर्थक हैं, इसके बाद भी मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ क्योंकि मै हिंदुत्व समर्थक पहले और भाजपा समर्थक बाद में हूँ।
    गरबा में सनातन नहीं, अश्लीलता का शूद्रत्व है। यह रोग पूरे भारत मे अय्याश और अज्ञानी हिंदुओं में फैल चुका है ! हिंदुओं को चाहिए कि गरबा जैसे घटिया और अश्लील उत्सव पर जल्दी ही बैन लगाएं।
    — Sanjay Mishra————————–सुमित सनातनी लेखक-दिनेश कुमार प्रजापतिगरबा – उजालों की आड़ में छिपा एक अंधा खेल :-
    विश्व का सबसे बड़ा सेक्स मेला #गरबा परंपरा के नाम पर खुला सेक्स
    #एक लड़की…”मुझे स्ट्रॉबेरी बहुत पसंद है”
    #दूसरी लड़की…”पर मुझे तो चॉकलेट बहुत अच्छा लगता है, खासकर डार्क चॉकलेट” कह कर आँख मारती है
    “अरे यार कोई मैंगो के बारे में भी तो बताओ”
    #तीसरी लड़की बीच में बोल पड़ी…
    यह सब तो ठीक है, लेकिन एक बात माननी पड़ेगी…. जो बात नेचुरल में होती हैं उसका तो कोई जवाब नहीं … उसके सामने बाकी सब फीके होते हैं…. “असली का कोई मुकाबला नहीं”
    #चौथी लड़की दार्शनिक अंदाज में बोली….
    हां यार !!! यह तुम एकदम सही कह रही हो… “उसकी तो बात ही कुछ और है”
    “it’s a fun to having the real thing in…oh! dear l just can’t resist the heat n the passion of the moment. …”
    इसके बाद एक बेशर्म खिलखिलाहट वातावरण में फैल जाती हैं और लड़कियां एक दूसरे को हाथ मार कर हाई-फाई देतीे हैं …..
    ये 4-5 लड़कियों की आपसी बातचीत किसी फ्रूट फेस्टिवल को लेकर नहीं है…ना ही किसी खाने पीने की चीज को लेकर हैं…. यह बात हो रही है नवरात्रि में #डांडिया खेलने वालों की… #कंडोम के #फ्लेवर की….
    शारीरिक_संबंध बनाते समय कहीं गर्भ न ठहर जाए….. इसके लिए अलग-अलग कंपनियों के अलग-अलग खुशबू वाले कंडोम के इस्तमाल करते है ….
    कितना आसान है #धर्म_का_पजामा पहन के
    #नाड़ा_खोल_देना
    और #चूड़ीदार_सरकाना ….
    #घाघरा_लहँगा_उठाना ।
    जी हाँ….
    नवरात्रि के नौ दिन पूजा का तो पता नहीं पर #खुले_सेक्स का खुला बाज़ार ज़रूर हो गया है. …
    लड़कियों द्वारा खुद को बेहतरीन तरीके से सजना सँवरना और अच्छे से अच्छा परिधान पहनना ऐसा लगता है लड़कों को लुभाने की कोई प्रतियोगिता चल रही है…
    कहने के लिए #डांडिया_खेला जाता है पर असल मकसद #गुल्ली_डंडा और #कबड्डी_खेलना होता है…. वह भी कही भी.. किसी भी अंधेरे कोने में …. दीवार के सहारे …. फ्रेश होने के लिए बुक कराए गए कमरों में …..या पार्किंग में खड़ी कार का इस्तेमाल बखूबी झूम झूम कर पूरी शिद्दत के साथ किया जाता है।
    रात भर कौन नाचता है !!! कोई बता सकता है ??
    इंसान एक घंटा नाचेगा… दो घंटा नाचेगा …फिर तो थक कर सो ही जाएगा…. पर लड़के लड़कियां रात भर गायब रहते हैं ….दिन भर सोते हैं और रात को फिर जाते हैं !
    ऐसा कौन सा डांडिया खेलने जाते हैं जो उनको रात भर बाहर रहना पड़ता है ।
    लड़कियों की बातें चोली ….यानी कि एक डोरी गले पर और एक डोरी कमर पर ….बस !
    आगे से खूब डीप गले जिसने उनके स्तन के सिर्फ निप्पल ही छुप पाते हैं….
    लड़कियां लेटेस्ट मेकअप वह भी नॉन ट्रांस्फ़रेबल ताकी चिपका चिपकी में और होंठों से होंठ चूसते और खाते वक्त फैला हुआ मेकअप चुगली ना कर दे किसी से !!!
    ऐंटी रोमियो के नाम पर साथ चल रहे लड़के लड़की को सरे आम बेइज़्जत कर देते हैं लेकिन धर्म के नाम पर खुले ये को त्योहार के नाम पर किसी को दिक्कत नहीं है और मीडिया में कितना इसका प्रचार किया जाता है !
    अब ये गरबा राते अपने पैर गुजरात और महाराष्ट्र से अलावा दूसरे प्रदेशों में भी फैला रही हैं….और इसकी जद में हमारे बच्चों के आने का भी डर है….
    यह अपर क्लास का धर्म के नाम पर नंगा नाच ही तो है। जिसका इंफेक्शन अब मिडिल क्लास को भी लगने लगा है।
    नवरात्रि के समय इस दो जगहों (गुजरात और महाराष्ट्र) में कंडोम की और गर्भ न ठहरने देने वाली गोलियों की बिक्री में बेतहाशा बिक्री होती है।
    ये कैसा त्योहार है जिसमें बच्चे अपने चरित्र का हनन स्वयं करने में संकोच नहीं करते ?
    क्यूँ धर्म के नाम पर माँ बाप रात भर बाहर रहने की छूट दे देते हैं ?
    क्यूँ सेक्स का नाम लेने भर से शरमाने वाले समाज ने धर्म के नाम पर खुली छूट दे दी ?
    ये पर्व अब
    #चल_संयासी_मंदिर_में
    #तेरा_चिमटा_मेरी_चूड़ियां
    #दोनों_साथ_बजाएंगे
    #साथ_साथ_खनकाएँगे
    से अधिक कुछ नहीं रह गया है !!

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  6. सिकंदर हयात

    Vikas Agrawal
    17 September at 21:06 ·
    जब इस मुल्क में लालू प्रसाद और ममता बनर्जी के समर्थक हो सकते हैं, गुरमीत राम रहीम के हो सकते हैं. तो नरेंद्र मोदी के भी हो सकते हैं. इसमें बुराई क्या है? स्वीकार कीजिए. मैं नरेंद्र मोदी का समर्थक हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि आज़ादी के बाद यह पहली सरकार है जो आम आदमी को राहत देने की सोच रखती है. सड़कें बन रही हैं. मनरेगा में भ्रष्टाचार बहुत कम हुआ है.
    नोटबंदी के बाद अगर टैक्स पेयर्स की संख्या बढ़ती है, तो निश्चित तौर पर पहले से टैक्स दे रहे आदमी पर टैक्स का बोझ कम होगा. तीन साल पहले जब हरदोई में था तो सब मिला कर साढ़े पाँच छः लाख का आईटीआर फाइल करता था. और मुझे समझ नहीं आता था कि यह पैसा है कहाँ जो मैं कमा रहा हूँ. जबकि मेरे एक मित्र जिनके दो राइस मिल, एक आटा मिल और गल्ले का काफी बड़ा काम था, वो साढ़े तीन लाख का फाइल करते थे. उनसे उनकी असली सालाना कमाई के चौथाई पर भी टैक्स लिया जा सके तो मुझे टैक्स स्लैब की छूट में कम से कम एक लाख का फायदा होगा.
    मार्केट में पैसा कम घूम रहा है, छोटे उद्योग अभी दिक्कत में हैं, मगर यह भी सोचें कि एक दुकानदार या उद्योगपति हर चीज़ के लिए व्यापारी नहीं है. अस्सी से लेकर नब्बे प्रतिशत जरूरी चीजों के लिए वो उपभोक्ता भी है. तो महँगाई कम होने से उसको भी राहत है.
    कमी बस यह लग रही है कि ब्यूरोक्रेसी और नेतागिरी की शोशेबाजी अभी यथावत है. मंझोले स्तर के अधिकारी की सेवा में छः होमगार्ड लगे हुए हैं. नेता जी का कहना ही क्या. जब जनता से उम्मीद की जा रही है कि देश के विकास के लिए महँगा तेल खरीद ले, और जनता स्वीकार भी कर रही है तो आपका भी फर्ज बनता है कि नेताओं के काफिले में फ्री के पेट्रोल की बरबादी कम करें.
    देश तो विधायक जी और सांसद जी का भी है. डीएम साहब का भी है, कमिश्नर साहब का भी है.Vikas Agrawal
    24 September at 12:10 ·
    छोटे शहर में रहने वाले लोगों के लिए बच्चों को पढ़ाना कभी आसान नहीं रहा, या तो अपने बच्चों को रिश्तेदारों के घर फ्री का नौकर और दूसरे दर्जे का नागरिक बनने के लिए उनके हाल पर छोड़ दें या फिर हॉस्टल ढूंढे और चिंता करते रहें कि खाना खाया होगा या नहीं, दूध मिलता होगा या नहीं, सिगरेट तो नहीं पीने लगेगा, बिगड़ तो नहीं जाएगा वगैरह वगैरह. कई लोग भाग्यशाली भी होते हैं. आराम से पढ़ाई पूरी हो जाती है, कई उतने भाग्यशाली नहीं होते. लड़कियों के साथ दिक्कत हज़ार गुना बढ़ जाती है क्योंकि अस्सी परसेंट लड़का यह सीखते और देखते बड़ा होता है कि छेड़ने और पीछा करने से लड़की पट जाती है. और लड़की पटाना जवान हो रहे लड़के के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि बड़े लोग बताते हैं कि वो जवानी जवानी नहीं, जिसकी कोई कहानी न हो.
    बच्चियां जो बाहर पढ़ने जाती हैं, उन्हें सबसे ज्यादा इसी दिक्कत का सामना करना पड़ता है. छेड़छाड़ का विरोध करेंगे तो तेजाब डाल देगा, बदनाम कर देगा, दीवार पर नाम लिख देगा. मोबाइल नंबर बांट देगा, फोटो मॉर्फ करके वायरल कर देगा.
    ऐसे में लड़की से उम्मीद की जाती है कि वो चुपचाप सह ले और किसी तरह कोर्स पूरा करके घर आ जाए. ढांचा ही नहीं है ऐसा कि हम अपनी लड़कियों को सुरक्षा दें पाएं.
    सरकार हमें डेवलपमेंट नहीं चाहिए. हमें सुरक्षा चाहिए. हम बारह घंटा लाइट में काम चला लेंगे. बीस साल से चला ही रहे थे. गड्ढे वाली सड़कों से काम चला लेंगे, इतने साल से चला ही रहे थे, और खरीदारी के लिए मॉल, आधुनिक कारें, एलसीडी, एलईडी, फलाना ढिमाका कुछ नहीं चाहिए. हमें सुरक्षा चाहिए. जानवरों से सुरक्षा. हम जानवरों के साथ नहीं रह सकते. पचास साल से रह रहे हैं, अब और नहीं रह सकते. और यह नाकारा सिस्टम जो सिर्फ नेतागिरी और अफसरशाही को संरक्षण प्रदान करता है, अब बोझ हो गया है इससे मुक्ति चाहिए. केवल उसी आदमी के दिमाग कानून का खौफ बचा है जिसका कोई रिश्तेदार अफसर या नेता नहीं है. और जिसका है वो कानून से ऊपर है. नेता का लड़का किसी लड़की के पीछे पड़ जाए तो उसकी रक्षा केवल भगवान ही कर सकते हैं.
    विकास की जरुरत अभी नहीं है देश को, जितना हो चुका बहुत है, प्लास्टिक सर्जरी के बेहतरीन इलाज खोजे जाएं, इससे बेहतर होगा कि किसी बच्ची के चेहरे पर तेजाब डालने की किसी की हिम्मत न पड़े. खौफ हो कि कपड़े तक हाथ पहुँचने से पहले तोड़ दिया जाएगा तो किसकी हिम्मत होगी जींस में हाथ डालने की.Vikas Agrawal
    22 September at 21:52 ·
    NDTV के बिकने की खबर के बाद बहुत सारे लोग एक फोटो शेयर कर रहे हैं संबित पात्रा जी की, जिसमें वो कोई भोकाली प्रतिज्ञा कर रहे हैं. कि मैं फलाना मैं यह, मैं वो. जैसे जमाने भर के आयुर्वेद माने जाने वाले नुस्खे राजीव दीक्षित जी के नाम कर दिए जाते हैं और तमाम फिल्मी संवाद चाणक्य नीति के नाम पर चिपका दिए जाते हैं, वैसी ही प्रतिज्ञा चिपका दी गई है संबित पात्रा पर. पात्रा जी जब कल सोकर उठेंगे तो पाएंगे कि वो आदमी से पोस्टर में तब्दील हो गए हैं. राजीव दीक्षित और चाणक्य जी के बीच की किसी चीज़ का पोस्टर. इसके थोड़े दिन बाद वो 2029 या 2034 में मोदी जी के उत्तराधिकारी के उत्तराधिकारी बना दिए जाएंगे.
    इसे संबित पात्रा की NDTV पर विजय के तौर पर पेश किया जा रहा है, मगर मालिकाना हक बदलने से कुछ बदलेगा, इसकी संभावना कम है, क्योंकि सामने वाले ने विक्टिम प्ले करना शुरू कर दिया है.
    वैसे पात्रा जी के समर्थक अगर इस विजय से उत्साहित हैं, तो सबसे ज्यादा निराशा उन्हें ही हाथ लगेगी जब पाएंगे कि NDTV बदलने से कुछ हाथ तो लगा ही नहीं. बल्कि इससे तो पहले अच्छे थे. एनडीटीवी सरकार के लिए धरोहर है. जब तक कपड़े फटवाने के लिए रवीश कुमार हैं, तभी तक सरकार के पास शांति से काम करने का मौका है. नहीं तो जनता के मुँह खून लग गया है, अगर मनीष तिवारी जैसे लोग हफ्ते दर हफ्ते बयान न दें, तो जनता मोदी हाय हाय करने लगती है.
    संबित पात्रा को हीरो NDTV ने बनाया है. और संबित तभी तक हीरो है जब तक निधि राज़दान खलनायक हैं. जनता को खलनायक चाहिए. ताकतवर खलनायक. अभी संबित को जनता निधि राज़दान और रवीश कुमार से जूझता पाती है, तो वो नायक हैं. जब ब्राह्मण शिरोमणि उत्कलवासी डॉक्टर संबित पात्रा अकेले बचेंगे, तब कौन जाने उन्हें ही खलनायक बना दिया जाए.Vikas Agrawal
    18 September at 21:50 ·
    मृणाल पांडे काफी दिन से चर्चा से बाहर थीं. अब वो चर्चा में हैं. तमाम कमाई गई, उगाही गई उपलब्धियों के बावजूद उनका परिचय लेखिका शिवानी की बेटी के तोर पर देना ज्यादा सुविधा जनक रहा करता था. मुझे तो बहुत दिन बाद उनके महिला होने का ही पता चला. इस उधारी के परिचय की टीस भी रही होगी उन्हें. रिटायर मेंट के बाद तो और कसकता होगा कि यार ऐसे ही कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे. लेकिन जैसा कि टीवी विज्ञापन में दिखाते हैं कि नई शुरुआत करने की कोई उम्र नहीं होती. और इधर सरकार भी स्टार्ट अप की बहुत बात कर रही है, तो मृणाल पांडे जी ने भी कम पैसों का उद्योग लगाया है, मोदी गरियाओ उद्योग.
    एक छोटी सी फोटो और उसके डेढ़ लाइन कैप्शन की बदौलत मृणाल जी इतना लोकप्रिय हो चुकी हैं कि अगर चाहें तो विनोद दुआ के साथ मिलकर अपना कुकरी शो शुरु कर सकती हैं. बुआ पकाए मामा खाए. अकेले भी शुरु कर सकती हैं, मगर प्लेट में खाना लिए हुए दुआ जी ऐसा सजते हैं जैसे सनी लिओन.
    और अगर बीफ हो तो बात ही क्या. मृणाल जी बीफ के बारे में क्या विचार रखती हैं पता नहीं. मगर चूंकि विनोद जी बता चुके हैं कि वो देश के लिए खाते हैं, तो मृणाल जी भी देश के लिए पका तो सकती ही हैं.
    पकाने का अनुभव है वैसे उन्हें. एक बार धीमी आंच पर पकाया था जब नंदन वाले जय प्रकाश भारती जी की लीगेसी को लीप दिया था. मृणाल जी के संपादक बनने के बाद रस ही चला गया नंदन कहानियों में से. पत्रिका बरबाद हो गई. खैर पांडे मैम ने जीवन में जो भी खोया था, वो एक दिन में पा लिया है.
    हालिया उपलब्धि के बाद मृणाल जी के पास अब इस देश में पाने के लिए क्या बचा रह जाता है. वैसे जैसा कि इस देश की परंपरा है कि यहाँ दो ही प्रोफेशन अल्टीमेट की श्रेणी में आते हैं, नंबर दो पर फिल्में और नंबर एक पर राजनीति. तो अब या तो मृणाल जी को किसी फिल्म में शाहरुख खान की माँ का रोल मिले या सक्रिय राजनीति में शरद यादव इनको नितीश कुमार जी की जगह जेडीयू का अध्यक्ष बना दें. वैसे ये जातीय आधार पर शरद यादव जी के फर्मे और योजनाओं में फिट नहीं बैठतीं, मगर पूंजीवादी और फासीवादी प्रधानमंत्री पर अशोभनीय टिप्पणी करके इन्होंने सामाजिक न्याय का कैप्सूल कोर्स पूरा कर लिया है. क्वालिफिकेशन पूरी है. असाइनमेंट का इंतज़ार है.
    Vikas AgrawalVikas Agrawal
    10 September at 10:28 ·
    रवीश भाई ने फेसबुक पोस्ट के आधार पर एक आदमी पर जान से मारने की धमकी या प्लानिंग जैसा कुछ आरोप लगाया. मुझे ताज्जुब है कि रवीश भाई ने ऐसा क्यों किया. मैं सर की जगह भाई इसलिए कह रहा हूँ कि अब वो और मैं सेम लेवल के हो गए हैं. मामूली फेसबुकिया लेखक. पहले वो छपी किताब के लेखक और टीवी पत्रकार थे. हम लोग उनको बड़े आदमी की नज़र से देखते थे. मगर सब खत्म हो गया अब.
    मानो कि अगर कोई मित्र फोन करके बताए कि फलां आदमी गिनती के सात लोगों को इकट्ठा करके आपको गाली दे रहा है, तो मैं अपने मित्र का आभार प्रकट करुंगा कि उसने मेरे बारे में कुछ गलत सुना तो मुझे बताया. मगर ठलुए गलियर से लड़ने तो जाउंगा नहीं. देखने भी नहीं जाउंगा. मगर रवीश जी चले जाते हैं, और उसका शोर भी मचाते हैं. इसलिए अब वो मेरे छोटे भाई हैं. मैं ज्यादा मैच्योर हूँ और मैं बड़ा भाई हूँ. लेकिन मेरा नाम ब्रजेश कुमार पांडे नहीं है.
    मैं अगर दो चार दिन में रवीश कुमार जी के ऊपर आधा घंटा खर्च करता हूँ, तो बस इसलिए कि मुझे उसमें आनंद आता है. इसलिए थोड़े ही कि लोग मुझे रवीश भाई का सब्स्टीट्यूट मान लेंगे. ऐसा प्रयास कर रहे हैं लोग. और उसमें बुराई भी नहीं है. कैरियर दिख रहा है उनको. मगर ऐसे समाज में जहाँ रवीश कुमार जी को खुद अपनी लिखी सस्ती किताब बेचने के लिए चार खूबसूरत कंधों का सहारा लेना पड़ता है, वहाँ उनकी नकल से केवल सस्ता मनोरंजन ही मिल सकता है, रोटी नहीं चल सकती.
    मेरे जैसे लोग तो, जिनके लिए नौकरी और आजीविका महत्वपूर्ण है, वो रवीश भाई को मनोरंजन की निगाह से ही देखते हैं और उसी में खुश हो जाते हैं.
    अच्छा जो लोग उनके समर्थक हैं, उनकी स्तिथि काफी खराब हो जाती है ऐसी हालत में, वो भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री अपना ट्विटर अकाउंट खुद नहीं चलाते होंगे. लोग होंगे, टीम होगी. और यह टीम कितनी काबिल है यह हम दिल्ली विधानसभा चुनाव में देख ही चुके हैं. यह चुनाव भाजपा ने फेसबुक पर लड़ा था. सब आपिया दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया था. मैदानी हकीकत जानने की जरूरत ही नहीं समझी गई थी. और जब नतीजा आया तो केजरीवाल की सत्तर में से सढ़सठ सीटें आईं थीं. तो ऐसे काबिल लोगों के, जिनका रवीश भाई खुद भी मजाक बनाते रहते हैं, के किसी आदमी को ट्विटर पर फॉलो कर लेने से आप प्रधानमंत्री पर जिम्मेदारी तय कर रहे हैं, तो फिर आपका कुछ नहीं हो सकता करते रहिए. न कोई संज्ञान ले रहा है, न किसी को फर्क पड़ता है.
    आज आप आम फेसबुकिए के लेवल पर आ गए हैं, कल किसी अंतर्वासना टाइप साइट पर घरेलू आत्मकथाएं लिखने वाले गंजेड़ी झा के लेवल तक आ जाएंगे. हमें क्या है. हम कोई और ढूंढ लेंगे.Vikas Agrawal
    24 September at 15:14 ·
    कांग्रेस ने सबसे अच्छा काम यह किया कि बुद्दिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों का एक वैचारिक ईको सिस्टम तैयार किया जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसको जिलाए रखता है और जैसे ही स्तिथियां अनुकूल होती हैं, कांग्रेस वापस आ जाती हैं. पहले की तरह ही ताकतवर होकर. जैसे सत्ता उसकी नियति है. 2003 में जब इंडिया शाइनिंग का शोर था और यह माना जा रहा था कि वाजपेयी का कोई विकल्प ही नहीं है, यह सिस्टम अपना काम कर रहा था, भाजपा के विरोध में भी और भाजपा के अंदर घुस कर भी. और 2004 में क्या हुआ. भाजपा औंधे मुँह गिरी. सहयोगियों की हालत और खराब.
    भाजपा सोचती है कि उसके पास भी एक सिस्टम है संघ. संघ भी भाजपा का पोषण करता है, मगर वो रक्षण से ज्यादा शिक्षण में विश्वास रखता है. वो केवल काम करना सिखाता है, सेवा करना सिखाता है, राजनीति नहीं सिखाता. संघ मध्य वर्गीय लोगों का संगठन है,
    एडजस्टमेंट सिखाता है, जगह बनाना नहीं सिखाता.
    इस बार सत्ता मोदी जी के हाथ लगी थी, गुजरात में बड़ा अच्छा काम किया था. तीन साल में सरकार के हर सही गलत काम को डिफेंड करने के लिए ओपीनियन लीडर्स का एक ग्रुप खड़ा कर लेना चाहिए था, जो नहीं किया गया. आपके पास हेमा मालिनी और अक्षय कुमार जैसे चेहरे तो हैं, मगर क्रेडिबिलिटी क्या है उनकी? कितनी यूनिवर्सिटियों में अपने आदमी बिठा पाए, बिठाने का छोड़ो, किसी अधिकारी, वीसी से कोई भाजपाई कह भर दे, वो नहीं है, यह साबित करने के लिए पागलपन की हद तक चला जाएगा. कितने अखबारों के संपादक आपके आदमी हैं? सोशल मीडिया पर ताकतवर होने का दम भरती है यह सरकार. मगर हकीकत यह है कि फ्री वाले सपोर्टरों के बल पर है यह ताकत. और ताकत भी कहाँ, सिर्फ फेसबुक ट्विटर पर.
    वर्ल्डप्रेस ज़ीरो. वहाँ रोज फर्जी आर्टिकल लिखे जा रहे हैं, दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के, दस्तावेज तैयार हो रहे हैं, आप खुश हैं कि इतने करोड़ फॉलोवर बन गए. और फॉलोवर भी कैसे जो कौवा कान ले गया वाले स्कूल में पढ़ते हैं.
    आपको जेएनयू चाहिए, कन्हैया चाहिए, जावेद शबाना चाहिए. नहीं तो यादव जी लोगों ने ओबीसी हक मारु मोर्चा बना लिया तो आगे का भूल जाइए. बार बार थोड़े ही बंट पाएगा नकारात्मक वोट.

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  7. सिकंदर हयात

    कहते की जो कुछ भी अमेरिका में बीस पचास साल पहले हुआ हो सब भारत में जरूर होता हे अब जब अमेरिका जैसे समृद्ध समाज से रिपोर्ट आयी हे की बच्चे तो हो रहे हे मगर शादिया बहुत कम ही हो रही हे शादी ना होने की एक बड़ी वजह किसी रिसर्च ने ये बताई हे की की गैर कामयाब लोगो से कोई शादी नहीं करना चाहता हे ये हाल अमेरिका का हे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की दुनिया की सबसे अधिक गैर बराबरी वाला भारतीय समाज कितने बड़े जवालामुखी पर खड़ा हे याद आता हे वो संघी किशोर जो लाखो लौंडो की तरह सोशल मिडिया पर हिन्दुओ को धर्मयुद्ध के लिए आगाह करने के अवैतनिक जॉब पर था पर था कुछ दिनों बाद उसने एक बेकसूर ब्राह्मण किशोरी को घास ना डालने के जुर्म में चाकुओ से गोद डाला था अब गौरव सोलंकी लिखते हे Gaurav Solanki
    6 hrs ·
    यह Newslaundry Hindi के लिए लिखा।
    खाली बरतन की तरह इधर से उधर घूमते बहुत सारे लड़के जो ख़ुद भी इसी मर्दवादी समाज के विक्टिम हैं। जो सिर्फ़ इसलिए अपने परिवार और समाज की परिभाषा में ठीक से मर्द नहीं हैं क्योंकि शाम को 100 रुपए भी कमाकर नहीं ला पाते। जो सेक्शुअली कुंठित हैं क्योंकि शादियों के बाज़ार में उनका खरीददार कोई नहीं। क्योंकि उनमें ऐसा कुछ नहीं जो उन्हें प्रगतिशील या पारम्परिक किसी भी परिभाषा में लड़कियों के लिए डिजायरेबल बनाए। और हैरत नहीं कि वे अपने भीतर समूची इंसानियत से नफ़रत करते हैं और कभी-कभी रोते भी हैं।
    हम हर साल कितने लाख सोश्योपैथ बनाते हैं, किसी को नहीं मालूम।
    हर दो में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है और यह समझने के लिए विज्ञान की डिग्री नहीं चाहिए कि क्यों इनमें से बहुत सारे बच्चे बड़े होकर तर्क नहीं कर पाते और तर्क नहीं समझ पाते। क्यों इन्हें बरगलाना आसान होता है, क्यों ये झूठे इतिहास पर गर्व करते हैं और धर्म की छाया चुनते हैं, भले ही वह इन्हें मार डाले।https://www.newslaundry.com/2017/10/04/troll-army-taking-control-over-social-media-and-everywhere-else

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  8. सिकंदर हयात

    Sanjay Shraman Jothe
    44 mins ·
    प्रदूषण, नैतिकता और नैतिक प्रदूषण
    ************************************
    “नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है”
    +++
    एक बार मैंने लिखा था कि भारत में गरीबी या विकास की समस्या असल में व्यवस्था की नहीं बल्कि धर्म और नैतिकता की समस्या है, ये विकास की रणनीति या व्यवस्था का मुद्दा बिलकुल नहीं है. बहुत लोगों को बुरा लगा था उस समय. इस बात को प्रदुषण के उदाहरण से फिर समझिये.
    एक आदिवासी दलित बहुल इलाके में कुछ साल मैंने वाटर और लैंड मेनेजमेंट का काम किया, ग्राम पंचायतों पटवारियों, गाँव के दबंगों और एकदम गरीब दलितों और आदिवासियों को एकसाथ लेकर पानी बचाओ जमीन सुधारों की चुनौती से रोज जूझना होता था. उस समय पता चला कि भारतीय गाँवों में लोगों में अपनी ही जमीन, सडक, पहाड़, नदी, आदि को बचाने के लिए एक जैसा उत्साह नहीं है.
    इसके कारण पर विचार करते हुए एक गजब की बात तब उजागर हुई थी कि भारतीय समाज में एक ही सडक एक तालाब एक पहाड़, मैदान या यहाँ तक कि एक पेड़ पर भी सभी लोगों का एक जैसा अधिकार नहीं होता. नदी, पोखर, झरने या तालाब के साफ़ हिस्से पर और कुओं पर पहला अधिकार ब्राह्मणों ठाकुरों बनियों का है, फिर ग्रामीण इलाकों के खुले मैदानों, सडकों, सार्वजनिक स्थलों का भी यही हाल है. ऐसे में दलितों आदिवासियों की बड़ी आबादी को जब तालाब या नाला सुधारने के लिए इकट्ठा किया जाता है तो उनमे कोई उत्साह नहीं होता. कारण ये कि उस तालाब या कुवें पर उनका अधिकार नहीं है, ये तालाब या कुवां ठीक भी हो जाए तो उन्हें उसका लाभ मिलेगा ये बहुत निश्चित नहीं है. दुसरा कारण कि ये गरीब लोग हैं जिनके पास जमीन नहीं हैं. इसलिए पानी बचाकर खेती करने का कोई उत्साह इनमे हो भी नहीं सकता.
    याद कीजिये, अंबेडकर को चवदार तालाब सत्याग्रह क्यों करना पडा था. वो केस स्टडी भारत के धर्म और संस्कृति द्वारा मानव जीवन और उसके प्रकृति से सम्बन्धों के बारे में किये गए सभी दावों की पोल खोल देती है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः” “वसुधैव कुटुंब” और “पुत्रोहम प्रथ्विव्याम” इत्यादि कम से कम भारतीय संस्कृति के लिए सबसे बड़े झूठ हैं. यहाँ समाज जीवन और प्रकृति पर हर व्यक्ति का एकसमान अधिकार नहीं है. यहाँ वर्ण और जाति से सबकुछ तय होता है. ये जीवन जीने का एक असभ्य और बर्बर तरीका है जिसकी पोल आधुनिक शहरी जीवन में खुलने लगी है.
    जो संस्कृति ब्रह्मा के शरीर के चार हिस्सों से अलग अलग ढंग से पैदा हुई है उसने राजधानी से लेकर गाँवों जंगलों तक में किस तरह का पदानुक्रम बना रखा है ये देखिये. एक गली मुहल्ले तक में प्राकृतिक या कुदरती संसाधन की मालकियत भी एकसमान नहीं है. ऐसे में उसे बचाने के लिए इकट्ठा होने का या सामूहिक प्रयास करने का सवाल ही कहाँ उठता है. प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के लिए सामुदायिक प्रयास की आवश्यकता दुनिया भर में स्थापित हो चुकी है लेकिन भारत में एक साझे लक्ष्य से सहानुभूति रखने वाला समुदाय मिलना बड़ा कठिन है. ऐसे में असभ्य भारतीय समाज अपने खुद के बच्चों के भविष्य के लिए भी इकट्ठा नहीं हो पा रहा है अपनी व्यवस्था और सरकार पर दबाव नहीं बना पा रहा है.
    आज दिल्ली में जो जहर फैला है उसका क्या कारण हो सकता है?
    ये असल में एक नैतिक प्रदूषण की हालत है. एक ऐसे समाज में जहां एकसाथ बैठना खाना पाप हो, एकदूसरे से संबंधित होने के लिए आपको जाति और सरनेम पता करने की जरूरत पड़ती हो वो समाज एक साझे सामूहिक भविष्य की कल्पना कैसे कर सकता है? हर आदमी का सडक तालाब पेड़ बगीचे पर अलग अलग किस्म का हक या लगाव है. जब प्राकृतिक संसाधन नष्ट होता है तो सबको इकट्ठा एक जैसा नुक्सान का दुःख नहीं होता. जिस अनुपात में आप उससे संबंधित थे उसी अनुपात में दुःख होता है. ये भारतीय संस्कृति की गजब की विशेषता है.
    अगर पाषाण कालीन या वैदिक या मध्ययुगीन अवस्था में जी रहे होते तो ये अनैतिकता और ये असभ्य जीवन शैली आसानी से चल सकती थी. लेकिन आज के आधुनिक समाज में नैतिकता से शून्य हो चुकी जीवन शैली नहीं चलने वाली. नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है. अब वायु, पानी, जमीन जंगल इत्यादि को जब तक सामूहिक सम्पत्ति न समझा जाएगा तब तक भारत जैसे असभ्य समाज आधुनिक जीवन के योग्य नहीं बन पायेंगे.
    दिल्ली या चंडीगढ़ की हवा को ठीक करने के उपाय नहीं किये जा रहे हैं. कारण वही है. सबको लगता है कि अपना घर साफ़ कर लिया अपनी गली में बगीचा लगा लिया और हो गया समाधान. जैसे गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये सोचते हैं कि तालाब का अपना हिस्सा साफ़ रहे तो हम साफ़ पानी पी सकते हैं. या अपने मुहल्ले का कुआ साफ़ हो गया तो सब ठीक हो गया. आजकल एक और आदत फ़ैल रही है. शहर की सामूहिक जीवन की चिंता किये बिना अपना आसन बिछाकर प्राणायाम कर लीजिये और हो गया समाधान. ये प्राणायाम और योग की मानसिकता भी एकदम खंडित और स्वार्थी जीवनशैली को जन्म देती है.
    एक घर के कोने में बैठकर प्राणायाम कर लेने से मान लिया जाता है कि आपका काम हो गया. लेकिन शहर और समाज को एक बड़े इकोसिस्टम की तरह देखने का नजरिया इससे नहीं आने वाला है.
    जीवन और जगत को खंडित करके देखने की ‘वैदिक बुद्धिमत्ता’ असल में अब मूर्खता साबित हो रही है. वैदिक बुद्धिमत्ता सब तरह की परिस्थितियों को खंड खंड करके देखती है. जैसे ब्रह्मा को चार खंडों में बांटकर उसने चार वर्ण बना दिए. वे इकोलोजी या इकोसिस्टम का सिद्धांत समझ ही नहीं सकते. गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये नहीं समझना चाहते कि गाँव का भूमिगत जल अगर प्रदूषित है तो एक कुंवे को साफ़ करने का कोई अर्थ नहीं है. ठीक इसी तरह दिल्ली चड़ीगढ़ के प्रभावशाली लोग हैं जो इकोसिस्टम को नहीं समझते, वे एपने घर में एयर कंडीशन और प्यूरीफायर लगाकर या प्राणायाम करके सुरक्षित नहीं हो सकते.
    भारत के गाँवों से लेकर शहरों तो वही की वही समस्या है. क्योंकि इनका धर्म और संस्कृति एक ही है. ये किसी भी शहर या गाँव में चले जाएँ ये समग्रता की भाषा में सोच ही नहीं सकते. ये खंड खंड पाखंड के आदि हो चुके हैं. एक साझे सामूहिक जीवन का विरोध करते हुए इन्होने जो धर्म और संस्कृति पैदा की है वो अब इनके शरीर और मन के जीवन को भी खंडित कर देना चाह रही है. अब इनसे कहना चाहिए कि आपके फेफड़े और ह्रदय (छाती) अगर प्रदुषण से मर रहे हैं तो चिंता मत कीजिये ये क्षत्रिय हिस्सा है जो मर रहा है, अभी भी आपके शरीर का मस्तिष्क अर्थात ब्राह्मण हिस्सा सही सलामत है. ऐसे तर्क अभी तक आये क्यों नहीं ये भी आश्चर्य की बात है.
    भारत के धर्म और संस्कृति ने जैसा समाज बनाया है उसमे व्यवस्था, कानून आदि को जिम्मेदार ठहराने से पहले हमें इस देश की नैतिकता को ठीक से पकड़ना होगा. जो समाज जीवन और प्रकृति ही नहीं परमात्मा तक पर अलग अलग ढंग से अधिकार और स्वामित्व देता हो वहां सामूहिक साझे भविष्य के लिए पूरी कौम को इकट्ठा करना असंभव है. यही भारत की गुलामी और हार की सबसे बड़ी वजह रही है. भारतीय समाज किसी भी अच्छे प्रयास में यहाँ तक कि आत्मरक्षा के लिए भी इकट्ठा नहीं हो सका है.
    ऐसे में प्रदूषण जैसी पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को सुलझाने का भारतीय असभ्य समाज का जो तरीका है उसपर गौर कीजियेगा. ये सोच और तरीका गहराई से देखिये, इस तरीके में भारतीय संस्कृति की मूल समस्या – अनैतिकता और अमानवीयता – साफ़ नजर आती है.
    – संजय जोठेSanjay Shraman Jothe
    44 mins ·

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  9. सिकंदर हयात

    Abhishek Srivastava
    9 hrs · Ghaziabad ·
    आज सुबह जब कालोनी का बड़ा वाला गेट अप्रत्‍याशित रूप से खुला और कबाड़ में जाने से ठीक पहले की मनोदशा में दाएं-बाएं सांगोपांग झूलता एक विशालकाय ट्रक मय लोहा-लक्‍कड़ भीतर घुसा, तो कुछ लोग मेरी ही तरह दहल गए थे। दिन भर मेरी बालकनी के ठीक नीचे खड़ाक, भड़ाक, ठीक से बे, एsss हांsss, संभाल के, टन्‍नटुन्‍न, जैसी मानवीय-अमानवीय मिश्रित ध्‍वनियां बजती रहीं। दोपहर नीचे उतरा तो चौतरफा ऐसा कब्‍ज़ा लगा गोया मेरे पीछे कहीं कोई मेरे घर का सामान बाहर न फिंकवा दे। सहमा हुआ चुपचाप निकल लिया।
    शाम को लौटा तो कारों से गली जाम थी। भइया, नौ नंबर कौन सा है? हर कार से मुंडी निकालें औरतें यही पूछ रही थीं हर आते-जाते वाले से। डेढ़ दर्जन बच्‍चे इधर-उधर नए कपड़े पहने दौड़ रहे थे। दो-तीन मुझसे टकराते-टकराते बचे और मेरे मुंह से गाली निकलते-निकलते रह गई। दिमाग सामने की ओर गया तो अचानक आवाज़ आई, ”आज ब्‍लू है पानी पानी पानी”’।” ऊपर चढ़ा तो पानी जा चुका था। कामवाली भी जा चुकी थी। मोटर सूं सूं कर रही थी। तब से पूरा चार घंटा हो चुका है। सारी खिड़कियां दरवाज़े बंद हैं, लेकिन जाने कहां से ध्‍वनि तरंगें मेरे कमरे का अतिक्रमण किए जा रही हैं, ”अभी तो पार्टी शुरू हुई है।”
    तन-बदन में आग लगी हुई है। मेरी आत्‍मा डीजे का अवतार ले चुकी है। सिर फटा जा रहा है। अभी गार्ड ने खुलासा किया है कि सामने वाले फ्लैट के मालिक ने पिछले साल अपना एक जि़रॉक्‍स कॉपी पैदा किया था। आसपास के कम से कम डेढ़ सौ लोगों को पता ही नहीं था कि वे चुपचाप 2016 में उपकृत हो चुके हैं। आज उस उपकार की सामूहिक वसूली हो रही है। मुझे बरबस नाना पाटेकर याद आ गए हैं, जिन्‍होंने ‘अग्निसाक्षी’ में अपने फ्लैट के नीचे हो रही जन्‍मदिन पार्टी में जाकर हवा में गोली चला दी थी और सर्वकालीन प्रासंगिक डायलॉग दाग कर सबको शहीद कर दिया था, ”पैदा होकर कौन सा महान काम कर दिया हरामखोरों?”Abhishek Srivastava
    8 hrs · Ghaziabad ·
    बारह बज गया। अब भी डीजे बज रहा है। बस तर्ज बदल दी है मास्‍टर ने। बच्‍चे सो गए हैं। गाने थोड़ा अश्‍लील होना चाहते हैं। ”सटा ले सइयां फेविकोल से” बज रहा है। समवेत् स्‍वर में हर उम्र के खाये-अघाये पुरुष-स्‍त्री डांस फ्लोर पर परस्‍पर रगड्-घिस्‍स मचाए हुए हैं। कम से कम पांच लाख का खर्च हुआ होगा इस पार्टी पर। कोई भी देखकर कहेगा कि शादी का पंडाल है। अगर यह जनता है, तो इसके लिए इतना तो बनता है। पिछले साल एक पत्रकार ने एक सांसद के बंगले पर बिटिया का बर्थडे मनाया था। कोई कुछ नहीं बोला। उससे ऊपर जाइए तो विजय माल्‍या अपने बेटे के बर्थडे पर एयरलाइन ही शुरू कर दिए थे।
    पूरी कायनात बच्‍चों पर कुरबान। सारी अश्‍लीलता बच्‍चों के बहाने। सारा भ्रष्‍टाचार बच्‍चों के भविष्‍य के लिए। इतने पर बच्‍चा परीक्षा रुकवाने के लिए अगर किसी और के बच्‍चे का गला घोंट दे, स्‍कूल में सरेआम गोली चला दे, किसी बच्‍ची का रेप कर दे, तो आश्‍चर्य कैसा? होगा मसीहा सामने तेरे फिर भी न तू बच पाएगा। तेरा अपना खून ही आखिर तुझको आंख दिखाएगा। आसमान में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जाएगा।
    परिवार का क्षय हो। समाज का क्षय हो।

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  10. सिकंदर हयात

    Pankaj K. Choudhary
    12 November at 11:56 ·
    #पद्मावती विवाद का आदरणीय पंकज के चौधरी द्वारा किया गया बिंदुवार विश्लेषण:
    # ये बहुत अच्छा हुआ है कि फ्रीडम ऑफ़ स्पीच, फ्री स्पीच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नया नया सिलवाया हुआ लंगोट पहने हुए लोग संजय लीला भंसाली के पक्ष में बोल नहीं रहे हैं, लिख नहीं रहे हैं, सोशल मीडिया पर शोर शराबा नहीं मचा रहे हैं
    # लोगों को अब अहसास हो गया है कि वो इधर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आग मूतेंगे और उधर संजय लीला भंसाली राजपूत सेना से समझौता कर लेगा…
    # लोग अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला और प्रचार के लिए सस्ती पब्लिसिटी में अंतर करना समझ गए हैं
    # इस तरह की पब्लिसिटी से सिर्फ जातीय और धार्मिक संगठन, न्यूज़ चैनल और फिल्म वालों को फायदा होता है
    # भारत में जातीय, धार्मिक और तमाम संगठन फिल्म, साहित्य, और तमाम ऐसी चीजों का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि भारत में वेस्टर्न लिबास में लिपटे, कार चलाने वाले, महंगे मोबाइल रखने वाले, पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर लोग कबीलाई मानसिकता के हैं…
    # ऐसे लोग सार्वजनिक जगह पर कैसे व्यवहार किया जाता है, फोन पर कैसे बातें की जाती है, नहीं जानते और ये लोग ये भी नहीं जानते कि मेट्रो में प्रेमी से कैसे चिपटना चाहिए और कितना चिपटना चाहिए, कहां हाथ रखना चाहिए और कहाँ नहीं, पैर पर पैर चढ़ाकर सिर्फ इसलिए नहीं बैठना चाहिए क्योंकि उसने महंगा ब्रांड का जूता पहन रखा है…ये क्लास बीमार है और बीमार लोगों की भावनाएं बात बात पर आहत होती हैं
    # जो न्यूज़ चैनल पद्मावती विवाद को सबसे ज्यादा कवरेज दे रहा है वही न्यूज़ चैनल कांचा इलैया की किताब पर बनियों द्वारा किए गए बवाल पर कुछ नहीं बोलता है…
    # न्यूज़ चैनल हर आदमी को सप्ताह में दो बार जरूर देखना चाहिए ताकि ये पता लग सके की न्यूज़ चैनल देखने वाले कितने बीमार होते हैं
    # जो लोग पद्मावती फिल्म में कुछ ख़ास दृश्य पर अप्पति कर रहे हैं वो ये नहीं जानते हैं कि ये हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है जहाँ ऐतिहासिक घटनाओं पर तमाशा फिल्म बनती है
    # हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर अगले 100 सालों तक ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाने पर पाबंदी लगनी चाहिए, क्योंकि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अशोक जैसी फिल्म बनाता है जहाँ अशोक की कहानी कम कहता है और करीना कपूर का नितंब, वक्ष, पीठ, कटि प्रदेश, मांसल बदन और गदराई जवानी ज्यादा दिखता है…अशोक के नाम पर एक सॉफ्टकोर पोर्न फिल्म बना डालता है
    # पद्मावती में फलाना गाना फलाने तरीके से नहीं फिल्माना चाहिए, मगर क्या अशोक के समय सन सनान नन जैसे गानों की हम कल्पना कर सकते हैं
    # हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म इसलिये नहीं बनानी चाहिए क्योंकि वो अकबर के चरित्र के लिए दिलीप कुमार और हृतिक रोशन को हीरो बनाता है, जबकि अकबर संभवतया मंगोल/चीनी की तरह दिखते होंगे
    # एक समय था जब कंधे पर शॉल और हारमोनियम लेकर कोई भी ग़ज़ल गायक बन जाता था, वही बीमारी संजय लीला भंसाली और राकेश ओम प्रकाश मेहरा को है, इन्हें लगता है कि दाढ़ी बढ़ाकर रखने से वो गंभीर निर्देशक बन जाएंगे
    # आशुतोष गोवारिकर, राकेश ओम प्रकाश मेहरा, संजय लीला भंसाली, अनुराग कश्यप सूडो इंटेलेक्चुअल निर्देशक हैं
    # ये वही संजय लीला भंसाली है जो प्रियंका चोपड़ा में मेरी कोम देखता है, जो नार्थ ईस्ट की लड़की को नार्थ ईस्ट की औरत का किरदार निभाने नहीं देता है, ऐसे जंगली, नस्लवादी, असभ्य लोगों के पक्ष में क्यों खड़ा होना
    # संजय लीला भंसाली को होलोकॉस्ट पर फिल्म बनानी चाहिए ताकि हम कंसंट्रेशन केम्प में नाचते गाते लोग, झूलता स्तन, हिलते नितम्ब, क्लीवेज, रंग बिरंगे यहुदिओं को देख सकेंPankaj K. Choudhary
    14 November at 10:35 ·
    #चाचा_से_मुझे_याद_आया
    एक मुंहबोला भतीजा था…नाम था उसका वाइको….वाइको ने अपने चाचा करूणानिधि से कहा, चच्चा, मोर्टन टॉफी खाते खाते मेरा मन ऊब गया है, मैं चिकन टिक्का खाऊंगा…भतीजा रोता रहा, चाचा करूणानिधि पत्थर की मूरत बने रहे और अभी चिकन टिक्का बेटा स्टालिन खा रहा है..
    मनप्रीत सिंह बादल ने अपने चाचा प्रकाश सिंह बादल से कहा चाचा अब मैं बड़ा हो गया हूँ…बहुत कुछ करने का मन करता है….फिलहाल आप अपनी वाली मर्सीडीज पर चढ़ने दो….जिस दिन मनप्रीत ने मर्सीडीज की जिद ठानी उसी दिन चाचा ने मनप्रीत को नज़र से उतार दिया और मर्सीडीज की चाभी बेटा सुखबीर को दे दिया….
    गोपीनाथ मुंडे का भतीजा धनंजय मुंडे, शरद पवार का भतीजा अजीत पवार अकड़ में रहता था…मगर सुप्रिया सुले और पंकजा मुंडे ने सारी अकड़ निकाल दी इनकी…
    अखिलेश यादव जानता था, राजनीति के चाचाओं की हक़ीक़त…अखिलेश जानता था कि यदि चाचा शिवपाल को मौका मिला तो वो सबसे पहले उसे ही डसेगा….अखिलेश ने इसलिए पापा मुलायम की मदद से चाचा को ठिकाने लगा दिया….
    जवाहरलाल नेहरू को कोई भतीजा नहीं था….एक बेटी थी और बेटी बुआ विजया लक्ष्मी पंडित को देखना नहीं चाहती थी….जानती थी कि बुआ को मौका मिलेगा तो भतीजी का क्या हश्र करेगी….
    आज चाचा नेहरू का हैप्पी बर्थ डे है, उनका जन्मदिन मुबारक हो आप सब शहरी , सेक्युलर, लिबरल, एलिट, जड़ से कटे भतीजों को…
    गुड मॉर्निंग माय फ्रेंड्स———बाई सेक्सुअल, स्ट्रैट, होमोसेक्सुअल वर्तमान और भावी मंत्री, विधायक, सांसद, कार्यकर्ताओं को कुछ मुफ्त सलाह:
    # एड्स होता है असुरक्षित यौन संबंध बनाने से
    # एड्स नहीं होता है चूमने से, चाटने से, एक दूसरे का रुमाल इस्तेमाल करने से, एक दूसरे का अंडर गारमेंट्स पहनने से
    # नाजायज सम्बन्ध बनाते वक़्त सुरक्षा का ख्याल रखें, सुरक्षा हटेगी तो दुर्घटना घटेगी
    # सीडी कहीं भी बन सकता है, कोई भी बना सकता है, राजभवन भी सुरक्षित जगह नहीं रह गया है
    # कोशिश करें कि या तो होम पिच पर खेलें या न्यूट्रल वेन्यू में
    # नाजायज सम्बन्ध बनाने की जगह पहले से तय न करें, लास्ट मिनट तक जगह और समय का सस्पेंस बनाए रखें
    # बिजली की रौशनी में नाजायज संबंध न बनाएं
    # नाजायज संबंध बनाने से पहले एक दूसरे की अच्छी तरह से तलाशी ले लें, कि कहीं किसी ने हिडन कैमरा तो नहीं छुपा रखा है
    # हो सके तो अपना चेहरा तौलिया से ढक कर रखें, ताकि कोई सीडी लीक हो तो आपकी पहचान न हो सके…होंठ तौलिया से मत ढकें, चूम नहीं पाएंगे पार्टनर को
    गुड मॉर्निंग फ्रेंड्सPankaj K. Choudhary
    15 November at 16:05 ·
    #सेक्स_स्कैंडल_से_मुझे_याद_आया
    बात वर्ष 1978 की है ..उस समय मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री हुआ करते थे और जगजीवन राम उपप्रधानमंत्री ….जगजीवन राम के बारे में कहा जाता था कि वो एक न एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगे …जगजीवन राम का एक बेटा था …नाम था सुरेश …..एक पत्रिका हुआ करती थी …नाम था सूर्य ..सूर्य पत्रिका का संपादक थीं मेनका गांधी …मेनका गांधी का एक हिस्ट्री है ..एक बैकग्राउंड है ..इमरजेंसी का बैकग्राउंड …आज वही मेनका गांधी इमरजेंसी के खिलाफ सबसे ज्यादा बोलने वाली पार्टी का एक सम्माननीय सदस्य हैं …मंत्री हैं …
    हाँ तो मैं कह रहा था कि सूर्य का संपादक थी मेनका गाँधी ..सलाहकार संपादक थे …खुशवंत सिंह ..साल था 1978 …सूर्य ने दो पन्ने की एक स्टोरी छापी ..सेक्स स्कैंडल …जगजीवन राम का बेटा का कोम्प्रोमाजिंग पोजीशन में तस्वीर ..हैडलाइन था ..defence secrets leaked to Chinese embasaay..
    ये उस समय का एक बहुत बड़ा स्कैंडल था ..पोर्न आसानी से उपलब्ध नहीं था …नंगी तस्वीरें देखना इतना आसान नहीं था ..और उस दौर में जब हिडन कैमरा का अविष्कार नहीं हुआ था ..भारत में इन्टरनेट नहीं आया था ..तब लोगों ने भारत के उपप्रधानमंत्री के बेटे की एक लड़की के साथ एक नहीं, दो नहीं, पूरी नौ तस्वीरें देखीं
    मेनका गांधी का एक बैकग्राउंड है ..मेनका गांधी का एक अतीत है …और उसी मेनका गांधी के ऊपर महिलाओं और बच्चों के कल्याण की जिम्मेदारी है…
    उस घटना के 38 साल बाद एक और स्कैंडल हुआ …इस स्कैंडल में भी भारत की सुरक्षा के साथ समझौता होने का आरोप लगा …जो आदमी हनी ट्रैप हुआ ..जिस आदमी पर भारत की सुरक्षा के साथ समझौता करने का आरोप लगा वो और कोई नहीं मेनका गांधी का सुपुत्र था ..जो आरोप कभी मेनका गांधी ने जगजीवन राम के बेटे पर लगाया था, वही आरोप मेनका गांधी के सुपुत्र पर लगा ..सोशल मीडिया पर तस्वीर वायरल हुई …तस्वीर बहुत साफ़ थी …बहुत उम्दा भी ..वुमन ओन टॉप कैसे होना चाहिए ..ये उन तस्वीरों से सीखा जा सकता था ..किसी ने कहा तस्वीर फर्जी है ..किसी ने कहा सच है ..सच क्या है ..झूठ क्या है ये शायद हम कभी भी न जान पाएं …
    लेकिन इन सेक्स स्कैंडल्स से ज्यादा चौंकाने वाला स्कैंडल था अभिषेक मनु सिघवी का स्कैंडल …CD मैंने नहीं देखी है ..तस्वीर देखी है …लाल कुर्ता और बिना पायजामे वाली अभिषेक मनु सिंघवी की तस्वीर ..बेसिक इंस्टिंक्ट वाली शेरेन स्टोन पोज में अभिषेक मनु सिंघवी की तस्वीर …उस तस्वीर को देख कर लगता है कि जस्टिस और इक्वलिटी का पैजामा किसी ने खोल लिया हो …और न्याय एक सस्टूल पर शर्मिंदा होकर बैठा हो …या फिर ऐसा लगता है कि किसी हाई प्रोफाइल वकील ने न्याय का बलात्कार कर लिया हो ..और पैजामा पहनना भूल गया हो …
    See Translation

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