गौ रक्षा इसलिए जरुरी हे!

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by — शुजूको

( इन दोनों लेखो http://desicnn.com/blog/ban-on -beef-the-other-side-of-coin http://khabarkikhabar.com/archives/3307 के जवाब में ”शुजूको ” जी ने ये कमेंट लिखे थे जिन्हे लेख के रूप में दिया जा रहा हे )

गौ-पालन महंगा है :इस हिस्से में सही लिखा है कि गौ पालन का खर्चा बहुत है | ऐसे में दूध न देने वाली गाय को लोग क्यों पाले ?
एकदम सही बात कही है कि लोग गाय को चारे के लिए खुला छोड़ देते हैं , और वे प्लास्टिक कचरा या कीटनाशक खाने को मज़बूर हो जाती हैं | लेकिन ऐसाक्रूर व्यव्हार , दूध देने वाली गायों के साथ भी होता है | उन्हें भी चारा नहीं दिया जाता |बैल या बछड़े को आर्थिक कारणों से पाला नहीं जा सकता | लेकिन इनके बिना गौवंश का आगे बढ़ना और गाय का दूध देना भी असंभव है | इसलिए इन्हेव्यावहारिक रूप से क़त्ल नहीं किया जाना चाहिए | वर्ना गाय एक विलुप्तप्राय जीव बन जायेगी |इंसानो की तरह, गायों में भी सेक्स रेश्यो का संतुलन रखना ज़रूरी है | आपने चिड़ियाघरों में देखा होगा कि सेक्स रेश्यो गड़बड़ाने से कैसे कईबार जानवर की प्रजाति खतरे में पड़ जाती है | ये सोच कर खुश मत होईये कि गायो और बैलो की संख्या बहुत है | कभी दूसरे जीव जंतुओं की भी रही होगी |
आप कह सकते हैं कि इंसान तो मुर्गा और मछली को भी मारता है | तो इकोसिस्टम क्यों नहीं गड़बड़ाता | मेरे ख्याल से गड़बड़ाता तो होगा | लेकिन मुर्गी और मछली का पालन (poultry farming) किया जाता है | उनकी ब्रीडिंग की जाती है |

आपका ‘एनिमल-हसबेंडरी’, ‘काऊ-फार्मिंग’ और ‘गौ-आधारित इंडस्ट्रियल विकास’ वाले सुझाव भी अच्छे लगे | बस मुकेश अम्बानी जैसे लोगो के इस बिज़नेस में आने की ज़रूरत है |आपकी व्यापारियों को मुनाफे वाली बात भी सही है कि जब तक उन्हें मुनाफा ना हो , वे निवेश नहीं करते | इसलिए आपकी ‘टेक्नोलॉजी में विस्तार की ज़रूरत’ वाली बात से भी मैं सहमत हूँ |

आपकी इस बात को भी मैंने स्वीकार किया कि सरकार को गौ आधारित इंडस्ट्री के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी | और सरकार को गाय को आस्था का विषय बनाने से बचना चाहिए | गाय पर हर पार्टी और पत्रकारों की तरफ से राजनीति बंद होनी चाहिए | और सबको मिलकर व्यावहारिक धरातल पर ऐसी कोशिशें करनी चाहिए , जिससे गायो को कत्लखानो में भेजने की ज़रूरत ना पड़े और गायो को प्लास्टिक खाने की ज़रूरत भी ना पड़े |

सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के पॉइंट को भी स्वीकार करती हूँ | और इसके लिए मेरे पास कोई समाधान भी नहीं है | भ्रष्टाचार, इंसान की बढ़ती ज़रूरतों और दिखावे का नतीजा है | अब इंसान तो साधू बनने से रहा | तो भ्रष्टाचार किसी नियम-कानून-लोकपाल के सहारे ख़त्म नहीं किया जा सकता | हाँ , कम ज़रूर किया जा सकता है | बछड़ो के द्वारा फसल की बर्बादी :

सही मुद्दा उठाया है आपने | फसल किसान की मेहनत और हक़ है | गांव के मवेशी : गाय , बैल , बछड़ा , भैंस इत्यादि को उन्हें उजाड़ने नहीं दिया जा सकता | लेकिन क्या इस समस्या का हल यही है कि इन मवेशियों कि हत्या कर दी जाए ? कुछ समय पहले , इन्ही वजहों से नीलगाय को भी मारने की सरकार द्वारा अनुमति दी गयी है |बछड़ो को गौशाला में भी नहीं भेजा जा सकता क्यूंकि ऐसा करने पर गाय दूध देना बंद कर देगी | दूध दुहने के लिए बछड़े का गाय के सामने होना ज़रूरी है |लेकिन मवेशी की पहचान तो की जा सकती है कि उसका मालिक कौन है ? उनकी आधार नंबर टैगिंग की सरकार वैसे भी कोशिश कर रही है | ऐसे में सरकार को एक कानून बनाने की ज़रूरत पड़ेगी कि हर मवेशी कि पूरी ज़िम्मेदारी उसके मालिक की होगी | अगर उनका मवेशी किसी के खेत में कोई नुकसान करता है तो हर्जाना उनको भरना पड़ेगा |लेकिन बात सिर्फ गाय , भैंस की ही नहीं है , बल्कि नीलगाय और जंगली सूअरों की भी है | उनकी जान कैसे बचाये ? इन बेजुबान जानवरों को कहाँ पता है कि हद से ज्यादा मतलबी इंसान , इन्हे पेट भरने की ऐसी क्रूर सज़ा देगा ?

हल तो बाड़ लगाए जाने से ही निकलता दिख रहा है | लेकिन इतने लम्बे खेतो को कैसे कवर किया जाए ? इसके लिए खेतों की आउटर बॉउंड्री में बॉस या सीमेंट या फ्लाई ऐश (कोयले की राख) के दो खम्बे लगाने होंगे | उनके बीच में नारियल की रस्सी से बुनाई करनी होगी | जैसी सीमा पर की जाती है | चारो किनारो पर कुल चार खम्बे खड़े करने होंगे | कुछ कुछ चारपाई बुनने जैसा है ये | किसी जानवर में इतनी ताक़त तो नहीं होनी चाहिए कि वो मज़बूत रस्सियों और मज़बूत खम्बो की बाड़ को तोड़ सके | एक छोटे खेत पर शायद 4-8 चारपाई का खर्च आएगा | किसी जानवर की जान बचाने के लिए इससे अच्छा और सस्ता उपाए और क्या हो सकता है | कम से कम नीलगाय को मारने के लिए शूटर को नौकरी पर रखने से तो सस्ता पड़ेगा | हाँ , बीच में दरवाज़ा लगाना ना भूले | ऐसा दरवाज़ा , जिसे मुर्ख जानवर खोलना न सीख पाए |

इस बाड़ का एक और फायदा हो सकता है | जब बेमौसम बारिश में ओले पड़ने से फसल ख़राब होने का खतरा हो तो इस बाड़ पर तिरपाल/चादर ढककर फसल को बचाया जा सकता है | किसान अगर ट्रेक्टर , थ्रेशर आदि मशीने खरीद सकता है तो पुरानी चादरों को सिल कर तिरपाल क्यों नहीं बना सकता ? यदि फिर भी आर्थिक हालत ख़राब हो तो सरकार से क़र्ज़ लिया जा सकता है |

अब आप कहेंगे कि किसान को सपने आ रहे हैं कि कब बारिश होगी , ओले पड़ेंगे ? तो हर किसान को मौसम का एप अपने मोबाइल में डालना चाहिए | अक्सर सटीक भविष्यवाणी ही होती है | अगर मोबाइल नहीं है तो सरपंच के मोबाइल में डालना चाहिए , जो पूरे गांव को सतर्क कर दे |

हालाँकि मैं सुझाव देने से पहले सतर्क कर दूँ कि ओले जानलेवा भी हो सकते हैं | इसलिए ओले आने के बाद तिरपाल लगाने ना जाएं | हो सके तो एक दिन पहले ही यह कर लें | साथ ही चादर मज़बूत हो और मज़बूती से बांधी जाए | भूसे का गणितजिस कंबाइन हार्वेस्टर मशीन कि बात आप कर रहे हैं उसे हरियाणा के कुछ स्थानीय लोग ‘हडम्पा’ कहते हैं | सही है कि ये मशीन तूड़े को नीचे ही छोड़ देती है | लेकिन खेतों में आग लगाना तो वैसे भी गैर कानूनी है | आप क्यों किसानो की ऐसी हरकत का समर्थन कर रहे हैं जो गैर कानूनी है , प्रकृति के लिए नुकसानदेह है और आर्थिक दृष्टि से भी मूर्खता भरा कदम है |

आपने खुद बताया कि भूसा दस रूपए किलो के भाव से बिकता है | मेरी ख्याल में गेहूं बीस रूपए किलो के भाव बिकता होगा | तो जो चीज़ आधी कीमत पर बिक जाती है , किसान उसे जला कर अपना नुकसान क्यों करते हैं ? थोड़ी सी एक्स्ट्रा मेहनत करके अपने मुनाफे को डेढ़ गुना या दुगना क्यों नहीं कर लेते ? मेरे ख्याल . भूसा तो गेंहू से लगभग दुगना ही होता होगा न खेत में ?

आपने कहा कि भूसे की कटाई , प्रोसेसिंग पर अलग से छह से दस रूपए प्रतिकिलो खर्च आएगा | इसका मतलब गेंहू पर भी इतना ही खर्च आया होगा ? और गेंहू की बुवाई में अलग से खर्चा और मेहनत लगी होगी ? तो किसान की बचत भी ना के बराबर रही होगी ? फिर भी किसान गेंहू बोना नहीं छोड़ता | तो भूसे की कटाई भी करा ही ले | क्या पता प्रतिकिलो एक रूपए का फायदा ही हो जाये ?

साबुन की जो टिकिया बाजार में दस रूपए में बिकती है , उसपर कंपनी कितना कमा लेती होगी ? आधा या एक रुपया , ज्यादा से ज्यादा | फिर भी कंपनी लाखो – करोड़ो कमाती है | ज्यादा सेल की वजह से |तो सोचिये , अगर किसान के एक खेत में एक क्विंटल भूसा निकल आये तो वो एक रूपए के हिसाब से भी हज़ार रूपए कमा लेगा | और चार रूपए के हिसाब से चार हज़ार रूपए | अगर अच्छी उपज हो तो एक खेत में चार क्विंटल अनाज होता है और कम से कम उतना ही तूड़ा | तो इस हिसाब से किसान का मुनाफा बैठा सोलह हज़ार रूपए | अगर एक किसान के पास करीब पांच हेक्टेयर के खेत हो तो तूड़े से मुनाफा बैठा अस्सी हज़ार रूपए | तो बताइए , एक किसान अपने अस्सी हज़ार रुपयों को क्यों आग लगा देता है ?

गोबर गैस संयंत्र
आपने पुछा कि आप गोबर गैस संयंत्र लगा कर बुद्धिमानी का परिचय देंगे ?
आपका तो पता नहीं , लेकिन हर गांव में (संयुक्त रूप से) ऐसा एक संयंत्र ज़रूर होना चाहिए | आज नहीं तो कल , लगाना ही पड़ेगा | गोबर एक संसाधन है | उसको बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए | मैं खुद, शहरी सीवर के निपटारे के लिए बायोगैस प्लांट के उपयोग के बारे में सोच रही थी | लेकिन शहरी सीवर के कचरे में डिटर्जेंट , फिनाइल , एसिड और हार्पिक जैसे केमिकल हो सकते हैं | सड़ चुके सीवर कचरे को सीधे खेतों में डालना उपयुक्त नहीं होगा | इससे ज़मीन बंजर हो सकती है | बस इसी वजह से शहरी सीवर पर गोबरगैस प्लांट के उपयोग में अड़चन दिखाई देती है |

आपकी समस्याओं के हल इस प्रकार हैं :-
1. गांव में एक संयुक्त गोबर गैस प्लांट लगाया जाए , जिसका सञ्चालन पंचायत कि देख रेख में हो | हर किसान से बराबर राशि ली जा सकती है | अगर एक गांव में हज़ार किसान हैं तो हर किसान को दो सौ रूपए देने होंगे |
2. अगर सरकारी खर्चे पर सरकारी प्लांट लग जाए , जिसका सञ्चालन सरकार करे तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता | किसान को उसके लाये गोबर की कीमत दे दी जाए , बस | जो मुनाफा हो , वो सरकार रखे |
3. सड़ चुके गोबर को निकलने के लिए बूस्टर पम्पिंग मशीन की सहायता ली जा सकती है | गोबर डालने के लिए तो बाकायदा गढ्ढा बनाया जाता है जिसमे पानी के सहारे गोबर को नीचे धकेला जाता है |
4. गोबर गैस का व्यावसायिक उपयोग अभी भले ही ना हो, पर आने वाले वक़्त में ज़रूर होगा | क्या पता मेरे जैसा कोई वैज्ञानिक गोबर गैस से गाड़ी चलाने के बारे में सोच रहा हो | आपसे गुज़ारिश है, कृपया मेरे आईडिया को कहीं बेच ना आईयेगा | ऊर्जा है , तो उपयोग की कमी नहीं |
5. आपने संयंत्र से निकलने वाली खाद की तो बात ही नहीं की | क्या उस खाद की वजह से हम केमिकल खाद के दुष्परिणामों से बच नहीं जायेंगे ? और केमिकल खाद के पैसे भी बचेंगे |
6. गौमूत्र को भी बायोगैस संयंत्र में ही डालना चाहिए | बल्कि अभी गांवों में सीवर नहीं हैं | तो एडवांस सीवर लगाए जा सकते हैं | घरो में शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, लोग केवल पानी से ही फ्लश करें | इस प्रकार सारा सीवर का कचरा सीधा बायोगैस प्लांट तक पहुंचा दिया जाए | अब जिस दिन लोगो को शौचालय की हार्पिक आदि से सफाई करनी हो , उस दिन एक बटन दबा कर सीवर के वाल्व को बंद कर दिया जाए (जो बायोगैस प्लांट तक जाता है) और दूसरा वाल्व खोल दिया जाए (जो दूसरी नाली में जा रहा हो) | लेकिन इसमें समस्या ये है कि हमारे देश में लोग इतने जिम्मेदार कहाँ जो वे एक बटन दबा कर भी पर्यावरण को बचाने की सोचें | शहरो में सरकार कह कह कर थक गयी कि सूखे और गीले खचरे को अलग रखिये , पर किसी ने माना ? औरों की तो छोड़िये , लेकिन सो कॉल्ड जिम्मेदार नागरिकों ने भी माना ? मासांहार

मांसाहार पर प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय हो सकती है | मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि मांसाहार या शाकाहार का फैसला लोगो पर छोड़ देना चाहिए | सरकार जितना इस मुद्दे को उछालेगी, उतने ही ज्यादा हालात बिगड़ेंगे | लेकिन जिन लोगो में दया भावना है , वे लोग किसी भी पशु को कटते नहीं देख सकते | चाहे वो मुर्गी हो, बकरा हो, मछली हो या गाय या भैंस | इसलिए, वे मांसाहार का विरोध करते हैं | हाँ कुछ लोग राजनितिक/धार्मिक कारणों से भी ऐसा करते हैं |मांसाहार का वैज्ञानिक पहलु ये है कि अनाज के पौधों की हत्या की तुलना में जानवरो की हत्या ज्यादा कष्टप्रद है | जानवरो (इंसान समेत) के सेल पर सेल वाल नहीं होती | सिर्फ बाल और नाख़ून के सेल पर होती है | इसलिए बाल या नाखून काटते वक़्त दर्द नहीं होता | लेकिन दूसरे अंगों पर चोट लगने पर दर्द होता है | क्यूंकि जानवरो के शरीर में ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम और नर्वस सिस्टम होता है | और दिमाग भी होता है | नर्वस सिस्टम का काम यही है कि शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से (जैसे त्वचा) को यदि कुछ चोट पहुंचाने लायक वस्तु छूती है तो नर्वस सिस्टम दिमाग को सिग्नल भेज देता है | दिमाग तुरंत उसपर एक्शन लेता है कि अपना बचाव कैसे किया जाए | इसलिए जानवर तड़प तड़प कर मरता है |

पौधों के सेल पर सेल वाल रहती है | और उनमे खून , ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम , नर्वस सिस्टम और दिमाग नहीं होता , इसलिए उन्हें काटने पर दर्द भी नहीं होता |मेरे जैसे शाकाहारियों का यही तर्क है कि अपने स्वाद के लिए मैं किसी जीव को तड़पा तड़पा कर क्यों मारुं ? अगर इंसानो की हत्या अपराध है तो जानवरो की हत्या क्यों नहीं? उन्हें भी तो उतना ही कष्ट होता है जितना इंसानो को | हालाँकि किसी दूसरे से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह शाकाहारी है या मांसाहारी | सबके अपने अपने कर्म हैं | सबकी अपनी अपनी चॉइस है |

‘मांसाहार के डिमांड और सप्लाई वाले’ और ‘गायों, बैलो और बछड़ो के दूध ना देने की वजह से क़त्ल वाले’ आपके तर्कों के बारे में मेरा यह सवाल है कि दूध तो कुत्ते, बिल्ली और चूहे भी नहीं देते (मतलब इतना नहीं देते कि इंसान पी सके, हालाँकि ये सब स्तनधारी जीव हैं), तो इनका मांस क्यों नहीं खाया जाता ? इंसान के शरीर में भरपूर गोश्त है , तो इंसान इंसान को क्यों नहीं खाता ? वैसे भी इंसानो की जनसँख्या से इकोसिस्टम गड़बड़ाया हुआ है | बंगाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

हमे अगर बंगाल और पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा करनी ही है तो देश के विकास में करनी चाहिए , नाकि बेजुबान पशुओं की हत्या में | आर्थिक फायदे के लिए क्या हम पशुहत्या का कोई विकल्प नहीं खोज सकते ? इंसानो को जीने का अधिकार है , पशुओं को नहीं ?
जहाँ तक , सीमा पर पशु तस्करी का सवाल है , तो फिलहाल , पशु तस्करी (एक्सपोर्ट) रोकने से ज्यादा आतंकवादियों की (इम्पोर्ट) तस्करी रोकना ज्यादा अहम् है |

ब बात आपके इस लेख के सन्दर्भ में कर ली जाए :-
http://khabarkikhabar.com/a…
आपकी सारी चिंता , देश में भ्र्ष्टाचार , आर्थिक हालात , संसाधनों की कमी को लेकर दिखती है | आपने मेरी किसी मांग को अनुचित नहीं ठहराया है | बस आपको मेरी मांगे आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं लगी | आपको गौसेवा को लेकर कोई उम्मीद भी नहीं दिखती | आपकी सारी बाते जायज़ हैं | उम्मीद मुझे भी कम ही है, और भ्रष्टाचार से मैं भी इंकार नहीं कर रही | देश की अर्थव्यवस्था भी पटरी पर नहीं है |

लेकिन ये सभी पक्ष केवल तभी क्यों विचारे जा रहे हैं जब गायों की चर्चा हो रही है ? जब हज़ारो किलोमीटर लम्बी सड़क, रेल पटरी बनती है तब भ्रष्टाचार और पर्यावरण के हवाले से ये क्यों नहीं कहा जाता कि यह feasible / व्यावहारिक नहीं है ? हमारे खेतों, जंगलों को सड़के, रेल पटरियां खा जाती है | सड़क बनाने में तारपीन का इस्तेमाल होता है, रेल पटरी में ना जाने कितना लोहा लगा है | फिर भी सड़के बनती हैं , रेल पटरियां बिछती हैं | कितने areas में mass स्तर पर सरकार काम कर रही है | सब कुछ achieve कर रही है | केवल गौरक्षा में ही फेल हो जाएगी ? क्यूंकि गौरक्षा उसके बस की नहीं | हैना गायों के प्रति मार्मिकता
यह आपका नहीं, बल्कि वामपंथियों का तर्क है कि आखिर हम गाय को माता क्यों माने ? वह महज़ एक जानवर है | व्यावहारिक लोग भी गाय को एक व्यावसायिक साधन मानते हैं |पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात | हम इंसान लोग , गाय या भैंस या बकरी के बछड़े के हिस्से का दूध , इन जानवरो से छीन कर पी जाते हैं | हम मुर्गा आदि जानवरो का व्यावसायिक उपयोग करते हैं | हमे किसने यह हक़ दिया कि हम इन जानवरों को मारे ? इनके बच्चो के हिस्से का दूध छीन कर पी जाएँ ?
बेदर्दी से इनको मारना , दूध के लिए इंजेक्शन लगाना , आदि , इन जीवों के साथ जानवरो जैसा सलूक तो हम इंसान करते हैं | और जानवर इनको बुलाते हैं |
अगर हम बूढ़े जानवरों को पाल नहीं सकते , तो हमे इनका मांस भी नहीं खाना चाहिए , इनका दूध भी नहीं पीना चाहिए | क्या इंसानो को सिर्फ छीनना आता है ? बदले में कुछ देना नहीं ? वाह रे इंसान , तेरी इंसानियत |जब ये जीव , हमारी ज़िन्दगियों में दखल नहीं देते , तब हम भी इन्हे बख्श क्यों नहीं देते ?प्कर्ति का नियम है , इकोसिस्टम के लिए ज़रूरी है , तब भी , थोड़ा तो रहम रखिये |

लेख की लेखिका शुजूको नाम से लिखती हे !

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4 thoughts on “गौ रक्षा इसलिए जरुरी हे!

  1. zakir hussain

    शुजुका जी अच्छी चिंतक है, इस साइट पर अगर सक्रिय हुई तो बाकी पाठकों को भी अच्छी चर्चा का आनंद मिलेगा.

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    rakesh Gautam हे भोले बकरों।
    तुम इन झूठे, लंपट पशुप्रेमियों की बातों में मत आना,
    जीवन एक संग्राम है, मुक्ति ही समाधान है,
    तुम्हारी इज़्ज़त ही इस वजह से है की तुम कटते हो,
    जिस दिन इन झूठे पशु प्रेमियों की बातों में आकर तुमने कटना बन्द किया,
    उसी दिन तुम आवारा हो जाओगे और चारे की जगह पॉलीथिन, कूड़ा करकट और यहां तक के लठ खाने पड़ेंगे।
    ये सारे पशुप्रेमी शहरी पपलू हैं, ये फिर तुम्हे आवारा पशु कह कर अपने शहरों से दूर हमारे गांवो में धकेल देंगे,
    अपने urban estate में ये तुम्हारी छांव तक नही पड़ने देंगे, फर
    देखो भाई बकरों, हमारे गांवो में इनकी माता और पिता गाएं ने ही तबाही मचा रखी है, उस के साथ हर रोज़ हमारा संग्राम होता है, लठपुजारी होती है,
    तुम बेचारे तो एक लठ भी सहन नही कर पाओगे, इनकी माताएं और पिता तो फिर भी 8-10 लठ सहन कर लेते है।
    इन लंपट के माता पिता तक आवारा तो मेरे भाई बकरों हमारे गांवो से बहुत अच्छा है तुम्हारा बाड़ा,
    हमारे गांवो में मत आना भाई लोगो,
    तुम ईद पर यूँ ही कटते रहना, लोगो को यूं ही जन्नत का रास्ता दिखाते रहना,
    मत आना भाई बकरों इन झूठो की बातों में। rakesh Gautam ———————————————————————-Sanjay Shraman Jothe30 August at 09:45 ·क्या देशप्रेम का ठेका आयुर्वेद और प्राणायाम ने ही ले रखा है? क्या सिर्फ शाकाहारी ही देशप्रेम के गीत गा सकते है? शिलाजीत, और कपालभाति में जितना देशप्रेम उभरता है उतना ही देसी चिकन करी और बिरयानी से क्यों नहीं उभर सकता?
    दलितों आदिवासियों के अपने रोजगार हैं। चिकन, बकरा बकरी, सब्जी भाजी, दूध इत्यादि कई रोजगार हैं। इन सबसे देश की असली सेवा होती है।
    भाई कुलदीप के पोल्ट्री फार्म से चिकन खरीदिये और उससे स्वदेशी पकवान बनाइये। पिज्जा बर्गर फ्रेंच फ्राइज जैसे विदेशी पकवानों का मोह छोडकर देसी पकवान बनाइये और अमूल्य भारतीय मुद्रा को विदेश जाने से बचाइये।
    देशप्रेम दर्शाने का हर भारतीय का अपना तरीका और अधिकार है। हर जाति वर्ण और समुदाय अपने ढंग से देशप्रेम की घोषणा करें। किसी एक रंग के देशप्रेम का कोई परमानेंट ठेका नहीं है।
    अपना अपना देशप्रेम अपनी भाषा मे व्यक्त कीजिये और धूर्तों की देशप्रेम की मोनोपाली को टक्कर दीजिये।Sanjay Shraman Jothe—————-kuldeep Pahad added 2 new photos — feeling जन्मदिन स्पेशल with Munesh Bhumarkar and 9 others.
    30 August at 09:37 ·
    #स्वदेशी_पकवान_खाइए, #विदेशी_लूट_से_छुटकारा_पाइए
    मैकडोनाल्ड और KFC जैसीे विदेशी कम्पनियों के विदेशी पकवान जैसे बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राई और चिकन खाकर आप देश की अमूल्य मुद्रा विदेशों में भेज रहे हैं।
    आप हमारे अपने स्वदेशी चिकन और स्वदेशी चिकन करी, टिक्का, बिरयानी, तंदूरी चिकन जैसे लजीज भारतीय पकवान खाइये।
    भारत की अर्थव्यवस्था एवं भारतवासियो को मजबूत कीजिये।
    हमारे जय भारत पोल्ट्री पर स्वदेशी चिकन और बाबा फेमिली रेस्टोरेंट & ढाबे पर स्वदेशी पकवान ऑर्डर कीजिये और देशभक्ति – देशप्रेम का परिचय दीजिये।
    देश को विदेशी लूट से बचाइए।
    भारत माता की जय
    जय भीम जय भारत
    आपका अपना साथी
    कुलदीप पहाड़
    8982291148-more comments
    Kuldeep Pahad
    Kuldeep Pahad क्या सिर्फ शाकाहार ही देश प्रेम का प्रतिक है जबकि जिस समय यह भारत देश सोने की चिड़िया हुआ करता था उस समय चमड़े का व्यापार सबसे बड़ा काम था इस देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का।
    और आज भी मांशाहार एक बड़ी इकाई है देश को मजबूत अर्थ नीति देने के लिएudhir Meshram कंहा है भाई ये ढाबा
    See translation
    Like · 2 · 31 August at 16:26
    Manage
    Kuldeep Pahad
    Kuldeep Pahad मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में भोपाल नागपुर हाइवे 47 पर ससुन्द्रा चेकपोस्ट के पास

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  3. सिकंदर हयात

    Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    15 September at 09:55 · Dehra Dun ·
    देहरादून से लखनऊ की फ्लाइट में सवारी सीट पर कुत्ता ले जाने की ज़िद पर अड़े यात्री को समझदार पायलट ने उतार दिया , तो कुत्ता पति ने तूफान खड़ा कर दिया । दर असल जहाज़ में कुत्ता ले जाने की छूट देने का नियम अंग्रेजों ने बनाया था , जिनकी मेमें काले भारतीयों से घृणा करती थीं , जबकि काले कुत्ते स——————– मैं बार बार कहता हूं कि कुत्ता रखने का अधिकार सिर्फ किसान , चरवाहे , बागवान , ग्रामीण , व्याध और घमन्तु मनुष्य को है , जिनके लिए कुत्ता उपयोगी है । इसके सिवा शहरों में स्टेटस और शौक़ के लिए कुत्ता रखने वाले अव्वल दर्जे के घामड़ हैं । जिसके घर मे कुत्ता होता है , में कभी दुबारा उसके घर नहीं जाता । उसका कुत्ता कभी मुझ पर भौंक कर मुझे अपमानित करता है , तो कभी नाश्ते के वक़्त अपनी थूथनी से मेरी देह सूंघने लगता है । कुत्ता स्वामी सुबह सुबह दूसरों के गेट पर कुत्ते से टट्टी करवाता है । नौकर को पूरी पगार नहीं देता , जबकि कुत्ता को मंहगे बिस्कुट खिलाता ।
    शहरों में कुत्ता रखने पर पाबंदी लगे । तमाम शहरी कुत्तों को पकड़ उत्तराखण्ड के बनों में छोड़ दिया जाए , जहां शिकार के अभाव में बाघ बस्तियों में आ रहे हैं । शहर में कुत्ता रखने वालों का बायकाट कीजिये । उन्हें बताइये कि कुत्ता रहने से उनकी शान नहीं बढ़ रही , बल्कि वह असामाजिक सिद्ध हो रहे हैं । एक बार में एक परिचित के लॉन में बैठ चाय पी रहा था , कि छोटा खरगोश कुत्ता उछल कर मेरी गोद मे आ बैठा । मैंने उस पर गर्म चाय उंडेली तो किकिया कर भागा । मैने पूछा – क्यों रखा तूने यह बदतमीज़ कुत्ता ? तो उसकी बेटी मुझ पर गुस्सा हुई कि इसने हमारे हनी को कुत्ता बोला ।
    में सम्बंधित पायलट को बधाई देता हूँ । चलते जहाज़ में कुत्ता अपनी पर आकर किसी को काट सकता था , अथवा उपद्रव कर सकता था ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    15 September at 21:04 · Dehra Dun ·
    कुत्ता कलंक कथा -2
    —————
    मेरी शहरी कुत्ता विरोधी पिछली पोस्ट पर कई अजब तर्क आये हैं । पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं नगर – पुरी में कुत्ता पाले जाने का विरोधी हूँ , ग्राम्य तथा वन प्रान्तर में नहीं ।
    एक ने कहा है – कुत्ता से अधिक स्वामी भक्त तथा वफादार कोई नहीं । ” बराबर है , लेकिन कई मनुष्य भी अपने स्वामी के प्रति इतने वफादार तथा भक्ति से ओतप्रोत होते हैं , कि स्वामी के इंगित पर अन्य मनुष्यों को मार डालते हैं , अथवा मरवा देते हैं । यह कुत्ता नुमा स्वामी भक्ति अंततः मनुष्य विरोधी है ।
    दूसरे ने जीव दया एवं पशु प्रेम का हवाला दिया है । अगर आप सचमुच पशु प्रेमी हैं , तो घर मे अपने बंगले या फ्लेट में बकरी पालिये । कुत्ते जितनी ही जगह घेरेगी । दूध देगी । बकरी की मेग्नी सर्व श्रेष्ठ जैविक खाद है । किसी को काटेगी नहीं । कुत्ते से कम खर्च में पलेगी । भौंक कर भय तथा आतंक नहीं फैलाएगी , तथा सोते वक्त मालकिन की रजाई में भी नहीं घुसेगी ।
    किसान , चरवाहे , बागवान अथवा आखेटक का कुत्ता एक श्रम जीवी प्राणी है , जबकि शहरी कुत्ता टुकड़खोर है । इसी लिए दुम हिलाता है , तथा तलवे चाटता है । शहरों में जानवरों की डॉक्टरी पढ़ कर आये जन भी गाय , बकरी , भैंस आदि उपयोगी मवेशियों की बजाय कुत्ते के इलाज में रुचि लेते हैं , क्योंकि उसमें फीस भारी मिलती है ।एक का तर्क है कि गांधी भी पानी के जहाज में अपनी बकरी को विलायत ले गए थे । अवश्य ले गए थे । लेकिन गांधी अपनी बकरी का दूध पीते थे , तथा उनकी बकरी किसी को काटती नहीं थी । क्या आप भी अपने कुत्ते का दूध पीते हैं ?
    निदान यह कि शहर में कुत्ता पालन अन्न और धन की निर्मम बर्बादी है , अतः शहरों में कुत्ता पालन पर सख्ती से रोक लगे । कुत्ता पति की काउंसलिंग की जाए । कुछ दिन सदमे से उबारने के लिए उन्हें प्लास्टिक अथवा रबर का कृत्रिम कुत्ता दिया जाए ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    Yesterday at 09:53 · Dehra Dun ·
    उत्तराखण्ड में हज़ारों सरकारी स्कूलों को बंद कर , शिशु मंदिरों को बढ़ावा देने की योजना भारी अपशकुन है । राज्य के पहाड़ी इलाक़ों में कुछ समय से गुटखा और शिशु मंदिर दूरस्थ गांवों तक पँहुच चुके हैं । ये दोनों कैंसर की जड़ हैं । एक से मुंह का कैंसर होता है , तो दूसरे से साम्प्रदायिकता का । अबोध बच्चों को संघ जैसी भयावह विचारधारा की ज़हरीली घुट्टी पिलाना अमानवीय है । जिस तरह 18 साल से कम उम्र के बच्चों को नशीले पदार्थ अथवा तम्बाकू बेचने पर रोक होती है , उसी तरह वयस्क होने से पहले उन्हें संघ परिवार , जैशे मुहम्मद , आईएस , तालिबान अथवा बब्बर खालसा जैसे हिंसक आतंक वादी संगठनों में भेजे जाने पर उनके अभिभावकों के विरुद्ध कार्रवाई हो । संघ पोषित ज़हरीली शिक्षा की बजाय बच्चों का अपढ़ रहना अधिक श्रेयष्कर है । शांत पहाड़ों में इस तरह की गतिविधि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक है ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    13 hrs · Dehra Dun ·
    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर सम्बन्धी मेरी विगत पोस्ट पर संघ प्रिय मित्रों ने भारी क्रंदन और कोलाहल किया है । कृपया आप लोग दिल पर न लें । आपका दिल नहीं दुखाना चाहता । ….मैं बात को कुछ बढा चढ़ा कर कहने का आदी हूँ । लम्बे समय तक अखबार में क्राइम रिपोर्टर रहा , और कुछ वक्त चैनल का स्ट्रिंगर भी रहा , अतः मुझसे बात का बतंगड़ स्वतः ही बन जाता है । आपकी आश्वस्ति के लिए मैं श्री संघ प्रिय गौतम को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ , जो संघी होते हुए भी सफेद नेहरू कैप पहनते थे , और दलित होकर भी जनरल सीट से चुनाव जीते थे । अन्यथा बाबा साहेब अंबेडकर या बाबू जगजीवन राम भी जनरल सीट से लड़ने का साहस न जुटा पाए ।
    दूसरी बात यह कि गौतम बुद्ध के काल मे भी संघ का अस्तित्व प्रतीत होता है । सम्राट अशोक की पुत्री का संघ मित्रा नाम इसका सबूत है । साथ ही बुद्ध भगवान अपने युग्म को संघ ही कहते थे ।
    लोकापवाद पर श्री कृष्ण ने भी मथुरा का युद्ध छोड़ दिया , और रणछोड़ कहलाये । लेकिन मेरे लिए यू टर्न लेना समीचीन नहीं है । अतः अपनी मिनिमम डिमांड पर आता हूँ । 1:- शिशु मंदिर आचार्यों को यथेष्ठ वेतन मिले , ताकि उन्हें रात्रि भोजन हेतु दर दर न भटकना पड़े । 2:- राजनैतिक अथवा धार्मिक संगठनों द्वारा संचालित स्कूल , मदरसा इत्यादि की नियमित एवं निष्पक्ष जांच हो कि कहीं वह शिक्षण से इतर अन्य एजेंडा तो बच्चों पर लागू नहीं कर रहे ? 3:- चुनाव के वक़्त आचार्यों से दर दर वोटों की भीख न मंगवाई जाए ।
    साथ ही यह कि चाहे रामदेव कि दवा से अमृत सदृश फायदा होता हो , पर मैं कभी उसकी दवा नहीं ले सकता , क्योंकि उसका उद्देश्य कलुषित है । तथा यह भी कि हो सकता है संघ संचालित स्कूलों की शिक्षा सर्व श्रेष्ठ हो , लेकिन मैं अपने किसी पालित को उनमे पढ़ाने की सोच भी नहीं सकता , क्योंकि उनकी मूल अवधारणा में साम्प्रदायिकता निहित है ।
    भारतीय मनीषा में सदियों पहले ही घोषित किया गया था – संघे शक्ति कलियुगे । यही उक्ति फलित होती प्रतीत हो रही है । अस्तु , बी कूल & कॉम ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    4 hrs · Dehra Dun ·
    पूरा शहर बंधक बना लिया गया । रास्तों के रुख मोड़ दिए । भद्दे झंडों और बैनर पोस्टर से पुर का हुलिया बिगाड़ दिया । क्या यही है vip कल्चर की समाप्ति ?——————————-Vishnu Nagar
    7 hrs ·
    गुजरात से भाजपा के लिए बुरी खबर,जहाँ जल्दी ही विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं।
    गिरिराज किशोर की पोस्ट सेः
    गुजरात में नहीं चली मोदी लहर, भाजपा की हुई ऐसी हार ..
    By openkhabar – September 18, 2017
    अहमदाबाद। लगभग 2 दशकों से गुजरात की सत्ता पर काबिज बीजेपी को ग्रामीण इलाकों में भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। यहाँ पर पंचायती चुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी को जबरदस्त झटका दिया है। कांग्रेस ने बीजेपी की 31 में से 21 जिला पंचायतों पर अपना कब्जा कर लिया है।
    इसके साथ ही बीजेपी के पास अब सिर्फ 6 पंचायतों पर ही सत्ता रह गयी है। बात दें कि 2010 में सिर्फ 2 जिला पंचायत थीं। लेकिन कांग्रेस ने इस बार बड़ा छलांग लागते हुए 21 पंचायतों पर अपना कब्जा कर लिया है।जानकारी के मुताबिक गुजरात के तालुका पंचायतों में 4778 सीटें थीं, जिनमें कांग्रेस ने 2509 जीती है वहीँ बीजेपी ने 1981 जीती हैं।
    वहीँ दूसरी तरफ बीजेपी ने शहरी इलाकों में अपना दम-ख़म दिखाया है यहाँ पर नगर निगम चुनावों में 6 नगर निगमों और 56 में से 40 नगर पालिकाओं पर कब्जा जरूर किया है, लेकिन इसमें भी कांग्रेस के लिए अच्छी खबर छिपी हुई है। कांग्रेस ने नगर निगमों में 2010 के चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। 6 में से 5 नगर निगमों में बीजेपी की सीटों की संख्या घटी है।
    इन चुनावों में बीजेपी की इस तरह से हार सरकार के लिए बेहद शर्मनाक बतायी जा रही है मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के गांव खरोड़ और उनके तालुका पंचायत बहुचराजी में भी हार का सामना करना पड़ा है। बीजेपी के लिए राहत की बात बस शहरी इलाकों से आई है, जहां 56 नगर पालिकाओं में से उसने 40 पर कब्जा किया है, जबकि कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं।
    चुनावी नतीजों पर नज़र डालने पर कुछ और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। विधानसभा सीटों के लिहाज से इन नतीजों को देखा जाए तो 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 90 पर कांग्रेस को बढ़त मिली है, जबकि बीजेपी 72 सीटों आगे रही है। फिलहाल बीजेपी के पास 116 सीटें हैं,
    जबकि कांग्रेस के पास 60।गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए खुशखबरी भले ले आए हों पर इसका श्रेय राज्य में हार्दिक पटेल की अगुआई में हुए पटेल आंदोलन को देना ज़्यादा उचित होगा। पटेल आंदोलन का ही असर है जिसके कारण ग्रामीण इलाकों के साथ ही बड़े शहरों में भी कांग्रेस ने पिछले बार के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है।
    See Vishnu Nagar
    Yesterday at 09:33 ·
    अगर आज की तारीख़ में कोई पूछे कि दुनिया की या चलिये सीमित करते हुए कहते हैं कि भारत की कौनसी युवती सबसे सुंदर है तो एक पिता की नज़र से मैं कहूँगा कि पी़ वी़ सिंधु।कई बार बता चुका हूँ मगर फिर दोहराता हूँ कि खेल में मेरी दिलचस्पी लगभग नहीं है और क्रिकेट तो मुझे क़तई पसंद नहीं लेकिन पी टी उषा को मैं आज तक नहीं भूल पाता और अब पी वी सिंधु को।सौंदर्य गोरे रंग में भी होता है मगर गोरा रंग ही जो देखते हैं ,मेरी नज़र में वे दुनिया के मूर्खतम लोगों में से हैं।सौंदर्य पूरे व्यक्तित्व में बसता है और वह किसी में भी हो सकता है।बच्चे चाहे कैसे हों, चाहे उनकी नाक बह रही हो ,चाहे कई दिनों से नहाये न हों, चाहे बच्ची के बाल अनसुलझे हो, फ़्रॉक यहाँ -वहाँ से फटी हो,कंधे पर मुश्किल से ठहर पा रही हो, वे अनिवार्य रूप से सुंदर लगते हैं,दुनिया का अनोखा तोहफ़ा हैं वे, जिनके बिना जीना शायद मुश्किल होता। यह अलग बात है कि जवानी बीतते -बीतते बल्कि उससे बहुत पहले भी उन्हीं में से अनेकानेक बच्चे (सभी नहीं वरना जीना व्यर्थ होता!)क्या से क्या बन जाते हैं, धूर्त ,चालाक, कमीने और अपना सौंदर्य खो देते हैं या शायद हमीं , हमारी दुनिया बहुतों को ऐसा बना देती है।जवान भी अपने स्वाभाविक यौवन के साथ ही दुनिया को अक्सर सुंदर बनाने का सपना लिये होते हैं तो सुंदर लगते हैं।उम्र धीरे धीरे बहुत बार हमें एक घटिया, पाखंडों , झूठा इन्सान बना देती है , इसलिए अपनी उम्र के मध्यवर्गीय और उससे ऊपर ते वर्ग के -ख़ासकर पुरुषों को देखकर-उनसे मिलकर कई बार बहुत निराशा होती है बल्कि स्त्रियाँ बूढ़ी होकर भी अपने स्वाभाविक-मानवीय सौंदर्य कई बार बचा ले जाती हैं।उनका सबसे बड़ी समस्या पुरुषों के साथ ही उनका पितृसत्तात्मक पालन पोषण ,जाति ,धर्म के कुसंसकार बन जाते हैं।
    विषय से बहुत भटक गया मगर सिंधु का सौंदर्य उसके ग़ज़ब के धैर्य, उसके चेहरे की मुस्कान, घमंड से चूर न होकर जीत को सहज भाव से लेने में है।प्रतिद्व्दिता में सफल होने का दृढ़ संकल्प लेकर भी प्रतिद्वंदी के प्रति औदार्य है।उसका यह सौंदर्य हमेशा बना रहेगा , हालाँकि चूँकि सारे खेलों का ताल्लुक़ आपके शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है तो कोई भी जीवनभर खेलों के शिखर पर नहीं रह सकता।ख़तरा यही है कि विज्ञापन की दुनियावाले उसे ऐसा जकड़ सकते हैं कि सचिन की तरह पैसा ही उसका माईबाप बन सकता है।Vishnu Nagar
    14 September at 07:42 ·
    संघी अब हमें वामी कहते हैं,कहें ,हमें शर्म नहीं आती।संघियों को न जाने कब से तोते की तरह रटना सिखा दिया गया है कि वामियों को हिंदुओं की चिंता नहीं होती।हमें तो जो संघी हैं, उनकी भी चिंता होती है कि ज्ञान और संवेदना का इतना सुंदर इलाक़ा ख़ाली पड़ा है, वहाँ आकर खुली हवा नें साँस क्यों नहीं लेते,लें , तो ताज़ा हवा मिलेगी,जान में जान आएगी।संघ के लेखकों को पहले ध्यान से पढ लें,फिर विवेकानंद, महात्मा गाँधी,प्रेमचंद आदि आदि को भी पढ़ लें ,फिर जवाहर लाल नेहरू भी हिंदू ही थे, उन्हें भी पढ लें।भीष्म साहनी भी हिंदू ही थे, उन्हें भी पढ लें, वग़ैरह ।फिर कुछ और इच्छा भी अपनेआप होगी पढ़ने -देखने की, फिर किसी को बताना नहीं पड़ेगा।
    संघियों की नज़र में कश्मीरी शरणार्थी ही हिंदू हैं तो भई घर किसी को भी स्वेच्छा से छोड़ना पड़े ,बुरा है।लेकिन अब सरकार आपकी है , आप रास्ता निकालिए कि वहाँ वे फिर जा सकें।हमें क्यों दोष देते हैं, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कीजिये।और कश्मीर भारत का ही हिस्सा है, कुछ लोग उसे भारत का मुकुट भी कहते हैं तो वहाँ के जो छात्र पढ़ने या नौकरी करने यहाँ आते हैं,उनके साथ इनसानियत का व्यवहार कीजिए।फिर सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारिये, वहाँ जो बच्चे ढेर के ढेर मर रहे हैं,उनमें ज्यादातर हिंदू ही हैं।अस्पतालों की दशा सुधारना भी एक तरह से हिंदुओं की दशा सुधारना है, जो आज प्राइवेट अस्पतालों की लूट के कारण बुरी तरह क़राह रहे हैं। हाँ उससे मुसलमानों का भी फ़ायदा हो जाएगा , जो कि भारतीय नागरिक ही हैं और किसी से भी कम अधिकार नहीं रखते। सरकारी स्कूलों की दशा सुधारना भी एक प्रकार से हिंदुओं की दशा सुधारना है।खेती -किसानी की बर्बादी रोकना भी इसी तरह हिंदुओं की दशा सुधारना है।जो भी काम सरकार देश की बहुसंख्यक आबादी के हित में करेगी, उससे सबसे ज़्यादा हिंदुओं का ही हित होगा।मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी और सौ दिन काम मिलेगा तो यह भी हिंदू -सेवा होगी।अंबानी -अडानी सेवा हिंदू सेवा नहीं है। बहुत अयोध्या -अयोध्या करते हो, उसकी दशा सुधारना भी हिंदू -हित की बात करना होगा।अभी आसाराम और रामरहीम और भी बचे हैं,उन्हें भी बाहर करो।करोड़ों-अरबों की संपत्ति मंदिरों में सड़ रही है, उसे जनहित में लगाना भी हिंदुओं के हितों को साधना है।पाकिस्तान से जो हिंदू शरणार्थी आए हैं, जरा उनकी ख़बर ले लो।अपने हिंदुत्व को बाबरी मस्जिद-राम मंदिर से बाहर निकालो।और जो भारत हज़ारों सालों से तमाम जातियों -धर्मों के लोगों को पनाह देता रहा है,अपने को इस तरह सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक रूप से संपन्नतर बनाता रहा है, उस देश के लोगों के दिलों को इतना छोटा मत करो कि विष्णु नागर नामक एक मामूली कवि अगर बांग्लादेश में शरण लेने आए रोहिंग्या शरणार्थी बूढ़े -बच्चों की दशा पर सहज रूप से पिघल जाए तो हिंदू -मुसलमान कर दो,थोड़ी कृपा करो।करुणा के लिए न मेरे दरवाज़े बंद करो, न अपने

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