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राम आत्रे

कछुए और खरगोश की दौड़ समाप्त हो चुकी थी। बहुत से पत्रकार और रिपोर्टर वहां उपस्थित थे, उन्होंने इस जीत पर कछुए से उसका विचार जानना चाहा।

कछुए ने कहा, ‘मुझे तो मालूम ही नहीं कि मैं जीता हूं या हारा। आप कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे। फिर भी अगर मे जीता हूं तो ये जीत दलितों और पिछडों की जीत है- जिन्हें ऊंची जात वाले शुरू से ही उनका मजाक और मनोरंजन का सामान समझते रहे है। एक बात और वह ये कि मैंने जीतने के लिए दौड़ मे हिस्सा नही लिया था। मुझे तो अपना फर्ज अदा करना था सो किया।’

इधर खरगोश ने अपना विचार रखते हुए कहा, ‘कौन कहता है कि मैं हार गया हूँ? क्या आप लोग के कहने से मैं हार जाऊंगा? मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है कि मैं कछुए जैसे सुस्त जानवर से शर्त लगाता और फिर उससे हार कर अपनी जात के नाम पर बट्टा लगवाता? मुक़ाबला तो अपने बराबरवालों से होता है। समझे? दौड़, चुस्ती, फुर्ती और खूबसूरती के मामले मे तो खरगोश हमेशा जीतते रहे है और जीतते रहेंगे। मैंने तो जान बूझकर कछुए से मजाक किया था कि कम से कम एक दिन तो उसे खुश होने का मौका मिल जाए। मैं जान बूझकर पेड़ के साये मे आराम करने लगा था और जब मुझे यक़ीन हो गया के कछुवा निशाने तक पहुच गया होगा तो मैं वहां से चला था। उसे अगर अपने दौड़ने की ताक़त पर इतना ही घमंड है तो मैं जब कहो दौड़ने के लिए तैयार हूं।

एक और बात कि आप मीडिया वाले इसकी जीत का ढोल पीट-पीट कर इसे हीरो बना देंगे। इस तरह तो आने वाली नस्ल कछुवे की तरह चलना शुरु कर देंगी। फिर इस मुल्क का क्या होगा? सोच लीजिए…?