पुण्य प्रसून बाजपेयी

क्या प्रभाष जोशी होने के लिये रामनाथ गोयनका चाहिए?

मालवा के पठार की काली मिट्टी और लुटियन्स की दिल्ली के राजपथ की लाल बजरी के बीच प्रभाष जोशी की पत्रकारिता । ये प्रभाष जोशी का सफर नहीं है । ये पत्रकारिता की वह सुरंग है, जिसमें से निकलकर मौजूदा वक्त की पत्रकारिता को समझने के लिये कई आंखों, कई कान मिल सकते है तो कई सच, कई अनकही सियासत समझ में आ सकती है । और पत्रकारिता की इस सुरंग को वही ताड़ सकता है जो मौजूदा वक्त में पत्रकारिता कर रहा हो । जिसने प्रभाष जोशी को पत्रकारिता करते हुये देखा होऔर जिसके हाथ में रामबहादुर राय और सुरेश सर्मा के संपादन में लेखक रामाशंकर कुशवाहा की किताब “लोक का प्रभाष ” हो । यूं ” लोक का प्रभाष ” जीवनी है । प्रभाष जोशी की जीवनी । लेकिन ये पुस्तक जीवनी कम पत्रकारीय समझ पैदा करते हुये अभी के हालात को समझने की चाहे अनचाहे एक ऐसी जमीन दे देती है, जिस पर अभी प्रतिबंध है । प्रतिबंध का मतलब इमरजेन्सी नहीं है । लेकिन प्रतिबंध का मतलब प्रभाष जोशी की पत्रकारिता को सत्ता के लिये खतरनाक मानना तो है ही । और उस हालात में ना तो रामनाथ गोयनका है ना इंडियन एक्सप्रेस। और ना ही प्रभाष जोशी हैं। तो फिर बात कहीं से भी शुरु कि जा सकती है । बस शर्त इतनी है कि अतीत के पन्नों को पढ़ते वक्त मौजूदा सियासी धड़कन के साथ ना जोडें । नहीं तो प्रतिबंध लग जायेगा । तो टुकड़ों में समझें। रामनाथ गोयनका ने जब पास बैठे धीरुभाई अंबानी से ये सुना कि उनके एक हाथ में सोने की तो दूसरे हाथ में चांदी की चप्पल होती है । और किस चप्पल से किस अधिकारी को मारा जाये ये अधिकारी को ही तय करना है तो गोयनका समझ गये कि हर कोई बिकाऊ है, इसे मानकर धीरुभाई चल रहे हैं । और उस मीटिंग के बाद एक्सप्रेस में अरुण शौऱी की रिपोर्ट और जनसत्ता में प्रभाष जोशी का संपादकपन । नजर आयेगा कैसी पत्रकारिता की जरुरत तब हुई । अखबार सत्ता के खिलाफ तो खड़े होते रहे हैं । लेकिन अखबार विपक्ष की भूमिका में आ जाये ऐसा होता नहीं । लेकिन ऐसा हुआ । यूं “लोक का प्रभाष ” में कई संदर्भों के आसरे भी हालात नत्थी किये गये है।

मसलन वीपी सिंह से रामबहादुर राय के इंटरव्यू से बनी किताब “मंजिल से ज्यादा सफर” के अंश का जिक्र। किताब का सवाल – जवाब का जिक्र । सवाल-कहा जाता है हर सरकार से रिलायंस ने मनमाफिक काम करवा लिये। वाजपेयी सरकार तक से । जवाब-ऐसा होता रहा होगा । क्योंकि धीरुभाई ने चाणक्य सूत्र को आत्मसात कर लिया । राज करने की कोशिश कभी मत करो, राजा को खरीद लो।

तो क्या राजनीतिक शून्यता में पत्रकारिता राजनीति करती है । या फिर पत्रकारिता राजनीतिक शून्यता को भर देती है । ये दोनो सवाल हर दौर में उठ सकते है । और ऐसा नहीं है कि प्रभाष जोशी ने इसे ना समझा हो । पत्रकारिता कभी एक पत्रकार के आसरे नहीं मथी जा सकती । हां, चक्रव्यूह को हर कोई तोड़ नहीं पाता। और तोड कर हर कोई निकल भी नहीं पाता । तभी तो प्रभाष जोशी को लिखा रामनाथ गोयनका के उस पत्र से शुरुआत की जाये जो युद्द के लिये ललकारता है। जनसत्ता शुरु करने से पहले रामनाथ अगर गीता के अध्याय दो का 38 वां श्लोक का जिक्र अपने दो पेजी पत्र में करते हैं, जो उन्होंने प्रभाष जोशी को लिखा, ” जय पराजय, लाभ-हानी तथा सुख-दुख को समान मानकर युद्द के लिये तत्पर हो जाओ – इस सोच के साथ कि युद्द करने पर पाप के भागी नहीं बनोगे। ” और कल्पना कीजिये प्रभाष जोशी ने भी दो पेज के जवाबी पत्र में रामनाथ गोयनका को गीता के श्लोक से पत्र खत्म किया , ” समदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्दाय युज्यस्व नैंव पापमवायस्यसि ।।” और इसके बाद जनसत्ता की उड़ान जिसके सवा लाख प्रतियां छपने और खरीदे जाने पर लिखना पड़ा- बांच कर पढे । ना ना बांट कर पढ़ें का जिक्र था। लेकिन बांटना तो बांचने के ही समान होता है। यानी लिखा गया दीवारों के कान होते है लेकिन अखबारो को पंख । तो प्रभाष जोशी की पत्रकारीय उड़ान हवा में नहीं थी। कल्पना कीजिये राकेश कोहरवाल को इसलिये निकाला गया क्योंकि वह सीएम देवीलाल के साथ बिना दफ्तर की इजाजत लिये यात्रा पर निकल गये । और देवीलाल की खबरें भेजते रहें। तो देवीलाल ने भी रामनाथ गोयनका को चेताया कि खबर क्यों नहीं छपती । और जब यह सवाल रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जोशी से पूछा तो संपादक प्रभाष जोशी का जवाब था । देवीलाल खुद को मालिक संपादक मान रहे हैं। बस रिपोर्टर राकेश कोहरवाल की नौकरी चली गई। लेकिन रामभक्त पत्रकार हेमंत शर्मा की नौकरी नहीं गई। सिर्फ उन्हें रामभक्त का नाम मिला। और हेमंत शर्मा ” लोक का प्रभाष ” में उस दौर को याद कर कहने से नहीं चूकते कि प्रभाष जी ने रिपोर्टिंग की पूरी स्वतंत्रता दी । रिपोर्टर की रिपोर्ट के साथ खडे होने वाले संपादकों की कतार खासी लंबी हो सकती है । या आप सोचे अब तो कोई बचा नहीं तो रिपोर्टर भी कितने बचे हैं ये भी सोचना चाहिये । लेकिन प्रभाष जोशी असहमति के साथ रिपोर्टर के साथ खड़े होते। तो उस वक्त रामभक्त होना और जब खुद संपादक की भूमिका में हो तब प्रभाष जोशी की जगह रामभक्त संपादक हो जाना। ये कोई संदर्भ नहीं है । लेकिन ध्यान देने वाली बात जरुर है कि चाहे प्रभाष जोशी हो या सुरेन्द्र प्रताप सिंह । कतार वाकई लंबी है इनके साथ काम करते हुये आज भी इनके गुणगान करने वाले संपादको की । लेकिन उनमें कोई भी अंश क्यो अपने गुरु या कहे संपादक का आ नहीं पाया । यो सोचने की बात तो है । मेरे ख्याल से विश्लेषण संपादक रहे प्रभाष जोशी का होना चाहिये । विश्लेषण हर उस संपादक का होना चाहिये जो जनोन्मुखी पत्रकारिता करता रहा। आखिर क्यों उनकी हथेली तले से निकले पत्रकार रेंगते देखायी देते है। क्यों उनमें संघर्ष का माद्दा नहीं होता। क्यों वे आज भी प्रभाष जोशी या एसपी सिंह या राजेन्द्र माथुर को याद कर अपने कद में अपने संपादकों के नाम नत्थी करनाचाहते है। खुद की पहचान से वह खुद ही क्यों बचना चाहते है। रामबहादुरराय में वह क्षमता रही कि उन्होंने किसी को दबाया नहीं। हर लेखन को जगह दी। आज भी देते है। चाहे उनके खिलाफ भी कलम क्यों न चली। लेकिन राम बहादुर राय का कैनवास उनसे उन संपादकों से कहीं ज्यादा मांगता है जो रेग रहे है। ये इसलिये क्योंकि ये वाकई अपने आप में अविश्वसनिय सा लगता है कि जब प्रभाष जी ने एक्सप्रेस में बदली सत्ता के कामकाज से नाखुश हो कर जनसत्ता से छोड़ने का मन बनाया तो रामबहादुर राय ने ना सिर्फ मुंबई में विवेक गोयनका से बात की बल्कि 17 नवंबर 1975 को पहली बार अखबार के मालिक विवेक गोयनका को पत्र लिखकर कहा गया कि प्रभाष जोशी को रोके। बकायदा बनवारी से लेकर जवाहर लाल कौल । मंगलेश डबराल से लेकर रामबहादुर राय । कुमार आंनद से लेकर प्रताप सिंह। अंबरिश से लेकर राजेश जोशी । ज्योतिर्मय से लेकर राजेन्द्र धोड़पकर तक ने तमाम तर्क रखते हुये साफ लिखा । “हमें लगता है कि आपको प्रभाषजी को रोकने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये ।” जिन दो दर्जन पत्रकारों ने तब प्रभाष जोशी के लिये आवाज उठायी । वह सभी आज के तारिख में जिन्दा है । सभी की धारायें बंटी हुई है। आप कह सकते है कि प्रभाष जोशी की खासियत यही थी कि वह हर धारा को अपने साथ लेकर चलते। और यही मिजाज आज संपादकों की कतार से गायब है। क्योंकि संपादकों ने खुद को संपादक भी एक खास धारा के साथ जोड़कर बनाया है।
दरअसल, प्रभाष जोशी के जिन्दगी के सफर में आष्ठा यानी जन्मस्थान । सुनवानी महाकाल यानी जिन्दगी के प्रयोग । इंदौर यानी लेखन की पहचान । चडीगढ़ यानी संपादकत्व का निखार । दिल्ली यानी अखबार के जरीये संवाद । और इस दौर में गरीबी । मुफ्लिसी । सत्ता की दरिद्रगी । जनता का संघर्ष । सबकुछ प्रभाष जोशी ने जिया । और इसीलिये सत्ता से हमेशा सम्मानजनक दूरी बनाये रखते हुये उसी जमीन पर पत्रकारिता करते रहे जिसे कोई भी सत्ता में आने के बाद भूल जाता है । सत्ता का मतलब सिर्फ सियासी पद नहीं होता चुनाव में जीत नहीं होती । संपादक की भी अपनी सत्ता होती है । और रिपोर्टर की भी ।

लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद कोई भी चखने लगता है वैसे ही पत्रकारिता कैसे पीछे छूटती है इसका एहसास हो सकता है प्रभाष जोशी ने हर किसी को कराया हो । लेकिन खुद सत्ता के आसरे देश के राजनीतिक समाधान की दिशा में कई मौको पर प्रभाष जोशी इतने आगे बढे कि वह भी इस हकीकत को भूले कि राजनीति हर मौके पर मात देगी । अयोध्या आंदोलन उसमें सबसे अग्रणी कह सकते है । क्योंकि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस हुआ तो प्रभाष जोशी ये लिखने से नहीं चूके , ‘ राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसको ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रधुकुल की रिती पर कालिख पोत दी…… “। सवाल इस लेखन का नहीं सवाल है कि उस वक्त संघ के खिलाफ डंडा लेकर कूद पडे प्रभाष जोशी के डंडे को भी रामभक्तों ने अपनी पत्रकारिता से लेकर अपनी राजनीति का हथियार बनाया । कहीं ढाल तो कही तलवार । और प्रभाष जी की जीवनी पढ़ते वक्त कई पन्नो में आप ये सोच कर अटक जायेंगे कि क्या वाकई जो लिखा गया वही प्रभाष जोशी है।

लेकिन सोचिये मत । वक्त बदल रहा है । उस वक्त तो पत्रकार-साहित्यकारों की कतार थी । यार दोस्तो में भवानी प्रसाद मिश्र से लेकर कुमार गंधर्व तक का साथ था । लेखन की विधा को जीने वालो में रेणु से लेकर रधुवीर सहाय थे। वक्त को उर्जावान हर किसी ने बनाया हुआ था । कही विनोबा भावे अपनी सरलता से आंदोलन को भूदान की शक्ल दे देते । तो कही जेपी राजनीतिक डुगडुगी बजाकर सोने वालो को सचेत कर देते । अब तो वह बिहार भी सूना है । चार लाइन न्यूज चैनलों की पीटीसी तो छोड़ दें कोई अखबारी रपट भी दिखायी ना दी जिसने बिहार की खदबदाती जमीन को पकड़ा और बताय़ा कि आखिर क्यो कैसे पटना में भी लुटिसन्स का गलियारा बन गया । इस सन्नाटे को भेदने के लिये अब किसी नेता का इंतजार अगर पत्रकारिता कर रही है तो फिर ये विरासत को ढोते पत्रकारो का मर्सिया है । क्योकि बदलते हालात में प्रभाष जोशी की तरह सोचना भी ठीक नहीं कि गैलिलियो को फिर पढे और सोचे ” वह सबसे दूर जायेगा जिसे मालूम नहीं कि कहा जा रहा है ” । हा नौकरी की जगह पत्रकारिता कर लें चाहे घर के टूटे सोफे पर किसी गोयनका को बैठाने की हैसियत ना बन पाये । लेकिन पत्रकार होगा तो गोयनका भी पैदा हो जायेगा, ये मान कर चलें।

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3 thoughts on “क्या प्रभाष जोशी होने के लिये रामनाथ गोयनका चाहिए?

  1. सिकंदर हयात

    ” Sushobhit Singh Saktawat
    28 July at 19:35 ·
    इक़बाल का “जावेदनामा_________________________________________________अल्लामा इक़बाल ने सन् सत्ताइस में जब “जावेदनामा” लिखना शुरू किया था, तब तक भी हिंदुस्तान की साझा तहज़ीब उनके ज़ेहन पर छाई हुई थी, अलबत्ता वे उसके आख़िरी दिन ज़रूर थे!
    बाद उसके, “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” जैसा तराना रचने वाले अल्लामा का दिल मुसलमानों के लिए एक मुख़्तलिफ़ मुल्क की तख़लीक़ में बारे में सोचने लगा। ये इक़बाल ही थे, जिन्होंने जिन्ना को “मुस्ल‍िम लीग” का सरपरस्त बनने के लिए राज़ी किया था, और फिर उसके बाद जो हुआ, वो इतिहास के वरक़ों पर दर्ज है!
    लेकिन मैं यहां इक़बाल की क़ौमी सियासत के बारे में बात नहीं कर रहा, मैं यहां उस आलातरीन शाइर के बारे में बात कर रहा हूं, जो हिंदुस्तान की ज़मीन में ऐसे धंसा हुआ था, जैसे कोई बरगद का दरख़्त, जिसकी ना केवल जड़ें धरती में गड़ी हों, बल्कि जिसके जटा-जूट भी उसी धरती को छूने के लिए बढ़ रहे हों। और हिंदुस्तान ही क्यों, दुनिया-जहान के फ़लस्फ़ों में जिसकी शाख़ें लहराती हों, ख़ासतौर पर जर्मनी और इटली के क्लासिकी महाकाव्यों में, यहां मैं उस इक़बाल की बात करना चाहता हूं।
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    यही वो इक़बाल था, जिसने दान्ते की “डिवाइन कॉमेडी” की तर्ज पर सन् सत्ताइस में “जावेदनामा” लिखना शुरू किया और फिर अगले छह सालों तक वो फ़ारसी ज़बान में इस किताब को लिखता रहा।
    दान्ते की “डिवाइन कॉमेडी” एक ऐसी चेतना की यात्रा है, जो मृत्यु के उपरान्त “इनफ़र्नो”, “पर्गेतोरियो” और “पैरादिसो” से होकर गुज़रती है। जब इक़बाल ने “जावेदनामा” में अपना तसव्वुर एक ऐसी चेतना की तरह किया था, जो सात सितारों को लांघकर ख़ुदाई क़ायनात तक पहुंचती है, तो उसके ज़ेहन में यक़ीनन उस “शबे-मेराज़” की याद रही होगी, जब पैग़म्बर ने ख़ुदा का दीदार किया था।
    दान्ते ने जब “डिवाइन कॉमेडी” लिखी तो उसके सामने इतालवी महाकवि वर्जिल की मूरत थी।
    इक़बाल ने जब “जावेदनामा” लिक्खा तो उनकी नज़रों के सामने रौशन था रूमी का चेहरा!
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    इस क़ायनाती यात्रा में इक़बाल ने ख़ुद को “ज़िन्दा रूद” कहकर पुकारा है। “ज़िन्दा रूद” यानी चेतना की एक जीवंत धारा। इस “रूद” लफ़्ज़ का इस्तेमाल इक़बाल ने एक और जगह पर किया है। अपने उस नायाब इंक़लाबी तराने में : “ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! / वह दिन है याद तुझको? / उतरा तिरे किनारे / जब कारवाँ हमारा!” यानी “हे गंगा के जल की धारा / तुझे वह दिन याद है / जब तेरे तट पर हमारी यात्राओं का / अंत हुआ था!”
    क्या यहां पर इक़बाल आर्यों के गंगा के दोआब में आकर बसने की बात की ओर इशारा कर रहे हैं? मुझे नहीं मालूम!
    साहिर को दिल्लगी का शायर नहीं माना जाता है, लेकिन बाद में उन्होंने इक़बाल के इसी तराने के एक मिसरे को बदलकर यूं कर दिया था : “ज़ेबें हैं अपनी ख़ाली / वरना क्यों देता गाली / वो संतरी हमारा / वो पासबाँ हमारा! / चीनो अरब हमारा / हिंदोस्तां हमारा / रहने को घर नही है / सारा जहाँ हमारा!” साहिर ने यह तराना सन् सत्तावन में लिक्खा था। यहां पर नेहरूवादी युग के प्रति मोहभंग की तल्ख़ चेतना की तुलना इक़बाल के उस रौशन ख़याल जज़्बे से करें, जो उन्होंने सन् उन्नीस सौ चार में इतनी बुलंदी से बयां किया था : “यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा / सब मिट गए जहाँ से / अब तक मगर है बाक़ी / नाम-ओ-निशाँ हमारा!”
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    बहरहाल, अल्लामा इक़बाल के बेटे जावेद इक़बाल ने जब चार खंडों में अपने पिता की बायोग्राफ़ी लिक्खी, तो उसका शीर्षक उन्होंने “ज़िन्दा रूद” ही रक्खा।
    अल्लामा ने “जावेदनामा” लिक्खा, जावेद ने “ज़िन्दा रूद”। इस तरह वो एक सर्किल पूरा हुआ!
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    “जावेदनामा” में जहां एक तरफ़ ज़र्वान, सरोश, अह्रिमन, ज़रतुश्त, अबू जहल के अफ़साने हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसमें गौतम बुद्ध, भर्तृहरि, आम्रपाली और विश्वामित्र की भी कहानियां हैं। और विश्वामित्र को इक़बाल ने “जहान दोस्त” के नाम से पुकारा है। जैसा कि आप देख सकते हैं, फ़ारसी में उनके नाम का तर्जुमा करके!
    “जावेदनामा” में जो चैप्टर मुझे प्रिय है, वो वह “विश्वामित्र” वाला ही चैप्टर है!
    ये “विश्वामित्र” ही थे ना, जिनके नाम के साथ मेनका, कामधेनु, वशिष्ठ, श्रीराम और त्र‍िशंकु की किंवदंतियां जुड़ी हैं। और इन्हीं विश्वामित्र के नाम पर “ऋग्वेद” के दस मंडलों में से एक पूरा मंडल है, 62 सूक्तों का तृतीय मंडल, जिसमें “गायत्री मंत्र” भी सम्मिलित!
    “जावेदनामा” के “चंद्रमा का मंडल” प्रकरण में वह अध्याय है, जिसका तर्जुमा मोहम्मद शीस ख़ान ने इस शीर्षक से किया है : “चंद्रमा की एक गुफा में एकांतवादी हिंदुस्तानी ऋषि, जिसे लोग “जहान दोस्त” कहते हैं। और उस हिंदू ऋषि की नौ बातें।”
    “जावेदनामा” के अंत:स्तल में बसी “विश्वामित्र” की ये नौ सूक्त‍ियां काव्य के भीतर दर्शन का एक ज़िन्दा-जावेद नज़्ज़ारा पेश करती हैं!
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    मसलन, इस अध्याय के पहले ही बन्ध में आने वाली यह पंक्त‍ि देखिए :
    “ईश्वर को देखने के लिए यह संसार बाधा नहीं है। जल में बनने वाला प्रतिबिम्ब हमें उसमें छलांग लगाने से कैसे रोक सकता है!”
    अब आप इस एक जादुई कथन पर ही मुद्दतों तलक सोच सकते हैं!
    और इसके बाद तीसरे बन्ध में यह :
    “अज़ ख़ुदा दर इल्मे मर्ग अफ़्ज़ूंतरेम” यानी “मनुष्य ईश्वर से केवल एक ही चीज़ में आगे है और वह है मृत्यु के बोध में। ईश्वर इस बोध से सर्वथा वंचित है!”
    और इसके बाद सातवें बन्ध में यह ख़याल :
    “वो आंख अंधी है जो भूल-ग़लती को देखती है, क्योंकि रात को तो कहीं भी सूरज दिखाई नहीं देता।”
    मुझे नहीं मालूम, “विश्वामित्र” ने मूल में इन बातों को किस तरह से कहा था। अल्लामा ने “विश्वामित्र” के श्लोकों का तर्जुमा किया, या उनका भावार्थ गढ़ा, या एक नई ही तख़लीक़ उन्होंने “विश्वामित्र” को “जहान दोस्त” के नाम से पुकारकर रची, ये भी नहीं मालूम। अलबत्ता यह ज़रूर है कि वो पूरी तरह से सांयोगिक या “रैंडम” नहीं हो सकती, कोई ना कोई तो ख़याल का सिलसिला उसमें ज़रूर रहा होगा!
    ##
    इक़बाल का “जावेदनामा” जब अंग्रेज़ी में अनूदित होकर आया था, तो भारतीयता के प्रति आकृष्ट जर्मन उपन्यासकार हरमन हेस ने कहा था कि यह महाकाव्य “विश्वात्मा” के पांच अधिराज्यों हिंदुत्व, बौद्ध धर्म, ज़रतुश्त धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम की समेकित अभिव्यक्त‍ि है। बाद में इस किताब की तुलना फ़िरदौसी के “शाहनामा”, सादी की “गुलिस्तां”, हाफ़िज़ के “दीवान” और ख़ुद रूमी की “मसनवी” से की गई।
    लेकिन 1932 में यह किताब ख़त्म करते-करते एक दूसरे ही अल्लामा इक़बाल हमारे सामने थे, जो 29 दिसंबर 1930 को “ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” के इलाहाबाद अधिवेशन में मुसलमानों के लिए एक पृथक पाकिस्तान की मांग बुलंद कर चुके थे।
    “जावेदनामा” में दुनिया-जहान के फ़लस्फ़ों की जो एक लड़ी दिखाई देती है, उससे भी पहले “सारे जहां से अच्छा” में हिंदोस्तां की धरती पर इक़बाल का जो नाज़ दिखाई देता है, सहसा उस पर इस्लामिक अलगाववाद हावी हो गया था।
    ##
    1927 से 1930 के बीच इक़बाल के भीतर क्या बदलाव आया, शायद जानने वाले इसको बेहतर बता पाएं। और शायद, पाकिस्तान के इस राष्ट्रकवि के “जावेदनामा” और हिंदुस्तान की आज़ादी से पहले उसके द्वारा रचे गए उस बुलंद इक़बाली तराने का ज़िक्र ही उन अलगाववादी मंसूबों को कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दे, जो आज हिंदुस्तान की जड़ों में मट्ठा डालने पर आमादा हैं।
    हमारे पास चंद “शायद” और “काश” के सिवाय ज़्यादा कुछ यों भी होता नहीं है।
    आमीन!
    Sushobhit सक्तावत ” ———————- इकबाल का मिजाज अगर प्रेमचंद और हबीब जालिब वाला होता तो क्या आग लगाता इकबाल , लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ इस विषय पर लेख की कोशिश रहेगी

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  2. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    21 hrs ·
    किसी के पास पैसे हैं, मुझे सिर्फ शशि थरुर का पीछा करने के लिए चैनल खोलना है। नाम होगा थरूर का पीछा। इसके संपादक का नाम होगा, थरूर इन चीफ़। राजनीतिक संपादक का नाम होगा चीफ़ थरूर चेज़र। ब्यूरो चीफ का नाम होगा ग्राउंड थरूर चेज़र। रिपोर्टर का नाम होगा, ग्राउंड ज़ीरो थरूर चेज़र। कम से कम सौ ग्राउंड ज़ीरो थरूर चेज़र होंगे। जो संवाददाता बाथरूम में घुसकर शौच करते वक्त थरूर की बाइट ले आएगा उसे ज्यादा इंक्रिमेंट मिलेगा।
    लाखों शिक्षा मित्र, बीटीसी अभ्यर्थी, किसान, महँगे अस्पतालों के शिकार लोग ,थानों अदालतों से परेशान लोग इंतज़ार कर रहे हैं कि उनकी आवाज़ सरकार तक मीडिया पहुँचा दे। सरकार से पूछा जा सके कि कब ठीक होगा, क्यों हुआ ये सब। टीवी ने सबसे पहले और अब आपके हिन्दी अखबारों ने भी जनता के लिए अपना दरवाज़ा बंद कर दिया है। 2010 के साल से इसकी प्रक्रिया शुरू हुई थी जब मीडिया को सरकार ने ठेके देने शुरू कर दिए। अब यह शबाब पर है।
    मुझे हैरानी होती है कि आप अब भी मीडिया के लिए इतने पैसे खर्च कर रहे हैं। जबकि सारे चैनल आपकी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहे हैं। उन्हें पता है कि वो आपकी आदत में शामिल हो गए। आप जाएंगे कहां। और आप भी चैनल-चैनल बदलकर दिल बहला रहे हैं। ये चैनल वो चैनल की बात नहीं है दोस्तों। सब चैनल की बात है।
    ध्यान से सुनिये और लिखकर जेब में रख लीजिए। मुझे पता है कि मुझे इसका नुकसान उठाना पड़ेगा, पड़ भी रहा है फिर भी बोल देता हूं। ये टीवी ग़रीबी विरोधी तो है ही, लोकतंत्र विरोधी भी हो गया है। ये जनता की हत्या करवा रहा है। आपकी आवाज़ को आपकी देहरी पर ही दबा रहा है ताकि सत्ता और सरकार तक पहुंचे ही न। टीवी ने लोकतंत्र का मतलब ही बदल दिया है। जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए नहीं। नेता का, नेता के द्वारा और नेता के लिए हो गया है।
    भारत के लोकतंत्र से प्यार करते हैं तो अपने घरों से टीवी का कनेक्शन कटवा दीजिए। आज़ादी के सत्तर साल में गोदी मीडिया की गुलामी से मुक्त कर लीजिए ख़ुद को। आम जनता तरस रही है। वो सरकार तक खुद को पहुंचाना चाहती है ताकि उस ओर भी ध्यान जाए। टीवी के खेल को समझना अब सबके बस की बात नहीं है। हम लोग तो ग़म ए रोज़गार के लिए फंसे हैं यहां, आप तो नहीं फंसे हैं। आप क्यों अपना पैसा और वक्त बर्बाद कर रहे हैं। इसलिए कि फ्री डिश में कुछ भी आता है। बताने के भी जोखिम हैं पर बता दे रहा हूं।
    इस पोस्ट पर अनाप शनाप कमेंट कर देने से कुछ नहीं होने वाला है। कस्बा पर 2007 से इस प्रक्रिया पर लिख रहा हूं। आप जो चाहें कमेंट कर लें, मगर जो लिखा है वही मीडिया का सत्य है। बाकी आप फैसला करते रहें।Ravish Kumar——————-Krishna Kant
    Yesterday at 08:00 ·
    मुख्तार अब्बास नकवी को अपना नाम बदलकर महामना अम्बा चक्रवर्ती रख लेना चाहिए। उनका अभी का नाम उर्दू में है। उर्दू मुगलों की भाषा है। मुगल संघियों के काल्पनिक दुश्मन हैं। संघी राष्ट्रवादी हैं। राष्ट्रवाद हिन्दू है। हिन्दू राष्ट्रवाद हिन्दू धर्म का राजनीतिक संस्करण है जो मुस्लिमों से घृणा का पर्याय है। मुस्लिम संघियों के काल्पनिक दुश्मन हैं जो हिंदुओं को मूर्ख बनाने के काम आते हैं। दुश्मनों की निशानी मिटा देनी चाहिए। इसलिए मुख्तार अब्बास नकवी को पहले अपना बदल देना चाहिए। यह तर्क नक़वी के संसद में दिए बयान से प्रेरित है। इसका विरोध करने वाले हिन्दू राष्ट्रवाद के विरोधी हैं। मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने के विरोध पर नक़वी संसद में कह रहे हैं कि मुगलसराय स्टेशन में मुगल शब्द जुड़ा है। इनको मुगलों का नाम चाहिए, राष्ट्रवादियों का नाम नहीं चाहिए। नक़वी सबसे पहले अपना नाम क्यों नहीं बदलते? एक और सलाह है। नक़वी को आज ही संसद में प्रस्ताव रखना चाहिए कि लाल किले का नाम बदल दिया जाए। लाल किले से उर्दू टाइप देशद्रोही फील आता है। किला मुगलों का होता था। संघियों की तो शाखा होती है। लाल किले का नाम रक्तशाखा होना चाहिए।—————-Awesh Tiwari
    20 hrs ·
    यह उस वक्त की बात है जब राहुल गांधी ने राजनीति समझनी शुरू कर दी थी.छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने को थे, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी हमेशा की तरह अपने बेटे और अपने करीबियों को टिकट दिलाने के लिए जोड़ तोड़ में लगे थे, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, केन्द्रीय मंत्रियों के साथ मिलकर संभावित विधानसभा उम्मीदवारों की सूची बना रहे थे उधर अजीत जोगी के नार्थ एवेन्यू स्थित बंगला न -87 में अलग सूची बन रही थी. जोगी के जोड़ तोड़ से नाखुश राहुल गांधी ने उनसे मिलने से साफ़ तौर पर इनकार कर दिया. लेकिन सोनिया को पता था कि अजीत जोगी मेरे पति के मित्र है वो अजीत जोगी से मिली और उनसे कहा सबको साथ लेकर चलिए. खैर जोगी बड़े तीरंताज ठहरे और सोनिया से कह दिया मेरे सारे उम्मीदवार जिताऊ हैं. सोनिया ने राहुल से कहा कि जोगी की बात रख लो. न चाहने के बावजूद राहुल ने पार्टी के नेताओं को जोगी के घर भेजा. शाम को पार्टी हुई फिर जैसा जोगी ने चाहा उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी गई ,चुनाव हुए और कांग्रेस फिर पराजित हो गई. उस दिन एक घटना और घटी थी. जब सोनिया से जोगी मिले थे शाम को राहुल के घर पर भी एक बैठक हुई थी. राहुल इस जोड़ तोड़ से मर्माहत थे,खैर बारिश तेज थी जोगी चलने में असमर्थ अपने व्हील चेयर पर. बैठक के बाद जब सब राहुल के घर से निकले. राहुल गान्धी ने जोगी के सिर पर खुद छाता तान दिया और उन्हें गाडी तक छोड़ कर वापस आ गए.-Awesh Tiwari——————-Awesh Tiwari
    Yesterday at 01:25 ·
    उसने पहले अपनी दादी को खोया, फिर अपने पिता को खोया, फिर जब इस देश की सत्ता उसकी माँ को मिल सकती थी। उसने माँ से कहा यह ताकत भी हमे अपने पास नही रखनी चाहिए। वो राजनीति सीखने की कोशिश कर रहा था , आज भी करता है। एक बार जीतता है 10 बार हारता है मगर वो लड़ता है। उसने विवाह नही किया ,अपनी माँ के गलत निर्णयों का विरोध करता रहा, पार्टी में अपने पिता के मित्रों का मान रखने के लिए कुरबनियाँ देता रहा ,इसलिए वो पप्पू है। वो इसलिए पप्पू है कि वो किसानों युवाओं की लड़ाई में अपने थके हुए कंधों के साथ खड़ा हो जाता है,वो खुद देश का पीएम हो सकता था, मगर उसे लगा कि अभी पहले देश को जान लूँ ,इसलिए वो पप्पू है। जिन्होंने पूरे देश की जनता को कभी 56 इंच का सीना दिखाकर तो कभी पाकिस्तान,कभी इस्लाम,कभी काले धन का खौफ दिखाकर ठगा वो सब साहेब हो गए। राहुल को बोलने का हक सिर्फ उसको है जिन्होंने कुर्बानियां दी है। कांग्रेस में एक हजार बुराइयां हो सकती है वो भाजपा से पतित पार्टी हो सकती है। लेकिन यह मानने में कोई ऐतराज नही होना चाहिए कि राहुल सही मायनों में इस देश के युवाओं का प्रतिनिधि चेहरा हैं। क्या सोचते हो वो सपने में अपनी दादी, अपने पिता को नही देखता होगा? क्या उसने अपनी विधवा माँ को छिपकर अकेले में सुबकते न देखा होगा? पहले उसकी जगह खड़े होकर अपने परिवार, अपने मोहल्ले अपने देश को महसूस करो। फिर तय करना कि पत्थर मारना है कि पप्पू कहना है।————————————–Girish Malviya
    4 August at 09:01 ·
    हम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सिर्फ इसीलिए इग्नोर नही कर सकते कि वह कांग्रेस से है वह विश्व के जाने माने अर्थशास्त्री भी है इसलिए वह जो कह रहे हैं उसे हमे ध्यान से सुनना चाहिए
    पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था सिर्फ सरकारी खर्च पर चल रही है और निजी क्षेत्र का निवेश पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि देश में नौकरियों के अवसर बहुत तेजी से घट गए हैं। निर्माण क्षेत्र में रेाजगार के सबसे ज्यादा अवसर थे लेकिन वह पूरी तरह से संकट के दौर से गुजर रही है। उन्होंने कहा कि कुल मूल्य संवद्र्धन (जीवीए) की दर में भी गिरावट आई है। जीवीए की दर मार्च 2016 के 10.3 प्रतिशत से गिरकर इस साल मार्च में महज 3.8 प्रतिशत रह गयी है। उन्होंने कहा कि यह गिरावट करीब सात प्रतिशत की है और यह बहुत शोचनीय स्थिति है
    मशहूर विचारक पी साईनाथ ने कहा कि किसान अपने ही खेतों में मज़दूर की तरह हो गए हैं जो कॉर्पोरेट के फ़ायदे के लिए काम कर रहे हैं. साईनाथ ने यह भी कहा, “कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बनाया जा रहा है ताकि किसान खेतीबाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए.”आप दसियों लाख किसानों को दिए चालीस हज़ार करोड़ क़र्ज़ की चिंता करते हैं जबकि अकेले अडानी को अरबों डॉलर का क़र्ज़ दे देते हैं’
    आप कहेंगे कि ऐसी यदि ऐसी स्थिति है तो हमे कुछ पता क्यो नही चल रहा है …………….एक बड़ा ही इंटरस्टिंग आलेख मिंट के सम्पादक आर सुकुमार ने लिखा था , आर सुकुमार ने जीएसटी, रियल इस्टेट कानून और नोटबंदी जैसी चीजों को आर्थिक गति की रफ्तार की धीमी करने वाला बताया है लेख में फार्मा क्षेत्र में गिरावट ओर ऊर्जा क्षेत्र में विकास की रफ्तार थमने की बात भी की गयी हैं विशेषकर गैर परंपरागत ऊर्जा के बढ़ावे के साथ कोयला से उत्पादित ऊर्जा को तवज्जो नहीं देने की बात भी की गयी है
    लेकिन उस लेख से दिलचस्प मुझे उसका टाइटिल लगा ‘If things are so good, why do we feel so bad?’
    एक तरह का परसेप्शन लोगो के दिमाग मे बड़ी खूबसूरती से बैठाया जा रहा है सब कुछ बहुत बढ़िया होता जा रहा है, लेकिन स्थितियां तेजी से बिगड़ रही हैं, ओर जितनी बिगड़ रही है यह परसेप्शन अपना काम उतनी ही तेजी से करता जा रहा है, एक महीने में ही मोदी जी मन की बात में बताने लगे कि जीएसटी के सकारात्मक प्रभाव पड़ने लगे हैं, अखबार में फेंक न्यूज़ छाप दी जाती है कि भारत की सरकार सबसे भरोसेमंद सरकार है, यह उदाहरण है IF THINGS ARE SO GOOD के ओर ऊपर के उदाहरण WHY DO WE FEEL SO BAD के है————Girish Malviya
    2 August at 09:05 ·
    प्यारे अरविंद…………… तुम जहाँ कहीं भी हो फ़ौरन चले आओ तुम्हे कोई कुछ भी नही कहेगा, तुम्हारे बिना यह कोलम्बिया यूनिवर्सिटी सूनी सूनी लगती है,
    भारत की धरती तो साधु संत फकीरों की धरती है कहाँ फ़क़ीर की बात में आकर नीति आयोग के उपाध्यक्ष बन गए, फ़क़ीर का क्या है वह तो कभी भी झोला उठाकर चल देंगे, नोटबन्दी हो गयी हैं GST भी लग गयी हैं, काम धंधे की तो वाट लग गयी हैं अब बस आर्थिक मंदी की कुछ दिनों में घोषणा होने ही वाली हैं, बेहतर यही होगा कि तुम वापस आओ
    राजन भी वापस आकर मास्टर बन गया था, सुना है मुकुल ने भी अपना पद छोड़ दिया है, अब तुम्हारी बारी हैं, ये गाय गाय करने वालो के साथ रहे तो तुम्हारी बुद्धि भी गोबर हो जाएगी,………
    हमे डर है कि तुम अर्थशास्त्र पढ़ाने के बजाय अथर्ववेद न पढ़ाने लग जाओ, वैसे संघी लोगो के साथ तुमने तीन साल निकाल लिए ओर क्या भगवान से मिलोगे, तुम जानते ही नही हो कि गोमूत्र ओर गोबर में चमत्कारी शक्तियां होती है, भारत मे नीति आयोग वही चला सकता है जो यह सब जानता हो, इसलिये जितना जल्दी हो वापस लौट आओ सुना है मोब लिंचीग की घटनाएं भी भारत मे बढ़ती जा रही हैं
    तुम्हारा शुभेच्छु
    कुलपति, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी——————————Nitin Thakur
    18 hrs ·
    एक साल पहले कॉल ड्रॉप होने पर रविशंकर प्रसाद ने फोन कंपनियों पर सख्त दिखने की ड्रामेबाज़ी की थी. कॉल ड्रॉप होने पर ग्राहक को पैसा लौटाने का नियम लाकर कंपनियों पर दबाव बनाने की कोशिश हुई. अरबों-खरबों वाली कंपनी ने बड़बोले प्रसाद जी को ऐसी डोज़ दिलवाई कि अब तक सन्नाटे में घूम रहे हैं. मुझे नहीं मालूम कि आपमें से कितने लोगों को कॉल ड्रॉप होने के बाद रिफंड आया होगा पर टेलीकॉम मिनिस्टर की हैसियत और बूता उसी दिन स्पष्ट हो गया था जब ट्राई के सामने कंपनियां एक हो कर अड़ गई थीं. इंटरनेट के नाम पर ग्राहकों को गंजा करते वोडाफोन वाले, हाई स्पीड के नाम पर औसत स्पीड का नैट बेचनेवाला एयरटेल, ऊल जलूल बिल बनानेवाले दूसरे टेलीफोन बनिए ना इस मंत्री से डरते हैं और ना सरकारों से. इनके पास बहुत पैसा है और हिंदुस्तान लाख प्रयासों के बावजूद अभी तक ऐसा देश नहीं बन सका कि पैसेवाले का आप कुछ खास बिगाड़ पाएं.

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  3. सिकंदर हयात

    Deepak Sharma
    21 hrs · FORMER EDITOR at Aajtak News Channel
    अमित शाह के बेटे पर खोज खबर छापने के बाद ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, आज देश के सबसे बड़े सम्पादक माने जा रहे हैं । देश में श्रेष्ठतम सम्पादकों की कोई वरीयता सूची ना होने पर, सिद्धार्थ ने मोदी के खिलाफ ताबड़तोड़ ख़बरें छाप कर टॉप संपादक होने का परसेप्शन तो बना लिया है।
    लेकिन सच ये भी है कि उनकी सम्पादकीय श्रेष्ठता की झलक हमे उनके लम्बे करियर के उन्ही वर्षों में दिखी जब सत्ता के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी जैसे हार्डकोर हिंदुत्व छवि वाले प्रधानमंत्री हैं. और सच ये भी है कि सिद्धार्थ ने वायर जैसी वैकल्पिक पत्रकारिता मोदी काल में ही शुरू की। कांग्रेस के राज में उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिन्दू जैसे कॉर्पोरेट घराने रास आ रहे थे. इसलिए सच ये भी है कि जो आक्रमक पत्रकारिता सिद्धार्थ की टीम आज कर रही है वो उनकी सोच और राजनैतिक विचारधारा के बिलकुल अनुकूल है. यानि सिद्धार्थ और उनके लेफ्ट के साथी कोई तय करके अचानक भगत सिंह या आज़ाद नहीं बने हैं बल्कि देश में जिस विचारधारा की आज सरकार है उसका बैंड बजाना इस टीम को पॉलिटिकली सूट करता है.
    बहरहाल जब कुछ बड़ी ख़बरें करके ‘वायर’ की शोहरत बढ़ने लगी तो सिद्धार्थ साहब सार्वजनिक मंच पर ये कहने भी लगे कि कॉर्पोरेट मीडिया ने पत्रकारिता का बेडा गर्क किया है और अब ‘वायर’ ही इस देश की जनता को सच बता सकता है। इसलिए वो जनता से चंदा मांग रहे हैं और वायर को आर्थिक तौर पर और मज़बूत करना चाहते हैं.
    भले ही सिद्धार्थ एक जबरदस्त सम्पादक दिख रहे हैं लेकिन भविष्य में उनकी सम्पादकीय श्रेष्ठता हर कसौटी पर खरी उतरती है ये लेकर संशय है. संशय इसलिए है क्यूंकि पत्रकारिता अजेंडा पर आधारित है जो आज के वक़्त तो एंटी-इस्टैब्लिशमेंट है पर अगर आगे चलकर मोदी सरकार बदल गयी तो सिद्धार्थ साहब का अजेंडा भी बदल सकता है . . और मुमकिन है तहलका की तरह सिद्धार्थ के ‘द वायर’ को वर्तमान सरकार से और उलझना पड़े। उन पर मानहानि के कई मुक़दमे अभी और दर्ज़ हों । लेकिन तरुण तेजपाल की तरह सिद्धार्थ की पत्रकारिता एजेंडा से मुक्त नहीं है । 2019 में अगर मोदी सरकार बदली तो तरुण तेजपाल की तरह सिद्धार्थ के सुर भी बदल सकते हैं ।
    मित्रों, अरुण शौरी से लेकर सिद्धार्थ वरदराजन या रामनाथ गोयनका से लेकर प्रभाष जोशी तक हमने एक ‘एडिटर बॉस’ को हमेशा आंकलन से दूर रखा । हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी को किस पत्रिका ने सबसे पहले घेरा था ? हर्षद मेहता काण्ड से लेकर चारा घोटाले तक सबसे बड़े खुलासे किस पत्रिका ने किये थे ? न जाने कितने ऐसे हफ्ते थे जब इस पत्रिका की कोई न कोई कवर स्टोरी देश को भीतर तक झकझोर जाती थी । शायद ऐसा कोई देश का बड़ा पत्रकार न होगा जिसने इस पत्रिका के लिए काम न किया होगा । यही पत्रिका यानि इंडिया टुडे जब अपना चैनल आजतक लेकर आयी तो शुरुआती वर्षों में देश की पत्रकारिता नए तरीके से परिभाषित हुई । धारदार रिपोर्टिंग के लिए बीबीसी ने इसे देश का सबसे बड़ा पब्लिक ब्रांड कहा। मुझे याद है संसद के कई बड़े नेताओं का सवालों पर रिश्वत लेने का जब आजतक पर खुलासा हुआ तो प्रधानमंत्री से लेकर संसद के स्पीकर तक के होश उड़ गए । सर्वदलीय बैठक के बाद दर्ज़न भर सांसदों से स्पीकर को इस्तीफ़ा लेना पड़ा । कुछ ही दिन बाद जब कारगिल के कफ़न काण्ड का खुलासा हुआ तो पहली बार अटलजी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया । उसके बाद तो आजतक में जैसे झड़ी लग हो गयी खुलासों की । आजतक की आक्रामकता का आलम ये था कि पीएम या सीएम नहीं सिर्फ चैनल के नाम से पुलिस और नौकरशाही डरने लगी थी।
    अमूमन नौकरी छोड़ने के बाद या दूसरी नौकरी पा लेने के बाद पत्रकार पुराने सम्पादकों या मालिकों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते. लेकिन मेरा मानना है कि मेरे पुराने चीफ एडिटर यानी अरुण पुरी से बड़ा संपादक इस देश में अबतक नहीं हुआ है । मैंने कई बड़े सम्पादकों के साथ काम किया लेकिन अरुण पुरी के करीब भी मुझे कोई नहीं दिख । बहुत कम लोग जानते होंगे कि पुरी, दून स्कूल में राजीव गाँधी के साथ थे लेकिन जब एमर्जेन्सी लगी तो उनकी पत्रिका ने कांग्रेस के बखिये उधेड़ दिए । अरुण शौरी जैसे पत्रकार को पुरी साहब ने ब्रेक दिया । रघु रॉय जैसे फ़ोटोग्राफ़र भी इंडिया टुडे की देन हैं। सरकार चाहे नरसिम्हा राउ की हो या फिर वीपी सिंह की, इंडिया टुडे ने नाकों चने सबको चबवाये । इंडिया टुडे की वीडियो मैगज़ीन न्यूज़ ट्रैक ने १९९० में जिस दिन मंडल विरोध में छात्र नेता राजीव गोस्वामी के जलते हुए जिस्म की तस्वीरें रिलीज़ कीं थीं उसी दिन वीपी सिंह के सत्ता से बाहर होने का रास्ता साफ़ हो चुका था । दरअसल अरुण पुरी बड़ी ख़बरों के मुरीद रहे हैं। खबर तथ्य परक हो तो कभी रोकी नहीं जा सकती । हाँ आपको सामने वाले का कथन रिकॉर्ड करना होगा। सलमान खुर्शीद की खबर पर शायद वो उतने ही उत्सक थे जितना मै था। इसलिए मुकदमे तो हुए लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं थी । सच तो ये है कि मैं क्या कोई भी आजतक में १०-१५ साल काम करने के बाद भी ये नहीं समझ सका कि अरुण पूरी या ग्रुप की विचारधारा क्या है ? एक बार मुलायम सिंह यादव सरकार के आवास घोटाले पर आजतक में बड़ी खबर हुई. मुलायम की सेक्रेटरी अनीता सिंह का नाम आने से मुलायम इतना तिलमिलाए थे कि आजतक की खबर के खिलाफ उन्होंने लखनऊ के सारे अख़बारों के पहले पेज पर खंडन छपवा दिया। मुझे लगा कि मेरे सहयोगी धीरेन्द्र पुंडीर जिन्होंने खबर की थी …..कहीं उनकी नौकरी न चली जाए क्यूंकि अमर सिंह के मित्र प्रभु चावला ने पुंडीर के खिलाफ कई बेबुनियाद आरोप लगाए. लेकिन दिन भर की हंगामी बैठक के बाद पुरी साहब ने पुंडीर का पक्ष लिया. हमारी जीत हुई और चावला साहब और अमर सिंह ढेर हुए। बाद में अमर सिंह विवाद को लेकर पुरी साहब ने चावला को चलता कर दिया और पुंडीर को प्रमोशन मिला। ऐसी दिलेरी और हिम्मत आपको आज के दौर के मालिक सम्पादकों में देखने को नहीं मिलेगी. इस श्रेणी में आम जैसे पिलपिले प्रणोय रॉय या ठेकेदार टाइप सुभाष चंद्रा किसी भी स्तर पर पुरी साहब के नज़दीक नहीं ठहरते।
    बहरहाल बात ज्यादा लम्बी की नहीं जा सकती । आज भी आजतक बाकि कई चैनलों से बेहतर है। आजतक में जो शिथिलता है उसका एक कारण ये है कि पूरी साहब पिछले कई बरसों से रिटायर होना चाहते हैं। शायद ७३ वर्ष की उम्र में लगातार १५-१६ घंटे काम करके इतने बड़े मीडिया ग्रुप को चलाना शारीरिक स्तर पर एक कठिन चुनौती है । काश अरुण पुरी, इस लीजेंड मीडिया हाउस को कोई दूसरा अरूण दे सकें। ऐसा नहीं हुआ तो देश में सिद्धार्थ वरदराजन जैसे विचारधारा आधारित संपादक ही सर्वश्रेष्ठ कह लाएँगे। और हाँ सम्पादक डेढ़-दो साल में नही बनते । सम्पादकीय कार्यकाल की एक लम्बीउम्र, एक बड़े सम्पादक की साख को गढ़ती है। मोदी सरकार में अरुण पूरी की साख और संतुलन को ज़ाहिर करने के लिए चैनल के सिर्फ़ दो चेहरे ही पर्याप्त हैं । पुण्य प्रसून बाजपेई और राजदीप सरदेसाई। क्या इन्हें विनीत जैन या सुभाष चंद्रा आज नौकरी दे सकते हैं ?
    निसंदेह, मोदी की आर्थिक नीतियों के बढ़ते विरोध में वरदराजन एक लहर की उफान है जो २०१९ के सत्ता परिवर्तन के बाद थम भी सकते है । लेकिन पिछले चार दशकों से पुरी का सम्पादन किसी आसमान की ऊँचायी से कम नही है।Deepak Sharma——————————————————–Vikram Singh Chauhan
    17 August ·
    अरुण पुरी ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव’ में सिर्फ कुर्सी पर बिठाने के लिए रमन सिंह से एडवांस में 45 लाख रुपया ले लिया था। वह अरुण पूरी अगर मोदी को आज अपने सर्वे में 298 सीट दे रहा है तो इसके लिए करोड़ों का डील हुआ होगा। अरुण पुरी बिना एडवांस लिए काम नहीं करता। उसने लोकप्रियता में इंदिरा से मोदी को 16 प्रतिशत आगे बताने के लिए भी अलग चार्ज किया होगा। नेहरू से चार गुना बेहतर प्रधानमंत्री बताने के लिए भी अरुण पुरी ने करोड़ों लिया होगा। कुलमिलाकर यह डील करोड़ों की रही है। गाय ,बीफ ,दलित हत्या और गोरखपुर के बाद मोदी को एक ब्रांडिग की जरूरत थी। इसके लिए आज तक से बेहतर चैनल कोई नहीं हो सकता। अगर यही काम ज़ी न्यूज़ या इंडिया टीवी को देते तो मोदी के ऊपर सीधा आरोप लगता ,मोदी का चैनल है। लेकिन चालाकी से ”आज तक” खुद को निष्पक्ष घोषित कर रखा है। और इसको वह कैश भी करवाता है।
    अब आप आप दुनिया की सबसे विश्वसनीय जाँच एजेंसी एफबीआई को इस काम पर लगा दीजिये कि सर्वे के लिए आज तक और इंडिया टुडे देश में किन राज्यों में गए ,कितने लोगों से मिले ,उन लोगों के नाम और फोटो /वीडियो सामने लाये। एफबीआई अपना माथा पीट लेगी पर ऐसा कोई व्यक्ति को सामने नहीं ला पायेगा। आएगा भी कैसा जब उनसे ये मिलेंगे तब। यह पूरा सर्वे का खाका इंडिया टुडे समूह और भाजपा के रणनीतिकारों ने एक टेबल पर बैठकर तैयार किया है। दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ चार लोगों से पूछ लिए होंगे,उनका पीछा करेंगे तो पता चलेगा ये भी इसी ग्रुप के लोग है।
    आप बस देखते जाइये और 2019 की कल्पना कीजिये। यही चैनल यह बोलने लगेंगे कि मोदी तो निर्विरोध प्रधानमंत्री बनने जा रहे है। मोदी को श्रीराम का अवतार भी बताया जा सकता है। अमित शाह को हनुमान बताया जा सकता है। आपने कल्पना भी नहीं किया होगा वह सब होगा 2019 में। यह भारत देश की मीडिया है जनाब।-Vikram Singh Chauhan

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