पुण्य प्रसून बाजपेयी

हत्यारों को कठघरे में कौन खड़ा करेगा?

तो गौरी लंकेश की हत्या हुई। लेकिन हत्या किसी ने नहीं की। यह ऐसा सिलसिला है, जिसमें या तो जिनकी हत्या हो गई उनसे सवाल पूछा जायेगा, उन्होंने जोखिम की जिन्दगी को ही चुना। या फिर हमें कत्ल की आदत होती जा रही है क्योंकि दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के कत्ल का जब हत्यारा कोई नहीं है तो फिर गौरी लंकेश की हत्या के महज 48 घंटो के भीतर क्या हम ये एलान कर सकते हैं कि अगली हत्या के इंतजार में शहर दर शहर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पत्रकार, समाजसेवी या फिर बुद्दिजीवियों के इस जमावड़े के पास लोकतंत्र का राग तो है लेकिन कानून का राज देश में कैसे चलता है ये हत्याओ के सिलसिले तले उस घने अंधेरे में झांकने की कोशिश तले समझा जा सकता है। चार साल बाद भी नरेन्द्र दामोलकर के हत्यारे फरार हैं। दो बरस पहले गोविंद पंसारे की हत्या के आरोपी समीर गायकवाड को जमानत मिल चुकी है । कलबुर्गी की हत्या के दो बरस हो चुके है लेकिन हत्यारो तक पुलिस पहुंची नहीं है। कानून अपना काम कैसे कर रही है कोई नहीं जानता। तो फिर गौरी लंकेश की हत्या जिस सीसीटीवी कैमरे ने कैद भी की वह कैसे हत्यारों को पहचान पायेगी। क्योकि सीसीटीवी को देखने समझने वाली आंखें-दिमाग तो राजनीतिक सत्ता तले ही रेंगती हैं। और सत्ता को विचारधारा से आंका जाये या कानून व्यवस्था के कठघरे में परखा जाये। क्योंकि दाभोलकर और पंसारे की हत्या को अंजाम देने के मामले में सारंग अकोलकर और विनय पवार आजतक फरार क्यों हैं। और दोनों ही अगर हत्यारे है तो फिर 2013 में दाभोलकर की हत्या के बाद 2015 में पंसारे की हत्या भी यही दोनों करते हैं तो फिर कानून व्यवस्था का मतलब होता क्या है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में दाभोलकर की हत्या कांग्रेस की सत्ता तले हुआ। महाराष्ट्र के ही कोल्हापुर में पंसारे की हत्या बीजेपी की सत्ता तले हुई। हत्यारों को कानून व्यवस्था के दायरे में खड़ा किया जाये। तो कांग्रेस-बीजेपी दोनों फेल है। और अगर विचारधारा के दायरे में खड़ा किया जाये तो दोनो की ही राजनीतिक जमीन एक दूसरे के विरोध पर खडी है।

यानी लकीर इतनी मोटी हो चली है कि गौरी लंकेश की हत्या पर राहुल गांधी से लेकर मोदी सरकार तक दुखी हैं। संघ परिवार से लेकर वामपंथी तक भी शोक जता रहे हैं। और कर्नाटक के सीएम भी ट्वीट कर कह रहे हैं, ये लोकतंत्र की हत्या है। यानी लोकतंत्र की हत्या कलबुर्गी की हत्या से लेकर गौरी शंकर तक की हत्या में हुई। दो बरस के इस दौर में दो दो बार लोकतंत्र की हत्या हुई। तो फिर हत्यारों के लोकतंत्र का ये देश हो चुका है। क्योंकि सीएम ही जब लोकतंत्र की हत्या का जिक्र करें तो फिर जिम्मेदारी है किसकी। या फिर हत्याओ का ये सिलसिला चुनावी सियासत के लिये आक्सीजन का काम करने लगा है। और हर कोई इसका अभयस्त इसलिये होते चला जा रहा है क्योंकि विसंगतियों से भरा चुनावी लोकतंत्र हर किसी को घाव दे रहा है। तो जो बचा हुआ है वह उसी लोकंतत्र का राग अलाप रहा हैं, जिसकी जरुरत हत्या है। या फिर हत्यारो को कानूनी मान्यता चाहे अनचाहे राजनीतिक सत्ता ने दे दी है। क्योंकि हत्याओं की तारीखों को समझे। अगस्त 2013 , नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या। फरवरी 2015 गोविन्द पंसारे की हत्या। अगस्त 2015 एमएम कलबुर्गी की हत्या। 5 सितंबर 2017 गौरी लंकेश की हत्या। गौरतलब है कि तीनों हत्याओं में मौका ए वारदात से मिले कारतूस के खोलों के फोरेंसिक जांच से कलबुर्गी-पानसारे और दाभोलकर-की हत्‍या में इस्‍तेमाल हथियारों में समानता होने की बात सामने आई थी। बावजूद इसके हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं। तो सवाल सीधा है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े जाएंगे-इसकी गारंटी कौन लेगा? क्योंकि गौरी लंकेश की हत्या की जांच तो एसआईटी कर रही है, जबकि दाभोलकर की हत्या की जांच को सीबीआई कर चुकी है, जिससे गौरी लंकेश की हत्या के मामले में जांच की मांग की जा रही है। तो क्या गौरी लंकेश की हत्या का सबक यही है कि हत्यारे बेखौफ रहे क्योकि राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र है जो देश को बांट रहा है ।

या फिर अब ये कहे कि कत्ल की आदत हमें पड़ चुकी है क्योंकि चुनावी जीत के लिये हत्या भी आक्सीजन है। और सियासत के इसी आक्सीजन की खोज में जब पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट निकलते है तो उनकी हत्या हो जाती है। क्योंकि जाति, धर्म या क्षेत्रियता के दायरे से निकलकर जरा इन नामों की फेरहिस्त देखे। मोहम्मद ताहिरुद्दीन,ललित मेहता,सतीश शेट्टी,अरुण सावंत ,विश्राम लक्ष्मण डोडिया ,शशिधर मिश्रा, सोला रंगा राव,विट्ठल गीते,दत्तात्रेय पाटिल, अमित जेठवा, सोनू, रामदास घाड़ेगांवकर, विजय प्रताप, नियामत अंसारी, अमित कपासिया,प्रेमनाथ झा, वी बालासुब्रमण्यम,वासुदेव अडीगा ,रमेश अग्रवाल ,संजय त्यागी ।

तो ये वो चंद नाम हैं-जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत घपले-घोटाले या गडबड़झालों का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया तो विरोधियों ने मौत की नींद सुला दिया। जी-ये लिस्ट आरटीआई एक्टविस्ट की है। वैसे आंकड़ों में समझें तो सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद 66 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है ।159 आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं और 173 ने धमकाने और अत्याचार की शिकायत दर्ज कराई है । यानी इस देश में सच की खोज आसान नहीं है। या कहें कि जिस सच से सत्ता की चूलें हिल जाएं या उस नैक्सस की पोल खुल जाए-जिसमें अपराधी और सत्ता सब भागीदार हों-उस सच को सत्ता के दिए सूचना के अधिकार से हासिल करना भी आसान नहीं है। दरअसल, सच सुनना आसान नहीं है। और सच को उघाड़ने वाले आरटीआई एक्टविस्ट हों या जर्नलिस्ट-सब जान हथेली पर लेकर ही घूमते हैं। क्योंकि पत्रकारों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पत्रकारों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती। भ्रष्टाचार और राजनीति तो खतरनाक बीट हैं । 1992 के बाद 27 ऐसे मामले दर्ज हुए,जिनमें पत्रकारों को उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी । तो गौरी लंकेश के हत्यारों को सजा होगी-इसकी बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन-एक तरफ सवाल वैचारिक लड़ाई का है तो दूसरी तरफ सवाल कानून व्यवस्था का है। क्योंकि सच यही है कि बेंगलुरु जैसे शहर में अगर एक पत्रकार की घर में घुसकर हत्या हो सकती है तो देश के किसी भी शहर में पत्रकार-आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या हो सकती है-और उन्हें कोई बचा नहीं सकता। यानी अब गेंद सिद्धरमैया के पाले में है कि वो दोषियों को सलाखों के पीछे तक पहुंचवाएं। क्योंकि मुद्दा सिर्फ एक हत्या का नहीं-मीडिया की आजादी का भी है। और सच ये भी है कि मीडिया की आजादी के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की 2107 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम रैकिंग कहती है कि भारत का 192 देशों में नंबर 136वां है । और इस रैंकिंग का आधार यह है कि किस देश में पत्रकारों को अपनी बात कहने की कितनी आजादी है। और जब आजादी कटघरे में है तो हत्यारे कटघरे में कैसे आयेंगे।

Related Articles

8 thoughts on “हत्यारों को कठघरे में कौन खड़ा करेगा?

  1. सिकंदर हयात

    http://thewirehindi.com/17914/apoorvanand-on-veteran-journalist-gauri-lankesh-murder/ गौरी लंकेश अगर अंग्रेजी से कन्नड़ में ना आती तो शायद जिन्दा रहती असली खतरा इन्ही लोगो को हे क्योकि बदलाव यही लोग ला सकते हे अगर कोई सम्भवना हुई तो , मगर ज़बर्दस्ती के ” जिन्दा शहीद ” कोई और ही बने रहते हे http://thewirehindi.com/18050/after-gauri-lankesh-murder-sagarika-ghose-shobha-de-arundhati-roy-kavitha-krishnan-shehla-rashid-receives-threat/ बताइये शोभा डे तक —— ? हद हो गई जो एंटीलिया से दावत खा कर बाहर निकल कर डकार लेकर कहती हे की सब इनकी मेहनत का हे जैसा चाहे खर्च करे . इसी तरह लखनऊ के सोशल सूफी संत भी बता और जता रहे थे की क़ुरबानी के खिलाफ लिखने से उनकी जान को खतरा हे और ये भी बता रहे थे की उनके पिता जी भी सेम उन्ही की सोच रखते हे और घर वाले भी अरे भाई जब उनके भी कभी नाख़ून नहीं टूटे तो आपको भला क्या खतरा हो सकता हे लखनऊ शिया सुन्नी में बटा हुआ हे और आप बता ही चुके हे की खलीफाओं से आपको समस्या हे तो फिर लखनऊ में भला आपको क्या खतरा हो सकता हे ———— ? पुणे के महा महा महाकटरपन्ति वासी भाई कहते थे की मेन मुद्दा शिर्क हे जब शिर्क ही एडजस्ट आपने कर लिया हे वो भी खानदानी , तो भला बाकी बाते क्या रह गयी और क्यों कोई आपके मुँह लगेगा क्यों भला ——— ? . नाख़ून कटवा कर शहीद कहलाना चाहते हे

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    अपूर्वानंद जी ने सही कहा हे की गौरी लंकेश अगर अंग्रेजी से कन्नड़ में ना आती तो शायद जिन्दा रहती असली खतरा इन्ही लोगो को हे क्योकि बदलाव यही लोग ला सकते हे अगर कल को कोई सम्भवना हुई तो , मगर ज़बर्दस्ती के ” जिन्दा शहीद ” कोई और ही बने रहते हे http://thewirehindi.com/180… बताइये शोभा डे तक —— ? हद हो गई जो एंटीलिया से दावत खा कर बाहर निकल कर डकार लेकर कहती हे की सब इनकी मेहनत का हे जैसा चाहे खर्च करे
    इसी तरह लखनऊ के सोशल सूफी संत भी बता और जता रहे थे की क़ुरबानी के खिलाफ लिखने से उनकी जान को खतरा हे और ये भी बता रहे थे की उनके पिता जी भी सेम उन्ही की सोच रखते हे और घर वाले भी , अरे भाई जब उनके भी कभी नाख़ून नहीं टूटे तो आपको भला क्या खतरा हो सकता हे लखनऊ शिया सुन्नी में बटा हुआ हे और आप बता ही चुके हे की खलीफाओं से आपको समस्या हे तो फिर लखनऊ में भला आपको क्या खतरा हो सकता हे ————– ? पुणे के महा महा महाकटरपन्ति वासी भाई कहते थे की मेन मुद्दा शिर्क हे जब शिर्क ही एडजस्ट आपने कर लिया हे वो भी खानदानी , तो भला बाकी बाते क्या रह गयी और क्यों कोई आपके मुँह लगेगा क्यों भला ——— ? . नाख़ून कटवा कर शहीद का स्टेटस चाहते हे

    Reply
  3. सिकंदर हयात

    Mukesh Aseem
    11 hrs ·
    Ryan ग्रुप देश के स्कूली शिक्षा के बड़े कॉर्पोरेट गिरोहों में से एक है| पूरी तरह मुनाफे और काले धन पर आधारित| इसकी मालिक ग्रेस पिंटो आजकल बीजेपी महिला मोर्चे की पदाधिकारी हैं, पहले कांग्रेस में हुआ करती थीं| सिर्फ दिल्ली में ही इनके स्कूलों में हाल के सालों में कई मासूम बच्चे संदिग्ध मृत्यु का शिकार बन चुके हैं, आज ही एक बच्चे की नृशंस हत्या हुई है| आज ही मुंबई में भी इनके एक स्कूल के प्रिंसिपल को एक बच्चे के यौन शोषण में गिरफ्तार किया गया| पर जिनके बच्चों के साथ भी ऐसा हो उनके दुःख को अच्छी तरह जानते-समझते हुए भी अक्सर पूरी दिली हमदर्दी महसूस कर पाना मुश्किल लगता है|
    आज़ादी के बाद सार्वजनिक सुविधाओं/सब्सिडी से डिग्री, नौकरी हासिल कर बना यह मध्यमवर्ग सुविधाओं के मामले में तो आधुनिक हुआ मगर चिंतन में नहीं| संपत्ति के घमंड के साथ पूरी तरह सड़ी हुई ब्राह्मणवादी जातिगत नफ़रत के मेल से इसने एक भयानक कुसंस्कृति को पाला-पोसा| इसने सब के बच्चों के लिए सार्वजनिक शिक्षा के बजाय अपने बच्चों के लिए ऐसे स्कूल खड़े किये जिनमें गरीब बच्चे घुस भी न सकें, सबके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की बरबादी कर अपने लिए पैसे फेंककर ईलाज खरीदने का रास्ता चुना, शहर-गाँवों में सबके लिए स्वस्थ आवास-खेल-सफाई के इंतजाम के बजाय अपनी दीवारों से घिरीं, गेट पर चौकीदारों वालीं सफेदपोश ‘सोसायटी’ बनाई जिसमें गरीब लोग सिर्फ चाकरी के लिए ही आने पाएं; साथ ही रहने वालों में भी धर्म, जाति, भाषा, खान-पान की बंदिशें भी आयद कीं|
    यह नफ़रत से भरा वह वर्ग है जिसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि अधिकाँश लोग किस गंदगी में रहते हैं, उनके बच्चे कहाँ खेलते हैं, कहाँ पढ़ते हैं, उनका इलाज होता है या नहीं| झोंपड़ पट्टी में रहने वाले कितने बच्चे चुरा कर अपंग कर दिए जाते, भीख माँगने, वेश्यावृत्ति, अपराधों में लगा दिए जाते इस तबके को कोई मतलब नहीं| सरकारी अस्पतालों में कितने गरीब बच्चे बिना डॉक्टर, दवा, ऑक्सीजन के तड़प कर मर जाते, पर इनके दिल में उनके लिए कोई हमदर्दी नहीं, बल्कि इस पर मजाक बनाये जाते हैं| इसको सिर्फ एक बात से मतलब है कि मेरा बच्चा किसी गरीब के बच्चे के साथ पढ़ना-खेलना तो दूर, छू भी न जाए| मैं जिस सेक्टर में रहता हूँ वहाँ तो यह माँग उठी कि खेल के मैदान को ख़त्म कर फूल-पौधों, बेंचों वाला पार्क बनाया जाय क्योंकि ‘हमारे जैसे भद्रजनों’ के बच्चे तो वहाँ खेलते नहीं, पास के गाँव के गरीब बच्चे आकर खेलते हैं जो इन ‘सज्जनों’ की आँखों को चुभते हैं, जिनकी ख़ुशी से भरी किलकारियाँ इनके कानों में दर्द कर देती हैं; इनके फ्लैटों की कीमतें गिरा देती हैं|
    पर यह सब इंतजाम करने के बाद भी यह तबका अक्सर पाता है कि पैसा फेंककर किया गया यह सब इंतजाम अक्सर बेकार हो जाता है, पैसा लेने वाले स्कूल पैसा तो खूब लेते हैं, पर वहाँ भी बच्चों के साथ कुछ भी हो सकता है; पैसा लेने वाले अस्पताल इलाज करने में लूट तो लेते ही हैं, गलत टैस्ट, इलाज, दवा, सर्जरी से जान पर भी बन आती है; शहर में खुले सीवर के ढक्कनों में सिर्फ गंदे गरीब लोग ही नहीं कभी-कभी इनकी भी जान चली जाती है| तब ये और इनके तबके का मीडिया बहुत कोहराम मचाता है पर फिर भी ये पूरे समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर कुछ नहीं सोचते!
    इसलिए इन त्रासद घटनाओं पर भी दिली हमदर्दी महसूस करने में रूकावट महसूस होती रहती है|
    यहाँ यह भी कह देना पड़ेगा कि इस मानसिकता से सिर्फ ‘सवर्ण-अशराफ़’ जाति की पृष्ठभूमि वाले ही नहीं मध्य वर्ग में शामिल होने का मौका पाने वाले वंचित तबके के लोगों का भी अधिकाँश इसी मानसिकता में शामिल हो जाता है और उसके लिए भी इसी व्यवस्था में अपने हिस्से का जुगाड़ कर लेना ही मकसद रह जाता है और वह भी सबके लिए सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, खेल, सफाई, आदि सुविधाओं की चर्चा से उतनी ही दूर रहना चाहता है ताकि पसीने की दुर्गंध वाले मेहनतकश तबके से कोई ग़ैरज़रूरी वास्ता न रखना पड़े|Mukesh AseemMukesh Aseem
    16 hrs ·
    पहले अपने देश में बीफ़ खालें तब भारत आयें – पर्यटन मन्त्री अल्फोंस उवाच!
    अब कुछ और आने वाले बयानों की कल्पना करें।
    पहले खूब सारी ऑक्सीजन फेफड़ों में भर लें तब उप्र आयें – आदित्यनाथ
    पहले अपनी जिंदगी भरपूर जी लें तब ही रेल यात्रा करें – रेल मंत्री

    Reply
  4. विजय

    सिकंदर हयात भाई कॉपी पेस्ट नकरके आप खुद अपने बिचार रखे 😊

    Reply
  5. सिकंदर हयात

    दो बाते हे एक तो बड़े भाई की डेथ के सदमे से में खुद लिख नहीं पा रहा हु दूसरा जहा तक कॉपी पेस्ट का सवाल हे तो ये सब सोशल मिडिया से लिया गया हे कोशिश ये हे की लेखकों का लिखा फेसबुक से उठा कर यहाँ चिपका दिया जाए ताकि कुछ पाठक किसी को सोशल मिडिया पर नहीं यहाँ पढ़ने की आदत डाल ले इससे क्लिक बढ़ेंगे और अगर अधिक क्लिक से कमाई हुई तो अफ़ज़ल भाई उसे लेखकों को ही दे देंगे तो ये सही रहेगा जबकि फेसबुक आदि एक पैसा रेवन्यू शेयर नहीं करता हे ये योजना हे हालांकि ये करना बहुत ही मुश्किल हे लेकिन कोशिश करके देख लेते हे

    Reply
  6. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan
    23 hrs ·
    आज से कुछ दस पंद्रह साल पहले देश में कोल्डड्रिंक क्रांति आया था ,सभी गांव ,सड़क में कोल्डड्रिंक की बॉटल लटकी रहती थी। गांव के लोग भी ठंडा दो बोलते थे और कुछ भी गटक जाते थे। इसी कोल्डड्रिंक की वजह से कई लोग अपनी लीवर ख़राब कर बैठे। आज ठीक वहीँ स्थिति पतंजलि के स्टोर को लेकर है। गांव ,शहर सब जगह इसके स्टोर है। पतंजलि के स्टोर में सभी जा रहे हैं और बिना चिकित्सक के सलाह के उनकी दवाइयां और अन्य प्रोडक्ट ले रहे हैं। आयुर्वेद यह जरूर कहता है कि इससे साइड इफ़ेक्ट नहीं होता पर दवाई की मात्रा के लिए क्या किसी आयुर्वेदाचार्य से संपर्क करना जरूरी नहीं है। अंधभक्ति की वजह से लोग आँख मूंदकर पतंजलि के हर्बल प्रोडक्ट ले रहे हैं। इसका फायदा बाबा रामदेव उठा रहे हैं और निहायत ही सड़ा और निम्न गुणवत्ता का प्रोडक्ट देशभक्ति के नाम पर लोगों को बेच रहे हैं। ताकत बढ़ाने वाली और मर्दाना कमजोरी दूर करने की दवाई यह पतंजलि ठीक उसी तरह बेच रही है जैसे दीवारों पर नाम लिखा कोई शाह दवाखाना ,डॉ राज ,डॉ सागर आदि बेचते हैं। क्या इससे पहले हम आयुर्वेद से अंजान थे ,क्या हम आयुर्वेद की दवाइयां नहीं लेते थे। कई चिकित्सक पहले भी वैद्यनाथ ,चरक ,उंझा और डाबर सहित कई आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाई लिखते थे ,और उनका निश्चित खुराक तय करते थे। आज तो रक्तचाप और शुगर की दवाई पतंजलि में ऐसे मिल रही है जैसे किसी दुकान से टूथपेस्ट। लोग धड़ल्ले से इसे ले भी रहे हैं और दूसरे को इसे लेने की सलाह भी दे रहे हैं। इसकी गुणवत्ता पर कोई चर्चा भी नहीं कर रहा है। मेरी जानकारी में आज तक किसी बीएएमएस या अन्य डॉक्टर ने अपने मरीज को पतंजलि की दवाई लेने का सलाह नहीं दिया है। ऐसा क्यों? क्या वे इस बाबा से चिढ़ते हैं या उन्हें उसके पतंजलि से कोई समस्या है ! नहीं वजह यह है कि डॉक्टर जानते हैं कि भाजपा में राजनीतिक पहुँच की वजह से यह बाबा आयुर्वेद के नाम पर सिर्फ अपना ब्रांड बड़ा कर रहा है ,उसे तनिक भी चिंता नहीं है कि इससे लोगों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। वे जानते हैं देशभक्त जनता को ज़हर भी बेचोगे तो वे ख़ुशी से खा लेंगे। आप स्वदेशी के नाम पर उनका सड़ा हुआ प्रोडक्ट ले रहे हैं और अपनी जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। आइंदा जब कभी पतंजलि प्रोडक्ट ले तो उससे पहले किसी डॉक्टर से सलाह जरूर ले ,विशेष तौर पर अगर शुगर और रक्तचाप में पतंजलि प्रोडक्ट ले रहे हैं तो,हो सकता है कभी आपकी जान पर बन आये। यह कोई स्वदेशी क्रांति नहीं है सिर्फ आयुर्वेद के नाम पर दूसरी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा है ,इस प्रतिस्पर्धा का मोहरा आप है। जनहित में जारीVikram Singh Chauhan
    Yesterday at 21:46 ·
    लाल सलाम और जय भीम को आपस में लड़ने की नहीं गले मिलने का वक्त हैं। कामरेड कभी भेद नहीं करते और मुद्दों को उठाने में देश की किसी अन्य विचारधारा से बीस ही है। वहीँ जिस तरह से बाप्सा आगे आ रही है बेशक आने वाला वक़्त उनका है , इसके पीछे निश्चित रूप से बहुजन की ताकत है। हम तानाशाही सरकार के खिलाफ शुरू से लेकर अभी तक एक है ,तो सिर्फ एक चुनाव से एक -दूसरे पर पत्थर क्यों उछालने लगे। देश में मुस्लिम ,दलित विरोधी दंगो पर ,सहारनपुर में दलितों की गिरफ़्तारी में ,दलितों को जलाकर मारने ,गाय के नाम पर उनकी हत्या में ,रोहित वेमुला मामलें में कॉमरेड साथ रहे ,ठीक उसी तरह आंबेडकर वादी देश के सभी ज्वलंत मुद्दों पर ,विचारकों की हत्या पर ,आदिवासियों की नक्सली के नाम पर हत्या पर ,वर्तमान में गौरी लंकेश की हत्या पर वाम के साथ खड़े रहे ,बल्कि कई मुद्दों पर वाम से तीव्र आवाज उठाया। मैंने लोकसभा चुनाव में मोदी के जीत के बाद लिखा था ”कामरेड सिगरेट फूंकना और लैपटॉप में क्रांति करना छोड़ो। मार्क्स ,एंगेल्स ,लेनिन ,स्टालिन ,माओ , एमिल बर्न्स , चे ग्वेरा ,मोरिस कोनफोर्ड की किताबें तुम्हारी अलमारी में सजी पड़ी रही और इधर पूंजीवाद ने एक तानाशाह को देश का शासक बना दिया!” ऐसा कभी आंबेडकरवादियों के खिलाफ नहीं लिखना पड़ेगा क्योंकि जितने सजग आज वे हैं और कोई नहीं। तो आज जय भीम और लाल सलाम साथ साथ—————-Girish Malviya
    4 hrs ·
    टीवी पर मोदी जी का भाषण चल रहा है, ओर बाहर बादल के गरजने की आवाज आ रही है,मोदी भी विज्ञान भवन में गरज रहे हैं , न बादल बरसे ओर न मोदी जी, ठीक ही कहा गया है कि जो गरजते हैं बरसते नही है
    उनके सामने 30 साल के युवा बैठे हैं, वो मोदी मोदी कर रहे हैं किराए की भीड़ है, उनकी सभाओं में अक्सर नजर आती हैं
    30 साल का नोजवान हर साल 2 करोड़ रोजगार का सपना देख रहा है वो सपना 3 साल पहले जो मोदी जी ने दिखाया था, आज हकीकत क्या है लिखने की जरूरत नही है, सभी को पता है, इतनी खराब हालत है रोज़गार की, कि जिनके पास था वो भी छीन लिया गया है
    इसी विज्ञान भवन में 2 साल पहले उन्होंने स्टार्ट अप इंडिया अभियान की शुरुआत की थी मैं आंकड़ों पर भी जा सकता हूँ पर मैं सीधी बात करना चाहूंगा दो साल मैं मुझे किसी एक ही स्टार्ट अप का नाम बता दीजिए जिसे सरकार ने अपने वादों के मुताबिक अनुदान ओर छूट दी हो,मुझे यकीन है कि आपके जहन में तुरन्त एक भी नाम नही आएगा
    आज फिर एक जुमला उछाल गए कि जॉब सीकर नही जॉब क्रिएटर बनो, कहने से क्या होगा आपने एक बेरोजगार आदमी को अपना व्यापार शुरू करने के लिए आपकी सरकार ने क्या किया है ये बताए एक आम आदमी जब अपना बिजनेस प्लान लेकर बैंक मैनेजर के पास जाता है तो उसके साथ क्या क्या होता है बताने की जरूरत नही है, मुद्रा योजना तो पहले से ही चल रही है, आपने उसका नाम बदला है, ओर उसमे भी बीजेपी नेताओं के रिश्तेदारो को लोन दिलवाए गए है
    एक बात ओर खटकती है मोदीजी जब देखो तब 2022 का नाम ले ले रहे हैं, जब 2014 में चुन कर आये थे तब तो वह 2019 तक सुधार कर देंगे यही कह कर सत्ता में आये थे आज वो 2022 की बात कर रहे हैं, 2022 आएगा तो यह 2030 की बाते करेंगे, भक्तों को भी भक्ति से ऊपर उठकर सोचना होगा, सवाल तो कम से कम कीजिए——————-Awesh Tiwari
    5 hrs · Malakhera ·
    यह हैं रायन पिंटो, ग्रेसी पिंटो के बेटे। रायन इंटरनेशनल स्कूल का नाम इन्ही के नाम पर है। एक फ़िल्म “मस्ती एक्सप्रेस” में काम कर चुके हैं बहन के साथ पार्टनरशिप के एक दर्जनों कंपनियां खोल व्यवसाय बढ़ा रहे हैं। इनकी कंपनियां रियल इस्टेट से लेकर टीवी चैनल तक का काम कर रही है। खैर, अब बात असल की ,मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर की डिफॉल्टरों की सूची में इनका नाम है।इनका पता मुम्बई का है लेकिन इनकी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन तामिलनाडु का।भाजपा के एक बिगड़ैल मंत्री पुत्र से इनकी मित्रता की चर्चाएं खूब रही है।Awesh Tiwari
    14 hrs · Jaipur ·
    जब कांग्रेस सत्ता में आई तो रायन इंग्लिश स्कूल की प्रबंध निदेशक मैडम ग्रेस पिंटो ने सोनिया गांधी के नजदीक आने की बहुत कोशिश की मगर असफल रहीं| ग्रेस पिंटो यूपीए की सरकार में अपने लिए शिक्षा क्षेत्र का पदम् पुरस्कार प्राप्त करने के लिए जमकर लाबिंग कर रही थी साथ ही चाहती थी कि उनके पति को अल्पसंख्यक आयोग में सदस्यता मिल जाए| खैर सरकार चली गई तो उन्होंने मोटे चंदे की बदौलत बीजेपी में अपनी जगह बना ली|जब भाजपा की सरकार आई तो वो महिला मोर्चा की महासचिव बन गई और तबसे लगातार बतौर ईसाई अल्पसंख्यक सदस्य राज्यसभा में जाने की कोशिश कर रही है , इस बात की प्रबल संभावना है कि बीजेपी उन्हें राज्यसभा में भेजेगी|Awesh Tiwari
    23 hrs ·
    रायन इंटरनेटशनल स्कूल की प्रबंध निदेशक ग्रेस पिंटो ( अति विशालकाय मुखमुद्रा ) का नाम 1800 करोड़ रुपयों की टैक्स चोरी में आ चुका है| इसने अपने पति के साथ मिलकर ‘कामाक्षी फाइनेंस कार्पोरेशन’ नामक कंपनी में करोड़ों रूपए लगाकर अपने काले धन को सफ़ेद कर लिया | लेकिन मजेदार बात इसके बाद की है जब सेबी ने इसका नाम उजागिर किया इसने अपने सभी विद्यालयों में शिक्षकों और अभिभावकों को बीजेपी की सदस्यता लेने का फरमान जारी कर दिया और इस तरह काला धन ,काला मन और काली कमाई हमेशा के लिए सफ़ेद हो गई |Awesh Tiwari
    Yesterday at 21:45 ·
    देश के नंबर वन अखबार ने जेएनयू में एबीवीपी की जीत की खबर छाप दी और नारा भी लगवा दिया, यह केवल भक्ति भर नहीं है ,उससे भी ज्यादा की चीज है| देश भर में इस अखबार के न्यूज रूम में बैठे एडिटर्स, संवाददाताओं को यह बात घोल कर पिला दी गई है कि कोई भी खबर ऐसी नहीं होनी चाहिए जो भाजपा, संघ, पीएम मोदी या फिर उनसे जुड़े किसी भी संगठन को कमतर साबित करे| निस्संदेह ऐसे में बार बार हास्यास्पद स्थिति पैदा हो जाती है | इसी अखबार में काम करने वाले मेरे एक साथी बताते हैं सुबह से शाम तक हम केवल इस बात के परेशान रहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि कोई भी खबर सरकार के विरुद्ध चली जाए | नतीजा यह है कि हमने शहर की नालियों की गंदगी की ख़बरें भी छापना बंद कर दिया हैं , भाजपा शासित प्रदेशों में हत्या और रेप की ख़बरें एक कालम में कर दी गई है | एक बात बड़ी अजीबोगरीब लगी जब यह बताया गया कि गोरखपुर में बच्चों की मौत के दौरान प्रकाशित हर एक खबर को पहले सीएम आफिस भेजकर उनसे मंजूरी ली गई फिर छापा गया , वही यूपी में भाजपा की जीत का डमी एक महीने पहले बना लिया गया था |Awesh Tiwari
    9 September at 19:20 · Jaipur ·
    मेरा बच्चा शहर के एक बड़े कान्वेंट स्कूल में पढता है, वहां पढ़ने के पीछे मेरी या उसकी इच्छा नहीं गर्वनमेंट कालेज में सीटों की कमी जिम्मेदार है, मैं उसके लिए सिफारिश नहीं करना चाहता था मैंने नहीं किया, हांलाकि उसके स्कूल की फीस मेरी जेब पर भारी है | मैंने शुरुआत के कुछ साल कान्वेंट में पढ़ाई की फिर मैं सरकारी स्कूल में आ गया| मेरे भाई बहन शुरू से ही सरकारी स्कूल में ही पढ़े , मैं कक्षा दस तक टाट पट्टी पर बैठता था बाद में जब टेबल कुर्सी मिली तो मेरे दोस्त उसे तोड़ दिए इसलिए फिर से टाट पर बैठना पढ़ा,लेकिन मुझे याद है हम छात्रों का घर से ज्यादा मन अपने विद्यालय और अपने शिक्षकों के बीच लगता था| मेरी बहन हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल से पढ़कर डाक्टर बन गई ,भाई भी अधिकारी बन गया | मेरा बच्चा जब अपने स्कूल की बातें बताता है तो मैं अवाक हो जाता हूँ ,अंग्रेजी स्कूलों में प्रबंधन अभिभावकों के सीने पर चढ़कर फीस लेते हैं लेकिन साथ में वो सुख चैन भी ले लेते हैं ,वो अच्छी इंग्लिश बोल लेता है लेकिन अच्छा इंसान बनना ज्यादा जरुरी है| किसी छात्र को अच्छा नागरिक बनाने में निजी स्कूलों की कोई रूचि नहीं रही है |अंग्रेजी स्कूलों में प्रबंधन पहले आर्थिक अपराध करता है फिर उन अपराधों के साये में किस्म किस्म के अपराध होते हैं | इन निजी स्कूलों से बेहतर मिशनरी के स्कूल हैं, फीस भी कम होती है और ऊपर वाले का डर भी होता है|——————————-Dilip C Mandal added 3 new photos.
    9 hrs ·
    Ryan पब्लिक स्कूल की मालकिन मैडम ग्रेस पिंटो बीजेपी महिला मोर्चा की ऑल इंडिया सेक्रेटरी कैसे बन गईं? कितने रुपयों का लेन-देन हुआ? बदले में सेबी और इनकम टैक्स के केस के बारे में क्या डील हुई?
    भारत में खोजी पत्रकारिता जैसी कोई चीज़ नहीं है। होती तो पता चलता सारा खेलDilip C Mandal added 3 new photos.
    10 hrs ·
    बीजेपी नेता ग्रेस पिंटो का Ryan पब्लिक स्कूल इस बात का पर्याप्त कारण है कि ईसाइत फैलाने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को अब भारत में एक पैसा भी नहीं भेजना चाहिए।
    Ryan पब्लिक स्कूल माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन का लाभ ले रहा है। लेकिन माइनॉरिटी के लिए वह कुछ नहीं करता।
    वैसे भी भारत की आबादी में में ईसाई अनुपात हर दस साल में जिस तेज़ी से घट रहा है, उसे देखते हुए अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि विदेशी पैसों का कोई बड़ा भारी स्कैम चल रहा है।
    सरकार को इसकी जाँच करानी चाहिए।

    Reply
  7. सिकंदर हयात

    Mohd Zahid is with Mohd Zahid.
    1 hr ·
    गुजरात माॅडल
    राना अयूब की “गुजरात फाइल्स” जब इंग्लिश में प्रकाशित हुई थी तब भी खरीदा और पढ़ा था परन्तु मेरी इंग्लिश की समझ हिन्दी की अपेक्षा कम ही है तो और बेहतर तरीके से समझने के लिए इस किताब का हिन्दी संस्करण भी मँगाया और पढ़ रहा हूँ।
    यह किताब नहीं बल्कि गुजरात में राना अयूब द्वारा वरिष्ठ आइपीएस और आइएएस तथा नेताओं का वह स्टिंग आपरेशन है जिसे राना अयूब ने अपना नाम और धार्मिक पहचान बदल कर किया। यहाँ महत्वपुर्ण बात यह है कि इस स्टिंग को आजतक किसी ने झूठा या फर्जी नहीं कहा और ना किसी ने अपना नाम होने के कारण राना अयूब पर कोई मुकदमा किया।
    रोंगटे खड़े कर देने वाली यह किताब देश को उसकी वह संप्रादायिक सच्चाई बताती है जिसे बताने का साहस ना इलेक्ट्रानिक मीडिया में है ना प्रिन्ट मीडिया में , ना नेताओं में है और ना ही व्यवस्था और न्यायपालिका में है। हालाँकि यह सभी इस सच को जानते भी हैं।
    दरअसल जिस समय का यह स्टिंग है तब से आज तक गंगा में बहुत पानी बह गया है और भाजपा की सरकारें अब देश के 70% हिस्से में काबिज हैं और गुजरात जैसा सांप्रादायिक व्यवस्था हर जगह बना चुकी हैं या बना रही हैं।
    “गुजरात माडल” की जो चर्चा भाजपा या संघ करती है उसके दो मतलब हैं , और यह दोनों मतलब दो अलग अलग वर्ग को समझाने के लिए है।
    “गुजरात माॅडल” का एक मतलब तो अपने गिरोह के अतिरिक्त देश और दुनिया को यह समझाने के लिए है कि गुजरात विकास के मामले में सारी दुनिया के देशों को पीछे छोड़ चुका है और यही “गुजरात माडल” का विकास भाजपा पूरे देश का करेगी , और “गुजरात माॅडल” का दूसरा मतलब अपने जहरीले 36 संगठनों के लिए है कि जैसे गुजरात में एक एक ऐसे मुस्लिमों से घृणा करने वाले अधिकारी को चुन चुन कर बैठाया गया और पूरी व्यवस्था को “मुस्लिम विरोधी” ही नहीं बल्कि नफरत करने वाला बनाया वैसी ही व्यवस्था पूरे देश में भाजपा लागू करेगी।
    दरअसल दूसरा मतलब इस गिरोह को समझाने के लिए ही है जिसे अंडर करन्ट तरीके से संघ और उसके नाजायज़ संगठनों के ज़रिये देश भर में फैलाया जाता है।
    यह देशद्रोह है , और केवल “गुजरात फाइल्स” के दिए प्रमाण पर ही संघ , उसके 36 संगठन और भाजपा को इस देश में प्रतिबंधित कर देना चाहिए परन्तु राना अयूब के इस प्रस्ताव पर कि
    “वह सारे वीडियो टेप किसी निष्पक्ष एजेन्सी या अदालत में देने के लिए तैयार हैं”
    देश की पूरी व्यवस्था चुप है।
    गुजरात फाइल्स देश की व्यवस्था के मुस्लिम विरोध का वह सच दिखाती है जिसमें प्रशासन , व्यवस्था , सरकार किस तरह मुसलमानों का गुजरात में जेनोसाइड कराती है और फिर उस पर अपनी ताकत से लीपापोती करके अदालत से क्लीनचिट पाती है।
    यही दरअसल असली “गुजरात माॅडल” है। और भाजपा की इस देश में जहाँ जहाँ भी सरकारें हैं वहाँ वहाँ यही “गुजरात माडल” लागू किया जा रहा है और यह संघ , उसके 36 नाजायज़ संगठन , उसके कैडर और वोटर खूब अच्छी तरह समझते हैं इसीलिए उनको देश की बर्बाद अर्थव्यवस्था से असर नहीं पड़ता।
    उनके लिए यह “गुजरात माॅडल” देश में लागू हो रहा है यह देश की अर्थव्यवस्था से अधिक महत्वपुर्ण है।
    भाजपा और उसके नाजायज़ कुनबे के अतिरिक्त शेष लोगों को समझना चाहिए कि देश की पूरी व्यवस्था को देश के 25 करोड़ लोगों के विरुद्ध करके वह कौन सा भारत ये संघी बनाना चाह रहे हैं ? जहाँ एक सीमा के बाद देश में विद्रोह की स्थिति पैदा हो वैसी ? या 25 करोड़ लोग देश के इस “गुजरात माॅडल” से पीड़ित होकर कोई अन्य माँग कर दें वैसी ?
    हालाँकि इस देश का मुसलमान बहुत संयम और अपने देश से प्रेम करने वाला है तो ऐसा कुछ हो उसकी संभावना नहीं परन्तु किसी भी ज़ुल्म के बर्दाश्त करने की एक सीमा तो होती ही है।
    देश के भाजपा संघ विरोधी अन्य सभी को देश हित में समझना चाहिए कि “गुजरात” संघ और भाजपा के लिए नफरत की राजनीति का एक ऐसा माॅडल और एक ऐसा प्रतीक है जो यदि आने वाले गुजरात विधानसभा के चुनाव में ढह गया तो संघ और भाजपा की यहीं कब्र खुद जाएगी जो पूरे देश में इनको दफन करना शुरू कर देगी।
    यहाँ भाजपा का मुकाबला केवल काँग्रेस से है , इसलिए देशहित में बाकी लोग वहाँ खेल बिगाड़ने ना जाएँ तो बेहतर है , चाहें केजरीवाल हों या मायावती। यह अपने गृह प्रदेश में ही खुद को बचाने के लिए उस उर्जा का प्रयोग करें तो उनके खुद के लिए यह लाभदायक होगा।
    काँग्रेस के साथ इस चुनाव में सबको साथ आना ही होगा क्युँकि भाजपा के विरुद्ध और कोई विकल्प नहीं , कांग्रेस को भी बहुत सूझ बूझ और होशियारी से चुनाव प्रचार करना होगा और कहीं से भी यह मौका नहीं देना होगा जिससे मोदी-शाह की शातिर जोड़ी सांप्रदायिक कार्ड खेल सके जिसमें उसकी विशेषज्ञता है और ऐसा करके ही वह गुजरात अब तक जीतती आई है।
    कांग्रेस के लिए इस बार संभावनाएँ अधिक हैं और वह इस बार सतर्क भी बहुत है , उसने विभिषण और मोदी के बाल सखा शंकर सिंह बघेला को पार्टी से बाहर किया तो अहमद पटेल जैसे गुजरात में घृणा के प्रतीक व्यक्ति को इस चुनाव से दूर रखा। यदि गुजरात में मुसलमान और सांप्रदायिक कार्ड खेलने से मोदी-शाह को रोक दिया गया तो भाजपा वहाँ धराशाई हो जाएगी।
    कारण है वहाँ व्यापारियों , पटेल और दलित जैसे भाजपा के हार्डकोर वोटरों में भाजपा से बेहद सख्त नाराज़गी जिसका नेतृत्व हार्दिक पटेल और जिग्नेश मवानी जैसे लोग कर रहे हैं।
    मेरी सूचना के अनुसार हार्दिक पटेल कुछ दिनों में भाजपा के विरुद्व उसे हराने के लिए खुलकर कांग्रेस के पक्ष में आ सकते हैं , जिग्नेश मवानी को साधने का कांग्रेस प्रयास कर रही है।
    गुजरात माॅडल के दूसरे मतलब का इस चुनाव में ध्वस्त होना देश हित में है , यदि आप को यह समझना है कि कैसे देशहित में है तो “राना अयूब” के “गुजरात फाईल्स” के हिन्दी संस्करण को एमोजोन से ₹295/= में खरीद कर पढ़ें आपको यदि संघ की जगह देश से प्रेम होगा तो एहसास हो जाएगा।

    Reply
  8. सिकंदर हयात

    Albert Pinto-Works at MMI Online Ltd – A Jagran Prakashan venture
    23 September at 19:20 ·
    पहचान कौन?
    किस देश का पीएम लुटेरों और बलात्कारियों के साथ फोटो खिंचवाता है, लड़कियों पर डंडे चलवाकर मूर्तियों की पूजा करता है और हर समस्या का समाधान विकास में बताता है?Albert Pinto
    14 September at 22:53 ·
    मोदी 70 के लपेटे में हैं। बुलेट ट्रेन का क़र्ज़ आने वाली पीढ़ियाँ 50 साल तक चुकाएँगी। 120 साल तक वह जियेंगे नहीं। ग़ज़ब का लोन लिया है बंदे ने।
    इसे कहते हैं- लम्हों ने ख़ता की, सदियों ने सज़ा पाई।तकनीकी कारण
    सुना है कि अर्थशास्त्र के पुरोधा अमित शाह ने कहा है कि आर्थिक मंदी की वजह नोटबंदी नहीं, कुछ तकनीकी कारण हैं। इससे मुझे एक कहानी याद आ गई। आप भी पढ़ें-
    अस्सी के दशक में एक बार गाँव में पहली बार टीवी सेट आया। पूरे गाँव का माहौल सिनेमा हॉल सा हो गया था। चलते-बोलते चित्र देखने को भारी मजमा जुटा। बच्चे-बूढ़े-जवान, महिला-पुरुष सभी चटाई बिछाकर टीवी के सामने बैठ गए। पहली बार चलचित्र देखने वाले तमाम तरह के क़यास लगा रहे थे कि। गाँव के कुछ आवारा गपौड़ी हाँकने लगे कि पास बैठने वालों को करंट लगने की घटनाएं सामने आई हैं, टीवी से भाप भी निकलती है, ख़तरनाक किरणें निकलती हैं आदि, इत्यादि। लेकिन बच्चे थे कि दो हाथ से ज्यादा पीछे हटने को तैयार न हुए।
    ख़ैर, पहली मर्तबा टीवी चलना था तो घरवालों में मशविरा हुआ कि कम से कम आज सबको चाय पिलाई जाए। मजमा तो रोज़ जुटेगा, पर पहले दिन इतना तो बनता है। शाम भी हो ही रही थी।
    इधर मेले सा माहौल था और उधर टीवी सेट वाला पसीना-पसीना हो रहा था। अभी तक टीवी चल जाना चाहिए था। उसे डर था कि कहीं लाते समय झटकों से टीवी के नाज़ुक पुर्ज़े ख़राब न हो गए हों। जब चाय ख़त्म हो गई, हुक्के ठंडे हो गए और कानाफूसी होने लगी तो उसने भी पिंड छुड़ाने की गरज से कहा कि पिक्चर ट्यूब गर्म होने में कभी-कभी दो घंटे भी लगते हैं और उसे अंधेरा होने से पहले शहर भी पहुँचना है। इसलिए चिंता न करें, टीवी चल जाएगा।
    साँझ घिर आई थी। लोगों ने भी ज़िद सी ठान ली थी कि टीवी देखकर ही घर जाएंगे। कुछ बुज़ुर्गों ने भजन-कीर्तन भी शुरू कर दिए थे, बच्चे ताली बजाकर साथ दे रहे थे। इससे उनकी शाम की पूजा का क्रम भी नहीं टूटता और क्या पता इससे ही टीवी जल्दी गर्म हो जाए…।
    टीवी के घरवालों को लगने लगा था कि रईसी दिखानी भारी पड़ी, आज तो नाक कटी ही कटी। लेकिन गाँव के कुछ उपकारी युवक टीवी मकेनिक को बुला लाए। उसे पता चल गया था कि गाँव के गड्ढों से आते समय टीवी के नाज़ुक पुर्ज़े हिल गए हैं। उसने दो मिनट में टीवी खोलकर बिखेर दिया। बच्चे डरते-डरते कौतूहलवश पुर्ज़ों को छू रहे थे तो बड़े उन्हें दूर से ही डाँट रहे थे कि दूर रहो। सात बज गए थे। सबको भूख भी लगने लगी थी। मकेनिक भी हार मानकर, तकनीकी ख़राबी का हवाला देकर, लेकिन पैसे लेकर चला गया। उसने अगले दिन टीवी सही करने का वादा कर टीवी बांध दिया। लोग भी अपने घरों को जाने लगे थे, पर बच्चे अभी और रुकना चाहते थे।
    अब टीवी वाले घर की बेटी भी अपने ट्यूशन से लौट आई थी। उसे सारा माजरा समझने में पल भर भी नही लगा। वह टीवी के पास गई। बिजली का स्विच ऑन किया और टीवी चल गया। अब कोई टीवी नहीं देख रहा था। सब लड़की की शक्ल और बच्चों का उछलना-कूदना देख रहे थे।
    तो दोस्तो, तकनीकी ख़ामी या कारण दरअसल बिजली का स्विच यानी नोटबंदी है, जो अमित शाह जैसे मकेनिक की समझ में ही नहीं आ रही तो वह आपको क्या समझाएगा?Albert Pinto
    24 September at 14:11 ·
    कुछ लोग व्यथित हैं कि नवरात्रि के कन्या पूजन के अवसर पर #BHU में लड़कियों पर लाठीचार्ज हुआ है। कृपया व्यथित न हों, ये पूजन वाली नहीं, अशुद्ध हो चुकी लड़कियाँ हैं।
    हिंदू धर्म के अनुसार हम लोग कन्या पूजन पाँच-छह, सात-आठ साल की लड़कियों का ही करते हैं। इसके बाद हम लड़कियों का रेप, मॉलेस्टेशन, शारीरिक-मानसिक हिंसा, कार्यस्थलों में लैंगिक भेदभाव, दहेज हत्या आदि कर सकते हैं और करते भी हैं। इसलिए, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में हिंदू धर्म के अनुसार ही कार्रवाई हुई है।
    आप लोग देवी उपवास जारी रखें, हर दिन अलग-अलग रंगों के कपड़े पहनकर दफ़्तर जाएँ, वहाँ फोटो खिंचवाएं, शराब और माँस के लिए कुछ दिन और रुक जाएँ। धर्म का झंडा ऊँचा रहेगा।
    रंगीले जादूगर ने कह ही दिया है कि वे तो जानवरों की भी सेवा करते हैं, जबकि जानवरों से उन्हें वोट नहीं मिलता। ज़रूर पिटी हुई लड़कियों की ही कोई गलती होगी। आप सब्र रखें, कुछ समय बाद जब #BHU और यूपी के इतिहास का पुनर्लेखन होगा तो यूपी सरकार इन लड़कियों की गलती पाठ्यक्रम की किताबों में छपवा देगी। फिर उन किताबों को पढ़कर यूपी में संस्कारी बेटियाँ ही पैदा होंगी।—————————Shambhunath Shukla
    19 hrs ·
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ताजमहल से खुन्नस है. और होनी भी चाहिए. अब देखिए ताजमहल है प्रेम का प्रतीक और हमारे योगी जी बेचारे बालब्रह्मचारी! अब वे बेचारे क्या जानें कि प्रेम-प्यार और स्त्री क्या बला है. इसलिए उन्होंने ताजमहल को उत्तर प्रदेश के पर्यटन नक़्शे से बाहर कर दिया. अब केंद्र सरकार खूब कहती रहे कि ताजमहल से हमें बहुत कमाई होती है. एक अनुमान है कि हर वर्ष ताजमहल से लगभग 25 करोड़ की कमाई सिर्फ टिकट बेचकर होती है. इसके अलावा ताज़ महल कितने लोगों को रोज़गार देता है, कितने लाख की विदेशी मुद्रा लाता है और अकेले ताज कैसे भारत का ताज़ बना हुआ है, यदि इन सब बातों का हिसाब लगाया जाए तो बड़े-बड़े उद्योग फीके पड़ जाएंगे. एक ऐसी दर्शनीय और पर्यटन में शिखर पर बिराजती धरोहर को हम पर्यटन नक्शे से निकाल देंगे तो उत्तर प्रदेश में बचेगा क्या! ————–Panini Anand
    2 October at 20:25 ·
    मन में हिंसा है, भेद का कचरा है, घृणा की गंदगी है, ईर्ष्या की पीप है, असत्य का कीचड़ है, रूढ़ियों का पाप है और अवैज्ञानिकता की दुर्गंध.
    स्वच्छता कैसे होगी मितरों———————————-Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    15 hrs · Dehra Dun ·
    आह ताज
    ,——
    ताज महल पर अपने निर्माण काल से ही संकट आते रहे हैं । अपने कट्टरपंथी , क्रूर और धूर्त पुत्र औरंगज़ेब उर्फ आलमगीर की क़ैद में पड़ने तक शाहजहाँ इसकी तामीर पूरी न करा पाया था । इसका ढांचा तो बन गया था , पर नक़्क़ाशी का काम चल रहा था । शाहजहां का निजी खज़ाना और कोहेनूर समेत अनेक कीमती नग और जेवरात एक समझौते के तहत उसी के पास थे । इसी सम्पत्ति से वह क़ैद में रह कर ताजमहल का निर्माण करा रहा था । एक बार शाहजहां और औरंगज़ेब में कटु पत्र व्यवहार छिड़ा ।ध्यान दें , कि दोनों पिता – पुत्र में सिर्फ पत्र सम्वाद होता था । अन्यथा दोनों एक दूसरे का मुंह नहीं देखते थे ।विवाद का विषय यह था कि औरंगज़ेब ने शाहजहां से कोहेनूर मांगा । शाहजहां ने अपने इस पुत्र को पत्र लिख उसे भ्रातृ हन्ता , पितृ पीड़क एवं पर धन अपहर्ता बताते हुए कोहेनूर समेत अपने कब्जे वाले सारे नगों को पत्थर से चूरमा बना देने की धमकी दी । प्रत्युत्तर में औरंगज़ेब ने शाजहाँ को अय्याश और फ़िज़ूल खर्च बताते हुए ताजमहल का अधूरा निर्माण कार्य रोकने की धमकी दी । किसी तरह मामला सलट सका ।
    ब्रिटिश काल मे एक अंग्रेज हाकिम को यह इमारत फज़ूल का ढांचा लगा , और उसने इसका मार्बल उखड़वा कर ब्रिटेन भेजने की तैयारी कर ली । इसी बीच इटली में मार्बल की खदानें मिल गईं , वहां मार्बल सस्ता हो गया , फलस्वरूप भारत से मार्बल भेजना ट्रांसपोर्ट के हिसाब से मंहगा साबित हुआ । ताजमहल बच गया ।
    इससे पहले मुग़लों के बुरे वक्त में भरतपुर के जाटों ने ताजमहल के भीतरी गुम्बदों से अलाव जला कर सोना चांदी की नक्काशी पिघला दी , और उस पर जड़े नगों को लठ के बल्लम से ठोक कर निकाल लिया । उन्होंने कई दिन तक ताज के भीतर अपने घोड़े , ऊंट और भैंसें बांधे ।
    द्वित्तीय विश्व युद्ध मे एक ब्रिटिश विमान को रसद लेकर आगरा से लाहौर जाना था । विमान में वज़न अधिक था , सो पायलट ने फ्लाइट इंजीनियर से कहा कि तेल की टँकी आधी ही भरे । नासमझ ने टैंक फुल कर दिया । पायलट लिखता है , कि भार की वजह से विमान वांछित ऊंचाई न ले सका , और ताजमहल से टकराने में बस कुछ ही इंच की दूरी रही । पायलट के मुताबिक अदृश्य शक्ति मदद न करती तो उस दिन विमान और ताज दोनो चकनाचूर थे ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    Yesterday at 07:54 · Dehra Dun ·
    जिस तरह मोदी विरोधी उन्हें खिजाने और किलसाने के लिए जब तब आडवाणी का महिमामंडन करने लगते हैं , उसी तरह गांधी द्रोही और प्रकारांतर से राष्ट्रद्रोही संघ परिजन गांधी के मुकाबले में लाल बहादुर शास्त्री और आम्बेडकर को सामने ले आते हैं । जबकि दोनों मामलों में स्थितियां सर्वथा भिन्न हैं ।
    मोदी के उत्थान में आडवाणी की महती भूमिका रही है , जबकि गांधी न होते तो शास्त्री भी न होते । और आम्बेडकर भी सिर्फ एक वकील अथवा राज कर्मचारी होते । लाल बहादुर शास्त्री जहां सर्वथा गांधी के खेत की मूली हैं । विनम्रता , साहस और ईमानदारी से ओतप्रोत उनका स्पम्पूर्ण व्यक्तित्व गांधी की घुट्टी से ही पुष्ट हुआ है । दूसरी ओर गांधी और आम्बेडकर में तीव्र राजनीतिक मतभेद रहे , लेकिन दोनों ने प्रच्छन्न रूप से ही सही , एक दूसरे का साथ दिया और सम्मान दिया । भारतीय राजनीतिक पटल पर अंबेडकर के उदय से पहले गांधी भरतीय समाज मे दलित विमर्श जगा चुके थे , जिससे आम्बेडकर की राह खुली । आम्बेडकर को संविधान सभा मे निर्वाचित कराने वाले गांधी ही थे , जबकि दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग के विरोध में अनशन कर मृत्यु शय्या पर पड़े गांधी का जीवन आम्बेडकर ने ही बचाया था । वह गांधी की ज़िद के सामने झुक गए ।
    अस्तु , अंग्रेज़ परस्त , साम्प्रदायिक और इतिहास विमुख संघ परिजन गांधी , शास्त्री और आम्बेडकर के चप्पलों की धूल भी नहीं हैं ।

    Reply

Add Comment