राजेश प्रियदर्शी
डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी

निखिल दधीच को एक हफ़्ते पहले तक शायद ही कोई जानता हो, मगर पीएम का ट्विटर हैंडल चलाने वाले उन्हें न सिर्फ़ जानते थे बल्कि इस लायक भी मानते थे कि मोदी जी उन्हें फॉलो करें.

‘न्यू इंडिया’ बनाने के लिए युवा शक्ति का पुरज़ोर आह्वान कर रहे मोदी जी ने दधीच को ‘अनफॉलो’ करने की माँग को नज़रअंदाज़ करके ज़ाहिर कर दिया है कि वे कितने ‘भक्त-वत्सल’ हैं. उन्होंने यही जताया है कि जो उनकी छत्रछाया में है उसका सेकुलर और लिबरल टाइप शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे.

सेकुलर और लिबरल ही लिखना चाहिए क्योंकि ये माँग उन्हीं लोगों की थी, पिछले सवा तीन साल में विपक्ष ने कब कोई माँग की है?

बहरहाल, विपक्ष की ग़ैर-मौजूदगी में वे ही लोग विपक्ष हैं जो हिंदुत्व की राजनीति से असहमत हैं. भले ही वे किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े न हों, आजकल उन्हीं को सुविधानुसार शेख़ुलर, लिबटार्ड और कौमी कहा जाता है. कांग्रेस के हर कुकृत्य के लिए वही लोग जवाबदेह हैं, कांग्रेस नहीं.

वैसे कांग्रेस के ज़माने से चलन रहा है कि संवेदना प्रकट करने से या आरोपों में घिरे व्यक्ति को किनारे करने से पूरी पार्टी और सरकार दोषी दिखने लगती है इसलिए ऐसा करने से जहाँ तक संभव हो बचना चाहिेए. बीजेपी ने इस रवायत को और पुख़्ता किया है और यह अभयदान निचले स्तर तक एक्सटेंड किया गया है.

ऐसा व्यवहार राजनीति में शुचिता के लिए बेहद ज़रूरी, लेकिन अब पिट चुके सिद्धांत के विपरीत है.

पीएम अपनी मर्ज़ी के मालिक?

इससे पहले मनोहर लाल खट्टर, योगी आदित्यनाथ और सुरेश प्रभु की घनघोर आलोचना से विचलित हुए बिना पीएम ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, वे किसको हटाएँ, किसको रखें, किसकी आलोचना करें, किसे कड़ा संदेश दें, ये सब देश की जनता या विपक्ष के कहने से नहीं होगा.

शायद सोच ये है कि प्रधानमंत्री ने 56 इंच के सीने वाले एक रोबदार नेता की जो छवि गढ़ी है, उसके साथ उनका करूण-संवेदनशील रूप फिट नहीं बैठता इसलिए गोरखपुर में रोती हुई माएँ हों या रेल दुघर्टना के शिकार लोगों के रिश्तेदार या फिर गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें ‘कुतिया’ कहे जाने से नाराज़ लोग, मोदी जी ने किसी मामले में सहानुभूति ज़ाहिर करना सही नहीं समझा.

ये बात अलग है कि वक़्त-ज़रूरत के हिसाब से, और सबसे बढ़कर अपनी मर्ज़ी से, उनका गला भर आता है और आँखें नम हो जाती हैं.

बहुत मजबूरी में, पीएम ने शायद ही कभी, अपने श्रीमुख से श्मशान और कब्रिस्तान जैसे जुमले उछाले हों, वर्ना अलग-अलग स्तर पर ऐसा करने के लिए लोग तैनात हैं जिसके निचले पायदान पर निखिल दधीच हैं और ऊपर वाले पायदान पर कई सांसद और मंत्री.

रोकने-टोकने की ज़रूरत नहीं

वैसे जब प्रधानमंत्री गांधी-बुद्ध की बात करते हैं, अंबेडकर-फुले को याद करते हैं, परमवीर अब्दुल हमीद को श्रद्धांजलि देते हैं तो हिंदुत्व के जांबाज सिपाहियों में कोई भ्रम नहीं फैलता, वे अच्छी तरह जानते हैं कि कहने की बात क्या है और करने की चीज़ क्या है.

इसके बावजूद, अनफॉलो करना तो दूर, पीएम ने बेमन से ही, दिखाने के लिए ही सही, खुद ट्वीट करके या किसी और से कराके, निखिल दधीच को रोकने-टोकने की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसा अकारण नहीं है, वे अच्छी तरह जानते हैं कि सत्ता के प्रश्रय से सक्रिय-सशक्त हुए लोग ही हिंदुत्व के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाएँगे.

ये वो समूह है उचित-अनुचित की परवाह किए बग़ैर डटे रहने को मज़बूती मानता है, और पीएम उन्हें निराश करने और उनका उत्साह घटाने के कायल नहीं हैं.

मई 2014 से लेकर अब तक मुसलमानों के मताधिकार छीन लेने, उनकी बढ़ती आबादी को रोकने और उन्हें पाकिस्तान भेजने तक के जितने बयान सरकार से जुड़े लोगों ने दिए हैं, पीएम उनमें से किसी से भी नाराज़ तो दूर, असहमत भी हुए हों इसका कोई सबूत खोजे से नहीं मिलता.

अगर वे ‘लिबरलों’ और ‘वामपंथियों’ की इस तरह की माँगों पर ध्यान देने लगें तो कितने गिरिराज सिंहों, वीके सिंहों, साध्वी निरंजन ज्योतियों और साक्षी महाराजों की शिकायतें लेकर लोग आने लगेंगे जिससे सिरदर्द और बढ़ेगा ही.

दधीच से प्रेरणा ले सकते हैं

दधीच उस युवा वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो कथित ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ खत्म करने, पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने और हिंदू परचम लहराने वाले नेता के रूप में मोदी को पूज्य-अराध्य मानता है. ये वो युवा हैं जो न्याय और बराबरी की बात करने वालों को हिंदुत्व की राह के रोड़े के रूप में देखते हैं. इनका जोश देश, राजनीति और समाज की समझ का मोहताज नहीं है.

पीएम ने निखिल दधीच प्रकरण में साफ़ संकेत दिया है कि उनके 2019, 2022 और उससे आगे के प्रोजेक्ट्स में युवाओं की अहम भूमिका होगी, और जो महत्वाकांक्षी युवा चाहते हैं कि पीएम उन्हें नोटिस करें, उन्हें फॉलो करें, उन्हें आश्वस्त रहना चाहिए कि दधीच से वे प्रेरणा ले सकते हैं और निडर होकर योगदान कर सकते हैं.

यानी ये लोग अपना काम कर रहे हैं और पीएम ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल्ड इंडिया’, ‘क्लीन इंडिया’ और स्मार्ट सिटी जैसी अनगिनत परियोजनाओं की ‘अपार सफलता’ के बाद ‘न्यू इंडिया’ बनाने में जुटे हैं.

न्यू इंडिया के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने 9 अगस्त को कहा था, “आइए संकल्प करें कि हम ग़रीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता को मिटाकर 2022 तक अपने सपनों का न्यू इंडिया बनाएँगे”.

कितने सुंदर विचार हैं और किसको इस पर एतराज़ होगा, ऐसा न्यू इंडिया तो बनना ही चाहिए इसके लिए पीएम 2022 तक का समय माँग रहे हैं, भले ही देश की जनता ने उन्हें 2019 तक के लिए ही चुना है.

आइडिया ऑफ़ इंडिया

अच्छी-अच्छी बातों के अलावा पीएम सिर्फ़ एक्सट्रा टाइम माँग रहे हैं, लेकिन हर बार की तरह, दूसरी बातें करने की ड्यूटी दूसरे लोगों की है जिनसे प्रधानमंत्री कभी न तो सहमति प्रकट करेंगे, न असहमति, काम चलता रहेगा.

बीजेपी की अभिभावक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अग्रणी विचारक राकेश सिन्हा ने ट्वीट किया है, “नए दौर की राजनीति में बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और समुदायों को ये समझने की ज़रूरत है कि ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ राष्ट्रवाद के हिंदू रूप से आता है.”

राष्ट्रवाद के इस हिंदू रूप का सीधा टकराव उन करोड़ों लोगों के हितों और अधिकारों से है जो हिंदू नहीं हैं, न ही ये सेकुलर संविधान के अनुरूप है, ज़ाहिर है कि इस पर एतराज़ करने वाले भी होंगे.

अब आप समझ सकते हैं कि निखिल दधीच जैसे युवाओं की निर्द्वंद्व सेना के बिना संघ के विचारक जिसकी बात कर रहे हैं वैसा न्यू इंडिया कैसे बन पाएगा?

रोज़गार के सिमटते अवसरों और जीडीपी के गिरते आँकड़ों के बीच, दुनिया की सबसे बड़ी जवान आबादी को ‘राष्ट्र निर्माण’ जैसे गौरवशाली कार्य में व्यस्त रखने की रणनीति अब तक तो कारगर दिख रही है.