मोदी के ‘न्यू इंडिया’ में निखिल दधीच जैसों की भूमिका!

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राजेश प्रियदर्शी
डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी

निखिल दधीच को एक हफ़्ते पहले तक शायद ही कोई जानता हो, मगर पीएम का ट्विटर हैंडल चलाने वाले उन्हें न सिर्फ़ जानते थे बल्कि इस लायक भी मानते थे कि मोदी जी उन्हें फॉलो करें.

‘न्यू इंडिया’ बनाने के लिए युवा शक्ति का पुरज़ोर आह्वान कर रहे मोदी जी ने दधीच को ‘अनफॉलो’ करने की माँग को नज़रअंदाज़ करके ज़ाहिर कर दिया है कि वे कितने ‘भक्त-वत्सल’ हैं. उन्होंने यही जताया है कि जो उनकी छत्रछाया में है उसका सेकुलर और लिबरल टाइप शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे.

सेकुलर और लिबरल ही लिखना चाहिए क्योंकि ये माँग उन्हीं लोगों की थी, पिछले सवा तीन साल में विपक्ष ने कब कोई माँग की है?

बहरहाल, विपक्ष की ग़ैर-मौजूदगी में वे ही लोग विपक्ष हैं जो हिंदुत्व की राजनीति से असहमत हैं. भले ही वे किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े न हों, आजकल उन्हीं को सुविधानुसार शेख़ुलर, लिबटार्ड और कौमी कहा जाता है. कांग्रेस के हर कुकृत्य के लिए वही लोग जवाबदेह हैं, कांग्रेस नहीं.

वैसे कांग्रेस के ज़माने से चलन रहा है कि संवेदना प्रकट करने से या आरोपों में घिरे व्यक्ति को किनारे करने से पूरी पार्टी और सरकार दोषी दिखने लगती है इसलिए ऐसा करने से जहाँ तक संभव हो बचना चाहिेए. बीजेपी ने इस रवायत को और पुख़्ता किया है और यह अभयदान निचले स्तर तक एक्सटेंड किया गया है.

ऐसा व्यवहार राजनीति में शुचिता के लिए बेहद ज़रूरी, लेकिन अब पिट चुके सिद्धांत के विपरीत है.

पीएम अपनी मर्ज़ी के मालिक?

इससे पहले मनोहर लाल खट्टर, योगी आदित्यनाथ और सुरेश प्रभु की घनघोर आलोचना से विचलित हुए बिना पीएम ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, वे किसको हटाएँ, किसको रखें, किसकी आलोचना करें, किसे कड़ा संदेश दें, ये सब देश की जनता या विपक्ष के कहने से नहीं होगा.

शायद सोच ये है कि प्रधानमंत्री ने 56 इंच के सीने वाले एक रोबदार नेता की जो छवि गढ़ी है, उसके साथ उनका करूण-संवेदनशील रूप फिट नहीं बैठता इसलिए गोरखपुर में रोती हुई माएँ हों या रेल दुघर्टना के शिकार लोगों के रिश्तेदार या फिर गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें ‘कुतिया’ कहे जाने से नाराज़ लोग, मोदी जी ने किसी मामले में सहानुभूति ज़ाहिर करना सही नहीं समझा.

ये बात अलग है कि वक़्त-ज़रूरत के हिसाब से, और सबसे बढ़कर अपनी मर्ज़ी से, उनका गला भर आता है और आँखें नम हो जाती हैं.

बहुत मजबूरी में, पीएम ने शायद ही कभी, अपने श्रीमुख से श्मशान और कब्रिस्तान जैसे जुमले उछाले हों, वर्ना अलग-अलग स्तर पर ऐसा करने के लिए लोग तैनात हैं जिसके निचले पायदान पर निखिल दधीच हैं और ऊपर वाले पायदान पर कई सांसद और मंत्री.

रोकने-टोकने की ज़रूरत नहीं

वैसे जब प्रधानमंत्री गांधी-बुद्ध की बात करते हैं, अंबेडकर-फुले को याद करते हैं, परमवीर अब्दुल हमीद को श्रद्धांजलि देते हैं तो हिंदुत्व के जांबाज सिपाहियों में कोई भ्रम नहीं फैलता, वे अच्छी तरह जानते हैं कि कहने की बात क्या है और करने की चीज़ क्या है.

इसके बावजूद, अनफॉलो करना तो दूर, पीएम ने बेमन से ही, दिखाने के लिए ही सही, खुद ट्वीट करके या किसी और से कराके, निखिल दधीच को रोकने-टोकने की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसा अकारण नहीं है, वे अच्छी तरह जानते हैं कि सत्ता के प्रश्रय से सक्रिय-सशक्त हुए लोग ही हिंदुत्व के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाएँगे.

ये वो समूह है उचित-अनुचित की परवाह किए बग़ैर डटे रहने को मज़बूती मानता है, और पीएम उन्हें निराश करने और उनका उत्साह घटाने के कायल नहीं हैं.

मई 2014 से लेकर अब तक मुसलमानों के मताधिकार छीन लेने, उनकी बढ़ती आबादी को रोकने और उन्हें पाकिस्तान भेजने तक के जितने बयान सरकार से जुड़े लोगों ने दिए हैं, पीएम उनमें से किसी से भी नाराज़ तो दूर, असहमत भी हुए हों इसका कोई सबूत खोजे से नहीं मिलता.

अगर वे ‘लिबरलों’ और ‘वामपंथियों’ की इस तरह की माँगों पर ध्यान देने लगें तो कितने गिरिराज सिंहों, वीके सिंहों, साध्वी निरंजन ज्योतियों और साक्षी महाराजों की शिकायतें लेकर लोग आने लगेंगे जिससे सिरदर्द और बढ़ेगा ही.

दधीच से प्रेरणा ले सकते हैं

दधीच उस युवा वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो कथित ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ खत्म करने, पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने और हिंदू परचम लहराने वाले नेता के रूप में मोदी को पूज्य-अराध्य मानता है. ये वो युवा हैं जो न्याय और बराबरी की बात करने वालों को हिंदुत्व की राह के रोड़े के रूप में देखते हैं. इनका जोश देश, राजनीति और समाज की समझ का मोहताज नहीं है.

पीएम ने निखिल दधीच प्रकरण में साफ़ संकेत दिया है कि उनके 2019, 2022 और उससे आगे के प्रोजेक्ट्स में युवाओं की अहम भूमिका होगी, और जो महत्वाकांक्षी युवा चाहते हैं कि पीएम उन्हें नोटिस करें, उन्हें फॉलो करें, उन्हें आश्वस्त रहना चाहिए कि दधीच से वे प्रेरणा ले सकते हैं और निडर होकर योगदान कर सकते हैं.

यानी ये लोग अपना काम कर रहे हैं और पीएम ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल्ड इंडिया’, ‘क्लीन इंडिया’ और स्मार्ट सिटी जैसी अनगिनत परियोजनाओं की ‘अपार सफलता’ के बाद ‘न्यू इंडिया’ बनाने में जुटे हैं.

न्यू इंडिया के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने 9 अगस्त को कहा था, “आइए संकल्प करें कि हम ग़रीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता को मिटाकर 2022 तक अपने सपनों का न्यू इंडिया बनाएँगे”.

कितने सुंदर विचार हैं और किसको इस पर एतराज़ होगा, ऐसा न्यू इंडिया तो बनना ही चाहिए इसके लिए पीएम 2022 तक का समय माँग रहे हैं, भले ही देश की जनता ने उन्हें 2019 तक के लिए ही चुना है.

आइडिया ऑफ़ इंडिया

अच्छी-अच्छी बातों के अलावा पीएम सिर्फ़ एक्सट्रा टाइम माँग रहे हैं, लेकिन हर बार की तरह, दूसरी बातें करने की ड्यूटी दूसरे लोगों की है जिनसे प्रधानमंत्री कभी न तो सहमति प्रकट करेंगे, न असहमति, काम चलता रहेगा.

बीजेपी की अभिभावक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अग्रणी विचारक राकेश सिन्हा ने ट्वीट किया है, “नए दौर की राजनीति में बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और समुदायों को ये समझने की ज़रूरत है कि ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ राष्ट्रवाद के हिंदू रूप से आता है.”

राष्ट्रवाद के इस हिंदू रूप का सीधा टकराव उन करोड़ों लोगों के हितों और अधिकारों से है जो हिंदू नहीं हैं, न ही ये सेकुलर संविधान के अनुरूप है, ज़ाहिर है कि इस पर एतराज़ करने वाले भी होंगे.

अब आप समझ सकते हैं कि निखिल दधीच जैसे युवाओं की निर्द्वंद्व सेना के बिना संघ के विचारक जिसकी बात कर रहे हैं वैसा न्यू इंडिया कैसे बन पाएगा?

रोज़गार के सिमटते अवसरों और जीडीपी के गिरते आँकड़ों के बीच, दुनिया की सबसे बड़ी जवान आबादी को ‘राष्ट्र निर्माण’ जैसे गौरवशाली कार्य में व्यस्त रखने की रणनीति अब तक तो कारगर दिख रही है.

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2 thoughts on “मोदी के ‘न्यू इंडिया’ में निखिल दधीच जैसों की भूमिका!

  1. सिकंदर हयात

    Vikas Mishra : मेरी पत्नी का सेविंग अकाउंट था इंडियन ओवरसीज बैंक में। गुप्त खाता। जिसमें जमा रकम का मुझे घर में लिखित कानून के मुताबिक पता नहीं होना था, लेकिन श्रीमतीजी के मोबाइल में बैंक से अक्सर खातों से कुछ रुपये निकलने के मैसेज आने लगे। कभी एसएमएस चार्ज के नाम पर, कभी एटीएम चार्ज के नाम पर। बीवी आगबबूला। मैं बैंक पहुंचा तो पता चला कि सेविंग अकाउंट में ब्याज घटकर 3 फीसदी हो गया है। एसएमएस चार्ज हर महीने देना है, हर छह महीने में एटीएम चार्ज देना है। दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकाले तो उसका चार्ज। चाहे एटीएम का इस्तेमाल हो या न हो उसका भी चार्ज। खैर, मैंने पत्नी का वो अकाउंट बंद करवा दिया।
    खाता तो बंद हुआ, नए खाते के लिए बैंक की तलाश हुई। मैंने कहा पोस्ट ऑफिस में खुलवा लो। पोस्ट ऑफिस गए, वहां एक तो ब्याज 6 फीसदी से घटकर 4 फीसदी हो गया था। सर्वर ऊपर से डाउन। वहीं के एक कर्मचारी ने धीरे से कहा-भाई साहब कहां फंस रहे हो, झेल नहीं पाओगे। खैर, यस बैंक में सबसे ज्यादा 6 फीसदी ब्याज का विज्ञापन देखा था, वहां संपर्क किया, कंडीशन अप्लाई में देखा तो पता चला कि जो लोग एक करोड़ रुपये खाते में रखेंगे, उन्हें 6 फीसदी ब्याज मिलेगा। एक लाख रुपये से कम रखने वालों को 4 फीसदी। चार्जेज यहां भी कटेंगे। सभी बैंकों में कटेंगे। हां, एक शर्त और, दस हजार रुपये से कम हुआ बैलेंस तो भी चार्जेज कटेंगे। सभी बैंकों का ये नियम है।
    इससे पहले कि आप गलत अनुमान लगा लें, मैं स्पष्ट कर दूं कि पत्नी की कुल जमा राशि 10 हजार रुपये से ऊपर है और 15 हजार से नीचे। बाकी तो मेरे ऊपर उन्हीं का उधार रहता है। उन्हें एक गुप्त अकाउंट रखने का शौक है, जिस पर अच्छा ब्याज मिले, पति को पता न हो कि कितना जमा है। अब वो पति को दौड़ा रही थीं, पति के पास दौड़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं।
    मैं अच्छा खासा कमाता हूं, मेरे लिए पत्नी का खाता खुलवाना एक मनोरंजक खेल हो सकता है, लेकिन मुझे फिक्र हो रही है करोड़ों उन महिलाओं की, जो बड़े जतन से कुछ सौ रुपये, सौ भी क्यों 40-50 रुपये तक बैंक में जमा करवाती हैं। उनकी फिक्र हो रही है, जिनके पास अकाउंट में 10 हजार रुपये मेंटेन कर पाने की क्षमता नहीं है। वो तो ये सोचकर बैंक में पैसे रखती होंगी कि ब्याज मिलेगा, जरूरत पड़ने पर पैसा काम आएगा, लेकिन बैंक ब्याज देना तो दूर, चार्जेज के नाम पर उनके खातों में दीमक छोड़ दे रहा है, जो एक रोज उनका अकाउंट चालकर जीरो बैलेंस पर छोड़ देगा। मेंटीनेंस चार्ज का नाम सुनकर ही मेरा खून खौलता है।मेरी भानजी रुचि Ruchi Shukla का एचडीएफसी बैंक में खाता था। एक बार 10 हजार से कम बैलेंस हुआ, बैंक ने 1 हजार रुपये काट लिए। अगले महीने फिर कटे। उसने कुछ पैसे निकाल लिए। कुछ सौ रुपये छोड़े। अब हर महीने मैसेज आने लगा कि अकाउंट में माइनस इतने रुपये है। मैं बैंक मैनेजर से मिला। बताया कि सेविंग अकाउंट में माइनस 4 हजार रुपये का बैलेंस हो गया है। वो बोला- खाता चलाना हो तो इसे चुकाना पड़ेगा। नहीं चलाना, तो चुपचाप रहिए, एक रोज अपने आप बंद हो जाएगा।
    बीए में अर्थशास्त्र मेरा विषय था। उसमें बैंकिंग का पाठ भी था। बताया गया था कि अगर आप 100 रुपये जमा करते हैं तो बैंक मानता है कि आप महीने में 15 रुपये से ज्यादा नहीं निकालेंगे, अब बैंक 85 रुपये को बाजार में लगाएगा, लोन देगा, ब्याज कमाएगा। आपको सेविंग अकाउंट पर ब्याज देगा। यही बैंकिंग है। यानी अगर बैंक में एक लाख करोड़ रुपये जमा हैं तो वो 85 हजार करोड़ रुपये का व्यापार करेगा, उधारी देगा, ब्याज से कमाएगा। दुनिया के किसी भी बैंक की इतनी औकात नहीं जो अपने सभी ग्राहकों का पूरा पैसा एक दिन में लौटा सके।
    बैंक भी करें तो क्या करें। नोटबंदी के बाद बैंक तो मालामाल हैं, पैसे ठसे पड़े हैं, लेकिन कोई कर्ज लेने के लिए तैयार नहीं है। रियलिटी सेक्टर का भट्ठा बैठा हुआ है। लोन लेकर फ्लैट लेने वाले गूलर के फूल हो रहे है। पैसा उगलती जमीनों के ग्राहक गायब हो गए हैं। पर्सनल लोन तो होम लोन की दर पर मिल रहा है, लेने के लिए लोग तैयार नहीं हैं, बैंक वाले लोन के लिए फोन कर करके आजिज कर दे रहे हैं। और हां, जिन्हें वाकई लोन की जरूरत है, उनके पास इतनी संपत्ति नहीं, जिसे गिरवी रखकर लोन लें।बैंकों में पैसा फंसा है, बैंक व्यापार कर नहीं पा रहे हैं। इसकी गाज गिर रही है उन गरीबों पर, जो एक एक पैसा जोड़कर बैंक में जमा कर रहे हैं। सरकारी हों या प्राइवेट बैंक, पीएफ हो या पीपीएफ, हर जगह जमा पर ब्याज दर घट चुकी है, घट रही है। सरकार चाहती ही नहीं कि कोई बैंक में पैसा जमा करे, लेकिन ये भी नहीं चाहती कि लोग नकद पैसा अपने पास रखें, क्योंकि उसे तो कैशलेस इंडिया बनाना है।डिजिटल पेमेंट का हाल देखिए, एलपीजी गैस नकद खरीदने पर सस्ती है, क्रेडिट कार्ड से खरीदने पर महंगी। क्योंकि उसका अलग से चार्ज है। बिजली बिल क्रेडिट कार्ड से चुकाना, ट्रेन का टिकट कटाना महंगा हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी ने व्यापारियों और दुकानदारों की बैंड बजा दी, लेकिन अब भी वो क्रेडिट कार्ड या किसी और माध्यम से डिजिटल पेमेंट लेने को तैयार नहीं हैं। कार्ड दो तो कहते हैं 2 फीसदी अलग से देना होगा। कोई रोकथाम नहीं। अब आपको गरज हो तो कैश दीजिए, सौदा लीजिए, वरना भाड़ में जाइए। कैश का हाल ये है कि छोटे शहरों और कस्बों में बैंकों ने सीमा रख दी है कि अकाउंट से बस इतनी ही रकम निकाल पाएंगे। मैं अर्थशास्त्र का ज्ञानी नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। अर्थव्यवस्था तो अड़ियल घोड़ी की तरह अटकी सी दिख रही है।आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र ———-Girish Malviya
    12 hrs ·
    आज NDTV पर पेट्रोल डीजल के दाम से जुड़ी हुई रिपोर्ट दिखाई जा रही है अच्छी बात है, कोई अन्य चैनल ऐसा नही कर रहा है, इसलिए ये बहुत अच्छा कदम है इसका स्वागत किया जाना चाहिए , कि किसी ने तो जनता की दुख तकलीफों को दिखाने लायक समझा
    एक संवाददाता दिल्ली के पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाते लोगो से पूछ रहा है, पेट्रोल महंगा हो गया आपका क्या कहना है ? सवांददाता पूछता है ….आदमी कहता है कि यही तो अच्छे दिन है ओर उसके चेहरे पर तंज भरी मुस्कान उभर आती है,
    रिपोर्टर दूसरी कार का रुख करता है, उस कार में खाया पिया अघाया हुआ सेठ ड्राइविंग सीट पर बैठा है सवांददाता वही सवाल दोहराता है सेठ बोलता है कि दाम बढ़ गए तो क्या हुआ , दाम तो पहले भी बढ़े थे , अपेक्षित उत्तर न मिलने पर रिपोर्टर झुँझला जाता है,
    स्टूडियो में बैठी एंकर बम्बई में पेट्रोल पंप के बाहर खड़े संवाददाता का रुख कर लेती है
    वहा का रिपोर्टर एक टैक्सी वाले के पास जाकर पूछता है कि पेट्रोल डीजल के रेट बढ़ गए हैं आपका क्या कहना है ड्राइवर कहता है कि हमारी टेक्सी में तो पेट्रोल तो कम्पनी भरवाती है , हमे क्या फर्क पड़ता है रिपोर्टर का मुंह जरा सा हो जाता है, फिर वो बताने लगता है कि देश मे सबसे महंगा पेट्रोल डीजल मुंबई में मिल रहा है अन्य राज्यों के मुकाबले यहाँ पेट्रोल बहुत महंगा पड़ रहा है ,
    एक बात यहां पर अखरने लगती है कि रिपोर्टर को कम से कम यह तो बताना चाहिए कि ऐसा क्यों है पेट्रोल बम्बई में इतना महंगा क्यो पड़ रहा है ?
    दरअसल महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार ने वैट के साथ 3 रुपए अतिरिक्त सूखा उपकर (ड्रॉट सेस) लगाया है. इसके बाद से मुंबई में पेट्रोल सबसे महंगा हो गया है,ताज्जुब की बात ये है कि अब मानसून के बाद मुंबई में बाढ़ जैसे हालात हैं, महाराष्ट्र में सूखे जैसी कोई स्थिति नहीं है तो इसे 6 रुपए से बढ़ाकर 9 रुपए क्यों किया गया दरअसल सूखा उपकर से हुई उगाही से राज्य सरकार को हाईवेज के किनारे बार और शराब की दुकानें बंद होने की वजह से हुए घाटे की भरपाई करने में मदद मिलेगी.
    यानी तेल कम्पनिया भी आपको लूटेगी ,राज्य सरकार भी आपको लूटेगी ओर केंद्र सरकार भी आपको लूटेगीGirish Malviya
    22 hrs ·
    खुदरा महंगाई दर बढ़ गयी है अभी यूपी के किसी मंत्री का बयान आता होगा कि ‘सितम्बर के महीने में’ महंगाई दर बढ़ती है फिर अमित शाह बताने लग जाएंगे कि महंगाई दर किसी ‘टेक्निकल’ वजह से बढ़ रही है
    खुदरा मंहगाई दर अगस्त महीने में बढ़कर 5 महीने के उच्चस्तर 3.36 प्रतिशत पर पहुंच गई है कभी यह 2.36 प्रतिशत हुआ करती थी, आंकड़ो का खेल ऐसा खेला जाता है कि साथ ही हमे यह बता दिया जाता है कि औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है अभी जुलाई में वृद्धि दर 1.2 फीसदी रही, जबकि जून में यह 0.16 फीसदी थी लेकिन यह तथ्य छुपा लिया जाता है कि साल 2016 के जून में यह वृद्धि दर 4.5 फीसदी थी।
    दो महीने पहले हमारे वित्तमंत्री पता नही किस मुँह से बोल रहे थे कि जीएसटी लगने से महंगाई कम हो जाएगी, शायद अब कोई दूसरे चेहरे से जुबान चलाने लग जायेंगे, बहानो को कोई कमी थोड़ी है देश मे
    वैसे सच बताऊँ तो इस तरह की 2 प्रतिशत दर बढ़ने और 1 प्रतिशत कम होने से कोई बहुत ज्यादा फर्क नही पड़ता है फर्क पड़ता है पेट्रोल डीजल के दाम के बढ़ जाने से, आधुनिक युग मे हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है ओर ये तो ईंधन है जिसकी जरूरत हर क्षेत्र में है पेट्रोल डीजल दाम जो बढ़े है वो बेवजह नही बढ़े हैं
    कोई कारोबारी मीडिया चैनल, कोई अखबार या सरकार के निर्लज्ज मंत्री यह बताने को तैयार नही है कि जब 2 महीनो में क्रुइड ऑयल के दाम में मामूली घटत बढ़त हुई है तो इन दिनों पेट्रोल डीजल के भाव मे यह 12 से 15 प्रतिशत का उछाल क्यो हैं
    हर समझदार आदमी यह जानता था कि जीएसटी लगने की वजह से महंगाई बढ़ेगी, लेकिन सरकार में समझदार व्यक्ति नही बैठे हैं निर्लज्ज चमचो को मंत्रिपद से नवाज रखा है
    तो आखिरकार पेट्रोल डीजल के दामो में इतनी बढ़ोतरी कैसे हो गयी ये सवाल है मेरी साधारण समझ कहती हैं कि यदि कच्चा माल महंगा हो गया हो तो रेट बढ़ाने ही होंगे , हमे यह मालूम होना चाहिए कि पेट्रोल, डीज़ल को भले ही सरकार ने जीएसटी के दायरे से बाहर रखा है लेकिन इसकी प्रोसेसिंग से जुड़े अन्य सामानों पर जीएसटी लागू होने से कंपनियों की कुल लागत बढ़ गयी हैं नैफ़्था ऑयल पेट्रोलियम पदार्थों की प्रोसेसिंग का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. जिस पर उच्च दरों से जीएसटी लागू की गई है
    एक मीडिया रिपोर्ट में ओएनजीसी के पूर्व प्रमुख आरएस बटोला ने पहले ही बता दिया था कि पेट्रोलियम कंपनियों पर 15 हज़ार से 25 हज़ार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा जिसे वो ग्राहकों से वसूलना चाहेंगी. ओर यह वृद्धि हर साल होगी, पेट्रोलियम कम्पनी को भी बड़ी मात्रा में सेवाए लेना होती है जो अब जीएसटी के दायरे में आ गयी हैं
    इन सब का बोझ आज ग्राहक यानी, हमे ओर आपको उठाना पड़ रहा है
    वैसे कुछ लोग अभी भी मूर्खो के स्वर्ग में रह रहे हैं जो कहते हैं कि जीएसटी से महंगाई नही बढ़ेगी————————-Nitin Thakur
    20 hrs ·
    राहुल गांधी किसी सरकारी पद पर नहीं हैं लेकिन अमेरिकी यूनिवर्सिटी उन्हें राजनीतिक विचार रखने के लिए बुलाती है. दूसरी तरफ मोदी जी प्रधानमंत्री होकर प्राइवेट इवेंट्स आयोजित कराके प्रवासियों को बताते हैं कि पचास सालों तक आपकी कोई इज्जत नहीं थी और आप लोग कटोरा लेकर घूम रहे थे. लगता है मोदी जी ने अपने इवेंट के अगले दिन छपनेवाले विदेशी अखबार नहीं पढ़े या टीवी शो नहीं देखे. उनके रंगारंग और खर्चीले प्रोग्राम्स को बॉलीवुड ड्रामा कहकर मौज ली जाती है. अब इसे विदेशियों की कुढ़न कह कर आप अपने पेटदर्द से छुटकारा भले ही पा लें लेकिन विदेशी नेताओं की सादगी वाली पोस्ट्स लगाकर फिदा तो आप भी होते हैं. ऐसे में वाकई उनका मीडिया हमारे नेताओं की शोशेबाज़ी देखकर हंसता है. राहुल का सादे कुरते पाजामे में बैठना भी एक सुकून दे रहा था. बावजूद इसके मेरे लिए राहुल अभी भी वंशवादी राजनीति के प्रोडेक्ट हैं जिसने अभी सीखना शुरू किया है. अगर भारत की किस्मत में एक और वंशवादी प्राइम मिनिस्टर है तो कम से कम वो सादा तो ज़रूर हो. दस लाख के सूट गरीब देश के बदन पर चुभते हैंNitin Thakur
    21 hrs ·
    सरकार के सब आलोचक देशद्रोही, मोदीद्वेषी और मूर्ख हैं.. लेकिन उस मज़दूर संघ के बारे में क्या ख्याल है जो भाजपा की ही तरह संघ जनित संगठन है. उसे भी मोदी जी जैसे प्रचारकों ने खून पसीना देकर सींचा है. उसकी तो कोई पॉलिटिक्स भी नहीं है. वो नवंबर में सरकार के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में पांच लाख मज़दूरों को लेकर आ रहा है. कम से कम बीजेपी वाले अपने मौसेरे संगठन का ही सम्मान करते हुए मज़दूरों के लिए कुछ कर दें.————————Dilip C Mandal added 7 new photos.
    7 hrs ·
    पेट्रोल डीज़ल की आसमान छूती क़ीमत को समझने के लिए अर्थशास्त्र जानने की ज़रूरत नहीं है।
    अपने शहर के रिलायंस के पेट्रोल पंप पर जाइए।
    वहाँ मैनेजर से गपशप करते हुए पूछिए कि उनका पेट्रोल पंप 2008 से 2015 तक बंद क्यों था और अब ऐसा क्या हुआ कि खुल गया।
    मोदी अंबानी का यार है।Dilip C Mandal added 2 new photos.
    8 hrs ·
    प्यारे देशवासियों,
    भारत की सबसे बड़ी तेल रिफ़ायनरी मेरे यार मुकेश अंबानी की है। मैं तो चाहूँगा कि पेट्रोल और डीज़ल 200 रुपए लीटर बिके। यह होकर रहेगा। इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि ग्लोबल मार्केट में कच्चा तेल निचले स्तर पर चल रहा है।
    मेरे प्रिय गधों,
    इस बीच मैं मुसलमानों को टाइट रखूँगा। आप सब लोग मुकेश भाई का ख़ज़ाना भरते रहिए। मेरा समर्थन करते रहिए।
    धन्यवाद,
    मुकेश का नरेंद्रDilip C Mandal
    16 hrs ·
    देश के गिने-चुने विश्वविद्यालयों में ही विद्यार्थी परिषद के लफंगों की यूनियन चल रही है.
    आज दिल्ली यूनिवर्सिटी से भी विद्यार्थी परिषद साफ.
    यह पढ़े-लिखे लोगों का, मोदी सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव है.Dilip C Mandal added 2 new photos.
    17 hrs ·
    देश में रिलायंस के 1,425 पेट्रोल पंप हैं. ये सारे पंप 2008 में बंद हो गए क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो गईं. दरअसल कच्चा तेल पूरी दुनिया में सस्ता हो गया था.
    विश्व स्तर पर कच्चा तेल सस्ता बना रहा.
    लेकिन इस बीच एक नई बात हुई. 2014 में देश में नरेंद्र भाई मोदी की सरकार आ गई.
    18 अक्टूबर, 2014 को नरेंद्र भाई ने डीजल प्राइस को डिरेगुलेट कर दिया. इससे डीजल को महंगा करने का रास्ता साफ हो गया.
    इसके बाद से डीजल और पेट्रोल भारत में लगातार महंगे होते चले गए.
    2015 की शुरुआत में रिलायंस के सभी 1,425 पेट्रोल पंप खुल गए. रिलायंस का बिजनेस अब अच्छा चल रहा है. देश के लोग खुश हैं. राष्ट्र प्रसन्न है.
    अब भारत में पेट्रोल और डीजल को महंगा होते जाने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती.Dilip C Mandal
    17 hrs ·
    पेट्रोल और डीजल इतना महंगा तो होना ही चाहिए कि रिलायंस को तेल के बिजनेस में पर्याप्त आमदनी हो जाए.
    इसमें कौन सी गलत बात है?
    मुकेश भाई ने 2012 से लेकर 2014 के बीच नरेंद्र मोदी पर सबसे ज्यादा निवेश किया. इसी की वजह से लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के सत्ता संघर्ष में हारे.
    अब निवेश पर मुनाफा कमाने का समय है तो आप लोग कह रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों है?
    फोटो- इंडिया टुडे ग्रुप से साभारDilip C Mandal added 5 new photos.
    17 hrs ·
    राजस्थान के शेखावाटी इलाके में किसानों का एक बड़ा आंदोलन पिछले डेढ़ हफ्ते से चल रहा है. जनजीवन अस्तव्यस्त है.
    बहुत बड़ा आंदोलन है.
    लेकिन जब तक पुलिस फायरिंग करके कुछ किसानों की हत्या नहीं कर देगी, तब तक नेशनल मीडिया के लिए यह खबर नहीं है.
    राम रहीम की गुफा से आगे इनकी सोच नहीं जाती. जब तक रामरहीम मीडिया को पैसा दे रहा था, तब तक गुफा भी नहीं दिखती थी. तब तो चैनलों पर राम रहीम के प्रवचन चला करते थे.

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  2. सिकंदर हयात

    Abhishek Srivastava
    Yesterday at 11:04 · Ghaziabad ·
    मनीष तिवारी ने च्‍यूतिया लिखा। मृणाल पांडे ने वैशाखनंदन। कुछ लोगों ने इसकी व्‍याख्‍या की। अपने ऊपर ले लिया। अब दोनों को गालियां पड़ रही हैं। मुझे दुख हो रहा है। इसलिए नहीं कि दोनों कांग्रेसी हैं। इसलिए कि दोनों ब्राह्मण हैं। अभी दो दिन पहले हम कुछ लोग यही बात कर रहे थे कि ब्राह्मणों की कैसी दुर्गति हो गई है इस सरकार में। एक समय था जब ब्राह्मण इस समाज के मानस का रक्षक हुआ करता था। आज हालत ये है कि सामाजिक-आर्थिक उपेक्षा के कारण ब्राह्मणों के बौद्धिक नेतृत्‍व का मानस ही गड़बड़ा गया है। पूरा विमर्श इतना मिसप्‍लेस्‍ड है कि दमन और दबंगई ठाकुर करते हैं लेकिन नारा लगता है ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद। बेचारे ब्राह्मण, जो पहले से ही भाजपा-आरएसएस के सताये हुए हैं, उनके विरोधियों के निशाने पर भी आ जाते हैं। भइ गति सांप-छछूंदर केरी…।
    ब्राह्मणों को अपने घटते सामाजिक प्रभाव के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए। मेरा पहला खयाल है कि ब्राह्मणों को यह मिथ तोड़ना चाहिए कि वे भाजपा के डिफॉल्‍ट वोटर हैं। उन्‍हें अपने आसपास के समुदायों पर नज़र डालनी चाहिए और दलित-दमित समूहों के साथ एक गठजोड़ बनाना चाहिए। इनमें पहला समूह कायस्‍थों का होना चाहिए जो कायदे से दलित हैं लेकिन झूठे दम्‍भ में खुद को सवर्ण मानते आए हैं। यह दम्‍भ उन्‍हें ब्राह्मणों की तरह ही ले डूबेगा। परंपरागत रंजिश को भुलाकर बाह्मण-कायस्‍थ साथ आए तो सशक्‍त ओबीसी यानी यादव-कुर्मी उनकी लाठी बन सकता है। इसके बाद दलित और मुसलमान में साथ आने का भरोसा जगाना होगा।
    बीजेपी-आरएसएस को गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित में काम करने दीजिए। वे जिन्‍हें नैसर्गिक वोटर मानकर चल रहे हैं झटका वहां से लगना ज़रूरी है। ब्राह्मण, कायस्‍थ, यादव, जाटव और मुसलमान अच्‍छे से जान चुके हैं कि संघ ने उनका 1992 के बाद से केवल इस्‍तेमाल किया है। इसलिए उसके खिलाफ़ गोलबंदी का ऐतिहासिक कार्यभार इन समूहों के सिर पर है। कालांतर में जैसे-जैसे अन्‍य समूहों को विश्‍वासघात का अहसास होता जाएगा, कारवां बढ़ता जाएगा। इस सुझाव को बहुत गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है क्‍योंकि मैं जाति का एक्‍सपर्ट नहीं हूं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से ब्राह्मणों से सहानुभूति हो रही थी, सो ईमानदारी से लिख दिया। भूल चूक लेनी देनी माफ!-Abhishek Srivastava is with Vishwa Deepak and 8 others.
    10 September at 22:46 ·
    खबरों के प्रसार का शास्त्र अजीब है। मैं हफ्ते भर लदाख में हज़ारों किलोमीटर घूमते हुए दर्जनों किस्म के लोगों से मिला लेकिन किसी को इस बात की खबर नहीं थी कि दिल्ली एक पत्रकार की हत्या पर उबल रही है। वहां सोशल मीडिया से जुड़े लोगों का नेटवर्क ऐसा है कि उसमें ऐसी खबर का प्रवेश ही नहीं हो पाता। फिर मैंने जानने की कोशिश की कि सामाजिक रूप से सक्रिय दिल्लीवासियों के नेटवर्क में क्या कहीं लेह बंद की खबर है। यहां भी निराश होना पड़ा।
    आइए, गौरी लंकेश की राष्ट्रीय खबर के बरक्स लेह की स्थानीय खबर को एक बार देखें। जम्मू में एक कारगिल निवासी मुसलमान लड़के ने एक बौद्ध लड़की से प्रेम कर लिया। दोनों भाग गए। इस घटना के खिलाफ लेह शहर 8-9 सितंबर को बंद रहा। उस दौरान मैं तुरतुक से पैंगोंग के रास्ते में था। लौटकर 9 को पता चला कि 14 तारीख का अल्टीमेटम लेह में काम करने वाले कारगिल वासी मुसलमानों को दिया गया है कि वे शहर छोड़ कर चले जाएं। स्थानीय बौद्ध निवासियों ने 14 को लेह चलो का नारा दिया है।
    लदाख में बौद्ध बनाम मुस्लिम की फांक पड़ चुकी है। बौद्धों में भयंकर असुरक्षा है कि उनकी आबादी कम हो रही है और कारगिल के मुसलमान उनके रोजगार हथिया कर संख्या और संसाधन में बढ़ते जा रहे हैं। बीजेपी इस भावना पर खेल रही है। एक स्थानीय सज्जन किसी समझौते का हवाला देते हैं जो लदाखी बौद्धों और कारगिल के मुसलमानों के बीच 1948 में हुआ था जिसके मुताबिक दोनों के बीच बेटी का रिश्ता वर्जित था।
    बीते तीन-चार साल में मुस्लिम लड़के और बौद्ध लड़की के बीच प्रेम की ऐसी कुछ घटनाएं सामने आई हैं। आज लेह में लोगों की ज़बान पर इसके लिए एक शब्द आम हो चला है- लव जिहाद। उनके मन में इस बात को भर दिया गया है कि कारगिल का मुसलमान बौद्ध लड़की से प्यार करे तो उसे लव जिहाद कहते हैं। जिन्हें रोहिंग्या मुसलमानों की फ़िक्र है, उन्हें लेह के इस टाइम बम की टिकटिकाती घड़ी को सुनना चाहिए।
    कुछ हत्याएं हो चुकी हैं। कुछ नरसंहार होने के इंतज़ार में हैं। दोनों का टारगेट ऑडियंस एक-दूसरे से बेख़बर और बेपरवाह है। एक पत्रकार होने के नाते मैं केवल दोनों तरफ़ आगाह कर सकता हूं। सूचना प्रसार में ऐसे असंतुलन का इलाज क्या होगा, मैं नहीं जानता।————————Vikram Singh Chauhan
    22 hrs ·
    मैं प्रधानमंत्री के लिए कभी अपशब्दों का प्रयोग नहीं करता। मैं तो फेंकू ,पप्पू जैसे शब्दों से भी परहेज करता हूँ। ये शब्द मेरे शब्दों के वजन को कमजोर ———————करते हैं। मैंने मोदी का अधिकतम विरोध 2014 चुनाव से पूर्व किया था और तब भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया। हालाँकि मोदी भक्त मुझे बेहिचक गाली देते रहे मेरे इनबॉक्स में लगभग सैकड़ों अनरीड मैसेज गंदी गालियों के ही है। अक्सर मैंने देखा है मुझे सार्वजनिक तौर पर गलियां देने वाले मेरे सौ से अधिक मित्रों के म्युचुअल फ्रेंड होते हैं। क्या आपको वो गालियां नहीं दिखती? क्या आपके मित्रों को आपके किसी मित्र द्वारा दी जाने वाली गाली नहीं दिखती? इसके बावजूद आप उन्हें फ्रैंड बनाये रखना चाहते हैं। जबकि ऐसे लोगों को चुपचाप अलविदा कर देना चाहिए। खैर , वे बड़े लोग जिन्हें ट्वीटर पर हजारों लोग फॉलो करते हैं कैसे सार्वजनिक तौर पर गालियां देते हैं मेरे समझ से परे हैं। मोदी को गाली देने वाले सब मोदी के बड़े भक्त हैं। वे उन्हें गालियां देकर जनता के मन में उनके लिए संवेदना पैदा करते हैं। और मोदी इसे अपने लिए कैश करवाते हैं। आप मोदी को कभी इन मुद्दों पर घेर नहीं पाएंगे। वे किसी दिन भी मंच पर बोल देंगे आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को विपक्ष के लोग गाली देते हैं बहनों और भाइयों ,ये गाली मुझे नहीं आपको दिया जा रहा है बहनों और भाइयों। तब आप क्या बोलेंगे? आपका विरोध इतना कमजोर रहा है कि एक गालीबाज निखिल दाधीच को अभी तक मोदी फॉलो कर रहे हैं। जबकि इस पर मोदी को पानी पानी कर देना था। मोदी बुरी तरह फ्लॉप हो गए हैं लेकिन हमेशा की तरह विपक्ष उन्हें फिर से मजबूत करने में लगे हैं। मोदी गालियां खाकर मजबूत होते हैं। बस आप गाली देना बंद कर दीजिये देखिएगा मोदी कैसे गाली देना शुरू करते हैं। विकास के मुद्दे पर उनसे सवाल पूछिए बंगले झांकेंगे साहब। उनके सभी योजनाओं का डीप एनालिसिस कीजिये ,डेटा तैयार कीजिये 2019 में बहुत काम आएगा।Vikram Singh Chauhan
    Yesterday at 00:38 ·
    देश में कितनी लड़कियां हैं जो मेधा पाटकर बनना चाहती हैं? ऊँगली में गिन दूँ ऐसे लड़कियों को। कोई आज की तारीख में अपना कॅरिअर ,विवाह आदि चीजों को छोड़कर मुसीबत में पडोसी के घर तक झाँकने नहीं जाता उस दौर में यह सिरफिरी महिला हजारों ग्रामीण लोगों के भविष्य के लिए कभी जेल जाती है तो कभी पानी में अपना शरीर डूबो जल सत्याग्रह करती है। आज पानी में लगातार रहने से उनका हाथ पैर ऑक्सीजन की कमी से चर (आधा गलना ) गया है। अगर ये महिला किसी अफ़्रीकी देश में मेधा की जगह मुगाबी नाम से पैदा होती तो उस देश में इनकी पूजा होती। क्या मेधा पाटकर एक सामान्य भारतीय महिला की जिंदगी नहीं जी सकती थी? लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता क्यों चुना जिसमें सिर्फ कांटे ही कांटे हैं। उनके लिए जिनके लिए लड़ने वाला कोई नहीं है , ,वे जो अपनी खेती पर जिन्दा है ,वे जो अपने परिवारों के लिए मछली पकड़ते हैं ,वे जिनका भविष्य अंधकारमय हैं इनके लिए अपनी जिंदगी की दांव खेल रही है यह महिला। देश की मीडिया से यह समाचार गायब है क्योंकि यह गरीब विज्ञापनदाता नहीं है और आजकल मेधा ,सोनी सोरी की खबर देने मात्र से वह अख़बार और चैनल देशद्रोही हो जाता है। कोई चैनल वाला अपने पेट में क्यों लात मारेगा। उसको इधर जन्मदिन की स्टोरी भी मिल रही है और स्पेशल विज्ञापन पैकेज भी। आप कुछ दिन बाद पत्थर की बूत की पूजा करेंगे उन्हें देवी मानेंगे लेकिन जो आज की तारीख में किसी की जिंदगी बचाने के लिए लड़ रही हैं उन्हें अराजक ,देशद्रोही मानते हैं।——————————Om Thanvi added 2 new photos.
    1 hr ·
    “तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा!”
    किसान के साथ मोदी की भी हुज्जत, जिनकी तसवीर एक पैसे की ऋणमाफ़ी के प्रमाण-पत्र पर चस्पाँ है।
    अमर उजाला की ख़बर: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की फसल ऋणमोचन योजना मजाक बनकर रह गई है। मथुरा के गोवर्धन में एक किसान का एक पैसा माफ हुआ है। जबकि किसान का कहना है कि करीब डेढ़ लाख रुपये का कर्ज है। बता दें कि उत्तर प्रदेश फसल ऋण मोचन योजना के अंतर्गत मथुरा में सोमवार को करीब साढ़े पांच हजार किसानों को ऋण माफी के प्रमाण पत्र ‌दिए गए। इसी क्रम में मथुरा की गोवर्धन तहसील के गांव अड़ीग निवासी छिद्दी पुत्र डालचंद को एक पैसे की ऋण माफी का प्रमाण पत्र दिया गया। प्रमाण पत्र देखकर किसान के होश उड़ गए।——————–Awesh Tiwari
    8 hrs ·
    इस देश मे ऐसे पत्रकार नजर नही आते जिन्होंने कोई न कोई खेमा न चुन रखा हो। क्या हम ऐसा खुद के बचाव के लिए करते हैं? क्या विचारधारा की गुलामी के बिना काम करना बेहद मुश्किल है? क्या ऐसा न करने पर अकेले पड़ जाने का खतरा है? मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा नही लगता। राजनैतिक पूर्वाग्रहों के साथ विरोध समर्थन अलग चीज है और सिस्टम को लेकर आलोचनात्मक या फिर विरोधी दृष्टिकोण होना अलग चीज। शायद अजीत अंजुम और रविश कुमार के बीच मे कही कोई जगह ऐसी होती होगी। जब हम पूर्वाग्रहों के साथ आगे बढ़ते हैं तो दरअसल हम तथ्यों को समझने बुझने और खोज करने की क्षमता को खो देते हैं। इस वर्ष या इस सरकार में ही नही इस देश मे पिछले एक दशक की सबसे बड़ी घटना देश मे बड़ी संख्या में बच्चों की मौत है,देश मे चारो ओर बच्चे मर रहे हैं,शिशु मृत्युदर में आज की हमारी स्थिति इथियोपिया और बांग्लादेश से भी बुरी है लेकिन हमने जब तक हवा रही बच्चो की मृत्यु की खबरें दिखाई और खामोश हो गए, जबकि यह सही वक्त था कि हम समूची स्वास्थ्य नींति को बदलने का दबाव डाल सकते रहे। लेकिन हमने क्या किया? हम सरकार को गाली देते रहे या गाली खाते रहे। खैर अब जनता भी समझ चुकी है खबरों से कुछ नही बदलता, दरअसल वो नही जानती हमारी प्रतिबद्धताएं राजनैतिक हो चुकी है वो सामाजिक नही रहीं।Awesh Tiwari
    23 hrs · Varanasi ·
    गौरी लंकेश की हत्या का खुलासा जल्दी हो सकता है अब तक जो सूचना मिल रही है उसके अनुसार हत्यारे प्रोफेशनल किलर नहीं थे, इस मामले की तफ्तीश में अब तक जो जानकारियाँ सामने आई हैं, वो यह है –
    1- गौरी लंकेश के भाई पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं,अब तक हुई पूछताछ में उन्होंने स्वीकार है कि उनके पास एक पिस्तौल थी जिससे उन्होंने गौरी को धमकी थी लेकिन बाद में मामला सुलझ गया म उनसे जब उनकी गन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि गन तो है लेकिन इन्द्रजीत गन की खरीदी का कागज़ प्रस्तुत नहीं कर सके , उन्होंने एक सप्ताह का समय माँगा है |उनके और गौरी के बीच पैतृक संपत्ति का विवाद था जो पुलिस के पास तक गया था |
    2- इस मामले में गोवा में जयंत अठावले द्वारा स्थापित ” सनातन संस्था” के पदाधिकारियों से पूछताछ की गई है| यह कट्टर हिंदूवादी संस्था है। कुल्बर्गी की हत्या के बाद भी संस्था के सदस्यों से पूछताछ की गई है|
    3- बंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल के वरिष्ठ अधिकारी विक्रम संपत से भी पूछताछ की गई गई , हांलाकि इस पूछताछ पर विक्रम नाराज है|
    4- यह बात लगभग तय हो चुकी है कि लंकेश के हत्यारे प्रोफेशनल नहीं थे उनका हत्या करने के कोई पूर्व अनुभव नहीं था | इस मामले में कुल्बर्गी की पत्नी को भी सीसीटीवी फुटेज दिखाकर हत्यारों की पहचान करने को कहा गया था लेकिन खराब क्वालिटी के फुटेज में हेलमेट पहने हत्यारे पहचाने नहीं जा सके|
    5- गौरी लंकेश की हत्या में नक्सलियों के हाथ की बात इन्द्रजीत द्वारा कही जा रही है लेकिन पुलिस को अब तक इस दिशा में कोई बड़ा सुराग नहीं मिला हैअभी बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार साथी से रवीश कुमार के भाई ब्रजेश को लेकर बातें हो रही थी ,उन्होंने एक बात सही कही वो यह कि इस मामले की इतना चर्चा हो गई कि अगर बृजेश दोषी होते तो पुलिस रविश के घर की कुर्की करा देती| मैं दूसरी तरह से सोचता हूँ मुझे लगता है जो सरकार इंटर आफिशियल मेल का इस्तेमाल कर तरुण तेजपाल के खिलाफ मुकदमा ठोंक सकती है, जो सरकार एनडीटीवी की ईट से ईट बजा सकती है, वो अपने एक घोर विरोधी पत्रकार रविश कुमार के भाई के खिलाफ कारवाई क्यूँ नहीं करा सकती है ?अब तो बिहार में नीतीश भी साथ हैं| खैर, ब्रजेश पर आरोप अभी तक साबित नहीं हो पाए हैं, मामला अदालत में लंबित हैं|लेकिन एक चीज मैंने देखी कम से कम एक लाख बार यहाँ कहा गया होगा कि रवीश,अपने भाई के लिए स्क्रीन कब काला करेंगे? माने इतनी जल्दबाजी है कि अगर समर्थकों की चले तो न्याय की एक सामान्य परम्परा भी छोड़ दी जाए, जिसको भाई लोग कहे चोर वो चोर है जिसको कहे हत्यारा वो हत्यारा| खैर , शाम होते होते देखा कि एक फेसबुक पोस्ट पर रविश कुमार से स्क्रीन काला करने को कहा गया था | उन्होंने जवाब में दो बार जशोदा बेन का नाम लिया| जशोदा बेन कौन हैं ? वो स्त्री हैं इसलिए सरोकार होने चाहिए लेकिन क्या वो हमारे घर की माँ बहिन बेटी हैं ? अगर उन्हें पीएम मोदी के साथ रहना मंजूर नहीं या पीएम मोदी उनके साथ नहीं रहना चाहते तो हम उसमें पड़ने वाले कौन होते हैं?रविश कुमार कौन होते हैं ? एक स्त्री का नाम क्योंकर सार्वजनिक तौर पर ऐसे लेना चाहिए ? जशोदा बेन के बारे में हमें तब तक खामोश रहना होगा जब तक वो खुद आगे बढ़कर नहीं बोलती | यह सब उतनी ही छोटी बातें हैं जितनी छोटी बात यह कहना कि ब्रजेश पांडे को लेकर रविश स्क्रीन काली कर दें, अतिवाद दोनों तरफ बराबर है|

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