पुण्य प्रसून बाजपेयी

मां-बाप क्या करें ? जब हर जिम्मेदारी से है मुक्त चुनी हुई सरकार

तो सुप्रीम कोर्ट को ही तय करना है कि देश कैसे चले। क्योंकि चुनी हुई सरकारों ने हर जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लिया है। तो फिर शिक्षा भी बिजनेस है। स्वास्थ्य सेवा भी धंधा है। और घर तो लूट पर जा टिका है। ऐसे में जिम्मेदारी से मुक्त सरकारों को नोटिस थमाने से आगे और संविधान की लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत से आगे सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकता। और नोटिस पर सरकारी जवाब सियासी जरुरतो की तिकड़मों से पार पा नहीं सकता। तो होगा क्या। सरकारी शिक्षा फेल होगी। प्राइवेट स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह फले-फुलेंगे। सरकारी हेल्थ सर्विस फेल होगी। निजी अस्पताल मुनाफे पर इलाज करेंगे। घर बिल्डर देगा। तो घर के लिये फ्लैटधारकों की जिन्दगी बिल्डर के दरवाजे पर बंधक होगी। यानी जीने के अधिकार के तहत ही जब न्यूनतम जरुरत शिक्षा, स्वास्थ्य और घर तक से चुनी हुई सरकारें पल्ला झाड़ चुकी हो तब सिवाय लूट के होगा क्या सियासत लूट के कानून को बनाने के अलावा करेंगी क्या। और सुप्रीम कोर्ट सिवाय संवैधानिक व्याख्या के करेगा क्या। हालात ये है कि 18 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चो में 7 करोड़ बच्चों का भविष्य निजी स्कूलों के हाथो में है। सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है तो निजी स्कूलों का बजट 8 लाख करोड से ज्यादा है। यानी देश की न्यूनतम जरुरत, शिक्षा भी सरकार नहीं बाजार देता है। जिसके पास जितना पैसा। और पैसे के साथ उन्हीं नेताओं की पैरवी, जो जिम्मेदारी मुक्त है। और तो और नेताओ के बडी कतार चाहे सरकारी स्कूल में बेसिक इन्फ्रस्ट्रक्चर ना दे पाती हो लेकिन उनके अपने प्राईवेट स्कूल खूब बेहतरीन हैं। इसीलिये निजी स्कूलों की कमाई सरकारी स्कूलो के बजट से करीब सौगुना ज्यादा है। तो मां-बाप क्या करें । सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर 21 दिन बाद आने वाले जवाब का इंतजार करें ।

और इस बीच चंद दिनो पहले की खबर की तरह खबर आ जाये कि गोरखपुर में 125 बच्चे । तो फर्रुखाबाद में 38 और सैफई में 98 बच्चे मर गये। बांसवाडा में भी 90 बच्चे मर गये। ये सच बीते दो महीने का है तो मां-बाप शिक्षा के साथ अब बच्चो के जिन्दा रहने के लिये इलाज की तालाश में भटके। और इलाज का आलम ये है कि 100 करोड जनसंख्या जिस सरकारी इलाज पर टिकी है उसके लिये बजट 41,878 करोड का है। 25 करोड नागरिकों के लिये प्राइवेट इलाज की इंडस्ट्री 6,50,000 करोड पार कर चुकी है। यानी इलाज की जगह सरकारी अस्पतालो में मौत और मौत की एवज में करोड रुपये का मुनाफा। तो दुनिया में भारत ही एकमात्र एसा देश है जहा शिक्षा और हेल्थ सर्विस का सिर्फ निजीकरण हो चला है बल्कि सबसे मुनाफे वाली इडस्ट्री की तौर पर शिक्षा और हेल्थ ही है। तो मां-बाप क्या करें। जब शिक्षा के नाम पर कत्ल हो जाये । इलाज की एवज में मौत मिले। और एक अदद घर के लिये खुद को ही बिल्डर के हाथो रखने की स्थिति आ जाये और चुनी हुई सरकार पल्ला झाड ले तो फिर सुप्रीम कोर्ट का ये कहना भर आक्सीजन का काम करता है कि , ” बैंक बिल्डर का नहीं फ्लैटधारको को फ्लैट दिलाने पर ध्यान दें। बिल्डर डूबता है तो डूबने दें।” तो जो बात सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्यख्या करते हुये कह सकता है उसके चुनी हुई सरकारे सत्ता भोगते हुये लागू नहीं कर सकती। क्योंकि सवाल बच्चो की मौत के साथ हर पल मां बाप के मर के जीने का भी होता है। इसीलिये गुरुग्राम के श्यामकुंज की गली नं 2 में जब नजर कत्ल किये जा चुके प्रद्यु्म्न 50 गज के घर पर पडती है तो कई सवाल हर जहन में रेंगते है। क्योंकि पूरी कालोनी जिस त्रासदी को समेटे प्रद्युम्न की मां ज्योति ठाकुर को सांतवना देने की जगह खुद के बच्चे की तस्वीर आंखों में समेटे है। वह मौजूदा सिस्टम के सामने सवाल तो हैं। क्योंकि बच्चे का कत्ल ही नहीं बल्कि सिर्फ बच्चे को पालने के आसरे पूरा परिवार कैसे जिन्दगी जीता है उसकी तस्वीर ही प्रद्युम्न के घर पर मातम के बीच खामोशी तले पसरी हुई है।

और फैलते महानगरो में हाशिये पर पड़े लोगों के बीच देश के किसी भी हिस्से में चले जाइये इस तरह पचास गज की जमीन पर घर बनाकर बच्चो को बेहतर जिन्दगी देने की एवज में खुद जिन्दगी से दो दो हाथ करते परिवार आपको दिखायी दे जायेगें । और बच्चो को पढाने के नाम पर इन्हीं परिवारो की जेब में डाका ढाल कर इस देश में सालाना दो लाख करोड़ की फिस-डोनेशन प्राइवेट स्कूलों से ली जाती है। सबसे ज्यादा जमीन शिक्षा के नाम पर प्राईवेट-कान्वेंट स्कूल को मिल गई। सिर्फ एक रुपये की लीज पर। तीस बरस के लिये। इसी दौर में प्राइवेट शिक्षा का बजट देश के शिक्षा बजट से 17 गुना ज्यादा का हो गया। तो जो परिवार रेयान स्कूल में कत्ल के बाद फूट पडे । उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो को मां-बाप के लिये चुनी हुई सरकारें क्या वाकई कुछ सोचती भी हैं। क्योंकि आज का सच यही है कि प्राइवेट स्कूलों की फीस भरने में मां-बाप की कमर दोहरी हो रही है। एसोचैम का सर्वे कहता है कि बीते चार साल में निजी स्कूलों की फीस 100 से 120 फीसदी बढ़ गई है । प्राइवेट स्कूलों की फीस हर साल औसतन 10 से 20 फीसदी बढ़ाई जाती है । बच्चो की पढाई को लेकर मंहगाई मायने नही रखती । स्कूलो की मनमानी पर कोई रोक लगती नहीं । मसलन महानगरो में एक बच्चे को पढाने का सालाना खर्च किस रफ्तार से बढा । उसका आलम ये है कि 2005 में 60 हजार । 2011 में 1 लाख बीस हजार । तो 2016 में 1 लाख 80 हजार सालाना हो चुका है।यानी महानगरो में किसी परिवार से पूछियेगा कि एक ही बच्चा क्यों तो जवाब यही आयेगा कि दूसरे बच्चे को पैदा तो कर लेंगे लेकिन पढायेंगे कैसे । यानी बच्चो की पढाई परिवार की वजह से पहचाने वाले देश में परिवार को ही खत्म कर रही है । लेकिन सिर्फ प्राइवेट स्कूल ही क्यो । पढाई के लिये ट्यूशन एक दूसरी ऐसी इंडस्ट्री है जिसके लिये स्कूल ही जोर डालते है । आलम ये है कि देश का शिक्षा बजट 46,356 करोड का है । और ट्यूशन इंडस्ट्री तीन लाख करोड़ रुपए पार कर चुकी है । एसोचैम का सर्वे कहता है कि महानगरों में प्राइमरी स्कूल के 87 फीसदी छात्र और हाई स्कूल के 95 फीसदी छात्र निजी ट्यूशन लेते हैं । महानगरों में प्राइवेट ट्यूटर एक क्लास के एक हजार रुपए से चार हजार रुपए वसूलते हैं जबकि ग्रुप ट्यूशन की फीस औसतन 1000 रुपए से छह हजार रुपए के बीच है ।

यानी दो जून की रोटी मेंमरे जा रहे देश में नौनिहालो की पढाई से लेकर इलाज तक की जिम्मेदारी से चुनी हुई सरकारे ही मुक्त है । क्योकि देश की त्रासदी उस कत्ल में जा उलझी है जिसका आरोपी दोषी नहीं है और दोषी आरोपी नहीं है क्योकि उसकी ताकत राजनीतिक सत्ता के करीब है । जब काग्रेस सत्ता में तो कांग्रेस के करीब और अब बीजेपी सत्ता में तो बीजेपी के करीब रेयान इंटरनेशनल की एमडी ग्रेस पिंटो । यू देश का सच तो ये भी है कि देश के 40 फीसदी निजी स्कूलों या शैक्षिक संस्थानों के मालिक राजनीतिक दलों से जुड़े हैं । बाकि अपने ताल्लुकात राजनीति सत्ता से रखते है । क्योंकि ध्यान दीजिए तो डीवाई पाटील,शरद पवार, सलमान खुर्शीद, छगन भुजबल, जगदंबिका पाल, जी विश्वानाथन,ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवपाल यादव, मनोहर जोशी,अखिलेश दास गुप्ता,सतीश मिश्रा जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है,जिनके स्कूल हैं या जो स्कूल मैनजमेंट में सीधे तौर पर शामिल हैं ।तमिलनाडु में तो 50 फीसदी से ज्यादा शैक्षिक संस्थान राजनेताओं के हैं । महाराष्ट्र में भी 40 से50 फीसदी स्कूल राजनेताओं के हैं तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी यही हाल है । दरअसल, शिक्षा अब एक ऐसा धंधा है, जिसमें कभी मंदी नहीं आती। स्कूल की मंजूरी से लेकर स्कूल के लिए तमाम दूसरी सरकारी सुविधाएं लेना राजनेताओं के लिए अपेक्षाकृत आसान होता है और स्कूल चलाने के लिए जिस मसल पावर की जरुरत होती है-वो राजनेताओं के पास होती ही है। तो एक बच्चे की हत्या के बाद मचे बवाल से सिस्टम ठीक होगा यही ना देखियेगा । कुछ वक्त बाद परखियेगा रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 7 बरस के बच्चे की हत्या ने किस किस को लाभ पहुंचाया।

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3 thoughts on “मां-बाप क्या करें ? जब हर जिम्मेदारी से है मुक्त चुनी हुई सरकार

  1. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan
    11 hrs ·
    इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से खबर है गौरी लंकेश को मारने के लिए इस्तेमाल की गई पिस्तौल भी वहीँ है जिससे कलबुर्गी ,पनसारे और दाभोलकर की हत्या की गई है। मामले की जाँच कर रही एसआईटी टीम ने स्वीकार किया है इन चारों हत्याओं का तार आपस में जुड़ा है। गौरी लंकेश पर 7. 65 एमएम की पिस्तौल से गोली चलाया गया था। इसी पिस्तौल से इन तीनों विचारकों की भी हत्या की गई थी। इन हत्याओं के पीछे एक ही संगठन और एक ही व्यक्ति हो सकता है। लेकिन आज तक पुलिस किसी भी मामले को सुलझा नहीं पाई है। देश भी चार दिन चिल्लाता है उसके बाद सब चादर तानकर सो जाते हैं। हत्यारे भी कुछ दिन चुप बैठ जाते हैं फिर नई हत्या की साजिश रचते हैं। आखिर ये खूनी खेल कब तक चलेगा?Vikram Singh Chauhan
    13 hrs ·
    जिनका अपना कोई छोड़कर चला जाये वो इंसान दूसरों के लिए जीता है। अपने कलेजे के टुकड़े के जाने के बाद कैसे जी रहा है ये परिवार। पढ़े प्रद्युम्न के माता -पिता का एक इंटरव्यू।
    प्रद्युम्न के पिता -बच्चों को रायन इंटरनैशनल स्कूल में ऐडमिशन इसलिए कराया ताकि वह कहीं स्टैंड हो सकें। काबिल बनें सकें। मेरा नौकरी का मकसद ही यही था, उन्हें अच्छी से अच्छी एजुकेशन दूं। एक मिडल क्लास के अरमान सीमित होते हैं कि बच्चों की अच्छी परवरिश, उसकी पढ़ाई, एक मकान और बेटी की शादी। इससे ज्यादा मैंने भी नहीं सोचा था। बेटी और बेटे को पढ़ाना मेरे जीवन का अहम लक्ष्य रहा था लेकिन बेटे की हत्या ने मेरे जीवन के मकसद को ही बदलकर रख दिया। मैं अभी सोच भी नहीं पा रहा हूं कि आखिर बेटे के बिना जीवन कैसे कटेगा लेकिन इस घटना के बाद मेरे ऊपर जिम्मेदारी और ज्यादा आ गई है। जाहिर तौर पर इस दुख की घड़ी में परिवार को संभालना मेरी ही जिम्मेदारी है लेकिन एक अहम जिम्मेदारी यह आ गई है कि बेटे को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना। इसी को मकसद बनाकर जीने की कोशिश कर रहा हूं।
    यही कारण है कि मैंने हिम्मत नहीं हारी है। मेरे बेटे की बर्बर तरीके से हत्या कर दी गई। स्कूल में जब हम बच्चे को छोड़ते हैं तो ये सोचकर छोड़ते हैं कि बच्चे सेफ होंगे और हम निश्चिंत होकर उसके आने का इंतजार करते हैं। हम इस बात का इंतजार नहीं करते कि स्कूल से बच्चे की डेडबॉडी हमे मिलेगी। अगर इस घटना के बाद स्कूल की सेफ्टी के लिए सरकार ने गाइडलाइंस नहीं बनाईं तो पैरंट्स अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरेंगे। सवाल सिर्फ मेरे बच्चे का अब नहीं रहा। देशभर में लाखों बच्चे रोजाना स्कूल जाते हैं। ये अगर सुरक्षित नहीं होंगे तो देश का भविष्य असुरक्षित होगा और इसलिए सुरक्षा के लिए मानक तय करने की जरूरत है।
    निर्भया केस के बाद भी लोगों का गुस्सा फूटा था और निर्भया को इन्साफ दिलाने के लिए लोग सड़कों पर आ गए थे। कानून में बदलाव के लिए प्रदर्शन हुए थे और सरकार ने रेप लॉ में बदलाव कर कानून को सख्त किया था। मेरे बेटे की हत्या के बाद भी लोगों का गुस्सा फूटा है क्योंकि इस घटना से लोग खुद को जोड़कर देख रहे हैं। इस घटना से पहले मैंने भी सपने में नहीं सोचा था कि मेरे बेटे की स्कूल में हत्या कर दी जाएगी। अब इस घटना ने देशभर के पैरंट्स की आंखें खोल दी हैं। जो लोग भी संवेदनशील हैं वे इस बात को समझते हैं कि बच्चों की स्कूल में सुरक्षा कितनी अहम है। मेरे बेटे की मौत के बाद शायद सिस्टम में बदलाव हो और बाकी देशभर के बच्चे सुरक्षित हो जाएं तो शायद मेरे मन को थोड़ा संतोष होगा।
    फिलहाल सरकार से कोई कानूनी सहायता की जरूरत नहीं पड़ी, अगर आगे जरूरत हुई तो हम सरकार से इसके लिए गुहार लगाएंगे। जहां तक अभी सुप्रीम कोर्ट या फिर बॉम्बे में अदालत में कानूनी मदद का सवाल है तो अभी मिथिला लोक फाउंडेशन नाक संस्था के सहयोग से ऐडवोकेट सुशील टेकरीवाल और कमलेश मिश्रा उनसे मिलने आए थे और इन्होंने भरोसा दिया है कि वह बिना फीस लिए केस फाइट करेंगे। सुप्रीम कोर्ट में इन्होंने ही अर्जी लगाई है और बॉम्बे में भी अपने खर्चे पर इन्होंने केस की पैरवी की है। वैसे उन्होंने तय किया है कि इन्साफ के लिए वह हर हाल में फाइट करेंगे।
    एक सर्विस क्लास आदमी के पास क्या होता है। नौकरी और परिवार। बेटा गंवा चुका हूं और अब कुछ बचा नहीं है। इतना तो तय है कि अब मेरा बेटा वापस नहीं आने वाला है। उसकी यादें अब हमारे साथ हैं और कुछ नहीं लेकिन मैं यह सोचकर बैठ नहीं सकता कि अकेले हम क्या कर सकते हैं। यह मुद्दा एक अकेले का नहीं है। अगर फिर कोई घटना घटी तब मैं अपने आप को माफ नहीं कर पाऊंगा। अगर पहले किसी के साथ ऐसी घटना हुई होती और तभी सिस्टम में बदलाव की बात हुई होती तो शायद मेरा बेटा नहीं मरता। अब मैं चुप हो गया तो भविष्य में ऐसी घटना को न्यौता देना होगा। ऐसे में सिस्टम को ठीक करना ही इसका समाधान है(इस दौरान वह भावुक हो गए)।
    ——————————————————————————————————————
    प्रद्युम्न की मां- रोजाना स्कूल के लिए तैयार करना और स्कूल भेजना यही जीवन का मकसद था। किसी तरह से वह पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने और मैंने अपना जीवन उसी में समर्पित कर रखा था। बेटी बड़ी है और बेटा छोटा था। वह सबका लाडला था। स्कूल से आते ही वह खाने के बाद खेलने में लग जाता था। मेरे मना करने पर भी वह खेलने में लगा रहता था और मैं सो जाती थी। इसके बाद वह थक-हारकर बाद में कब मेरे बगल में लेटकर सो जाता था मुझे पता नहीं चलता था। (रोते हुए कहा) ये दर्द अब बर्दाश्त से बाहर है। पता नहीं जब लोगों की भीड़ खत्म हो जाएगी और जाहिर तौर पर लोग अपने-अपने काम में लग जाएंगे तब मेरे अकेलेपन का क्या होगा। कैसे जी पाऊंगी मुझे नहीं पता। उसके शरीर पर एक खरोंच को हम बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। हाल में 7 मई 2017 को वह 7 साल का हुआ था लेकिन वह अपनी बड़ी बहन की साइकल चलाने लगता था और हमें डर होता था कि कहीं गिर न जाए तो उसके पापा उसके पीछे-पीछे तब तक दौड़ते थे जब तक वह साइकल चलाता था। इस दरिंदगी ने मेरे हंसते-खेलते परिवार को ऐसा गम दिया है जिससे हम जीवन भर नहीं ऊबर पाएंगे।
    उसे स्विमिंग, साइकलिंग से लेकर क्रिकेट का काफी शौक था। वह जब ढ़ाई साल का था तो कहता था कि बड़ा होकर मुझे पापा बनना है। अब हाल के दिनों में उसके फेवरिट विराट कोहली थे और कहता था कि वह विराट कोहली बनना चाहता है। दिनभर घर में ही क्रिकेट का बैट लेकर घूमता रहता था। एक बार फोटोफ्रेम क्रिकेट की बॉल से तोड़ दिया था तो मैंने उसे काफी डांटा था लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैंने कहा था कि मैं हवाई जहाज पर नहीं चढ़ी, तब कहता था कि वह बड़ा होकर हवाई जहाज में घुमाएगा लेकिन मेरे बेटे के साथ जो हुआ वह दुनिया में किसी के साथ न हो।Vikram Singh Chauhan
    12 September at 21:46 ·
    अरनब ने रिपब्लिक में पत्रकारों को नहीं गुंडे मवालियों को रखा है। वे खुद भी एक गुंडा ही है। हर जगह इनके रिपोर्टर आक्रामक व्यवहार कर रहे हैं ,जैसे इससे पहले कभी भारत में पत्रकारिता नहीं हुई। रेयान इंटरनेशनल स्कूल में मारे गए दूसरी कक्षा के छात्र प्रद्युम्न ठाकुर के पिता से जिस तरह की बदसलूकी इनके महिला रिपोर्टर ने की है उसके लिए चैनल को माफ़ी मांगना चाहिए। उसके बच्चे की मौत हुई हैं और आप उनके साथ इस वक़्त ऐसे व्यवहार कर रहे हैं। भारतीय न्यूज़ चैनल पाकिस्तानी न्यूज़ चैनलों को दिनभर गाली देते रहते हैं लेकिन कुछ मामलो में भारतीय मीडिया को विश्व मीडिया या अपने पडोसी देश पाकिस्तान से सीख लेना चाहिए कि मानवीय रिपोर्टिंग किस तरह से की जाये। पेशावर में बच्चों पर आतंकवादी हमलों के बाद न्यूज़ पढ़ते ARY न्यूज़ चैनल की एंकर सनम बलोच लाइव फूट फूटकर रोई थी। सिर्फ चीखना और चिल्लाना पत्रकारिता नहीं हैं जनता के साथ उनके दुःख में शरीक होकर रोना भी पड़ता है।Vikram Singh Chauhan
    Yesterday at 00:03 ·
    आंग सान सू ची से नोबल पुरस्कार जरूर वापस ली जानी चाहिए पर आप ये बताओं अपने 80 बाज के लिए विमान में सीटें बुक कराने वाले सऊदी अरब के मुसलमानों को पता है कि नहीं कि कोई रोहिंग्या मुसलमान भी है जिनके रहने के लिए न घर है और न खाने के लिए अनाज। ये किस टाइप के मुसलमान हैं? कहते हैं इस्लाम में अमीर गरीब का भेद नहीं है। अरब देश अगर रोहिंग्या मुसलमानों के लिए आगे आते तो आज उनकी ये दुर्दशा नहीं होती।Vikram Singh Chauhan
    23 hrs ·
    नोटबंदी और जीएसटी नहीं मोदी आम जनता से सबसे बड़ी लूट पेट्रोल डीजल से कर रही है। ऐसी लूट जिसको लेकर न कभी कोई याचिका लगती है और न विरोध प्रदर्शन होता है। मोदी ने यह लूट बड़ी चालाकी से डायनैमिक प्राइसिंग के नाम से शुरू किया है यानि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हर दिन बदलाव। लोगों को पता ही नहीं चलता, कब कितना टैक्स बढ़ गया। कब कितनी कीमत बढ़ गई। जनता को कहा गया था कि इससे आपको फायदा मिलेगा लेकिन जिस दिन 16 जून से इसे शुरू किया गया है कभी भी पेट्रोल या डीजल सस्ता नहीं हुआ। मोदी ने साल 2014 से अब तक पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 126 फीसदी बढ़ा दी है। वहीं, डीजल पर लगने वाली ड्यूटी में 374 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर दी है। अब जानिए सबसे बड़ी सच्चाई , रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास 5,000 पेट्रोल पंप स्थापित करने का लाइसेंस है। कंपनी ने पिछले दशक की शुरुआत में लगभग 5,000 करोड़ रुपए के निवेश से 1,433 पेट्रोल पंप स्थापित किए लेकिन मई 2008 में इन सभी को बंद कर दिया। इसलिए बंद किया क्योंकि मनमोहन सिंह की सरकार निजी कंपनियों को पेट्रोल के नाम पर जनता के जेब में डाका डालने नहीं दिया था। अब रिलायंस के सभी 1,433 पेट्रोल पम्प शुरू हो गए हैं और नए पेट्रोल पम्प खोला जा रहा है,दो साल में सभी 5000 खुल जायेंगे । मोदी ने अम्बानी के लिए सबसे पहले लूट ऑफर खोला है। हम देश के लोग उनके जिओ मोबाइल से बेवकूफ बनते रहे कि रिलायंस मुफ्त में 4 जी नेट दे रहा है ,यह मुफ्त में नहीं है आपके 4 जी नेट का पैसा रिलायंस पेट्रोल से वसूल रही थी। मोदी वधु अम्बानी भाई छे।Vikram Singh Chauhan
    22 hrs ·
    अजीत डोभाल को एफबीआई या सीआईए का हेड होना था ,भारत में नाहक अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं यह महामानव। डोभाल साहब और मोदी के प्रधान सचिन नृपेंद्र मिश्रा ने भूखे ,प्यासे और बेघर रोहिंग्या मुसलमानों का लश्कर-ए-तैबा से आतंकी कनेक्शन ढूढ़ निकाला है। कहा गया है रोहिंग्या मुस्लिम समुदायों के बीच पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का बढ़ता प्रभाव एक गंभीर उभरता हुआ खतरा है और इसका इस्तेमाल भारत को निशाना बनाने के लिए किया जाएगा। अरे उन्हें शरण नहीं देना है तो मत दो कम से कम उनकी मज़बूरी का मजाक तो मत बनाओं। हर गरीब और बेघर में तुम्हें आतंकवादी ही नज़र आते हैं।Vikram Singh Chauhan added 4 new photos.
    10 hrs ·
    गाय खरीदकर ले जा रहे पहलू खान को राजस्थान अलवर हाइवे में पीट पीटकर मार डाला,उनके पास गाय को खऱीदने के सभी कागजात थे, इसके बावजूद गौ तस्करों ने उन्हें मरते दम तक पीटा । पहलू ने मरने से पहले कुछ नाम बताये थे वो नाम बेगुनाहों के निकले। पुलिस को उनका मोबाइल लोकेशन घटनास्थल का नहीं मिला ,पुलिस ने गौशाला के कर्मचारियों के बयान के आधार पर सबको निर्दोष बता दिया। इसका मतलब साफ़ है या तो गायों ने खुद पहलू खान को पैरों में कुचल कर मारा होगा। या पहलू ने आत्महत्या कर लिया होगा। फिर वे फोटो जो पहलू खान को मारते हुए दिखे वे क्या थे ? वे सब फोटोशॉप थे मोदी और भाजपा सरकार को बदनाम करने की मुल्लों और खांग्रेसियों की साजिश थी! वन्दे मातरम ,भारत माता की जय
    दी गई सभी तस्वीरें देशहित में फोटोशॉप्ड है!Vikram Singh Chauhan

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  2. सिकंदर हयात

    Mukesh Aseem
    9 hrs ·
    चीन और जापान दोनों की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की भयंकर अतिरिक्त नक़दी तरलता (surplus liquidity) है| इसकी वजह से जापान की बैंकिंग व्यवस्था को तबाह हुए 20 साल हो चुके| 1990 के दशक में दुनिया के 10 सबसे बड़े बैंकों में 6-7 जापानी होते थे, आज कोई इनका नाम तक नहीं जानता| जापानी सेन्ट्रल बैंक कई साल से नकारात्मक ब्याज दर पर चल रहा है – जमाराशि पर ब्याज देता नहीं लेता है! लोग किसी तरह कुछ खर्च करें तो माँग बढे, कहीं निवेश हो| जीडीपी में 20 साल में कोई वृद्धि नहीं, उसका शेयर बाजार का इंडेक्स निक्केई 20 साल पहले के स्तर पर वापस जाने की जद्दोजहद में है| इस आर्थिक संकट से निकलने के लिए पूँजीवाद के अंतिम हथियार अर्थात सैन्यीकरण और युद्ध की और ले जाने की नीति उसके वर्तमान प्रधानमंत्री शिंजो अबे की है जबकि पिछले युद्ध की बर्बादी के बाद जापान ने सेना लगभग समाप्त कर दी थी|
    चीन ने भी बड़े पैमाने पर निर्यात से भारी विदेशी मुद्रा अर्जित की है| अभी उसके बैंक दुनिया के सबसे बड़े बैंक हैं| शहरों, सडकों, रेल लाइनों, एयरपोर्टों में भारी निवेश के बाद भी यह अतिरिक्त तरलता उसकी अर्थव्यवस्था को संकट में डाल रही है| उसके बनाये कई शानदार शहरों में कोई रहने वाला नहीं है, इन्हें भूतिया शहर कहा जाता है| बुलेट ट्रैन खाली चल रही हैं| बैंक जापान की तरह बर्बादी के कगार पर हैं|
    अब ये दोनों प्रतियोगिता में हैं कि एशिया-अफ्रीका के देशों को कर्ज देकर वहाँ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लगाएं, जिसमें इनके उद्योगों का सामान खरीद कर लगाया जाये| चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा में दो ख़रब डॉलर से एयरपोर्ट और बंदरगाह बनाया| इसे अब दुनिया का सबसे बड़ा निर्जन इंटरनेशनल एयरपोर्ट (बिल्कुल खाली, कोई उड़ान नहीं!) कहा जाता है| लेकिन चीन के उद्योगों के माल की बिक्री तो हो गई और कर्ज वापस आता रहेगा| इसी तरह चीन दुनिया में हजारों ख़रब डॉलर के प्रोजेक्ट लगाने के ऐलान कर रहा है, कितना होगा देखना बाकी है|
    जापान भी इस दौड़ में है| अब 0.1% ब्याज उसके बैंकों के लिए कोई नुकसान नहीं क्योंकि वहाँ तो और ब्याज देना पड़ता है पैसा रखने के लिए| साथ में कुल लागत के 30% के बराबर की खरीदारी बुलेट ट्रैन के लिए जापान से की जाएगी, उसमें 20-25% मार्जिन लगाइये तो उसका मुनाफा सुनिश्चित है|
    लेकिन विदेशी मुद्रा के कर्ज में सिर्फ ब्याज नहीं होता बल्कि एक्सचेंज रेट रिस्क भी होता है जिसे हेज़ (hedge) किया जाता है और उसकी खर्च 5-6% आता है| तो जीरो बन गया 6%! रेलवे ने जो प्रीमियम रेट की गाड़ियाँ चलाई हैं उनमें जगह भर नहीं रही है तो बुलेट ट्रैन का क्या होगा? कुछ अमीर लोगों की सुविधा की लागत आखिर नए टैक्स लगा कर पूरी की जाएगी|
    लेकिन एक और पेंच है| जापान इस प्रोजेक्ट के बदले में बाकी एशिया-अफ्रीका के प्रोजेक्ट में भारतीय बैंकों को साझीदार बनाने का समझौता कर रहा है| भारतीय बैंक एक और तो डूबे कर्जों से निपट रहे हैं, साथ ही नए कर्ज नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था में माँग के अभाव में नया निवेश नहीं हो रहा है| उद्योगों को बैंक कर्ज की दर पिछले साठ साल में निम्न स्तर पर है| इसी स्थिति में मोदी जी अपने नोटबंदी नामके मास्टरस्ट्रोक से बैंकों में भारी मात्रा में नकदी जमा करा चुके हैं जिस पर उन्हें ब्याज से और हानि हो रही है| खुद रिजर्व बैंक भारी घाटा उठा चुका है और जमा राशि पर ब्याज दरें तेजी से कम की जा रही हैं| अब इस नकदी को कहाँ लगाया जाये?
    भारत-जापान मिल कर चीन के वन बेल्ट वन रोड (OBOR) के मुकाबले का कुछ करने का प्रयत्न कर रहे हैं जैसे ईरान में चाबहार पोर्ट| पिछले दिनों दोनों ने मिलकर अहमदाबाद में अफ़्रीकी देशों का सम्मलेन भी किया था जिसमें बीसियों ख़रब डॉलर के कर्ज और निवेश की घोषणाएं हुईं|
    इसी किस्म के बड़े कर्ज देने के लिए ही भारत के बैंकों को बड़ा बनाने की जरुरत है जिसके लिए सरकार 27 सरकारी बैंकों का विलय कर सिर्फ 5 या 6 बैंक बना देना चाहती है| पर समस्या ये है कि जापान और चीन ने यह सब तब किया था जब उनकी अर्थव्यवस्था एक हद तक उन्नत हो चुकी थी और उनके बैंक दुनिया में शिखर पर थे| भारतीय पूँजीपति इस रास्ते पर पहले ही चलने की कोशिश में है क्योंकि विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का गहन संकट उसे निर्यात के द्वारा जापान-चीन की तरह विकसित होने का भी मौका नहीं दे पा रहा है| चीन-जापान के बैंकों में तो संकट इस सबके बाद आया था जबकि भारतीय बैंक तो पहले ही भारी विपत्ति में हैं क्योंकि उनके 15% कर्ज डूबने की स्थिति में हैं|
    सबसे बड़ी बात यह कि भारत की ही तरह जिन देशों में ये भुतहा प्रोजेक्ट लगाए जायेंगे वे किस तरह इनका कर्ज चुकाएंगे? अपनी जनता पर भारी तबाही और लूट से भी कैसे यह कर्ज चुकाया जायेगा? तब क्या होगा? युद्ध या क्रांतियाँ? यह शोषित जनता को चुनना होगाMukesh Aseem—————Sanjay Tiwari
    20 hrs ·
    मुंबई से साबरमती के बीच हाई स्पीड ट्रेन का अनुमानित खर्च है १.१ लाख करोड़। दूरी है, ५०८ किलोमीटर। निश्चित तौर पर यह मंहगा है। लेकिन पहली बार आधारभूत ढांचा विकसित करने के लिए यह खर्च करना ही पड़ेगा। इसके बाद सरकार २०२९ तक जिस दिल्ली आगरा लखनऊ बनारस रूट पर हाई स्पीड ट्रेन चलाने की योजना बना रही है उसकी दूरी है ७२० किलोमीटर लेकिन खर्चा वर्तमान मुंबई साबरमती रूट से आधा। ५२ हजार करोड़ (अनुमानित)।
    यही होता है, शुरुआत में तकनीकि मंहगी होती है लेकिन जैसे जैसे तकनीकि आम होती है खर्चा घट जाता है। इसलिए ठंड रखिए। देर से हो रहा है लेकिन सही काम हो रहा है।Sanjay Tiwari
    Yesterday at 13:26 ·
    मैं जानता हूं मेरी आय इतनी नहीं है कि मैं बुलेट ट्रेन की सवारी कर सकूंगा लेकिन फिर भी मैं चाहता हूं कि अगले पांच साल में मुंबई से साबरमती नहीं बल्कि मुंबई से दिल्ली तक बुलेट ट्रेन दौड़ जाए। लेकिन मैं तो सिर्फ चाह ही सकता हूं इसलिए इस चाहत को सिर्फ कह ही सकता हूं।
    पांच साल में न सही पंद्रह साल में ही सही लेकिन दिल्ली मुंबई और दिल्ली बनारस तक बुलेट ट्रेन का सफर शुरु हो जाएगा। जब एक बार किसी उद्योग का इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित हो जाता है तो फिर उसकी गति तेज हो जाती है। देश में मेट्रो का ही उदाहरण देख लीजिए। दिल्ली मेट्रो बनते ही आज आधा दर्जन शहर मेट्रोमय हो गये। महज एक दशक के भीतर। उस वक्त मैं भी खूब शक करता था कि मेट्रो सफल नहीं होगी।
    लेकिन मेट्रो सफल ही नहीं हुई बल्कि दिल्ली, बंबई, चेन्नई, बंगलौर, कोच्चि, जयपुर, लखनऊ में शुरु हो चुकी है और नागपुर, अहमदाबाद, हैदराबाद में इसी साल शुरु होने जा रही है। ऐसा ही बुलेट ट्रेन के साथ भी होगा। और देख लेना यह बुलेट ट्रेन इतनी सफल रहेगी कि कमाई के रिकार्ड कायम करेगी। सबसे पहले वही टिकट कटायेंगे जो आज टेंसुएं बहा रहे हैं।—————————————————Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    7 hrs · Dehra Dun ·
    देहरादून से लखनऊ की फ्लाइट में सवारी सीट पर कुत्ता ले जाने की ज़िद पर अड़े यात्री को समझदार पायलट ने उतार दिया , तो कुत्ता पति ने तूफान खड़ा कर दिया । दर असल जहाज़ में कुत्ता ले जाने की छूट देने का नियम अंग्रेजों ने बनाया था , जिनकी मेमें काले भारतीयों से घृणा करती थीं , जबकि काले कुत्ते से मुंह और जाने क्या क्या चटवाती थीं । मैं बार बार कहता हूं कि कुत्ता रखने का अधिकार सिर्फ किसान , चरवाहे , बागवान , ग्रामीण , व्याध और घमन्तु मनुष्य को है , जिनके लिए कुत्ता उपयोगी है । इसके सिवा शहरों में स्टेटस और शौक़ के लिए कुत्ता रखने वाले अव्वल दर्जे के घामड़ हैं । जिसके घर मे कुत्ता होता है , में कभी दुबारा उसके घर नहीं जाता । उसका कुत्ता कभी मुझ पर भौंक कर मुझे अपमानित करता है , तो कभी नाश्ते के वक़्त अपनी थूथनी से मेरी देह सूंघने लगता है । कुत्ता स्वामी सुबह सुबह दूसरों के गेट पर कुत्ते से टट्टी करवाता है । नौकर को पूरी पगार नहीं देता , जबकि कुत्ता को मंहगे बिस्कुट खिलाता ।
    शहरों में कुत्ता रखने पर पाबंदी लगे । तमाम शहरी कुत्तों को पकड़ उत्तराखण्ड के बनों में छोड़ दिया जाए , जहां शिकार के अभाव में बाघ बस्तियों में आ रहे हैं । शहर में कुत्ता रखने वालों का बायकाट कीजिये । उन्हें बताइये कि कुत्ता रहने से उनकी शान नहीं बढ़ रही , बल्कि वह असामाजिक सिद्ध हो रहे हैं । एक बार में एक परिचित के लॉन में बैठ चाय पी रहा था , कि छोटा खरगोश कुत्ता उछल कर मेरी गोद मे आ बैठा । मैंने उस पर गर्म चाय उंडेली तो किकिया कर भागा । मैने पूछा – क्यों रखा तूने यह बदतमीज़ कुत्ता ? तो उसकी बेटी मुझ पर गुस्सा हुई कि इसने हमारे हनी को कुत्ता बोला ।
    में सम्बंधित पायलट को बधाई देता हूँ । चलते जहाज़ में कुत्ता अपनी पर आकर किसी को काट सकता था , अथवा उपद्रव कर सकता था ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    13 September at 13:01 · Dehra Dun ·
    राहुल गांधी 3 साल में एक बार भाषण देता है , और चाटुकार कांग्रेसी 6 महीने के लिए लहालोट हो जाते हैं । thiland से लौट कर उसने डेढ़ दो साल पहले जो भाषण दिया , उसे लेकर उनकी वाह वाह महीनों नहीं थमी । अरे , स्कूल की वादविवाद प्रतियोगिता में बच्चे , और अपना माल बेचने के लिए सेल्स मैन भी धाराप्रवाह भाषण देते हैं । उससे वह नेता नहीं हो जाते । रफ़ी अहमद किदवई और के कामराज कभी भाषण नहीं देते थे , पर अपनी अन्तर्दृष्टि के कारण बड़े नेता थे । क्या इससे पहले कोई ऐसा राष्ट्रीय नेता , किसी पार्टी का मुखिया देखा जो हफ्तों , महीनों कभी थाईलैंड , कभी इटली और कभी अमेरिका पड़ा रहता हो ? उसे देश के गांवों में भेजो , एक रात किसी दलित की झोम्पडी में सोने का पूर्व नियोजित ड्रामा करने को नहीं , अपितु देश को वस्तुतः समझने हेतु । लफ़्फ़ाज़ और महा झूठे व्यक्ति का मुकाबला भाषण में न कर पाओगे । अपनी मौलिक राह बनाओ । चाटुकारिता , अय्याशी और भ्र्ष्टाचार से बाज़ आओ । तुम ऐसे न होते , तो क्या आज वह व्यक्ति भारत जैसे विशाल गण राज्य के सत्ता शीर्ष पर होता , जिसकी अधिकाधिक योग्यता और व्यक्तित्व किसी म्यूनस्पलिटी के चेयर मैन बनने से अधिक नहीं है ?Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    13 September at 07:54 · Dehra Dun ·
    उत्तराखण्ड के एक अशिष्ट , उजड्ड और कुसंस्कारी मंत्री की वीडियो क्लिप देख मन ग्लानि , क्रोध और शर्म से म्लान हो गया । मंत्री एक सरकारी स्कूल की क्लास में जाकर , बच्चों के सम्मुख अध्यापिका को अपमानित कर रहा है , जबकि स्वयं ख़लीफ़ा बन कर मास्टरनी जी से गलत सवाल पूछ रहा है । वह मूर्ख हथियार बन्द पुलिस के साथ बच्चों की क्लास में जा घुसा , जो एक निहायत ही अश्लील हरकत है ।मास्टरनी जी ने संयम और शालीनता का परिचय दिया । मैं होता तो मंत्री को वहीं पर रगेदता , फिर चाहे जो भी हो । मंत्री पर कार्रवाई की बात तो सोचना भी वृथा है , पर समाज संज्ञान लेकर मंत्री के विरुद्ध सामाजिक कार्रवाई करे । शिक्षकों के सम्मान की रक्षा हेतु आचार संहिता बने ।
    लेकिन जब सरकारी स्कूलों के अध्यापक सुगम में तबादले के लिए एड़ी चोटी एक करते हैं , अल्प वेतन भोगी और बेरोज़गार युवकों का दुख भूल अपनी तनख्वाह बढाने को हड़ताल करते हैं , प्रोपर्टी डीलिंग और बेनामी ठेका लेते हैं , तब उनके भी कान खींचे जाने चाहिए । लेकिन सद्य प्रसंग सर्वथा आपत्तिजनक है ।
    See Translation—————————-Vikram Singh Chauhan added 4 new photos.
    1 hr ·
    मैं सरदार नहीं हूँ पर जैसे ही किसी सरदार को देखता हूँ बड़ी जोश आ जाती है अपने आप। उन पर गर्व होता है। मैं कई सालों तक इसका कारण ढूढ़ता रहा ,इसका कारण है उनका दूसरों के मदद के लिए दौड़ना। कुछ साल पहले अंबिकापुर कालीघाट में बाइक सवार पति ,पत्नी का बुरी तरह एक्सीडेंट हो गया वे सड़क पर पड़े हुए थे सामने से एक तेज रफ़्तार ट्रक आ रही थी ,ट्रक सरदार चला रहा था। सरदार ने खुद के ट्रक को नाले में गिरा दिया और खुद सड़क पर गिरकर उस पति पत्नी को बचाने दौड़े ,संयोग से मैं भी इस हादसे से बचा था और मेरे दोस्त उमेश तिवारी का सामने का दांत टूट गया था। आज जब रोहिंग्या मुसलमानों को कभी आतंकी बताया जा रहा है ,कभी भविष्य के लिए खतरा बताया जा रहा है तब सिख समाज के लोगों ने रोहिंग्या मुसलमानों को राहत पहुंचाने के लिए बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर ‘गुरू लंगर’ शुरू किया है। ‘द खालसा एड’ टीम ने सीमावर्ती शहर तेकनाफ में अपना कैंप लगा रखा है। सिख वॉलेंटियर्स भारत से वहां पहुंचे हैं। वे 35 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को रोज चावल, सब्जी खिला रहे हैं। यहां पर रोहिंग्या मुस्लिम कई दिनों तक टूटी नावों पर सफर करके म्यांमार से यहां पहुंच रहे हैं। किसी सरकार के पहले वहां लोगों की भूख मिटाने सरदार पहले पहुंचे हैं। सरदारों के पहुँचने से पहले रोहिंग्या मुसलमानों के बच्चे खाने के लिए सड़कों पर भीख मांगते घूम रहे थे। इसे कहते हैं इंसानियत ,इसे कहते है मानवता। अगर आपके पड़ोस में कोई सरदार रहता है या आपके मित्र सरदार हैं तो उन पर गर्व कीजिये। आपके मुसीबत में पहला आदमी जो खड़ा होगा वो सरदार होगा।Vikram Singh Chauhan
    3 hrs ·
    मैं दावे के साथ कहता हूँ अगर मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल का ढ़िढोरा पीटते और मार्केटिंग करते तो देश में कम से कम पांच साल और उनकी सरकार रहती। बुलेट ट्रेन की पहल भी दूरदर्शी मनमोहन सिंह की थी जिसे वर्ष 2013 में ही उनके जापानी समकक्ष प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने इस बारे में साझा बयान जारी किया था। मनमोहन सिंह की एक बड़ी खासियत यह थी कि वह कार्य हुए बिना कभी इसका प्रचार नहीं करते थे। मोदी ने इन तीन सालों में सिर्फ मनमोहन सिंह के कार्यों को अपना बताने का काम किया है। यह वहीँ मनमोहन सिंह हैं जिसे शिंजो आबे ने ही अगस्त 2014 में जापान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश को यह नुकसान हुआ है कि अब जापान सिर्फ बुलेट ट्रेन के लिए मदद करेगा जबकि 2013 में हुई बातचीत में हाईस्पीड ट्रेन और नेटवर्क मजबूत करने पर भी जापान सहयोग को तैयार था। मोदी ठीक अपने भक्तों की तरह कॉपी पेस्ट वाले नेता हैं। सरदार जी तुस्सी ग्रेट हो। नीचे लिंक पढ़े स्पेशियली भक्त लोग!

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  3. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar : सजन रे झूठ मत बोलो, पेट्रोल पंप पर जाना है… पेट्रोल के दाम 80 रुपये के पार गए तो सरकार ने कारण बताए। लोककल्याणकारी कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी और सरकार की भाषा एक हो चुकी है। दोनों को पता है कि कोई फैक्ट तो चेक करेगा नहीं। नेताओं को पता है कि राजनीति में फैसला बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट या प्रदर्शन से नहीं होता है। भावुक मुद्दों की अभी इतनी कमी नहीं हुई है, भारत में।
    बहरहाल, आपको लग रहा होगा कि भारत सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च कर रही होंगी इसलिए आपसे टैक्स के लिए पेट्रोल के दाम से वसूल रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता है। आप किसी भी बजट में इन मदों पर किए जाने वाले प्रावधान देखिए, कटौती ही कटौती मिलेगी। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर रवि दुग्गल और अभय शुक्ला का काम है। आप इनके नाम से ख़ुद भी करके सर्च कर सकते हैं।
    भारत ने 80 के दशक में स्वास्थ्य सेवाओं पर अच्छा ख़र्च किया था, उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखा लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियां आते ही हम 80 के स्तर से नीचे आने लगे। स्वास्थ्य सेवाओं का बजट जीडीपी का 0.7 फीसदी रह गया। लगातार हो रही इस कटौती के कारण आम लोग मारे जा रहे हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा महंगे इलाज पर ख़र्च हो रहा है।
    यूपीए के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के कारण हेल्थ का बजट वापस जीडीपी का 1.2 प्रतिशत पर पहुंचा। इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन तो बने मगर डाक्टरों और कर्मचारियों की भयंकर कमी के कारण यह भी दम तोड़ गया। अब तो इस योजना में भी लगातार कमी हो रही है और जो बजट दिया जाता है वो पूरा ख़र्च भी नहीं होता है। तो ये हमारी प्राथमिकता का चेहरा है।
    12 वीं पंचवर्षीय योजना में तय हुआ कि 2017 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हेल्थ बजट होगा। मोदी सरकार ने कहा कि हम 2020 तक 2.5 प्रतिशत ख़र्च करेंगे। जब संसद में नेशनल हेल्थ राइट्स बिल 2017 पेश हुआ तो 2.5 प्रतिशत ख़र्च करने का टारगेट 2025 पर शिफ्ट कर दिया गया। ये मामला 2022 के टारगेट से कैसे तीन साल आगे चला गया, पता नहीं। रवि दुग्गल कहते हैं कि हम हकीकत में जीडीपी का 1 फीसदी भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च नहीं करते हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र ही नहीं है। ( डी एन ए अख़बार में ये विश्लेषण छपा है)
    गोरखपुर में कई सौ बच्चे मर गए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में अभय शुक्ला और रवि दुग्गल ने एक लेख लिखा। कहा कि यूपी ने जापानी बुखार और एंसिफ्लाइटिस नियंत्रण के लिए 2016-17 में केंद्र से 30.40 करोड़ मांगा, मिला 10.19 करोड़। 2017-18 में तो मांगने में भी कटौती कर दी। 20.01 करोड़ मांगा और मिला मात्र 5.78 करोड़। तो समझे, बच्चे क्यों मर रहे हैं।
    रही बात कुल सामाजिक क्षेत्रों के बजट की तो अभय शुक्ला ने हिन्दू अख़बार में लिखा है कि 2015-16 में जीडीपी का 4.85 प्रतिशत सोशल सेक्टर के लिए था, जो 2016-17 में घटकर 4.29 प्रतिशत हो गया। प्रतिशत में मामूली गिरावट से ही पांच सौ हज़ार से लेकर दो तीन हज़ार करोड़ की कटौती हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं के हर क्षेत्र में भयंकर कटौती की गई।
    महिला व बाल विकास के बजट में 62 फीसदा की कमी कर दी गई। ICDS का बजट 2015-16 में 3568 करोड़ था, ,2016-17 में 1340 करोड़ हो गया। जगह जगह आंगनवाड़ी वर्करों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हर राज्य में आंगनवाड़ी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं।
    मिंट अख़बार ने लिखा है कि यूपीए के 2009 में सोशल सेक्टर पर 10.2 प्रतिशत ख़र्च हुआ था। 2016-17 में यह घटकर 5.3 प्रतिशत आ गया है, कटौती की शुरूआत यूपीए के दौर से ही शुरु हो गई थी। सर्व शिक्षा अभियान, इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, मिड डे मील का बजट कम किया या है।
    वही हाल शिक्षा पर किए जा रहे ख़र्च का है। आंकड़ों की बाज़ीगरी को थोड़ा सा समझेंगे तो पता चलेगा कि सरकार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा महत्वपूर्ण ही नहीं हैं। बीमा दे दे और ड्रामा कर दो। दो काम है। 31 मार्च 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है। सरकार ने इन क्षेत्रों में बजट बढ़ाया होता तो समझा भी जा सकता था कि इनके लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम हमसे आपसे वसूले जा रहे हैं।दरअसल खेल ये नहीं है। जो असली खेल है, उसकी कहानी हमसे आपसे बहुत दूर है। वो खेल है प्राइवेट तेल कंपनी को मालामाल करने और सरकारी तेल कंपनियों का हाल सस्ता करना। ग़रीब और आम लोगों की जेब से पैसे निकाल कर प्राइवेट तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। दबी जुबान में सब कहते हैं मगर कोई खुलकर कहता नहीं। इसका असर आपको चुनावों में दिखेगा जब आसमान से पैसा बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा। चुनाव जब महंगे होंगे तो याद कीजिएगा कि इसका पैसा आपने ही दिया है, अस्सी रुपये पेट्रोल ख़रीदकर। जब उनका खजाना भर जाएगा तब दाम कम कर दिए जाएँगे। आप जल्दी भूल जाएँगे । इसे ‘control extraction of money and complete destruction of memory’ कहते हैं।
    एनडीटीवी इंडिया न्यूज चैनल के चर्चित एंकर रवीश कुमार

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