अरुण माहेश्वरी

2019 मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा

अहमद पटेल की जीत ही लाज़िमी थी। जिस सीट को जीतने के लिये 47 विधायकों की ज़रूरत थी, कांग्रेस के पास 57 विधायक थे। फिर भी, मोदी-शाह बदनाम जोड़ी ने अपनी अनैतिकताओं की पूरी ताकत झोंक कर इसे लाज़िमी-ग़ैर-लाज़िमी के बीच की सीधी टक्कर का रूप दे दिया। पूरी नंगई से विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त में उतर गये। जनता के बीच पूरी ताकत के साथ एक ही बात फैलायी गई कि इसे ही ‘संसदीय जनतंत्र’ कहते हैं।

कांग्रेस ने कैसे अहमद पटेल की इस जीत को सुनिश्चित किया, एनसीपी और जेडीयू के एक-एक विधायक ने उसे कैसे बल दिया, इस पूरी कहानी को सब जानते हैं। मोदी-शाह के गुंडों, पुलिस और वाघेला की तरह के घुटे हुए सत्ता के दलालों की मार से बचने के लिये उनके विधायकों को गुजरात को छोड़ कर बंगलुरू तक जाना पड़ा।

जनतंत्र में अब जनता की भूमिका नहीं

इस सीट को लेकर गुजरात में अमित शाह ने जो किया और इधर सभी राज्यों में दूसरे दलों के जन-प्रतिनिधियों को दबाव में लाकर तोड़ने का जो काम मोदी-शाह गिरोह कर रहा है, उसकी गहराई में जाने पर यही कहा जा सकता है कि वे सचेत रूप से जनता में यह संदेश देना चाहते हैं कि संसदीय जनतंत्र में अब जनता की कोई भूमिका नहीं बची है। जनता किसी भी दल के प्रतिनिधि को क्यों न चुने, सबको अंबानी-अडानी की धन शक्ति और मोदी-शाह की राज-शक्ति का गुलाम बन कर ही रहना होगा!

इस प्रकार वास्तविक अर्थों में वे राज्य में अपनी सर्वशक्तिमत्ता को स्थापित करके, जन-प्रतिनिधियों को ग़ुलामों में बदल कर पूरी संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को जनता की नज़रों में बिल्कुल लुंज-पुंज और निरर्थक बना दे रहे हैं। ढेर सारे जन-प्रतिनिधियों को सीबीआई, आयकर विभाग इत्यादि के दुरुपयोग से नाना मुक़दमों में फंसा कर उनकी संसदीय निरापदता को मज़ाक़ का विषय बना कर छोड़ दे रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ाई का मतलब यही है कि विपक्ष के जन-प्रतिनिधियों की कोई हैसियत नहीं रहनी चाहिए। जन-प्रतिनिधियों की साख को इस प्रकार सुचिंतित ढंग से गिराना पूरी संसदीय प्रणाली की साख को ही गिराने का एक ऐसा सुनियोजित काम है, जिसकी पृष्ठभूमि में मोदी-शाह-संघ की तिकड़ी अपनी हर प्रकार की असंवैधानिक, ग़ैर-कानूनी या माफ़िया वाली हरकतों को बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चला सके।

मोदी को अपराजेय बनाने की कोशिश

अभी जिस प्रकार मोदी जी के रुतबे को बढ़ाने का अभियान चल रहा है, उसी अनुपात में जनता के सभी व्यक्तिगत प्रतिनिधियों के सम्मान को घटाने की भी समानान्तर प्रक्रिया चल रही है। जिस हद तक जन प्रतिनिधि बौने होते जायेंगे, संसद की अवहेलना करने के लिये कुख्यात एक कोरे लफ़्फ़ाज़ प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व अधिक से अधिक विराट दिखाई देने लगेगा। हिटलर के आगमन की प्रतीक्षा में सालों से लाठियाँ भांज रहे आरएसएस के लोग अब उसी हद तक ढोल-मृदंग बजाते उसकी आरती की तैयारियों के लिये उन्मादित दिखाई देने लगे हैं। इनकी मदद के लिये ‘सब चोर हैं, सब चोर हैं’ का शोर मचाने वाले ‘क्रांति वीरों’ की एक गाल बजाऊ फ़ौज भी पहले से लगी हुई है ।

वे 2019 की तैयारी में ऐसे तमाम लोगों को अभी से डराने-धमकाने में लग गये हैं जिनमें स्वाधीनता का लेश मात्र भी बचा हुआ हो ताकि 2019 के तूफ़ान के साथ भारत में संसदीय जनतंत्र के पूरे तंबू को ही उखाड़ कर हवा में उड़ा दिया जाए।

गैरमामूली है गुजरात की जीत

2019 के चुनाव में हर स्तर पर तमाम प्रकार की धांधलियों के जरिये चुनाव को पूरी तरह से लूट लेने का मोदी-शाह कंपनी ने जो सपना देखना शुरू किया है, उत्तर प्रदेश की जीत के बाद बिहार में अपनी सरकार बनाने और भाजपा से बचे हुए बाकी सभी राज्यों में जनतंत्र के अपने यमदूतों को दौड़ाने का जो सिलसिला शुरू किया गया है, उसमें गुजरात की राज्य सभा की इस एक सीट को जीतने की कोशिश काफी तात्पर्यपूर्ण थी। वे कांग्रेस के उम्मीदवार की सौ फ़ीसदी निश्चित जीत को हार में बदल कर आम लोगों के बीच मोदी-शाह की अपराजेयता का एक ऐसा हौवा खड़ा करना चाहते थे ताकि आगे की उनकी और भी बड़ी-बड़ी जनतंत्र-विरोधी साज़िशों के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई आवाज उठाने की कल्पना भी न कर सके और जनता भी इन षड़यंत्रकारियों को ही अपनी अंतिम नियति मान कर पूरी तरह से निस्तेज हो जाए ।

गुजरात में कांग्रेस दल की सक्रियता और अंतिम समय तक चुनाव आयोग के सामने भी उनकी दृढ़ता ने अमित शाह के इन मंसूबों पर काफी हद तक पानी फेरने का काम किया है। इसमें एनसीपी के एक सदस्य और जेडीयू के एक सदस्य ने भी उनका साथ दिया है। यह प्रतिरोध के एक नये संघर्ष के प्रारंभ का बिंदु साबित हो सकता है। जेडीयू के शरद यादव ने मोदी के दिये गये लालच को ठुकरा कर बिहार की सरज़मीन पर ही कौड़ियों के मोल बिकने वाले नीतीश कुमार को चुनौती देने का बीड़ा उठाया है।

विधानसभा चुनावों में दिखेगा इसका असर

इधर दूसरे ग़ैर-भाजपाई प्रमुख दलों ने भी भाजपा के खिलाफ संयुक्त अभियान में कांग्रेस के नेतृत्व में एक नये अभियान के साथ अपने को जोड़ने की प्रतिबद्धता का ऐलान किया है। गुजरात की इस पराजय का चंद महीनों बाद ही इस राज्य में होने वाले विधान सभा के चुनावों पर निश्चित तौर पर गहरा असर पड़ेगा। वहाँ वैसे ही जनता के बीच से भाजपा की ज़मीन खिसकने के सारे संकेत मिल रहे हैं । वे इसी जनता की चेतना को कमज़ोर करके और मोदी के चमत्कार को बढ़ा-चढ़ा कर बता कर जीतने के फेर में हैं । कांग्रेस के 43 विधायकों ने अपनी दृढ़ता का परिचय देकर इनके जहाज़ में इतना बड़ा सुराख़ पैदा कर दिया है कि आने वाले गुजरात चुनाव को पार करना भी इनके लिये कठिन होगा ।

कहना न होगा, यहीं से भाजपा के जहाज़ के डूबने का जो सिलसिला शुरू होगा, 2019 का आम चुनाव निश्चित तौर पर मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा। आज के टेलिग्राफ़ में अहमद पटेल की जीत की खबर की बहुत सही सुर्खी लगाई है – ‘अमित शाह आया, देखा और फुस्स हो गया’ (Amit Shah came, saw & flopped)।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ साहित्यकार, स्तंभकार और लेखक हैं। आजकल कोलकाता में रहते हैं।)
www.janchowk.com

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10 thoughts on “2019 मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा

  1. qutubuddin ansari

    में इस लेख से सहमत नहीं हु , क्योके नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गरुआप २०२४ तक अपराजय है उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता

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  2. सिकंदर हयात

    ” Prakash Singh
    8 hrs ·
    नोटबंदी के बाद जितने मज़दूर मेट्रो शहरों से वापस आ चुके हैं उनका परिवार क़र्ज़ से डूबा है. महँगाई से जूझने की ताक़त नहीं है और दवाई तक ख़रीदने का पैसा नहीं है. मेरे सामने बुखार, दर्द और सर्दी की दवा की क़ीमत महज़ 12 रुपये भी देने में असमर्थ होने की वजह से उधार के लिए गिड़गिड़ा रहा है. अचानक मैं बोल पड़ा भाई तु त सूरत कमात रहल हव न.. बोल पड़ा ,’ सेठ कहलें काम नहीं है त वापस चली अइनी.’ क़रीब दो घंटे बाद मैं अपने घर पहुँचा तो देखा वह मेरे पिता जी को जीएसटी, नोटबंदी, के फ़ायदे बता रहा था. पाकिस्तान को बर्बाद और अमेरिका से भारत को आगे करने लिए 2019 में मोदी जी को जीताना ज़रूरी है. मैंने पूछा जीएसटी की इतनी जानकारी कहाँ से मिली. बोला: मोबाइल में भतिजवा के सब जानकारी आ जाला… उसका भतिजा 8वीं में पढ़ता था अब पढ़ाई छूट गई है वह मद्रास पेंट पॉलिश करने जाने वाला है. इधर कांग्रेसी अभी एसी में आराम फ़रमा रहे हैं. ( गाँव से ग्राउंड रिपोर्ट Prakash सिंह ” ——————- कुछ दिनों में मेरी भी हालात भी ऐसी ही हो सकती हे मेरे भी काफी पैसे उस आदमी के पास अटक चुके हे जो मोदी की नीतियों के कारण अपना रोज़गार खो बैठा हे मेरा ——- रुपया उस पर उधार था वापसी के कोई आसार नहीं लग रहे हे

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  3. सिकंदर हयात

    Rakesh Kayasth
    1 hr ·
    ऐसा हो नहीं सकता कि हमारे संवेदनशील प्रधानमंत्री गोरखपुर के बच्चो के लिए ना रोयें। उचित समय की प्रतीक्षा कीजिये। मेरे हिसाब से उपयुक्त दिन 15 अगस्त और स्थान लालकिले की प्राचीर होगा।Rakesh Kayasth
    8 hrs · ईमानदारी से कहूं तो मुझे हामिद अंसारी के भाषण से निराशा हुई थी। एक निवर्तमान उपराष्ट्रपति ने जाते वक्त जो कुछ कहा उससे एक सांवैधानिक पद बेवजह विवादों के घेरे में आया। यह दौर वैसे भी संस्थानों के अवमूल्यन का है, ऐसे में एक नये विवाद से हासिल कुछ भी नहीं हुआ।लेकिन क्या किसी ने हामिद अंसारी की विदाई पर दिये गये प्रधानमंत्री के भाषण पर गौर किया? कटाक्ष भरी भाषा में दिये गये भाषण से कौन सी मर्यादा बढ़ गई? लेकिन खैर वे मोदी जी हैं, उनके कुछ कहने पर सवाल उठाना पाप है।अब सवाल इस बात का भी है कि हामिद अंसारी ने गलत क्या कहा? अगर हामिद अंसारी मुसलमान होने की जगह दलित होते और ये कहते कि इस देश में दलितों को डर लगता है, तो क्या प्रतिक्रियाएं तब भी वैसी ही होतीं? तब तो मोदीजी का भी गला भर आता और मीडिया कहता कि जाते-जाते उपराष्ट्रपति महोदय देशवासियों के आईना दिखा गये। दलितों के साथ बीजेपी का राजनीतिक गठजोड़ संभव है। गठजोड़ मजबूत किया जा रहा है। मुसलमानों के साथ ऐसा होना संभव नहीं है। अंसारी के बयान के देश विरोधी की सबसे बड़ी सच्चाई यही है। नैतिकता भी आजकल मोबाइल रिंगटोन की तरह कस्टमाइज्ड हो गई है। जो अच्छा लगे वह नैतिक और जो पसंद ना आये वह अनैतिक।Rakesh Kayasth
    Yesterday at 06:01 · ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब मैंने तय किया हो कि मैं राजनीतिक लेखन से यथासंभव दूर रहूंगा। राजनीति पर कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं। लेकिन जिंदगी में इससे बेहतर कई और काम हैं। थका देनेवाली पेशेवर जिंदगी से जो वक्त बचे उसमें पार्क में बच्चो के साथ क्रिकेट खेलना, छज्जे पर लाइन लगाकर बैठे कौव्वे और कबूतरों को दाना खिलाना, गेट के बाहर जुगाली करती अलसाई गाय को यूं ही निहारते रहना और कुछ नहीं तो पुरानी फिल्में देखना या बुक शेल्फ में रखी वे किताबें पढ़ना जो बरसो नहीं पढ़ी।
    सड़ांध भरी बजबजाती राजनीति पर अगर कुछ लिख भी दिया और दस लोग ने तालियां बजा दीं और पांच लोगो ने गालियां दे दीं, तो उससे आखिर हासिल क्या होना है? लोकतंत्र का मतलब चुनाव है। पांच साल में एक बार जाकर वोट दे आइये। पसंद की सरकार बन गई तो अच्छा अगर नहीं बनी तो बहुमत का सम्मान कीजिये। बस इतनी सी ही तो बात है।
    लेकिन अफसोस बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। देश में इस वक्त ऐसी स्थिति नहीं है, जहां सरकारें खामोशी से अपनी काम करती हैं और जनता चुपचाप अपना काम। सरकार और उससे जुड़े राजनीतिक संगठन जो कुछ कर रहे हैं, उसका सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगियों पर पड़ रहा है। पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले मेरे बेटे को अगर टीचर ये बताये कि भगत सिंह को वेलेंटाइंस डे के दिन फांसी हुई थी और पूछने पर पता चले कि उनकी सूचना आधार व्हाट्स एप है, तो यह मेरे लिए खतरे की घंटी है।
    अगर बच्चो के इतिहास की किताब से यह तथ्य हटा दिया जाये कि ताजमहल और लालकिला किसने बनवाया था, या फिर यह बताया जाये कि हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप ने अकबर को हराया था, तो यह एक बहुत डराने वाली बात है। झूठ की खुराक पर पलने वाली पीढ़ियां आगे चलकर बीमार होती है। मैं अपने बच्चो के लिए चिंतित हूं।
    मैं चिंतित इसलिए हूं क्योंकि देश में सरकार या रूलिंग पार्टी से अलग राय रखने वालों के खिलाफ संगठित हिंसा चल रही है। यह हिंसा जितनी शाब्दिक हैं, उतनी ही शारीरिक भी। समाज का एक बड़ा तबका इस हिंसा पर इतरा रहा है, खुश होकर तालियां बजा रहा है। कल को अगर किसी राजनीतिक विरोधी की हत्या भी हो जाये तो देश एक तबका यही कहेगा कि हीरो बनने गया था, इसलिए मारा गया। आखिर कहां जा रहा है, हमारा समाज?
    कीचड़ दायें-बायें हो तो आदमी बचकर निकल ले। लेकिन बिना दलदल में उतरे सफर संभव ही नहीं तो फिर विकल्प क्या है? .. और कुछ नहीं तो इतना तो कर ही सकता हूं कि ये बताने की कोशिश करूं कि एक नागरिक होने के नाते मैं अपने लिए कैसा समाज और देश चाहता हूं। मेरा ख्याल है, ऐसा कहना अभी देशद्रोह के दायरे में नहीं आया है।Rakesh कायस्थ——————————-

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  4. सिकंदर हयात

    शिखा अपराजिता13 hrs · -शिक्षक बेरोजगार क्यों जब शिक्षकों का भयंकर अभाव है ? सबको अच्छी शिक्षा का बीड़ा उठाया जाए तो सभी शिक्षकों को रोजगार देने के बाद भी शिक्षक कम पड़ जाएंगे l
    -डॉक्टरों की सरकारी बहाली बंद क्यों , सरकारी अस्पतालों की संख्या जनसँख्या की ज़रूरत के अनुपात में बेहद कम क्यों , जब प्रति 1000 जनसँख्या पर डॉक्टरों की संख्या मात्र 0.5 है और दुनिया के निचले पायदानों में भारत की गिनती होती है ?
    -निर्माण क्षेत्र , इंफ्रास्ट्रक्चर , भारी उद्योग हर जगह रोजगार का त्राहिमाम क्यों है ? क्या निवास , स्कूल , अस्पताल आदि हर नागरिक को मुहैया हो चुका है जो नए रोजगार की ज़रूरत नहीं बची ? इसके उलट जनता की ज़रूरत के निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर का उत्पादन और विकास हो तो इतने रोजगार की संभावना है कि ज़रूरत पूरी करने को वर्कर कम पड़ जाएंगे l
    -रेलवे में नौकरियाँ कैसे ख़त्म हो रही हैं , क्या जनसँख्या की अनुपात में देश में पर्याप्त ट्रेनें चल रहीं हैं ? उलटे सच्चाई तो ये है कि जनरल डिब्बों में जानवरों की तरह ठूंस ठूंसकर इंसान यात्रा करने को मजबूर है l यदि रेलवे का विकास जनसँख्या की ज़रूरत के हिसाब से हो तो दिन दोगुने रात चौगुने रोजगार पैदा करने पर भी श्रम की कमी पड़ जाए l फिर रेलवे में छंटनी , बेरोजगारी, रिक्त नौकरियाँ कैसे हैं ?शिखा अपराजिता
    -किसान आत्महत्या को मजबूर क्यों , अनाज लाखों टन सड़ जाता क्यों जब एक तरफ रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा दूसरी तरफ आपूर्ति नहीं हो रही ?
    -नए उद्योग लगने बंद क्यों , क्या जनता की सारी ज़रूरतें पूरी हो गई या संसाधन की कमी है या लेबर की या टेक्नोलॉजी की ?
    पूंजीपति कहेंगे , पैसा नहीं है , तो कहाँ से रोजगार पैदा करें, कहाँ से नए उद्योग लगाएं ? सरकार कहेगी पैसा नहीं है, कोष खाली हैं, कहाँ से नई सरकारी नौकरियाँ पैदा करें , कहाँ से सबको स्कूल , अस्पताल दें ? ये पैसा क्या होता है और इसकी कमी कैसे होती है ? क्या किसीने अपने स्कूल , अस्पताल , घर की दीवारों के निर्माण में ईंट पत्थर सीमेंट की जगह धातु के सिक्के और कागज़ के नोट इस्तेमाल होते देखा है ? क्या ट्रेन , बस के इंजन को चलाने में तेल, बिजली, गैस की जगह एटीएम कार्ड , चेक या करेंसी नोट का इस्तेमाल होते देखा है ? ये पैसा बनता कैसे है ? ये पैसा बनता है श्रम से और श्रम से पैदा हुई वस्तु के विनिमय मूल्य (exchange value) से l जब उत्पादन मुनाफे के लिए होता है तो मुनाफे की हवस में आम जनता की मजदूरी कम से कमतर होती जाति है , और अंततोगत्वा उसकी क्रय शक्ति भी कम हो जाती है l ऐसी अवस्था जिसमें मुनाफे को बनाए रखने के लिए मजदूरी को और कम करना पड़ता है , छंटनी करनी पड़ती है, बेरोजगारी बढ़ानी पड़ती है जिससे श्रम का सौदा सस्ते से सस्ते दर में हो सके l मुनाफे पर टिकी व्यवस्था जिसे पूंजीवाद कहते हैं , कभी बेरोजगारी ख़त्म नहीं कर सकती , न करना चाहेगी क्योंकि जितनी बेरोजगारी , श्रम की मंडी में मजदूर की उतनी कम bargaining power l साथ ही उत्पादन पर भी इसी मुनाफे का ग्रहण होता है , किसी सामान की जनता के बीच कितनी ही ज्यादा ज़रूरत क्यों न हो , यदि वह मुनाफे की शर्त को पूरा नहीं करती तो उसका उत्पादन कम होता है , या ज्यादा होने पर भी गोदामों में पड़ा सड़ता रहता है l
    पर जब उत्पादन मुनाफे के बजाए , समाज की ज़रूरत के आधार पर हो तो ज़रूरत होगी सिर्फ संसाधनों की , श्रम की और टेक्नोलॉजी की l
    आज भारत में जनता की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य , आवास , दवाएं , सूचना , यातायात , सड़क , संचार इन सबकी आपूर्ति के लिए न तो संसाधनों की कमी है , न श्रम की और न टेक्नोलॉजी की, ये बात हर कोई जानता है l
    फिर ये जो “पैसे की कमी” जिसका हवाला हमारी बदहाली , मंदी और विनाश के लिए दिया जाता है , वह और कुछ नहीं पूंजीवाद का अंतर्विरोध है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है l
    याद रहे 1929 से 1939 के बीच इसी मंदी के दौर ने दुनिया के सभी ताकतवर साम्राज्यवादी देशों अमेरिका , ब्रिटेन , फ्रांस , जर्मनी , जापान , इटली , सबकी आर्थिक वृद्धि दर को ज़मींदोज़ कर रखा था तब अपनी किशोरावस्था में समाजवादी सोवियत संघ की आसमान छूती आर्थिक वृद्धि दर को दुनिया भौंचक्की होकर देख रही थी l वह दशक जिसने मानव इतिहास की सबसे तेज़ी से होती प्रगति और सम्पन्नता का नज़ारा देखा l
    आज फासिस्ट मोदी सरकार की हर एक फ्रंट पर नाकामयाबी पर उसे कोसने से आगे की सोचें और अपनी राजनैतिक पक्षधरता तय करें तो यह ज़रूर ध्यान रहे कि क्या अन्य कथित सेक्युलर लिबरल दल इस मुनाफे की व्यवस्था से भिन्न मॉडल प्रस्तुत करते हैं ? यदि नहीं तो क्या आज मोदी सरकार के दौर में आई बदहाली से छुटकारा मिलेगा ? यदि नहीं तो जनता धर्म गाय गोबर के अफीम में क्यों न मस्त रहे ?
    अंततः विकल्प तो सिर्फ एक है , मजदूरों का राज यानी समाजवाद l आप लाल झंडे को पेट भरके गरिया लीजिए , दुनिया की हर एक समस्या का ज़िम्मेदार ठहरा दीजिए , “टॉयलेट एक प्रेमकथा” के फ्लॉप होने से लेकर ग्लोबल वार्मिंग तक के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दीजिए , अन्धकार में जितनी लाठी भंज लीजिए , जब अन्धकार से बाहर निकलने के सवालों पर चिंतन होगा तो रास्ता सिर्फ कम्युनिस्टों के पास मिलेगा, आपको पसंद हो या न हो l—————-हॉलीवुड व अन्य व्यवसायिक science fiction फिल्मों पर कुछ तैरते विचार
    हॉलीवुड की फंतासियों के क्या कहने ।
    कभी Interstellar में भविष्य मानव को संसाधनों के खत्म होने पर मध्ययुगीन खेतिहर सभ्यता में पहुंचाकर पृथ्वी से बाहर जीवन खोजने भेज देती हैं । कभी Day the earth stood still में मानव प्रवृत्ति को स्वाभाविक ही लालची और “आत्म-विनाशक” बनाकर बाहर से एलियनों द्वारा हमला करके पृथ्वी को “बदमाश” मानवों से बचाने का पवित्र कार्यभार सौंप देती है । कभी Planet of the apes में बंदरों को इंसान का बौद्धिक प्रतिस्पर्धी बनाकर “लालची धूर्त” मानव जाति को खुद अपनी फंतासियों में बन्दरों के हाथों सबक सिखा देती हैं । कभी Another earth में पृथ्वी का प्रतिबिंब तैयार कर देती है । कभी Last Man on Earth में पूरी मानव जाति को किसी वायरस से मारकर अंतिम पुरुष और अंतिम महिला द्वारा फिर से मानव सभ्यता शून्य से शुरू करने की फंतासियों की उड़ान अपनी कल्पनाओं में तय कर लेती है ।
    लेकिन जो मानव सभ्यता का यथार्थवादी भविष्य है , यानी पूंजीवाद का अंत, वर्ग विभाजित समाज का अंत, ये कभी इनकी फंतासियों, कल्पनाओं में नहीं आता । वह वर्ग विभाजित व्यवस्था जो युद्ध, पर्यावरण, बीमारी, संसाधनों का अंत, आदि हर उस समस्या की जननी है जिससे मानव सभ्यता को ऊपर वर्णित फिल्मों में प्राणघातक खतरा है, उस वर्ग व्यवस्था का अंत और एक वर्गविहीन आधुनिक कम्युनिस्ट समाज की स्थापना जो सभ्यता और विकास की उच्चतम व्यवस्था होगी, ऐसी कल्पना को फंतासियों में भी दिखाना इनके लिए सम्भव नहीं ।
    भालू, बन्दर, एलियन से मानव समाज का अंत इनकी कल्पनाओं में आता है लेकिन पूंजीवाद- साम्राज्यवाद- फासीवाद कीे गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध, पर्यावरण की तबाही, संसाधनों के मुनाफाखोर दोहन आदि की वजह से संभावित मानवता के अंत की कल्पना इनके दिमाग में उड़ान ही नहीं भरती ।
    इन समस्याओं का समाधान दूसरे ग्रह पर जीवन ढूंढने से लेकर इंसानियत के दुश्मन बने भालू बंदरों के साथ या एलियन्स के साथ शांति करार करने जैसी तमाम ऊल जुलूल फंतासियां इनके भेजे में आती हैं, लेकिन मानव सामूहिकता की शक्ति पर इनकी फंतासियों को इतना भी भरोसा नहीं जो 3 लाख साल पुरानी मानवता को महज 5-7 हज़ार साल पुराने वर्ग समाज से मुक्त सामूहिकता की बुनियाद पर बनी आधुनिक कम्युनिस्ट सभ्यता के रूप में देख सके ।शिखा अपराजिता
    विज्ञान को लेकर इनकी फंतासियों की उड़ान इस यथार्थ की कल्पना नहीं कर पाती कि जब विज्ञान पूंजी और मुनाफे की बेड़ियों से मुक्त होगा तो आज की तुलना में कितनी तेज़ी से , बिना पर्यावरण, संसाधनों और जीवन को लील किए उड़ान भरेगा । शिखा अपराजिता
    इतिहास ने साबित किया है कि समाजवाद के रास्ते सोवियत संघ ने दुनिया के एक बेहद पिछड़े समाज से शुरू करते हुए दुनिया के सबसे विकसित पूंजीवादी देशों की 200 वर्षों की विकास यात्रा को महज़ तीस वर्षों में पूरा किया था व विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तिशक्ति बन गया था, वो भी गृहयुद्ध, विश्वयुद्ध, आदि में हुए अनंत विध्वंसों का निरन्तर सामना करते हुए, बिना किसी अन्य मुल्क को उपनिवेशी ग़ुलाम बनाए । यह एक यथार्थ है कि समाजवाद के रास्ते एक वर्गविहीन कम्युनिस्ट समाज की स्थापना विज्ञान और इंसानी वैभव व सम्पन्नता को रिकॉर्ड तेज़ी के साथ अनगिनत ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी और यह कोई कल्पना नहीं, संकटग्रस्त पूंजीवाद के आगे का स्वाभाविक वैज्ञानिक गंतव्य है । लेकिन हॉलीवुड व पूंजीवाद की फिल्मी फंतासियों में इनकी कल्पना भी करना हराम है, क्योंकि ऐसा करने से इनके आकाओं का सिंहासन डोल जाएगा ।शिखा अपराजिता

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  5. सिकंदर हयात

    Rakesh Kayasth
    20 hrs ·
    डर के आगे जीत है
    ————–
    सोशल मीडिया पर मासूमियमत, मूर्खता और व्यवस्थित ट्रोलिंग की तीन धाराएं साथ-साथ चलती रहती हैं। इन तीनों का मकसद एक ही होता है। किसी खास मुद्धे पर उठ रहे सवालों को पटरी से उतारना। इतना शोर मचाना कि असली बात सुनाई ना दे। गौरी लंकेश प्रकरण में यही हो रहा है।
    एक तबका है जो फेसबुक और ट्विवटर पर मिठाई बांट रहा है। बेरहमी से मार दी गई एक बुजुर्ग पत्रकार के लिए कुतिया और वेश्या जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है। उन्हे कांग्रेसी एजेंट बता रहा है। इस मुहिम में लगे लोगो की सोशल मीडिया प्रोफाइल चेक कीजिये और साथ ही ये देखिये कि इनके कौन लोग फॉलो करते हैं, तो पूरी कहानी समझ में आ जाएगी।
    दूसरा तबका वह है जो कह रहा है कि उन्हे संघ परिवार नहीं बल्कि बेईमान कांग्रेसी नेताओं से खतरा था। पूरी जांच रिपोर्ट आ जाने दीजिये। नतीजे तक पहुंचने की क्या क्या जल्दी है? ऐसे लोगो के वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या ये ज्ञान उन्होने घर से लेकर सड़क तक बेगुनाहों की जान ले रहे गौभक्तों को भी दिया है? क्या उन्होने कभी यह पूछा है कि जब इतना बड़ा सरकारी तंत्र मौजूद है तो कथित गौरक्षा के लिए पूरे देश में गुंडों की पैरलल आर्मी क्यों और किस मकसद से खड़ी की जा रही है?
    जांच पूरी ना होने तक चुप रहने की शिक्षा देनेवालों से यह भी पूछिये कि उनके प्रिय नेता की सरकार ने गोधरा कांड के छह घंटे के भीतर किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि इसके पीछे कौन है? अगर निष्कर्ष मालूम था तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जानबूझकर गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में कारसेवकों की लाश घुमाकर दंगे क्यों करवाये गये और शुरुआती तीन दिनों तक दंगाइयों को खुली छूट क्यों दी गई?
    जो लोग यह ज्ञान दे रहे हैं कि यह राज्य सरकार का मामला है, उनसे पूछिये कि राजस्थान में किसकी सरकार है, जहां रोजाना गौरक्षा के नाम पर लोगो को पीटा जा रहा है, उनकी हत्या की जा रही है? राज्य सरकार का तकनीकी नुक्ता समझाने वालों से यह भी पूछिये कि जब बाबरी ढांचा तोड़ा गया था, तब उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार थी और सुप्रीम कोर्ट में कानून व्यवस्था बहाल करने का हलफनामा देने के बाद उसने क्या किया था? क्यों कल्याण सिंह ने दो दिन बाद खुलेआम कहा था कि उन्होने जानबूझकर सुरक्षा बलों से कहा था कि उपद्रवी भीड़ के खिलाफ कार्रवाई ना की जाये? कानून, संविधान और नैतिकता को ठेंगा दिखाना जिनका इतिहास रहा है, वे आपसे विमर्श के लायक नहीं है। इनका एकमात्र मकसद आपकी आवाज़ को दबाना है।
    एक तीसरा तबका भी है, जो शायद सीधे तौर पर व्यवस्थित हिंसा की विचारधारा से नहीं जुड़ा है। लेकिन जाने-अनजाने में उनके हितों का पोषण कर रहा है। इस तबके ने दार्शनिक भंगिमा अख्तियार कर रखी है। हत्या तो हत्या है। उसे राजनीतिक रंग ना दो। उनके वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या उन्होने संगठित हिंसा भड़काने की कोशिशों में जुटे आधा दर्जन केंद्रीय मंत्रियों और फर्जी फोटोशॉप बांट रहे सैकड़ो बीजेपी नेताओं को भी कभी उन्होने ये ज्ञान दिया है? अगर नहीं तो मान लीजिये ये लोग भी असली सवाल को पटरी से उतारने के खेल में शामिल हैं।
    संघ परिवार को कटघरे में खड़ा करना मेरा प्रयोजन नहीं है। जो लोग गांधी की हत्या कर चुके हों, जिनकी हकीकत पूरी दुनिया जानती हो, उनके पीछे वक्त बर्बाद करने से क्या हासिल होगा? मैं केवल तथ्यों की बात कर रहा हूं, जो बहुत स्पष्ट है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में उग्र हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं, जो अपने वैचारिक विरोधियों का चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। कलबुर्गी, पानसारे और दाभोलकर की हत्या में जो पैटर्न है, वही पैटर्न गौरी लंकेश के मामले में भी दिखाई दे रहा है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए किसी अनुसंधान की ज़रूरत नहीं है। गौरी लंकेश का लिखा पढ़ लीजिये। उन धमकियों के बारे में पता कर लीजिये जो उन्होने मिल रहे थे। उस मुकदमे पर गौर कीजिये जो सत्तारूढ़ पार्टी के ताकतवर नेता और उनके बीच चल रहा था। आखिर कौन लोग जो गौरी लंकेश के काम से नाराज़ थे और उन्हे धमकियां दे रहे थे?
    आखिरी बात! अगर इस मामले में कोई और कहानी सामने आती है और वजह वह नहीं होती जिसका अनुमान है, तो मुझे इस बात की खुशी होगी। मैं खुद कर्मकांडी हिंदू परिवार में पैदा हुआ हूं। जब मैं किशोर था और हिंदू आतंकवाद शब्द सुनता था तो मेरे तन बदन में आग लग जाती थी। अब सुनता हूं तो मेरा माथा शर्म से झुक जाता है, क्योंकि मुझे पता है कि यह कोई मिथ नहीं बल्कि हकीकत है।
    मैं उस मां का बेटा हूं, जिसे हिंदू परंपराओं का किसी भी आम कर्मकांडी ब्राह्रण के मुकाबले कई गुना ज्यादा ज्ञान है। एक विराट और उदात्त दर्शन का राजनीतिक फायदे के लिए जिस तरह अवमूल्यन किया जा रहा है, उससे मैं हतप्रभ हूं। मुझे मेरे धर्म ने सिखाया है कि सत्य साथ खड़े रहो और डरो मत। इसलिए मैने तय किया है कि डरूंगा नहीं। जहां बोलने की ज़रूरत होगी खुलकर बोलूंगा।
    तथाकथित धर्म रक्षा के नाम पर मरने-मारने पर उतारू भीड़ को मैं गायत्री मंत्र का सार याद दिलाना चाहता हूं, शायद कुछ सकारात्मक असर हो–
    उस प्राण स्वरूप देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें और वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।Rakesh Kayasth
    7 hrs ·
    किसी ट्रोल की वही मानसिकता होती है, जो कंप्यूटर गेम या प्ले स्टेशन से खेलने वाले 5 साल के बच्चे की होती है। गेम खेलता बच्चा अपने कल्पना लोक में जीता है। वह सोचता है कि उसमें इतनी ताकत समा गई है कि WWE के सूरमाओं को चुटकियों में ढेर कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि बच्चे में मासूमियत होती है और ट्रोल के दिमाग़ में बेइंतहा ज़हर भरा होता है।
    जब सोशल मीडिया नहीं था, ट्रोल तब भी थे। वे अख़बार के संपादकों के नाम सैकड़ो और हज़ारों की तादाद में चिट्ठियां भेजते थे। उनकी बकवास दीवारों से टकराकर वापस लौट आती थी। वे चोरी-छिपे दीवारों पर गंदे पोस्टर लगाते थे और पकड़े जाने सरेआम जूते खाते थे। चौराहे और पान की दुकानों पर खड़े होकर वे अपनी फेंकते थे और हर कोई उनकी बात अनसुनी करके आगे बढ़ जाता था। वे इसी तरह जीते थे, कुंठित होते थे और एक दिन गुमनामी में मर जाते थे। Rakesh Kayasth
    तब उनकी बात सुनने को कोई तैयार नहीं होता था। अब सोशल मीडिया है, इसलिए सुनने वाले हैं और फॉलो करने के लिए तो बकायदा देश के प्रधानमंत्री उपलब्ध हैं। ट्रोलिंग एक करियर ऑप्शन है। एक स्किल है, जिसमें दक्षता हासिल करके आप किसी राजनीतिक पार्टी में अपनी पैठ बना सकते हैं और एक दिन प्रवक्ता तक बन सकते हैं।
    किसी भी ट्रोल की योग्यता का एकमात्र पैमाना उसकी बदत्तमीजी करने की क्षमता है। वह एक तरह सुपारी किलर होता है। किसी भी तथ्यपरक और गंभीर विमर्श का हत्यारा। बड़ी और नामी-गिरामी शख्सियतों को वह इस तरह अपमानित करता है और डराता है कि उनकी हिम्मत टूट जाये। ट्रोल का इस्तेमाल कुछ इस तरह किया जाता है, जैसे शतरंज का कोई शातिर खिलाड़ी प्यादे का इस्तेमाल करके घोड़ा या वज़ीर फांस ले।
    यह एक नये किस्म की मनोवैज्ञानिक लड़ाई है, जिसमें बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी फंस रहे हैं। गौरी लंकेश का मामला ताजा उदाहरण है। जिस आदमी ने गौरी की मौत की बाद उनके बारे में बेहूदगी की हदें पार करती टिप्पणियां कीं, अनजाने में लोगो ने उसे भरपूर पब्लिसिटी दे दी। उसका जो भी नाम हो लेकिन वह अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहा और जो लोग इस्तेमाल हुए उन्हे पता भी नहीं चला कि वे किस तरह इस्तेमाल किये जा चुके हैं।
    दिमाग़ी रूप से बीमार लोगो का सबसे अच्छा इलाज उन्हे नज़रअंदाज़ करना है। मैं लगातार कहता आया हूं कि जिनमें भाषा की न्यूनतम मर्यादा नहीं है, जो हिंसा का समर्थन करते और अफवाहें फैलाते हैं, उन्हे तत्काल ब्लॉक कीजिये। वे आपसे जुड़कर वैधता हासिल करते हैं। उनके रास्ते बंद कर देने से ज्यादा प्रभावशाली कोई और तरीका नहीं है। यह ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने जैसा है। वे बिलबिलाकर अपनी मौत मर जाएंगे।Rakesh Kayasth

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  6. सिकंदर हयात

    Deepak SharmaDeepak Sharma
    Yesterday at 21:11 · New Delhi ·
    रवीश अच्छे पत्रकार हैं. सामाजिक सरोकार वाले. राजदीप भी बड़े पत्रकार हैं. विदेश में पढ़े लिखे ..देश के एक विख्यात क्रिकेटर के काबिल बेटे हैं.लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की साख को रवीश
    और राजदीप जैसे सैकड़ों बीजेपी विरोधी पत्रकारों, चिंतकों से खतरा नहीं है. ये वे लोग हैं जिनके विरोध के बावजूद, मोदी ने 2014 का प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था.
    प्रधानमंत्री हो या राजा हो, सत्ता को सामने खड़े शत्रु या विरोधी का डर नहीं होता है…क्यूंकि सत्ता, किसी के विरोध से नहीं अपनों के समर्थन से चलती है…. इसलिए सत्ता पर काबिज़ राजा को डर समर्थकों के भीतर उस भीड़ से होता है जो धीरे धीरे उसका साथ छोड़ने लगती है. अंग्रेजी में इस भीड़ के भीतर भीड़ को ‘फ्लोटिंग वोट्स’ कहते हैं. दिल्ली में 3 साल के राज के बाद आज मोदी को असली खतरा समर्थकों के इसी फ्लोटिंग वोट्स से है. ये वो समर्थक हैं जो मोदी की जगाई उम्मीदों पर कभी चिरागों की तरह जले थे पर आज नाउम्मीदी के साये में बुझती लौ जैसे मायूस दिख रहे हैं. और इन मायूस समर्थकों के साथ ही ग्रहों का चक्र भी मोदी से कुछ यूं नाराज़ सा है कि पिछले दो महीनो से हर घटना सरकार के लिए अपयश लेकर आ रही है. वो चाहे गोरखपुर में बच्चों का असमय संसार छोड़ना हो या फिर एक के बाद रेल दुर्घटनाए. या बाबा राम रहीम का भाजपा के सरंक्षण में बेनकाब होना. या फिर बीजेपी और एबीवीपी की ताज़ा चुनावी पराजय. जिधर देखिये, हवा में एक नकारात्मक सी प्रतिक्रिया है.
    खाली बर्तनो की आवाज़ कब तक सुने, थाली में अब खाना चाहिए
    जिन राष्ट्रवादियों ने 16 मई 2014 को मोदी में पृथ्वीराज चौहान की छवि देखि थी या जिन्हे उस दिन मोदी में हेगडेवार का ध्वज दिखा था , आज वे उतने ही निराश है जितने मोदी के अधिकाँश मंत्री और पार्टी के नेता. निराशा का कारण मोदी की निरंकुशता या अभिमान नहीं है बल्कि सरकार का वो स्कोरबोर्ड है जहाँ 50 ओवर में 400 रन बनाने का संकल्प लिया गया था पर 30 ओवर के बाद भी स्कोर 150 का आंकड़ा पार नहीं कर सका है. सरकार का एक भी ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है जो पांच साल में पूरा होते हुए हो दिख रहा हो. मेक इन इंडिया का हाल ये है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कोई 500 करोड़ का भी निवेश करने को तैयार नहीं है. एयरटेल, आईडिया, एयर सेल और वोडाफोन जैसी भारी भरकम कंपनियों में छंटनी हो रही है. जीएसटी ने छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है. नोटबंदी से जो एक लाख करोड़ की आमदनी होनी थी वो 16 हज़ार करोड़ के घाटे में तब्दील हो गयी. नितिन गडकरी के कुछ प्रोजेक्ट छोड़ दे तो इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का बुरा हाल है. डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट उप इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट फाइलों पर ज्यादा ज़मीन पर कम दिख रहे हैं. और ये सारी चुनौतियाँ उस वक़्त मुँह बाये खड़ी हैं जब 20 ओवर भी नहीं बचे हैं.
    ये सच है कि मोदी ने राष्ट्रीयता को नई तरीके से परिभाषित किया है. लेकिन सच ये भी कि राष्ट्र सिर्फ नारों के बल पर कब तक आगे बढ़ेगा. अगर कॉर्पोरेट न्यूज़ चैनल के पेड सर्वे दरकिनार कर दिये जाएँ तो देश का असली मूड अब धीरे धीरे कुछ और ही संकेत देने लगा है. इस मूड को भांपने के लिए हमे किसी सर्वे की नहीं खुद को आंकने की ज़रुरत है. शायद दो- तीन साल के शुरुआती उत्साह के बाद आखिरकार हम और आप अब ये सोचने पर मज़बूर हुए हैं कि ….मेरे घर और आसपास आखिर बदला क्या है? हमने आखिर हासिल क्या किया है ? समाज या देश में वाकई क्या फर्क आया है ? क्या हम वाकई छलांग लगाकर आगे बढ़ गए ….क्यूंकि दीवार पर लिखे गए नारे तो कुछ यूँ ही बयां कर रहे थे ….कि विकास सबका होगा ..आगे सब बढ़ेंगे. लेकिन सच यही है कि आँखों के सामने सिर्फ एक चायवाले की चौंका देने वाली छलांग हमे अब तक नज़र आयी है.
    मोदी जी माओ बनिए
    छलांग माओ जैसी हो
    जिसने पूरे चीन को बदल दियाDeepak SharmaFORMER EDITOR at Aajtak News Channel

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  7. सिकंदर हयात

    Jagadishwar Chaturvedi
    16 hrs ·
    मोदी सरकार की राष्ट्रीय नीति है सामान्य स्थिति मत रहने दो,सामान्य को एब्नार्मल करो,फिर हमले करो, कहो राष्ट्रद्रोह है, वाम-कांग्रेस का खेल है, बाहरी ताकतों का खेल है,बाहरी ताकतों से मिले हैं,इसतरह अराजकता को एक सिस्टम,रूटिन बना दो।रोहित वेमुला की घटना से लेकर कन्हैया कुमार की घटना तक, नोटबंदी से लेकर ई-पेमेंट तक,बीएचयू की घटना से लेकर कश्मीर तक यही पैटर्न है।
    मोदी ने अराजकता को रूटिन बना दिया है।वे किसी भी समस्या का समाधान नहीं करते और न समाधान करने देते हैं,अराजकता में उनको रामराज्य दिखता है।——————————Nitin Thakur
    10 hrs ·
    ये जो पत्रकारों से ताकत पाकर पत्रकारों को संतुलन का पाठ पढ़ा रहे हैं, कल एक पार्टी विशेष के गाने गाते धरे जाएंगे। ये बेचारे फेसबुक पर नकली संतुलन बनाते ही इसलिए हैं ताकि कल जब पार्टी कार्यालय में दिखें तो खुद को जस्टिफाई कर सकें। कह सकें कि अरे सर हम विरोधी कब थे, हम तो गलत को गलत कहते थे और सही को सही। दरअसल कहना वो ये चाह रहे होंगे कि हम तो अपनी पसंद वाली पार्टी की तारीफ भी करते ही थे ना।
    आपको समझना होगा कि ये लोग सत्ता का खुलकर विरोध ही इसलिए नहीं करते क्योंकि कल उन्हें उसका हिस्सा बनने की गुंजाइश भी बनाए रखनी है। नकली संतुलन बनाकर लिखने वाली एक पूरी जमात है, उससे सावधान। ये अंधे होकर भक्त बने लोगों से अधिक घातक हैं।Nitin Thakur
    14 hrs ·
    तस्वीरें फोटोशॉप करना इस देश के लड़कों को बीजेपी के आईटी सेल ने सबसे पहले सिखाया था। किसी पत्रकार को ट्रोल करके उसे सोशल मीडिया से कैसे पलायन कराया जाए वो भी दक्षिणपंथी संगठनों ने बाकायदा सुनियोजित ढंग से किया। आज एक तस्वीर बीएचयू के लाठीचार्ज पर गलत वायरल हो गई तो प्रामाणिकता का ढोल बजाने लगे। तुम्हारा प्रामाणिकता से लेना देना क्या है भई? और वैसे भी खबर का आधार वो तस्वीर नहीं है, खबर अपनी जगह सच है। या फिर अब ये भी साबित करोगे कि लड़कियों ने खुद को ही छेड़ लिया, झूठा पत्र कुलपति को लिखा, कहीं कोई आंदोलन हुआ नहीं, आंदोलन हुआ नहीं तो लाठियां भला क्यों चलेंगी.. और जब लाठी चली नहीं तो फिर किसी के शरीर पर क्यों पड़ेंगी.. हाय प्रामाणिक तस्वीरों के भक्त, फोटोशोप करनेवाले अपने मौसेरे भाइयों से तो पूछ लो कि बीजेपी आईटी सेल में उनकी तनख्वाह कितनी है??Nitin Thakur
    20 hrs ·
    एक पोस्ट के साथ फोटो गलत लग गई। मैंने हटा ली। सूचनाओं के प्रवाह में लाख कोशिश करके भी ऐसा हो जाता है लेकिन गलत फोटो लगने से क्या ये साबित हो गया कि बीएचयू में आंदोलन नहीं हुआ, या ये साबित हो गया कि लाठीचार्ज नहीं हुआ या ये साबित हो गया कि वहां लड़कियां चोटिल नहीं हुईं? इनमें से कुछ भी नहीं लेकिन एक गलत फोटो लग गया तो इस आड़ में तटस्थ दिखने की कोशिश करनेवाले तुरंत अपने नेताओँ को बचाने की कोशिश में जुट गए। फोटो गलत हो सकती है, खबर तो गलत नहीं ही है।—————-Awesh Tiwari
    11 hrs · Varanasi ·
    BHU प्रकरण पर आज की आखिरी और जरूरी बात ‘मीडिया का रोल’। आप में से बहुत कम लोगों ने बनारस के अखबार पढ़े होंगे यह जरूरी है कि आप कम से कम एक बार पिछले तीन दिनों के तीन बड़े अखबारों दैनिक जागरण ,हिंदुस्तान और अमर उजाला के ई पेपर देखें। यह तीनों अखबार लगातार इस कोशिश में रहे कि छात्रों के इस आंदोलन को साजिश करार दिया जाए। दैनिक जागरण ने जो कि पिछले एक हफ्ते से पीएम के बनारस दौरे का लाखों का विज्ञापन पीट उत्सव मना रहा था आंदोलन के पहले दिन की कवरेज को लगभग गोल ही कर दिया| अमर उजाला ने 23 सितंबर को खबर छापी ‘सप्ताह भर से लिखी जा रही थी धरने की पटकथा’ माने लड़की के साथ हुआ यूं उत्पीड़न भी साजिश था। जागरण ने शीर्षक लगाया “कौन कर रहा साजिश?” आज की फ्रंट पेज की लीड खबर में इसी अखबार ने पहली लाइन में लिखा “छात्राओं की अनसुनी’ से यह घटना घटी। हिंदुस्तान का भी हाल लगभग ऐसा ही रहा।हमारा “पत्रिका” बनारस से प्रकाशित नही होता लेकिन हमने इसे सभी संस्करणों में मुख्य पृष्ठ की खबर बनाया और जो देखा वो लिख दिया,केवल इतना ही नही मेरे सभी साथी पिछले तीन दिनों से अपने अखबार के फेसबुक पेज के लिए बेहद सीमित संसाधनों से लाइव कवरेज करते रहे,जिसे अब तक तकरीबन 2 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है । यह कहने में कोई दो राय नही है कि कभी हिंदी पत्रकारिता की राजधानी रहा बनारस आज यहां के अखबारों की धंधेबाजी का शिकार है। वो वक्त बीत गया जब बनारस के अखबार बीएचयू को एक दुनिया और यहां के छात्रों को अपने घर का बच्चा समझते थे,यह समय बेहद कठिन है।—————-Pushya Mitra
    19 hrs ·
    चलिये मान लिया।
    चार NDTV वाले और आठ कम्युनिस्टों ने बनारस में घुस कर आपकी बैंड बजा दी। वे पूरे देश में आपको एक्सपोज कर रहे हैं। और आप लोग करोड़ों की संख्या में हो तब भी मोदी को बचा नहीं पा रहे। इसका मतलब तो यही न है कि आपकी हालत पप्पुओं से भी गयी गुजरी है। कोई भी बजाकर चला जा रहा है। फिर काहे की सरकार? कैसा पीएम? काहे की भक्त सेना? फिर तो यही लोग ज्यादा समर्थ और ताकतवर हैं। सत्ता चलाने के काबिल हैं। क्यों?Pushya Mitra
    20 hrs ·
    यह सच है कि हर आंदोलन में कुछ फर्जी लोग घुस जाते हैं। इसमें भी घुस आए हैं, झूठी तस्वीर चला रहे हैं, मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहे हैं। मगर वह उतना बड़ा सवाल नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि एक स्थानीय घटना को, लड़कियों की छोटी सी मांग को, जायज मांग को न मान कर इसे राष्ट्रीय बहस और राष्ट्रीय क्षोभ का विषय किसने बनाया? क्या कम्युनिस्टों और NDTV ने? लड़कियों के आंदोलन के लिये इतना बड़ा पुलिस बल किसने बुलाया? उन्हें लाठी भांजने का आदेश किसने दिया? वामपंथियों ने? जिस राज्य का मुखिया एन्टी रोमियो स्क्वायड गठित करता है, वह क्यों छेड़खानी की घटना को हैंडल नहीं कर पा रहा? क्या लड़कियों की मांग नाजायज है? आन्दोलन की शुरुआत तो ABVP की लड़कियों ने की थी, तभी क्यों नहीं माना गया?
    क्योंकि आपको सत्ता का नशा है। आपको भक्तों की ताकत पर भरोसा है कि वे कैसी भी बुरी स्थिति में आपको अपने कुतर्कों से बचा लेंगे। क्योंकि आपके सलाहकार और कर्ता धर्ता पुलिसिया मानसिकता के लोग हैं जिन्हें लाठी चलाने के अलावा कुछ नहीं आता।
    याद रखिये, बहुमत और सत्ता के मद में आपने जिन भस्मासुरों को हर जिम्मेदार जगहों पर बिठा रखा है, वही आपके पतन का कारण बनेंगे। आपको पता नहीं है, आपके पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है।Pushya Mitra
    23 September at 15:41 ·
    पिछले कुछ दिनों से मैं काफी गंभीरता से जेएनयू और बीएचयू के बिल्कुल अलदहा माहौल को लेकर एक उपन्यास लिखने के बारे में सोच रहा हूं. जैसे ही वक्त मिलेगा मैं उसमें जुट जाउंगा. निश्चित तौर पर दोनों जगहों का माहौल एक दूसरे के उलट है, जहां जेएनयू कम्युनिज्म इंटरनेशनल के थीम पर बसा एक वैश्विक शिक्षण संस्थान है, वहीं बीएचयू गाय और गंगा पट्टी की सामंतवादी और रूढीवादी सोच का प्रतीक है. हालांकि दोनों की अपनी-अपनी खूबियां और सीमाएं हैं. मगर कुछ चीजें तो ऐसी हैं जिन्हें आज के जमाने में होना ही नहीं चाहिए था.
    जैसे, बीएचयू में आधी आबादी की जिंदगी. जैसी की खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि बीएचयू प्रशासन तक आज भी लैंगिक समानता की सोच की हवा पहुंच नहीं पायी है. वे स्त्रियों को उसकी इज्जत से तौलते हैं. वे उस पुरातन सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं कि लड़कियों को विवाह से पहले हर हाल में अपना शील बचा लेना चाहिए. इसकी सुरक्षा सबसे जरूरी है. बाद बांकी पढ़ाई हो तो हो, न हो तो न हो.
    इसलिए उन्हें हर मुमकिन पिंजरे में कैद करने की कोशिश की जाती है. शाम ढलते ही हॉस्टल बुला लिया जाता है. खिड़कियों को बंद रखने कहा जाता है. ऊंची आवाज में बात करने से रोका जाता है. हालांकि इस तरह के कैदखानों में भी स्त्रियों का शील कितना सुरक्षित रहता है, कहना मुश्किल है.
    अपने किशोरावस्था में पूर्णिया से लेकर, भागलपुर, पटना और पूर्वी भारत के कई शहरों में महिला कॉलेज के ऐसे कई हॉस्टलों की चर्चा मैंने सुनी है. जहां पुरुषों को एंट्री नहीं है. विशाल फाटकों के बीच हजारों लड़कियां रहती हैं और लड़के उनके आसपास उनकी एक झलक के लिए मंडराते रहते हैं. कुछ लोग दीवार कूद कर अंदर जाने की कोशिश करते हैं. कुछ दूसरी तरह के प्रतिक्रिया करते हैं. इसके बावजूद इन तमाम हॉस्टलों की कोई न कोई कथा होती है, कि कैसे वार्डन कुछ लड़कियों को बड़े लोगों के पास भेजती हैं और ऐसी ही कई और कथाएं. मुझे लगा था कि पिछली सदी के आखिर और इसी सदी के पहले दशक के दौर का यह चलन अब खत्म हो चला होगा. मगर बीएचयू की घटना बताती है, कि ज्यादा कुछ नहीं बदला है.
    वहीं जेएनयू जिस सोच का प्रतिनिधित्व करता है, वहां लड़कियों की समानता के लिए वह हर तरह के रिस्क लेने के लिए तैयार रहता है. उदय प्रकाश की कहानी रामसजीवन की प्रेम कथा में मैंने पढ़ा है कि कैसे उस जमाने में एक ऐसे हॉस्टल की परिकल्पना की गयी थी, जहां लड़के और लड़कियां एक ही भवन में रहते थे. सोच यह है कि शील की रक्षा के नाम पर लड़कियों की समानता के अधिकार को बाधित न किया जाये. वह लड़कों की तरह घूम-फिर सके. समय की पाबंदी न हो, जगह की पाबंदी न हो. अगर इसके लिए जरूरी है तो उसे सुरक्षा उपलब्ध कराई जाये. यह नहीं कि शील बचाने के नाम पर वह कैदियों की तरह रहे.
    यह बड़ा अजीब है कि काउ बेल्ट के पारंपरिक ग्रामीण समाज में व्याप्त इस रूढी को कैसे यहां के शिक्षण संस्थान तक फोलो करते हैं. वे नये जमाने की सोच के हिसाब से नहीं चलते. होस्टल तो होस्टल इस इलाके में कोई मकान मालिक किसी लड़की को किराये पर मकान दे-दे तो भी वह अपना परम कर्तव्य समझता है कि वह उससे पूछे कि वह सात बजे के बाद कहां थी. वह इस बाद को अपनी जिम्मेदारी समझता है कि जिस हालत में उसे लड़की मिली है, उसका शील भंग हुए बगैर उसी हाल में उसके मां-बाप को वापस करे. प्राइवेट लॉज भी इसी कांसेप्ट पर बनते हैं.
    असल समस्या यह सोच है. जो कहती है कि बाहर खतरा है, लड़के छुट्टा घूम रहे हैं, कभी भी तुम्हारा रेप कर सकते हैं. इसलिए काम से काम रखो. शालीन कपड़े पहनो, बाहर निकलो तो नजर झुका कर निकलो, काम खत्म होते ही घर आ जाओ और भली लड़की की तरह घर में शांति से रहो. आज भी यहां कोई यह नहीं कहता कि बाहर गुंडे हैं तो गुंडों को अंदर करो. उनकी वजह से हमारी बेटियां क्यों कैद भोगे… और जब तक हम यह कहना, इस तरह सोचना नहीं सीखेंगे. हमारी दुनिया ऐसी ही रहेगी, इतनी ही पिछड़ी.
    और यह भी तय है कि हमारी सोच खुद नहीं बदलेगी. लड़कियां ही लड़-झगड़ कर हमारी आंखों का परदा उतारेगी. जिंदाबाद बीएचयू की लड़कियों.

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  8. सिकंदर हयात

    Narendra Nath
    3 October at 22:36 ·
    2022 में न्यू इंडिया की बात हो रही है। मेरे हिसाब से अब आने वाले पांच सालों में सरकार कोई भी रहे,हम आगे जरूर बढ़ जाएंगे। कुछ चीजें जो 70 सालों से हमारा पीछा कर रही हैं,जिनपर अनगिनत समय-उर्जा और बहुत कुछ गंवाना पड़ा,उप सब चीजों का स्थायी रूप से या तो हर हो जाएगा या फिर वह सवाल भी नहीं उठेंगे। सदा के लिए दफन हो जाएंगे ये सवाल। और देश के लिए यह बहुत अच्छा होगा।
    कुछ सवालों के जवाब मिल भी चुके हैं और कुछ का मिलना बाकी है।
    1-सुभाष चंद्र बोस की माैत हवाई दुर्घटना में हुई। अब इस सरकार के भी जापान,रूस से लेकर सब रिकार्ड खंगाल लेने के बादभी ,पश्चिम बंगाल में चुनावी मुद्दा बनाने के बाद अब तय हो गया कि इसमें अब कुछ नहीं बचा। मामला सदा के लिए समाप्त
    2-बोफोर्स घोटाला में राजीव गांधी दोषी थे या नहीं। अगर 6 महीने में इसमें कोई डवलपमेंट नहीं हुआ तो फिर जब भी इसका जिक्र हुआ तो लोग दौड़ा देंगे उसी तोप के साथ
    3-‘मंदिर वहीं बनाएंगे और डेट भी बताएंगे’।
    अगर 2019 तक राम मंदिर बनने की शुरूआत नहीं हुई तो फिर जब भी कहीं कोई मंदिर बोलेगा,लोग उसे दौड़ा देंगे
    4-धारा 370-
    कश्मीर में अगर 2019 तक धारा 370 हटाने की औपचारिक पहल नहीं हुई तो जैसे 370 का नाम लिया जाएगा लोग धारा 420 लगा देंगे
    5-‘हिंदू खतरे में है’-
    100 सालों से चल रहा हिंदू खतरे में अब अपने क्लाइमेक्स पर है। खतरे से निबटने के लिए जो करना है या नहीं करना है,वह अभी दो-तीन सालों में कही करना है। उसके बाद जो बोलेगा कि हिंदू खतरे में,वहीं लोगों के सामने खतरे में पड़ जाएगा
    6-’60 सालों में कुछ काम नहीं हुआ,सब नेता करप्ट हैं-‘
    अगले दो-तीन सालों में 60 सालों में कुछ नहीं करने की वैलिडीटी पीरियड भी समाप्त हो जाएगी। साथ ही जितने करप्ट-एंटी नेशनल नेता हैं,वे जेल चले जाएंगे। इसके बाद अगर किसी को करप्ट,एंटी नेशनल कहा गया तो फिर उन्हें दौड़ा दिया जाएगा
    7-‘आरक्षण देश को बर्बाद कर रहा-‘
    अभी चालाकी से एक फूल,दो माली का खेल हो रहा है। एक को बताया जा रहा है कि आरक्षण बढ़ा देंगे। दूसरे को बताया जा रहा है आरक्षण समाप्त कर देंगे। चुपके से। 2-3 सालों में एक को पता चल गया कि उसके साथ फ्लर्ट हो रहा था और आरक्षण पर चल रहा विवाद अगले कई सालों तक समाप्त हो जाएगा
    अच्छा है कि 2020 के बाद हमें इन सवालों से रुबरु नहीं होना होगा। उसके बाद देश सही मायने में न्यू इंडिया की ओर बढ़ेगा। जाे होगा,सदा के लिए हल निकल जाएगाNarendra Nath
    4 October at 18:32 ·
    यह बहुत बड़ा राजनीतिक मिथ है कि पूर्ण बहुमत की स्थायी सरकार विकास की पहली शर्त होती है। अगर यह फैक्ट होता तो
    -बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य विकास में अव्वल होते। लालू प्रसाद ने बिहार और लेफ्ट ने बंगाल में बहुत स्थायी सरकार दी
    -नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने अल्पमत-अस्थिर सरकार में देश में रिफार्म का सबसे बोल्ड दांव खेला
    -देवेगौंडा की तीसरे मोर्चे की खिचड़ी सरकार में तब युवा वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आजाद भारत का सबसे बेहतरीन बजट दिया जिसे अब तक ड्रीम बजट कहा जाता है।
    -यूपीए ,जो मूलत: खिचड़ी सरकार थी जिसमें सबसे बड़ी पार्टी को 150 सांसद भी नहीं थे ने यूपीए 2, जिसमें सबसे बड़ी पार्टी को 200 से अधिक सीट मिली से बेहतर प्रदर्शन किया।Narendra Nath
    22 hrs ·
    “तीन सालों में कुछ नहीं हुआ” यह “70 सालों में कुछ नहीं हुआ” का नया वर्जन है
    ———————————————–
    भारत की जीडीपी ग्रोथ देखें पिछले 15 सालों में। निर्विवाद रूप से अंत के सालों में बहुत खराब काम करने वाली मनमोहन सरकार ने भी मोदी सरकार को 67 जीडीपी ग्रोथ विरासत में।
    इन पंद्रह सालों में हमने 9 फीसदी और 8 फीसदी से भी अधिक ग्रोथ देखा है। ऐस तब जब हम एक धारणाा-भावना में कहते हैं कि 70 सालों में कुछ नहीं हुआ और देश की सबुह 26 मई 2014 से हुई।
    खैर,यह आंकड़े तथ्य है। इन पंद्रह सालों में अटल और मनमोहन दोनों की सरकार रही।
    कले मोदीजी ने कहा कि कोई उन्हें न बोले,क्योंकि पहले भी ग्राेथ रेट कम रही है।
    जेटली ने यशवंत सिन्हा को जवाब देते हुए कहा था कि उन्हें पता है कि अटल सरकार की आर्थिक नीति कारगर थी।
    मतलब आप जिस अटल-मनमोहन सरकार सिरे से खारिज कर रहे हैं आज उनके सबसे खराब सालों से तुलना कर खुद को बेहतर बताने की लाइन खींच रहे हैं।
    अगर अच्छे भाषण-आक्रामक भाषण-काउंटर से जीडीपी बढ़ जाती,इकोनॉमी फिक्स हो जाती तो नाना पाटकेर या इरफान खान के पीएम बनने से तो जीडीपी कहां चली जाती,अंदाज लगा लें।
    इन सबके बीच मोदीजी की बात सही है कि हालत उतनी बुरी नहीं है जिनती बतायी जा रही है।यह उतना ही गलत है जितना कहना कि 70 सालों में कुछ नहीं हुआ।
    बहुत सारे स्टेप लिये भी गये। आगे हालात ठीक भी होंगे। जब दोनों साइड ने अति की दीवार खींच दी तो फिर बीच की लकीर किसे दिखे,कौन देखे।
    दोनों बात सही हैं कि 70 सालों में भी बहुत कुछ हुआ और पिछले तीन साल भी बुरे नहीं रहे।
    खैर,इनके बीच धारणा-भावना अाधारित राजनीति में जिसकी बात सुनी जाय,उसकी बात ही सच मानी जाती है। इस हिसाब से नरेन्द्र मोदी की बात अभी सच मानी जाती है। इकोनॉमी बढ़े न बढ़े। उनकी पॉलिटिकल इकोनॉमी There Is No Opposition के कारण अभी भी ग्रोथ जोन में ही है।
    2019 में वह और शिखर पर जाते ही दिख रहे हैं।
    नीचें-चार्ट 15 सालों के जीडीपी काNarendra Nath
    30 mins ·
    यही मोदी की खासियत है। यही उनकी मजबूत राजनीतिक पूंजी है जो उन्हें अजेय बना रही है।
    वह मूर्ख समर्थकों की बिल्कुल नहीं सुनते और गंभीर आलोचना को वक़्त रहते ठीक कर देते हैं।
    पेट्रोल-डीजल कीमत बढ़ी तो मूर्ख समर्थक ‘पुल नहीं चाहये’,’गेहूं सस्ता मिलता’ है ना के थेथरोलोजी से लग गए बचाव करने।
    लेकिन मोदी ने माना गलत हो रहा और पहल की। कीमत कम कराई।
    बीएचयू में चिरकुट वीसी नाम हंसा रहे थे।लेकिन मूर्ख समर्थक इसके लिए ‘खान्ग्रेसी,शेखुलर,मीडिया’ को जिम्मेदार ठहरा रहे थे।
    लेकिन मोदी ने उनकी नहीं सुनी और वीसी को हटवाया।
    जीएसटी पर कहा जा रहा कि कई पर जुल्म हो रहे,कारोबार ठप हो रहा,नौकरी जा रही।
    मूर्ख समर्थक आ गए तर्क के साथ ‘सारे बेईमानों को मिर्ची लग रही’ और उन्हें कहीं दिक्कत नजर नहीं आ रही थी।
    मोदी ने यहां भी आलोचना को सुनी।
    वह जीएसटी को पूरी तरह बदलेंगे।समझ गए कि इसे नहीं बदले तो जनता उन्हें बदल देगी।
    इसकी शुरुआत आज होगी।
    बाकी उन्हें अपने मूर्ख समर्थकों पर कट्टर विश्वास है कि वह दिन को रात बोल देंगे तो वह दुनिया को बताने निकल जाएंगे कि ऐसा कहना क्यों जरूरी है और दिन को दिन कहने वाले किस तरह साज़िश कर रहे।इसके लिए व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से अद्भुत तर्क भी निकाले जाते हैं।
    अब आज के बाद वही समर्थक बताएँगे,तेल का दाम क्यों घटना बड़ा क़दम है,जीएसटी में बदलाव कितना जरूरी था और बीएचयू वीसी कितना मूर्ख था।Sheetal P Singh
    4 October at 20:03 ·
    हरियाणा के हिसार में AIKS के राष्ट्रीय महाधिवेशन में त्रिपुरा के वामपंथी CM मानिक बोले
    त्रिपुरा मे 95% स्कूल सरकारी है । सब के लिए शिक्षा फ्री है । 97% नागरिक पढे लिखे है । 98 % लोग सरकारी अस्पताल मे इलाज करवाते है जो बिल्कुल मुफ्त है । एक भी किसान ने आत्महत्या नही की है ।केन्द्र सरकार द्वारा फर्टिलाइजर सब्बसीडी खत्म करने व कम करने के बाद भी त्रिपुरा सरकार किसानो को पूरी सब्बसीडी दे रही है ।नहरी पानी व बिजली व सिंचाई व्यसस्था किसानो के लिए बिल्कुल मुफ्त है।त्रिपुरा मे वामपंथ की सरकार बनने से पहले वहां केवल 5% कृषि भूमि पर सिंचाई होती थी और अब 97% कृषि भूमि पर सिंचाई होती है …
    CopiedHimanshu Kumar
    3 hrs ·
    आजकल भारत के लोग भाजपा भक्तों के नफरती उफान से चिंतित है ,
    इन भक्त लोगों नें गाली गलौज का माहौल बनाया हुआ है ,
    साहित्य, कला , समझदारी की कोई भी बात करना मुश्किल हो रहा है ,
    चाहे कोई सार्वजनिक कार्यक्रम हो , नाटक या फिल्म शो का कार्यक्रम हो ,
    स्वयंघोषित राष्ट्रवादी गुंडे आकर हमला कर देते हैं ,
    हमें यह समझना होगा कि आखिर ये लोग खुद को दूसरों से ज़्यादा बड़ा राष्ट्रवादी क्यों दिखाना चाह रहे हैं ?
    राष्ट्रवाद की होड़ सिर्फ भारत मे ही नहीं मची है ,
    पहले भी अनेकों देशों मे खुद को ज़्यादा राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिशें हो चुकी हैं ,
    क्यों नागरिकों का एक समूह दूसरों से ज़्यादा राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिश करता है ?
    इसे समझने से ही हम नफरत के दलदल से निकल सकते हैं ,
    हर देश मे नागरिको का एक समूह खुद को ज़्यादा बड़ा राष्ट्रवादी घोषित करता है ,
    यह समूह अपने राजनैतिक विरोधियों को देशद्रोही घोषित करता है ,
    यह समूह आम जनता मे दुश्मन देश का भय खड़ा करता है ,
    यह समूह जनता को डरा कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है ,
    सत्ता पर कब्ज़ा कर के यह समूह अपने आर्थिक हितों की रक्षा करता है ,
    सत्ता के बल पर यह समूह व्यापार , उद्योग , ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेता है ,
    जैसे भारत मे पाकिस्तान और मुसलमानों का डर पैदा कर के सत्ता पर कब्ज़ा किया गया ,
    सत्ता मिलने के बाद आदिवासियों को मार कर ज़मीनों पर कब्ज़े और अपने उद्योगपतियों के फायदे का काम किया जा रहा है ,
    हर देश मे राष्ट्रवाद का यह शातिर खेल शहरी, अमीर आरामतलब वर्ग द्वारा खेला जाता है,
    राष्ट्रवाद के खेल में मेहनत कश मज़दूर , किसान छात्र , माहियायें सबसे ज़्यादा नुकसान मे रहते हैं ,
    क्योंकि राष्ट्रवादी राजनैतिक समूह इन वर्गों के हितों पर ध्यान नहीं देते,
    बल्कि यह राजनैतिक समूह अपने विरुद्ध उठने वाले हर जनविरोध को देशद्रोही कृत्य घोषित कर देता है ,
    इस स्वयं घोषित राष्ट्रवादी समूह के कारण राजनीति अपना असली काम छोड़ कर अमीर वर्ग के ही फायदे के काम करती रहती है,
    युद्ध इस राष्ट्रवाद की राजनीति के लिये टानिक का काम करता है ,
    इसलिये ये राष्ट्रवाद की राजनीति का खेल खेलने वाला राजनैतिक समूह जब भी कमज़ोर पड़ने लगता है तभी या तो यह पड़ोसी राष्ट्रों से युद्ध करने लगता है या अपने देश मे ही मौजूद किसी धार्मिक समूह को दुश्मन घोषित कर के उस पर हमला कर देते हैं,
    जैसे जर्मनी मे हिटलर ने यहूदियों को मारा था और अन्य राष्ट्रों पर हमला बोल दिया था,
    जैसे भारत मे भाजपा, पाकिस्तान से युद्ध और मुसलमानों पर हमले कर के अपने पक्ष मे समर्थन जुटाती है ,
    इस राष्ट्रवाद की राजनीति का एक ही इलाज है ,
    कि किसानों , मजदूरो , छात्रों , महिलाओं और अल्पसंख्यकों को संगठित किया जाये ,
    और इन वर्गों मे राष्ट्रवाद की राजनीति के षडयंत्र को समझाया जाय ,—————————–Vikram Singh Chauhan
    4 October at 22:45 ·
    नोटबंदी के बाद करोड़ों युवाओं को बेरोजगार करने वाले नरेंद्र मोदी खुद तो एक आदमी को रोजगार नहीं दे पा रहे हैं अगर केजरीवाल 15 हजार अतिथि शिक्षकों को नियमित कर रहे हैं तो उनके पेट में मरोड़ क्यों? अरविंद केजरीवाल एक निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। उनके साथ केंद्र के एजेंट एलजी का व्यवहार आतंकवादी की तरह ही है। शीला दीक्षित के समय तो केंद्र ऐसी कोई रुकावट पैदा नहीं करता था तो अब क्यों? जाहिर है राजधानी दिल्ली में भाजपा अपनी हार को अब तक पचा नहीं पाई है। नियुक्ति ,पदोन्नति और सेवा को नियमित किये जाने का अधिकार संघीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री के पास सुरक्षित रहता है। ये नितांत निजी अधिकार है। कभी जंग के कंधे में रखकर बन्दुक चलाने वाले मोदी ने अब बैजल के कंधे पर बन्दुक टिका दिया है। केंद्र ने दिल्ली सरकार के हर अच्छे काम पर टांग अड़ाया है बाद में कोर्ट के लताड़ के बाद भी नहीं सुधरे हैं। मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में दिल्ली की शिक्षा नीति भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए एक मॉडल बन चुका है। अगर मोदी में शर्म होता तो वे राजनैतिक दम्भ छोड़ इसे पूरे देश में लागू करते। उनके नकारे मंत्री उनसे सीखते कैसे जनहित के कार्य को लागू किया जाये। मोदी सफाई अभियान में राजनीति छोड़ सभी को साथ आने की अपील करते हैं क्या वे दिल्ली की शिक्षा नीति को देश में लागू करने के लिए खुद राजनीति छोड़ सकते हैं। छोड़ दे तो पूरा देश उनका अभिवादन करेगा और शिक्षा के नाम पर पालकों से जो अरबों रूपए की लूट हो रही है उस पर भी अंकुश लगेगा ,पर यह मेरा महज एक ख्वाब हैं। मोदी कभी दूसरों को सफलता का श्रेय नहीं लेने देंगे। और गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा मिले ऐसा वे कभी नहीं चाहेंगे। कल हो सकता है तेल और कोल में घाटा होने पर अडानी और जिओ में नुकसान होने पर अम्बानी एक अच्छी स्कीम वाला स्कूल खोल दे! मोदी जी भविष्य का सोचते हैं।

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  9. सिकंदर हयात

    2002 से हिन्दू कठमुल्लाओ ने मोदी को अपने मन में बसा लिया था और तब से ही बहुत लिखने वाले लोग नेट गंद फैलाकर उनके प्रचार कार्य में जुट गए थे नेट न होता तो मोदी कभी पि एम् नहीं बनसकते थे खेर पिछले दिनों अचानक से मूडस्विंग हुआ पन्दरह साल से डेढ़ टांग पर शुक्ला के पीछे घिसट रहे ये लंगड़ा त्यागी ( ओमकारा से ) अब थकने लगे और समझ गए हे की उन्हें कोई नहीं पूछने वाला हे आपने गौर किया ही होगा की सोशल मिडिया का हर दूसरा संघी मोदी प्रेमी बुडबकीया आजकल भाजपा मोदी आदि के द्वारा बुद्धजीवियों ( खुद को ) को भाव न देने की शिकायत कर रहे हे एक घोर कम्युनल स्वाभाविक मोदी भक्त और भाजपा का एक संपादक उर्फ़ लंगड़ा त्यागी तो आज लिखता हे ——— कुमार झा
    11 hrs ·
    मूर्खता का स्तर ज़रा कम हुआ तो पहला काम यही किया कि लिखना छोड़ दिया. उससे भी ज़रा सा कम हुआ स्तर बेवक़ूफ़ी का, तो ग़ैर-ज़रूरी बहसों पर लगभग विराम लगाया. लेकिन दिक़्क़त यह हो गयी कि तब तक लिखने-पढ़ने के अलावा शेष सभी काम भूल चुका था. अब मुश्किल यह है कि लिखूं भी नही तो क़रूं क्या!किसी शायर ने यह लिख कर तो और निकम्मा कर दिया कि- ऐसी वैसी बातों से तो ख़ामोशी ही बेहतर है/या कुछ ऐसी बात करो जो, ख़ामोशी से बेहतर हो.
    क्या किया जाय फिर?

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  10. सिकंदर हयात

    इसमें तो कोई शक अब रहा ही नहीं हे की की अगर गाँधी नेहरू की जोड़ी ना होती और तमाम मतभेद के बाद भी गाँधी जी नेहरू को सत्ता न सौपते तो भारत नाम का कोई देश वज़ूद में ही नहीं होता मोदी यो संघियो ने अब पूरी तरह सिद्ध कर दिया हे——————————————————————————-” Arvind Verma
    15 hrs · भारतीय सभ्यता -संस्कृति-व्यवस्था की जड़ों में जब मट्ठा डाला जा रहा था तब आम भारतीय जन बांसुरी बजा रहा था
    जो संघी विचार आज पूरे देश को हिन्दू-मुस्लिम,मंदिर-मस्जिद,सवर्ण-दलित,राजपूत-गैर राजपूत में बांटें हुए है अगर 70 वर्ष पूर्व देश ने सत्ता उनके हाथ में दी होती तो उन्होंने देश को क्या दिशा दी होती सोच कर ही मन सिहर उठता है।
    जो विचार आज हस्पतालों में ज्योतिष बिठाने के आदेश जारी करता है क्या वही विचार एम्स,आईआईएम जैसी संस्थाओं का निर्माण करता ? जो विचार आज घोषित रूप में शिक्षा के बजट में कटौती कर रहा है क्या वह विचार यूजीसी, जेएनयू ,बीएचयू,डीयू जैसी संस्थाओं का निर्माण करता ? जो विचार आज अनिल अंबानी को राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अन्तराष्ट्रीय ठेके दिलवा रहा है क्या उस विचार ने एच ए एल,डी आर डी ओ, बी ई एम एल जैसी संस्थाओं का निर्माण होने दिया होता ? जो लोग वेद और उपनिषद को यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल करवा रहे हैं क्या उन्होंने इसरो का निर्माण किया होता ? जो सोच रेडिएशन से बचने,परमाणु बम्ब से बचने का उपाय गाय के गोबर में ढूँढती है क्या वही सोच 70 के दशक में परमाणु बम्ब बनाने का सोचती ? जो लोग आज वन्दे मातरम और गर्व से कहो हम हिन्दू हैं जैसे विचारों को विद्वता समझते हैं क्या वह सोच योजना आयोग,पंच वर्षीय योजना पर विचार करती ?
    जो सोच आज 70 साल में कुछ न होने का रोना पीट रही है उसने पिछले 42 माह जो किया वह सिर्फ नीरो ही कर सकता था जलते सुलगते देश में भारत माता की जय के साथ अच्छे दिनों का प्रचार, इस सनक में मेरा देश भी रंगने लगा है पर ऐसी सनकों में रंगने के असल परिणाम गुलामी के रूप में ही सामने आया करते हैं। ”

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