डरा हुआ है या डरा रहा है मुसलमान?

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संजय तिवारी

तारीख २६ जून। ईद का दिन। मेरठ के ईदगाह में लोग ईद की नमाज अदा करने आये। हजारो की तादात। नये कपड़े। नयी टोपी। नया चप्पल। शरीर पर सबकुछ नया नया। लाउडस्पीकर से नमाज अदा करायी गयी। इसके बाद तेवहार के दिन “प्रेम और भाईचारे” का संदेश प्रसारित किया गया। “मुसलमान मोदी और योगी सरकार से डरे नहीं।” हजारों लोगों की भीड़ चुपचाप कारी की तकरीर सुनती रही और अपने भीतर का डर बाहर निकालने की कोशिश करती रही। डर निकला या और गहरे बैठ गया, यह तो पता नहीं लेकिन कारी शफीकुर्रहमान ने चेतावनी जारी करते हुए यह जरूर हिदायत दे दी कि “जो भी मुसलमानों पर जुल्मों सितम करता है अल्लाह उसका इतिहास से नामोनिशान मिटा देते हैं।”

मेरठ शहर का ही सोतीगंज बाजार। कहने के लिए इसे उत्तर भारत का सबसे बड़ा कबाड़ी बाजार कहा जाता है लेकिन हकीकत में यह चोरी की गाड़ियों को खरीदने बेचने का सबसे बड़ा बाजार है। इस बाजार पर इकतरफा मुसलमानों का राज है। मीडिया का कहना है कि दिल्ली और एनसीआर से जो गाड़ियां चुराई जाती हैं उनमें अधिकांश यहीं सोतीगंज पहुंचती हैं। जब तब यहां पुलिस कार्रवाई करती रहती है लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि पुलिस की मिलीभगत से ही यहां चोरी की गाड़ियों को काटने और बेचने का काम किया जाता है। लेकिन जब से यूपी में योगी सरकार आयी है यहां पुलिस की दबिश बढ़ गयी है। जब तब न सिर्फ छापेमारी होती है बल्कि विरोध करने पर गिरफ्तारियां भी की जाती है। ऐसी आखिरी कार्रवाई इसी तीन जुलाई को हुई थी जिसमें विरोध करने पर दर्जनभर लोग गिरफ्तार भी किये गये।

अकेले मेरठ शहर की ही ये दो घटनाएं जिसमें मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार और मुस्लिम कारी द्वारा ऐसे अत्याचारों के विरोध का आवाहन दोनों दिखता है। सवाल ये उठता है कि क्या देश में सचमुच मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है जिसकी वजह से उन्हें डरकर जीना पड़ रहा है? कम से कम कुछ वामपंथी पत्रकारों की दलीलों और रपटों से तो यही लगता है कि देश में ऐसा वातावरण बन गया है कि मुसलमान दहशत में जी रहे हैं। बीते दो साल में गाय के नाम पर कुछ मुसलमानों की मार पिटाई इस बात का सबूत भी पेश करती है गौ रक्षा के नाम पर हिन्दुओं का एक धड़ा मुसलमानों के साथ गुंडई कर रहा है जिसकी वजह से मुसलमान दहशत में हैं।

असल में यह सिक्के का एक पहलू है जब यह बताया जाता है कि किसी मुस्लिम को गौ हत्या या फिर गौ तस्करी के “संदेह” में मारा पीटा गया। सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि इतनी सारी कानूनी सख्ती के बाद भी मुसलमान गाय काट रहे हैं। अकेले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में रमजान के महीने में आधा दर्जन से गाय काटने की घटनाएं सामने आयीं और जब पुलिस कार्रवाई करने पहुंची तो पुलिस को मारपीट कर भगा दिया गया। इसी तरह बहुचर्चित जुनैद हत्याकांड में खुद जुनैद मारपीट के इरादे से दूसरे डिब्बे से साथियों को लेकर आया था लेकिन दुर्भाग्य से उसकी जान चली गयी। लेकिन मीडिया के एक धड़े ने इसे भी गौ रक्षा के नाम पर हत्या कहकर प्रचारित कर दिया।

“मुसलमान कहीं से डरा हुआ नहीं है। वह डर का डर दिखा रहा है जो कि मुस्लिम उलेमाओं और नेताओं की पुरानी नीति रही है।”

शायद इसी प्रचारतंत्र का प्रभाव है कि जाते जाते उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तक यह कह गये कि देश में एक वर्ग भयभीत है। जमीनी हकीकत इससे उलट है। जिस वर्ग को हामिद अंसारी भयभीत बता रहे हैं उसी वर्ग में बड़ी संख्या ऐसी है जो मेरठ के सोतीगंज से लेकर दिल्ली के दरियागंज तक चोर बाजार चला रहा है। काटने से लेकर गाड़ी काटने तक हर गैर कानूनी काम को अंजाम दे रहा है। अभी तक एक भीड़तंत्र का सहारा लेकर वो अपने गैर कानूनी काम को प्रश्रय देते रहे हैं। लेकिन अब प्रशासन (कम से कम यूपी में) उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है तो इसे वो अपने उत्पीड़न से जोड़ रहे हैं। जमीनी हकीकत ये है कि मुसलमान कहीं से डरा हुआ नहीं है। वह डर का डर दिखा रहा है जो कि मुस्लिम उलेमाओं और नेताओं की पुरानी नीति रही है। सत्तर अस्सी साल पहले भी मुसलमानों ने यही डर दिखाया था कि अगर बहुसंख्यक हिन्दुओं की सरकार बनी तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए पाकिस्तान ले लिया।

मुसलमानों में डर एक कारगर रणनीति है जिसे दिखाकर राजनीतिक बढ़त हासिल की जाती है। वह डराकर तो राजनीतिक फायदा लेता ही है, डरकर भी राजनीतिक फायदा उठाता है। मुसलमानों के भीतर का यह डर उनकी राजनीतिक विचारधारा से ही आता है। उन्हें लगता है कि जैसे बहुसंख्यक होने पर मुसलमान गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है वैसे ही दूसरे धर्म के लोग भी करते होंगे। जबकि हकीकत ये है कि सिर्फ इस्लाम ही दुनिया का इकलौता ऐसा मजहब है जो धर्म के नाम पर गैर मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक घोषित करता है, और सच्चे इस्लामिक राज्य में तो जीने के हर अधिकार छीन लेता है। दुनिया का कोई भी शासन प्रशासन यह घृणित काम नहीं करता। मुसलमान नेताओं और बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वो डर का डर दिखाने से अच्छा है मुसलमानों को सही रास्ते पर लायें। इससे उनका डर भी चला जाएगा और डर की शिकायत भी दूर हो जाएगी।

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14 thoughts on “डरा हुआ है या डरा रहा है मुसलमान?

  1. सिकंदर हयात

    जो लोग शाकाहार मांसाहार को इंसानियत से जोड़ कर देखते हे ( हलाकि शाकाहारी होना बहुत अच्छी बात हे ) वो देखे की किस तरह से संघियो ने गोरखपुर नरसंहार पर चुप्पी ही साध ली और ये शुद्ध शाकाहारी राक्षस संजय तिवारी तो और दो कदम आगे निकल गया पढ़े किस बेशर्मी से अपने योगी मोदी भाजपा का बचाव कर रहा हे लोगो का ध्यान भटका कर Sanjay Tiwari
    4 hrs ·
    पेमेन्ट रुकने से ऑक्सीजन सप्लाई रोक दिया कंपनी ने और कुल 48 लोग मर गए। सरकारी दफ्तरों का यही हाल हैं हर जगह… किसी भी सरकारी दफ्तरों को ले लीजिये उधर के कर्मचारियों ने गंद मचा रखा है। अगर कोई पेमेंट रुकने की बात से अचंभित है तो उसका पाला नहीं पड़ा हैं इनसे …. हमारा इनसे पाला पड़ने का ही काम है … हर सप्ताह सोमवार और शुक्रवार इन दफ्तरों में बकाए की राशि के लिए चिट्ठी भेजना प्रमुख काम है।
    घूस खाने के बाद भी पेमेंट लटकाए रखते हैं, जैसे इनकी मैय्यत के खर्चे का पैसा निकाल के दे रहे हों। बाबू अपने टेबल पर 500 रुपये, कोई 1000, कोई 5000 – (ये रकम तय कमीशन के अलावा बख़्शीश भी हो सकती है) औकतानुसार नहीं पहुंचने तक महीनों पेमेंट अटका के रखते हैं।
    कानूनन आपूर्ति करने वाले को पहले माल सप्लाई करना होता है, समय पर VaT/GST भरना होता है, समय पर एडवांस टैक्स भरना होता है, घूस खिलाना होता है, कई केस में तो बैंक गारन्टी भी देनी होती है साल भर की और फिर इतना करने के बाद भी महीनों पेमेंट का इंतज़ार। जब एक लिमिट हो जाता है तब कंपनी अगली सप्लाई को मना कर देती है या फिर इन सबको देखते हुए सरकारी दफ्तरों में 1 का माल 10 में बिकता है।
    इस देश में सबसे बड़ी समस्या है बाबूगिरी। सरकारी बाबू बड़े वाले से लेकर छोटे वाले तक ये सब “अल कायदा” जैसे आतंकवादी है। खोजबीन करेंगे तो पता चल जाएगा कि इन बाबुओं की वजह से भारत में जितनी मौत हुई होंगी उससे मुकाबले अल कायदा, लश्कर या इंडियन मुजाहिदीन कहीं नहीं ठहरता ….
    Ranjay त्रिपाठी —————————————————————–Dilip C Mandal added 2 new photos.
    1 hr ·
    जब योगी गोरखपुर में बच्चों को मार रहे थे तो डॉक्टर कफ़ील अपने ATM से ख़र्चा करके बच्चों के लिए ऑक्सीजन ख़रीद रहे थे।
    योगी ने नहीं देखा कि जिनको वे मार रहे हैं वे हिंदू हैं कि मुसलमान।
    डॉक्टर कफ़ील ने भी नहीं देखा कि जिनको वे बचा रहे हैं वे हिंदू हैं कि मुसलमान।
    शुक्रिया डॉक्टर कफ़ील।
    जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो आपका नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
    योगी-मोदी का नाम कूड़ेदान में होगा।Dilip C Mandal
    13 hrs ·
    वादा तो श्मशान का ही था. मोदी-योगी वचन के पक्के हैं.5 Replies · 5 hrs
    रमेश मीणा
    रमेश मीणा परिवार व् बच्चो के दर्द वोही समझ सकता है . जिसके घर में अपने बच्चे हो … जो पशुओ और चेले सपाटो में अपना जीवन व्यतीत किया हो वे ये दर्द नही समझ सकता … बहुत ही दुखद घटना !!!Dilip C Mandal
    13 hrs ·
    गोरखपुर में क्या हुआ, एक डॉक्टर की नजर से देखिए.
    अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन? -डॉ. नवमीत
    11 अगस्त की खबर है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिए जाने की वजह से 40 बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे एनएनयू वार्ड और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती थे। जनवरी से लेकर 11 अगस्त तक इंसेफेलाइटिस की वजह से इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 151 मासूमों की मौत हो चुकी है जिनमे से 40 बच्चे 10 और 11 अगस्त को मर गए।
    गौरमतलब है कि यह मेडिकल कॉलेज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व संसदीय क्षेत्र में आता है। आदित्यनाथ घटना से दो ही दिन पहले इस अस्पताल का दौरा भी करके गया था। खबरों के अनुसार अस्पताल पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 69 लाख का बिल बकाया था। इस वजह से कंपनी ने गुरुवार यानि 10 अगस्त को अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।
    लिक्विड ऑक्सीजन बंद होने के बाद आज सारे ऑक्सीजन सिलेंडर भी खत्म हो गए। इंसेफेलाइटिस वार्ड में दो घंटे तक अम्बू बैग का सहारा लिया गया लेकिन बिना ऑक्सीजन के यह तरीका ज्यादा देर तक कारगर नहीं हो पाया और इस तरह से सरकार की उदासीनता, अस्पताल प्रशासन की लापरवाही और कंपनी की मुनाफाखोरी की गाज अस्पताल में भर्ती बच्चों पर गिरी।
    बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दो वर्ष पूर्व लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड समेत 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। इसकी सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स है। कालेज पर कंपनी का 68 लाख 58 हजार 596 रुपये का बकाया था और बकाया रकम की अधिकतम तय राशि 10 लाख रुपये है।
    बकाया की रकम तय सीमा से अधिक होने के कारण देहरादून के आईनॉक्स कंपनी की एलएमओ गैस प्लांट ने गैस सप्लाई देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बात की बात में 40 मासूम इस मुनाफाखोर व्यवस्था की भेंट चढ़ गए।
    यह भी एकदम से नहीं हुआ, बल्कि गुरुवार की शाम से ही बच्चों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी पड़ी थी और एक-एक कर बच्चों की मौत हो रही थी।
    अस्पताल के डॉक्टरों ने पुष्पा सेल्स के अधिकारियों को फोन कर ऑक्सीजन भेजने की गुहार लगाई तो कंपनी ने पैसे मांगे। तब कॉलेज प्रशासन भी नींद से जागा और 22 लाख रुपये बकाया के भुगतान की कवायद शुरू की। पैसे आने के बाद बाद ही पुष्पा सेल्स ने लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर को भेजने का फैसला किया है।
    लेकिन अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी और 40 बच्चे भी मर चुके थे। यह खबर आने तक कहा जा रहा था कि यह टैंकर शनिवार की शाम या रविवार तक ही अस्पताल में पहुंच पायेगा। मौत के ऊपर लापरवाही और लालच का यह खेल भी नया नहीं है, पिछले साल अप्रैल में भी इस कंपनी ने 50 लाख बकाया होने के बाद इसी तरह ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।
    दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन का रुख भी इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संकट की जानकारी दी और मदद मांगी। मगर जिले के आला अधिकारी बेपरवाह रहे। वार्ड 100 बेड के प्रभारी डॉ. कफील खान के बार बार फोन करने के बाद भी किसी बड़े अधिकारी व गैस सप्लायर ने फोन नहीं उठाया तो डॉ. कफील ने अपने डॉक्टर दोस्तों से मदद मांगी और अपनी गाड़ी से ऑक्सीजन करीब एक दर्जन सिलेंडरों को ढुलवाया। उनकी कोशिशों के बाद एसएसबी व कुछ प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कुछ मदद की गई।
    सशस्त्र सीमा बल के अस्पताल से बीआरडी को 10 जंबो सिलेंडर दिए गए। लेकिन अभी भी स्थिति भयावह थी और ज्यादा मौतें होने की सम्भावना बनी रही थी।
    बीमारी का यह हमला आकस्मिक नहीं था। इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल हमारे देश में हजारों बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी हर इसी मौसम में अपना कहर ढाती है। 1978 से अब तक इंसेफेलाइटिस अकेले पूर्वांचल में 50 हजार से अधिक मासूमों को लील चुकी है। 2005 में इसने महामारी का रूप लिया था। तब अकेले बीआरडी मेडिकल कालेज में 1132 मौतें हो गई थीं।
    मई 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान शुरू किया था। मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि मोदी के आशीर्वाद से पोलियो और फ़ाइलेरिया की तरह इंसेफेलाइटिस को भी खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन हुआ ये कि जो बच्चे बच सकते थे उनकी एक तरह से हत्या कर दी गई। अब गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने घटना की जांच की बात कही है।
    जाहिर है जब तक जाँच होगी तब तक हमेशा की तरह इस मामले को भी फाइलों के नीचे दबाया जा चुका होगा।
    और यह सिर्फ गोरखपुर या इस एक अस्पताल की बात नहीं है। पूरे ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल है। जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेदारी होती है सरकार की। लेकिन अव्वल तो सरकार यह करती नहीं है और कुछ सरकारी अस्पताल जो ठीक ठाक काम करते भी थे उनकी हालत भी अब बद से बदतर होती जा रही है।
    पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों और नवउदारवादी नीतियों के चलते यहाँ हर क्षेत्र की तरह जनस्वास्थ्य की हालत भी खस्ता हो चुकी है। सरकार लगातार इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाती जा रही है। अब पूंजीपति तो कोई भी काम मुनाफे के लिए ही करता है तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी तो होनी ही हैं। और महँगी होने के बाद भी जान नहीं बचती।
    परिणाम हमारे सामने है। किस तरह मुनाफे के लिए पुष्पा सेल्स नाम की इस कंपनी ने 40 बच्चों की जान ले ली है। लेकिन साथ में सरकार और प्रशासन भी बराबर जिम्मेदार है।
    बहरहाल अच्छे दिनों, भारत निर्माण, इंडिया शाइनिंग के लोकलुभावने नारे देने वाली और लव जिहाद, गौहत्या जैसे साम्प्रदायिक मुद्दे उछालने वाली सरकारों को आम आदमी की सेहत का कोई ख्याल नहीं रहता है। पहली बात तो ऑक्सीजन या दवाओं या फिर किसी भी जरूरी सामान की उपलब्धता सरकार को ही सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर नहीं करती है तो इस उपलब्धता को सुनिश्चित के लिए जरुरी बजट हर हाल में उपलब्ध होना चाहिए। साथ में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि यह बजट सही समय पर सही जगह लग जाए। लेकिन इनमें से कोई भी चीज नहीं होती और इसी तरह से मरीज मौत का शिकार हो जाते हैं।
    बजट की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाना चाहिए। भारत की सरकारों ने पिछले दो दशक के दौरान लगातार 1 प्रतिशत के आसपास ही लगाया है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 2 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था और केवल 1.09 प्रतिशत ही लगाया गया। 12वीं योजना के पहले सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक ग्रुप बनाया था जिसने इस योजना में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का 2.5 प्रतिशत निवेश करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार द्वारा लक्ष्य रखा सिर्फ 1.58 प्रतिशत। पिछले बजट में भी यह डेढ़ प्रतिशत के आसपास ही रहा है।
    भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा किया गया निवेश इस क्षेत्र में किये गए कुल निवेश का 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है। पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत निजी क्षेत्र की होने वाली सबसे बड़ी भागीदारियों में एक नाम भारत का भी है। जाहिर है कि निजी क्षेत्र की ये कंपनियां लोगों के स्वास्थ्य की से खेलते हुए पैसे बना रही हैं। इनकी दिलचस्पी लोगों के स्वास्थ्य में नहीं बल्कि अपने मुनाफे में होती है और जब इनको लगता है कि मुनाफा कम होने लगा है या उसमें कोई अडचन आ गई है तो ये ऐसा ही करती हैं जैसे इन्होने गोरखपुर के इस अस्पताल में किया। और यह सब सरकार की शह पर होता है।
    इसके अलावा देश के हर नागरिक हो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सही समय पर सही अस्पताल, डॉक्टर और इलाज मुहैया हो यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।
    मानकों के अनुसार हमारे देश में हर 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हर एक लाख की आबादी पर 30 बेड वाले एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और हर सब डिविजन पर एक 100 बेड वाला सामान्य अस्पताल होना चाहिए लेकिन यह भी सिर्फ कागजों पर है। और यह कागजों के मानक भी सालों पुराने हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव करना तो दूर की बात है इन्हीं मानकों को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता जबकि पिछले दो दशक में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट और कॉर्पोरेट अस्पताल जरुर उग आये हैं जिनमें जाकर मरीज या तो बीमारी से मर जाता है या फिर इनके भारीभरकम खर्चे की वजह से। अब सरकार एक और शिगूफा लेकर आई है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप। मतलब सरकार अब प्राइवेट कंपनियों के साथ सहकारिता करेगी और लोगों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाएगी। यह शिगूफा और कुछ नहीं बल्कि पुष्पा सेल्स जैसी कंपनियों को मुनाफा देने की कवायद है ताकि ये पैसे बना सकें और समय आने पर इस मामले की तरह लोगों की जान से खेल सकें।
    बहरहाल बात ये है कि इन बच्चों सहित इस देश में रोज होने वाली ऐसी मौतों, जिनको रोका जा सकता था, के लिए मुनाफे पर आधारित यह व्यवस्था जिम्मेदार है। साथ में जिम्मेदार है इस देश की सरकारें जो कहने को तो इस देश की हैं लेकिन काम वे करती हैं पूंजीपतियों के लिए। किस तरह से इस मानवद्रोही व्यवस्था को खत्म किया जाये यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब हम सबको ही ढूँढना होगा ताकि इस तरह से मासूमों की बलि न चढ़ सके।

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  2. सिकंदर हयात

    Umashankar Singh shared Priyabhanshu Ranjan’s post.
    12 August at 10:53 ·

    Priyabhanshu Ranjan
    12 August at 10:17 ·
    Times Now चैनल की एक ‘बड़ी’ जर्नलिस्ट हैं नविका कुमार।

    अपने चैनल पर एक शो के दौरान विपक्ष के एक नेता को लताड़ लगाने के अंदाज में कह रही थीं कि हम मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के मुद्दे पर बहस कर रहे हैं और आप अस्पताल में बच्चों की मौत का मुद्दा उठाकर ध्यान भटकाना चाह रहे हैं?

    जी हां, नविका कुमार एक महिला हैं। किसी बच्चे की मां भी होंगी!
    ‘उग्र राष्ट्रवाद’ या फिर किसी तरह की लालच या किसी खौफ ने नविका कुमार जैसे पत्रकारों को आला दर्जे का दानव बना दिया है!Priyabhanshu Ranjan
    13 August at 09:15 · New Delhi · आतंकवाद के एक मामले में आरोपी रह चुके RSS के नेता इंद्रेश कुमार ने हामिद अंसारी को भारत छोड़कर चले जाने को कहा है!
    इंद्रेश बाबू, कान खोल कर सुन लो और आंखें खोल कर ये फेसबुक पोस्ट पढ़ लो।————————–Narendra Nath
    13 August at 17:37 ·
    गोरखपुर और बिहार में हर साल इनसेफ्लाइटिश से होने वाली मौत या बेसिक मेडिकल सुविधाओं को ठीक करने के प्रति सरकारें कितनी ईमानदार होती हैं उसे जानें।
    2014 में जब नरेन्द्र मोदी पीएम बने तो उन्होंने खुद डॉक्टर रहे हर्षवर्धन को हेल्थ मिनिस्टर बनाया। वे खुद बेहतरीन डॉक्टर हैं। बहुत ही सिंपल और ईमानदार। उन्हें पोलिया अभियान को शुरू करने का क्रेडिट भी जाता रहा है।
    खैर,उम्मीद बंधी कि अच्छे बंदे को मिनिस्ट्री दी गयी। हर्षवर्धन ने तुरंत मिशन शुरू किया। पद संभालते ही दो महीने के अंदर इनसेफ्लाइटिश फैली। वे बिना आरोप-प्रत्याराेप कि मैं अभी तो मंत्री बना हूं,पिछली सरकार ने क्या किया आदि का बहाना लगाए चुपचाप काम में लग गये। संभवत: पहली बार कोई सेंट्रल हेल्थ मिनिस्टर ने सिर्फ सर्वे-दौरा न कर बल्कि प्रभावित इलाकों में कैंप किया। सात दिन-रात बिताए। पूरा ब्लू प्रिंट बनाया। काम करते दिखे।
    इनसेफ्लाइटिश के साथ उन्होंने तंबाकू माफिया के गिरेबां पर भी अपनी हाथ बढ़ायी। मेडिकल एडमिशन माफिया काे पकड़ने का अगला अजेंडा बनाया। उनपर नकेल कस दिया। बस कुछ महीने में ही उनका ग्राफ से तेजी से बढ़ने लगा। माफिया का कद घटने लगा।
    लेकिन तभी आश्यर्चजनक तरीके से उन्हें हेल्थ मिनिस्ट्री से हटाकर डंप कर दिया गया। जब सरकार टैलेंट क्राइसिस से गुजर रही थी,एक बंदा जो विशेषज्ञ है किसी फील्ड का,उसे हटा दिया गया। उनके खिलाफ हर वह लोग लगे थे जो मेडिकल माफिया के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं।
    हर्षवर्धन के हटाने का असर यह था कि अगले ही दिल आईटीसी कंपनी के शेयर ने रिकार्ड जंप मारा जो सबसे बड़ी टोबैको कंपनी है।
    पॉवर सर्किल में यह बात दबीं जुंबा में सभी मानते हैं कि हेल्थ मिनिस्ट्री सबसे बड़ी वसूली मिनिस्ट्री होती है आैर फंड जमा करने की जिम्मेदारी इनपर ही होती है। मतलब या तो ये फंड जमा करेंगे या ईमानदारी से काम करेंगे। दोनोंएक साथ सम्भव नहीं।
    जो सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा था उसे कुछ महीने के लिए तोड़ने की कोशिश की गयी लेकिन वह कोशिश जल्द ही हार गयी। फण्ड जुटाना राजनीति का सबसे अनिवार्य काम होता है।
    मेडिकल जगत में एक सीट को बेचने से लेकर हर डील तक लाखों-करोड़ों की डील होती है जिसमें मीडिया-पक्ष-विपक्ष-ब्यूरोक्रेसी सभी का जबर्दस्त महागठबंधन है। अभी भी मेडिकल जगत से जुड़ा एक घपला पॉवर सर्किल में बहुत चर्चा का विषय बना हुआ है। याद हाेगा कि किस तरह डेढ़ साल पहले रात के आठ बजे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने रिटायर करने से पहले प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के पक्ष में करोड़ों का लाभ पहंचाने वाला अादेश सुनाकर निकल लिये थे।
    जाहिर है ऐसी सूरत में बुनियादी हेल्थ सेक्टर को ठीक करना हेल्थ मिनिस्ट्री के लिए कोई प्राथमिकता नहीं होती है। वह ऑटो मोड में चलती है जिसमें कमीशन-दलाली-घूस-नकारापन अपने हिसाब से चलते रहता है।
    इसिलिए गोरखपुर हादसे को पहला या अंतिम मान कर जो इसे मुद्दा बना रहे हैं वे गलतफहमी में न रहें। यह चलता रहेगा। जबतक इनकी प्राथमिकता ठीक नहीं होगी।
    हामिद अंसारी भारत छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। वो भारत के ही नागरिक हैं और उन्होंने आपसे कहीं ज्यादा इस देश की सेवा की है।
    भारत अभी RSS के लोगों की जागीर नहीं बना है कि किसी का यहां रहना या न रहना आप तय करें।
    बहरहाल, हम असल मुद्दे से भटकने वालों में से नहीं हैं।Narendra Nath
    12 August at 18:53 ·
    गोरखपुर में मौत होने के पीछे ऑक्सीजन की कमी मुख्य कारण है। जहां एक एमएलण् को अपने पक्ष में करने के लिए राजनीतिक दल करोड़ों की पेटी खोल दे रही है,वहीं बच्चों के लिए ऑक्सीजन खरीदने के लिए कुछ लाख पिछले तीन महीने में जुटा सकी। इसी से अंदाजा लगाएं कि इनकी जिंदगी सरकारें-सिस्टम के लिए कितनी मायने रखती हैं।
    अब बात गोरखपुर से दिल्ली की भी। दिल्ली की एक खबर की जानकारी कई लोगों को नहीं होगी। यहां पिछले एक महीने में 9 गरीब की मौत हो गयी। ये सभी सीवर साफ करने वाले हैं। आज भी 2 मरे हैं। सीवर के अंदर गंदगी साफ करने गये तो अंदर की गंदगी इस कदर जहर बन गयी थी कि उनकी मौत वही दम घूंट कर हो गयी। हां,सही पढ़ा। 9 लोगों की मौत 1 महीने में। कई लोगों की रूह कांप जाएगी यह जानकार कि ये मजदूर गंदगी में उतरने से पहले नशा करते हैं। नशा इस कारण करते हैं कि गंदगी की दुर्गंध को झेलने की ताकत आ सके। पूरे देश में ऐसे लाखों लोग हैं जो हर दिन यह काम करते हैं और ये यह काम 500-1000 सरकारी रूपये के लिए करते हैं। अौसतन हर दिन एक मौत होती है।
    लेकिन इन सब घटनाओं को पढ़ते-समझते-जानते हमारी देशभावना आहत नहीं होती है। हमारा राष्ट्रवाद नहीं जगता है। दरअसल हम खोखले राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं जिसमें देश से तो प्रेम करें लेकिन देश के लोगों से प्यार नहीं करना,उनके सरोकारों से कोई मतलब नहीं होना होता है।
    जो सरकारें 15 अगस्त पर मूसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए रिकार्डिंग करने का फरमान सुना रहे हैं वे जरा अपने साथ अपने गिरेबां की रिकार्डिंग भी देश के लोगों को दिखाते रहें। अगर ऐसा करेंगे तो न गोरखपुर में बच्चे मरेंगे न दिल्ली में मजदूर। औैर ऐसा हुआ तो मूसलमान वंदे मातरम नहीं भी गाएंगे तब भी बेहतर देश कहलाएंगे।
    कल ऐसा ही एक रिकार्डिंग एक टीवी चैनल पर दिखायी थी जिसमें यूपी के एक मंत्री सभी मूसलमानों के लिए वंदे मातरम गाने की शर्त को गरज कर सही ठहरा रहे थे लेकिन जब झटके में उनसे खुद पूरा वंदे मातरम सुनाने कह दिया गया तो पता चला कि उन्हें खुद यह नहीं आता है।
    आप अपनी सरकार से पूछो कि #GorakhpurMassMurder का जिम्मेदार कौन है और उनके खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई।
    भाजपा के अपने ‘चेलों’ से पूछो कि एक FIR दर्ज होने पर तेजस्वी यादव का इस्तीफा मांगने वालों ने गोरखपुर में 60 बच्चों की मौत पर अब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के इस्तीफे के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया।—————Dinesh Choudhary
    4 hrs ·
    इतने आत्मविश्वास के साथ झूठ बोलना उच्च कोटि की कला है। कोई अवतारी पुरुष ही यह काम कर सकता है।
    ऐरे -गैरे, नत्थू -खैरे तो सच बोलने में ही रिरियाने लगते हैं। ऐसा लगता है जुबान अभी की अभी हलक से बाहर निकल जाएगी। बात-बात में थूक गटकते हैं और चेहरे पर भाव ऐसे होते हैं जैसे घर से सौ जूते खाकर निकले हों। लानत है उन पर। आक थू!!
    देख लो। समझ लो। गाँठ बाँध लो। मुख मुद्रा देखो। भंगिमाएं देखो। भुजाओं की फड़कन देखो। चेहरे में ऎंठन देखो। देह की भाषा देखो। आँखों में समाई आशा देखो। चपलता देखो। वाक पटुता देखो। लय-ताल देखो। उतार-चढ़ाव देखो। आरोह-अवरोह-सम देखो। विलम्बित देखो-द्रुत देखो। झूठ बोलो तो बस ऐसे ही बोलो।
    यह सच्ची कला है। साधना है। तप है। योग है। कठिन परिश्रम से मिलती है। झूठ को झूठ की तरह नहीं सच की तरह कहने का अभ्यास अभी से कर लो क्योंकि आगे चलकर इसे कलाओं में ललित कला, धर्म में आचरण, आत्मा में ईमान और मुल्क में संविधान का दर्जा मिल सकता है।-
    पुर्तगाल के जंगलों में आग लगने पर ट्वीट करने वाले और क्रिकेट टीम के हर एक खिलाड़ी को अलग-अलग मेसेज लिखकर शुभकामनाएं देने वाले अपने ‘मित्र’ नरेंद्र मोदी से पूछो कि क्या वो इस हादसे पर खुलकर दुख भी नहीं जता सकते।
    रही आपकी बात, तो आप गाय के पास बैठकर Oxygen ग्रहण करने और गोबर से बंकर बनाने के लिए आजाद हो!Priyabhanshu Ranjan

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  3. zakir hussain

    इसी साइट पर आप देखोगे कि मेरे, सिकंदर और अफ़ज़ल भाई की तरह के लोग, जो इस्लाम की निंदा करने की बजाय, इस्लाम की उदार व्याख्या या तस्वीर पेश करने की कोशिश करते हैं को अनेको मुसलमान, मज़हब का विरोधी घोषित कर रहे हैं.
    एक तरफ ये लोग कहते हैं कि इस्लाम को कुछ गैर इस्लामी, सांप्रदायिक ताकते बदनाम कर रही है, इस्लाम के बारे मे ग़लतफहमी पैदा करके, मुसलमानो के प्रति नफ़रत भारी जा रही है, तो जनाब एक बात बताओ कि एक आम मुसलमान का रवैया हम जैसे लोगो के लिए क्या है? बहुसंख्यक मुस्लिम समाज, जब उदारवादी मुस्लिम को भी गालियाँ देगा, तो गैर मुस्लिम तो आम मुस्लिम को कट्टरपंथी ही समझेगा. इस्लामोफ़ोबिया के इस दुनिया मे फैलने का आम ज़िम्मेदार, एक आम मुसलमान ही है. आम मुसलमानो को हमारे जैसे मुस्लिमो की टिप्पणियों पर निष्क्रिय होने की बजाय, हम को गलियाने वालो को भी आड़े हाथों लेने की ज़रूरत हो. आपकी खामोशी भी गैर मुस्लिम सुन रहा है, ध्यान रखना.

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  4. सिकंदर हयात

    लखनऊ के सोशल मिडिया के प्रसिद्ध सूफी संत————— सिद्द्की के लेख दैत्याकार मीडियाग्रुप की साइट पर पब्लिश हो रे हे यानी नाम भी शायद दाम भी वैसे तो अच्छी बात हे लेखक भी अच्छे हे लेकिन हे शुद्ध बरेलवी और शिया झुकाव वाले . अच्छा गैर मुस्लिमो को सेकुलरो लिबरलों को वाम को इन बातो की समझ नहीं हे सो वो ऐसे लिबरल मुसलमानो को मान सम्मान देते आये हे सोचते हे वो बड़ा अच्छा और मुश्किल काम कर रहे हे वो ये नहीं देखते हे और समझ भी नहीं हे की ये सभी लोग एक आसान काम कर रहे हे इनके लिए कोई संघर्ष नहीं हे ना ये कोई नयी बात हे ना इसका कोई परिवर्तनकारी रिज़ल्ट निकलने वाला हे भारत में सभी लिबरल मुस्लिम विचारक लगभग सभी शिया और बरेलवी बोहरा ही हुए जबकि बहुमत देवबंदियों का हे और कटटरता के आरोप भी अधिक देवबंदियों पर हे जिनका बाकियो पर ये आरोप सा रहा हे की वो इस्लाम में शिर्क घुसाते हे खेर कहने का आशय ये हे की गैर मुस्लिमो लिबरलों को शिया- सुन्नी देवबंदी बरेलवी खींचतान का अधिक पता नहीं हे इसलिए वो नासमझी में इन शिया और बरेलवी विचारको पर फ़िदा होते रहते हे और इन लोगो को इसकी ठीक ठाक मलाई भी मिलती रही हे जबकि जमीन पर इनके नतीजे और प्रभाव सिफर रहे हे कुछ नहीं जैसे साइट ने लिखा की सूफी संत कटरपन्तियो के निशाने पर रहते हे कौन से निशाने पर भाई ————— ? अगर होते तो इनका भी हम ( हम ना शिया ना बरेलवी देवबंदी और शुद्ध सेकुलर ) जैसा हाल ना होता—————— ? अफ़ज़ल भाई दुबई हे तो वो लिख पा रहे हे जाकिर भाई और में हम दोनों लगभग अंडरग्राउंड रहकर लिखते हे मेरा बहुत बड़ा सोशल सर्किल हे मगर किसी को नहीं पता की में क्या लिखता हु पता चलेगा तो विरोध ही होगा जो में फिलहाल झेलने की पावर में नहीं हु ना कोई भी कैसा भी सपोर्ट हे जबकि उधर सूफी संत खुल कर लिखते हे अपने पुरे खानदान बीवी बच्चो आजु बाजु पता ठिकाना बताते हे की में यहाँ हु यहाँ नाटक खेल रहा हु कोई डर नहीं , खुद इन्ही के शब्दों में की एक मुल्ला इन्हे धमका रहा था तो उल्टा इन्होने उसे धमका दिया वो मुल्ला भी ठंडा पड़ गया होगा की कौन मुँह लगे बात बढ़ी तो देवबंदी बरेलवी शिया सुन्नी का रूप ना ले ले जबकि हम अपने विरोधियो से थर थर कांपते हे आप जनाब करते हे . क्योकि पता हे की बात बढ़ी तो हमारे लिए कोई शील्ड नहीं हे जबकि इन शिया और बरेलवी विचारको को घर से समाज से , ठेकेदारों से सपोर्ट मिलता हो सकता हे की भाई देखो हम तो इन वहाबियो से लड़ रहे हे पुरे परिद्र्श्य को देखते हुए ही ये शिया और बरेलवी विचारक अपने यहाँ के खिलाफ कोई खास नहीं लिखते हे क्योकि उन्हें पता हे की ————————कुल मिलाकर भारत में उदारवाद की मलाई इन शिया और बरेलवी विचारको को कुछ ना कुछ मिलती रही हे और ये लोग खुद के शिया या बरेलवी होने की बात ज़ाहिर भी नहीं करते हे . कहने का आशय ये हे की दुनिया की सबसे मुश्किल लड़ाई और चिंतन एक शुद्ध सेकुलर लिबरल भारतीय देवबंदी सुन्नी मुस्लिम का हे और ”मलाई ” इन शिया और बरेलवी विचारको के हिस्से में आती हे

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    1. सिकंदर हयात

      राइटिस्टों की तो मौज़ ही हे तो ज़ाहिद साहब चुनाव से पहले बता रहे थे की तीन तीन पार्टियों के नेता इनसे सोशल मिडिया पर आशीर्वाद मांग रहे थे ( हम लिबरलों वो भी सुन्नी देवबंदी लिबरलों को गली का कुत्ता ना पूछे जैसा की ऊपर के Comment मे बताया की यहा लिबरलिज्म के प्रचार से जुडी सारी सरदर्दी” मुश्किलें ” खतरे तो सेकुलर देवबंदियों के मत्थे और बहुत बिलोने पर जो थोड़ी बहुत ”मलाई ” वो सारी सेकुलर शियाओ बरेलवियो के लिए आरक्षित —— ? ) तो खेर साफ़ सुथरी डील हुई होगी तो इन्होने चुनाव से पहले आज़म खान की महानता के बारे में बताया की ये ही हे मुस्लिमो के हमदर्द वो आज़म खान जिनकी इरिटेटिंग हरकतों बयानबाज़ियों ने लाखो नए हिन्दू वोट भाजपा को दिलाये होंगे जिसने कँवल भारती जैसे दलित चिंतक को उठवाया था तो खेर फिर जो हुआ ——— ? अब आजकल ये असम से केरल तक सभी सभी अरबपति मुस्लिम रहनुमाओ को कोसते हुए लखपति इमरान प्रतापगडी को मुसलमानो का केजरीवाल बनाना चाहते हे खेर अल्लाह भला करे , फिलहाल मदद के लिए लिखते हे Mohd Zahid5 hrs · FBP/17-172संवेदनहीन नेताओं की भक्ति घातक :-
      आप जिन नेताओं को अपना सब कुछ मान कर उनके लिए गाली-गलौज और भक्ति करते हैं वह कितने संवेदनहीन होते हैं , इसे आप समझिए। आप यह समझिए कि इन नेताओं के लिए आप या जनता मात्र एक टेक्निकल टूल है जो उनका समर्थन करती है उनके पक्ष में गाली-गलौज करती है , उनके लिए ज़मीनी स्तर पर या सोशलमीडिया पर दिन रात काम करती है , दरअसल आप या कोई भी इनकी नज़र में इनकी सत्ता प्राप्त करने के उस टूल से अधिक कुछ नहीं।
      आप आपस में भिड़े रहिए , यह नेता आपस में मिले रहेंगे और जिस दिन आप या आपका परिवार किसी त्रासदी में फँस गया ये आपकी तरफ झाँकने भी नहीं आने वाले। बिहार हो गोरखपुर हो या गुजरात त्रासदी , वहाँ भी आप जैसे भक्त रहे होंगे जो बह गये और इन नेताओं के माथे पर शिकन भी नहीं।
      उदाहरण आपके सामने है , इसे देख कर यदि आपकी आँखें खुल जाएँ तो अब भी देश का भला हो जाए।
      बिहार की बाढ़ आपदा से शुरू करते हैं , मुसलामानों के प्रचंड वोट से चुने गये विधायकों के बल पर भाजपा जैसी मुस्लिम विरोधी पार्टी के साथ मिल कर सरकार बना लेने वाले पद के लालची अवसरवादी नितीश कुमार इतने संवेदनहीन होंगे यह पूर्व में कल्पना करना भी असंभव था परन्तु उदाहरण सबके सामने है , बिहार का एक हिस्सा बाढ़ से तबाह है और वहाँ का मुख्यमंत्री केवल और केवल पटना में बैठा जोड़ तोड़ की राजनीति में लगा हुआ है , बाढ़ पीड़ितों के लिए किसी भी राहत योजना का नेतृत्व करते दिखने के बजाए वह केवल और केवल अपने मुख्यमंत्री पद को सुरक्षित करने के लिए अपने घटिया चरित्र का प्रदर्शन कर रहा है। बाढ़ में हज़ारो लोग मरते रहें , हू केयर।
      ऐसे ही गैरज़िम्मेदारी का प्रदर्शन देश का प्रधानमंत्री देश में लगातार सामने आ रही आपदा और त्रासदी पर कर रहा है , गुजरात में बाढ़ और स्वाईन फ्लु से लगभग 500 गुजराती लोगों की जान चली गयी परन्तु देश का प्रधानमंत्री 7 आरसीआर में मस्त है , गोरखपुर में 70 बच्चे , बिहार में हजारों मौतें , किसानों की आत्महत्या और गोलीकांड तक पर खामोश रहने वाला यह प्रधानमंत्री वही है जो विदेश में हुई 2-4 लोगों की मौत पर फड़उफड़ाते हुए अपनी पीड़ा का इज़हार करता है।
      और केवल देश का प्रधानमंत्री और बिहार का मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि देश के सभी नेता ऐसी त्रासदी और तबाही पर जितना करना चाहिए उतना तो छोड़िए कुछ भी नहीं करते।
      असंवेदनशील बयान दिए जाते हैं और त्रासदी पर राजनीति की जाती है , चाहे राहुल गांधी हों अखिलेश हों या योगी आदित्य नाथ।
      इन सबका देश की जनता के दुख दर्द से कोई मतलब नहीं , इन्हें हर त्रासदी में वह कार्य करना होता है जिससे इनको पोलिटिकल माइलेज मिल सके।
      ज्यादा कड़वा हो जाएगा , पर सच तो यही है कि देश के सभी नेताओं का चरित्र एक ही है , देश की जनता को समझ कर मिलजुल कर इनकी कालर पकड़ कर इनके किए वादों का हिसाब माँगना चाहिए।
      माफ कीजिएगा , भक्ति और अंध समर्थन किसी का भी हो यह देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं , माफ कीजिएगा हम खुद को इन संवेदनहीन नेताओं के बंधक बनाते जा रहे हैं।
      पिछले बिहार विधानसभा चुनाव का वह दिन अभी भी याद आ रहा है जब संसद में 3 मिनट 19 सेकेंड मुतालबा करके देश के मुसलामानों के नेतृत्व का दंभ भरने वाले ₹10 हजार करोड़ के मालिक एक ऐसा ही नेता सीमांचल में हार जीत की परवाह ना करते हुए चुनावी घोषणा कर रहा रहा था कि वह सीमांचल के दुख दर्द में सदैव खड़ा मिलेगा , आज सीमांचल बर्बाद हो गया वहाँ के लोग तबाह हो गये और मुतालबा महोदय एक बयान जारी करके दुख प्रकट ना कर सके।
      उदाहरण बहुत अधिक हैं परन्तु मैं केवल तीन मुस्लिम राजनीति का दंभ भरने वाले लोगों का उदाहरण दूँगा , मुम्बई से घोषित रूप से अपनी संपत्ति ₹750 करोड़ वाले हों या आसाम के हजारों करोड़ का व्यापार और से कम ₹20 हजार करोड़ की संपत्ती वाले एक नेता हों या हैदराबाद से घोषित रूप से ₹10 हजार करोड़ वाले एक नेता , यह लोग मुस्लिम रहनुमाई का दम भरते हैं पर हकीक़त यह है कि देश में 31 बेगुनाह मुसलामानों के मारे जाने के बावजूद इनकी जेब से उनकी मदद के लिए चवन्नी नहीं निकलती , यदि यह चाहें तो सबके परिवार की ₹5-5 लाख की मदद कर दें तो यह इनके द्वारा निकाले गये ज़कात का एक मामुली हिस्सा होता। पर नहीं , बात केवल मुस्लिम रहनुमाई का दंभ भरने वालों की ही नहीं , आप भी अपने नेताओं के इस संवेदनहीनता पर नज़र रखिए , आपको भी सब एक जैसे मिलेंगे।
      खुदा ना करे कल आप और आपके परिवार पर भी ऐसी ही त्रासदी आ गयी तो आप बेबस , ऐसी त्रासदी की भेट इन अपने भगवान जैसे नेताओं की दो शब्द की संवेदना का इंतज़ार करते हुए चढ़ जाएँगे।
      लोकतंत्र में जब नेताओं से सवाल करने की जगह उनकी भक्ति होने लगती है तो लोकतंत्र चरमराने लगता है , सोचिएगा कि आप किस संवेदनहीन नेताओं की भक्ति करते हैं और देश और लोकतंत्र का नुकसान करते हैं।
      सोचिएगा
      आइए मिल जुल कर हाथ बढ़ाएँ बिहार के सीमांचल के लोगों तक कुछ अन्न पहुँचाएँ , इन संवेदनहीन नेताओं के भरोसे बैठे रहना उचित नहीं।
      यह किशनगंज के एक बड़े और ज़िम्मेदार मदरसे का बैंक एकाउंट नंबर है , आपसे जो भी बन सके ₹100 से अधिकतम जो भी संभव हो पैसे ट्रांसफर करने की मेहरबानी करें , अपने ज़कात के पैसों का भी आप यहाँ ट्रांसफर कर सकते हैं।
      Account Number – 3374898303
      Central Bank of India
      Jamia Ashraful Uloom
      Current Account
      Branch – Bahadurganj
      Distt – Kishanganj
      Ifsc code
      CBIN 0281054
      लोकल ज़िम्मेदार लोगों का फोन नंबर
      Akramul Haque Baghi
      9431885314
      Tabrez hashmi
      9771510786 Mohd Zahid
      Muzataba anwar rahi
      9471834140

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  5. सिकंदर हयात

    हम मनहूस सुन्नीदेवबंदी लिबरलों को तो गली का कुत्ता ना पूछे और हम भी खेर मनाते हे की ना ही पूछे , पूछेगा तो काटने के लिए ही पूछेगा और इधर बरेलवीलिबरल एक बहुत बड़े मिडिया ग्रुप की एक साइट के ” दामाद ” बन चुके हे . उधर मुस्लिम जागरण को ” समर्पित ” एक लड़का , अरबपति धार्मिक राजनितिक मुस्लिम रहनुमा का दाए बाए , रियल लाइफ का तो पता नहीं अब कम से कम सोशल मिडिया पर मुस्लिम ह्रदय सम्राट बन चुका हे मुजफरनगर दंगो से जैसे अफवाह हे की जैसे मोदी ने वोट कमाए तो भले लोगो ने नोट खूब कमाए ————– ? ( कंफर्म नहीं -सुनने में आ रहा हे ) अब इधर देखिये की घोर राइटिस्ट और कुछ कुछ विक्षिप्त सा आदमी आजतक वर्कर ——– झा तो साहब हमें तो लाखो लाइने लिखने पर भी कुत्ता ना पूछे और इधर देखिये दो चार राइटिस्ट पोस्ट का ही जलवा की आई आई टी यन और हाई प्रोफ़ाइल और हिन्दू जागरण को समर्पित इनके दरसन को बेचैन हे लिखते हे ”———- Jha with Bharat Sharma.29 mins · भरत भाई का आभारमेरी मित्रता सूची में एक हैं भरत शर्मा जी । कल अचानक उनका संदेश आया, क्या हम साथ चाय पी सकते हैं? मैंने उनका स्वागत किया । वे सवा बजे दोपहर को अपने दिये समय के मुताबिक हाजिर हो गए । इस मुलाकात से पहले हम कभी नहीं मिले थे । फेसबुक पर उन्होंने एकाधिक बार मेरी पोस्ट शेयर की है । इससे ज्यादा का परिचय मेरा उनसे नहीं था । कल पता चला कि भरत शर्मा आईआईटी दिल्ली के ग्रैजुएट हैं और इस समय एक कंपनी के डायरेक्टर । अच्छा खासा काम है उनका । लेकिन उनका बड़प्पन ये नहीं है कि वे एक कामयाब आंत्रेप्रेन्योर हैं बल्कि उनका बड़प्पन देशप्रेम है, उनकी समाजसेवा है, परंपरागत भारतीय जीवनशैली का पुनरावलोकन और पुनर्स्थापन है और जरूरतमंदों की मदद करना है । सबसे ऊपर तो ये है कि वे सकारात्मक अर्थों में हिन्दू जागरण के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हैं । भरत जी बड़ी ही आत्मीयता से मिले। लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं औऱ उन्होंने अपनी वृहत्तरता से मुझे जीत लिया । लोग कितना कुछ कर रहे हैं और हम यहां फेसबुक पर बकवास कर महान ज्ञानी बने बैठे हैं । भरत शर्मा जैसे लोग देश का सौभाग्य हैं ठीक सुमंत दा की ही तरह, जो देश में भ्रमण कर एक नए भारत की खोज कर रहे हैं ।——–झा ———————-” शुजूका to सिकंदर हयात • 13 hours ago
    Idea is good. But my name. What will you write there? I am not going to tell my original name now. Will Shuzuka (imaginary name) work?और बवाल क्यों नहीं होगा ? रवीश जी भी तो सीधी बाते कहते हैं | पर कई लोग उलटी ही लेते हैं | मैं उनकी तरह तलवार कि धार पर चलने को अभी तैयार नहीं हूँ |पर बात करना भी ज़रूरी है | चुप रहना समाधान नहीं है | तो मेरी permission है आपको | You can collaborate all points in Shuzuka’s name.Thanks once again •Reply•Share ›Avata—————————————————————————rसिकंदर हयात to Shuzuka • an hour ago
    चिंता मत कीजिये रविश जी के खिलाफ भी जितना बवाल होता हे उतना ही वो ज़्यादा फेमस होते आये हे होते रहेंगे नॉन राइटिस्टों के बीच रविश लीजेंड से बन गए हे ( डिजर्व भी करते हे ) , गुजरात दंगो के बवाल से ही मोदी पि एम् बने . समझिये आज का समय ही ऐसा हे हर कोई हर किस्म के बवाल प्रचार विवाद से घुमाफिराकर फायदे में ही रहता हे ( वो फायदा लाइक्स से लेकर पी एम् पोस्ट मिलने तक कुछ भी किसी भी रूप में हो सकता हे ) विरोधी होते हे तो सपोटर भी होते हे विरोध से सपोटर्स के बीच बहुत कुछ मिल सकता हे जैसे आप या कोई भी अर्णव को ज़ी न्यूज़ को सौ गालिया दे तो ये खुश ही होंगे दुखी नहीं लोग अब कहते हे मन ही मन , की गालिया दो विरोध करो बस खुदा के वास्ते इग्नोर मत करना जितना अधिक विरोध उतना ही अधिक सपोटरो के बीच में प्रचार और इमेज बनती हे थोड़ा बहुत जाता आता बहुत कुछ नहीं तो कुछ ना कुछ आता ही हे मेने सपादक —– तिवारी का जमकर विरोध किया नतीजा उसके फॉलोवर शयद तीन महीने में तीन गुणा बढ़ गए . एक भाषण को मिले विरोध से एक शहर हैदराबाद के नेता ओवेसीस नेशनल लीडर से हो गए आपने देखा ही होगा की सोशल मिडिया पर किसी को गालिया पड़ती हे तो वो खुश ही होता हे दुखी नहीं लेकिन हां , बस एक ही सोच हे जो इन हालात में मात खाती हे वो हे भारतीय शुद्ध सेकुलर देवबंदी सुन्नी मुस्लिम सोच होना क्योकि इन्हे सिर्फ विरोध मिलता हे सपोर्ट सपोटर फण्ड सिम्पेथी समझ कही नहीं हे इसलिए हमें सोशल मिडिया से परहेज़ करना पड़ता हे और अंडरग्रॉउंड सा रहकर लिखना पड़ता हे कल को कुछ बात हो जाए तो जान की तो परवाह नहीं मगर हॉस्पिटल या कोर्ट के खर्चे सोच कर ही हार्ट बीट राजधानी एक्सप्रेस हो जाती हे आप चिंता ना कीजिए बवाल होगा नहीं , हुआ तो आपको कोई नुक्सान नहीं होगा अगर हुआ तो फायदा ही होगा मेने आपका लेख बनाकर शुजूको नाम से संपादक अफ़ज़ल भाई को मेल किया हे अगर वो पब्लिश करेंगे तो ठीक हे नहीं तो कमेंट बॉक्स में लगा दूंगा मेल मिला तो चिपलूनकर को भी कर दूंगा

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  6. सिकंदर हयात

    ” विक्रम सिंह चौहान के विचार ‘
    विक्रम सिंह चौहान ‘इसी गाय के नाम पर देश में 15 से अधिक मुसलमानों की हत्या कर दी गई है। भीड़ को बता दो उस थैले में मुसलमान मांस लेकर जा रहा है भीड़ टूट पड़ता है और हत्या कर देता है। सिर्फ शक के आधार पर पूरे देश में इसी तरह हत्या हुई ,और मारपीट तो रोज हो रहे हैं। पुलिस लगभग सभी मामले में भीड़ का साथ दे रही है। मृतकों के मरने के बाद उनके परिवार वालों पर गौहत्या का मामला चल रहा है। अख़लाक़ का परिवार आज भी थाने में हाजिरी दे रहा है ,जबकि वह बकरे का मांस था,बाद में उसकी रिपोर्ट बदली गई।
    सभी जगह मुसलमानों को मारने वाले भाजपा या संघ से जुड़े लोग थे। गौसेवा से जुड़े लोग थे। आज जब 200 गाय को उसी गौसेवा से जुड़े व्यक्ति ने मार दिया तब ये लोग चुप है क्योंकि वह हिन्दू है। मतलब गाय को भूखी प्यासी रखकर हिन्दू मार सकते हैं। उनको गौमाता को मारने का, फिर गौमाता के मांस को चारा बनाकर मछली को खिलाने का अधिकार है—————-।इरोम शर्मिला ने अपने ब्रितानी मित्र डेसमंड कोटिन्हो से विवाह कर लिया। आयरन लेडी और मेरे नज़र में भारत रत्न इरोम को इस शादी के लिए दिल से शुभकामनाएं। भारत देश इस महान महिला के रहने लायक नहीं है। इस देश को शायद अभिशाप है कि इन्हें अपने सच्चे योद्धाओं और वीरांगनाओं की परख नहीं है। निश्चित रूप से ब्रितानी नागरिक और इरोम के मित्र डेसमंड कोटिन्हो एक असाधारण पुरुष है जो इरोम के त्याग और उनके संघर्ष में हर पल साथ रहे और उन्हें तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनाया। प्रेम निश्छल है और इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। धर्म ,रंग और जाति में उलझे लोग अपने जन्म को असफल साबित कर रहे हैं।
    यह देश व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों को अपना दुश्मन मानकर चलता है। जबकि यही लोग सच्चे योद्धा है और पूजनीय है। इरोम आफ्सपा के खिलाफ लगातार 16 वर्षो तक भूख हड़ताल पर रही । 16 वर्षों तक नाक में लगी नली से इरोम को फीड दिया जाता रहा ,बाद में इरोम ने इसे भी लेना बंद कर दिया था। जिन लोगों के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया उसका सिला वहां के लोगों ने चुनाव में महज 90 वोट देकर दिया। उस समाज ने इरोम को धोखा दिया जिसके लिए इरोम लड़ रही थीं। बावजूद इसके इरोम हारी नहीं है ,और न हारा है उनका संघर्ष। इरोम का संघर्ष अमर रहेगा ,इतिहास में सफ़ेद अक्षरों में लिखा रहेगा। इतिहास में उन गद्दारों का नाम नहीं रहेगा जिन्होंने उन्हें कमजोर करने की कोशिश की है। इरोम तुम्हे लाल सलाम————–अरुण पुरी ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव’ में सिर्फ कुर्सी पर बिठाने के लिए रमन सिंह से एडवांस में 45 लाख रुपया ले लिया था। वह अरुण पूरी अगर मोदी को आज अपने सर्वे में 298 सीट दे रहा है तो इसके लिए करोड़ों का डील हुआ होगा। अरुण पुरी बिना एडवांस लिए काम नहीं करता। उसने लोकप्रियता में इंदिरा से मोदी को 16 प्रतिशत आगे बताने के लिए भी अलग चार्ज किया होगा। नेहरू से चार गुना बेहतर प्रधानमंत्री बताने के लिए भी अरुण पुरी ने करोड़ों लिया होगा। कुलमिलाकर यह डील करोड़ों की रही है। गाय ,बीफ ,दलित हत्या और गोरखपुर के बाद मोदी को एक ब्रांडिग की जरूरत थी। इसके लिए आज तक से बेहतर चैनल कोई नहीं हो सकता। अगर यही काम ज़ी न्यूज़ या इंडिया टीवी को देते तो मोदी के ऊपर सीधा आरोप लगता ,मोदी का चैनल है। लेकिन चालाकी से ”आज तक” खुद को निष्पक्ष घोषित कर रखा है। और इसको वह कैश भी करवाता है।
    अब आप आप दुनिया की सबसे विश्वसनीय जाँच एजेंसी एफबीआई को इस काम पर लगा दीजिये कि सर्वे के लिए आज तक और इंडिया टुडे देश में किन राज्यों में गए ,कितने लोगों से मिले ,उन लोगों के नाम और फोटो /वीडियो सामने लाये। एफबीआई अपना माथा पीट लेगी पर ऐसा कोई व्यक्ति को सामने नहीं ला पायेगा। आएगा भी कैसा जब उनसे ये मिलेंगे तब। यह पूरा सर्वे का खाका इंडिया टुडे समूह और भाजपा के रणनीतिकारों ने एक टेबल पर बैठकर तैयार किया है। दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ चार लोगों से पूछ लिए होंगे,उनका पीछा करेंगे तो पता चलेगा ये भी इसी ग्रुप के लोग है।
    आप बस देखते जाइये और 2019 की कल्पना कीजिये। यही चैनल यह बोलने लगेंगे कि मोदी तो निर्विरोध प्रधानमंत्री बनने जा रहे है। मोदी को श्रीराम का अवतार भी बताया जा सकता है। अमित शाह को हनुमान बताया जा सकता है। आपने कल्पना भी नहीं किया होगा वह सब होगा 2019 में। यह भारत देश की मीडिया है जनाब।—————-देश को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बारे में और जानना चाहिए। वे इस देश के सबसे गरीब.. नहीं सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री हैं। उन्हें वेतन में करीब 9200 रूपए मिलता है जिसे वे अपनी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को दे देतें है ,पार्टी उन्हें पांच हजार रूपए महीना गुजारा भत्ता देती है। उनका बैंक बैलेंस आज की तारीख में भी दस हजार रूपए से कम हैं । चार साल पहले हुई एंजिओप्लास्टी से पहले 68 वर्षीय माणिक सरकार खुद अपने कपडे धोते थे ,जूते भी खुद पोलिश करते थे। घर का खर्च उनकी शासकीय सेवा से रिटायर्ड पत्नी चलाती हैं। माणिक सरकार 1998 से लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री हैं बावजूद उनके पास न कार है न अपना खुद का घर।
    देश की मीडिया मोदी के लम्बे साफा की चर्चा करती है और मीडिया बताता है कि यह गरीबों की शान है ,जितना लम्बा साफा ,उतने ही गरीबों के करीब। कभी दस लाख का सूट पहनने वाला अगर साफा पहनकर आपको दिखा रहा है मतलब यह उनका दिखावा है न कि गरीबों के प्रति प्यार या इज्जत। वह बहुरुपिया है। देश में लेफ्ट पार्टियों के नेताओं की छवि साफ-सुथरी ही है। लेकिन लेफ्ट पार्टियों ने मोदी की तरह इसे कभी मुद्दा बनाकर अपने नेताओं की छवि का प्रोजेक्शन करने की कोशिश भी कभी नहीं की। और न ही कभी मीडिया का इस्तेमाल किया। 56 इंच का सीना जैसी तमाम उन्मादी बातों और देह भंगिमाओं के साथ घूम रहे उस शख्स से त्रिपुरा के इस सेक्युलर, शालीन, सुसंस्कृत मुख्यमंत्री की तुलना का कोई अर्थ नहीं है।
    इसी मुख्यमंत्री का भाषण मोदी और स्मृति ईरानी ने दूरदर्शन और आकाशवाणी से प्रसारित नहीं होने दिया। यह संघीय व्यवस्था के खिलाफ था। संघीय व्यवस्था में एक राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के समान अधिकार होते हैं। लेकिन मोदी और स्मृति ईरानी तो दूसरे वाले संघ से आये हैं। इस भाषण में माणिक सरकार ने प्रतिक्रियावादियों और विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ कड़ा सन्देश दिया था और गाय के नाम पर हो रही हत्या पर मोदी सरकार का कान मरोड़ा था (पूरा भाषण कमेंट बॉक्स में ) । इस देश को अपने एक राज्य के इस मुख्यमंत्री पर गर्व करना चाहिए।———-अरविंद केजरीवाल को जो लोग यहाँ गाली देते हैं ,उनसे चिढ़ते हैं ,उनके खिलाफ व्यंग्य करते हैं जरूर केजरीवाल ने उनके घर का कुछ बिगाड़ा होगा। उनके घर से पैसे चुराए होंगे ,उनके राशन का सामान चुराया होगा या बटुआ से पैसा ले गया होगा। क्योंकि बिना व्यक्तिगत दुश्मनी के कोई इतना निम्नतम शब्द किसी के लिए प्रयोग नहीं करता है। और अगर इनमें से कुछ नहीं करने के बावजूद आप उनके लिए गाली का प्रयोग करते है ,उनसे चिढ़ते हैं ,उन्हें गाली देते हैं ,उनके खिलाफ व्यंग्य करते है तो दुनिया का सबसे घटिया इंसान आप ही हो ,मान लीजिये। आप उनसे जलते हैं और उनके जैसे प्रसिद्धि ,उनके ख्याति ,उनकी लोकप्रियता के सामने आप खुद को बौना समझते हैं। अरे वो इंसान चार साल पहले आंदोलन किया ,आज एक राज्य का मुख्यमंत्री है। आपमें कूबत है तो कुछ आप भी करके दिखाओं। उनके वायदे पूरे नहीं हुए ,वो आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा ,उसने लोकपाल लागू नहीं किया ! तो देश में किस नेता ने अपने वायदे पूरे किये। आलोचना करने वालों के खाते में मोदी ने 15 लाख डलवा दिया है तभी मोदी की जगह केजरीवाल की आलोचना करने लगे हैं। तुम्हारी आलोचना उसे चर्चा में रखा है और रोज बड़ा बना रही है। शाबाश आलोचना जारी रखें।———–रोहित वेमुला मामले में जुडिशल इंक्वॉयरी पैनल की रिपोर्ट आई है कि रोहित ने अपनी मर्जी से सूइसाइड किया, रोहित समस्याओं में घिरे हुए शख्स थे और कई कारणों से नाखुश थे। रिपोर्ट में घटनाओं के लिए तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी और बीजेपी लीडर बंडारू दत्तात्रेय को जिम्मेदार नहीं माना गया है। रोहित वेमुला को हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने नवंबर 2015 में निकाला। 17 जनवरी 2016 को रोहित ने अपने हॉस्टल के कमरे में सूइसाइड कर लिया। इस एक महीनें में एक छात्र को उनके शिक्षा से अलग करने के अलावा आत्महत्या के लिए और क्या जिम्मेदार हो सकता है?
    जुडिशल इंक्वॉयरी पैनल में एचआरडी मंत्रालय के अपने लोग थे ,शासन से इन्हें सालभर वेतन /भत्ता मिलता रहा और इन्हें जो काम सौंपा गया था ,इन्होंने अच्छी तरह से किया। एक छात्र की हत्या पर पर्दा डालने का काम। रिपोर्ट में रोहित की जाति को भी दलित नहीं बताया गया है। मतलब जुडिशल इंक्वॉयरी पैनल ने ओवरटाइम काम भी किया है ,इनका अलग से भत्ता बनेगा।
    अब इसी तरह गोरखपुर में बच्चों के सामूहिक हत्याकांड का जुडिशल इंक्वॉयरी रिपोर्ट आएगा सालभर बाद। रिपोर्ट में जो सच आएगा उसे आज सुन लीजिये। रिपोर्ट में लिखा जायेगा ,जो बच्चे जापानी बुखार से पीड़ित बताया गया था दरअसल वे बच्चे अपनी माँ के द्वारा टॉफी नहीं देने से नाराज थे,और इस तरह उनके दोस्त भी नाराज थे ,एक दिन गोरखपुर के एक गार्डन में इन बच्चों की बैठक हुई ,इन बच्चों को टॉफी नहीं मिलने से बहुत समस्याएं हो रही थी ,इसलिए इन बच्चों ने सामूहिक आत्महत्या का रास्ता चुना! इस मौत के लिए शासन प्रशासन बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं था।———आज़ादी के 70 वें सालगिरह पर लालकिला के प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण भी हो गया ,आपने वाह वाह भी कर लिया। आपने अपने घर ,स्कूल ,ऑफिस में तिरंगा फहरा लिया और शाम तक उतार कर अगले साल तक के लिए सुरक्षित भी रख लिया। आपने फेसबुक में तिरंगा वाला डीपी भी हटा ली और अपनी तस्वीर भी चिपका लिया। टीवी पर देशभक्ति फ़िल्में भी देख ली ,और आज़ादी दिलाने वाले बहादुरों को याद भी कर लिया। आपने अपने हिस्से की एक दिन वाली देशभक्ति खूब निभा ली। आइये अब बात करते हैं 62 वर्षीय उस बूढी औरत की जिसे शांति भंग करने की आशंका के चलते धार जेल में बंद रखा गया है। आजादी की सालगिरह के मौके पर विभिन्न जेलों में बंद अपराधी और आरोपियों को अच्छे आचरण के चलते सजा में कटौती या माफी दी जाती है, मगर इस बूढी से देश में अशांति का खतरा था इसलिए इन्हें जेल में ठूंसा गया है। इस बूढी औरत का नाम है मेधा पाटकर। यह बूढी औरत नर्मदा घाटी के डूब क्षेत्र के 192 गांव में निवासरत 40 हजार परिवार को बचाने का भयंकर अपराध करने चली थी। इन परिवारों के बचने से देश में हिंसा फ़ैल सकती थी ,इसलिए इस महिला को हिंसा फैलने से पहले ही एहतियातन जेल में रखा गया है। आइये गर्व करे उस देश पर जिस देश में बाबू बजरंगी ,माया कोडनाणी ,साध्वी प्रज्ञा ,कर्नल पुरोहित ,असीमानंद ,डीजी बंजारा और अमित शाह बेल में है और मेधा पाटकर जेल में हैं। विक्रम सिंह चौहान

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  7. सिकंदर हयात

    Sheeba Aslam Fehmi28 August at 22:51 · सुधार चाहिये या तबाही?
    -शीबा असलम फ़हमीशीबा असलम फ़हमी (इस मज़मून की लेखिका), ज़किया सोमन, नूरजहां सफिअ निआज़, नाइश हसन आदि महिलाओं को अब सोचना चाहिए की जो मीडिया, प्रगतिशील समाज और नारीवादी, मुस्लमान महिला को न्याय दिलाने की लड़ाई बिना थके लड़ रहे हैं और मुसलमानो से ज़्यादा लड़ रहे हैं, वही लोग बलात्कार और क़त्ल जैसे जघन्य अपराधों कि शिकार हिन्दू महिलाओं से रत्ती भर हमदर्दी क्यों नहीं करते ? हिन्दू मीडिया मालिक, हिन्दू चैनल हेड, हिन्दू एंकर आखिर हिन्दू महिलाओं के ख़िलाफ़ क्यों हैं ?
    इन्हे पूरे भारतीय समाज में सेहतमंद बदलाव क्यों नहीं चाहिए? सिर्फ मुस्लिम समाज में ही सब परफेक्ट क्यों चाहिए?
    स्वामी नित्यानंद, बाबा सारथी, संत रामपाल, आसाराम, बाबा गुरमीत या फिर किसी छोटे-मोटे बाबा-योगी द्वारा हिन्दू बेटियों से धर्म के नाम पर बलात्कार की एक लम्बी आपराधिक परंपरा चली आ रही है इसके बावजूद इस पर मीडिया आंदोलित नहीं होता. आजतक कभी भी मैंने ऐसी रेपर्टिंग नहीं देखि जिसमे लगातार हिन्दू बाबा-साधुओं-संतो की वासना और अपराधों पर जेंडर के एंगल से स्टोरी या रेपर्टिंग की गयी हो. उन पर सैद्धांतिक कुठाराघात किया गया हो. उनके मठ, आश्रम, केंद्र, डेरों, ग़ुफ़ाओं पर, हमेशा भांडा फूटने, जग हंसाई होने, विदेशों में रिपोर्टिंग होने, मुक़दमा दर्ज होने, फैसला तक आ जाने के दबाव में ही रिपोर्टिंग होती है जिसमे IPC के क़ानूनी दायरे में बात की जाती है. बलात्कारी गुरमीत ने अगर हिंसा का तांडव न करवाया होता तो मीडिया चुप ही था 12 सालों से। यही हाल आसाराम बापू और संत रामपाल की गिरफ़्तारी पर हुआ.
    सवाल ये है की महिला-पुरुष दोनों की मौजूदगी से भरे इन धार्मिक केंद्रों पर विशाखा गाइड लाइन के तहत यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कमेटी बनाने की आदर्श व्यवस्था पर सरकार, महिला आयोग, मीडिया और न्यायालय ऐसी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इन केंद्रों को ‘सेक्सुअल हरस्मेंट ऑफ़ वीमेन एट वर्कप्लेस एक्ट 2013’ के दायरे में लाने की मांग क्यों नहीं हो रही? हिन्दू धार्मिक नेताओं की वासना और व्यभिचार की शिकार महिलाऐं तब तक मीडिया में और बृहत हिन्दू समाज में न्याय नहीं पातीं जब तक कोई व्हिसल-ब्लोअर, रिश्तेदार, पत्रकार की जान नहीं चली जाती. तब भी ये ज़रूरी है की वासना की शिकार महिला दलित या आदिवासी न हो वरना भंवरी देवी, सोनी सोरी जैसा फैसला आता है। होना तो ये चाहिए था की जिस तरह त्वरित तीन तलाक़ को जड़ से ख़त्म करने की मुहीम मीडिया ने चलाई, बार बार न्यायालय ने फैसले दिए, चुनाव घोषणापत्र में इसको मुद्दा बनाया गया वैसा ही आंदोलन इन मठों के ख़िलाफ़ खड़ा होता.
    हिन्दू महिलाओं के अपराधी जब तक हिन्दू पुरुष हैं, हिन्दू बलात्कारी योगी-बाबा-संत हैं, हिन्दू भगोड़े पति-पुत्र हैं, तब तक मीडिया इन अपराधों को छुपाता है. हिन्दू विधवा आश्रमों, डेरों, ग़ुफ़ाओं में वासना का अँधा कुआं कितनी महिलाओं की आत्मा को क़त्ल कर चुका है इसका कोई हिसाब नहीं है. लेकिन मजाल है की इस जगज़ाहिर अन्याय और अत्याचार पर इन धार्मिक लोगों को घेरा जाए.
    त्वरित तीन तलाक़ की पीड़ित बुर्क़ापोश मुस्लमान महिला की त्रासदी दर्शाने के लिए कितने तरह तरह के प्रभावशाली ग्राफ़िक, नाट्य-रूपांतर, और क्रिएटिव यही मीडिया तैयार करता है, लेकिन धर्म बदल कर बहु विवाह करनेवाले चंद्रमोहन-धर्मेंद्र जैसे अनगिनत हिन्दू पतियों, हिन्दू भगोड़े पतियों, बिना शादी के रखैल रखनेवाले नारायण दत्त तिवारी जैसे अनगिनत अय्याश नेताओं, प्रोफ़ेसरों, बुद्धिजीवी मर्दों, नाजायज़ औलादों के हक़ मारनेवाले पिताओं, विधवा-आश्रमों को आबाद रखनेवाले बेटों, बलात्कारी योगी-संत-बाबा और इन सब पर चुप रहनेवाली हिन्दू धर्म व्यवस्था पर मीडिया वैसा कुठाराघात क्यों नहीं करता जैसा कुठाराघात वो संबित पात्राओं, राकेश सिँहाओँ और बंसलों से इस्लाम पर करवाता है तीन तलाक़ और बहुविवाह पर? बाबाओं पर सिर्फ सियासी बहस और मुस्लिम समाज पर सैद्धांतिक बहस? हिन्दू लड़कियों के अधिकार, इज़्ज़त, बराबरी जैसे मुद्दे कहाँ हैं?
    हिन्दू लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए भारतीय मीडिया तभी आगे आता है जब अपनी मर्ज़ी से किसी हदिया या करीना कपूर ‘पीड़िता’ ने मुस्लमान मर्द से प्रेम विवाह किया हो. आख़िर हिन्दू मर्दों की शिकार हिन्दू महिलाओं पर कौन फ़िक्र करेगा? मौलाना या चाइना ?
    इस बीच ये भी रेखांकित करने की ज़रुरत है की मुस्लिम बुनियाद परस्ती पर जब भी भारतीय न्यायलय हमला करता है, मौलानाओं ने उस पर मौखिक या लोकतान्त्रिक विरोध ही जताया है, जबकि बाबरी मस्जिद गिराए जाने से ले कर, बाबा गुरमीत के बलात्कारों पर फैसले तक, हिन्दू धार्मिक अराजकता किस किस तरह से सड़कों पर तांडव करती रही है ये किसी से छुपा नहीं है. ऐसे में अब ये ज़रूरी है की हम मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट इस मीडिया और समाज की चुनिंदा संवेदनशीलता-प्रगतिशीलता को समझें जो सिर्फ मुस्लमान मर्द को नीचा दिखाने के लिए ही उभरती है. एक खास तरह से मुस्लिम महिला का दर्द उभारने की ये कला हकीकत में इस्लाम और आम मुस्लमान मर्द के प्रति समाज में एक घिन्न पैदा कराने के लिए है क्या? जिसका भयानक नतीजा सड़कों पर घेर-घेर के मारे जा रहे बेक़ुसूर मुस्लमान मर्द भुगत रहे हैं.
    मुस्लिम समाज में हालात बेहतर होने चाहिए, घर के अंदर भी, बाहर भी, जिसकी कोशिश हम सब करें, लेकिन दोग़लों को मौक़ा दिए बग़ैर. आइये बातचीत करें, बैठकें करें, ज़िद्द करें और क़ानूनी लड़ाई भी लड़ें, मौलानाओं से भी और सरकारों से भी, लेकिन इस लेहाज़ के साथ की सुधार के बजाय तबाही न आ जाए.
    –शीबा असलम फ़हमी

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    1. RAJKHYD

      क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से तबाही अ सकती है या कुछ मुस्लिम महिलाओ की तेजी को रोकने की कोशिश की जा रही है

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  8. सिकंदर हयात

    Wasim Akram Tyagi
    15 hrs ·
    इस दुनिया का मुसलमान दो लड़ाई लड़ता है, पहली लड़ाई खुद को पीड़ित साबित करने की दूसरी लड़ाई इंसाफ, पहली लड़ाई में वह कुछ हद तक कामियाब हो जाता है मगर दूसरी लड़ाई में आज तक कामियाबी नहीं मिली है। फिलिस्तीन, म्यांमार, सीरिया, इराक, में लाखों की संख्या में मुसलमान मारे गये हैं मगर दुनिया के लोग बेगैरती से मुसलमानों को ही आतंकवादी कह देते हैं।——————————Sanjay Tiwari
    12 hrs ·
    ये आरती कुमारी हैं। पाकिस्तान के सिन्ध में स्कूल टीचर हैं। एक मोमिन ने इन्हें अगवा कर लिया है। बहुत जल्द ये खबर आनेवाली है कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल कर लिया है और अपने अगवा करनेवाले गुण्डे के साथ वो बहुत खुश हैं।Sanjay Tiwari
    13 hrs ·
    भीड़ की हिंसा क्या होती है, इसे समझना हो तो जयपुर के रामगंज में मुसलमानों की हिंसा का वीडियो देखिए। पगलाई भीड़ ने जिस पुलिसवाले को पाया दबाकर दुकान के अंदर कर लिया। जितना पीट सकते थे, मारा पीटा।
    मामला क्या था? एक मुस्लिम ने ट्रफिक नियम तोड़ा तो पुलिस वाले ने डंडा चला दिया। बस बात बिगड़ गयी। मोहल्ले में होने पर बहुत सारे मुसलमान मानते हैं कि उनका जन्म हर प्रकार का कानून तोड़ने के लिए ही हुआ है इसलिए वो ऐसी छोटी मोटी बातों का भी बतंगड़ बनाते हैं। हो सकता है इसके पीछे अपनी एकता दिखाने की भी मंशा रहती हो कि देख लो हम अपने पर आ गये तो क्या कर जाएंगे। जो भी कारण हो जयपुर में ऐसा कुछ नहीं हुआ था कि मुसलमान दंगा करने पर उतर आते। लेकिन वो उतरे।
    हालात बिगड़े तो पुलिस ने जयपुर के पांच थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाया और जायजा लेने के लिए ड्रोन विडियो बनाया तो देखकर हैरान रह गये कि हर छत पर कांच की बोतल और पत्थर के ढेर रखे हुए हैं। यानी तैयारी पूरी रहती है कि न जाने कब काफिरों से भिड़ने का वक्त आ जाए।
    मुझे लगता है डरे हुए लोगों को इस डरावने ड्रोन वीडियो की चर्चा भी अपने अपने टीवी प्रोग्राम में करनी चाहिए। नकली डर का डर दिखाकर आप बहुत देर तक सलामत रह नहीं पायेंगे। सलामत रहना है तो असल डर को खत्म करिए।——————Sanjay Tiwari
    6 September at 10:42 ·
    बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों की वही समस्या है जो बांग्लादेश में बिहारी मुसलमानों के साथ और पाकिस्तान में मोहाजिर मुसलमानों के साथ है। मुसलमान होने के बावजूद न तो बांग्लादेश बिहारी मुसलमानों को स्वीकार कर पाया है और न पाकिस्तान हिन्दुस्तानी मोहाजिरों को। फिर भला यही देश बर्मा से यह उम्मीद क्यों करते हैं कि वो बंगाली रोहिंग्या मुसलमानों को स्वीकार कर लेगा?——————————————————————Wasim Akram Tyagi
    8 September at 15:05 ·
    बंग्लादेश जैसा गरीब देश बर्मा से आये हिन्दू और मुसलमानों को अपने देश में पनाह दे रहा है। लेकिन भारत में कुछ लोग शरणार्थियों को पनाह देने के नाम मात्र पर ही स्यापा कर रहे हैं।—————————————Komal Gupta
    10 hrs ·
    सुनिए साहेब! आप बड़े आदमी हैं। फिर भी आग्रह है, कि सुनिए। हो सकता है यह अकेले मेरी नहीं, करोड़ों के दिल की आवाज़ हो।
    हम हिन्दू वीर तो हैं, पर शांतिप्रिय हैं। हम अधिकांशतः पढ़े-लिखे और काम-धंधे में लगे लोग हैं। सुबह घर से कमाने निकलते हैं और शाम को थककर वापस आते हैं। हमारे बच्चे भी एक या हद से हद दो होते हैं। वे भी हमारे ही जैसे होते हैं, अपने काम से काम रखने वाले। हमारे घर की महिलाओं के लिए झगड़ा, मतलब दो-चार जली-कटी सुनकर, सुनाकर बातचीत बंद कर देना। झगड़ा इससे आगे बढ़ता दिखे तो वो दरवाज़े की आड़ से कह देती हैं, “सुनिए! ज़रा आप शांत हो जाइये।” आमतौर पर हम लोग धार्मिक होते हैं और अपने देश से प्रेम करते हैं। इसलिए हमें विदेश से भी कोई पैसा नहीं मिलता।
    पिछले कुछ समय से पानी सिर के ऊपर से बहने लगा। हमें बुरी तरह दबाया जाने लगा। अब हम तो ठहरे काम-धंधे वाले शांतिप्रिय लोग, तो क्या करते? न हमारे घरों में बकरा काटने वाले बड़े-बड़े चाकू और न चार बोरी पत्थर। हमने बड़े सब्र से समय काटा और फिर आपको अपनी सारी शक्ति दे दी। अब आप उस शक्ति का उपयोग उस काम के लिए कीजिये जिस काम के लिए दी गई थी।
    समझ तो आप गए ही होंगे।—————————नवेद चौधरी is with Zaid Pathan and 10 others.
    11 hrs ·
    दुनिया में 54 देश इस्लामिक हैं,जिसमें से एक देश पाकिसतान जिसे आतंकियों का अड्डा कहा जाता है.
    बर्मा में मुसलमानों के क़त्ल ओ ग़ारत के बावजूद एक भी देश में अब तक म्यांमार अम्बेसियों की खिड़कियों का कांच तक नहीं टूटा साथ ही किसी भी देश में किसी बौद्ध धर्म के मानने वालों पर हमले नहीं हुए ? और आप कहते हैं कि इस्लाम आतंक का मज़हब है.. म्यांमार इन 54 इस्लामिक देशों के आधे से आधा भी नहीं फ़िर भी अब तक इस छोटे से देश पर कोई सैन्य कार्यवाही नहीं हुई लेकिन संघियों को अब भी लगता है इस्लाम आतंक का पाठ सीखाता है.
    आइये कुछ बातों पर गौर करें
    ईसाइयों ने मुसलमानों को अफ़ग़ानिस्तान में मारा
    यहूदियों ने फिलिस्तीन में मारा
    बोडो लोग बर्मा में मुसलमानों को मार रहें हैं..
    एक साजिश के तहत सीरिया,इराक़ को बर्बाद करके ईसाइयों ने नेस्त ओ नाबूत करदिया..
    ऊपर बताई गईं बातों के बाद भी अगर आप इस्लाम को विश्व के लिए खतरा मान बैठे हैं तो संघियों तुम्हें अपनी आंखों में जमी गन्द को साफ़ करने की ज़रूरत है.किसी बाबा के चक्कर में आके तुम लोग भी वास्तविकता से दूर हो गए हो इसमें बाबा की नहीं ग़लती तुम्हारी खुद की है..
    बाबा=मोदी,संघ.

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  9. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari
    13 hrs ·
    भीड़ की हिंसा क्या होती है, इसे समझना हो तो जयपुर के रामगंज में मुसलमानों की हिंसा का वीडियो देखिए। पगलाई भीड़ ने जिस पुलिसवाले को पाया दबाकर दुकान के अंदर कर लिया। जितना पीट सकते थे, मारा पीटा।
    मामला क्या था? एक मुस्लिम ने ट्रफिक नियम तोड़ा तो पुलिस वाले ने डंडा चला दिया। बस बात बिगड़ गयी। मोहल्ले में होने पर बहुत सारे मुसलमान मानते हैं कि उनका जन्म हर प्रकार का कानून तोड़ने के लिए ही हुआ है इसलिए वो ऐसी छोटी मोटी बातों का भी बतंगड़ बनाते हैं। हो सकता है इसके पीछे अपनी एकता दिखाने की भी मंशा रहती हो कि देख लो हम अपने पर आ गये तो क्या कर जाएंगे। जो भी कारण हो जयपुर में ऐसा कुछ नहीं हुआ था कि मुसलमान दंगा करने पर उतर आते। लेकिन वो उतरे।
    हालात बिगड़े तो पुलिस ने जयपुर के पांच थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाया और जायजा लेने के लिए ड्रोन विडियो बनाया तो देखकर हैरान रह गये कि हर छत पर कांच की बोतल और पत्थर के ढेर रखे हुए हैं। यानी तैयारी पूरी रहती है कि न जाने कब काफिरों से भिड़ने का वक्त आ जाए।
    मुझे लगता है डरे हुए लोगों को इस डरावने ड्रोन वीडियो की चर्चा भी अपने अपने टीवी प्रोग्राम में करनी चाहिए। नकली डर का डर दिखाकर आप बहुत देर तक सलामत रह नहीं पायेंगे। सलामत रहना है तो असल डर को खत्म करिए।——————Sanjay ———————Abbas Pathan
    20 hrs ·
    इन दिनो आपने निक्कर गिरोह को जयपुर कर्फ्यू मामले को लेकर काफी हाहाकार मचाते हुए देखा होगा। निक्कर गिरोह ने जमकर इसे साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिस की है, कश्मीर के वीड़ियो जयपुर के बताकर खूब शेयर किए गए।
    मामले में साम्प्रदायिक कुछ भी नही था बल्कि ये जनता और पुलिस के बीच की मुठभेड़ थी जिसकी शुरुआत पुलिस ने की थी। दरअसल हुआ यूं कि एक कांस्टेबल ने दुपहिया वाहन पे जा रहे दम्पति को डंडा मार दिया, डंडा महिला को मारा गया। इस बात ने तूल पकड़ा तो वही पे बवाल मच गया, माफी मांगने के बजाय उल्टा दम्पति को ही माफी मांगने के लिये कहा गया… बात आगे बढ़ी तो मामला जन प्रतिशोध में तब्दील हो गया।
    कोई भी व्यक्ति चार दिन जयपुर में घूम लेगा तो उसे समझ आ जाएगा कि जयपुर की पुलिस आमजन को लेकर कितनी बदतमीज़, बदअखलाक और बद किरदार है। ये एक नम्बर के भ्रष्ट है, जनता पे रॉब जमाते है, चप्पे चप्पे पे खड़े मिलते है लेकिन अपराध ज्यो के त्यों होते रहते है।
    बहरहाल दम्पति को डंडा मारने की बात थाने तक जा पहुँची, लोग कॉन्स्टेबल की शिकायत करने थाने गए तो वहां लोगो पे डंडे बरसाए गए.. फलस्वरूप मामला और बढ़ गया। पुलिस ने गोली चलाई जिसमे एक लड़के की मृत्यु हो गयी। अब जनता कबतक बर्दाश्त करती इन्हें, पुलिस को जूते ही खाने थे और जनता ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा इन्हें… पुलिस ने खुद के बचाव के लिए कर्फ्यू लगाया।
    इधर नुक्कड़छाप गिरोह को खबर लगीं तो इनके तमाम साम्प्रदायिक इंडिकेटर जल उठे..एक गधी बिरादरी का शिक्षक भोंकने लगा तो कुछ मित्रो ने मुझे मेसेज करके पूछा कि जयपुर में क्या हुआ… भाई जयपुर में पुलिस की सुताई हुई और कुछ ना हुआ।Abbas Pathan————–Vikram Singh Chauhan
    12 September at 23:08 ·
    जयपुर में सवाल आदिल की मौत ही नहीं है। सवाल यह है कि भीड़ ,सेना और पुलिस की गोली का शिकार सिर्फ मुसलमान क्यों हो रहे हैं। इतने भी भोले नहीं है आप लोग। भारतीय मुस्लिम भारतीय नागरिक हैं ,आप हर बार उन्हें पाकिस्तान चले जाओ ,पाकिस्तानी मुल्ले और देशद्रोही कह अपना रास्ता साफ नहीं कर सकते। यह बहुत हल्की बात है। आपकी इस साजिश का हिस्सा बनने से भारतीय मुसलमानों ने इंकार कर दिया है। उन्हें अपने वतन से प्यार हैं।वरन पाकिस्तान हमेशा संघियों का फेवरेट देश रहा है। कभी आडवाणी घूम आये तो कभी बेसब्र मोदी अचानक चले गए। जब किसी हिन्दू बच्चे की मौत होती है तो उनके परिवार सहित सभी हिन्दू भाई इकठ्ठा होते हैं और विरोध करते हैं ,कभी -कभी थाना को भी घेर लेते हैं ,कभी चक्काजाम भी करते हैं। ठीक उसी तरह एक मुस्लिम युवा की मौत हुई तो वे इकठ्ठा हुए ,विरोध जताया। आपको मुस्लिमों की भीड़ से दिक्कत क्यों हैं? वे जब मस्जिद में साथ नमाज अदा करते हैं तो अपने परिवार के किसी की मौत पर साथ क्यों नहीं आएंगे। ऐसे भी अब उनको साथ रहने का और एक रहने वक़्त हैं। ऐसे विरोध से शांतिपूर्वक वैसे ही निपटिए जैसे हिन्दुओं के विरोध में निपटते हैं। ये जो अचानक लाठी लग जाती है और अपने आप बन्दुक चल जाती है ये कहानी बंद कीजिये जनाब। सबकी जान की कीमत हैं। हाँ तो !किसी वतनपरस्त कौम के युवाओं को मारने का अधिकार आपको किसने दिया है यह बता दीजिये बस!—-Vikram Singh Chauhan—————————————–Abbas Pathan
    17 hrs ·
    पिछले कुछ वर्षों से गणेश चतुर्थी के मौके पे दैनिक भास्कर समूह एक बहुत अच्छी पहल चला रहा है। भास्कर लोगो को समझाना चाह रहा है कि “आप बड़ी बड़ी मूर्तियां पानी मे विसर्जित करने के बजाय मिट्टी के गणेश स्थापित कीजिये और इसे घर मे ही विसर्जित कर दीजिए ताकि जलाशयों को प्रदूषण से बचाया जा सके, और आपके धार्मिक प्रतीक की बेहुरमती भी ना हो। बहुत से लोगो ने इस पे अमल भी किया किन्तु कट्टरपन्थो को ये सीधी सी बात नागवार गुजरी। प्रशासन ने गणेश विसर्जन के दिन तकरीबन 50 बड़ी मूर्तियां जोधपुर के गुलाब सागर में विसर्जित करने से रोकी थी किन्तु विभिन्न संघटनो की दादाग़री के आगे प्रशासन को झुकना पड़ा और सभी मूर्तियां उस छोटे से जलाशय में उंडेल दी गयी।
    अब सवाल ये है कि इन्हें मिट्टी के गणेश को घर मे विसर्जित करने में दिक्कत क्या है? उसका उत्तर भास्कर शायद ही दे पाए किन्तु मैं दूँगा ” मिट्टी के गणेश को घर मे विसर्जित करने से कोई धार्मिक त्रुटि तो नही होगी किन्तु राजनीतिक नुकसान होगा। लोग घरो में उत्सव मनाने लगे तो शहर भर में रैलियां नही निकलेगी, डीजे नही बजेगा, भगवे झंडे नही लहराएंगे, सड़के जाम नही होंगी और डीजे पे बड़े बड़े प्रचंड नारे नही लगेंगे.. इन नारो के बिना जागृति नही आएगी, लोगो की भावनाओ का भगवाकरण नही हो पाएगा.. ” राज तिलक की करो तैयारी आ रहे है भगवाधारी, घर घर भगवा छाएगा, रामराज्य आएगा” ,
    मातृभूमि को शान है हिन्दू, भारत का अभिमान है हिन्दू, जय श्री राम जय श्री राम, जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है , मन्दिर वही बनाएंगे ये संकल्प हमारा है जैसे नारे देश के कोने कोने में नही पहुचेंगे। इन्ही नारो के सहारे सरकार बनती है, यही वो बीज है जो हर जगह बोया जा रहा है।
    इस राजनीतिक आडम्बर को धार्मिक चोला पहनाने के लिए चाहे भगवान गणेश का उपयोग करना पड़े तो करेंगे चाहे जलाशय के लाखों जीवों को मार डालना पड़े तो मार डालेंगे लेकिन मिट्टी के गणेश को पूरे सम्मान के साथ घर मे उगे तुलसी के पौधे की ठंडी छांव में जगह नही लेने देंगे। प्रधानमंत्री दुनिया मे घूमकर जलवायु समझौता कर रहे है और ये जलवायु की अर्थी सरेआम ढोल डीजे के साथ निकाल रहे है।
    जितनी भी धार्मिक और राजनितिक रैलियां है जो लोगो का रास्ता अवरुद्ध करती है इन्हें तुरंत प्रभाव से प्रतिबंधित करना चाहिए, अपने रोड शो का प्रदर्शन अपने घर मे अथवा पार्टी कार्यालय में करे।
    Abbas Pathan

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  10. सिकंदर हयात

    Pushya Mitra
    22 hrs ·
    मेरा मानना है कि रोहिंग्या मामले में सबसे जरूरी काम म्यांमार सरकार पर दबाव डाल कर वहां शांति बहाली करवाना, सभी रोहिंग्या शरणार्थियों की सुरक्षित म्यांमार वापसी कराना और उन्हें म्यांमार की नागरिकता दिलवाना है. यह हैरतअंगेज है कि एक पूरी बिरादारी हजार साल से अधिक वक्त से किसी देश में रह रही है और वहां की सरकार उसे नागरिकता तक नहीं दे रही.
    रोहिंग्या लोगों का वतन म्यांमार ही है. और उनके रहने के लिए म्यांमार से ज्यादा बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती. शरणार्थी बनकर भारत में रहें, बांग्लादेश में रहें, पाकिस्तान में रहें, साउदी या अमेरिका में रहें, हमेशा पराये ही बने रहेंगे. उन्हें उनके अपने वतन में जगह, सुरक्षा और सम्मान दिलाना ही सबसे बेहतर समाधान होना चाहिये.
    और जहां तक भारत में उन्हें शरण दिये जाने का सवाल है, मैं न विदेश नीति का एक्सपर्ट हूं, न सामरिक नीति का. इसलिए भारत सरकार उन्हें क्यों अपने मुल्क में जगह नहीं देना चाहती, यह कह नहीं सकता. हो सकता है, जैसा कहा जा रहा है, सांप्रदायिकता की भावना भी काम कर रही हो. या फिर सचमुच सरकार के पास कुछ सुबूत हों. चुकि मेरी निगाह में उन्हें भारत में शरणार्थी बना लेना ही कोई बेहतर समाधान नहीं लगता है, इसलिए मुझे यह बहस बहुत काम की नहीं लग रही कि उन्हें शरण दिया जाये या न दिया जाये.
    कुछ लोग जो रोहिंग्या को यहां बसाये जाने की मांग कर रहे हैं, उनके या तो साम्प्रदायिक कारण हैं या राजनीतिक. संवेदना का तो बस दिखावा है. संवेदना तो वे सिख दिखा रहे हैं, जो राहत शिविरों में उनकी मदद कर रहे हैं.
    यह भी कहा जा रहा है कि भारत में जो 40 हजार रोहिंग्या बसे हैं, उन्हें वापस भेजा जायेगा. मगर सवाल है, कहां भेजा जायेगा… मणिपुर के जेल में जो कुछ रोहिंग्या हैं, उन्हें तो भारत सरकार म्यांमार भेज नहीं पा रही. इन 40 हजार लोगों को कैसे भेजेंगी. इसलिए सबसे जरूरी काम है, म्यांमार सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना. कि वे 40 हजार ही नहीं बांग्ला देश में गये चार लाख अन्य रोहिंग्या लोगों को भी अपने मुल्क वापस बुलाये, अमन बहाली करे और इन्हें नागरिकता और बराबरी का अधिकार दे.Pushya Mitra—————–Nitin Thakur
    5 hrs ·
    अभी तक तो किसी रोहिंग्या के आतंकवादी होने का सबूत नहीं था. मोदी के सू की से मिलते ही पके आम की तरह रोहिंग्यों के आतंकी होने के सबूत रोज़ टपकने लगे. फिर आप कहते भी हैं कि हमें मुसलमानों से दिक्कत नहीं है. बाकी रहे भक्त, उन्हें तो रोहिंग्या के सामने “मुसलमान” लिखा दिखने के बाद तर्कों और तथ्यों की कोई खास ज़रूरत ही नहीं है. आप एशिया के लीडर बनना चाहते हैं और सू की से दोटूक कहकर नहीं आ सके कि अपने यहां माहौल ठीक रखो ताकि पूरा एशिया इस तनाव से मुक्त रहे. अमेरिका बनने की इच्छा है तो उस जैसा रौब भी पैदा करो. सिर्फ कॉन्सर्ट करने से वर्ल्ड लीडर नहीं बना करते.. नेहरू की तरह ताल ठोक कर या तो शरणार्थियों को स्वीकार करने की हिम्मत दिखाओ या इंदिरा की तरह कमज़ोर का साथ देने के लिए आंखें तरेरो.—————————————————–Pushya Mitra
    1 hr · Patna ·
    अन्ना आंदोलन के बाद से कई पत्रकार और संपादक राजनीति में आये. उनकी निष्ठा को लेकर सवाल भी खूब उठे. मगर इस बात पर चर्चा कम हुई कि पत्रकारिता के विशद अनुभवों के लेकर राजनीति के मैदान में पहुंचे ये पत्रकार कर क्या रहे हैं? इन्होंने सत्ता और प्रशासन व्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया, क्या सकारात्मक योगदान दिया?
    आम आदमी पार्टी में मनीष सिसोदिया, आशुतोष और आशीष खेतान जैसे बड़े पत्रकार शामिल हुए. आशुतोष और आशीष खेतान ने समाज को किया दिया यह तो नहीं मालूम, मगर एक शिक्षा मंत्री के रूप में मनीष सिसोदिया ऐसे काम में जुटे हैं, जिसे लोग लंबे समय तक याद करेंगे. भाजपा के एमजे अकबर क्या कर रहे हैं, यह भी नहीं मालूम. कांग्रेस के संजय निरुपम और राजीव शुक्ला का जिक्र भी इसमें नहीं होना चाहिए.
    हां, इस बीच मैं अपने पूर्व प्रधान संपादक हरिवंश जी के बारे में कुछ अपडेट जरूर शेयर करना चाहूंगा. वे जदयू कोटे से राज्यसभा सांसद हैं और उन्होंने अपनी पूरी सांसद निधि को एक ऐसा काम के लिए खर्च करने का फैसला किया है, जिसका लाभ आने वाले दिनों में पूरे बिहार को मिलेगा.
    उनकी सांसद निधि से आर्यभट्ट विवि में सेंटर फॉर रिवर स्टडीज की शुरुआत की जा रही है. इस सेंटर का काम नदियों के स्वभाव और उनकी परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करना होगा ताकि नदियों के साथ सरकार और समाज जो व्यवहार करता है, उसमें थोडी़ संवेदनशीलता आये.
    बिहार का आधा इलाका हर साल बाढ़ की आपदा झेलता है. इन आपदाओं के मूल में कहीं न कहीं नदियों के साथ की जाने वाली अवैज्ञानिक छेड़छाड़ जिम्मेदार है. राज्य का जल संसाधन विभाग आज भी समझ नहीं पाया है कि तटबंधों के जरिये नदियों को बांध कर रखा निदान नहीं है. ऐसे में यह अध्ययन राज्य के लिए एक नीति नियामक का काम कर सकता है, बशर्ते इस काम की कमान अच्छे लोगों के हाथ में हो और सरकारी मशीनरी इनके निष्कर्ष से खुद को बदलने के लिए तैयार हो.
    आज कल जहां सांसद निधि किसी भी राजनेता के लिए पॉकेट खर्च की तरह हो गया है. उसमें 30 से 40 फीसदी का कमीशन बिना हाथ-पांव हिलाये आ जाता है. ऐसे में एक सांसद के रूप में अपनी पूरी सांसद निधि को एक बेहतर काम के लिए देने के फैसले की खबर सुनकर मैं खुद को भी गौरवांन्वित महसूस कर रहा हूं. अगर नौकरी का चक्कर न होता तो मैं भी एक छात्र बनकर इस पाठ्यक्रम का हिस्सा बनता.

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  11. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari
    9 hrs ·
    पूरी दुनिया में देवी की पूजा होती थी। खुद अरब स्त्री शक्ति का उपासक था। लेकिन जहां जहां इस्लाम गया वहां वहां से देवी उपासना को खत्म कर दिया। इस्लाम बुनियादी तौर स्त्री विरोधी संगठन है।Sanjay Tiwari
    8 hrs ·
    पुरुष हो तो कॉमरेड लेकिन स्त्री हुई तो? वह भी कॉमरेड? कॉमरेड तो पुरुषवाची शब्द है। इसका मतलब साम्यवाद मूलत: महिला विरोधी संगठन है। कोई महिला विरोधी विचारधारा जो महिलाओं के लिए एक जेन्डर न्यूट्रल संबोधन नहीं दे सकता वह खुद को महिलाओं का हितैषी कैसे कह सकता है?Sanjay Tiwari
    24 September at 12:49 ·
    कम्युनिस्टों ने साजिश के तहत बीएचयू को बदनाम करने की कोशिश की लेकिन बीएचयू के छात्रों ने उनकी पोल खोल दी।Sanjay Tiwari
    25 September at 20:19 ·
    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक कुलगीत है जिसे जाने माने वैज्ञानिक पद्मभूषण शांति स्वरूप भटनागर ने लिखा है। शांति स्वरूप भटनागर भारत की वैज्ञानिक शोध संस्था सीएसआईआर के संस्थापक थे और शुरुआत के कुछ वर्ष उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया था।
    इस कुलगीत को सुनेंगे तो यकीन करना मुश्किल होगा कि इसे एक वैज्ञानिक ने लिखा है और वह भी जिसकी मातृभाषा हिन्दी नहीं बल्कि पंजाबी थी। श्री भटनागर कुलगीत में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को सर्वविद्या की राजधानी बताते हैं। वो लिखते हैं कि ये जो ईंट पत्थर की इमारतें यहां आपको दिख रही हैं वो इमारतें नहीं है विश्वकर्मा का निर्माण है।
    शांति स्वरूप भटनागर का लिखा यही कुलगीत यहां गाया जाता है जिसे पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने स्वरबद्ध किया था। एक बार उसे सुनिये। समझ जाएंगे बीएचयू जेएनयू नहीं है जिसे आपके सड़ी हुई सोच की जरूरत है।
    यह बीएचयू ही है जहां पढ़ने वाला एक छात्र देश के पहले फाइटर जेट तेजस का जनक बन गया। उनका नाम है कोटा हरिनारायण। यह बीएचयू ही है जो उत्तर भारत का इकलौता विश्वविद्यालय है जिसे एडीए द्वारा फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट डेवलपमेन्ट प्रोग्राम में शामिल किया गया है। भारत में शांति, सुरक्षा और समरसता के क्षेत्र में जितने उल्लेखनीय काम हुए हैं उसमेें कहीं न कहीं महामना का बीएचयू मौजूद है। यहां भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने वाले लोग नहीं पैदा होते। यहां भारत के टुकड़ों को जोड़ने का जतन सिखाया जाता है।
    इसलिए कॉमरेड अपनी सड़ी हुई सोच सही सहालमत लेकर बीएचयू से दूर हट जाइये। वह सर्वविद्या की राजधानी है। उसे जेएनयू समझने की भूल मत करिए।—————————————————————————Awesh Tiwari15 hrs · Varanasi ·
    BHU के कुलपति जी सी त्रिपाठी ने मेरे साथ कल देर रात हुई बातचीत में बनारस के जिला प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं,उन्होंने साफ़ तौर पर कहा है कि जेएनयू माइंडेड एक महिला एसडीएम् जिनका नाम ईशा है इस पूरे आन्दोलन को भड़काया ,उन्होंने आरोप लगाया कि यौन उत्पीडन की शिकार छात्रा को बंधक बनाया गया था और उसे मेरे पास आने नहीं दिया जा रहा था ,कुलपति का कहना था कि मुझे दो दिन तक पुलिस का एक जवान नहीं दिया गया , उन्होंने स्वीकार किया कि बीएचयू में हो रही नियुक्तियों के सिलसिले में पूर्व सरकार के एक मंत्री और मौजूदा भाजपा सरकार के नेता ने उसे मुलाक़ात की थी} बीएचयू मुद्दे पर कुलपति और राज्य सरकार आमने सामने हैं इसका अंदाजा इस पूरे इंटरव्यू को पढ़कर और सुनकर आपको लग जाएगा, सुबह की खुशखबरी यह है कि घटना की जिम्मेदारी लेते हुए चीफ प्राक्टर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है ,हम आपको पूरा इंटरव्यू कुछ देर में सुनायेंगे भी फिलहाल पढ़िएAwesh Tiwari
    4 hrs · Varanasi ·
    यह ईशा दुहान हैं , हरियाणा की रहने वाली और 2014 बैच की आईएएस अधिकारी ,फिलहाल वाराणसी के राजातालाब में उप जिलाधिकारी हैं| यह वही ईशा दुहान है जिन पर बीएचयू के वीसी ने आन्दोलनकारियों को भड़काने का आरोप लगाया है| अभी कुछ समय पहले ईशा के बारे में अपराध जगत में यह चर्चा जोरों पर थी और इसकी शिकायत भी की गई कि वो जमानत लेने के लिए आने वाले आरोपियों को मुर्गा बना देती हैं| जहाँ तक वीसी के आरोपों का सवाल है मौके पर मौजूद कुछ लड़कियां बताती है “मैडम ने तो किसी से कुछ नहीं कहा, हाँ यह जरुर है न वो झुंझलाई न ही किसी से कोई कड़वे बोल बोले”| मैं नहीं जानता सिविल सर्विसेज में धरना प्रदर्शन आन्दोलन से निपटने के क्या तरीके बताये जाते हैं?ईशा अपने ऊपर लगाए गए आरोपों पर खामोश हैं| लेकिन यह जरुर कहूँगा कि किसी एक लड़की पर जुल्म होगा तो उसकी लड़ाई दुनिया भर की लड़कियों की वो आम या ख़ास कुछ भी हो ,क्यों नहीं होनी चाहिए? ————————————–Shambhunath Shukl18 mins ·
    आज़ादी के बाद से एक बात गौर करने लायक हुई है। हिंदू लोग मुसलमान समाज और मुसलमानी धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं। इसके विपरीत मुसलमान लोग हिंदू समाज और धर्म के बारे में और ज्यादा जानने लगे हैं। हर मुसलमान रामायण, महाभारत, गीता ही नहीं पुराणों के बारे में भी बहुत कुछ जानत है। आज़ादी के बाद से हिंदुओं द्वारा मुस्लिम समाज की यह उपेक्षा सही नहीं है।Shambhunath Shukla
    1 hr ·
    आमतौर पर लोग कहते हैं कि दया, ममता, करुणा तथा सेवा भावना उभयनिष्ठ हैं। और हर मानवीय चिंतक व वाम एवं दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों में समान रूप से ये गुण पाए जाते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। अक्सर मैंने देखा है कि गांधीवादी, लोहियावादी और आरएसएस जैसी संस्थाओं से जुड़े समाजसेवियों में यह सेवाभावना अपनी विचारधारा अथवा अपनी जाति-बिरादरी और अपने धर्म/मज़हब/पंथ से जुड़े लोगों के प्रति ही जागृत होती है। लेकिन वाम विचारधारा से जुड़े लोगों में यह सेवा भावना सब के प्रति समान होती है। गांधी और लोहिया के अनुयायी एक कथित सेवाभावी डॉक्टर को मैंने करीब से देखा तो पाया कि उनकी पूरी गरीब सेवा झूठ पर टिकी है। आरएसएस के एक सेवक डॉक्टर सिर्फ अपने संगठन से जुड़े मरीजों के प्रति नरमी बरतते थे, उनका यह अहंकार देख कर मुझे उनसे नफरत हो गई। वे नामी हृदयरोग विशेषज्ञ हैं पर जैसे ही पता चलता है कि मरीज संघ का नहीं है वे उसके कपड़े उतरवा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मगर वाम विचारों के डॉक्टर अनूप सराया, जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में प्रोफेसर हैं, के पास एक बार मैं गया। मैंने देखा कि एक फटेहाल गेरुआ वस्त्रधारी साधू को वे उसकी बीमारी के बारे में समझा रहे हैं। करीब आधा घंटे बाद जब वे साधू बाबा गए तो उन्हें डॉक्टर साहब ने अपनी तरफ से दवाएं भी दीं। उन बाबा के जाने के बाद डॉक्टर सराया ने मुझे बताया कि इन बाबा जी की उनके बच्चों ने सेवा नहीं की। बाबाजी साधू हो गए। पैसा पास में है नहीं इसलिए कोई धर्मादा संस्था भी उनकी मदद नहीं करती। यह देखने में सामान्य बात लग सकती है लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि मनुष्य की सेवा भावना उसके विचारों से ही प्रेरित होती है। वाम की करुणा सब के प्रति समान है क्योंकि उसकी विचारधारा समानता, बराबरी और भाईचारे पर टिकी है। जबकि बाकी की उसके द्वारा घेरे गए खड़िया के घेरे में कैद है।Shambhunath Shukla
    Yesterday at 17:43 ·
    बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति जीसी त्रिपाठी को रवीश कुमार ने उधेड़ कर धर दिया है. हालाँकि 21 की शाम से ही वे चर्चा में थे और उसके पहले भी उनके क्रिया-कलाप उनके व्यक्तित्त्व को ज़ाहिर कर रहे थे. पूरी सोशल मीडिया पर थू-थू हो रही हैं. कुछ लोग लिख रहे इस त्रिपाठी नामधारी ब्राह्मण ने सारे ब्राह्मणों को बदनाम कर दिया है. मुझे समझ नहीं आता कि लोग इतने कूढ़मगज क्यों होते हैं और क्यों इस त्रिपाठी को ही अपना आदर्श मानते हैं. जहाँ तक ब्राह्मण जाति में पैदा होने की बात है तो जीसी त्रिपाठी को उधेड़ने वाले रवीश भी उसी कुल में जन्में. पंडित जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी, मधु लिमये से लेकर मधु दंडवते, ईएमएस नम्बूदरीपाद से लेकर सोमनाथ चटर्जी और बुद्धदेब भट्टाचार्य तथा जयललिता से लेकर ममता बनर्जी आदि सेकुलर राजनेता भी तो ब्राह्मण कुल में ही पैदा हुए. जबकि घोर असहिष्णु कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी ब्राह्मण नहीं हैं. मज़े की बात कि भाजपा के ब्राह्मण जाति में जन्में नेता अटलबिहारी वाजपेयी कम्युनल नहीं थे और न ही सुषमा स्वराज हैं. राहुल सांकृत्यायन से लेकर भदंत आनंद कौशल्यायन जैसे विद्वान ब्राह्मण कुल में जन्मे थे. हिंदू समाज की कुरीतियों का विरोध करने पर कट्टरपंथियों द्वारा मारे जाने वाले कलबुर्गी ब्राह्मण ही थे. आज भी इस सरकार की असहनशीलता और असहिष्णुता का विरोध करने वाले अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, जगदीश्वर चतुर्वेदी आदि विद्वानों से लेकर ओम थानवी तक ब्राह्मण परिवारों से ही आए हैं. हर तरह के अन्धविश्वास और जातीय कट्टरता का विरोध करने वाले महीषी हिमांशु कुमार भी जन्म से ब्राह्मण हैं. ताउम्र हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जीने वाले विश्वंभरनाथ पांडे ब्राह्मण कुल में जन्में. तब आपको क्यों लगता है कि किसी त्रिपाठी या किसी मिश्रा ने आपके कुल को बदनाम कर दिया. सोचो यह कि कोई भी व्यक्ति किसी कुलविशेष में जन्म लेने से छोटा-बड़ा, महान अथवा गिरा हुआ इंसान नहीं होता. हर कुल, हर जाति, हर धर्म और मजहब में लुच्चे-लफंगे भी पैदा होते हैं और महान लोग भी. बस सोचना यह है कि आप किसे अपना नायक समझते हैं.Shambhunath Shukla
    Yesterday at 10:02 ·
    कांग्रेस अपने ज़माने में विश्वविद्यालयों के कुलपति, इतिहास और विज्ञान अकादमियों तथा अन्य विज्ञ संस्थानों में अध्यक्ष के पद के लिए उदारवादी धारा वाले वाम बौद्धिकों को लेकर आती थी क्योंकि उसे पता होता था कि उसके नेता और यूथ कांग्रेस के लौंडे बस हुल्लड़ ही मचा सकते हैं। इसलिए सारी संस्थाएं सुगमतापूर्वक चलती रहीं। एनडीए की अटलबिहारी बाजपेयी सरकार ने वाम बौद्धिकों को तो तवज्जो नहीं दी लेकिन दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों को ये पद दिए। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार की दिक्कत यह है कि वाम तो इनके पास फटकेगा नहीं दक्षिणपंथी भी अलग पड़ा है। तब इन्हें कौन मिलेगा वही गजेंद्र सिंह चौहान, नरेंद्र कोहली, कमलकिशोर गोयनका और जीसी त्रिपाठी टाइप के लोग!

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