by — शुजूको

( इन दोनों लेखो http://desicnn.com/blog/ban-on -beef-the-other-side-of-coin http://khabarkikhabar.com/archives/3307 के जवाब में ”शुजूको ” जी ने ये कमेंट लिखे थे जिन्हे लेख के रूप में दिया जा रहा हे )

गौ-पालन महंगा है :इस हिस्से में सही लिखा है कि गौ पालन का खर्चा बहुत है | ऐसे में दूध न देने वाली गाय को लोग क्यों पाले ?
एकदम सही बात कही है कि लोग गाय को चारे के लिए खुला छोड़ देते हैं , और वे प्लास्टिक कचरा या कीटनाशक खाने को मज़बूर हो जाती हैं | लेकिन ऐसाक्रूर व्यव्हार , दूध देने वाली गायों के साथ भी होता है | उन्हें भी चारा नहीं दिया जाता |बैल या बछड़े को आर्थिक कारणों से पाला नहीं जा सकता | लेकिन इनके बिना गौवंश का आगे बढ़ना और गाय का दूध देना भी असंभव है | इसलिए इन्हेव्यावहारिक रूप से क़त्ल नहीं किया जाना चाहिए | वर्ना गाय एक विलुप्तप्राय जीव बन जायेगी |इंसानो की तरह, गायों में भी सेक्स रेश्यो का संतुलन रखना ज़रूरी है | आपने चिड़ियाघरों में देखा होगा कि सेक्स रेश्यो गड़बड़ाने से कैसे कईबार जानवर की प्रजाति खतरे में पड़ जाती है | ये सोच कर खुश मत होईये कि गायो और बैलो की संख्या बहुत है | कभी दूसरे जीव जंतुओं की भी रही होगी |
आप कह सकते हैं कि इंसान तो मुर्गा और मछली को भी मारता है | तो इकोसिस्टम क्यों नहीं गड़बड़ाता | मेरे ख्याल से गड़बड़ाता तो होगा | लेकिन मुर्गी और मछली का पालन (poultry farming) किया जाता है | उनकी ब्रीडिंग की जाती है |

आपका ‘एनिमल-हसबेंडरी’, ‘काऊ-फार्मिंग’ और ‘गौ-आधारित इंडस्ट्रियल विकास’ वाले सुझाव भी अच्छे लगे | बस मुकेश अम्बानी जैसे लोगो के इस बिज़नेस में आने की ज़रूरत है |आपकी व्यापारियों को मुनाफे वाली बात भी सही है कि जब तक उन्हें मुनाफा ना हो , वे निवेश नहीं करते | इसलिए आपकी ‘टेक्नोलॉजी में विस्तार की ज़रूरत’ वाली बात से भी मैं सहमत हूँ |

आपकी इस बात को भी मैंने स्वीकार किया कि सरकार को गौ आधारित इंडस्ट्री के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी | और सरकार को गाय को आस्था का विषय बनाने से बचना चाहिए | गाय पर हर पार्टी और पत्रकारों की तरफ से राजनीति बंद होनी चाहिए | और सबको मिलकर व्यावहारिक धरातल पर ऐसी कोशिशें करनी चाहिए , जिससे गायो को कत्लखानो में भेजने की ज़रूरत ना पड़े और गायो को प्लास्टिक खाने की ज़रूरत भी ना पड़े |

सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के पॉइंट को भी स्वीकार करती हूँ | और इसके लिए मेरे पास कोई समाधान भी नहीं है | भ्रष्टाचार, इंसान की बढ़ती ज़रूरतों और दिखावे का नतीजा है | अब इंसान तो साधू बनने से रहा | तो भ्रष्टाचार किसी नियम-कानून-लोकपाल के सहारे ख़त्म नहीं किया जा सकता | हाँ , कम ज़रूर किया जा सकता है | बछड़ो के द्वारा फसल की बर्बादी :

सही मुद्दा उठाया है आपने | फसल किसान की मेहनत और हक़ है | गांव के मवेशी : गाय , बैल , बछड़ा , भैंस इत्यादि को उन्हें उजाड़ने नहीं दिया जा सकता | लेकिन क्या इस समस्या का हल यही है कि इन मवेशियों कि हत्या कर दी जाए ? कुछ समय पहले , इन्ही वजहों से नीलगाय को भी मारने की सरकार द्वारा अनुमति दी गयी है |बछड़ो को गौशाला में भी नहीं भेजा जा सकता क्यूंकि ऐसा करने पर गाय दूध देना बंद कर देगी | दूध दुहने के लिए बछड़े का गाय के सामने होना ज़रूरी है |लेकिन मवेशी की पहचान तो की जा सकती है कि उसका मालिक कौन है ? उनकी आधार नंबर टैगिंग की सरकार वैसे भी कोशिश कर रही है | ऐसे में सरकार को एक कानून बनाने की ज़रूरत पड़ेगी कि हर मवेशी कि पूरी ज़िम्मेदारी उसके मालिक की होगी | अगर उनका मवेशी किसी के खेत में कोई नुकसान करता है तो हर्जाना उनको भरना पड़ेगा |लेकिन बात सिर्फ गाय , भैंस की ही नहीं है , बल्कि नीलगाय और जंगली सूअरों की भी है | उनकी जान कैसे बचाये ? इन बेजुबान जानवरों को कहाँ पता है कि हद से ज्यादा मतलबी इंसान , इन्हे पेट भरने की ऐसी क्रूर सज़ा देगा ?

हल तो बाड़ लगाए जाने से ही निकलता दिख रहा है | लेकिन इतने लम्बे खेतो को कैसे कवर किया जाए ? इसके लिए खेतों की आउटर बॉउंड्री में बॉस या सीमेंट या फ्लाई ऐश (कोयले की राख) के दो खम्बे लगाने होंगे | उनके बीच में नारियल की रस्सी से बुनाई करनी होगी | जैसी सीमा पर की जाती है | चारो किनारो पर कुल चार खम्बे खड़े करने होंगे | कुछ कुछ चारपाई बुनने जैसा है ये | किसी जानवर में इतनी ताक़त तो नहीं होनी चाहिए कि वो मज़बूत रस्सियों और मज़बूत खम्बो की बाड़ को तोड़ सके | एक छोटे खेत पर शायद 4-8 चारपाई का खर्च आएगा | किसी जानवर की जान बचाने के लिए इससे अच्छा और सस्ता उपाए और क्या हो सकता है | कम से कम नीलगाय को मारने के लिए शूटर को नौकरी पर रखने से तो सस्ता पड़ेगा | हाँ , बीच में दरवाज़ा लगाना ना भूले | ऐसा दरवाज़ा , जिसे मुर्ख जानवर खोलना न सीख पाए |

इस बाड़ का एक और फायदा हो सकता है | जब बेमौसम बारिश में ओले पड़ने से फसल ख़राब होने का खतरा हो तो इस बाड़ पर तिरपाल/चादर ढककर फसल को बचाया जा सकता है | किसान अगर ट्रेक्टर , थ्रेशर आदि मशीने खरीद सकता है तो पुरानी चादरों को सिल कर तिरपाल क्यों नहीं बना सकता ? यदि फिर भी आर्थिक हालत ख़राब हो तो सरकार से क़र्ज़ लिया जा सकता है |

अब आप कहेंगे कि किसान को सपने आ रहे हैं कि कब बारिश होगी , ओले पड़ेंगे ? तो हर किसान को मौसम का एप अपने मोबाइल में डालना चाहिए | अक्सर सटीक भविष्यवाणी ही होती है | अगर मोबाइल नहीं है तो सरपंच के मोबाइल में डालना चाहिए , जो पूरे गांव को सतर्क कर दे |

हालाँकि मैं सुझाव देने से पहले सतर्क कर दूँ कि ओले जानलेवा भी हो सकते हैं | इसलिए ओले आने के बाद तिरपाल लगाने ना जाएं | हो सके तो एक दिन पहले ही यह कर लें | साथ ही चादर मज़बूत हो और मज़बूती से बांधी जाए | भूसे का गणितजिस कंबाइन हार्वेस्टर मशीन कि बात आप कर रहे हैं उसे हरियाणा के कुछ स्थानीय लोग ‘हडम्पा’ कहते हैं | सही है कि ये मशीन तूड़े को नीचे ही छोड़ देती है | लेकिन खेतों में आग लगाना तो वैसे भी गैर कानूनी है | आप क्यों किसानो की ऐसी हरकत का समर्थन कर रहे हैं जो गैर कानूनी है , प्रकृति के लिए नुकसानदेह है और आर्थिक दृष्टि से भी मूर्खता भरा कदम है |

आपने खुद बताया कि भूसा दस रूपए किलो के भाव से बिकता है | मेरी ख्याल में गेहूं बीस रूपए किलो के भाव बिकता होगा | तो जो चीज़ आधी कीमत पर बिक जाती है , किसान उसे जला कर अपना नुकसान क्यों करते हैं ? थोड़ी सी एक्स्ट्रा मेहनत करके अपने मुनाफे को डेढ़ गुना या दुगना क्यों नहीं कर लेते ? मेरे ख्याल . भूसा तो गेंहू से लगभग दुगना ही होता होगा न खेत में ?

आपने कहा कि भूसे की कटाई , प्रोसेसिंग पर अलग से छह से दस रूपए प्रतिकिलो खर्च आएगा | इसका मतलब गेंहू पर भी इतना ही खर्च आया होगा ? और गेंहू की बुवाई में अलग से खर्चा और मेहनत लगी होगी ? तो किसान की बचत भी ना के बराबर रही होगी ? फिर भी किसान गेंहू बोना नहीं छोड़ता | तो भूसे की कटाई भी करा ही ले | क्या पता प्रतिकिलो एक रूपए का फायदा ही हो जाये ?

साबुन की जो टिकिया बाजार में दस रूपए में बिकती है , उसपर कंपनी कितना कमा लेती होगी ? आधा या एक रुपया , ज्यादा से ज्यादा | फिर भी कंपनी लाखो – करोड़ो कमाती है | ज्यादा सेल की वजह से |तो सोचिये , अगर किसान के एक खेत में एक क्विंटल भूसा निकल आये तो वो एक रूपए के हिसाब से भी हज़ार रूपए कमा लेगा | और चार रूपए के हिसाब से चार हज़ार रूपए | अगर अच्छी उपज हो तो एक खेत में चार क्विंटल अनाज होता है और कम से कम उतना ही तूड़ा | तो इस हिसाब से किसान का मुनाफा बैठा सोलह हज़ार रूपए | अगर एक किसान के पास करीब पांच हेक्टेयर के खेत हो तो तूड़े से मुनाफा बैठा अस्सी हज़ार रूपए | तो बताइए , एक किसान अपने अस्सी हज़ार रुपयों को क्यों आग लगा देता है ?

गोबर गैस संयंत्र
आपने पुछा कि आप गोबर गैस संयंत्र लगा कर बुद्धिमानी का परिचय देंगे ?
आपका तो पता नहीं , लेकिन हर गांव में (संयुक्त रूप से) ऐसा एक संयंत्र ज़रूर होना चाहिए | आज नहीं तो कल , लगाना ही पड़ेगा | गोबर एक संसाधन है | उसको बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए | मैं खुद, शहरी सीवर के निपटारे के लिए बायोगैस प्लांट के उपयोग के बारे में सोच रही थी | लेकिन शहरी सीवर के कचरे में डिटर्जेंट , फिनाइल , एसिड और हार्पिक जैसे केमिकल हो सकते हैं | सड़ चुके सीवर कचरे को सीधे खेतों में डालना उपयुक्त नहीं होगा | इससे ज़मीन बंजर हो सकती है | बस इसी वजह से शहरी सीवर पर गोबरगैस प्लांट के उपयोग में अड़चन दिखाई देती है |

आपकी समस्याओं के हल इस प्रकार हैं :-
1. गांव में एक संयुक्त गोबर गैस प्लांट लगाया जाए , जिसका सञ्चालन पंचायत कि देख रेख में हो | हर किसान से बराबर राशि ली जा सकती है | अगर एक गांव में हज़ार किसान हैं तो हर किसान को दो सौ रूपए देने होंगे |
2. अगर सरकारी खर्चे पर सरकारी प्लांट लग जाए , जिसका सञ्चालन सरकार करे तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता | किसान को उसके लाये गोबर की कीमत दे दी जाए , बस | जो मुनाफा हो , वो सरकार रखे |
3. सड़ चुके गोबर को निकलने के लिए बूस्टर पम्पिंग मशीन की सहायता ली जा सकती है | गोबर डालने के लिए तो बाकायदा गढ्ढा बनाया जाता है जिसमे पानी के सहारे गोबर को नीचे धकेला जाता है |
4. गोबर गैस का व्यावसायिक उपयोग अभी भले ही ना हो, पर आने वाले वक़्त में ज़रूर होगा | क्या पता मेरे जैसा कोई वैज्ञानिक गोबर गैस से गाड़ी चलाने के बारे में सोच रहा हो | आपसे गुज़ारिश है, कृपया मेरे आईडिया को कहीं बेच ना आईयेगा | ऊर्जा है , तो उपयोग की कमी नहीं |
5. आपने संयंत्र से निकलने वाली खाद की तो बात ही नहीं की | क्या उस खाद की वजह से हम केमिकल खाद के दुष्परिणामों से बच नहीं जायेंगे ? और केमिकल खाद के पैसे भी बचेंगे |
6. गौमूत्र को भी बायोगैस संयंत्र में ही डालना चाहिए | बल्कि अभी गांवों में सीवर नहीं हैं | तो एडवांस सीवर लगाए जा सकते हैं | घरो में शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, लोग केवल पानी से ही फ्लश करें | इस प्रकार सारा सीवर का कचरा सीधा बायोगैस प्लांट तक पहुंचा दिया जाए | अब जिस दिन लोगो को शौचालय की हार्पिक आदि से सफाई करनी हो , उस दिन एक बटन दबा कर सीवर के वाल्व को बंद कर दिया जाए (जो बायोगैस प्लांट तक जाता है) और दूसरा वाल्व खोल दिया जाए (जो दूसरी नाली में जा रहा हो) | लेकिन इसमें समस्या ये है कि हमारे देश में लोग इतने जिम्मेदार कहाँ जो वे एक बटन दबा कर भी पर्यावरण को बचाने की सोचें | शहरो में सरकार कह कह कर थक गयी कि सूखे और गीले खचरे को अलग रखिये , पर किसी ने माना ? औरों की तो छोड़िये , लेकिन सो कॉल्ड जिम्मेदार नागरिकों ने भी माना ? मासांहार

मांसाहार पर प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय हो सकती है | मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि मांसाहार या शाकाहार का फैसला लोगो पर छोड़ देना चाहिए | सरकार जितना इस मुद्दे को उछालेगी, उतने ही ज्यादा हालात बिगड़ेंगे | लेकिन जिन लोगो में दया भावना है , वे लोग किसी भी पशु को कटते नहीं देख सकते | चाहे वो मुर्गी हो, बकरा हो, मछली हो या गाय या भैंस | इसलिए, वे मांसाहार का विरोध करते हैं | हाँ कुछ लोग राजनितिक/धार्मिक कारणों से भी ऐसा करते हैं |मांसाहार का वैज्ञानिक पहलु ये है कि अनाज के पौधों की हत्या की तुलना में जानवरो की हत्या ज्यादा कष्टप्रद है | जानवरो (इंसान समेत) के सेल पर सेल वाल नहीं होती | सिर्फ बाल और नाख़ून के सेल पर होती है | इसलिए बाल या नाखून काटते वक़्त दर्द नहीं होता | लेकिन दूसरे अंगों पर चोट लगने पर दर्द होता है | क्यूंकि जानवरो के शरीर में ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम और नर्वस सिस्टम होता है | और दिमाग भी होता है | नर्वस सिस्टम का काम यही है कि शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से (जैसे त्वचा) को यदि कुछ चोट पहुंचाने लायक वस्तु छूती है तो नर्वस सिस्टम दिमाग को सिग्नल भेज देता है | दिमाग तुरंत उसपर एक्शन लेता है कि अपना बचाव कैसे किया जाए | इसलिए जानवर तड़प तड़प कर मरता है |

पौधों के सेल पर सेल वाल रहती है | और उनमे खून , ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम , नर्वस सिस्टम और दिमाग नहीं होता , इसलिए उन्हें काटने पर दर्द भी नहीं होता |मेरे जैसे शाकाहारियों का यही तर्क है कि अपने स्वाद के लिए मैं किसी जीव को तड़पा तड़पा कर क्यों मारुं ? अगर इंसानो की हत्या अपराध है तो जानवरो की हत्या क्यों नहीं? उन्हें भी तो उतना ही कष्ट होता है जितना इंसानो को | हालाँकि किसी दूसरे से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह शाकाहारी है या मांसाहारी | सबके अपने अपने कर्म हैं | सबकी अपनी अपनी चॉइस है |

‘मांसाहार के डिमांड और सप्लाई वाले’ और ‘गायों, बैलो और बछड़ो के दूध ना देने की वजह से क़त्ल वाले’ आपके तर्कों के बारे में मेरा यह सवाल है कि दूध तो कुत्ते, बिल्ली और चूहे भी नहीं देते (मतलब इतना नहीं देते कि इंसान पी सके, हालाँकि ये सब स्तनधारी जीव हैं), तो इनका मांस क्यों नहीं खाया जाता ? इंसान के शरीर में भरपूर गोश्त है , तो इंसान इंसान को क्यों नहीं खाता ? वैसे भी इंसानो की जनसँख्या से इकोसिस्टम गड़बड़ाया हुआ है | बंगाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

हमे अगर बंगाल और पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा करनी ही है तो देश के विकास में करनी चाहिए , नाकि बेजुबान पशुओं की हत्या में | आर्थिक फायदे के लिए क्या हम पशुहत्या का कोई विकल्प नहीं खोज सकते ? इंसानो को जीने का अधिकार है , पशुओं को नहीं ?
जहाँ तक , सीमा पर पशु तस्करी का सवाल है , तो फिलहाल , पशु तस्करी (एक्सपोर्ट) रोकने से ज्यादा आतंकवादियों की (इम्पोर्ट) तस्करी रोकना ज्यादा अहम् है |

ब बात आपके इस लेख के सन्दर्भ में कर ली जाए :-
http://khabarkikhabar.com/a…
आपकी सारी चिंता , देश में भ्र्ष्टाचार , आर्थिक हालात , संसाधनों की कमी को लेकर दिखती है | आपने मेरी किसी मांग को अनुचित नहीं ठहराया है | बस आपको मेरी मांगे आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं लगी | आपको गौसेवा को लेकर कोई उम्मीद भी नहीं दिखती | आपकी सारी बाते जायज़ हैं | उम्मीद मुझे भी कम ही है, और भ्रष्टाचार से मैं भी इंकार नहीं कर रही | देश की अर्थव्यवस्था भी पटरी पर नहीं है |

लेकिन ये सभी पक्ष केवल तभी क्यों विचारे जा रहे हैं जब गायों की चर्चा हो रही है ? जब हज़ारो किलोमीटर लम्बी सड़क, रेल पटरी बनती है तब भ्रष्टाचार और पर्यावरण के हवाले से ये क्यों नहीं कहा जाता कि यह feasible / व्यावहारिक नहीं है ? हमारे खेतों, जंगलों को सड़के, रेल पटरियां खा जाती है | सड़क बनाने में तारपीन का इस्तेमाल होता है, रेल पटरी में ना जाने कितना लोहा लगा है | फिर भी सड़के बनती हैं , रेल पटरियां बिछती हैं | कितने areas में mass स्तर पर सरकार काम कर रही है | सब कुछ achieve कर रही है | केवल गौरक्षा में ही फेल हो जाएगी ? क्यूंकि गौरक्षा उसके बस की नहीं | हैना गायों के प्रति मार्मिकता
यह आपका नहीं, बल्कि वामपंथियों का तर्क है कि आखिर हम गाय को माता क्यों माने ? वह महज़ एक जानवर है | व्यावहारिक लोग भी गाय को एक व्यावसायिक साधन मानते हैं |पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात | हम इंसान लोग , गाय या भैंस या बकरी के बछड़े के हिस्से का दूध , इन जानवरो से छीन कर पी जाते हैं | हम मुर्गा आदि जानवरो का व्यावसायिक उपयोग करते हैं | हमे किसने यह हक़ दिया कि हम इन जानवरों को मारे ? इनके बच्चो के हिस्से का दूध छीन कर पी जाएँ ?
बेदर्दी से इनको मारना , दूध के लिए इंजेक्शन लगाना , आदि , इन जीवों के साथ जानवरो जैसा सलूक तो हम इंसान करते हैं | और जानवर इनको बुलाते हैं |
अगर हम बूढ़े जानवरों को पाल नहीं सकते , तो हमे इनका मांस भी नहीं खाना चाहिए , इनका दूध भी नहीं पीना चाहिए | क्या इंसानो को सिर्फ छीनना आता है ? बदले में कुछ देना नहीं ? वाह रे इंसान , तेरी इंसानियत |जब ये जीव , हमारी ज़िन्दगियों में दखल नहीं देते , तब हम भी इन्हे बख्श क्यों नहीं देते ?प्कर्ति का नियम है , इकोसिस्टम के लिए ज़रूरी है , तब भी , थोड़ा तो रहम रखिये |

लेख की लेखिका शुजूको नाम से लिखती हे !