अरुण माहेश्वरी

2019 मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा

अहमद पटेल की जीत ही लाज़िमी थी। जिस सीट को जीतने के लिये 47 विधायकों की ज़रूरत थी, कांग्रेस के पास 57 विधायक थे। फिर भी, मोदी-शाह बदनाम जोड़ी ने अपनी अनैतिकताओं की पूरी ताकत झोंक कर इसे लाज़िमी-ग़ैर-लाज़िमी के बीच की सीधी टक्कर का रूप दे दिया। पूरी नंगई से विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त में उतर गये। जनता के बीच पूरी ताकत के साथ एक ही बात फैलायी गई कि इसे ही ‘संसदीय जनतंत्र’ कहते हैं।

कांग्रेस ने कैसे अहमद पटेल की इस जीत को सुनिश्चित किया, एनसीपी और जेडीयू के एक-एक विधायक ने उसे कैसे बल दिया, इस पूरी कहानी को सब जानते हैं। मोदी-शाह के गुंडों, पुलिस और वाघेला की तरह के घुटे हुए सत्ता के दलालों की मार से बचने के लिये उनके विधायकों को गुजरात को छोड़ कर बंगलुरू तक जाना पड़ा।

जनतंत्र में अब जनता की भूमिका नहीं

इस सीट को लेकर गुजरात में अमित शाह ने जो किया और इधर सभी राज्यों में दूसरे दलों के जन-प्रतिनिधियों को दबाव में लाकर तोड़ने का जो काम मोदी-शाह गिरोह कर रहा है, उसकी गहराई में जाने पर यही कहा जा सकता है कि वे सचेत रूप से जनता में यह संदेश देना चाहते हैं कि संसदीय जनतंत्र में अब जनता की कोई भूमिका नहीं बची है। जनता किसी भी दल के प्रतिनिधि को क्यों न चुने, सबको अंबानी-अडानी की धन शक्ति और मोदी-शाह की राज-शक्ति का गुलाम बन कर ही रहना होगा!

इस प्रकार वास्तविक अर्थों में वे राज्य में अपनी सर्वशक्तिमत्ता को स्थापित करके, जन-प्रतिनिधियों को ग़ुलामों में बदल कर पूरी संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को जनता की नज़रों में बिल्कुल लुंज-पुंज और निरर्थक बना दे रहे हैं। ढेर सारे जन-प्रतिनिधियों को सीबीआई, आयकर विभाग इत्यादि के दुरुपयोग से नाना मुक़दमों में फंसा कर उनकी संसदीय निरापदता को मज़ाक़ का विषय बना कर छोड़ दे रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ाई का मतलब यही है कि विपक्ष के जन-प्रतिनिधियों की कोई हैसियत नहीं रहनी चाहिए। जन-प्रतिनिधियों की साख को इस प्रकार सुचिंतित ढंग से गिराना पूरी संसदीय प्रणाली की साख को ही गिराने का एक ऐसा सुनियोजित काम है, जिसकी पृष्ठभूमि में मोदी-शाह-संघ की तिकड़ी अपनी हर प्रकार की असंवैधानिक, ग़ैर-कानूनी या माफ़िया वाली हरकतों को बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चला सके।

मोदी को अपराजेय बनाने की कोशिश

अभी जिस प्रकार मोदी जी के रुतबे को बढ़ाने का अभियान चल रहा है, उसी अनुपात में जनता के सभी व्यक्तिगत प्रतिनिधियों के सम्मान को घटाने की भी समानान्तर प्रक्रिया चल रही है। जिस हद तक जन प्रतिनिधि बौने होते जायेंगे, संसद की अवहेलना करने के लिये कुख्यात एक कोरे लफ़्फ़ाज़ प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व अधिक से अधिक विराट दिखाई देने लगेगा। हिटलर के आगमन की प्रतीक्षा में सालों से लाठियाँ भांज रहे आरएसएस के लोग अब उसी हद तक ढोल-मृदंग बजाते उसकी आरती की तैयारियों के लिये उन्मादित दिखाई देने लगे हैं। इनकी मदद के लिये ‘सब चोर हैं, सब चोर हैं’ का शोर मचाने वाले ‘क्रांति वीरों’ की एक गाल बजाऊ फ़ौज भी पहले से लगी हुई है ।

वे 2019 की तैयारी में ऐसे तमाम लोगों को अभी से डराने-धमकाने में लग गये हैं जिनमें स्वाधीनता का लेश मात्र भी बचा हुआ हो ताकि 2019 के तूफ़ान के साथ भारत में संसदीय जनतंत्र के पूरे तंबू को ही उखाड़ कर हवा में उड़ा दिया जाए।

गैरमामूली है गुजरात की जीत

2019 के चुनाव में हर स्तर पर तमाम प्रकार की धांधलियों के जरिये चुनाव को पूरी तरह से लूट लेने का मोदी-शाह कंपनी ने जो सपना देखना शुरू किया है, उत्तर प्रदेश की जीत के बाद बिहार में अपनी सरकार बनाने और भाजपा से बचे हुए बाकी सभी राज्यों में जनतंत्र के अपने यमदूतों को दौड़ाने का जो सिलसिला शुरू किया गया है, उसमें गुजरात की राज्य सभा की इस एक सीट को जीतने की कोशिश काफी तात्पर्यपूर्ण थी। वे कांग्रेस के उम्मीदवार की सौ फ़ीसदी निश्चित जीत को हार में बदल कर आम लोगों के बीच मोदी-शाह की अपराजेयता का एक ऐसा हौवा खड़ा करना चाहते थे ताकि आगे की उनकी और भी बड़ी-बड़ी जनतंत्र-विरोधी साज़िशों के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई आवाज उठाने की कल्पना भी न कर सके और जनता भी इन षड़यंत्रकारियों को ही अपनी अंतिम नियति मान कर पूरी तरह से निस्तेज हो जाए ।

गुजरात में कांग्रेस दल की सक्रियता और अंतिम समय तक चुनाव आयोग के सामने भी उनकी दृढ़ता ने अमित शाह के इन मंसूबों पर काफी हद तक पानी फेरने का काम किया है। इसमें एनसीपी के एक सदस्य और जेडीयू के एक सदस्य ने भी उनका साथ दिया है। यह प्रतिरोध के एक नये संघर्ष के प्रारंभ का बिंदु साबित हो सकता है। जेडीयू के शरद यादव ने मोदी के दिये गये लालच को ठुकरा कर बिहार की सरज़मीन पर ही कौड़ियों के मोल बिकने वाले नीतीश कुमार को चुनौती देने का बीड़ा उठाया है।

विधानसभा चुनावों में दिखेगा इसका असर

इधर दूसरे ग़ैर-भाजपाई प्रमुख दलों ने भी भाजपा के खिलाफ संयुक्त अभियान में कांग्रेस के नेतृत्व में एक नये अभियान के साथ अपने को जोड़ने की प्रतिबद्धता का ऐलान किया है। गुजरात की इस पराजय का चंद महीनों बाद ही इस राज्य में होने वाले विधान सभा के चुनावों पर निश्चित तौर पर गहरा असर पड़ेगा। वहाँ वैसे ही जनता के बीच से भाजपा की ज़मीन खिसकने के सारे संकेत मिल रहे हैं । वे इसी जनता की चेतना को कमज़ोर करके और मोदी के चमत्कार को बढ़ा-चढ़ा कर बता कर जीतने के फेर में हैं । कांग्रेस के 43 विधायकों ने अपनी दृढ़ता का परिचय देकर इनके जहाज़ में इतना बड़ा सुराख़ पैदा कर दिया है कि आने वाले गुजरात चुनाव को पार करना भी इनके लिये कठिन होगा ।

कहना न होगा, यहीं से भाजपा के जहाज़ के डूबने का जो सिलसिला शुरू होगा, 2019 का आम चुनाव निश्चित तौर पर मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा। आज के टेलिग्राफ़ में अहमद पटेल की जीत की खबर की बहुत सही सुर्खी लगाई है – ‘अमित शाह आया, देखा और फुस्स हो गया’ (Amit Shah came, saw & flopped)।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ साहित्यकार, स्तंभकार और लेखक हैं। आजकल कोलकाता में रहते हैं।)
www.janchowk.com

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6 thoughts on “2019 मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा

  1. qutubuddin ansari

    में इस लेख से सहमत नहीं हु , क्योके नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गरुआप २०२४ तक अपराजय है उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता

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  2. सिकंदर हयात

    ” Prakash Singh
    8 hrs ·
    नोटबंदी के बाद जितने मज़दूर मेट्रो शहरों से वापस आ चुके हैं उनका परिवार क़र्ज़ से डूबा है. महँगाई से जूझने की ताक़त नहीं है और दवाई तक ख़रीदने का पैसा नहीं है. मेरे सामने बुखार, दर्द और सर्दी की दवा की क़ीमत महज़ 12 रुपये भी देने में असमर्थ होने की वजह से उधार के लिए गिड़गिड़ा रहा है. अचानक मैं बोल पड़ा भाई तु त सूरत कमात रहल हव न.. बोल पड़ा ,’ सेठ कहलें काम नहीं है त वापस चली अइनी.’ क़रीब दो घंटे बाद मैं अपने घर पहुँचा तो देखा वह मेरे पिता जी को जीएसटी, नोटबंदी, के फ़ायदे बता रहा था. पाकिस्तान को बर्बाद और अमेरिका से भारत को आगे करने लिए 2019 में मोदी जी को जीताना ज़रूरी है. मैंने पूछा जीएसटी की इतनी जानकारी कहाँ से मिली. बोला: मोबाइल में भतिजवा के सब जानकारी आ जाला… उसका भतिजा 8वीं में पढ़ता था अब पढ़ाई छूट गई है वह मद्रास पेंट पॉलिश करने जाने वाला है. इधर कांग्रेसी अभी एसी में आराम फ़रमा रहे हैं. ( गाँव से ग्राउंड रिपोर्ट Prakash सिंह ” ——————- कुछ दिनों में मेरी भी हालात भी ऐसी ही हो सकती हे मेरे भी काफी पैसे उस आदमी के पास अटक चुके हे जो मोदी की नीतियों के कारण अपना रोज़गार खो बैठा हे मेरा ——- रुपया उस पर उधार था वापसी के कोई आसार नहीं लग रहे हे

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  3. सिकंदर हयात

    Rakesh Kayasth
    1 hr ·
    ऐसा हो नहीं सकता कि हमारे संवेदनशील प्रधानमंत्री गोरखपुर के बच्चो के लिए ना रोयें। उचित समय की प्रतीक्षा कीजिये। मेरे हिसाब से उपयुक्त दिन 15 अगस्त और स्थान लालकिले की प्राचीर होगा।Rakesh Kayasth
    8 hrs · ईमानदारी से कहूं तो मुझे हामिद अंसारी के भाषण से निराशा हुई थी। एक निवर्तमान उपराष्ट्रपति ने जाते वक्त जो कुछ कहा उससे एक सांवैधानिक पद बेवजह विवादों के घेरे में आया। यह दौर वैसे भी संस्थानों के अवमूल्यन का है, ऐसे में एक नये विवाद से हासिल कुछ भी नहीं हुआ।लेकिन क्या किसी ने हामिद अंसारी की विदाई पर दिये गये प्रधानमंत्री के भाषण पर गौर किया? कटाक्ष भरी भाषा में दिये गये भाषण से कौन सी मर्यादा बढ़ गई? लेकिन खैर वे मोदी जी हैं, उनके कुछ कहने पर सवाल उठाना पाप है।अब सवाल इस बात का भी है कि हामिद अंसारी ने गलत क्या कहा? अगर हामिद अंसारी मुसलमान होने की जगह दलित होते और ये कहते कि इस देश में दलितों को डर लगता है, तो क्या प्रतिक्रियाएं तब भी वैसी ही होतीं? तब तो मोदीजी का भी गला भर आता और मीडिया कहता कि जाते-जाते उपराष्ट्रपति महोदय देशवासियों के आईना दिखा गये। दलितों के साथ बीजेपी का राजनीतिक गठजोड़ संभव है। गठजोड़ मजबूत किया जा रहा है। मुसलमानों के साथ ऐसा होना संभव नहीं है। अंसारी के बयान के देश विरोधी की सबसे बड़ी सच्चाई यही है। नैतिकता भी आजकल मोबाइल रिंगटोन की तरह कस्टमाइज्ड हो गई है। जो अच्छा लगे वह नैतिक और जो पसंद ना आये वह अनैतिक।Rakesh Kayasth
    Yesterday at 06:01 · ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब मैंने तय किया हो कि मैं राजनीतिक लेखन से यथासंभव दूर रहूंगा। राजनीति पर कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं। लेकिन जिंदगी में इससे बेहतर कई और काम हैं। थका देनेवाली पेशेवर जिंदगी से जो वक्त बचे उसमें पार्क में बच्चो के साथ क्रिकेट खेलना, छज्जे पर लाइन लगाकर बैठे कौव्वे और कबूतरों को दाना खिलाना, गेट के बाहर जुगाली करती अलसाई गाय को यूं ही निहारते रहना और कुछ नहीं तो पुरानी फिल्में देखना या बुक शेल्फ में रखी वे किताबें पढ़ना जो बरसो नहीं पढ़ी।
    सड़ांध भरी बजबजाती राजनीति पर अगर कुछ लिख भी दिया और दस लोग ने तालियां बजा दीं और पांच लोगो ने गालियां दे दीं, तो उससे आखिर हासिल क्या होना है? लोकतंत्र का मतलब चुनाव है। पांच साल में एक बार जाकर वोट दे आइये। पसंद की सरकार बन गई तो अच्छा अगर नहीं बनी तो बहुमत का सम्मान कीजिये। बस इतनी सी ही तो बात है।
    लेकिन अफसोस बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। देश में इस वक्त ऐसी स्थिति नहीं है, जहां सरकारें खामोशी से अपनी काम करती हैं और जनता चुपचाप अपना काम। सरकार और उससे जुड़े राजनीतिक संगठन जो कुछ कर रहे हैं, उसका सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगियों पर पड़ रहा है। पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले मेरे बेटे को अगर टीचर ये बताये कि भगत सिंह को वेलेंटाइंस डे के दिन फांसी हुई थी और पूछने पर पता चले कि उनकी सूचना आधार व्हाट्स एप है, तो यह मेरे लिए खतरे की घंटी है।
    अगर बच्चो के इतिहास की किताब से यह तथ्य हटा दिया जाये कि ताजमहल और लालकिला किसने बनवाया था, या फिर यह बताया जाये कि हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप ने अकबर को हराया था, तो यह एक बहुत डराने वाली बात है। झूठ की खुराक पर पलने वाली पीढ़ियां आगे चलकर बीमार होती है। मैं अपने बच्चो के लिए चिंतित हूं।
    मैं चिंतित इसलिए हूं क्योंकि देश में सरकार या रूलिंग पार्टी से अलग राय रखने वालों के खिलाफ संगठित हिंसा चल रही है। यह हिंसा जितनी शाब्दिक हैं, उतनी ही शारीरिक भी। समाज का एक बड़ा तबका इस हिंसा पर इतरा रहा है, खुश होकर तालियां बजा रहा है। कल को अगर किसी राजनीतिक विरोधी की हत्या भी हो जाये तो देश एक तबका यही कहेगा कि हीरो बनने गया था, इसलिए मारा गया। आखिर कहां जा रहा है, हमारा समाज?
    कीचड़ दायें-बायें हो तो आदमी बचकर निकल ले। लेकिन बिना दलदल में उतरे सफर संभव ही नहीं तो फिर विकल्प क्या है? .. और कुछ नहीं तो इतना तो कर ही सकता हूं कि ये बताने की कोशिश करूं कि एक नागरिक होने के नाते मैं अपने लिए कैसा समाज और देश चाहता हूं। मेरा ख्याल है, ऐसा कहना अभी देशद्रोह के दायरे में नहीं आया है।Rakesh कायस्थ——————————-

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  4. सिकंदर हयात

    शिखा अपराजिता13 hrs · -शिक्षक बेरोजगार क्यों जब शिक्षकों का भयंकर अभाव है ? सबको अच्छी शिक्षा का बीड़ा उठाया जाए तो सभी शिक्षकों को रोजगार देने के बाद भी शिक्षक कम पड़ जाएंगे l
    -डॉक्टरों की सरकारी बहाली बंद क्यों , सरकारी अस्पतालों की संख्या जनसँख्या की ज़रूरत के अनुपात में बेहद कम क्यों , जब प्रति 1000 जनसँख्या पर डॉक्टरों की संख्या मात्र 0.5 है और दुनिया के निचले पायदानों में भारत की गिनती होती है ?
    -निर्माण क्षेत्र , इंफ्रास्ट्रक्चर , भारी उद्योग हर जगह रोजगार का त्राहिमाम क्यों है ? क्या निवास , स्कूल , अस्पताल आदि हर नागरिक को मुहैया हो चुका है जो नए रोजगार की ज़रूरत नहीं बची ? इसके उलट जनता की ज़रूरत के निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर का उत्पादन और विकास हो तो इतने रोजगार की संभावना है कि ज़रूरत पूरी करने को वर्कर कम पड़ जाएंगे l
    -रेलवे में नौकरियाँ कैसे ख़त्म हो रही हैं , क्या जनसँख्या की अनुपात में देश में पर्याप्त ट्रेनें चल रहीं हैं ? उलटे सच्चाई तो ये है कि जनरल डिब्बों में जानवरों की तरह ठूंस ठूंसकर इंसान यात्रा करने को मजबूर है l यदि रेलवे का विकास जनसँख्या की ज़रूरत के हिसाब से हो तो दिन दोगुने रात चौगुने रोजगार पैदा करने पर भी श्रम की कमी पड़ जाए l फिर रेलवे में छंटनी , बेरोजगारी, रिक्त नौकरियाँ कैसे हैं ?शिखा अपराजिता
    -किसान आत्महत्या को मजबूर क्यों , अनाज लाखों टन सड़ जाता क्यों जब एक तरफ रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा दूसरी तरफ आपूर्ति नहीं हो रही ?
    -नए उद्योग लगने बंद क्यों , क्या जनता की सारी ज़रूरतें पूरी हो गई या संसाधन की कमी है या लेबर की या टेक्नोलॉजी की ?
    पूंजीपति कहेंगे , पैसा नहीं है , तो कहाँ से रोजगार पैदा करें, कहाँ से नए उद्योग लगाएं ? सरकार कहेगी पैसा नहीं है, कोष खाली हैं, कहाँ से नई सरकारी नौकरियाँ पैदा करें , कहाँ से सबको स्कूल , अस्पताल दें ? ये पैसा क्या होता है और इसकी कमी कैसे होती है ? क्या किसीने अपने स्कूल , अस्पताल , घर की दीवारों के निर्माण में ईंट पत्थर सीमेंट की जगह धातु के सिक्के और कागज़ के नोट इस्तेमाल होते देखा है ? क्या ट्रेन , बस के इंजन को चलाने में तेल, बिजली, गैस की जगह एटीएम कार्ड , चेक या करेंसी नोट का इस्तेमाल होते देखा है ? ये पैसा बनता कैसे है ? ये पैसा बनता है श्रम से और श्रम से पैदा हुई वस्तु के विनिमय मूल्य (exchange value) से l जब उत्पादन मुनाफे के लिए होता है तो मुनाफे की हवस में आम जनता की मजदूरी कम से कमतर होती जाति है , और अंततोगत्वा उसकी क्रय शक्ति भी कम हो जाती है l ऐसी अवस्था जिसमें मुनाफे को बनाए रखने के लिए मजदूरी को और कम करना पड़ता है , छंटनी करनी पड़ती है, बेरोजगारी बढ़ानी पड़ती है जिससे श्रम का सौदा सस्ते से सस्ते दर में हो सके l मुनाफे पर टिकी व्यवस्था जिसे पूंजीवाद कहते हैं , कभी बेरोजगारी ख़त्म नहीं कर सकती , न करना चाहेगी क्योंकि जितनी बेरोजगारी , श्रम की मंडी में मजदूर की उतनी कम bargaining power l साथ ही उत्पादन पर भी इसी मुनाफे का ग्रहण होता है , किसी सामान की जनता के बीच कितनी ही ज्यादा ज़रूरत क्यों न हो , यदि वह मुनाफे की शर्त को पूरा नहीं करती तो उसका उत्पादन कम होता है , या ज्यादा होने पर भी गोदामों में पड़ा सड़ता रहता है l
    पर जब उत्पादन मुनाफे के बजाए , समाज की ज़रूरत के आधार पर हो तो ज़रूरत होगी सिर्फ संसाधनों की , श्रम की और टेक्नोलॉजी की l
    आज भारत में जनता की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य , आवास , दवाएं , सूचना , यातायात , सड़क , संचार इन सबकी आपूर्ति के लिए न तो संसाधनों की कमी है , न श्रम की और न टेक्नोलॉजी की, ये बात हर कोई जानता है l
    फिर ये जो “पैसे की कमी” जिसका हवाला हमारी बदहाली , मंदी और विनाश के लिए दिया जाता है , वह और कुछ नहीं पूंजीवाद का अंतर्विरोध है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है l
    याद रहे 1929 से 1939 के बीच इसी मंदी के दौर ने दुनिया के सभी ताकतवर साम्राज्यवादी देशों अमेरिका , ब्रिटेन , फ्रांस , जर्मनी , जापान , इटली , सबकी आर्थिक वृद्धि दर को ज़मींदोज़ कर रखा था तब अपनी किशोरावस्था में समाजवादी सोवियत संघ की आसमान छूती आर्थिक वृद्धि दर को दुनिया भौंचक्की होकर देख रही थी l वह दशक जिसने मानव इतिहास की सबसे तेज़ी से होती प्रगति और सम्पन्नता का नज़ारा देखा l
    आज फासिस्ट मोदी सरकार की हर एक फ्रंट पर नाकामयाबी पर उसे कोसने से आगे की सोचें और अपनी राजनैतिक पक्षधरता तय करें तो यह ज़रूर ध्यान रहे कि क्या अन्य कथित सेक्युलर लिबरल दल इस मुनाफे की व्यवस्था से भिन्न मॉडल प्रस्तुत करते हैं ? यदि नहीं तो क्या आज मोदी सरकार के दौर में आई बदहाली से छुटकारा मिलेगा ? यदि नहीं तो जनता धर्म गाय गोबर के अफीम में क्यों न मस्त रहे ?
    अंततः विकल्प तो सिर्फ एक है , मजदूरों का राज यानी समाजवाद l आप लाल झंडे को पेट भरके गरिया लीजिए , दुनिया की हर एक समस्या का ज़िम्मेदार ठहरा दीजिए , “टॉयलेट एक प्रेमकथा” के फ्लॉप होने से लेकर ग्लोबल वार्मिंग तक के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दीजिए , अन्धकार में जितनी लाठी भंज लीजिए , जब अन्धकार से बाहर निकलने के सवालों पर चिंतन होगा तो रास्ता सिर्फ कम्युनिस्टों के पास मिलेगा, आपको पसंद हो या न हो l—————-हॉलीवुड व अन्य व्यवसायिक science fiction फिल्मों पर कुछ तैरते विचार
    हॉलीवुड की फंतासियों के क्या कहने ।
    कभी Interstellar में भविष्य मानव को संसाधनों के खत्म होने पर मध्ययुगीन खेतिहर सभ्यता में पहुंचाकर पृथ्वी से बाहर जीवन खोजने भेज देती हैं । कभी Day the earth stood still में मानव प्रवृत्ति को स्वाभाविक ही लालची और “आत्म-विनाशक” बनाकर बाहर से एलियनों द्वारा हमला करके पृथ्वी को “बदमाश” मानवों से बचाने का पवित्र कार्यभार सौंप देती है । कभी Planet of the apes में बंदरों को इंसान का बौद्धिक प्रतिस्पर्धी बनाकर “लालची धूर्त” मानव जाति को खुद अपनी फंतासियों में बन्दरों के हाथों सबक सिखा देती हैं । कभी Another earth में पृथ्वी का प्रतिबिंब तैयार कर देती है । कभी Last Man on Earth में पूरी मानव जाति को किसी वायरस से मारकर अंतिम पुरुष और अंतिम महिला द्वारा फिर से मानव सभ्यता शून्य से शुरू करने की फंतासियों की उड़ान अपनी कल्पनाओं में तय कर लेती है ।
    लेकिन जो मानव सभ्यता का यथार्थवादी भविष्य है , यानी पूंजीवाद का अंत, वर्ग विभाजित समाज का अंत, ये कभी इनकी फंतासियों, कल्पनाओं में नहीं आता । वह वर्ग विभाजित व्यवस्था जो युद्ध, पर्यावरण, बीमारी, संसाधनों का अंत, आदि हर उस समस्या की जननी है जिससे मानव सभ्यता को ऊपर वर्णित फिल्मों में प्राणघातक खतरा है, उस वर्ग व्यवस्था का अंत और एक वर्गविहीन आधुनिक कम्युनिस्ट समाज की स्थापना जो सभ्यता और विकास की उच्चतम व्यवस्था होगी, ऐसी कल्पना को फंतासियों में भी दिखाना इनके लिए सम्भव नहीं ।
    भालू, बन्दर, एलियन से मानव समाज का अंत इनकी कल्पनाओं में आता है लेकिन पूंजीवाद- साम्राज्यवाद- फासीवाद कीे गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध, पर्यावरण की तबाही, संसाधनों के मुनाफाखोर दोहन आदि की वजह से संभावित मानवता के अंत की कल्पना इनके दिमाग में उड़ान ही नहीं भरती ।
    इन समस्याओं का समाधान दूसरे ग्रह पर जीवन ढूंढने से लेकर इंसानियत के दुश्मन बने भालू बंदरों के साथ या एलियन्स के साथ शांति करार करने जैसी तमाम ऊल जुलूल फंतासियां इनके भेजे में आती हैं, लेकिन मानव सामूहिकता की शक्ति पर इनकी फंतासियों को इतना भी भरोसा नहीं जो 3 लाख साल पुरानी मानवता को महज 5-7 हज़ार साल पुराने वर्ग समाज से मुक्त सामूहिकता की बुनियाद पर बनी आधुनिक कम्युनिस्ट सभ्यता के रूप में देख सके ।शिखा अपराजिता
    विज्ञान को लेकर इनकी फंतासियों की उड़ान इस यथार्थ की कल्पना नहीं कर पाती कि जब विज्ञान पूंजी और मुनाफे की बेड़ियों से मुक्त होगा तो आज की तुलना में कितनी तेज़ी से , बिना पर्यावरण, संसाधनों और जीवन को लील किए उड़ान भरेगा । शिखा अपराजिता
    इतिहास ने साबित किया है कि समाजवाद के रास्ते सोवियत संघ ने दुनिया के एक बेहद पिछड़े समाज से शुरू करते हुए दुनिया के सबसे विकसित पूंजीवादी देशों की 200 वर्षों की विकास यात्रा को महज़ तीस वर्षों में पूरा किया था व विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तिशक्ति बन गया था, वो भी गृहयुद्ध, विश्वयुद्ध, आदि में हुए अनंत विध्वंसों का निरन्तर सामना करते हुए, बिना किसी अन्य मुल्क को उपनिवेशी ग़ुलाम बनाए । यह एक यथार्थ है कि समाजवाद के रास्ते एक वर्गविहीन कम्युनिस्ट समाज की स्थापना विज्ञान और इंसानी वैभव व सम्पन्नता को रिकॉर्ड तेज़ी के साथ अनगिनत ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी और यह कोई कल्पना नहीं, संकटग्रस्त पूंजीवाद के आगे का स्वाभाविक वैज्ञानिक गंतव्य है । लेकिन हॉलीवुड व पूंजीवाद की फिल्मी फंतासियों में इनकी कल्पना भी करना हराम है, क्योंकि ऐसा करने से इनके आकाओं का सिंहासन डोल जाएगा ।शिखा अपराजिता

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  5. सिकंदर हयात

    Rakesh Kayasth
    20 hrs ·
    डर के आगे जीत है
    ————–
    सोशल मीडिया पर मासूमियमत, मूर्खता और व्यवस्थित ट्रोलिंग की तीन धाराएं साथ-साथ चलती रहती हैं। इन तीनों का मकसद एक ही होता है। किसी खास मुद्धे पर उठ रहे सवालों को पटरी से उतारना। इतना शोर मचाना कि असली बात सुनाई ना दे। गौरी लंकेश प्रकरण में यही हो रहा है।
    एक तबका है जो फेसबुक और ट्विवटर पर मिठाई बांट रहा है। बेरहमी से मार दी गई एक बुजुर्ग पत्रकार के लिए कुतिया और वेश्या जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है। उन्हे कांग्रेसी एजेंट बता रहा है। इस मुहिम में लगे लोगो की सोशल मीडिया प्रोफाइल चेक कीजिये और साथ ही ये देखिये कि इनके कौन लोग फॉलो करते हैं, तो पूरी कहानी समझ में आ जाएगी।
    दूसरा तबका वह है जो कह रहा है कि उन्हे संघ परिवार नहीं बल्कि बेईमान कांग्रेसी नेताओं से खतरा था। पूरी जांच रिपोर्ट आ जाने दीजिये। नतीजे तक पहुंचने की क्या क्या जल्दी है? ऐसे लोगो के वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या ये ज्ञान उन्होने घर से लेकर सड़क तक बेगुनाहों की जान ले रहे गौभक्तों को भी दिया है? क्या उन्होने कभी यह पूछा है कि जब इतना बड़ा सरकारी तंत्र मौजूद है तो कथित गौरक्षा के लिए पूरे देश में गुंडों की पैरलल आर्मी क्यों और किस मकसद से खड़ी की जा रही है?
    जांच पूरी ना होने तक चुप रहने की शिक्षा देनेवालों से यह भी पूछिये कि उनके प्रिय नेता की सरकार ने गोधरा कांड के छह घंटे के भीतर किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि इसके पीछे कौन है? अगर निष्कर्ष मालूम था तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जानबूझकर गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में कारसेवकों की लाश घुमाकर दंगे क्यों करवाये गये और शुरुआती तीन दिनों तक दंगाइयों को खुली छूट क्यों दी गई?
    जो लोग यह ज्ञान दे रहे हैं कि यह राज्य सरकार का मामला है, उनसे पूछिये कि राजस्थान में किसकी सरकार है, जहां रोजाना गौरक्षा के नाम पर लोगो को पीटा जा रहा है, उनकी हत्या की जा रही है? राज्य सरकार का तकनीकी नुक्ता समझाने वालों से यह भी पूछिये कि जब बाबरी ढांचा तोड़ा गया था, तब उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार थी और सुप्रीम कोर्ट में कानून व्यवस्था बहाल करने का हलफनामा देने के बाद उसने क्या किया था? क्यों कल्याण सिंह ने दो दिन बाद खुलेआम कहा था कि उन्होने जानबूझकर सुरक्षा बलों से कहा था कि उपद्रवी भीड़ के खिलाफ कार्रवाई ना की जाये? कानून, संविधान और नैतिकता को ठेंगा दिखाना जिनका इतिहास रहा है, वे आपसे विमर्श के लायक नहीं है। इनका एकमात्र मकसद आपकी आवाज़ को दबाना है।
    एक तीसरा तबका भी है, जो शायद सीधे तौर पर व्यवस्थित हिंसा की विचारधारा से नहीं जुड़ा है। लेकिन जाने-अनजाने में उनके हितों का पोषण कर रहा है। इस तबके ने दार्शनिक भंगिमा अख्तियार कर रखी है। हत्या तो हत्या है। उसे राजनीतिक रंग ना दो। उनके वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या उन्होने संगठित हिंसा भड़काने की कोशिशों में जुटे आधा दर्जन केंद्रीय मंत्रियों और फर्जी फोटोशॉप बांट रहे सैकड़ो बीजेपी नेताओं को भी कभी उन्होने ये ज्ञान दिया है? अगर नहीं तो मान लीजिये ये लोग भी असली सवाल को पटरी से उतारने के खेल में शामिल हैं।
    संघ परिवार को कटघरे में खड़ा करना मेरा प्रयोजन नहीं है। जो लोग गांधी की हत्या कर चुके हों, जिनकी हकीकत पूरी दुनिया जानती हो, उनके पीछे वक्त बर्बाद करने से क्या हासिल होगा? मैं केवल तथ्यों की बात कर रहा हूं, जो बहुत स्पष्ट है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में उग्र हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं, जो अपने वैचारिक विरोधियों का चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। कलबुर्गी, पानसारे और दाभोलकर की हत्या में जो पैटर्न है, वही पैटर्न गौरी लंकेश के मामले में भी दिखाई दे रहा है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए किसी अनुसंधान की ज़रूरत नहीं है। गौरी लंकेश का लिखा पढ़ लीजिये। उन धमकियों के बारे में पता कर लीजिये जो उन्होने मिल रहे थे। उस मुकदमे पर गौर कीजिये जो सत्तारूढ़ पार्टी के ताकतवर नेता और उनके बीच चल रहा था। आखिर कौन लोग जो गौरी लंकेश के काम से नाराज़ थे और उन्हे धमकियां दे रहे थे?
    आखिरी बात! अगर इस मामले में कोई और कहानी सामने आती है और वजह वह नहीं होती जिसका अनुमान है, तो मुझे इस बात की खुशी होगी। मैं खुद कर्मकांडी हिंदू परिवार में पैदा हुआ हूं। जब मैं किशोर था और हिंदू आतंकवाद शब्द सुनता था तो मेरे तन बदन में आग लग जाती थी। अब सुनता हूं तो मेरा माथा शर्म से झुक जाता है, क्योंकि मुझे पता है कि यह कोई मिथ नहीं बल्कि हकीकत है।
    मैं उस मां का बेटा हूं, जिसे हिंदू परंपराओं का किसी भी आम कर्मकांडी ब्राह्रण के मुकाबले कई गुना ज्यादा ज्ञान है। एक विराट और उदात्त दर्शन का राजनीतिक फायदे के लिए जिस तरह अवमूल्यन किया जा रहा है, उससे मैं हतप्रभ हूं। मुझे मेरे धर्म ने सिखाया है कि सत्य साथ खड़े रहो और डरो मत। इसलिए मैने तय किया है कि डरूंगा नहीं। जहां बोलने की ज़रूरत होगी खुलकर बोलूंगा।
    तथाकथित धर्म रक्षा के नाम पर मरने-मारने पर उतारू भीड़ को मैं गायत्री मंत्र का सार याद दिलाना चाहता हूं, शायद कुछ सकारात्मक असर हो–
    उस प्राण स्वरूप देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें और वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।Rakesh Kayasth
    7 hrs ·
    किसी ट्रोल की वही मानसिकता होती है, जो कंप्यूटर गेम या प्ले स्टेशन से खेलने वाले 5 साल के बच्चे की होती है। गेम खेलता बच्चा अपने कल्पना लोक में जीता है। वह सोचता है कि उसमें इतनी ताकत समा गई है कि WWE के सूरमाओं को चुटकियों में ढेर कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि बच्चे में मासूमियत होती है और ट्रोल के दिमाग़ में बेइंतहा ज़हर भरा होता है।
    जब सोशल मीडिया नहीं था, ट्रोल तब भी थे। वे अख़बार के संपादकों के नाम सैकड़ो और हज़ारों की तादाद में चिट्ठियां भेजते थे। उनकी बकवास दीवारों से टकराकर वापस लौट आती थी। वे चोरी-छिपे दीवारों पर गंदे पोस्टर लगाते थे और पकड़े जाने सरेआम जूते खाते थे। चौराहे और पान की दुकानों पर खड़े होकर वे अपनी फेंकते थे और हर कोई उनकी बात अनसुनी करके आगे बढ़ जाता था। वे इसी तरह जीते थे, कुंठित होते थे और एक दिन गुमनामी में मर जाते थे। Rakesh Kayasth
    तब उनकी बात सुनने को कोई तैयार नहीं होता था। अब सोशल मीडिया है, इसलिए सुनने वाले हैं और फॉलो करने के लिए तो बकायदा देश के प्रधानमंत्री उपलब्ध हैं। ट्रोलिंग एक करियर ऑप्शन है। एक स्किल है, जिसमें दक्षता हासिल करके आप किसी राजनीतिक पार्टी में अपनी पैठ बना सकते हैं और एक दिन प्रवक्ता तक बन सकते हैं।
    किसी भी ट्रोल की योग्यता का एकमात्र पैमाना उसकी बदत्तमीजी करने की क्षमता है। वह एक तरह सुपारी किलर होता है। किसी भी तथ्यपरक और गंभीर विमर्श का हत्यारा। बड़ी और नामी-गिरामी शख्सियतों को वह इस तरह अपमानित करता है और डराता है कि उनकी हिम्मत टूट जाये। ट्रोल का इस्तेमाल कुछ इस तरह किया जाता है, जैसे शतरंज का कोई शातिर खिलाड़ी प्यादे का इस्तेमाल करके घोड़ा या वज़ीर फांस ले।
    यह एक नये किस्म की मनोवैज्ञानिक लड़ाई है, जिसमें बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी फंस रहे हैं। गौरी लंकेश का मामला ताजा उदाहरण है। जिस आदमी ने गौरी की मौत की बाद उनके बारे में बेहूदगी की हदें पार करती टिप्पणियां कीं, अनजाने में लोगो ने उसे भरपूर पब्लिसिटी दे दी। उसका जो भी नाम हो लेकिन वह अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहा और जो लोग इस्तेमाल हुए उन्हे पता भी नहीं चला कि वे किस तरह इस्तेमाल किये जा चुके हैं।
    दिमाग़ी रूप से बीमार लोगो का सबसे अच्छा इलाज उन्हे नज़रअंदाज़ करना है। मैं लगातार कहता आया हूं कि जिनमें भाषा की न्यूनतम मर्यादा नहीं है, जो हिंसा का समर्थन करते और अफवाहें फैलाते हैं, उन्हे तत्काल ब्लॉक कीजिये। वे आपसे जुड़कर वैधता हासिल करते हैं। उनके रास्ते बंद कर देने से ज्यादा प्रभावशाली कोई और तरीका नहीं है। यह ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने जैसा है। वे बिलबिलाकर अपनी मौत मर जाएंगे।Rakesh Kayasth

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  6. सिकंदर हयात

    Deepak SharmaDeepak Sharma
    Yesterday at 21:11 · New Delhi ·
    रवीश अच्छे पत्रकार हैं. सामाजिक सरोकार वाले. राजदीप भी बड़े पत्रकार हैं. विदेश में पढ़े लिखे ..देश के एक विख्यात क्रिकेटर के काबिल बेटे हैं.लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की साख को रवीश
    और राजदीप जैसे सैकड़ों बीजेपी विरोधी पत्रकारों, चिंतकों से खतरा नहीं है. ये वे लोग हैं जिनके विरोध के बावजूद, मोदी ने 2014 का प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था.
    प्रधानमंत्री हो या राजा हो, सत्ता को सामने खड़े शत्रु या विरोधी का डर नहीं होता है…क्यूंकि सत्ता, किसी के विरोध से नहीं अपनों के समर्थन से चलती है…. इसलिए सत्ता पर काबिज़ राजा को डर समर्थकों के भीतर उस भीड़ से होता है जो धीरे धीरे उसका साथ छोड़ने लगती है. अंग्रेजी में इस भीड़ के भीतर भीड़ को ‘फ्लोटिंग वोट्स’ कहते हैं. दिल्ली में 3 साल के राज के बाद आज मोदी को असली खतरा समर्थकों के इसी फ्लोटिंग वोट्स से है. ये वो समर्थक हैं जो मोदी की जगाई उम्मीदों पर कभी चिरागों की तरह जले थे पर आज नाउम्मीदी के साये में बुझती लौ जैसे मायूस दिख रहे हैं. और इन मायूस समर्थकों के साथ ही ग्रहों का चक्र भी मोदी से कुछ यूं नाराज़ सा है कि पिछले दो महीनो से हर घटना सरकार के लिए अपयश लेकर आ रही है. वो चाहे गोरखपुर में बच्चों का असमय संसार छोड़ना हो या फिर एक के बाद रेल दुर्घटनाए. या बाबा राम रहीम का भाजपा के सरंक्षण में बेनकाब होना. या फिर बीजेपी और एबीवीपी की ताज़ा चुनावी पराजय. जिधर देखिये, हवा में एक नकारात्मक सी प्रतिक्रिया है.
    खाली बर्तनो की आवाज़ कब तक सुने, थाली में अब खाना चाहिए
    जिन राष्ट्रवादियों ने 16 मई 2014 को मोदी में पृथ्वीराज चौहान की छवि देखि थी या जिन्हे उस दिन मोदी में हेगडेवार का ध्वज दिखा था , आज वे उतने ही निराश है जितने मोदी के अधिकाँश मंत्री और पार्टी के नेता. निराशा का कारण मोदी की निरंकुशता या अभिमान नहीं है बल्कि सरकार का वो स्कोरबोर्ड है जहाँ 50 ओवर में 400 रन बनाने का संकल्प लिया गया था पर 30 ओवर के बाद भी स्कोर 150 का आंकड़ा पार नहीं कर सका है. सरकार का एक भी ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है जो पांच साल में पूरा होते हुए हो दिख रहा हो. मेक इन इंडिया का हाल ये है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कोई 500 करोड़ का भी निवेश करने को तैयार नहीं है. एयरटेल, आईडिया, एयर सेल और वोडाफोन जैसी भारी भरकम कंपनियों में छंटनी हो रही है. जीएसटी ने छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है. नोटबंदी से जो एक लाख करोड़ की आमदनी होनी थी वो 16 हज़ार करोड़ के घाटे में तब्दील हो गयी. नितिन गडकरी के कुछ प्रोजेक्ट छोड़ दे तो इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का बुरा हाल है. डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट उप इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट फाइलों पर ज्यादा ज़मीन पर कम दिख रहे हैं. और ये सारी चुनौतियाँ उस वक़्त मुँह बाये खड़ी हैं जब 20 ओवर भी नहीं बचे हैं.
    ये सच है कि मोदी ने राष्ट्रीयता को नई तरीके से परिभाषित किया है. लेकिन सच ये भी कि राष्ट्र सिर्फ नारों के बल पर कब तक आगे बढ़ेगा. अगर कॉर्पोरेट न्यूज़ चैनल के पेड सर्वे दरकिनार कर दिये जाएँ तो देश का असली मूड अब धीरे धीरे कुछ और ही संकेत देने लगा है. इस मूड को भांपने के लिए हमे किसी सर्वे की नहीं खुद को आंकने की ज़रुरत है. शायद दो- तीन साल के शुरुआती उत्साह के बाद आखिरकार हम और आप अब ये सोचने पर मज़बूर हुए हैं कि ….मेरे घर और आसपास आखिर बदला क्या है? हमने आखिर हासिल क्या किया है ? समाज या देश में वाकई क्या फर्क आया है ? क्या हम वाकई छलांग लगाकर आगे बढ़ गए ….क्यूंकि दीवार पर लिखे गए नारे तो कुछ यूँ ही बयां कर रहे थे ….कि विकास सबका होगा ..आगे सब बढ़ेंगे. लेकिन सच यही है कि आँखों के सामने सिर्फ एक चायवाले की चौंका देने वाली छलांग हमे अब तक नज़र आयी है.
    मोदी जी माओ बनिए
    छलांग माओ जैसी हो
    जिसने पूरे चीन को बदल दियाDeepak SharmaFORMER EDITOR at Aajtak News Channel

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