डरा हुआ है या डरा रहा है मुसलमान?

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संजय तिवारी

तारीख २६ जून। ईद का दिन। मेरठ के ईदगाह में लोग ईद की नमाज अदा करने आये। हजारो की तादात। नये कपड़े। नयी टोपी। नया चप्पल। शरीर पर सबकुछ नया नया। लाउडस्पीकर से नमाज अदा करायी गयी। इसके बाद तेवहार के दिन “प्रेम और भाईचारे” का संदेश प्रसारित किया गया। “मुसलमान मोदी और योगी सरकार से डरे नहीं।” हजारों लोगों की भीड़ चुपचाप कारी की तकरीर सुनती रही और अपने भीतर का डर बाहर निकालने की कोशिश करती रही। डर निकला या और गहरे बैठ गया, यह तो पता नहीं लेकिन कारी शफीकुर्रहमान ने चेतावनी जारी करते हुए यह जरूर हिदायत दे दी कि “जो भी मुसलमानों पर जुल्मों सितम करता है अल्लाह उसका इतिहास से नामोनिशान मिटा देते हैं।”

मेरठ शहर का ही सोतीगंज बाजार। कहने के लिए इसे उत्तर भारत का सबसे बड़ा कबाड़ी बाजार कहा जाता है लेकिन हकीकत में यह चोरी की गाड़ियों को खरीदने बेचने का सबसे बड़ा बाजार है। इस बाजार पर इकतरफा मुसलमानों का राज है। मीडिया का कहना है कि दिल्ली और एनसीआर से जो गाड़ियां चुराई जाती हैं उनमें अधिकांश यहीं सोतीगंज पहुंचती हैं। जब तब यहां पुलिस कार्रवाई करती रहती है लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि पुलिस की मिलीभगत से ही यहां चोरी की गाड़ियों को काटने और बेचने का काम किया जाता है। लेकिन जब से यूपी में योगी सरकार आयी है यहां पुलिस की दबिश बढ़ गयी है। जब तब न सिर्फ छापेमारी होती है बल्कि विरोध करने पर गिरफ्तारियां भी की जाती है। ऐसी आखिरी कार्रवाई इसी तीन जुलाई को हुई थी जिसमें विरोध करने पर दर्जनभर लोग गिरफ्तार भी किये गये।

अकेले मेरठ शहर की ही ये दो घटनाएं जिसमें मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार और मुस्लिम कारी द्वारा ऐसे अत्याचारों के विरोध का आवाहन दोनों दिखता है। सवाल ये उठता है कि क्या देश में सचमुच मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है जिसकी वजह से उन्हें डरकर जीना पड़ रहा है? कम से कम कुछ वामपंथी पत्रकारों की दलीलों और रपटों से तो यही लगता है कि देश में ऐसा वातावरण बन गया है कि मुसलमान दहशत में जी रहे हैं। बीते दो साल में गाय के नाम पर कुछ मुसलमानों की मार पिटाई इस बात का सबूत भी पेश करती है गौ रक्षा के नाम पर हिन्दुओं का एक धड़ा मुसलमानों के साथ गुंडई कर रहा है जिसकी वजह से मुसलमान दहशत में हैं।

असल में यह सिक्के का एक पहलू है जब यह बताया जाता है कि किसी मुस्लिम को गौ हत्या या फिर गौ तस्करी के “संदेह” में मारा पीटा गया। सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि इतनी सारी कानूनी सख्ती के बाद भी मुसलमान गाय काट रहे हैं। अकेले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में रमजान के महीने में आधा दर्जन से गाय काटने की घटनाएं सामने आयीं और जब पुलिस कार्रवाई करने पहुंची तो पुलिस को मारपीट कर भगा दिया गया। इसी तरह बहुचर्चित जुनैद हत्याकांड में खुद जुनैद मारपीट के इरादे से दूसरे डिब्बे से साथियों को लेकर आया था लेकिन दुर्भाग्य से उसकी जान चली गयी। लेकिन मीडिया के एक धड़े ने इसे भी गौ रक्षा के नाम पर हत्या कहकर प्रचारित कर दिया।

“मुसलमान कहीं से डरा हुआ नहीं है। वह डर का डर दिखा रहा है जो कि मुस्लिम उलेमाओं और नेताओं की पुरानी नीति रही है।”

शायद इसी प्रचारतंत्र का प्रभाव है कि जाते जाते उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तक यह कह गये कि देश में एक वर्ग भयभीत है। जमीनी हकीकत इससे उलट है। जिस वर्ग को हामिद अंसारी भयभीत बता रहे हैं उसी वर्ग में बड़ी संख्या ऐसी है जो मेरठ के सोतीगंज से लेकर दिल्ली के दरियागंज तक चोर बाजार चला रहा है। काटने से लेकर गाड़ी काटने तक हर गैर कानूनी काम को अंजाम दे रहा है। अभी तक एक भीड़तंत्र का सहारा लेकर वो अपने गैर कानूनी काम को प्रश्रय देते रहे हैं। लेकिन अब प्रशासन (कम से कम यूपी में) उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है तो इसे वो अपने उत्पीड़न से जोड़ रहे हैं। जमीनी हकीकत ये है कि मुसलमान कहीं से डरा हुआ नहीं है। वह डर का डर दिखा रहा है जो कि मुस्लिम उलेमाओं और नेताओं की पुरानी नीति रही है। सत्तर अस्सी साल पहले भी मुसलमानों ने यही डर दिखाया था कि अगर बहुसंख्यक हिन्दुओं की सरकार बनी तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए पाकिस्तान ले लिया।

मुसलमानों में डर एक कारगर रणनीति है जिसे दिखाकर राजनीतिक बढ़त हासिल की जाती है। वह डराकर तो राजनीतिक फायदा लेता ही है, डरकर भी राजनीतिक फायदा उठाता है। मुसलमानों के भीतर का यह डर उनकी राजनीतिक विचारधारा से ही आता है। उन्हें लगता है कि जैसे बहुसंख्यक होने पर मुसलमान गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है वैसे ही दूसरे धर्म के लोग भी करते होंगे। जबकि हकीकत ये है कि सिर्फ इस्लाम ही दुनिया का इकलौता ऐसा मजहब है जो धर्म के नाम पर गैर मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक घोषित करता है, और सच्चे इस्लामिक राज्य में तो जीने के हर अधिकार छीन लेता है। दुनिया का कोई भी शासन प्रशासन यह घृणित काम नहीं करता। मुसलमान नेताओं और बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वो डर का डर दिखाने से अच्छा है मुसलमानों को सही रास्ते पर लायें। इससे उनका डर भी चला जाएगा और डर की शिकायत भी दूर हो जाएगी।

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7 thoughts on “डरा हुआ है या डरा रहा है मुसलमान?

  1. सिकंदर हयात

    जो लोग शाकाहार मांसाहार को इंसानियत से जोड़ कर देखते हे ( हलाकि शाकाहारी होना बहुत अच्छी बात हे ) वो देखे की किस तरह से संघियो ने गोरखपुर नरसंहार पर चुप्पी ही साध ली और ये शुद्ध शाकाहारी राक्षस संजय तिवारी तो और दो कदम आगे निकल गया पढ़े किस बेशर्मी से अपने योगी मोदी भाजपा का बचाव कर रहा हे लोगो का ध्यान भटका कर Sanjay Tiwari
    4 hrs ·
    पेमेन्ट रुकने से ऑक्सीजन सप्लाई रोक दिया कंपनी ने और कुल 48 लोग मर गए। सरकारी दफ्तरों का यही हाल हैं हर जगह… किसी भी सरकारी दफ्तरों को ले लीजिये उधर के कर्मचारियों ने गंद मचा रखा है। अगर कोई पेमेंट रुकने की बात से अचंभित है तो उसका पाला नहीं पड़ा हैं इनसे …. हमारा इनसे पाला पड़ने का ही काम है … हर सप्ताह सोमवार और शुक्रवार इन दफ्तरों में बकाए की राशि के लिए चिट्ठी भेजना प्रमुख काम है।
    घूस खाने के बाद भी पेमेंट लटकाए रखते हैं, जैसे इनकी मैय्यत के खर्चे का पैसा निकाल के दे रहे हों। बाबू अपने टेबल पर 500 रुपये, कोई 1000, कोई 5000 – (ये रकम तय कमीशन के अलावा बख़्शीश भी हो सकती है) औकतानुसार नहीं पहुंचने तक महीनों पेमेंट अटका के रखते हैं।
    कानूनन आपूर्ति करने वाले को पहले माल सप्लाई करना होता है, समय पर VaT/GST भरना होता है, समय पर एडवांस टैक्स भरना होता है, घूस खिलाना होता है, कई केस में तो बैंक गारन्टी भी देनी होती है साल भर की और फिर इतना करने के बाद भी महीनों पेमेंट का इंतज़ार। जब एक लिमिट हो जाता है तब कंपनी अगली सप्लाई को मना कर देती है या फिर इन सबको देखते हुए सरकारी दफ्तरों में 1 का माल 10 में बिकता है।
    इस देश में सबसे बड़ी समस्या है बाबूगिरी। सरकारी बाबू बड़े वाले से लेकर छोटे वाले तक ये सब “अल कायदा” जैसे आतंकवादी है। खोजबीन करेंगे तो पता चल जाएगा कि इन बाबुओं की वजह से भारत में जितनी मौत हुई होंगी उससे मुकाबले अल कायदा, लश्कर या इंडियन मुजाहिदीन कहीं नहीं ठहरता ….
    Ranjay त्रिपाठी —————————————————————–Dilip C Mandal added 2 new photos.
    1 hr ·
    जब योगी गोरखपुर में बच्चों को मार रहे थे तो डॉक्टर कफ़ील अपने ATM से ख़र्चा करके बच्चों के लिए ऑक्सीजन ख़रीद रहे थे।
    योगी ने नहीं देखा कि जिनको वे मार रहे हैं वे हिंदू हैं कि मुसलमान।
    डॉक्टर कफ़ील ने भी नहीं देखा कि जिनको वे बचा रहे हैं वे हिंदू हैं कि मुसलमान।
    शुक्रिया डॉक्टर कफ़ील।
    जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो आपका नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
    योगी-मोदी का नाम कूड़ेदान में होगा।Dilip C Mandal
    13 hrs ·
    वादा तो श्मशान का ही था. मोदी-योगी वचन के पक्के हैं.5 Replies · 5 hrs
    रमेश मीणा
    रमेश मीणा परिवार व् बच्चो के दर्द वोही समझ सकता है . जिसके घर में अपने बच्चे हो … जो पशुओ और चेले सपाटो में अपना जीवन व्यतीत किया हो वे ये दर्द नही समझ सकता … बहुत ही दुखद घटना !!!Dilip C Mandal
    13 hrs ·
    गोरखपुर में क्या हुआ, एक डॉक्टर की नजर से देखिए.
    अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन? -डॉ. नवमीत
    11 अगस्त की खबर है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिए जाने की वजह से 40 बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे एनएनयू वार्ड और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती थे। जनवरी से लेकर 11 अगस्त तक इंसेफेलाइटिस की वजह से इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 151 मासूमों की मौत हो चुकी है जिनमे से 40 बच्चे 10 और 11 अगस्त को मर गए।
    गौरमतलब है कि यह मेडिकल कॉलेज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व संसदीय क्षेत्र में आता है। आदित्यनाथ घटना से दो ही दिन पहले इस अस्पताल का दौरा भी करके गया था। खबरों के अनुसार अस्पताल पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 69 लाख का बिल बकाया था। इस वजह से कंपनी ने गुरुवार यानि 10 अगस्त को अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।
    लिक्विड ऑक्सीजन बंद होने के बाद आज सारे ऑक्सीजन सिलेंडर भी खत्म हो गए। इंसेफेलाइटिस वार्ड में दो घंटे तक अम्बू बैग का सहारा लिया गया लेकिन बिना ऑक्सीजन के यह तरीका ज्यादा देर तक कारगर नहीं हो पाया और इस तरह से सरकार की उदासीनता, अस्पताल प्रशासन की लापरवाही और कंपनी की मुनाफाखोरी की गाज अस्पताल में भर्ती बच्चों पर गिरी।
    बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दो वर्ष पूर्व लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड समेत 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। इसकी सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स है। कालेज पर कंपनी का 68 लाख 58 हजार 596 रुपये का बकाया था और बकाया रकम की अधिकतम तय राशि 10 लाख रुपये है।
    बकाया की रकम तय सीमा से अधिक होने के कारण देहरादून के आईनॉक्स कंपनी की एलएमओ गैस प्लांट ने गैस सप्लाई देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बात की बात में 40 मासूम इस मुनाफाखोर व्यवस्था की भेंट चढ़ गए।
    यह भी एकदम से नहीं हुआ, बल्कि गुरुवार की शाम से ही बच्चों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी पड़ी थी और एक-एक कर बच्चों की मौत हो रही थी।
    अस्पताल के डॉक्टरों ने पुष्पा सेल्स के अधिकारियों को फोन कर ऑक्सीजन भेजने की गुहार लगाई तो कंपनी ने पैसे मांगे। तब कॉलेज प्रशासन भी नींद से जागा और 22 लाख रुपये बकाया के भुगतान की कवायद शुरू की। पैसे आने के बाद बाद ही पुष्पा सेल्स ने लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर को भेजने का फैसला किया है।
    लेकिन अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी और 40 बच्चे भी मर चुके थे। यह खबर आने तक कहा जा रहा था कि यह टैंकर शनिवार की शाम या रविवार तक ही अस्पताल में पहुंच पायेगा। मौत के ऊपर लापरवाही और लालच का यह खेल भी नया नहीं है, पिछले साल अप्रैल में भी इस कंपनी ने 50 लाख बकाया होने के बाद इसी तरह ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।
    दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन का रुख भी इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संकट की जानकारी दी और मदद मांगी। मगर जिले के आला अधिकारी बेपरवाह रहे। वार्ड 100 बेड के प्रभारी डॉ. कफील खान के बार बार फोन करने के बाद भी किसी बड़े अधिकारी व गैस सप्लायर ने फोन नहीं उठाया तो डॉ. कफील ने अपने डॉक्टर दोस्तों से मदद मांगी और अपनी गाड़ी से ऑक्सीजन करीब एक दर्जन सिलेंडरों को ढुलवाया। उनकी कोशिशों के बाद एसएसबी व कुछ प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कुछ मदद की गई।
    सशस्त्र सीमा बल के अस्पताल से बीआरडी को 10 जंबो सिलेंडर दिए गए। लेकिन अभी भी स्थिति भयावह थी और ज्यादा मौतें होने की सम्भावना बनी रही थी।
    बीमारी का यह हमला आकस्मिक नहीं था। इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल हमारे देश में हजारों बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी हर इसी मौसम में अपना कहर ढाती है। 1978 से अब तक इंसेफेलाइटिस अकेले पूर्वांचल में 50 हजार से अधिक मासूमों को लील चुकी है। 2005 में इसने महामारी का रूप लिया था। तब अकेले बीआरडी मेडिकल कालेज में 1132 मौतें हो गई थीं।
    मई 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान शुरू किया था। मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि मोदी के आशीर्वाद से पोलियो और फ़ाइलेरिया की तरह इंसेफेलाइटिस को भी खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन हुआ ये कि जो बच्चे बच सकते थे उनकी एक तरह से हत्या कर दी गई। अब गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने घटना की जांच की बात कही है।
    जाहिर है जब तक जाँच होगी तब तक हमेशा की तरह इस मामले को भी फाइलों के नीचे दबाया जा चुका होगा।
    और यह सिर्फ गोरखपुर या इस एक अस्पताल की बात नहीं है। पूरे ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल है। जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेदारी होती है सरकार की। लेकिन अव्वल तो सरकार यह करती नहीं है और कुछ सरकारी अस्पताल जो ठीक ठाक काम करते भी थे उनकी हालत भी अब बद से बदतर होती जा रही है।
    पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों और नवउदारवादी नीतियों के चलते यहाँ हर क्षेत्र की तरह जनस्वास्थ्य की हालत भी खस्ता हो चुकी है। सरकार लगातार इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाती जा रही है। अब पूंजीपति तो कोई भी काम मुनाफे के लिए ही करता है तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी तो होनी ही हैं। और महँगी होने के बाद भी जान नहीं बचती।
    परिणाम हमारे सामने है। किस तरह मुनाफे के लिए पुष्पा सेल्स नाम की इस कंपनी ने 40 बच्चों की जान ले ली है। लेकिन साथ में सरकार और प्रशासन भी बराबर जिम्मेदार है।
    बहरहाल अच्छे दिनों, भारत निर्माण, इंडिया शाइनिंग के लोकलुभावने नारे देने वाली और लव जिहाद, गौहत्या जैसे साम्प्रदायिक मुद्दे उछालने वाली सरकारों को आम आदमी की सेहत का कोई ख्याल नहीं रहता है। पहली बात तो ऑक्सीजन या दवाओं या फिर किसी भी जरूरी सामान की उपलब्धता सरकार को ही सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर नहीं करती है तो इस उपलब्धता को सुनिश्चित के लिए जरुरी बजट हर हाल में उपलब्ध होना चाहिए। साथ में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि यह बजट सही समय पर सही जगह लग जाए। लेकिन इनमें से कोई भी चीज नहीं होती और इसी तरह से मरीज मौत का शिकार हो जाते हैं।
    बजट की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाना चाहिए। भारत की सरकारों ने पिछले दो दशक के दौरान लगातार 1 प्रतिशत के आसपास ही लगाया है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 2 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था और केवल 1.09 प्रतिशत ही लगाया गया। 12वीं योजना के पहले सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक ग्रुप बनाया था जिसने इस योजना में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का 2.5 प्रतिशत निवेश करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार द्वारा लक्ष्य रखा सिर्फ 1.58 प्रतिशत। पिछले बजट में भी यह डेढ़ प्रतिशत के आसपास ही रहा है।
    भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा किया गया निवेश इस क्षेत्र में किये गए कुल निवेश का 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है। पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत निजी क्षेत्र की होने वाली सबसे बड़ी भागीदारियों में एक नाम भारत का भी है। जाहिर है कि निजी क्षेत्र की ये कंपनियां लोगों के स्वास्थ्य की से खेलते हुए पैसे बना रही हैं। इनकी दिलचस्पी लोगों के स्वास्थ्य में नहीं बल्कि अपने मुनाफे में होती है और जब इनको लगता है कि मुनाफा कम होने लगा है या उसमें कोई अडचन आ गई है तो ये ऐसा ही करती हैं जैसे इन्होने गोरखपुर के इस अस्पताल में किया। और यह सब सरकार की शह पर होता है।
    इसके अलावा देश के हर नागरिक हो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सही समय पर सही अस्पताल, डॉक्टर और इलाज मुहैया हो यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।
    मानकों के अनुसार हमारे देश में हर 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हर एक लाख की आबादी पर 30 बेड वाले एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और हर सब डिविजन पर एक 100 बेड वाला सामान्य अस्पताल होना चाहिए लेकिन यह भी सिर्फ कागजों पर है। और यह कागजों के मानक भी सालों पुराने हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव करना तो दूर की बात है इन्हीं मानकों को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता जबकि पिछले दो दशक में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट और कॉर्पोरेट अस्पताल जरुर उग आये हैं जिनमें जाकर मरीज या तो बीमारी से मर जाता है या फिर इनके भारीभरकम खर्चे की वजह से। अब सरकार एक और शिगूफा लेकर आई है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप। मतलब सरकार अब प्राइवेट कंपनियों के साथ सहकारिता करेगी और लोगों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाएगी। यह शिगूफा और कुछ नहीं बल्कि पुष्पा सेल्स जैसी कंपनियों को मुनाफा देने की कवायद है ताकि ये पैसे बना सकें और समय आने पर इस मामले की तरह लोगों की जान से खेल सकें।
    बहरहाल बात ये है कि इन बच्चों सहित इस देश में रोज होने वाली ऐसी मौतों, जिनको रोका जा सकता था, के लिए मुनाफे पर आधारित यह व्यवस्था जिम्मेदार है। साथ में जिम्मेदार है इस देश की सरकारें जो कहने को तो इस देश की हैं लेकिन काम वे करती हैं पूंजीपतियों के लिए। किस तरह से इस मानवद्रोही व्यवस्था को खत्म किया जाये यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब हम सबको ही ढूँढना होगा ताकि इस तरह से मासूमों की बलि न चढ़ सके।

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  2. सिकंदर हयात

    Umashankar Singh shared Priyabhanshu Ranjan’s post.
    12 August at 10:53 ·

    Priyabhanshu Ranjan
    12 August at 10:17 ·
    Times Now चैनल की एक ‘बड़ी’ जर्नलिस्ट हैं नविका कुमार।

    अपने चैनल पर एक शो के दौरान विपक्ष के एक नेता को लताड़ लगाने के अंदाज में कह रही थीं कि हम मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के मुद्दे पर बहस कर रहे हैं और आप अस्पताल में बच्चों की मौत का मुद्दा उठाकर ध्यान भटकाना चाह रहे हैं?

    जी हां, नविका कुमार एक महिला हैं। किसी बच्चे की मां भी होंगी!
    ‘उग्र राष्ट्रवाद’ या फिर किसी तरह की लालच या किसी खौफ ने नविका कुमार जैसे पत्रकारों को आला दर्जे का दानव बना दिया है!Priyabhanshu Ranjan
    13 August at 09:15 · New Delhi · आतंकवाद के एक मामले में आरोपी रह चुके RSS के नेता इंद्रेश कुमार ने हामिद अंसारी को भारत छोड़कर चले जाने को कहा है!
    इंद्रेश बाबू, कान खोल कर सुन लो और आंखें खोल कर ये फेसबुक पोस्ट पढ़ लो।————————–Narendra Nath
    13 August at 17:37 ·
    गोरखपुर और बिहार में हर साल इनसेफ्लाइटिश से होने वाली मौत या बेसिक मेडिकल सुविधाओं को ठीक करने के प्रति सरकारें कितनी ईमानदार होती हैं उसे जानें।
    2014 में जब नरेन्द्र मोदी पीएम बने तो उन्होंने खुद डॉक्टर रहे हर्षवर्धन को हेल्थ मिनिस्टर बनाया। वे खुद बेहतरीन डॉक्टर हैं। बहुत ही सिंपल और ईमानदार। उन्हें पोलिया अभियान को शुरू करने का क्रेडिट भी जाता रहा है।
    खैर,उम्मीद बंधी कि अच्छे बंदे को मिनिस्ट्री दी गयी। हर्षवर्धन ने तुरंत मिशन शुरू किया। पद संभालते ही दो महीने के अंदर इनसेफ्लाइटिश फैली। वे बिना आरोप-प्रत्याराेप कि मैं अभी तो मंत्री बना हूं,पिछली सरकार ने क्या किया आदि का बहाना लगाए चुपचाप काम में लग गये। संभवत: पहली बार कोई सेंट्रल हेल्थ मिनिस्टर ने सिर्फ सर्वे-दौरा न कर बल्कि प्रभावित इलाकों में कैंप किया। सात दिन-रात बिताए। पूरा ब्लू प्रिंट बनाया। काम करते दिखे।
    इनसेफ्लाइटिश के साथ उन्होंने तंबाकू माफिया के गिरेबां पर भी अपनी हाथ बढ़ायी। मेडिकल एडमिशन माफिया काे पकड़ने का अगला अजेंडा बनाया। उनपर नकेल कस दिया। बस कुछ महीने में ही उनका ग्राफ से तेजी से बढ़ने लगा। माफिया का कद घटने लगा।
    लेकिन तभी आश्यर्चजनक तरीके से उन्हें हेल्थ मिनिस्ट्री से हटाकर डंप कर दिया गया। जब सरकार टैलेंट क्राइसिस से गुजर रही थी,एक बंदा जो विशेषज्ञ है किसी फील्ड का,उसे हटा दिया गया। उनके खिलाफ हर वह लोग लगे थे जो मेडिकल माफिया के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं।
    हर्षवर्धन के हटाने का असर यह था कि अगले ही दिल आईटीसी कंपनी के शेयर ने रिकार्ड जंप मारा जो सबसे बड़ी टोबैको कंपनी है।
    पॉवर सर्किल में यह बात दबीं जुंबा में सभी मानते हैं कि हेल्थ मिनिस्ट्री सबसे बड़ी वसूली मिनिस्ट्री होती है आैर फंड जमा करने की जिम्मेदारी इनपर ही होती है। मतलब या तो ये फंड जमा करेंगे या ईमानदारी से काम करेंगे। दोनोंएक साथ सम्भव नहीं।
    जो सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा था उसे कुछ महीने के लिए तोड़ने की कोशिश की गयी लेकिन वह कोशिश जल्द ही हार गयी। फण्ड जुटाना राजनीति का सबसे अनिवार्य काम होता है।
    मेडिकल जगत में एक सीट को बेचने से लेकर हर डील तक लाखों-करोड़ों की डील होती है जिसमें मीडिया-पक्ष-विपक्ष-ब्यूरोक्रेसी सभी का जबर्दस्त महागठबंधन है। अभी भी मेडिकल जगत से जुड़ा एक घपला पॉवर सर्किल में बहुत चर्चा का विषय बना हुआ है। याद हाेगा कि किस तरह डेढ़ साल पहले रात के आठ बजे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने रिटायर करने से पहले प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के पक्ष में करोड़ों का लाभ पहंचाने वाला अादेश सुनाकर निकल लिये थे।
    जाहिर है ऐसी सूरत में बुनियादी हेल्थ सेक्टर को ठीक करना हेल्थ मिनिस्ट्री के लिए कोई प्राथमिकता नहीं होती है। वह ऑटो मोड में चलती है जिसमें कमीशन-दलाली-घूस-नकारापन अपने हिसाब से चलते रहता है।
    इसिलिए गोरखपुर हादसे को पहला या अंतिम मान कर जो इसे मुद्दा बना रहे हैं वे गलतफहमी में न रहें। यह चलता रहेगा। जबतक इनकी प्राथमिकता ठीक नहीं होगी।
    हामिद अंसारी भारत छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। वो भारत के ही नागरिक हैं और उन्होंने आपसे कहीं ज्यादा इस देश की सेवा की है।
    भारत अभी RSS के लोगों की जागीर नहीं बना है कि किसी का यहां रहना या न रहना आप तय करें।
    बहरहाल, हम असल मुद्दे से भटकने वालों में से नहीं हैं।Narendra Nath
    12 August at 18:53 ·
    गोरखपुर में मौत होने के पीछे ऑक्सीजन की कमी मुख्य कारण है। जहां एक एमएलण् को अपने पक्ष में करने के लिए राजनीतिक दल करोड़ों की पेटी खोल दे रही है,वहीं बच्चों के लिए ऑक्सीजन खरीदने के लिए कुछ लाख पिछले तीन महीने में जुटा सकी। इसी से अंदाजा लगाएं कि इनकी जिंदगी सरकारें-सिस्टम के लिए कितनी मायने रखती हैं।
    अब बात गोरखपुर से दिल्ली की भी। दिल्ली की एक खबर की जानकारी कई लोगों को नहीं होगी। यहां पिछले एक महीने में 9 गरीब की मौत हो गयी। ये सभी सीवर साफ करने वाले हैं। आज भी 2 मरे हैं। सीवर के अंदर गंदगी साफ करने गये तो अंदर की गंदगी इस कदर जहर बन गयी थी कि उनकी मौत वही दम घूंट कर हो गयी। हां,सही पढ़ा। 9 लोगों की मौत 1 महीने में। कई लोगों की रूह कांप जाएगी यह जानकार कि ये मजदूर गंदगी में उतरने से पहले नशा करते हैं। नशा इस कारण करते हैं कि गंदगी की दुर्गंध को झेलने की ताकत आ सके। पूरे देश में ऐसे लाखों लोग हैं जो हर दिन यह काम करते हैं और ये यह काम 500-1000 सरकारी रूपये के लिए करते हैं। अौसतन हर दिन एक मौत होती है।
    लेकिन इन सब घटनाओं को पढ़ते-समझते-जानते हमारी देशभावना आहत नहीं होती है। हमारा राष्ट्रवाद नहीं जगता है। दरअसल हम खोखले राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं जिसमें देश से तो प्रेम करें लेकिन देश के लोगों से प्यार नहीं करना,उनके सरोकारों से कोई मतलब नहीं होना होता है।
    जो सरकारें 15 अगस्त पर मूसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए रिकार्डिंग करने का फरमान सुना रहे हैं वे जरा अपने साथ अपने गिरेबां की रिकार्डिंग भी देश के लोगों को दिखाते रहें। अगर ऐसा करेंगे तो न गोरखपुर में बच्चे मरेंगे न दिल्ली में मजदूर। औैर ऐसा हुआ तो मूसलमान वंदे मातरम नहीं भी गाएंगे तब भी बेहतर देश कहलाएंगे।
    कल ऐसा ही एक रिकार्डिंग एक टीवी चैनल पर दिखायी थी जिसमें यूपी के एक मंत्री सभी मूसलमानों के लिए वंदे मातरम गाने की शर्त को गरज कर सही ठहरा रहे थे लेकिन जब झटके में उनसे खुद पूरा वंदे मातरम सुनाने कह दिया गया तो पता चला कि उन्हें खुद यह नहीं आता है।
    आप अपनी सरकार से पूछो कि #GorakhpurMassMurder का जिम्मेदार कौन है और उनके खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई।
    भाजपा के अपने ‘चेलों’ से पूछो कि एक FIR दर्ज होने पर तेजस्वी यादव का इस्तीफा मांगने वालों ने गोरखपुर में 60 बच्चों की मौत पर अब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के इस्तीफे के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया।—————Dinesh Choudhary
    4 hrs ·
    इतने आत्मविश्वास के साथ झूठ बोलना उच्च कोटि की कला है। कोई अवतारी पुरुष ही यह काम कर सकता है।
    ऐरे -गैरे, नत्थू -खैरे तो सच बोलने में ही रिरियाने लगते हैं। ऐसा लगता है जुबान अभी की अभी हलक से बाहर निकल जाएगी। बात-बात में थूक गटकते हैं और चेहरे पर भाव ऐसे होते हैं जैसे घर से सौ जूते खाकर निकले हों। लानत है उन पर। आक थू!!
    देख लो। समझ लो। गाँठ बाँध लो। मुख मुद्रा देखो। भंगिमाएं देखो। भुजाओं की फड़कन देखो। चेहरे में ऎंठन देखो। देह की भाषा देखो। आँखों में समाई आशा देखो। चपलता देखो। वाक पटुता देखो। लय-ताल देखो। उतार-चढ़ाव देखो। आरोह-अवरोह-सम देखो। विलम्बित देखो-द्रुत देखो। झूठ बोलो तो बस ऐसे ही बोलो।
    यह सच्ची कला है। साधना है। तप है। योग है। कठिन परिश्रम से मिलती है। झूठ को झूठ की तरह नहीं सच की तरह कहने का अभ्यास अभी से कर लो क्योंकि आगे चलकर इसे कलाओं में ललित कला, धर्म में आचरण, आत्मा में ईमान और मुल्क में संविधान का दर्जा मिल सकता है।-
    पुर्तगाल के जंगलों में आग लगने पर ट्वीट करने वाले और क्रिकेट टीम के हर एक खिलाड़ी को अलग-अलग मेसेज लिखकर शुभकामनाएं देने वाले अपने ‘मित्र’ नरेंद्र मोदी से पूछो कि क्या वो इस हादसे पर खुलकर दुख भी नहीं जता सकते।
    रही आपकी बात, तो आप गाय के पास बैठकर Oxygen ग्रहण करने और गोबर से बंकर बनाने के लिए आजाद हो!Priyabhanshu Ranjan

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  3. zakir hussain

    इसी साइट पर आप देखोगे कि मेरे, सिकंदर और अफ़ज़ल भाई की तरह के लोग, जो इस्लाम की निंदा करने की बजाय, इस्लाम की उदार व्याख्या या तस्वीर पेश करने की कोशिश करते हैं को अनेको मुसलमान, मज़हब का विरोधी घोषित कर रहे हैं.
    एक तरफ ये लोग कहते हैं कि इस्लाम को कुछ गैर इस्लामी, सांप्रदायिक ताकते बदनाम कर रही है, इस्लाम के बारे मे ग़लतफहमी पैदा करके, मुसलमानो के प्रति नफ़रत भारी जा रही है, तो जनाब एक बात बताओ कि एक आम मुसलमान का रवैया हम जैसे लोगो के लिए क्या है? बहुसंख्यक मुस्लिम समाज, जब उदारवादी मुस्लिम को भी गालियाँ देगा, तो गैर मुस्लिम तो आम मुस्लिम को कट्टरपंथी ही समझेगा. इस्लामोफ़ोबिया के इस दुनिया मे फैलने का आम ज़िम्मेदार, एक आम मुसलमान ही है. आम मुसलमानो को हमारे जैसे मुस्लिमो की टिप्पणियों पर निष्क्रिय होने की बजाय, हम को गलियाने वालो को भी आड़े हाथों लेने की ज़रूरत हो. आपकी खामोशी भी गैर मुस्लिम सुन रहा है, ध्यान रखना.

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  4. सिकंदर हयात

    लखनऊ के सोशल मिडिया के प्रसिद्ध सूफी संत————— सिद्द्की के लेख दैत्याकार मीडियाग्रुप की साइट पर पब्लिश हो रे हे यानी नाम भी शायद दाम भी वैसे तो अच्छी बात हे लेखक भी अच्छे हे लेकिन हे शुद्ध बरेलवी और शिया झुकाव वाले . अच्छा गैर मुस्लिमो को सेकुलरो लिबरलों को वाम को इन बातो की समझ नहीं हे सो वो ऐसे लिबरल मुसलमानो को मान सम्मान देते आये हे सोचते हे वो बड़ा अच्छा और मुश्किल काम कर रहे हे वो ये नहीं देखते हे और समझ भी नहीं हे की ये सभी लोग एक आसान काम कर रहे हे इनके लिए कोई संघर्ष नहीं हे ना ये कोई नयी बात हे ना इसका कोई परिवर्तनकारी रिज़ल्ट निकलने वाला हे भारत में सभी लिबरल मुस्लिम विचारक लगभग सभी शिया और बरेलवी बोहरा ही हुए जबकि बहुमत देवबंदियों का हे और कटटरता के आरोप भी अधिक देवबंदियों पर हे जिनका बाकियो पर ये आरोप सा रहा हे की वो इस्लाम में शिर्क घुसाते हे खेर कहने का आशय ये हे की गैर मुस्लिमो लिबरलों को शिया- सुन्नी देवबंदी बरेलवी खींचतान का अधिक पता नहीं हे इसलिए वो नासमझी में इन शिया और बरेलवी विचारको पर फ़िदा होते रहते हे और इन लोगो को इसकी ठीक ठाक मलाई भी मिलती रही हे जबकि जमीन पर इनके नतीजे और प्रभाव सिफर रहे हे कुछ नहीं जैसे साइट ने लिखा की सूफी संत कटरपन्तियो के निशाने पर रहते हे कौन से निशाने पर भाई ————— ? अगर होते तो इनका भी हम ( हम ना शिया ना बरेलवी देवबंदी और शुद्ध सेकुलर ) जैसा हाल ना होता—————— ? अफ़ज़ल भाई दुबई हे तो वो लिख पा रहे हे जाकिर भाई और में हम दोनों लगभग अंडरग्राउंड रहकर लिखते हे मेरा बहुत बड़ा सोशल सर्किल हे मगर किसी को नहीं पता की में क्या लिखता हु पता चलेगा तो विरोध ही होगा जो में फिलहाल झेलने की पावर में नहीं हु ना कोई भी कैसा भी सपोर्ट हे जबकि उधर सूफी संत खुल कर लिखते हे अपने पुरे खानदान बीवी बच्चो आजु बाजु पता ठिकाना बताते हे की में यहाँ हु यहाँ नाटक खेल रहा हु कोई डर नहीं , खुद इन्ही के शब्दों में की एक मुल्ला इन्हे धमका रहा था तो उल्टा इन्होने उसे धमका दिया वो मुल्ला भी ठंडा पड़ गया होगा की कौन मुँह लगे बात बढ़ी तो देवबंदी बरेलवी शिया सुन्नी का रूप ना ले ले जबकि हम अपने विरोधियो से थर थर कांपते हे आप जनाब करते हे . क्योकि पता हे की बात बढ़ी तो हमारे लिए कोई शील्ड नहीं हे जबकि इन शिया और बरेलवी विचारको को घर से समाज से , ठेकेदारों से सपोर्ट मिलता हो सकता हे की भाई देखो हम तो इन वहाबियो से लड़ रहे हे पुरे परिद्र्श्य को देखते हुए ही ये शिया और बरेलवी विचारक अपने यहाँ के खिलाफ कोई खास नहीं लिखते हे क्योकि उन्हें पता हे की ————————कुल मिलाकर भारत में उदारवाद की मलाई इन शिया और बरेलवी विचारको को कुछ ना कुछ मिलती रही हे और ये लोग खुद के शिया या बरेलवी होने की बात ज़ाहिर भी नहीं करते हे . कहने का आशय ये हे की दुनिया की सबसे मुश्किल लड़ाई और चिंतन एक शुद्ध सेकुलर लिबरल भारतीय देवबंदी सुन्नी मुस्लिम का हे और ”मलाई ” इन शिया और बरेलवी विचारको के हिस्से में आती हे

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    1. सिकंदर हयात

      राइटिस्टों की तो मौज़ ही हे तो ज़ाहिद साहब चुनाव से पहले बता रहे थे की तीन तीन पार्टियों के नेता इनसे सोशल मिडिया पर आशीर्वाद मांग रहे थे ( हम लिबरलों वो भी सुन्नी देवबंदी लिबरलों को गली का कुत्ता ना पूछे जैसा की ऊपर के Comment मे बताया की यहा लिबरलिज्म के प्रचार से जुडी सारी सरदर्दी” मुश्किलें ” खतरे तो सेकुलर देवबंदियों के मत्थे और बहुत बिलोने पर जो थोड़ी बहुत ”मलाई ” वो सारी सेकुलर शियाओ बरेलवियो के लिए आरक्षित —— ? ) तो खेर साफ़ सुथरी डील हुई होगी तो इन्होने चुनाव से पहले आज़म खान की महानता के बारे में बताया की ये ही हे मुस्लिमो के हमदर्द वो आज़म खान जिनकी इरिटेटिंग हरकतों बयानबाज़ियों ने लाखो नए हिन्दू वोट भाजपा को दिलाये होंगे जिसने कँवल भारती जैसे दलित चिंतक को उठवाया था तो खेर फिर जो हुआ ——— ? अब आजकल ये असम से केरल तक सभी सभी अरबपति मुस्लिम रहनुमाओ को कोसते हुए लखपति इमरान प्रतापगडी को मुसलमानो का केजरीवाल बनाना चाहते हे खेर अल्लाह भला करे , फिलहाल मदद के लिए लिखते हे Mohd Zahid5 hrs · FBP/17-172संवेदनहीन नेताओं की भक्ति घातक :-
      आप जिन नेताओं को अपना सब कुछ मान कर उनके लिए गाली-गलौज और भक्ति करते हैं वह कितने संवेदनहीन होते हैं , इसे आप समझिए। आप यह समझिए कि इन नेताओं के लिए आप या जनता मात्र एक टेक्निकल टूल है जो उनका समर्थन करती है उनके पक्ष में गाली-गलौज करती है , उनके लिए ज़मीनी स्तर पर या सोशलमीडिया पर दिन रात काम करती है , दरअसल आप या कोई भी इनकी नज़र में इनकी सत्ता प्राप्त करने के उस टूल से अधिक कुछ नहीं।
      आप आपस में भिड़े रहिए , यह नेता आपस में मिले रहेंगे और जिस दिन आप या आपका परिवार किसी त्रासदी में फँस गया ये आपकी तरफ झाँकने भी नहीं आने वाले। बिहार हो गोरखपुर हो या गुजरात त्रासदी , वहाँ भी आप जैसे भक्त रहे होंगे जो बह गये और इन नेताओं के माथे पर शिकन भी नहीं।
      उदाहरण आपके सामने है , इसे देख कर यदि आपकी आँखें खुल जाएँ तो अब भी देश का भला हो जाए।
      बिहार की बाढ़ आपदा से शुरू करते हैं , मुसलामानों के प्रचंड वोट से चुने गये विधायकों के बल पर भाजपा जैसी मुस्लिम विरोधी पार्टी के साथ मिल कर सरकार बना लेने वाले पद के लालची अवसरवादी नितीश कुमार इतने संवेदनहीन होंगे यह पूर्व में कल्पना करना भी असंभव था परन्तु उदाहरण सबके सामने है , बिहार का एक हिस्सा बाढ़ से तबाह है और वहाँ का मुख्यमंत्री केवल और केवल पटना में बैठा जोड़ तोड़ की राजनीति में लगा हुआ है , बाढ़ पीड़ितों के लिए किसी भी राहत योजना का नेतृत्व करते दिखने के बजाए वह केवल और केवल अपने मुख्यमंत्री पद को सुरक्षित करने के लिए अपने घटिया चरित्र का प्रदर्शन कर रहा है। बाढ़ में हज़ारो लोग मरते रहें , हू केयर।
      ऐसे ही गैरज़िम्मेदारी का प्रदर्शन देश का प्रधानमंत्री देश में लगातार सामने आ रही आपदा और त्रासदी पर कर रहा है , गुजरात में बाढ़ और स्वाईन फ्लु से लगभग 500 गुजराती लोगों की जान चली गयी परन्तु देश का प्रधानमंत्री 7 आरसीआर में मस्त है , गोरखपुर में 70 बच्चे , बिहार में हजारों मौतें , किसानों की आत्महत्या और गोलीकांड तक पर खामोश रहने वाला यह प्रधानमंत्री वही है जो विदेश में हुई 2-4 लोगों की मौत पर फड़उफड़ाते हुए अपनी पीड़ा का इज़हार करता है।
      और केवल देश का प्रधानमंत्री और बिहार का मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि देश के सभी नेता ऐसी त्रासदी और तबाही पर जितना करना चाहिए उतना तो छोड़िए कुछ भी नहीं करते।
      असंवेदनशील बयान दिए जाते हैं और त्रासदी पर राजनीति की जाती है , चाहे राहुल गांधी हों अखिलेश हों या योगी आदित्य नाथ।
      इन सबका देश की जनता के दुख दर्द से कोई मतलब नहीं , इन्हें हर त्रासदी में वह कार्य करना होता है जिससे इनको पोलिटिकल माइलेज मिल सके।
      ज्यादा कड़वा हो जाएगा , पर सच तो यही है कि देश के सभी नेताओं का चरित्र एक ही है , देश की जनता को समझ कर मिलजुल कर इनकी कालर पकड़ कर इनके किए वादों का हिसाब माँगना चाहिए।
      माफ कीजिएगा , भक्ति और अंध समर्थन किसी का भी हो यह देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं , माफ कीजिएगा हम खुद को इन संवेदनहीन नेताओं के बंधक बनाते जा रहे हैं।
      पिछले बिहार विधानसभा चुनाव का वह दिन अभी भी याद आ रहा है जब संसद में 3 मिनट 19 सेकेंड मुतालबा करके देश के मुसलामानों के नेतृत्व का दंभ भरने वाले ₹10 हजार करोड़ के मालिक एक ऐसा ही नेता सीमांचल में हार जीत की परवाह ना करते हुए चुनावी घोषणा कर रहा रहा था कि वह सीमांचल के दुख दर्द में सदैव खड़ा मिलेगा , आज सीमांचल बर्बाद हो गया वहाँ के लोग तबाह हो गये और मुतालबा महोदय एक बयान जारी करके दुख प्रकट ना कर सके।
      उदाहरण बहुत अधिक हैं परन्तु मैं केवल तीन मुस्लिम राजनीति का दंभ भरने वाले लोगों का उदाहरण दूँगा , मुम्बई से घोषित रूप से अपनी संपत्ति ₹750 करोड़ वाले हों या आसाम के हजारों करोड़ का व्यापार और से कम ₹20 हजार करोड़ की संपत्ती वाले एक नेता हों या हैदराबाद से घोषित रूप से ₹10 हजार करोड़ वाले एक नेता , यह लोग मुस्लिम रहनुमाई का दम भरते हैं पर हकीक़त यह है कि देश में 31 बेगुनाह मुसलामानों के मारे जाने के बावजूद इनकी जेब से उनकी मदद के लिए चवन्नी नहीं निकलती , यदि यह चाहें तो सबके परिवार की ₹5-5 लाख की मदद कर दें तो यह इनके द्वारा निकाले गये ज़कात का एक मामुली हिस्सा होता। पर नहीं , बात केवल मुस्लिम रहनुमाई का दंभ भरने वालों की ही नहीं , आप भी अपने नेताओं के इस संवेदनहीनता पर नज़र रखिए , आपको भी सब एक जैसे मिलेंगे।
      खुदा ना करे कल आप और आपके परिवार पर भी ऐसी ही त्रासदी आ गयी तो आप बेबस , ऐसी त्रासदी की भेट इन अपने भगवान जैसे नेताओं की दो शब्द की संवेदना का इंतज़ार करते हुए चढ़ जाएँगे।
      लोकतंत्र में जब नेताओं से सवाल करने की जगह उनकी भक्ति होने लगती है तो लोकतंत्र चरमराने लगता है , सोचिएगा कि आप किस संवेदनहीन नेताओं की भक्ति करते हैं और देश और लोकतंत्र का नुकसान करते हैं।
      सोचिएगा
      आइए मिल जुल कर हाथ बढ़ाएँ बिहार के सीमांचल के लोगों तक कुछ अन्न पहुँचाएँ , इन संवेदनहीन नेताओं के भरोसे बैठे रहना उचित नहीं।
      यह किशनगंज के एक बड़े और ज़िम्मेदार मदरसे का बैंक एकाउंट नंबर है , आपसे जो भी बन सके ₹100 से अधिकतम जो भी संभव हो पैसे ट्रांसफर करने की मेहरबानी करें , अपने ज़कात के पैसों का भी आप यहाँ ट्रांसफर कर सकते हैं।
      Account Number – 3374898303
      Central Bank of India
      Jamia Ashraful Uloom
      Current Account
      Branch – Bahadurganj
      Distt – Kishanganj
      Ifsc code
      CBIN 0281054
      लोकल ज़िम्मेदार लोगों का फोन नंबर
      Akramul Haque Baghi
      9431885314
      Tabrez hashmi
      9771510786 Mohd Zahid
      Muzataba anwar rahi
      9471834140

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  5. सिकंदर हयात

    हम मनहूस सुन्नीदेवबंदी लिबरलों को तो गली का कुत्ता ना पूछे और हम भी खेर मनाते हे की ना ही पूछे , पूछेगा तो काटने के लिए ही पूछेगा और इधर बरेलवीलिबरल एक बहुत बड़े मिडिया ग्रुप की एक साइट के ” दामाद ” बन चुके हे . उधर मुस्लिम जागरण को ” समर्पित ” एक लड़का , अरबपति धार्मिक राजनितिक मुस्लिम रहनुमा का दाए बाए , रियल लाइफ का तो पता नहीं अब कम से कम सोशल मिडिया पर मुस्लिम ह्रदय सम्राट बन चुका हे मुजफरनगर दंगो से जैसे अफवाह हे की जैसे मोदी ने वोट कमाए तो भले लोगो ने नोट खूब कमाए ————– ? ( कंफर्म नहीं -सुनने में आ रहा हे ) अब इधर देखिये की घोर राइटिस्ट और कुछ कुछ विक्षिप्त सा आदमी आजतक वर्कर ——– झा तो साहब हमें तो लाखो लाइने लिखने पर भी कुत्ता ना पूछे और इधर देखिये दो चार राइटिस्ट पोस्ट का ही जलवा की आई आई टी यन और हाई प्रोफ़ाइल और हिन्दू जागरण को समर्पित इनके दरसन को बेचैन हे लिखते हे ”———- Jha with Bharat Sharma.29 mins · भरत भाई का आभारमेरी मित्रता सूची में एक हैं भरत शर्मा जी । कल अचानक उनका संदेश आया, क्या हम साथ चाय पी सकते हैं? मैंने उनका स्वागत किया । वे सवा बजे दोपहर को अपने दिये समय के मुताबिक हाजिर हो गए । इस मुलाकात से पहले हम कभी नहीं मिले थे । फेसबुक पर उन्होंने एकाधिक बार मेरी पोस्ट शेयर की है । इससे ज्यादा का परिचय मेरा उनसे नहीं था । कल पता चला कि भरत शर्मा आईआईटी दिल्ली के ग्रैजुएट हैं और इस समय एक कंपनी के डायरेक्टर । अच्छा खासा काम है उनका । लेकिन उनका बड़प्पन ये नहीं है कि वे एक कामयाब आंत्रेप्रेन्योर हैं बल्कि उनका बड़प्पन देशप्रेम है, उनकी समाजसेवा है, परंपरागत भारतीय जीवनशैली का पुनरावलोकन और पुनर्स्थापन है और जरूरतमंदों की मदद करना है । सबसे ऊपर तो ये है कि वे सकारात्मक अर्थों में हिन्दू जागरण के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हैं । भरत जी बड़ी ही आत्मीयता से मिले। लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं औऱ उन्होंने अपनी वृहत्तरता से मुझे जीत लिया । लोग कितना कुछ कर रहे हैं और हम यहां फेसबुक पर बकवास कर महान ज्ञानी बने बैठे हैं । भरत शर्मा जैसे लोग देश का सौभाग्य हैं ठीक सुमंत दा की ही तरह, जो देश में भ्रमण कर एक नए भारत की खोज कर रहे हैं ।——–झा ———————-” शुजूका to सिकंदर हयात • 13 hours ago
    Idea is good. But my name. What will you write there? I am not going to tell my original name now. Will Shuzuka (imaginary name) work?और बवाल क्यों नहीं होगा ? रवीश जी भी तो सीधी बाते कहते हैं | पर कई लोग उलटी ही लेते हैं | मैं उनकी तरह तलवार कि धार पर चलने को अभी तैयार नहीं हूँ |पर बात करना भी ज़रूरी है | चुप रहना समाधान नहीं है | तो मेरी permission है आपको | You can collaborate all points in Shuzuka’s name.Thanks once again •Reply•Share ›Avata—————————————————————————rसिकंदर हयात to Shuzuka • an hour ago
    चिंता मत कीजिये रविश जी के खिलाफ भी जितना बवाल होता हे उतना ही वो ज़्यादा फेमस होते आये हे होते रहेंगे नॉन राइटिस्टों के बीच रविश लीजेंड से बन गए हे ( डिजर्व भी करते हे ) , गुजरात दंगो के बवाल से ही मोदी पि एम् बने . समझिये आज का समय ही ऐसा हे हर कोई हर किस्म के बवाल प्रचार विवाद से घुमाफिराकर फायदे में ही रहता हे ( वो फायदा लाइक्स से लेकर पी एम् पोस्ट मिलने तक कुछ भी किसी भी रूप में हो सकता हे ) विरोधी होते हे तो सपोटर भी होते हे विरोध से सपोटर्स के बीच बहुत कुछ मिल सकता हे जैसे आप या कोई भी अर्णव को ज़ी न्यूज़ को सौ गालिया दे तो ये खुश ही होंगे दुखी नहीं लोग अब कहते हे मन ही मन , की गालिया दो विरोध करो बस खुदा के वास्ते इग्नोर मत करना जितना अधिक विरोध उतना ही अधिक सपोटरो के बीच में प्रचार और इमेज बनती हे थोड़ा बहुत जाता आता बहुत कुछ नहीं तो कुछ ना कुछ आता ही हे मेने सपादक —– तिवारी का जमकर विरोध किया नतीजा उसके फॉलोवर शयद तीन महीने में तीन गुणा बढ़ गए . एक भाषण को मिले विरोध से एक शहर हैदराबाद के नेता ओवेसीस नेशनल लीडर से हो गए आपने देखा ही होगा की सोशल मिडिया पर किसी को गालिया पड़ती हे तो वो खुश ही होता हे दुखी नहीं लेकिन हां , बस एक ही सोच हे जो इन हालात में मात खाती हे वो हे भारतीय शुद्ध सेकुलर देवबंदी सुन्नी मुस्लिम सोच होना क्योकि इन्हे सिर्फ विरोध मिलता हे सपोर्ट सपोटर फण्ड सिम्पेथी समझ कही नहीं हे इसलिए हमें सोशल मिडिया से परहेज़ करना पड़ता हे और अंडरग्रॉउंड सा रहकर लिखना पड़ता हे कल को कुछ बात हो जाए तो जान की तो परवाह नहीं मगर हॉस्पिटल या कोर्ट के खर्चे सोच कर ही हार्ट बीट राजधानी एक्सप्रेस हो जाती हे आप चिंता ना कीजिए बवाल होगा नहीं , हुआ तो आपको कोई नुक्सान नहीं होगा अगर हुआ तो फायदा ही होगा मेने आपका लेख बनाकर शुजूको नाम से संपादक अफ़ज़ल भाई को मेल किया हे अगर वो पब्लिश करेंगे तो ठीक हे नहीं तो कमेंट बॉक्स में लगा दूंगा मेल मिला तो चिपलूनकर को भी कर दूंगा

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