‘क्रूर हत्याकांड’ से भी ज्यादा क्रूर है नेताओं का व्यवहार

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प्रेम कुमार

अमित शाह ने खोल दी है पोल। झूठ की पोल। गोरखपुर में बच्चों की सामूहिक हत्या पर संवेदना दिखाने का जो उपक्रम 28 घंटे बाद शुरू हुआ, उसकी पोल। इस घटना को हत्या या लापरवाही के कारण हादसा नहीं मानने की सरकार की जिद पर भी बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने मुहर लगा दी है। अमित शाह ने यह भी उजागर कर दिया है कि हर छोटी-मोटी बातों पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ घंटों के भीतर 30 से ज्यादा बच्चों की मौत पर कोई ट्वीट क्यों नहीं किया, कोई संवेदना क्यों नहीं दिखाई, किसी मुआवज़े का एलान क्यों नहीं किया?

शाह ने बोली शिवपाल की भाषा

कभी समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव ने कहा था कि यूपी कई देशों से भी बड़ा राज्य है और इसलिए यहां छोटी-मोटी घटनाएं होती रहतीं हैं। उनके बयान पर हंगामा काटने वाली बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी अब वही भाषा दोहरा दी है। बात आगे बढ़ाने से पहले आपके जेहन में अमित शाह के शब्दों को जीवंत बनाए रखना भी जरूरी लगता है। सुनिए उन्होंने क्या कहा- “इतने बड़े देश में बहुत सारे हादसे हुए और ये कोई पहली बार नहीं हुआ। घटनाएं होती रहीं हैं, हो रही हैं और होती रहेंगी।”

वाकई अमित शाहजी, ज़िन्दगी है तभी तो मौत है। अमितशाह जी कहना चाहते हैं कि जिस अस्पताल में इन्सेफेलाइटिस नाम की बीमारी से हर रोज बच्चे मर रहे हैं, वहां किसी दिन किसी और वजह से आंकड़े कुछ बढ़ भी जाएं, तो इतनी हाय-तौबा क्यों?

‘कांग्रेस का काम सिर्फ इस्तीफा मांगना’

अमित शाह को तो विपक्ष का यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस्तीफ़ा मांगना भी गवारा नहीं। सुनिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह क्या कहते हैं “कांग्रेस का काम सिर्फ इस्तीफा मांगना है। क्या उसके शासनकाल में ऐसी घटना नहीं हुई?”

घटनाएं सबके राज में होती हैं, सो ‘भाईचारा’ बना रहे!

अब कांग्रेस नेता के मुंह से यही सुनना बाकी रह गया है कि जब कांग्रेस के शासनकाल में ऐसी घटना घटी थी, तब क्या बीजेपी ने इस्तीफ़ा नहीं मांगा था? कहने का मतलब ये है कि देश में राजनीति ऐसी हो, जिसमें यह मान लिया जाए कि ऐसी घटनाएं सबके राज में होंगी, चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी। और, कोई एक-दूसरे से इस्तीफ़ा नहीं मांगेगा। बिल्कुल! भाईचारा हो, तो ऐसा! घटनाएं रोकने के लिए ऐसी भाईचारगी नहीं दिखाएंगे। लेकिन बवाल रोकने के लिए या इस्तीफ़ा नहीं मांगने के लिए अमित शाह जी कांग्रेस से भाईचारे की उम्मीद कर रहे हैं।

पार्टी से लेकर सरकार तक दिखी एक ही सोच!

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ताज़ा बयान इसलिए गम्भीरता से लेने की जरूरत है क्योंकि वे उसी सोच को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं जिस पर चलते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने बच्चों की सामूहिक मौत के लिए ‘एक से अधिक कारण’ बताए थे। राज्य सरकार की ओर से जो ट्वीट जारी किए गये, उनका आशय भी यही था। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने तो साफ तौर पर कहा- “बच्चों की मौत केवल ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई। जिस वक्त ऑक्सीजन सप्लाई नहीं थी, उस वक्त ये मौतें नहीं हुईं”?

पीएम मोदी की चुप्पी के पीछे वही वजह!

अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और सिद्धार्थ नाथ सिंह सबकी सोच में कहीं कोई फर्क नज़र नहीं आता। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आचरण और व्यवहार से इस सोच पर अपनी मुहर लगायी। इसी सोच ने पीएम मोदी को ‘संवेदना के ट्वीट’ करने से रोक दिया, क्योंकि जब मौत लापरवाही से नहीं हुई हो या यह घटना ऐसी हो, जो “इतने बड़े देश में हो जाया करती हैं”, तो ऐसी घटना पर प्रधानमंत्री को ट्वीट करने की आवश्यकता क्यों हो। लिहाजा न मृतक बच्चों के परिजनों को पीएम की ओर से सांत्वना दी गयी, न ही मुआवज़े का मरहम ही पेश किया गया।

मरने वाले गायें नहीं थीं, बच्चे थे!

वैसे अगर गैरबीजेपी सरकार होती, तो यही बीजेपी कह रही होती कि मरने वाले बच्चे अगर अल्पसंख्यक समुदाय से होते, तो सरकार ऐसे सक्रिय होती या वैसे सक्रिय होती। लेकिन, केन्द्र और राज्य दोनों जगहों पर कथित हिन्दूवादी सरकार है इसलिए इस बार लोग इन बच्चों की जान को गायों की जान से तौल रहे हैं। उनके मुताबिक गायें मरी होतीं, तो सरकार ज्यादा एक्टिव रहती। यानी सरकारों के एक्टिव होने की विशेष परिस्थितियां निर्धारित हैं। अल्पसंख्यक के नाम पर सरकारों की सक्रियता की बात एकबारगी समझी जा सकती है। लेकिन इंसानों के मुकाबले गाय को ज्यादा तवज्जो देना कहां तक जायज ठहराया जा सकता है। और उसमें भी मासूम बच्चों का मरना इस देश में रोजाना घटने वाली घटनाओं में से एक घटना बना दी जाती है।

मौत के पीछे एक से अधिक कारण !

अब तो इस बात पर विचार करना ही पड़ेगा कि आखिरकार गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में बच्चों की मौत क्या है- रोज़ाना एक अस्पताल में होने वाली मौत! इन्सेफेलाइटिस के मरीजों की हो रही मौत! ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाने के बाद तड़प-तड़प कर हुई बच्चों की मौत! या इन सभी कारणों से ये घटना घटी! मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना के 28 घंटे बाद जो चुप्पी तोड़ी, उसके मुताबिक इस घटना की वजह सिर्फ एक नहीं है। यानी सिर्फ ऑक्सीजन की कमी से मौत नहीं हुई। यानी ऊपर गिनाए गये सभी कारण इस घटना के पीछे हैं।

बनता है हत्या का मामला

चलिए मान लेते हैं कि बच्चों की मौत केवल ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई। जो आंकड़े हैं उनमें इन्सेफेलाइटिस के मरीज भी हैं। अगर एक मौत भी (इससे कम तो मुख्यमंत्री भी नहीं बोलेंगे) ऑक्सीजन की कमी से हुई है तो वह हत्या ही कही जाएगी। क्रूर लापरवाही का उदाहरण ही है ये। बिल पेंडिंग रखना। चेतावनी के बावजूद नहीं चुकाना और ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिया जाना। यह छोटी घटना नहीं है। कोई ऑक्सीजन की सप्लाई रोकने जैसा तोप छोड़ने पर आमादा हो और प्रशासन कह रहा हो कि अरे कुछ नहीं होगा, हम हैं ना। और, तोप छोड़ दिया जाता है। घटना से एक दिन पहले डीएम को ऐसा ही भरोसा दिया गया था।

‘क्रूर हत्याकांड’ पर राजनीतिक व्यवहार और भी क्रूर!

बच्चों की मौत की क्रूरता पर जो व्यवहार दिख रहा है वह कहीं ज्यादा क्रूर है। और, सबसे शर्मनाक बात ये है कि इस व्यवहार में अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली बीजेपी के अध्यक्ष, सवा करोड़ लोगों के समर्थन का दावा करने वाले पीएम नरेंद्र मोदी, देश के सबसे बड़े सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ और उसी सूबे के स्वास्थ्यमंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह सभी शामिल हैं।

(लेखक 21 साल से प्रिंट व टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) http://janchowk.com

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3 thoughts on “‘क्रूर हत्याकांड’ से भी ज्यादा क्रूर है नेताओं का व्यवहार

  1. सिकंदर हयात

    Ajit Sahi
    3 hrs ·
    ये देश है या नौटंकी?
    •••••••••••••••
    एक बालिग़ हिंदू औरत मुसलमान बन गई. मुसलमान बनकर उसने एक बालिग़ मुसलमान आदमी से शादी कर ली. दुनिया-जहाँ को इसमें बहुत ख़तरा दिखा. औरत के बाप ने अदालत में अर्ज़ी दी. पुलिस ने उस बालिग़ औरत को उसके पति से अलग करके बाप के घर भेज दिया. हाई कोर्ट ने कहा संगीन मामला है, लव जिहाद लगता है. औरत का पति सुप्रीम कोर्ट पहुँचा. सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद की जाँच करने वाली केंद्रीय एजेंसी एनआईए को तफ़्तीश करने का हुक्म दिया. वो रपट आनी बाक़ी है. तब तक वो बालिग़ औरत पति से दूर बाप के घर रहेगी. ये अदालत है या तमाशा? हम अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बने रहते हैं कि हम दुनिया के सबसे प्रगतिशील मुल्कों और समाजों में हैं. इसे प्रगतिशील कहते हैं? पच्चीस साल की औरत अपनी मर्ज़ी से शादी नहीं कर सकती? सुप्रीम कोर्ट को और कोई काम नहीं है? सुप्रीम कोर्ट को ये नहीं दिखाई देता है कि मध्यप्रदेश सरकार नर्मदा घाटी के लाखों विस्थापित लोगों के पुनर्वास पर ख़ुद सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दिनदहाड़े अवहेलना कर रही है? सुप्रीम कोर्ट को ये नहीं दिखाई देता कि खुलेआम तथाकथित गोरक्षक आतंकवाद फैला रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट को ये नहीं दिखाई देता कि २०१३ में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगों में संघी/भाजपाई अभियुक्तों के ख़िलाफ़ यूपी पुलिस एक एक करके सबूत नष्ट कर रही है? सुप्रीम कोर्ट को ये नहीं दिख रहा कि किस तरह भीम आर्मी के नेताओं पर अन्याय और ज़ुल्म किया जा रहा है? नहीं दिखती क्या सुप्रीम कोर्ट को ऑक्सीजन की कमी से गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में मौतों के मामले में आदित्यनाथ की सरकार की बेइंतहा बेहयाई? अरस्तु ने कहा था कि वही समाज मज़बूत बनता है जिसकी अदालत हर नागरिक को क़ानून के सामने बराबर रखती है. भारत के न्यायाधीशों को सोचना चाहिए कि क्या वो तारीख़ की उम्मीदों पर खरे उतर रहे हैं? इस सवाल से वो भाग नहीं सकते.Ajit Sahi——————————Amitaabh Srivastava
    1 hr ·
    तीन तलाक़ , हलाला जैसे गंभीर मसलों पर चर्चा में संबित पात्रा और राकेश सिन्हा की क्या सार्थक भूमिका हो सकती है सिवाय इसके कि वो बहस को एक सांप्रदायिक आधार पर बांटते हुए कुल मिला कर मुसलमानों और उनके धर्म , उनके आचार- व्यवहार को गालियां दें? मुस्लिम समाज से जुडी कुरीतियों पर सवाल उठाने और मुल्ला-मौलवी टाइप लोगों को कटघरे में खड़ा करने का यही काम महिला- पुरुष मुस्लिम स्कॉलर बेहतर ढंग से कर सकते हैं. ऐसा लगता है कि चैनल जान बूझ कर विमर्श की एक ऐसी पद्धति अपनाते हैं जिसमे सांप्रदायिक आधार पर चीख-चिल्लाहट की गुंजाइश बनी रहे और स्टूडियो के बाहर के समाज में भी तनातनी के नए-नए मौके निकलते रहें. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. क्या हिन्दू समाज की कुरीतियों पर चर्चा में मुसलमान नेताओं, विचारकों को भी सामान्यतः बुलाते हैं कभी या बुलाएँगे कभी?Amitaabh Srivastava
    3 hrs · ——————-Dilip C Mandal added 4 new photos.
    23 hrs ·
    संघ और बीजेपी के नमूनों, आप लोग आपस में डिसाइड कर लो कि गोरखपुर हत्याकांड के लिए जिम्मेदार किसको ठहराना है.
    1. नरेंद्र मोदी ने आज कहा प्राकृतिक आपदा है.
    2. यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ सिंह बोलता है अगस्त महीना जिम्मेदार है.
    3. यूपी के चीफ मिनिस्टर को कुछ नहीं पता. उनका कहा-सुना ऐसे भी माफ है.
    4. संघी वेब-लफंगे कहते हैं कि डॉक्टर कफील वैसे तो मामूली लेक्चरर है, पर दोषी तो मुसलमान ही हो सकता है.
    5. डीएम, गोरखपुर अपनी रिपोर्ट कह रहे हैं कि प्रिसिपल और बाकी डॉक्टरों में तालमेल नहीं था.
    6. यूपी सरकार ऑक्सीजन सप्लाई कंपनी पर मुकदमा कर चुकी है.
    7. एकमात्र डॉक्टर राजीव मिश्रा पर अनुशासन की कार्रवाई हुई है. सस्पेंड है. प्रिसिपल हैं.
    8. सिद्धार्थ सिंह आज कह रहे हैं कि कमीशनखोरी जिम्मेदारी है.
    9. संघ ने आज कह दिया है कि सरकार को प्रायश्चित करना होगा.
    10. अमित शाह बोल रहा है कि हादसे होते रहते हैं.
    एक मुंह से बोलो बे. इतने मुंह से बोलते हो कि तुम्हारा शरीर भी कनफ्यूज हो चुका होगा.Dilip C Mandal
    23 hrs ·
    मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल की वेबसाइट से जब सारे सबूत मिटा दिए जाएं और उसे दोबारा शुरू किया जाए, तो उसकी सूचना सार्वजनिक करें. बार-बार खोलकर चेक करने के झंझट से तो छुटकारा मिले.Dilip C Mandal
    Yesterday at 18:56 ·
    आज तीसरा दिन है जब गोरखपुर के सरकारी बीआरडी मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल की वेब साइट बंद पड़ी है।
    आश्चर्यजनक है कि मीडिया एक बार भी नहीं पूछ रहा है कि माजरा क्या है।
    किस बात को छिपाने की कोशिश हो रही है?Dilip C Mandal with Palash Biswas.
    Yesterday at 14:27 ·
    बंदा डेरिंग है।
    लाहौरी गेट से लाल क़िले में घुसा और क़िले पर चढ़कर झूठ बोल गया। RBI का गवर्नर उर्जित पटेल संसदीय समिति को बता गया है कि रुपयों की गिनती नहीं हुई है। RBI ने नोट गिनने की मशीन के टेंडर निकाले हैं। अभी कई महीने गिनती चलेगी।
    और मोदी कॉन्फ़िडेंस से बोल गया कि नोटबंदी से तीन लाख करोड़ का काला धन पकड़ा गया है।
    बंदा ज़बर्दस्त है।
    मानना पड़ेगा।

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    Nitin Thakur
    Yesterday at 21:01 ·
    अगर कोई आपको पहली क्लास में दाखिला ना दिलाकर सीधा हाथ में शेक्सपीयर की किताब दे दे तो आप लगातार प्रयासों से उसे रट तो लेंगे, लेकिन सिर्फ रटंत योग्यता से आप अंग्रेज़ी व्याकरण के विशेषज्ञ नहीं बन सकते।
    कुछ ऐसा ही हादसा योगी आदित्यनाथ के साथ हो गया लगता है। आदित्यनाथ तो महज़ एक शोधार्थी थे। उन्हें गोरखनाथ पीठ का वारिस काफी छोटी उम्र में बना दिया गया था। इसके बाद नेता बनना तो उनकी नियति थी क्योंकि जिस पीठ के वो वारिस बने उसके प्रमुख महंत अपने इलाके के सांसद चुने जाते रहे थे। ज़ाहिर है, जब पीठ आदित्यनाथ की हो गई तो इलाके की सीट भी उनकी ही होनी थी।
    अगर आदित्यनाथ ने उस सीट के लिए मेहनत की होती तो संभव है उन्हें मालूम होता कि उस पर बैठना कितना ज़िम्मेदारी भरा है। उन्हें ये भी मालूम होता कि वो सीट संसद में बैठकर सिर्फ विधेयक पास करने के लिए नहीं है। उन्हें इस बात का भी अहसास होता कि उस सीट पर बैठकर कई ऐसी ज़िम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं जो तकनीकी तौर पर आपकी नहीं होती लेकिन इस बात की शिकायत आप कर भी नहीं सकते।
    ऊल जलूल भाषणों, जातिगत फैक्टर्स, धार्मिक श्रद्धा को वोट में तब्दील करते हुए योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम पद तक तो जा पहुंचे लेकिन उनका दिल प्रमोशन के अनुपात में बड़ा नहीं हो सका। वो स्तर से नीचे के व्यक्ति रह गए। मैं उनको लेकर ऐसे कठोर आकलन का पक्षधर नहीं था मगर उनके दो बयानों और एक हरकत ने मुझे इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए मजबूर किया है।
    योगी नए सीएम बने थे। किसी ज़िले के दौरे पर थे। अपने लंबे –चौड़े काफिले के साथ एक एसयूवी में चश्मा चढ़ाए मुस्कुरा रहे थे। रास्ते के चारों तरफ लोग उनकी झलक पाने को बेताब थे। इस बीच दो-तीन अस्थायी महिला टीचर उनसे मिलने का मौका ताक रही थीं। पुलिस इस बात को समझ गई और उन्हें कूट दिया। मैंने वो फुटेज देखा जिसमें योगी इस दृश्य को देखकर भी बस मुस्कुराते रहे। ठीक है, वो नज़ारा आप लोगों में से कम ने देखा होगा मगर अपनी ही पुलिस के हाथों महिलाओं को पिटते देख चेहरे पर ऐसी निष्ठुर मुस्कान ने उनके ‘योगी’ होने का भ्रम मेरे दिमाग से दूर कर दिया।
    फिर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी के चलते बच्चे मारे गए। उस दिन योगी यूपी में ही गोरखपुर से महज़ तीन सौ किलोमीटर दूर उमा भारती की बगल में बैठे किसी कार्यक्रम में मुस्कुराते देखे गए। उन्होंने कार्यक्रम का पूरा लुत्फ लिया। जिस गोरखपुर ने उन्हें सूबे का मुखिया बनाया और उससे पहले कई बार संसद पहुंचाया उन्होंने वहां जाना मुनासिब नहीं समझा । मामले के निपटान के लिए अपने स्वास्थ्यमंत्री को भेज दिया। स्वास्थ्यमंत्री ने भी फटाफट प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बता दिया कि अगस्त में बच्चे हर साल मरते हैं। इस बार तो कम ही मरे। मीडिया शोर मचाता रहा और आखिरकार सीएम साहब व्यस्त कार्यक्रम में से फुरसत निकालकर गोरखपुर आए। वो आए तो गुस्से में थे। मीडिया के सामने पेश हुए और तमाम बड़ी बड़ी बातों के बीच ये कह दिया कि आप फर्ज़ी रिपोर्टिंग मत कीजिए। वो ऐसा कह सकते हैं। उनके पास ताकत है। कोई अदना सा पत्रकार भला उनके कैसे कहता कि आप फर्ज़ी नेतागीरी मत कीजिए। बहरहाल, अपने ही गृह़ज़िले के लिए ऐसी बेरुखी मैंने पहले किसी में नहीं देखी थी।
    और फिर महीने भर में ही एक बार फिर गोरखपुर के उसी अस्पताल में 72 बेरहम घंटों ने 63 बच्चों की जान ले ली। यूपी के गौप्रेमी और संत सीएम ने लखनऊ में जनता पर तंज करते हुए कहा- लोग तो चाहते हैं कि बच्चों को दो साल का कर दो और फिर उन्हें सरकार पाले।
    समझ नहीं आता कि ये बयान आदित्यनाथ के कौन से रूप पर अधिक फिट बैठता है ? क्या इस बयान स्तर किसी ज़िम्मेदार नेता का माना जाए.. क्या इसे किसी सूबे के सीएम के स्तर का बयान माना जाए.. या ये बयान किसी संन्यासी का माना लें ?
    जैसा मैंने शुरू में लिखा कि कुछ लोग बिना व्याकरण सीखे किताब रटकर विद्वान हो जाते हैं। आगे चलकर दुर्भाग्यवश ये लोग पूरी भाषा के तौर तरीके तय करने लगते हैं।
    अब लौटता हूं उस पंक्ति पर जो सबसे पहले लिखी थी। उसका सीधा सादा सा अर्थ था कि हो सकता है आप किसी परिस्थितिवश किसी पद या स्थान पर पहुंच जाएं लेकिन कतई ज़रूरी नहीं कि आपको उसका महत्व भी मालूम हो। अगर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारियों का थोड़ा भी आभास होता तो वो अपने प्रदेश की जनता पर कभी तंज कसते हुए ये नहीं कहते कि लोग तो चाहते हैं बच्चा एक-दो साल का हो जाए तो फिर सरकार पाले।
    उन्हें ये पता होता कि मां-बाप के सिर पर बच्चे को पालने की ज़िम्मेदारी भले ही नैतिक रूप से होती हो मगर सरकार के ऊपर तो नैतिक और कानूनन ये ज़िम्मेदारी होती है। उन्होंने संविधान के भाग 4 में यदि नीति निदेशक तत्वों पर गौर किया होता तो अपने कर्तव्य का अहसास करते। ये वो हिस्सा है जिसके बारे में साफ लिखा है कि भले ही अदालतें सरकारों को नीति निदेशक तत्व मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं लेकिन विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का उद्देश्य होगा। संविधान तो कहता है कि अगर कोई राज्य सरकार इन सिद्धांतों पर नहीं चलती तो केंद्र सरकार को अधिकार है कि वो उसे सिद्धांतों को मानने पर मजबूर करे। नीति निदेशक तत्व के मुताबिक राज्य सरकार को हर बच्चे के लालन-पालन, स्वास्थ्य की देखभाल और पढ़ाई-लिखाई तक की देखरेख करनी है। यहां तक कि संयक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार संबंधी अधिसमय का अनुच्छेद 27 कहता है कि हर बच्चे को ऐसा जीवन जीने का अधिकार है जो उसके शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, नैतिक और सामाजिक विकास के लिए उपयुक्त हो। माता-पिता, अन्य अभिभावक अपनी योग्यताओं और आर्थिक क्षमताओं से बच्चे को ऐसा जीवनस्तर उपलब्ध कराएं जो उसके विकास के लिए आवश्यक है। पक्षकार राज्य (फिलहाल इसे योगी सरकार मान लें) अपनी परिस्थितियों के अनुसार तथा अपने साधनों की मर्यादा के अधीन इस अधिकार के कार्यान्वयन के लिए बच्चे के माता-पिता या अन्य अभिभावक को सहायता देने का उपाय करेंगे, खास तौर से पोषाहार, वस्त्र और आवास के मामले में।
    उसी का अनुच्छेद 28 बच्चे की शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। सरकार को कहा गया है कि वो प्राथमिक शिक्षा तो मुफ्त में दिलवाएगी ही, साथ ही सामान्य और व्यावसायिक शिक्षा समेत माध्यमिक शिक्षा के विकास को भी प्रोत्साहित करेगी। बच्चों को वित्तीय मदद भी उसे देनी होगी। यहां तक देखना होगा कि बच्चा स्कूल में नियमित पहुंचे और पढ़ाई बीच में ना छोड़े।
    उसी का अनुच्छेद 20 कहता है कि जो बच्चा अपने पारिवारिक परिवेश से वंचित हो गया हो, वो सामाजिक संरक्षण और राज्य से सहायता प्राप्त करने का हकदार होगा।
    आगे चलकर उसी बच्चे को रोज़गार मिले ये भी सरकार का काम है। काम मिलने में उसके साथ किसी भी स्तर पर भेदभाव ना हो ये भी सरकार का ही काम है। भारत ने इस संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार संबंधी अभिसमय को स्वीकारा है जिसकी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के लिए वो अपनी विदेश नीति नए सिरे से तय करता है। बच्चों के बारे में सरकार के सिर जैसी ज़िम्मेदारियां बांधी गई हैं उन्हें योगी को पढ़ना चाहिए था। आखिरकार अब वो देश के सबसे बड़े सूबों में से एक के माननीय मुख्यमंत्री हैं।
    ज़ाहिर है, या तो योगी आदित्यनाथ ने भारत का संविधान और संयुक्त राष्ट्र संघ की योजनाओं और कार्यक्रमों को पढ़ा नहीं है, या फिर उन्हें मानना ज़रूरी नहीं समझा। अगर वो गंभीर होते तो ये नहीं कह सकते थे कि लोग तो ये चाहते हैं कि उनके बच्चों को सरकार पाल ले। माता-पिता अगर वाकई ये चाहते भी हैं तो वो अपनी सरकार से कुछ गलत नहीं चाहते। अगर सीएम साहब वाकई सूबे के हर बच्चे को पालेंगे तो ये किसी पर अहसान भी नहीं होगा, बल्कि ये वो है जो वाकई उनका काम है। कांवड़ यात्रा में डीजे बजे या ना बजे ये उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे आखिर में आना चाहिए क्योंकि संविधान पढ़कर देखेंगे तो जानेंगे कि संविधान बनानेवालों ने इसे राज्य की चिंताओं में कहीं गिना ही नहीं है। जो राज्य की सबसे बड़ी चिंता मानी गई है वो तो दरअसल यही है जिसे योगी आदित्यनाथ ने चुटकुला बनाकर रख दिया।Nitin Thakur————————–Ravish Kumar
    Yesterday at 20:43 ·
    नोटबंदी फेल हो गई है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कह दिया कि 99 प्रतिशत पांच सौ और हज़ार के नोट वापस आ गए हैं। नोटबंदी के समय 15 लाख 44 हज़ार करोड़ के पांच सौ और हज़ार के नोट चलन में थे। 15 लाख 28 हज़ार करोड़ रुपया वापस आ गया है। इसका मतलब है कि जो दावा किया जा रहा था कि जिनका काला धन होगा, वो बर्बाद हो जाएग, वो फ़र्ज़ी निकला। कहा जा रहा था कि जिनके घरों में नोट छिपा कर रखे गए हैं वो डर से बैंक नहीं आएंगे और नष्ट हो जाएंगे। ऐसे लोग रात को नींद की गोली खा कर सो रहे हैं। जो नोट गंगा जी में फेंका गया, समंदर में फेंका गया, वो कौन सा पैसा था? मगर अब तो सारा पैसा वापस आ गया है। सरकार कह रही है कि ऐसा दावा नहीं किया गया था कि जितना पैसा नहीं आएगा वो रिज़र्व बैंक के लिए मुनाफ़ा होगा और बैंक उतना पैसा सरकार को वापस कर देगा। यही तो दावा हो रहा था। ऐसा कहां हुआ? करीब आठ हज़ार करोड़ रुपया तो नए नोट छापने में लग गया। कई लोगों ने लाइन में लगकर तकलीफें झेलीं, जान चली गई लोगों की। CMIE के अनुसार नोटबंदी के पहले चार महीनों में पंद्रह लाख नौकरियाँ भी गईं । काम धंधे बंद हो गए। भारतीय रिज़र्व बैंक को अपनी रिपोर्ट में कहना चाहिए था कि नोटबंदी सफल हुई या नहीं क्योंकि फैसले लेने के बाद सरकार ने बोला था कि रिज़र्व बैंक की सिफारिश पर ही नोटबंदी की गई थी। चिदंबरम ने कहा है कि नोटबंदी के बहाने काले धन को सफेद करवा दिया गया। सरकार कहती है कि करीब पौने दो लाख से तीन लाख करोड़ अघोषित आय की जानकारी हुई है। एक तो रिजर्व बैंक अभी तक नोट ही गिन रहा था, उससे पहलों ही सरकार ने अघोषित आय पकड़ कर दिन भी लिया ? आप बताइये कि इतने पैसे पकड़ने के लिए आपने कितने लोगों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए हैं? आयकर का मुक़दमा चलता है। कहीं दायर किया है? कौआ पकड़ रहे हैं या अघोषित आय? हावर्ड और हाड वर्क वालों में बहस होगी, फर्ज़ी दावे फिर से होंगे और भारत की चुनावी राजनीति में घूस और दलाली का पैसा फिर से पानी की तरह बहेगा। उस पैसे से मंच सजेगा, उस पर नेता हेलिकाप्टर से उतरेगा, पैसे देकर बसों में भर कर लोग लाए जाएंगे और मंच से नेता का दावा होगा कि काला धन मिट गया है। हमारे नेता ईमानदार हैं। वो काला धन सामने रखकर उसी से मंच सजाकर बोलते हैं कि देखो मिट गया है। जनता भी ईमानदार है। कहती हैं, सही है हुज़ूर मिट गया है। जब हमीं मिट गए तो काला धन क्यों नहीं मिटेगा हुज़ूर। मूल सवाल है कि इस ख़बर को चैनलों से ग़ायब करने के लिए कौन सा ईंवेंट या प्रोपेगैंडा आने वाला है? गुरमीत सिंह से लड़ने वाली दो साध्वियों के लिए कौन कौन बोला –
    निर्भया के लिए रायसीना हिल्स को जंतर मंतर में बदल देने वाली हिन्दुस्तान की बची हुई बेटियाँ नोट करें कि दो साध्वी ने कैसे ये लड़ाई लड़ी होगी, जिसकी जेल यात्रा को प्रधानमंत्री के काफ़िले की शान बख़्शी गई। दोनों साध्वी किस हिम्मत से लड़ीं ? क्या आप जानती हैं कि जब वे अंबाला स्थित सीबीआई कोर्ट में गवाही देने जाती थीं तो कितनी भीड़ घेर लेती थी? हालत यह हो जाती थी कि अंबाला पुलिस लाइन के भीतर एस पी के आफिस में अस्थायी अदालत लगती थी। चारों तरफ भीड़ का आतंक होता था। जिसके साथ सरकार, उसकी दास पुलिस और नया भारत बनाने वाले नेताओं का समूह होता था, उनके बीच ये दो औरतें कैसे अपना सफ़र पूरा करती होंगी ? क्या उनके साथ सुरक्षा का काफिला आपने देखा? वो एक गनमैन के साथ चुपचाप जाती थी और पंद्रह साल तक यहीं करती रहीं। बाद में सीबीआई की कोर्ट पंचकुला चली गई। दो में से एक सिरसा की रहने वाली हैं, वो ढाई सौ किमी का सफ़र तय
    करते पंचकुला जाती थीं और सिरसा के डेरे से निकल कर गुरमीत सिंह सिरसा ज़िला कोर्ट आकर वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये गवाही देता था। तब भी आधी से अधिक गवाहियों में पेश नहीं हुआ। साध्वी का ससुराल डेरा का भक्त है। जब पता चला कि बहू ने गवाही दी तो घर से निकाल दिया। इनके भाई रंजीत पर बाबा को शक हुआ कि उसी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जिस पर कोर्ट ने संज्ञान ले लिया। रंजीत की हत्या हो गई। गुरमीत पर रंजीत की हत्या का आरोप है। इस गुमनाम खत को महान पत्रकार राम चंद्र छत्रपति ने दैनिक पूरा सच में छाप दिया। उनकी हत्या हो गई। राजेंद्र सच्चर, आर एस चीमा, अश्विनी बख़्शी और लेखराज जैसे महान वकीलों ने बिना पैसे के केस लड़ा। सीबीआई के डीएसपी सतीश डागर ने साध्वियों का मनोबल बढ़ाया और हर दबाव का सामना करते हुए जाँच पूरी की। शुक्रवार रात साढ़े आठ बजे छत्रपति के बेटे अँशुल छत्रपति से बात हुई। फैसला आने तक उनके पास एक गनमैन की सुरक्षा थी। बाद में मीडिया के कहने पर चार पाँच पुलिसकर्मी भेजे गए। अँशुल ने कहा कि एक बार लड़ने का फैसला कर घर से निकले तो हर मोड़ पर अच्छे लोग मिले। तो आप पूछिये कि आज आपके नेता किसके साथ खड़े हैं? बलात्कारी के साथ या साध्वी के साथ ? आप उनके ट्वीटर हैंडल को रायसीना में बदल दीजिए। सरकार बेटियाँ नहीं बचाती हैं। दोनों साध्वी ने बेटी होने को बचाया है। सत्ता उनकी भ्रूण हत्या नहीं कर सकी। अब इम्तहान हिन्दुस्तान की बची हुई बेटियों का है कि वे किसके साथ हैं, बलात्कारी के या साध्वियों के ?
    नोट: सबसे अपील है कि शांति बनाएँ रखें । किसी का मज़ाक न उड़ाएँ । किसी को न भड़काएँ। सब अपने हैं ।इतना सब करने की जगह डेरा सच्चा सौदा को ही पंजाब और हरियाणा सौंप देना चाहिए था। वैसे भी इन प्रेमियों ने दो राज्य को डेरा में बदल ही दिया है। ये लोग चला लेते जैसे अभी चला रहे हैं। डेरा के आशीर्वाद से ही तो विधायक जीतते हैं जिससे सरकार बनती है। बाबा आराम से दोनों राज्य के मुख्यमंत्री बन सकते हैं। महत्वपूर्ण दलों के किसी बड़े नेता ने इनकी निंदा की है क्या? कौन करेगा? लोकसभा और विधानसभा का चुनाव साथ हो गया तो एक साथ जाने कितने उम्मीदवारों को डेरा ले जाने की ज़रूरत होगी। इसलिए शांति की अपील करते हुए सेना, अर्ध सैनिक बलों की तैनाती ही उत्तम रास्ता है। बस प्रतिष्ठा बचाने के लिए इतनी मेहरबानी कर दें कि जितने सैनिक चीन सीमा के पास डोकलाम में तैनात हैं, उससे तीस चालीस सैनिक कम हरियाणा पंजाब में तैनात किए जाएँ। इससे चीन का ईगो आहत नहीं होगा। डेरा बाबा से मेरी मामूली शिकायत है कि उनके भक्तों ने दूसरे वाले के भक्तों को कंफ्यूज़ क्यों कर दिया है! कोई ललकार नहीं पा रहा है।सोमवार को छंदक और रूबिया जब मिलने आए तो अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि इनके भीतर किसी मुद्दे को लेकर इतनी प्रतिबद्धता होगी कि ये ट्यूशन पढ़ाकर झारखंड के जादूगोड़ा में काम करने जाते हैं। आप में इतनी प्रतिबद्धता है? मुझमें भी नहीं है। रूबिया ने तो झटके में ही कह दिया कि हमारे पास दिल्ली आने के लिए भी पैसे नहीं होते हैं। इसलिए ट्रेन से उतरते ही दोनों गुड़गांव गए मारुति मज़दूरों से मिलने चले गए, वहां से आपके पास और अब जे एन यू जा रहे हैं, जहां डाक्यूमेंट्री दिखानी है। घड़ी देखकर सोचता रहा कि इन्होंने तो सुबह से चाय भी नहीं पी होगी।
    दोनों की बातचीत में कोई दावा नहीं, कोई हताशा नहीं थी। उन्हें किसी से मंज़ूरी भी नहीं लेनी थी क्योंकि उन्हें पता है कि ये काम करने का फ़ैसला जब उनका है तो उनका है। यही चाहते हैं कि जादूगोड़ा की बात होती रहे। वहां के लोग बहुत तकलीफ में हैं। जल-जंगल ज़मीन नाम की संस्था के तहत कोलकाता के कुछ डाक्टर जादूगोड़ा जाते हैं। वहां के लोगों पर यूरेनियम के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।
    उनसे जो कुछ सीखा, यहां लिख रहा हूं। जादूगोड़ा का एक लोकगीत है- तुम्हारा मंदिर तो ईंटों और खंभों के बीच है, हमारा मंदिर तो जंगलों और जानवरों के बीच है। मगर अब जंगल तो समाप्ती के कगार पर पहुंच गए हैं। जादूगोड़ा में फैली रेडिएक्टिव किरणें इंसान को विकृत कर रही हैं। रूबिया ने बताया कि जहां यूरेनियम का खनन होता है उसके 20 किमी के दायरे में कोई इंसानी आबादी नहीं हो सकती मगर कई गांव हैं। खान से निकलने वाला कचरा भी गांव के दूसरी तरफ फैला होता है जहां से रेडिएक्टिव तत्व हवाओं के सहारे उन तक आसानी से पहुंचते रहते हैं।
    यहां काम करने वाले कर्मचारियों का स्वास्थ्य गिरता ही जा रहा है। रेडिएशन का स्तर बढ़ रहा है। बच्चे पैदा नहीं होते और जो पैदा होते हैं उनमें जन्म के समय ही कई प्रकार की विकृतियां आ जाती हैं। कैंसर से होने वाली मौत की संख्या बढ़ रही है। इनके अध्ययन से पता चलता है कि 68.33 प्रतिशत 62 साल के पहले ही मर जाते हैं। रेडिएशन डेटा कभी पब्लिक नहीं की जाती है।
    हम लोग कितने विषयों में पारंगत हो जाएं। टीवी ने रिपोर्टिंग को मार दिया। जो चार मसलों की heroic reporting करके सारा काम हो जाता है। लगातार कहीं जाकर देखते और जानने की प्रक्रिया ख़त्म हो गई है। इसी झुंझलाहट में टीवी नहीं ऑन नहीं करता हूं। डाउन टू अर्थ पत्रिका ने भी जादूगोड़ा पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। कुछ तस्वीरें दे रहा हूं। ये भी हमारे ही देश के नागरिक हैं। इनकी हालत पर भी सोचिए और अपनी जानकारी का विस्तार कीजिए। जल जंगल ज़मीन नाम से यू ट्यूब पर इनकी डाक्यूमेंट्री है। देख सकते हैं ।——————————————-तलाक से लेकर तिलक तक-
    चूंकि ज़माना बदल रहा है इसलिए हो सकता है कि अब दहेज़ न देने के कारण मार दी जाने वाली औरतों की ख़बरों पर भी नज़र जाने की उम्मीद की जा सकती है। 21 अगस्त को दिल्ली के विकासपुरी में 10 लाख दहेज में नहीं लाने के कारण एक महिला को कथित रूप से जला दिया गया। उसे पति और सास ने घर से निकाल दिया था जब वो अपने बच्चे के कपड़े लेने घर आई तो दोनों ने मिलकर जला दिया।
    22 अगस्त को जब हम तुरंता तीन तलाक पर रोक की खुशी में झूम रहे थे उसी दौरान पूर्वी दिल्ली की दीपांशा शर्मा फांसी लगाने की तैयारी कर रही थीं। पहले पति को शक हुआ कि नौकरी करती है तो किसी से चक्कर होगा। चरित्र अच्छा नहीं है तो दीपांशा ने नौकरी छोड़ दी। दीपांशा के पिता ने आरोप लगाया है कि दहेज़ के लिए प्रताड़िता किया जा रहा था। दीपांशा की डेढ़ साल की बेटी है।
    दिल्ली में जनवरी-फरवरी 2016 के दौरान दहेज़ के कारण 19 औरतें मार दी गईं या ख़ुद मर गईं। जनवरी-फरवरी 2017 के दो महीनों में यह संख्या 26 हो गई। दिल्ली पुलिस कहती है कि इस राजधानी में हर दूसरे दिन दहेज़ से किसी औरत की जान जाती है।
    वैसे 2016 में दिल्ली शहर से 76 औरतें अगवा कर ली गईं। इस शहर में इतनी लड़कियां अगवा होती हैं, पता भी नहीं था।
    2015 में मेनका गांधी ने संसद में लिखित बयान दिया था कि 2012, 2013, 2014 में दहेज़ संबंधित कारणों से 24,771 महिलाएं मार दी गईं। उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर था। जहां 7048 महिलाएं मारी गईं। बिहार दूसरे नंबर पर और मध्य प्रदेश तीसरे नंबर पर। बिहार में 3,830 महिलाएं मार दी गईं। मध्य प्रदेश में 2,252 महिलाएं मार दी गईं। दहेज के मामले में मेरा राज्य शर्मनाक है। स्थानीय ज़ुबान में खत्तम है।
    दहेज़ की समस्या सभी धर्मों में हैं। पूरा समाज शादी के नाम पर होने वाली सौदेबाज़ी का तमाशा देखने आता है और खा पीकर जश्न मना कर जाता है। औरतें भी उस फटीचर पति के साथ जीवन भर सालगिरह मनाती रहती हैं। उसकी शकल कैसे देखती होंगी। मेरा मानना है कि दहेज़ लेकर अपनी बीबी को ग़ुलाम बनाने वाले मर्द ही अंध राष्ट्रवादी होते हैं। घोर सांप्रदायिक होते हैं और सियासी भक्त होते हैं। ठीक इसी तरह के होते हैं त्वरित तीन तलाक वाले मर्द। घटिया और कट्टरपंथी। दहेज़ के आधार पर कह सकता हूं कि भारत के मर्द इतने घटिया सामाजिक उत्पाद हैं।
    दहेज़ के ख़िलाफ़ कानून बेअसर है क्योंकि दहेज के लिए पूरा समाज तड़पता है। समाज ऐसे घेरता है कि बग़ैर दहेज़ के शादी संभव ही नहीं है। हर किसी के लिए विद्रोह करना असंभव हो जाता है। वैसे शादी न करने की हिम्मत करनी चाहिए। हलाला पर स्टिंग करने वाले न्यूज़ चैनलों को तो दहेज़ वाली शादियों की स्टिंग की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। ऐसी शादियों का तो लोकल केबल पर सरेआम लाइव किया जाता है और वीडियो रिकार्डिंग होती है।
    दहेज़ लेने वाला पति या लड़का संभावित हत्यारा भी होता है, इस टाइप के घोंचू पतियों के लिए औरतें व्रत भी करती हैं। ऐसी शादियों में जो लड़कियां पचीसवीं पचासवीं सालगिरह मनाने के लिए बच जाती हैं वो सिर्फ एक चांस की बात है। अगर पिता ने सारा पैसा न दिया होता तो उनका पति उनकी हत्या कर ही देता।
    हम दहेज़ से होने वाली हत्याओं और इसके नाम पर झूठी प्रताड़नाओं की ख़बरों को देखकर अनदेखा कर देते हैं। जितनी हत्या संगीन है उतनी है झूठी प्रताड़नाएं। इस कानून का इस्तमाल दहेज रोकने में कम, दहेज़ के नाम पर फंसाने में ज़्यादा होता है। दोनों को लेकर बहुत दुख होता है। कोई कैसे दहेज़ मांग लेता है।
    टीवी चैनल महिलाओं के अधिकारों के नाम पर धूर्तता करते हैं। हमें नहीं मालूम कि कल के दिन एंकरिंग करने वाले कितने न्यूज़ एंकरों ने तिलक लेकर शादी की होगी। वैसे ज़्यादातर मर्द पत्रकार दहेज़ लेकर शादी करते हैं। तिलक पर वार का समर्थन नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनकी और उनके बाप की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए तुरंता तीन तलाक के साथ तिलक पर भी वार करने की ज़रूरत है। बदले हुए ज़माने के भारत की राजधानी दिल्ली में एक लड़की जला दी जाती है।
    कमेंट में ज़रूर लिखें कि दहेज लिया है नहीं ।————————————-Ravish Kumarमेरी बिहार सरकार से मांग है कि बाढ़ में जितनी झोंपड़ियाँ नष्ट हुईं हैं, उनका पूरा पूरा दाम ग़रीबों को वापस करे। बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं है। सरकार की बाँध नीति और लापरवाही से पैदा होती है। इसलिए सरकार को अधिकतम जवाबदेही उठानी चाहिए। चूड़ा चीनी और बुनिया बिल्कुल ठीक है लेकिन ग़रीब लोगों का घर वापस होना चाहिए। दो तरह से। झोंपड़ी बनवा कर दे या फिर इंदिरा आवास योजना का पैसा उन्हें दिया जाए। यह पैसा एक महीने के अंदर सबको दिया जाए। आधार और अन्य पहचान के कारण अब सबका नाम पता है, उससे पता कर लोगों में पैसा बाँटा जा सकता है। रातों रात खाते में ये पैसा ट्रांसफ़र भी हो सकता है जिनके खाते हैं। जिनके नहीं है उन्हें भी दिया जा सकता है।
    हमने कल अपने मित्र गिरिंद्रनाथ झा की मदद से एक झोंपड़ी की लागत पता की है। दो कमरे की फूस की झोंपड़ी पचास हज़ार में बन जाती है और एक कमरे की पचीस से तीस हज़ार में। सरकार की नीतियों और लापरवाही के कारण कई लाख झोपड़ियाँ बह गई हैं। कम बही हैं तो यह अच्छी बात है, सरकार को कम लोगों को पैसे देने होंगे।
    हमने एक मोटामोटी अनुमान लगाया था। कोई सात आठ सौ करोड़ का हिसाब बैठता है। बेहद मामूली रक़म है। इतना पैसा तो कब किस जगह से घोटाले में निकल जाता है, सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है। दिल्ली की सरकार भी मदद कर सकती है। इसलिए पैसे की कमी नहीं है। इतना पैसा राजनीतिक दल एक चुनाव में हँसते खेलते फूँक देते हैं।
    बिहार के सभी दलों के विधायक और सांसद सरकार से मांग करें कि जिनकी भी फूस की झोंपड़ी तबाह हुई है, उन्हें नई झोंपड़ी बनाने का पैसा दशहरा से पहले बाँटा जाए। इस वक्त ग़रीब जनता विस्थापित है। अख़बार भी नहीं पढ़ पाती होगी। टीवी नहीं देख पाती होगी। इसलिए आप जिस भी बाढ़ प्रभावित ग़रीब लोगों से मिलें तो उन्हें बताए कि सरकार से चूड़ा चीनी नहीं, झोंपड़ी का दाम मांगिए। विधायक और सांसद को इसके आश्वासन के बग़ैर इलाके में घुसने न दें ।
    सरकार आराम से पचास हज़ार रुपये दे सकती है। यह मुआवज़ा नहीं होगा बल्कि जनता की तरफ से सरकार पर लगाया गया जुर्माना होगा।लगे हाथ प्रधानमंत्री भी सबके पास घर का अपना सपना पूरा कर सकते हैं। बिहार के जो युवा राजनीति में कुछ करना चाहते हैं , वो इस पोस्ट को अपने नाम और फोटो के साथ अभी का अभी पोस्टर पर छपवा कर अपने अपने इलाके में लगवा दें। मामूली ख़र्चे में यह मांग जन जन तक पहुँचेगा और आपका नाम भी। जल्दी करें। यूपी बंगाल और असम में भी यह मांग उठनी चाहिए।————————-डाउन टू अर्थ हिन्दी में आने लगा है। यह पत्रिका खुलते ही दूसरी दुनिया में ले जाती है जहाँ पहली दुनिया के ख़त्म होते नज़ारे आँखों को चुभते हैं। हिन्दी की दुनिया में जब हिन्दी में कुछ आता है तब भी चुप्पी होती है और जब कुछ नहीं आता तो रोने नाम की चुप्पी छा जाती है।
    जब हर शाम चैनलों में सरकार का प्रोपेगैंडा कर रहे न्यूज़ एंकरों के जुमलों में उलझे रहते हैं तब इसी दौर में कोई अर्चना यादव पटना से फ़रक्का की यात्रा कर रही होती हैं, बाढ़ के कारणों को समझने के लिए। तस्वीरों के ज़रिये बाढ़ का सौंदर्यीकरण और रिपोर्टिग के सतहीकरण की दीवारों को तोड़ डाउन टू अर्थ ने जुलाई महीने के अंक के लिए फ़रक्का को कवर स्टोरी के रूप में छापा है।
    ” 1950 के दशक में पश्चिम बंगाल के इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य ने चेतावनी दी थी कि फ़रक्का के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शीदाबाद और पूर्णिया हर साल पानी में डूबेंगे। ”
    अर्चना यादव की स्टोरी इस बयान से शुरू होती है और उनकी हर पड़ताल बार बार इसी बयान को सही साबित करती है। बाढ़ के बारे में सब जानते हैं। सबने लिखा है। चर्चा हुई है मगर कारणों पर फोकस कम है, NDRF और बीस किलो चूड़ा पर ज़्यादा है। राजनीतिक दलों में समस्याओं को दूर करने की इच्छाशक्ति कम और नौटंकी ज़्यादा है। पिछले साल भी बिहार में बाढ़ से 250 लोग मरे थे। चूँकि मरता ग़रीब है इसलिए वो संख्या में बदलकर जीवित हो जाता है और किसी को फर्क नहीं पड़ता।
    आई आई टी के प्रोफेसर राजीव सिन्हा गंगा का हवाई सर्वे करने के बाद बताते हैं कि गाद का बहाव सचमुच में बहुत ज़्यादा है। यह अविश्वसनीय है। गाद की सफाई के नाम पर नेताओं के पास यही सफाई है कि हमने मुद्दा उठाया है।
    अर्चना जब मुंगेर के मछुआरों की बस्ती में जाती हैं तो वे बताते हैं कि पहले तीस से चालीस हाथ पानी होता था। अब तो आठ से दस हाथ गहरी रह गई है। बताइये कौन सा चैनल कौन सा अखबार बाढ़ से पहले बाढ़ की रिपोर्ट करने निकला था ।
    जुलाई की यह रिपोर्ट है। अगस्त में बिहार दह रहा है। हम फिर से बाढ़ की पुरानी कहानी सुन रहे हैं। नई बात यह है कि मरने वाले इस बार भी नए लोग हैं ।
    हिन्दी के पाठकों को अपनी दिलचस्पी का विस्तार करना चाहिए। राजनीतिक ख़बरों के नाम पर हिन्दू मुस्लिम वहशीपने से आज़ाद होने का प्रयास कीजिए। डाउन टू अर्थ हिन्दी में सब्सक्राइब कीजिए, नियमित रूप से पढ़िये। पचास रुपये की यह पत्रिका कूड़ा छाप रहे हिन्दी अखबारों से कहीं बेहतर है। अख़बार और टीवी सूचनाओं की विविधता को ख़त्म कर आपको एक सुरंग में रखना चाहते हैं। सुरंग से निकलिए।————————–सेंटर फार मोनिटरिंग इंडियन इकोनोमी(CMIE) केंद्र और राज्य सरकारों के प्रोजेक्ट पर नज़र रखती है। इस संस्था ने 962 प्रोजेक्ट का अध्ययन किया है। ये सभी 150 करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट हैं। इनमें से 36 प्रोजेक्ट 20 साल से ज़्यादा की देरी से चल रहे हैं। 67 प्रोजेक्ट 10 से 20 साल की देरी से चल रहे हैं। ज़्यादातर प्रोजेक्ट पानी और सिंचाई से संबंधित हैं। CMIE के अनुसार ये प्रोजेक्ट 32.7 लाख करोड़ के हैं। 20 साल पहले 11 नई रेल लाइनेंऔर चार आमान परिवर्तन का प्रोजेक्ट बना था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ है।
    सांख्यिकी मंत्रालय 351 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर नज़र रखता है। ये सभी 1000 करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट हैं। 127 प्रोजेक्ट में देरी हो चुकी है। 115 प्रोजेक्ट की लागत बढ़ चुकी है और 51 प्रोजेक्ट देरी भी हो चुके हैं और लागत भी बढ़ चुकी है। फरवरी 2017 तक का आंकड़ा है।
    मार्च में सांख्यिकी मंत्रालय ने आंकड़ा पेश किया है। इसके अनुसार 9 प्रोजेक्ट समय से पहले पूरे होने वाले हैं। 324 प्रोजेक्ट समय पर चल रहे हैं। 327 प्रोजेक्ट में देरी हो चुकी है। इनमें से 322 प्रोजेक्ट की लागत बढ़ चुकी है। इन सभी 1,231 प्रोजेक्ट की लागत 15.59 लाख करोड़ है जिसमें देरी के कारण 1.71 लाख करोड़ लागत बढ़ गई है।
    2016 के अंत तक के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 29.8 प्रतिशत प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। मार्च 2014 से पहले यह प्रतिशत 45.74 था। काफी सुधार है। इसके कारण लागत में भी कभी आई है यानी जितने का प्रोजेक्ट था, उतने में पूरा हो रहा है, बिजली पेट्रोलियम कोयला, स्टील और खनन क्षेत्र के बड़े प्रोजेक्ट में देरी है। कोई एक साल की देरी से चल रहा है तो कोई दो से तीन साल की देरी से। 119 प्रोजेक्ट 25 से 60 महीने की देरी से चल रहे हैं।
    पुराने प्रोजेक्ट जो 20 साल की देरी से चल रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि क्यों देरी से चल रहे हैं। क्या सरकारों ने उन्हें पूरा करना ज़रूरी नहीं समझा? उनकी ज़रूरत समय के साथ समाप्त हो गई या नई सरकार के साथ प्राथमिकता बदल गई? बहुत से कारण होंगे।
    लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड की टीम को बधाई। शाइने जेकब, मेघा मनचंदा और राजेश भयानी की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद पेश किया गया है। ताकि ख़बरों को देखने का नज़रिया बदलता रहे। इसीलिए इतनी मेहनत की।
    हिन्दी के अख़बार पोछा लगाने के लिए ही रह गए हैं। दो चार अपवादों के अलावा कुछ होता नहीं है। इतने प्रतिभाशाली पत्रकारों के रहते हुए भी संपादक उनसे कूड़ा निकलवा रहे हैं। क्या किया जा सकता है। कोई मुकाबला नहीं है कि हिन्दी के पत्रकारों की प्रतिभा का लेकिन उनसे कोई काम ही नहीं लेगा तो क्या कर सकते हैं। हिन्दी के अख़बारों में सरकार के काम की गंभीर विश्लेषण की क्षमता ही नहीं है। इसलिए हिन्दी के अख़बार बाढ़ सुखाड़ या मानवीय स्टोरी तक ही सीमित रह गए हैं जहां सरकार या किसी नेता से टकराने की नौबत नहीं आती है। वो भी बाढ़ की ख़बरों में सरकार को बचाने का प्रयास दिखता है। वैसे अंग्रेज़ी के अख़बारों की भी यही हालत है। सौ ख़बरें चाटुकारिता की, एकाध पत्रकारिता के स्तर की। बस हो गया काम। ज़्यादा बोल गया मगर ग़ौर से देखेंगे तो पता चलेगा, उतना भी ज़्यादा नहीं बोला। रवीश कुमार

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  3. सिकंदर हयात

    Madhuvandutt Chaturvedi
    13 hrs ·
    उन्हें भी पता है !
    यूपी में अचानक सड़कों गली मोहल्लों में आवारा गाय बछड़ों के झुण्ड बढ़ गए हैं । आम शहरी इस परेशानी को महसूस कर रहा है । जगह जगह इनकी वजह से ट्रैफिक अवरुद्ध होने, वाहनों से टकराने या राहगीरों को चुटैल कर देने की घटनाएं हो रही हैं । योगी जी ने साफ कह ही दिया है कि सरकार इस बारे में कुछ न करेगी । उन्होंने कहा,”यह समाज की दी हुई समस्या है इसे समाज खुद हल करे ।'” यह खतरनाक जबाब है । इस सिद्धांत के आधार पर सरकार लोकहित के हर सवाल पर हाथ झाड़ सकती है । यह योगी जी के फासिस्ट विचारों का प्रमाण है जिसमें नागरिकों के प्रति सरकार का नहीं बल्कि सरकार के प्रति नागरिकों का दायित्व प्रधान होता है । आखिर सरकार किस लिए है ? खैर , कल एक सज्जन ने सांडों से रुके ट्रैफिक में खूब कहा- “उन्हें भी पता है, उनके बेटों की सरकार आ गई है ।'”
    #पशुपुत्रों_की_सरकारसाहसिक और चौंकानेवाले ?
    कुछ मोदीभक्त अब भी अब भी समझते हैं कि नोटबंदी, इजरायल यात्रा, पाकिस्तान में बिन बुलाए जाना या तीन तलाक पर स्टैंड लेना आदि मोदी के साहसिक और चौंकाने वाले निर्णय थे । वे इनके हवाले से कट्टर हिंदुत्व को देश की दुर्दशा के बाबजूद दिलासा दे रहे हैं कि मोदी निकट भविष्य में इसी तरह राम मंदिर और धारा 370 पर बड़े फैसले लेकर चौंकाने वाले हैं । प्रचंड बहुमत, पार्टी पर एकाधिकार एवम तानाशाही तौरतरीकों के रहते नरेन्द्र मोदी ‘मनमाने’ और ‘अचानक’ फैसले लेते रहे हैं लेकिन उनमें ‘बुद्धिमत्ता का अभाव’ रहा है जिसके चलते वे फैसले देश के लिए घातक रहे हैं । नोटबंदी से हुई तवाही साबित है, साबित है कि ये एक तानाशाह का सनकी और बेबकूफना फैसला था जिससे करोड़ों लोगों को बेजा तकलीफ हुई । नवाज शरीफ से मोदी की गलबहियां बेशक बिनबुलाये मेहमान के तौर पर उनकी अम्मा के चरण स्पर्श के लिए पाकिस्तान में जहाज उतार देने तक चलीं गयीं लेकिन उसका नतीजा भी पहले से ज्यादा होस्टाइल पाकिस्तान की शक्ल में सामने आया । आतंकवाद, घुसपैठ और सीमा उल्लंघन की घटनाएं बढ़ीं, सर्जिकल स्ट्राइक के ढोल बेशक बजे, लेकिन विवाद में रहे और बेअसर भी । स्वांग और नौटंकियों के स्तरहीन कलाकार की स्टाइल से देश विदेश में घूम कर, विदेशी नेताओं से चिपट-चिपट कर मोदी ने कहा कि ‘डंका बज रहा है’ परंतु ‘मेक इन इंडिया’ का हाल गोरखपुर अस्पताल में जाते रहे बच्चों सा ही रहा है । पड़ौसियों से रिश्ते बिगड़े और दुनिया में दोस्त कम हुए हैं । इजरायल यात्रा को किसी तरह साहसिक नहीं कहा जा सकता । यहाँ हुए सब सौदे देश विरोधी थे और इजरायल के पार्टनर किन्तु पीएम के देशी यार सरमायेदारों के मुनाफे के लिए थे । कुल मिलाकर देखें तो जिसे भक्तगण ‘साहसिक’ और ‘चौंकानेवाले’ फैसले कहकर खुद को तथा अपने जैसे लोगों को दिलासा दे रहे हैं वे वस्तुतः ‘मनमाने’ और ‘अचानक’ लिए गए ‘बुद्धिहीन तानाशाही सनक’ के फैसले रहे हैं जिनसे देश को भारी नुकसान हुआ है ।
    See TranslationMadhuvandutt Chaturvedi
    Yesterday at 10:59 ·
    बन्दरिया-सा प्रेम
    दर्शित किया है आरएसएस ने वृन्दावन में नरेंद्र मोदी के प्रति जो अपने मरे हुए बच्चे को चिपकाये घूमती है । संघ को सौंपी रिपोर्ट में प्रचारकों ने नरेंद्र मोदी को पूरे अंक और एमएलए एमपीज को जीरो दिया है । जबकि यथार्थ यह है कि देश की दुर्दशा के सारे फैसले नरेन्द्र मोदी ने बिना सांसदों विधायकों की राय लिए किये हैं । नोटबंदी से तबाह हुई अर्थव्यवस्था के लिए मोदी निजी तौर पर अपराधी हैं । उनकी ऐश्वर्यशाली अधिनायक वादी शैली लोकतंत्रप्रेमियों के लिए चुभन भरी है । खुद बीजेपी के सांसद विधायकों की शिकायत रही है कि मोदी हुक्म देते हैं, सलाह नहीं लेते । देश से बार बार नरेन्द्र मोदी ने झूठ बोला है । छात्रों नौजवानों के अवसर कम हुए हौं या खेती किसानी और व्यापार धंधे चौपट हुए हौं, पड़ौसी देशों से रिश्ते ख़राब हुए हौं या सरकार की ‘सूट बूट’ छवि बनी हो , चुनाव को सांप्रदायिक रंग दिया हो या ऐसी ही और बातें हों नरेन्द्र मोदी खुद जिम्मेदार हैं । बीजेपी के एमएलए एमपीज का दोष सिर्फ इतना है कि उनमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि जैसी गैरत नहीं है । संघ इन निरीहों को व्यर्थ दोष दे रहा है ।
    #वृन्दावनMadhuvandutt Chaturvedi
    Yesterday at 08:49 ·
    बकरीद और मैं :
    मैंने बधाई दी, और देता भी रहा हूँ । मैं लोगों की ख़ुशी में खुश होना जानता हूँ जब तक कि किसी समुदाय की ख़ुशी मनुष्यों के किसी दूसरे समुदाय के वास्तविक दुःख का कारण न बने । मैं शाकाहारी हूँ, शायद पारिवारिक संस्कारों के कारण बना हूँ, अब उसे ही ठीक समझता हूँ, बहुत से डॉक्टर भी इसी की सिफारिश करते हैं , सेहत के लिए इसे मांसाहार से मुफीद बताते हैं । शाकाहारी और मांसाहारी सभी समुदायों में हैं, अनगिनत मुसलमान भी शाकाहारी हैं और अनगिनत हिन्दू मांसाहारी भी हैं । धर्म के आधार पर यह विभाजन नहीं हो सकता है । बकरीद पर शाकाहार-मांसाहार का विवाद वस्तुतः सांप्रदायिक विद्वेष से प्रेरित बहस का हिस्सा है । पशु-बलि सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही है और सभी धर्मों में अनुमन्य भी । इस्लाम में भी यह सिर्फ अनुमन्य है, अनिवार्य नहीं । कुरान से पहले के काल खंड को ‘अय्याम अल जाहिलिया’ यानि अंधकार और अज्ञान का युग माना गया है । बकरीद पैगंबर मुहम्मद से पूर्व हुए इब्राहिम और इस्माइल के किस्से से जुडी प्रथा है । यह न तो मुसलमानों के लिए फर्ज है और न हुजूर की सुन्नत । हाँ, इसका स्पष्ट निषेध भी नहीं है । यानि पशु-बलि की धार्मिक स्थिति इस्लाम में भी वैसी ही है जैसी हिंदुत्व में । हिंदुओं में भी बहुत से लोग बहुत सी जगह देवी देवताओं पर पशु-बलि करते हैं । प्राचीन हिंदुत्व में भी और कुरान से पहले के इस्लामिक आदर्शों में भी- खुद इस्माइल और इब्राहिम के किस्से में भी- नर बलि की प्रथा मौजूद थी । अब यह कहीं नहीं दिखती है । मैं निजी तौर पर किसी भी तरह की पशु बलि नहीं कर सकता हूँ, न इसे अच्छा मानता हूँ । इसे इसी तरह सहन कर सकता हूँ जैसे हिंदुओं में यत्रतत्र की जाने वाली पशुबलि को सहन किया जाता है यानि अनापत्ति योग्य । जैसे जैसे मनुष्य अधिक संवेदनशील होता जाता है , मनुष्य के प्रति, पर्यावरण के प्रति, पशुओं के प्रति, सभी जीवों के प्रति, वह स्वतः अपने व्यवहार में परिवर्तन करता जाता है । पशुबलि के साथ भी यही है । आप प्रेमपूर्ण हिंसा-रहित समाज के प्रयास करते रहिए, धार्मिक कट्टरता और दुराग्रहों से खुद मुक्त होइए , औरों को भी उस ओर चलने दीजिये तब कुछ और अच्छा समाज होगा । बकरीद के बहाने इस्लाम और मुसलमानों के प्रति विद्वेष से बकरों की जानें बच जाएँगी यह मूर्खता है, ऐसे में जबकि भारत सहित दुनियां में ज्यादातर मनुष्यों के भोजन में पशुओं का मांस शामिल है ।
    See TranslationMadhuvandutt Chaturvedi
    2 September at 23:14 ·
    वृन्दावन मंथन
    में अभी तक आरएसएस का कोई सन्देश लोकहिताय सामने नहीं आया है । सत्ता का ऐश्वर्य, सत्ता की लालसा, सत्ता की चाटुकारिता, सत्ता के समक्ष समर्पण, सत्ता पर पकड़ , स्वयंसेवकों को राजसेवकों की नयी भूमिका में लाने का विमर्श ही अब तक सामने आया है । आशंकाएं इस बात की हैं कि नरेंद्र मोदी सहित योगी खट्टर शिवराज बसुंधरा आदि की असफलताओं को छुपाने के लिए देशभर में सांप्रदायिक विद्वेष को हवा देने की योजनाएं बनाई जा रही हैं ।
    #संघ_दशाननMadhuvandutt Chaturvedi
    2 September at 22:55 ·
    तानाशाही !
    प्रधानमंत्री को पसंद नहीं कि कोई उनसे सवाल पूछे – नाना पटोले, भंडारा-गोंदिया से भाजपा सांसद.
    “भाजपा सांसदों की मीटिंग में जब मैंने उनसे पिछड़ा वर्ग मंत्रालय, किसानों की आत्महत्या, पर्यवारण टैक्स आदि की बात की तो वो नाराज़ हो गए। उल्टा मुझसे पूछने लगे कि क्या तुमने पार्टी का घोषणा पत्र पढ़ा है? क्या तुमको सरकार की योजनाएं मालूम हैं? मेरे सवालों से मोदी ग़ुस्सा हो गए और मुझे चुप हो जाने के लिए कहा।”
    “मोदी नियमित रूप से सांसदों से मिलते हैं लेकिन उन्हें हमारा सवाल पूछना पसंद नहीं है।”
    http://indianexpress.com/…/pm-modi-doesnt-like-to-take-que…/
    हितेन्द्र अनंतMadhuvandutt Chaturvedi
    2 September at 11:04 ·
    ‘मदर इंडिया’
    में एक हिंदुस्तानी मां का ऊँचा चरित्र पतित आचरण पर प्रिय पुत्र को गोली मार देता है । यहाँ बीजेपी की अम्मा यानि आरएसएस नोटबंदी से जनता को तबाह करने वाले फैसले का समर्थन कर रही है । संघ मदर इंडिया की नरगिस नहीं है बल्कि वह बीजेपी के साथ नाभिनाल सम्बद्ध है । जनकर अलग नहीं किया । लटकाए लपेटे घूम रहा है ।Madhuvandutt Chaturvedi
    2 September at 09:58 ·
    गरीबों पर पड़ी मार !
    विश्व बैंक के पूर्व वरिष्ठ उपाध्यक्ष कौशिक बसु ने कहा है कि 99 फीसद पत्र मुद्रा का नोटबंदी के बाद फिर चलन में आ जाने का मतलब है कि नोटबंदी में लगभग सभी अमीरों ने अपना पैसा आसानी से बदल लिया जबकि इसकी मार छोटे व्यापारियों , असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और गरीबों पर सर्वाधिक पड़ी Madhuvandutt Chaturvedi
    31 August at 17:02 ·
    ‘नरेन्द्र का नरमेध’
    यानि नोटबंदी मूर्खता धूर्तता अहंकार और क्रूरता भरा राष्ट्रीय अपराध था । यह सिर्फ एक तानाशाही सनक थी । रिजर्व बैंक ने जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं उन्हें देखकर नोटबंदी के समर्थकों को समझ आ जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री ने उन्हें छला था । यह प्रजा को पीएम द्वारा दी गयी महापीड़ा थी । मनमोहन सिंह ने इसे समवैधानिक रूप से की गयी महालूट सही कहा था । क्या कोई राजनैतिक दल इस महा अपराध के लिए नरेन्द्र मोदी को दण्डित करने की बात को अपना एजेंडा बनायेगा ?।Madhuvandutt Chaturvedi
    30 August at 23:17 ·
    कालिख ?
    भाषाई दरिद्रता ही नहीं, यह सभ्य लोकतान्त्रिक समाज में अराजक व्यवहार का एलान है । यूपी के सीएम योगी ने कल राजधानी लखनऊ में एससीसी में फर्स्ट एम्प्लॉयमेंट समिट में कहा कि वे भ्रष्ट अधिकारियों के मुहं पर कालिख पुतवायेंगे । यह अधिकारियों को धमकी है । कालिख पुतवाने का कोई कानून है ? कालिख किससे पुतवायेंगे ? पुलिस से ? संघी-सेना से ? अपील दलील कुछ होगी भी ? गलती या साजिश से पोती गयी कालिख का डर या तो कुछ करने न देगा या फिर वही करने देगा जो संघी कराना चाहेंगे । वैसे ये भाषा गुंडई की है न ?Madhuvandutt Chaturvedi
    30 August at 09:10 ·
    मोदी जी !
    गोरखनाथ के दर्शन करने फ़िलहाल क्यों नहीं जा रहे ? चुनावों में ही क्यों ? जाइये वहां… वहां किसी बाल गणेश को महाशिव पुनरुज्जीवित तो न कर सकेंगे किन्तु आपके जाने से कदाचित कुछ और बुरा होने पर रोक लग सके । आप इतने निर्मम क्यों हैं कि बच्चों की मौतों ने आपके ‘मन की बात’ में स्थान भी नहीं पाया ?Madhuvandutt Chaturvedi
    28 August at 08:35 ·
    इस साहस को सलाम !
    अमेरिका में टीवी होस्ट पद्मा लक्ष्मी ने राष्ट्रपति ट्रम्प को ‘सामाजिक बुराई’ बताया है । उन्होंने कहा कि ट्रम्प ने ‘पद को अपवित्र’ किया है । उन्होंने यह भी कहा कि वे उन्हें ‘मानव सभ्यता के लिए प्लेग जैसी बीमारी’ के तौर पर देखती हैं । सवाल यह है कि क्या भारत में कोई टीवी होस्ट, एंकर , पत्रकार या संपादक ऐसा साहस दिखा सकता है ? वह भी भिन्न राष्ट्रीयमूल का होकर ? क्या हमारा नागरिक समाज ऐसी आलोचना को स्थान देने योग्य परिपक्व है ? हालात यहाँ भी तो ऐसे ही हैं न ?Madhuvandutt Chaturvedi
    12 hrs ·
    द्वेषान्ध !
    ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के साथ ही अमेरिका में भारतीयों पर नस्लीय हमले बढे हैं, उनकी मुसीबतें भी बढ़ी हैं । जिनमें ज्यादातर शिकार हिंदू और सिख हुए हैं । हाल में भारतीय मूल की अमेरिकी टीवी होस्ट पद्म लक्ष्मी ने जब असाधारण साहस के साथ ट्रम्प की निर्मम आलोचना की तो भारतीय हितों के शुभेच्छुओं को संतोष हुआ, उन्होंने इसकी प्रशंसा की । किन्तु कतिपय मोदिभक्तों ने खोज निकाला कि पद्मलक्ष्मी लेखक सलमान रश्दी की कभी बीबी रहीं थीं, उन्होंने कहा कि ट्रम्प दुनिया के मुसलमानों की ‘बजाने’ आया है इसलिए पद्मलक्ष्मी मुसलमानों की चिंता में ऐसे बयान दे रही है । इन मूर्खों को कौन समझाए कि सलमान रश्दी का नाम मुसलमानी है लेकिन ये वही लेखक है जिसकी ‘सैटेनिक वर्सेज’ के लिए कट्टरपंथी मुसलमानों ने उसके सर पर करोड़ों डॉलर का इनाम रखा हुआ है । दूसरे , यह कि द्वेषान्धों को यह भी दिखाई नहीं दे रहा कि अभी तक ट्रम्प समर्थकों ने हिन्दू और सिखों की ही ‘बजाई’ है । पद्मलक्ष्मी या सलमान रश्दी कभी इस्लामिक मूल्यों के पैरोकार नहीं रहे । पद्मलक्ष्मी खुद मुसलमान नहीं हैं । ट्रम्प के समर्थन से स्पष्ट है कि द्वेषान्ध हिंदूवाद आखिर किस तरह मनुष्य के विवेक को नष्ट कर देता है और जो भी उसके प्रभाव में आता है उसके हीये की फूट जाती हैं ।Madhuvandutt Chaturvedi
    13 hrs ·

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