क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

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by हरिगोविंद विश्वकर्मा

राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की कथित सेक्स लाइफ़ पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. लंदन के प्रतिष्ठित अख़बार “द टाइम्स” के मुताबिक गांधी को कभी भगवान की तरह पूजने वाली 82 वर्षीया गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा ने कहा है कि गांधी को सेक्स की बुरी लत थी, वह आश्रम की कई महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोते थे, वह इतने ज़्यादा कामुक थे कि ब्रम्हचर्य के प्रयोग और संयम परखने के बहाने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोने लगे थे. ये आरोप बेहद सनसनीख़ेज़ हैं क्योंकि किशोरावस्था में कुसुम भी गांधी की अनुयायी रही हैं. कुसुम, दरअसल, लंदन में पार्लियामेंट स्क्वॉयर पर गांधी की प्रतिमा लगाने का विरोध कर रही हैं. बहरहाल, दुनिया भर में कुसुम के इंटरव्यू छप रहे हैं.

वैसे तो महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ़ पर अब तक अनेक किताबें लिखी जा चुकी हैं. जो ख़ासी चर्चित भी हुई हैं. मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जेड ऐडम्स ने पंद्रह साल के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में “गांधी नैकेड ऐंबिशन” लिखकर सनसनी फैला दी थी. किताब में गांधी को असामान्य सेक्स बीहैवियर वाला अर्द्ध-दमित सेक्स-मैनियॉक कहा गया है. किताब राष्ट्रपिता के जीवन में आई लड़कियों के साथ उनके आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डालती है. मसलन, गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे.

देश के सबसे प्रतिष्ठित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गहन अध्ययन और गांधी से जुड़े दस्तावेज़ों के रिसर्च के बाद 2006 में “ब्रम्हचर्य गांधी ऐंड हिज़ वीमेन असोसिएट्स” में डेढ़ दर्जन महिलाओं का ब्यौरा दिया है जो ब्रम्हचर्य में सहयोगी थीं और गांधी के साथ निर्वस्त्र सोती-नहाती और उन्हें मसाज़ करती थीं. इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नायर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृतकौर, बीवी अमुतुसलाम, लीलावती आसर, प्रेमाबहन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं. प्रभावती ने तो आश्रम में रहने के लिए पति जेपी को ही छोड़ दिया था. इससे जेपी का गांधी से ख़ासा विवाद हो गया था.

तक़रीबन दो दशक तक महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे निर्मल कुमार बोस ने अपनी बेहद चर्चित किताब “माई डेज़ विद गांधी” में राष्ट्रपिता का अपना संयम परखने के लिए आश्रम की महिलाओं के साथ निर्वस्त्र होकर सोने और मसाज़ करवाने का ज़िक्र किया है. निर्मल बोस ने नोआखली की एक ख़ास घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है, “एक दिन सुबह-सुबह जब मैं गांधी के शयन कक्ष में पहुंचा तो देख रहा हूं, सुशीला नायर रो रही हैं और महात्मा दीवार में अपना सिर पटक रहे हैं.” उसके बाद बोस गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध करने लगे. जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी तो बोस ने अपने आप को उनसे अलग कर लिया.

ऐडम्स का दावा है कि लंदन में क़ानून पढ़े गांधी की इमैज ऐसा नेता की थी जो सहजता से महिला अनुयायियों को वशीभूत कर लेता था. आमतौर पर लोगों के लिए ऐसा आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था. आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन था कि गांधी की इमैज 20 वीं सदी के धर्मवादी नेता जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश जैसी बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स-अपील से अनुयायियों को वश में कर लेते थे. ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे. इतिहास के तमाम अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और अपनी इच्छा दमित करने के लिए ही कठोर परिश्रम का अनोखा तरीक़ा अपनाया. ऐडम्स के मुताबिक जब बंगाल के नोआखली में दंगे हो रहे थे तक गांधी ने मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम मेरे साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते. आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें.”

किताब में महाराष्ट्र के पंचगनी में ब्रह्मचर्य के प्रयोग का भी वर्णन है, जहां गांधी के साथ सुशीला नायर नहाती और सोती थीं. ऐडम्स के मुताबिक गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला मेरे सामने निर्वस्त्र होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं. मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता. मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है. मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ़ अंतःवस्त्र पहनी होती है.” दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नंगे सोने की बात फैलने लगी तो नथुराम गोड्से के नेतृत्व में वहां विरोध प्रदर्शन होने लगा. इससे गांधी को प्रयोग बंद कर वहां से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा. बाद में गांधी हत्याकांड की सुनवाई के दौरान गोड्से के विरोध प्रदर्शन को गांधी की हत्या की कई कोशिशों में से एक माना गया.

ऐडम्स का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा गोल-मटोल और अस्पष्ट बाते करती रहीं. उनसे जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह सब ब्रम्हचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था. गांधी की हत्या के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर भी लीपापोती की जाती रही. उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी, दरअसल, सेक्स-मैनियॉक थे. कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी के सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच छुपाती रही है. गांधी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सख़्त हिदायत दी गई. उसे गुजरात में एक बेहद रिमोट इलाक़े में भेज दिया गया. सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप्पी साधे रही. सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग में शामिल क़रीब-क़रीब सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन नष्ट हो गया.

ब्रिटिश इतिहासकार के मुताबिक गांधी के ब्रह्मचर्य के चलते जवाहरलाल नेहरू उनको अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानते थे. सरदार पटेल और जेबी कृपलानी ने उनके व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली थी. गिरिजा कुमार के मुताबिक पटेल गांधी के ब्रम्हचर्य को अधर्म कहने लगे थे. यहां तक कि पुत्र देवदास गांधी समेत परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी ख़फ़ा थे. बीआर अंबेडकर, विनोबा भावे, डीबी केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरीलाल मश्रुवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आरपी परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध कर रहे थे.

गांधी की सेक्स लाइफ़ पर लिखने वालों के मुताबिक सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे. नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे. रवींद्रनाथ टैगोर की भतीजी विद्वान और ख़ूबसूरत सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध तो जगज़ाहिर है. हालांकि, गांधी यही कहते रहे कि सरला उनकी महज “आध्यात्मिक पत्नी” हैं. गांधी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को भी भावुक प्रेमपत्र लिखते थे. इस्टर जब आश्रम में आती तो वहां की बाकी महिलाओं को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे. किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया.

दरअसल, ब्रिटिश चांसलर जॉर्ज ओसबॉर्न और पूर्व विदेश सचिव विलियम हेग ने पिछले महीने गांधी की प्रतिमा को लगाने की घोषणा की थी. मगर भारतीय महिला के ही विरोध के कारण मामला विवादित और चर्चित हो गया है. अपने इंटरव्यू में कभी महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलाने वाली कुसुम ने उनकी निजी ज़िंदगी पर विवादास्पद बयान देकर हंगामा खड़ा कर दिया है. कुसुम ने कहा, “बड़े लोग पद और प्रतिष्ठा का हमेशा फायदा उठाते रहे हैं. गांधी भी इसी श्रेणी में आते हैं. देश-दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा की वजह ने उनकी सारी कमजोरियों को छिपा दिया. वह सेक्स के भूखे थे जो खुद तो हमेशा सेक्स के बारे में सोचा करते थे लेकिन दूसरों को उससे दूर रहने की सलाह दिया करते थे. यह घोर आश्चर्य की बात है कि धी जैसा महापुरूष यह सब करता था. शायद ऐसा वे अपनी सेक्स इच्छा पर नियंत्रण को जांचने के लिए किया करते हों लेकिन आश्रम की मासूम नाबालिग बच्चियों को उनके इस अपराध में इस्तेमाल होना पड़ता था. उन्होंने नाबालिग लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं के लिए इस्तेमाल किया जो सचमुच विश्वास और माफी के काबिल बिलकुल नहीं है.” कुसुम का कहना है कि अब दुनिया बदल चुकी है. महिलाओं के लिए देश की आजादी और प्रमुख नेताओं से ज्यादा जरूरी स्वंय की आजादी है. गांधी पूरे विश्व में एक जाना पहचाना नाम है इसलिए उन पर जारी हुआ यह सच भी पूरे विश्व में सुना जाएगा.

दरअसल, महात्मा गांधी हत्या के 67 साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं. अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है. आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे. मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई. कुसुम के मुताबिक दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं. अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है. कहना न भी ग़लत नहीं होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया.

लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से लेकर यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है !

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22 thoughts on “क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

  1. ramesh kumar

    SACHCHAI JO BHI HO MAGAR LEKH PASAND AAYA , KUCH TO SACHCHAI RAHI HOGI AISE BAAT THODE HI NIKLI HAI

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  2. qutubuddin ansari

    में आप से रिक्वेस्ट करना चाहुगा के इस तरह के लेख न प्रकाशित करे क्योके ये भगवा और संघ द्वारा लिखा जाता है गांधी जी को बदनाम करने की साजिश है ! ऐसे भी सेक्स उनका अपना मसला था इससे किसी को मतलब नहीं होना चाहिए

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  3. wahid raza

    मेरे बिचार से अभी इन बातों को उठाना बिलकुल अप्रसंगिक है, कारण हर इन्सान का एक सेक्स लाईफ होता है, बहुत सिमित लोगों का उजागर होता है, अधिंकाश का छुपा रहता है, ये कोई अपराध नहीं है, ना ही इससे उनकी छवी पर अांच आती है, जितना गान्धी जी के बारे मे जानकारी उपलब्ध है, उससे यही पता चलता ये सारे कार्य सहमति से किया गया था, अपितू अभी ये बाते कोई मायने नहीं रखती,

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  4. chandarbhai tripathy

    All such bakwaas and fake news by some irresponsible Sangh Parivar people cannot detract the people of the world from deifying Gandhi. The concerned senior people of the organisation to which this mad cap belongs should control this mad cap. The one experiment about Brahmacharya Gandhi made in Noakhali is hinted by Prof. Nirmal Kumar Bose in his book published by Navajeevan. This fellow has not read that book. I have not only read it but discussed the matter with Prof. Bose, the well-known anthropologist and Commissioner for SC&ST 1967-71. Very soon Gandhiji gave up the experiment on a personal appeal by the doyen of social workers, Thakkar Bapa, who was requested by the close associates of the Mahatma to make a short visit to Noakhali for this purpose. Now this ignorant man is inventing so-called historians and allegedly sensational stories. His post deserves to be dismissed with the contempt it deserves. He may not have been born when I came in contact with the RSS in 1941 but it is below my dignity to spread canards about the vulnerable aspects of the fascist organisation or about the character of some of its leaders or cadres merely because I am instinctively opposed to its ideology. I am not even sure if the writer is connected with the RSS. He may be from the discredited army of the so-called ‘gorakshaks’ or Hindu Yuva Vahini.

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  5. prasad joshi

    दुनीया मे बहोत सारे लोगोको पास कोइ काम धाम होता नही है. वो लोग सेक्स के बारे मे जादा सोचते है. या फिर जो कुछ जादाही फाँरवर्ड और खुदको माँडर्न समझते है वो सेक्स के बारेमे जादा खुलकर बाते करते है. गांधीजी इन दोनो कँटँगिरी मे नही आते है. गांधीजी की सेक्स लाइफ पर रिसर्च करने वाला माँडर्न विचारोका कोइ इन्सान होगा. this is totally unproductive research. ऐसे विषयो से कुछ फायदा नही होता है.

    अगर बाजार मे कपडे खरीदने गये तो कपडे ही खरीदने चाहीये, दुकानदार कि सेक्स लाइफ के बारे मे जानने का प्रयास नही करना चाहीये. गांधीजी से हमने अहींसा, त्याग, उपवास, संयम ये सिखना है, बाकी की बाते बकवास है.

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  6. सिकंदर हयात

    अभी देखा की सोशल मिडिया पर छोटे इकबाल के सबसे बड़े फेन इलाहबादी सज़्ज़न और उनके बहुत सारे साथी आजकल कुछ मुस्लिम लड़कियों और खासकर एक लड़की से तो बुरी तरह खार खाये बैठे हे इस पत्रकार लड़की की दोस्त और रूम मेट ने पिछले वर्ष कई मानसिक दबावों से परेशान होकर खुदखुशी कर ली थी तो उस केस के कारण और एक वेबसाइट दुआरा ज़बर्दस्ती सिर्फ विवाद पैदा करने और प्रचार पाने की खातिर कुछ मुस्लिम लड़कियों को खांमखा क्रांतिकारी आदि घोषित कर दिया गया था जबकि इनमे से अधिकतर कोई खास लिखती भी नहीं हे हद ये की उनमे से एक तो यु ही बबली सी लड़की का नाम भी था जिसने दो चार पोस्ट कभी बुर्के पर लिखी होगी बस इनमे से किसी भी महिला की ऐसा कोई खास लेखन या गतिविधि नहीं थी की उन्हें रूढ़िवाद विरोधी कोई क्रन्तिकारी घोषित किया जाए जाहिर हे की वेबसाइट ने ये घटिया हरकत विवाद पैदा करने को की थी क्योकि आज हर कोई कैसे भी करके विवाद और पब्लिसिटी चाहता हे निगेटिव पॉजिटिव शब्द अब कोई महत्व नहीं रखते हे वेबसाइट अपने मकसद में कामयाब भी हुई और खासा प्रचार मिला यही आज हर कोई चाहता हे की दिखे और बिके खेर वो जो भी हो वो एक अलग विषय हे बात आयी गयी हो गयी लेकिन छोटे इकबाल के सबसे बड़े फेन और उनके बहुत सारे साथी अभी भी रूममेट की खुदखुशी विवाद को लेकर उनसे से एक लड़की के पीछे हाथ धो कर पड़े हे और उस पर तरह तरह की बाते कर रहे हे वो बाते सही हे या गलत हमें नहीं पता हमें उससे कोई लेना देना नहीं हे हमारा विषय कुछ और ही हे हमारा विषय हे की आखिर ये कटटरपन्ति ( सभी प्रकार के हिन्दू मुस्लिम छोटे बड़े- खुले छिपे- नरम गरम सभी प्रकार के ) इन आधुनिक लड़कियों से महिलाओ इतना क्यों चिढ़ते हे इसके पीछे क्या राज़ छिपा हो सकता हे आपने देखा ही होगा की भारत के सभी कटटरपन्ति लोग वो इन आज़ाद ख्याल आधुनिक लड़कियों से बेहद चिढ़ते हे आजकल ये भी देखा की नोएडा घरेलू कामगार विवाद के बाद कुछ हिन्दू कटटरपन्ति जिम जाने वाली शॉर्ट्स पहनने वाली लड़कियों और उनकी आधुनिक माताओ को खूब कोस रहे थे आखिर क्यों ————– ? असल में जैसा की उस केस में देखे तो वो लड़की जॉब के लिए इंदौर से दिल्ली आयी थी काम करना चाहती थी सहेली के साथ अकेली रहती थी उस सहेली ने सुसाइड कर ली आदि तो बात ये भी हे की इन कटटरपन्तियो को इस प्रकार की लड़किया सिरे से ही बिलकुल पसंद नहीं आती हे इस प्रकार की लड़कियाँ जो पढ़ना चाहती हे काम करना चाहती घर से बाहर निकलना चाहती हे कुछ बनना चाहती हे अपनी जिंदगी जीना चाहती हे इन लड़कियों से इन सभी प्रकार के कटटरपन्तियो को बड़ी सख्त नफरत होती हे बहुत सख्त नफरत इसकी वजह मुझे मेरी मोटी अक्ल से मुझे तो ये समझ आती हे ये लड़कियाँ इन लोगो की बहुत बड़ी आकांशा चाहत और सपने और छुपे हुए हित पर पानी फेरती दिखाई पड़ती हे और ये इन कटटरपन्तियो की दूरदर्शिता कहा जा सकती हे की वो बखूबी जानते हे की ये लड़किया और इनका रवैया अगर फैलता हे तो इनके हितो के खिलाफ हे कैसे खिलाफ हे ———- ? वो ऐसे हे की ये लड़किया और इनका रवैया इन हिन्दू मुस्लिम कटटरपन्तियो के एक बहुत बड़े मनसूबे पर पानी फेरती हे वो मंसूबा हे की लोगो से अधिक से अधिक आबादी बढ़वाकर अपना वर्चव बढ़ाना और इसी से कई तरह के हित साधना . आपने देखा ही होगा की खासकर मुस्लिम कटटरपन्ति और हिन्दू कटटरपन्ति भी ये जरूर ही करते हे की लोगो से परिवार नियोजन ना करने आबादी बढाने की अपील करते हे या नहीं तो बढ़ती आबादी को कभी मुद्दा नहीं बनाते आपने देखा ही होगा की सोशल मिडिया के ये मुस्लिम कटटरपन्ति रोज सुबह शाम मुसलमानो की बदहाली का जिक्र करते हे सारी दुनिया को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हे मगर भूल कर भी फेमली प्लानिंग की बात नहीं करते हे क्योकि इसमें ही इनके कई हित छुपे होते हे अब होता ये हे की छोटे इकबाल के संबसे बड़े फेन इलाहाबादी सज़्ज़न और उनके साथी जिस लड़की से खार खाये बैठे हे इस तरह की लड़किया इनके इरादों में बहुत बड़ा रोड़ा बनती हे ये पढ़ना चाहती हे कुछ करना चाहती हे अपनी जिंदगी जीना चाहती हे अपनी मर्जी चाहती हे जिसमे स्वाभिवक हे की कुछ गलतिया भी होने को हो सकती हे मगर इससे ही किसी के खुद की जिंदगी जीने का हक़ नहीं छीना जा सकता हे तो इस प्रकार की लड़किया नेचुरल हे की वो ना तो जल्द शादिया करेगी और ना ही बच्चे पैदा करने की मशीन बनेगी ना ही इसमें कोई खास रूचि लेंगी यही होगा अब इन लड़कियों महिलाओ की इसी हरकत और फितरत से कटरपन्तियो को और उनके आकाओ को बहुत चिढ होती हे ये तो चाहते हे की अधिक से अधिक से अधिक आबादी बढे ताकि इनके धर्म का राजनीति का वर्चस्व बढे इन कटरपन्तियो के आका नेता और पैसे वाले लोग होते हे ये भी यही चाहते हे की अधिक आबादी हो इनके अधिक वोट हे ज़ज़्बाती और भड़काऊ मुशायरा सभाये सुनने को लाखो की भीड़ हो , जाती के अधिक से अधिक वोट हे नेताओ को फायदा हो पैसे वाले लोगो के लिए अधिक से अधिक बड़ा बाजार हो सस्ते से सस्ते लेबर हो यही नहीं अधिक आबादी से जिंदगी से परेशान लोग हे जो भेड़ बकरी की तरह इनके पीछे चले इनके कहने पर लड़े यानी अधिक आबादी से इन लोगो का कटटरपन्तियो का शोषकारियो का नफ़ा ही नफ़ा हे अब होता ये हे की ये आधुनिक लड़कियाँ इनमे भी बाकी सभी लोगो की तरह अच्छाइया बुराइया होती ही हे मगर ये तो तय हे की इनका एटीट्यूड कभी भी जल्दी शादी करके अधिक बच्चे पैदा करने का किसी भी हालत में नहीं होता हे इसलिए ये आधुनिक लड़कियाँ इन कटटरपन्तियो के हमेशा निशाने पर रहती हे हमेशा .

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    1. सिकंदर हयात

      मेने भी ऊपर यहाँ कहा था की मेन मुद्दा हे लड़कियों से अधिक बच्चे पैदा करवाने का कटटरपन्तियो का सपना – राजेश प्रियदर्शी बी बी सी हिंदी ————-इन लड़कियों की आँखों में माँ बनने के नहीं, करियर के सपने हैं. वे बहुत जद्दोजहद के बाद घर से निकल पाई हैं, वे इज्ज़त से रहना चाहती हैं, हॉस्टल में रहने की अनुमति उन्हें आसानी से नहीं मिली होगी. अब इतने बवाल के बाद पिटकर घर लौटी बहुत सारी लड़कियों पर ज़बान बंद करके चुपचाप रहने या घर लौट आने का भारी दबाव होगा.लेकिन ये सिर्फ़ बीएचयू की लड़कियों की बात नहीं है, ये दबाव हर जगह होगा और ज़िंदगी को देखने के नज़रिए का टकराव भी हर ऐसी जगह दिखाई देगा जहाँ लड़कियों के मुँह में ज़बान है और वे उसका इस्तेमाल करना सीख गई हैं.
      बीएचयू की लड़कियाँ छेड़खानी से सुरक्षा की माँग कर रही थीं, सीसीटीवी लगाने का अनुरोध कर रही थीं, रास्ते में लाइटें लगाने की बात कह रही थीं, जबकि संघ का प्रतिनिधित्व करने वाले वीसी उनसे बात तक करने को तैयार नहीं थे.नवरात्र में देवी की अराधना करने वाले प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने लड़कियों को पुलिस के हाथों पिटने दिया.5 मौके जब नरेंद्र मोदी सरकार से भिड़े यूनिवर्सिटी के छात्रमांगपत्रइमेज कॉपीरइटRAJESH PRIYADARSHIImage captionबीएचयू की छात्राओं का मांगपत्रबीएचयू की छात्राओं के साथ जो व्यवहार हुआ है उससे देश में, ख़ास तौर पर कैम्पसों में गुस्सा है, कई शहरों में यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है जो ये दिखाता है कि वे इस टकराव में अपना पक्ष चुन रही हैं, और इसके लिए किसी राजनीतिक रुझान या समर्थन की ज़रूरत नहीं है.जब देश की महिलाएँ हर क़दम पर मर्दवादी वर्चस्व के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं, क़दम-क़दम पर संघर्ष और कई बार जीत की कहानियाँ लिख रही हैं, ज़ाहिर है, उन्हें हिंदू राष्ट्र की रक्षा के लिए सबल और संस्कारी पुत्र पैदा करने की भूमिका में धकेला जाना कैसे मंज़ूर होगा?
      वे साक्षी महाराज के चार बच्चे पैदा करने के आह्वान में योगदान करने वाली माताएँ बनने के इरादे से यूनिवर्सिटी नहीं जा रही हैं.
      संघ की पौधशाला से उमा भारती और साध्वी निरंजन ज्योति ही आ सकती हैं जिन्होंने कभी किसी यूनिवर्सिटी की शोभा नहीं बढ़ाई है. राजेश प्रियदर्शी ” ———————- ——————————-लेकिन लड़कियों को खास कर आम लड़कियों को ये बात समझ लेनी चाहिए क्रांति और नए विचार एक बहुत ही लम्बी और कष्टसाध्य पर्किर्या हे इसमें तकलीफे ही तकलीफे हे क़ुरबानी देनी पड़ेगी उसके लिए भी तैयार रहिये जैसा हमने दी मेरी बहने आज अपने बड़े भाई की याद में रो रोकर बेहाल हे एक तरह से मेरे बड़े भाई की मौत भी इन्ही सब आदर्शो पर चलने में हुई हे ——————— जारी

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  7. सिकंदर हयात

    ”संजय जोठे – देश के लिये बड़ा खतरा है तकनीक के बाबू JUL 30, 2017 1भारत में इंजीनियरिंग मैनेजमेंट मेडिसिन या तकनीक की अकेली पढाई पूरी कौम और संस्कृति के लिए कितनी घातक हो सकती है ये साफ नजर आ रहा है. इस श्रेणी के भारतीय युवाओं में समाज, सँस्कृति, साहित्य, इतिहास, धर्म की अकादमिक समझ लगभग शून्य बना दी गयी है. ये तकनीक के “बाबू” देश के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं.अकेली तकनीक,साइंस, मैनेजमेंट या मेडिसिन पढ़ने वालों से कभी बात करो तो पता चलता है कि ये व्हाट्सएप के प्रोपेगण्डा के कितने आसान शिकार हैं. इनमे से अधिकांश लोगों को इतिहास, समाज, सँस्कृति आदि की कोई समझ नहीं है, ये कल्पना भी नहीं कर पाते कि जैसे मेडिसिन या तकनीक की पढ़ाई की अपनी गहराई या ऊंचाई है उसी तरह साहित्य, दर्शन, राजनीति और सामाजिक विमर्श की भी अपनी गहराइयाँ और ऊंचाइयां होती हैं.ये तकनीक, मेडिसिन, मैनेजमेंट या साइंस के “बाबू” एक खतरनाक और आत्मघाती फौज में बदल गए हैं। दुर्भाग्य की बात ये भी है कि ये लोग सांप्रदायिक, धार्मिक और जातीय दुष्प्रचार के सबसे आसान शिकार हैं. आजकल के बाबाओं और अध्यात्म के मदारियों की गुलामी में इन बाबुओं की पूरी पीढ़ी बुरी तरह फस चुकी है. ये ही अप्रवासी भारतीयों की उस फ़ौज के निर्माता हैं जो विदेश से भारतीय संप्रदायवाद को पैसा और समर्थन भेजते हैं या यूरोप अमेरिका में पोलिटिकल या कोर्पोरेट लाबिंग करते हैं.भारत में समाज विज्ञान और मानविकी (ह्यूमेनिटीज) के विषयों की जैसी उपेक्षा और हत्या की गई है वह भयानक तथ्य है. ठीक मिडिल ईस्ट और अरब अफ्रीका के जैसी हालत है, आगे ये हालत और बिगड़ने वाली है. विज्ञान तकनीक मेडिसिन आदि को यांत्रिक ढंग से सीखकर कुछ सवालों के जवाब देने इन्हें आ जाते हैं, कुछ बीमारियों का इलाज करना, कुछ प्रबंधकीय समस्याओं को सुलझा लेना या “यूरोपीय या अमेरिकी” प्रेस्क्रिप्शन पर खड़े मोडल्स को चला लेना इनकी कुल जमा विशेषज्ञता है. ये असल में अच्छे आज्ञापालक हैं जो तकनीकी आज्ञाओं का पालन करके कुछ काम कर लेते हैं.ये स्वयं अपनी इंजीनियरिंग मेडिसिन या मेनेजमेंट में कितना नवाचार या शोध कर रहे हैं ये जगजाहिर बात है, उस मामले में ये फिसड्डी थे आज भी हैं क्योंकि इनमे क्रिटिकल थिंकिंग की कोई ट्रेनिंग ही नहीं है, ये सिर्फ अपने कुवें के मेंढक बने रहते हैं, जैसे ही यूरोप अमेरिका से कोई नई तकनीक पैदा होकर आती है वैसे ही ये उसका सबसे सस्ता या देसी संस्करण बनाने में लग जाते हैं. इसी से ये खुद को “वैज्ञानिक” भी सिद्ध करवा लेते हैं. फिर आगे बढ़कर इस विज्ञान को वेद उपनिषदों में खोजकर दिखाने वाले बाबाओं के चरण भी दबाने पहुँच जाते हैं. इन अधकचरे तकनीक के बाबुओं की भीड़ से घिरे हुए बाबाजी फिर दुनिया भर में हल्ला मचा देते हैं.ये बाबू और बाबा समाज में रूतबा रखते हैं, चूँकि इनके पास पैसा होता है कारें होती हैं और कारपोरेट की लूट के ये सीधे हिस्सेदार हैं इसलिए लोग इन्हें समझदार समझते हैं. भारत जैसे गरीब अनपढ़ और अन्धविश्वासी समाज में ज्ञानी और बुद्धिमान वही समझा जाता है जिसके पास पैसा हो बड़ा बंगला या कार हो. ये तकनीक के बाबू इसपर खरे उतरते हैं. इसीलिये ये दुष्प्रचार के सबसे आसान शिकार और उपकरण बन गये हैं.संजय जोठे
    इनकी अपनी पढाई पर भी गौर किया जाए विज्ञान विषयों की शार्टकट और ट्रिक सीखते हुए ये इंजीनियरिंग मेनेजमेंट या मेडिसिन की पढाई में प्रवेश करते हैं. ऊपर से धन कमाने की मशीन बन चुके कोचिंग संस्थान इन्हें इंसान भी नहीं रहने देते. जिस विज्ञान की ये ढपली बजाते हैं उस विज्ञान और तकनीक को भी एकदम भक्तिभाव से घोट पीसकर चबा जाते हैं कोई क्रिटिकल थिंकिंग नहीं की जाती. कोचिंग या तैयारी के दौरान पैसा खर्च करके बिलकुल रट्टा घोटा मारकर जैसे ये कालेज में घुसते हैं वसे ही बाहर निकलते हैं और पैसा कमाने की मशीन बन जाते हैं, तब ये भीड़ यथास्थिति बनाये रखना चाहती है ताकि इनके माता पिता ने अपनी क्षमता से बाहर जाकर भले बुरे ढंग से कमाते हुए इनपर जो खर्च किया है वह इस समाज से वसूल किया जा सके. ये अर्थशास्त्र भारत के भविष्य पर भारी पड़ रहा है. इसके कारण ये धनाड्य लेकिन अनपढ़ पीढी भारत में सामाजिक बदलाव या क्रान्ति की सबसे बड़ी दुश्मन बनकर उभर रही है.ऐसी यथास्थितिवादी और सुविधाभोगी ‘कुपढ़’ भीड़ को हांकना धर्म, सम्प्रदायाद और राष्ट्रवाद के लिए बहुत आसान है. वे बड़े पैमाने पर हांके जा रहे हैं. इन लोगों पता ही नहीं कि वे अपने और अपनी ही अगली पीढ़ियों की कब्र खोद रहे हैं. संजय जोठे
    इस “तकनीक की बाबू” पीढ़ी से अब इतना बड़ा खतरा पैदा हो चुका है जिसका कोई हिसाब नहीं. ये पीढी चलताऊ राष्ट्रवाद, अध्यात्म, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अतीत पर गर्व इत्यादि के बुखार में सबसे आसानी से फसती है और जहर फैलाने को तैयार हो जाती है. ये पीढी भारत के सभ्य और समर्थ होने की दिशा में एक बड़ी बाधा बनकर उभर रही है. इस पीढी को या अगली पीढी को अगर मानविकी विषयों, साहित्य, काव्य, इतिहास दर्शन आदि की थोड़ी समझ नहीं दी गयी तो ये सामूहिक आत्मघात के लिए बेहतरीन बारूद बन जायेंगे जिसे कोई भी सनकी तानाशाह या धर्मांध सत्ता आसानी से जब तब सुलगाती रहेगी.
    – संजय जोठे ”

    सिकंदर हयात • a minute ago
    में भी इस सबका ज़बर्दस्त शिकार हु बहुत ज़्यादा , मेरे भाई भी सॉफ्टवेयर इंजिनियर हे और आई बी एम् में रहे लेकिन वो तकनीक के बाबू नहीं रहे हिंदी भी पढ़ने लिखने का शोक रहा नतीजा सवेदनशीलता की उन्होंने अपने मित्र की सही समय पर लाखो की मदद की और वो दोस्त आज आयरलैंड में मज़े कर रहा हे दूसरी तरफ मेरा बेस्ट फ्रेंड जिसे बीसियों लाख खर्च करके ——— बनाया गया उसे मेरी कोई परवाह नहीं हे बुरा नहीं हे वो अच्छा आदमी हे मगर समय समझ खत्म हो चुकी हे उन्हें सिर्फ उस विषय की समझ रह गयी हे जो उन्हें पैसा दे रहा हे बाकी किसी बात की समझ नहीं बची हे और मुसीबत की यही लोग धर्म कर्म पर जरूर खूब पैसा फूँक रहे हे

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  8. सिकंदर हयात

    Deepak Sharma
    4 August at 18:44 · New Delhi ·
    बचपन में जब माँ को हर पूर्णमासी का व्रत रखते देखता था और पापा को हर मंगलवार को… तो एक डिफरेंट फीलिंग आती थी. या फिर वो दशहरा का मेला , या मेले से पहले नवरात्र और दुर्गा पूजा के पंडाल…जब माँ बाप बहनो के साथ हर शाम किसी पंडाल में हम सब होते थे… तो एक डिफरेंट फीलिंग होती थी. मांस नहीं खाना है…शराब नहीं छूनी है…तम्बाकू का सवाल नहीं…रोज़ दोहराया जाता था. और रोज़ नहा धोकर नाश्ते से पहले घर के मंदिर में रखे ठाकुरों को प्रणाम करना होता था. कोई बड़ा बुजुर्ग घर आये तो सबसे पहले पैर छूने का इशारा दिया जाता था. … ये हमने सीखा नहीं ..हमे सिखाया गया था. शायद मामा शाखा में जाते थे या दादा किसी गोलवलकर से प्रभावित रहेंगे होंगे. कारण संघ हो, आर्यसमाज हो या जो भी रहा हो पर घर में संस्कारों पर ही ज़ोर था. संतुष्टि ये है कि 40 -45 साल बाद संस्कारों का 90 प्रतिशत लहू से अभी अलग नहीं हुआ है. शायद यही प्रैक्टिस ऑफ़ हिन्दू लाइफ है…जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी हिंदुत्व कहा है.
    लेकिन आज मै देखता हूँ कि एक टीवी रिपोर्टर जो 2014 से पहले दिल्ली के अशोक होटल के अमात्रा स्पा में दिन भर दलाली करते थे आजकल शाम को एंकरिंग में वो देश को संस्कार पर ज्ञान दे रहे हैं. हिंदुत्व और मोदित्व समझा रहे है. जिनके हाथों में जाम और हथेलियों में काली कमाई के नोट थे …जिनका संस्कारों से कभी सरोकार नहीं रहा वो अचानक टीवी का सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर अपसंस्कारों का वध करने निकले है. जिन्होंने स्टूडियो में स्कर्ट पहनने वाली हर रिपोर्टर को बुरी निगाह से देखा और एंकर बनाने के प्रलोभन में दर्ज़नो मुताह किये वो मोहन भागवत के भक्त बने हुए है और ट्विटर पर भगवा का मोर्चा सभाला हुआ है. रातों रात बदली हुईं इन विचारधाराओं और वफादारियों को देखकर मै हैरान हूँ. जो कभी ताज मानसिंह होटल के चैम्बर क्लब में करोड़ों की डील कर आज टीवी मालिक बने है वो ये बता रहे हैं कि संघ और हिंदुत्व का कॉपीराइट उनके पास है. जो मशहूर एंकर यूपीए राज में हुडा के बेटे और वाड्रा के साथ मिलकर गुडगाँव की हर बड़ी ज़मीन का लैंड यूज़ बदलवा रहे थे वो 16 मई 2014 के बाद कांग्रेस मुक्त भारत का आह्वान कर रहे है. पिछले दस वर्षों से सत्ता के ये घोषित दलाल अचानक हिंदुत्व के पैरोकार, गौरक्षक और देश भक्त हो गए.
    किसी पत्रकार का विचारधारा बदलना अपराध नहीं है. कांग्रेसी से भाजपाई होना भी अपराध नहीं है. लेफ्ट से राइट विंगर होना भी अपराध नहीं है.
    लेकिन विचारधारा बदलकर अपराध(दलाली) जारी रखना सबसे बड़ा अपराध है.
    ऐसे अपराधियों की पहचान ज़रूरी है.Deepak Sharma

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  9. सिकंदर हयात

    Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    5 August at 21:39 · Dehra Dun ·
    यह भारतीय लोकतंत्र की स्वर्ण परीक्षा का काल है । यह इतिहास का एक मनोवैज्ञानिक क्षण है । स्वाधीनता संग्राम के सर्वाधिक नाज़ुक क्षणों में जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया , आज यदि उनके हाथ मे भारत वर्ष का सत्ता सूत्र है , तो यह भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली अथवा संविधान का फेल्योर नहीं , अपितु लोकतंत्र गामी शक्तियों की असफलता है । सर्वाधिक कांग्रेस की , जिसके जघन्य भ्र्ष्टाचार , परिवारवाद और अकर्मण्यता से देश पक चुका था । महती आवश्यकता है , कि कांग्रेस को अहिंसक बम से उड़ा दिया जाए , और इसका पुनसृजन किया जाए । कम्युनिष्टों का स्वदेशीकरण किया जाए । वे टाई कोट की जगह अपने प्रदेशों की स्थानीय पोशाक पहनें । गिटपिट अंग्रेज़ी बोलना बन्द करें । भारतीय भाषाओं में संवाद करें । साम्राज्यवादी चीन के खिलाफ मोर्चा खोलें ।
    सनद रहे , कि अभी अभी साम्प्रदायिक अधिनायक वाद में विश्वास रखने वाले वोट के लिए झूठ , अफवाह और सीनाजोरी का सहारा ले रहे हैं । कल वह संविधान को स्थगित भी कर सकते हैं । जिस विचारधारा का निर्मम हत्यारा अपने आड़े आ रहे एक अहिंसक , राम नाम भजने वाले वृद्ध की हत्या कर सकता है , उनके लिए कुछ भी असम्भव और वर्जित नहींRajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    4 August at 21:12 · Dehra Dun ·
    राहुल गांधी पर पड़े पत्थरों के प्रत्युत्तर में जो मूर्ख ” पत्थर का बदला पत्थर से ” का राग अलाप रहे हैं , क्या उन्हें आभास है कि वे देश को गृह युद्ध की दिशा में ठेल रहे हैं , जिसमे अंततः संघ परिवार की ही विजय होनी है ? वह तो चाहते ही यह हैं कि सरकार बनाने का फैसला अंततः वोट की बजाय पत्थर से हो , और उन्हें लोकतंत्र को स्थगित करने का अवसर मिले । आप उनसे गाली , गोली , लाठी , पत्थर और त्रिशूल के मुकाबले में नहीं जीत सकते । ये सब उनके पाठ्यक्रम में शामिल हैं । संघ परिवार ही एक ऐसा समूह है , जहां लाठी चालन की विधिवत और खुली ट्रेनिंग दी जाती है । डंडा उनके गणवेश में शामिल है ।अन्यथा कोई भी सभ्य नागरिक , जिसे भैंस न हाँकनी हो , लट्ठ लेकर चलना पसन्द नहीं करता ।
    यद्यपि कई अलगाववादी मुस्लिम संगठन भी हथियारों की ट्रेनिग देते हैं , लेकिन भूमिगत । संघ परिवार में यह खुला खेल फरुखाबादी चलता है । इसी सबके मद्दे नज़र सरदार वल्लभ भाई पटेल गांधी हत्या के बाद संघ परिवार को ban करने का मन बना चुके थे , लेकिन नेहरू ने अपने लोकतांत्रिक अतिरेक के कारण उन्हें रोका । पत्थर और लाठी दर असल इन बर्बर हिंसकों की मातृ भाषा है । दंगे का मैदान उनका प्रिय रंग मंच है । याद नहीं कि जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब कुछ कांग्रेसी लुच्चे सिखों पर जुल्म ढा रहे थे , तब संघ परिवार उन कोंग्रेसी गुंडों के साथ था । राहुल गांधी को राजनीति करनी है तो लाठी , पत्थर , गाली , गोली सब झेलें , जैसा कि उनके पूर्वजों ने झेला ।—–Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    7 August at 11:31 · Dehra Dun ·
    कवियत्री के पक्ष में कवि पर लठ भांजते हुए फेसबुक तथा अन्यत्र समवेत वक्तव्य जारी करने वाले साहित्यकार उन राहगीरों जैसे हैं , जो महिला की स्कूटी और पुरुष की बाइक में टक्कर होने पर धड़ाधड़ पुरुष की सुताई करने लगते हैं , बगैर यह जाने समझे , कि गलती किसकी थी , कितनी थी और जानबूझ कर थी या अनजाने । चूंकि इससे उन्हें महिला के प्रति सहानुभूति दिखाने का सुअवसर और अपने पुरुष दम्भ की संतुष्टि का शुभ लाभ मिलता है । जैसे अमेरिका में कुछ लोग फैशन के तौर पर यदाकदा अमेरिकी नीतियों के विरुद्ध बयान देते रहते हैं , ऐसे ही कुछ पुरुष अपनी नैतिकता पर पालिश मारने के लिए पुरुष के विरुद्ध और महिला के पक्ष में बयान देते रहते हैं ।
    मैने मूल सन्दर्भ नहीं देखा है , क्योंकि मैं साहित्य या उससे सम्बंधित सामग्री को तभी पढ़ता हूँ , जब मेरे पास कोई अन्य काम नहीं होता । मेरे पास साहित्य पढ़ने से अधिक आवश्यक बाइक दौड़ाना , जंगल मे लकड़ी से भोजन बनाना , किसी सरोवर में तैरना अथवा स्वस्थ और उन्मुक्त वाजि गण को बन में चरते देखना आदि कार्य हैं , जिनसे मुझे कम ही फुर्सत मिल पाती है । अतः मैने मामले से सन्दर्भित क्षेपक ही देखे हैं , जिनके मुताबिक मेरा निष्कर्ष है कि कवि पर पथराव अनावश्यक और अवांछित है ।
    नम्र निवेदन है , कि फेस बुक और साहित्य में अलग से कोई महिला आरक्षण लागू नहीं है । नही यहां ऐसा है कि महिला को 15 सेकंड से अधिक देखने पर घूरने वाला क़ानून लागू हो जाये । इसी लिए मैं महिलाओं को अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल नहीं करता । मेरी मित्र सूची में एक्का दुक्का वही महिलाएं हैं , जिनके बारे में आश्वस्त हूँ , कि वे अलग से महिला नहीं , अपितु एक व्यक्ति हैं । शिकायत किये जाने पर मेरा उत्तर यही होता है कि , चूंकि मैं आये दिन अश्लील लिखता हूँ , और इससे आपके महिला पन को ठेस लग सकती है , अतः हमारा एक दूसरे से दूर रहना ही समीचीन है ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna

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  10. सिकंदर हयात

    Manisha Pandey
    6 August at 12:55 ·
    10-12 साल पुरानी बात है। तब ब्लाॅग नया-नया आया था। मैंने कुछ लिख दिया, हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं। एकदम इममैच्योर सी पोस्ट थी, कुछ दम नहीं था उसमें। मतलब कुछ बहुत आर्टिकुलेट विचार नहीं थे, लेकिन क्यूट थी। लेकिन भई हिंदी वाले तो हिंदी वाले हैं। उस पर भी बवाल काट दिए। हिंदी के बवालों से ये मेरा पहला साबका था। सब अपना काम-धाम छोड़कर पतित लड़की का विश्लेषण करने तुल पड़े। थी तो मैं कम उमर ही। डर गई।
    कोई डर जाए तो क्या करता है। किसी का हाथ ढूंढता है न पकड़ने के लिए। मैंने भी ढूंढा। मुझे लगा कि जो लोग दोस्त हैं, उन्हें इस पर कुछ बोलना चाहिए। मेरे पक्ष में स्टैंड लेना चाहिए। मैंने आवाज लगाई। लोग पतनशीलता का विश्लेषण छोड़ स्टैंड लेने लग पड़े। कुछ देर बाद हुआ यूं कि जिसकी ये लड़ाई थी, वो लड़ाई से गायब हो चुकी थी और लोग आपस में पुराने निजी और साहित्यिक स्कोर सेटल कर रहे थे। कोई मेरे बहाने किसी को गाली दे रहा था तो कोई उस बहाने किसी को पुचकार रहा था। कुछ लोग लगे हाथ दोस्ती में स्टैंड लेने के बहाने मुझे भी सेट करने में लग पड़े थे। सेट न हो पाने की सूरत में तत्काल पाला बदल ले रहे थे। ब्लाॅग जगत में कोहराम मचा हुआ था। सुबह से शाम फोन घनघना रहे थे। ब्लाॅग और ब्लाॅग के बाहर तय किया जा रहा था कि कौन किसके पक्ष में है और किसके पक्ष में नहीं है। और मैं उस शहर में निपट अकेली अपने दो कमरे के फ्लैट में छत को ताकती सोच रही थी कि कोई नहीं है, डर लगने पर जिसका हाथ थामा जा सके। मैं दीवार से सटकर बिछे गद्दे पर दीवार से सटकर सोती, जैसे लगे कि बगल में कोई है।
    तो जी शाॅर्ट में स्टोरी ये कि हमने मदद का हाथ मांगा तो मदद में आए लोगों द्वारा एक चवन्नी छाप आंदोलन संपन्न हो गया।
    उस घटना के सबक मेरे लिए कुछ यूं थे-
    1- तुम लिखोगी, बोलोगी, जियोगी तो ये सब तो होगा ही। तारीफ, आलोचना। कोई आंय बोलेगा, कोई बांय। कोई पीठ थपथपाएगा, कोई शराब पीकर पोस्ट लिखेगा। अब जा-जाकर सबका मुंह तो नहीं पकड़ सकते न। सो जस्ट चिल।
    2- तुम कम उम्र, कम अनुभव हो, सेंसिटव हो, अकेली हो, डर गई हो, आहत हो गई हो तो तुम्हें मदद चाहिए होगी। लेकिन ये एक उम्र के बाद उस तरह से मिलती भी नहीं, जैसे बचपन में गिरते ही मां गोद में उठा लेती थी। ये समझ भी उम्र के साथ आएगी कि कौन सचमुच हाथ पकड़ रहा है और कौन हाथ पकड़ने का दिखावा करते हुए निजी स्कोर सेट कर रहा है। और हां, जीवन बड़ा दयालु है। सुंदर-असुंदर सब यही हैं। हाथ पकड़ने वाले भी मिलेंगे। अच्छे लोग। अच्छी कविताएं, अच्छी किताबें देने वाले लोग। उन्हें पहचानने का सलीका जरूर वक्त के हाथ आएगा।
    3- अपनी हर लड़ाई हमें खुद ही लड़नी होती है, फेसबुक पर या जिंदगी में। ये चुनाव तुम्हारे हाथ में है कि कौन सी वाली लड़नी है और कौन सी वाली छोड़ देनी है। फेसबुक वाली इग्नोर कर सकती हो। या न करना चाहो तो तुम्हारी मर्जी। फैसला खुद ही करना होगा। तुमको बारह पोस्टों से जवाब देना है, कोर्ट जाना है या चप्पल उतारकर वहीं के वहीं स्कोर सेटल करना है। तुम्हारा फैसला। प्लीज, लोगों से मत बोलो कि मेरे हिस्से की लड़ाई लड़िए न प्लीज। आप मेरे पक्ष में हैं या नहीं हैं। मेरे लिए स्टैंड लीजिए। मेरे पक्ष में कुछ बोलिए। लेख लिखिए। नो। ये सब किया तो फिर से एक चवन्नी छाप आंदोलन संपन्न होगा।
    4- और जो लोग तुम्हारे साथ हैं, वो हैं। उनका हाथ है सिर पर। फेसबुक पर दिखे, जरूरी नहीं। बल्कि फेसबुक पर जो दिखता है, वो असल में होता नहीं है।Manisha Pandey

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  11. umakant

    गाँधी जी ने ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के नाम पर आश्रम में जो छिछोरपन फैला रखा था, उसकी कभी सार्वजनिक रुप से लानत मलामत हुई होती, तो किसी आसाराम या राम रहीम या एक जो कश्मीर में नंगा पीर सुना था, किसी की भी हिम्मत न होती भावनात्मक सहारे के लिए अपने आई किसी महिला के आँचल पर हाथ डालने की.
    भीष्म जैसे दृढ़व्रती को भी इतिहास ने कभी क्षमा नहीं किया द्रौपदी का अपमान होते देखने के लिए, मगर पोती के साथ नहाने वाले बापू मोहन दास महात्मा कहलाए. नोटों पर छपे और लक्ष्मी गणेश के साथ पूजे गए.
    पूरे ज्ञात भारतीय इतिहास में एक भी उदाहरण महात्मा गाँधी की टक्कर का नहीं है. हाई प्रोफाइल भक्तों का जमघट, आश्रम की महिलाओं को अपनी लौंडी समझना, साधना के नाम पर व्याभिचार, यह सब वो है जो गाँधी जी से भारतीय फिल्म निर्माताओं ने सीखा और रिफाइन करके समाज को वापस सिखाया.
    गाँधी जी के खिलाफ कभी यौन शोषण का मुकदमा नहीं चला. आदमी की हिम्मत ही नहीं हुई. कोई कोई ऐसा होगा जिसकी इच्छा भी नहीं हुई होगी. सुना जाता है कि जय प्रकाश नारायण की पत्नी के साथ बापू ने ब्रह्मचर्य के प्रयोग कर लिए थे, जेपी नाराज़ थे मगर कुछ कह नहीं पाए. यह बिल्कुल उसी तरह है कि आदमी प्रमोशन कैरियर के लिए अपने बॉस और बीवी के नाजायज ताल्लुकात नज़र अंदाज़ कर दे.
    जेपी जी ने समाज को जो नेता रत्न दिए उनके अलावा यह चुप्पी भी उनके कैरियर की बड़ी उपलब्धि है.
    ये सब चुप रहे, बापू की बकरी को घास खिलाते रहे, चश्मे पर पालिश लगाते रहे, तभी तो किसी बाबा किसी पीर की हिम्मत बढ़ी होगी.
    Vikas Agrawal

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    1. सिकंदर हयात

      ”देवेश कुमार
      10 June ·
      जब पूरा देश दाने-दाने को मोहताज था तब उसने बड़ी चतुराई से विदेश जाकर वकालत पढ़ी…और फ़िर अफ्रीका जाकर उतनी चतुराई से गुलामी और गुलामों के दर्द को महसूस किया। लेकिन, भारत आकर अंग्रेजों की खुशामद करके अपने लिए भारत के हर राज्य में एक हवेली बनवा ली… दिन-रात सैकड़ों नौकरों से घिरने वाला वो चतुर सूट-बूट चढ़ाकर जब निकलता था तो यहाँ की अपवित्र ज़मीन पर पैर ही नहीं रखता था कि कहीं पैर ही गंदे न हो जायें। अंग्रेजी हुकूमत ने जब उसे ‘भारत रत्न’ की उपाधि देनी चाही तो उसने अपने लिए ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि मांग ली….। जब अंग्रेज वीर सावरकर जैसों के भय से भारत छोड़कर जा रहे थे तो वो बहुत रोया था… अंग्रेजों के प्रति उसका प्रेम ऐसा था कि अंग्रेजों ने अपने यहाँ उसकी प्रतिमा लगवा दी…30जनवरी 1948 को फिसलकर गिरने से उसकी मौत हो गई थी…! लेकिन भारत को असली आज़ादी 26 मई 2014 को मिली…और भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने का गौरव एक त्यागपुरुष को मिला जिसने भारत की आज़ादी में अतुलनीय योगदान दिया है…इस आज़ादी के बाद से भारत लगातार विकास की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा है…. रोज़ एक इतिहास बन रहा है….कई महापुरुष ऐसे हैं जो जीवित किंवदंती बन गए हैं…और वे देश की अदालतों द्वारा समय-समय पर सम्मानित होते रहे हैं….उनको देश का वास्तविक इतिहास लिखने की महत्त्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है…और उन्होंने बड़ी ही ईमानदारी से इस काम को अंजाम देना शुरू कर दिया है…नई पीढ़ी को अब तक के भ्रामक इतिहास से बचाना इनका पहला कदम है…!
      #कल्लू_मामा ” संघी अग्रवाल लिखता हे ” जेपी नाराज़ थे मगर कुछ कह नहीं पाए. यह बिल्कुल उसी तरह है कि आदमी प्रमोशन कैरियर के लिए अपने बॉस और बीवी के नाजायज ताल्लुकात नज़र अंदाज़ कर दे. ” ——————————————- कौन सा प्रोमोशन ——- ? जे पी को तो नेहरू अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते पहले उप और बाद में प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे जे पी ने ही खुद मना किया था फिर किस प्रोमोशनं की बकवास की जा रही हे फिर जे पी के कारण भी संघी मेनस्ट्रीम में घुसे थे ( आरोप ) संघी मोदी को ”हेलीकॉप्टर ” देने वाले राम रहीम कांड के बाद से पगला गए हे और बचाव का कोई रास्ता न देकर पता नहीं क्या क्या नॉनसेंस बक रहे हे जबकि हिन्दुओ को आदिवासियों को -ईसाई मिशनरियों से बचाने के नाम पर शायद संघ की लीडरशिप में बकौल राजेंद्र यादव एक से बढ़ कर एक राक्षसी संत तांडव कर ही रहे हे ———————————Satyendra PS-सिरसा के एक अदना से बाबा ने 56 इंच ब्रांड नरेंद्र मोदी को औकात दिखा दी। सेना भेजने के बावजूद 37 लोगों की हत्या हुई जिनमें शायद आम नागरिक ज्यादा हैं।
      एक बार रामदेव भी अपनी एक लाख सेना लेकर दिल्ली चढ़ आए थे। बहुत अमीर, ज्यादा चेले। भीड़ देखकर ख़ुशी से पागल बाबा बोले कि सोनिया की सभा में जितने लोग जुटते हैं, उतने लोग मेरे पेशाब करने पर देखने के लिए जुट जाते हैं।
      शांत , मृदुभाषी, ईमानदार गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह मामले को देख रहे थे। भारत के इतिहास में शायद यह पहला मौका था जब यह आदेश दिया गया कि कार्यक्रम में निहत्थी पुलिस कानून व्यवस्था देखेगी। किसी पुलिस वाले को डंडा ले जाने की भी अनुमति नहीं थी।
      नशे में चूर बाबा ने ऊल जुलूल बयान देना शुरू किया। योग के लिए अनुमति से चार गुना भीड़ जुटाई। समय सीमा का उल्लंघन किया। लगा कि बाबा रामलीला ग्राउंड को राजनीतिक मंच बनाएगा।
      आखिरकार सरकार सख्त हुई। रामदेव सलवार पहनकर भागा। पुलिस ने मंच से एक किलोमीटर पर ही उसे धर दबोचा। दूसरे दिन सलवारी बाबा ने रोते हुए मीडिया वार्ता की।
      वहीँ राम रहीम के गुर्गों ने न सिर्फ उत्पात मचाया, हत्याएं की, बल्कि उसके निजी गार्डों ने एक आईपीएस अधिकारी को थप्पड़ जड़ दिया।

      शासक अगर नैतिक हो तो हमारे सैन्य बल, हमारे प्रशासन और जनता की आबरू सुरक्षित रहती है। अगर शासक लिबिरहा हो, घूसखोर हो, पूंजीपतियों और बाबाओं का दलाल हो तो क्या आईपीएस, क्या सेना, क्या पब्लिक, किसी की आबरू सुरक्षित नहीं रहती।स्वतंत्रता के समय अगर संघियों के हाथ सत्त्ता आई होती तो देश के सैकड़ों रजवाड़ों में से कोई भी चढ़कर पीएम की पता नहीं क्या-क्या कर दिया होता।
      देश सैकड़ों रियासतों में बंट गया होता।
      एक अदने से बाबे ने केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकार और सुरक्षाबलों को मुर्गा बना दिया, इसे देखकर तो यही लगता है।
      शुक्रिया सरदार कि आप थे.
      Satyendra PS
      Satyendra PS

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      1. zakir hussain

        हम सरकार को एक आदमी की मानते हैं, इसलिए नमो नही तो कौन का सवाल भक्त लोग पब्लिक मे उछाल देते हैं. एक व्यक्ति का सवाल तब हो, जब तानाशाही की बात हो, जैसे नमो ने देश के तमाम संस्थानो को अपने आगे झुका दिया है. इतनी मजबूत सरकार कि देश के संस्थान कमजोर हो गये, और देश मजबूत हो गया.
        नमो की 56 इंच की छाती है, वो खूब बोलते हैं, इसलिए मजबूत है. मनमोहन बहुत कम बोलते थे, इसलिए इतने ज्ञानी नही थे, उनमे विजन नही था. रिमोट से चलने वाले पीएम थे, इसलिए कमजोर थे.
        अब ये अलग बात है, उनकी सरकार मे रामदेव को सलवार पहन के भागना पड़ा, और बीजेपी के केंद्र और राज्य दोनो जगह होने के बावजूद तांडव हो गया.
        बाकि नमो की ही दिलेरी है कि वो कश्मीर मे अलगाववादी और आतंकवादियों के साथ, धारा 370 के समर्थन मे खड़ा होने वाले कश्मीरियों को मीडिया के ज़रिए, भारत विरोधी घोषित कर, सारे कश्मीरियों से लड़ने को तैयार है.
        सरकार ने देश की बड़े बड़े विश्वविद्यालयों की छवि आम जनता मे देशद्रोही बता कर निस्संदेह राष्ट्र-निर्माण का कार्य किया है. तार्किक और सभ्य चर्चा की बजाय, असहमतियों को ललकार और गाली-गलौच से चुनौती देने वाली देशभक्तो की फौज तैयार करी है.
        देशभक्ति के इतने सारे लिटमस टेस्ट्स की खोज इस सरकार ने कर दी कि और हमे पता चल सका कि हमारे देश मे इतने गद्दार रहते हैं. हमारा देश तो इतने इसे गुणी और महान व्यक्ति का नेतृत्व पाकर धन्य हो गया.

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  12. zakir hussain

    गाँधी ने ब्रह्म्चर्य के साथ अपने प्रयोगों को अपनी किताब “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” मे विस्तार से लिखा है. गाँधी ने कुछ छुपाया नही, ऐसे मे इस विषय पर सनसनीखेज लेख बनना मुश्किल है. सिवाय इन अटकलों के फलाँ महिला को चुप रहने के लिए कहा. सरदार पटेल और गाँधी की दूरी की बात लेख मे लिखी गई है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ इसकी पुष्टि नही करते. ना सिर्फ़ पटेल बल्कि उनका पूरा परिवार गाँधी के काफ़ी करीब रहा था.

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    1. umakant

      मेरे परिवार माँ काली पर पान और पेड़ा चढ़ाने का रिवाज है लेकिन मैं उनपर चढ़ने वाली बलि का विरोध नहीं कर सकता हु यही वजह है की मैं बकरीद पर कटने वाले बकरो का भी विरोध नहीं करता हु वास्तव में जब हम किन्तु परन्तु लगा कर एक सेलेक्टिव सोच का समर्थन करते है और दूसरे का विरोध तो यही से ही न चाहते हुए भी हम कट्टरता को हो बढाने का काम करते है

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  13. सिकंदर हयात

    सही कहा जाकिर भाई गाँधी जी ने जो किया ( ? ) वो बहुत अजीब सा था मगर जो भी हो गाँधी ने कुछ नहीं छिपाया था ना ये रिलेशन थे न रेप था ना बदले में देने को कुछ था गांधी खुद कहते थे की वो काम को कंट्रोल के लिए झूझते रहे थे फ़्रांस की क्रांति और आधुनिक दुनिया की नींव के पत्थर ” रूसो ” ( फ़्रांस में कहावत हे की अगर यहाँ रूसो ना पैदा होता तो क्रांति भी ना होती ) लिखते हे की वो मदाम रोला जिन्हे वो माँ जैसी कहते थे वो स्वीकारते हे की वो उनकी और भी” आकर्षित ” हुए थे तो जो गाँधी जी ने किया बताया जाता हे वो सब अजीब सा था मगर संघियो का अपने ज़हरीले विलासी लोभी लुच्चे बाबाओ के बचाव में महामानव गाँधी को लाना इनकी पुरानी नीचता का प्रदर्शन ही हे ——————————Shahnawaz Malik
    2 hrs ·
    बाबा रामपाल इसलिए मशहूर हुए क्योंकि वो स्नान पानी से नहीं दूध से करते थे. फिर उस दूध से खीर बनाई जाती थी और प्रसाद के रूप में बांटा जाता था. बाबा से जुड़ी ख़बर पढ़ेंगे तो पाएंगे कि इस विशेष खीर वाले प्रसाद को ग्रहण करने के लिए लंबी क़तारें लगती थीं. गिरफ़्तार होने से पहले बाबा लाखों-करोड़ों भारतीयों को ये प्रसाद खिला चुके थे.
    बाबा के बारे में ये जानकारी मिलने के बाद आज जब करोड़ों भारतीय भाजपा के साथ खड़े दिखते हैं तो मुझे हैरानी नहीं होती. किसी को भी नहीं होनी चाहिए.Shahnawaz Malik
    2 hrs · Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    26 August at 12:13 ·
    अंध भक्त चाहे किसी बाबे के हों या राजनेता के , यहां तक कि भगवान के भी , सभी तरह के अंध भक्त स्वयम के लिए तथा समाज के लिए घातक होते हैं । इतिहास साक्षी है कि ये समय समय पर भारी आपदा का हेतु बने हैं। यहां तक कि एक अलग तरह के बाबा रजनीश मोहन जैन के अंध भक्तों ने भी देश विदेश में भारी कहर ढाया है , जबकि रजनीश एक सुपठित एवं तार्किक मनुष्य था । लेकिन चूंकि उसमे भी सेक्स , सम्पति और यश की भारी हवस थी , अतः उसने भी खाते पीते घरों के लड़कों को नीम पागल बना दिया । निदान , जब रजनीश मोहन जैसे बौद्धिक बाबाओं ने भी इतिहास के साथ घात किया तो आसुमल सिरुमलानी अथवा गुरमीत जैसे मूर्खों की तो बात ही क्या है। ऐसे डेरों तथा झूठे , पाखंडी राजनेताओं के निकट प्रभाव में रहने वाले भक्तों की नियमित जांच कोई डॉक्टर करे । यदि उसके दिमाग तथा खून में भक्ति की मात्रा सामान्य से अधिक पाई जाए , तो तुरंत उसका बिजली के झटकों से इलाज किया जाए , ताकि जन धन की सम्भावित क्षति से बचा जा सके । Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna

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  14. सिकंदर हयात

    महात्मा गाँधी के अजीब प्रयोग ही नहीं नेहरू की सेक्स लाइफ भी बेहद चर्चा में रही हे महिलाये भी नेहरू की तरफ बेहद आकर्षित रही हे एडविना की बेटी ने पिछले दिनों बिलकुल सटीक बताया की नेहरू और उनकी माँ एकदूसरे को बेहद पसंद करते थे मगर फिजिकल रिलेशन नहीं थे . कहा तो ये भी जाता हे की नेहरू को सेकुलर राष्ट्र बनाने से रोकने के लिए एक सन्यासिन ————– जिससे ———– ? खेर बात ये हे की क़ाम तो एक बड़ी समस्या रहा ही हे कुछ लोग इसका हल दमन को तो कुछ सब कुछ फ्री को इसका हल बताते रहे मगर हल नहीं मिला दमन बताने वाले किस कदर येड़ा बनकर पेड़ा खाने वाले हुए ये तो शीशे की तरह साफ़ हे ही मेरे एक दोस्त का दोस्त फाइव स्टार होटल में था अल्लाह ही जाने क्या सच था वो कहता था की उसने मुसलमानो की एक बहुत बड़ी हस्ती —
    को ————–उधर फ्री बताने ओशो टाइप के आश्र मो में उन्ही के चेले चेलिया गर्भपात से लेकर रेप तक पर किताबे लिख रहे हे गाँधी नेहरू जेसो ने छुपाया नहीं ना किसी का शोषण किया ये महामानव थे ये न दोगले थे न येड़ा बनकर पेड़ा खाने वाले थे बस हो सकता हे की ———————— ? नेहरू की बात करे तो जवानी उनकी जेल और आंदोलनों में गुजरी उसके बाद उनकी बीवी रही नहीं उसके बाद भी बहुत बिजी रहे इंदिरा को देखे हुए दूसरी शादी ना कर सके , मेरे जैसे टुच्चो का हाल तो समाजसेवा का रुझान और छुटभय्येक्रन्तिकारी होने के कारण खतरों को देखते हुए अंदाज़ा लगाया की शादी से दूर रहना चाहिए और वैसे भी बहुत बड़ी फेमली से होने के और हमेशा फेमली के साथ रहने के कारण भी उस हलवाई जैसी हालात हो गयी जिसे मिठाई ( बीवी बच्चे परिवार ) में कोई आकर्षण नहीं दीखता हे लेकिन हे तो हम भी सामान्य आदमी ही जो हमेशा आकर्षण में रहता हे तो हमारे जेसो के लिए क़ाम बहुत बड़ी समस्या रहा हे शादी कर नहीं सकते क्योकि रूचि नहीं हे किसी से झूठा प्यार का नाटक नहीं कर सकते क्योकि बुरे नहीं हे पेड़ सेक्स भी नहीं रुचता किसी तरह चैन नहीं ऊपर से वो लोग जो एक्सरसाइज वगैरह करते हे उनमे और भी ज़्यादा ————————? तो क़ाम तो बेहद समस्या हे ही जैसे एक बार अगर वो लड़की दुनिया को बता देती की देखने में बेहद शरीफ दिखने वाले और हे भी सिकंदर ने ———————-तो शायद शायद मुझे सुसाइड करनी पड़ सकती थी भला हो उसका की उसने किसी को भी कुछ नहीं बताया . तो हम सभी को समझना चाहिए अपने अंदर झांकना चाहिए की काम तो समस्या हे ही महात्मा गाँधी तो महामानव थे जो उन्होंने कुछ भी छुपाया नहीं

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  15. सिकंदर हयात

    एक बात गौर करे तो चाहे वो झाँसाराम हो या ये जो—- या फिर अपनी तेज ( पाल) ठरक में एक अच्छे खासे जमे जमाये पत्रकारिता ग्रुप को डुबो देने वाला , एक बात गौर करे तो तीनो को ही सेक्स की कोई कमी नहीं रही होगी भर भर कर होगा मगर तीनो ने ही कम उम्र कुंवारी लड़कियों पर भी हाथ साफ़ करने के चक्कर में ——————– ? ये सब इन्होने क्यों किया इनके लिए तो सब कुछ तो बढ़िया चल रहा होगा बात यही हे की सेक्स यहाँ बहुत बड़ी समस्या हे यहाँ या तो मिलता नहीं हे , या भर भर कर मिलता हे जिन्हे नहीं मिलता वो तो कुंठित होते ही हे तो जिन्हे मिलता हे वो भी बोर होकर नया नया नया चाहते हे और फिर ——- ? ऊपर तीन ठरकियो की बात करे तो तीनो ने ही भर भर कर सेक्स मौजूद होने के बाद भी जो किया , बात यही हे की इन तीनो को किसी ना किसी ने जरूर बताया होगा की अरे हमने तो कुंवारी ————- ——- अरे मेरे पीछे पड़ गयी थी —————– अरे बहुत ——————–तो ये सब इन्होने सूना होगा और . बात ये भी हे की किसी के भी सेक्स अनुभवों को कभी भी सौ फीसदी सच मानकर ही ना चले इनमे बहुत कुछ तीर तुक्का खट्टा मीठा आधा सच आधा झूठ गप्पे शप्पे होते ही हे . लोग किसी की भी बातो सेक्स दावों को शर्तिया सच मानकर ना चले ये पॉइंट भी हमेशा याद रखे————————————————————————————–Arvind Varun
    27 August at 09:31 ·
    आखिर कैसे कुछ लोग अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं?
    गुरमीत राम रहीम प्रकरण को ही लीजिए।
    साध्वी तो जानती थी कि गुरमीत कितना खूंखार अपराधी है और किस तरह उसके चरणों में बड़े-बड़े राजनेता पोंछा लगाते हैं, लेकिन वह नहीं झुकी। उसे अपना भाई खोना पड़ा,परंतु भाई की हत्या के बाद भी वह नहीं टूटी। वर्षों चली जांच और अदालती कार्रवाई में वह कभी पीछे नहीं हटी। कल्पना कीजिए, उसे शांत कर देनेे के कौन-कौन से तरीके अपनाये गए होंगे।
    रामचंदर छत्रपति को किसी बड़े अखबार का साया प्राप्त नहीं था। वह पूरा सच नामक एक छोटा अखबार निकालते थे। लेकिन दिल इतना बड़ा था कि साध्वी के जिस पत्र को छापने का साहस कोई बड़ा अखबार नहीं दिखा सका, उसे प्रमुखता से छापने के साथ गुरमीत राम रहीम के काले कारनामों का एक-एक कर उद्भेदन करने लगे। इस दौरान कितना दबाव, कितना प्रलोभन, कितनी धमकियां इन्हें मिली होंगी, लेकिन सच का दामन छोड़ने का नाम नहीं लिया। सीना छलनी करवाना मंजूर किया, परंतु पूरा सच सामने ला दिया।सीबीआई डीएसपी सतीश डागर। खूब जानते थे कि वह जिसके खिलाफ सबूत जुटा रहे है, उसकी चरण वंदना में किस तरह पूरा सत्ता प्रतिष्ठान हर पल समर्पित है। लेकिन कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इतने पुख्ता सबूत जुटा दिए कि अपराधी का बच पाना असंभव हो गया। नौकरीपेशा लोगों की एक सीमा होती है। इस लिहाज से सोचिए कि कितना और किस तरह का जानलेवा दबाव इन्हें झेलना पड़ा होगा। लेकिन टस से मस नहीं हुए।
    जिस किशोर बेटे के बाप को छलनी कर दिया गया था, उस अंशु छत्रपति की परिस्थितियों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। पिता रामचंदर छत्रपति के हत्यारे गुरमीत के खिलाफ लड़ पाना इस नौजवान के लिए इकट्ठे सत्ता, शासन और समाज के एक भांग खाये हिस्से से अकेले लोहा लेना था। लेकिन अब भी इन सबसे सामने अंशु एक अटूट चट्टान की तरह खड़ा है।आखिर कौन सा वह तत्व है जो किसी आम आदमी को भी इतना मजबूत बना देता है कि बिना किसी डर-भय के वह अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है?इस तत्व को आत्मसात करने वाली भारत की इन संतानों के आगे नतमस्तक हो जाना एकदम स्वाभाविक है ।Arvind Varun————————————————————————————-Surya Pratap Singh
    9 hrs ·
    एक बाबा के ‘फ़र्श से अर्श’ तक की कहानी के पीछे ३ हत्याओं/मौत के हादसे क्या कहते हैं ?
    अमेरिका में पढ़ी-लिखी प्रसिद्ध लेखिका प्रियंका पाठक-नारायण ने आज देश के प्रसिद्ध योगगुरु व अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति, बाबा रामदेव की साइकिल से चवनप्रास बेचने से आज के एक व्यावसायिक योगगुरु बनने तक की कथा अपनी निम्न किताब में Crisp facts/प्रमाणों सहित लिखी है। इस पुस्तक में बाबा की आलोचना ही नहीं लिखी अपितु सभी उपलब्धियों के पहलुओं को भी Investigative Biography के रूप में लिखा है। इस पुस्तक में सभी तथ्य बड़े सशक्त ढंग से लिखे है , कुछ भी ऐसा नहीं लगता जिसे बकवास कहकर दरकिनार कर दिया जाए, प्रथम धृष्टता ऐसा भी नहीं लगता कि यह किसी मल्टीनैशनल द्वारा प्रायोजित किताब है। वैसे बाबा रामदेव ने कोर्ट के injunction order से प्रकाशक को यह स्थगन दिलवाया हुआ है कि अब इस पुस्तक की कोई नई कॉपी न छापी जाए।
    ज़रूरी नहीं कि इस पुस्तक में सभी बातों पर विश्वास किया जाए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बाबा रामदेव का क़द बहुत बड़ा है और राजनीतिक/ सामाजिक रसूक़ भी बहुत बड़ा है, अतः जनमानस को उनके बारे में जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। किताब है :
    “Godman to Tycoon : The Untold Story of Baba Ramdev by Priyanka Pathak-Narain”
    इस किताब में तीन हत्याओँ/ मौतों का विस्तार से परिस्थितियों व शंकाओं का प्रमाण सहित ज़िक्र किया है:
    १- बाबा रामदेव के ७७ वर्षीय गुरु शंकरदेव का ग़ायब होने से पूर्व बाबा रामदेव का एक माह तक विदेश में चले जाना। दिव्य योगपीठ ट्रस्ट की सभी सम्पत्ति शंकरदेव के नाम थी, जी अब बाबा रामदेव के पास है। (CBI की जाँच अत्यंत मद्धम गति से जारी है)
    २- बाबा रामदेव को आयुर्वेद दवाओं का लाइसेंस देने वाले स्वामी योगानंद की वर्ष २००५ में रहस्मयी हत्या।
    ३- बाबा रामदेव के स्वदेशी आंदोलन के पथ प्रदर्शक राजीव दीक्षित की वर्ष २०१० में संदिग्ध मौत।
    मैं इस किताब का प्रचार नहीं कर रहा… लेकिन इसको पढ़कर आपको कुछ शंकाओं का निराकरण तो अवश्य होगा कि कैसे योग ने राम कृष्ण यादव को बना दिया बाबा रामदेव….. धर्म के नाम पर तेज़ी बढ़े बाबा के व्यापार पर ED/IMCOME TAX की भी नज़र है।
    गुरु शंकरदेव की रहस्यमयी गुमशुदी के साथ-अन्य दो हत्याओं/मौतों को भी CBI के दायरे में लाना उपयुक्त होगा ….. राम रहीम पर आए कोर्ट के निर्णय से आम लोगों को अन्य ढोंगी बाबाओं पर भी सिकंजा कसने का विश्वास जगा है। CBI को उक्त जाँच में भी शीघ्रता कर दूध का दूध व पानी का पानी अवश्य करना चाहिए … वैसे उ.प्र. मी भी नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में बाबा को 455 एकड़ भूमि अखिलेश यादव ने दी थी, उसकी जाँच भी ज़रूरी है।
    नोट: कुछ लोगों ने मुझे फ़ोन कर यह आगाह किया है / चेतावनी दी है कि बाबा रामदेव के बारे में और न लिखें, क्यों कि इनके पास धनबल के साथ अन्य सभी बल हैं। सभी बड़ी मीडिया कम्पनीओँ को इतने विज्ञापन/ धन बाबा रामदेव से मिलते हैं कि कोई उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं करता।
    संलग्न न्यूज़ भी पढ़ें Surya Pratap Singh
    9 hrs · http://www.hindi.indiasamva

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    सिकंदर हयात सिकंदर हयात • 13 hours ago
    Girish Malviya
    14 hrs ·
    पतंजलि ओर देश भर की भाजपा सरकारो का गठजोड़ कितना भयानक है कि ,उत्तराखंड में अब पैदा होने वाली जड़ी बूटियों का खरीद मूल्य की घोषणा अब उत्तराखंड की सरकार नही करेगी बल्कि अब से जड़ी बूटियों का दाम बाबा रामदेव के स्वामित्व वाली पतंजलि तय करेगी, यह राज्य सरकार की घोषणा है
    एक समय इसकी शुरुआत जब हुई जब भाजपा सरकारो ने बेभाव से सरकारी जमीने पतंजलि को अलॉट करना शुरू कर दी थी अब यह भाजपा सरकारो ओर पतंजलि के गठजोड़ का यह अगला दौर है उत्तराखंड सरकार ने यह घोषणा की है कि राज्य मे जो टूरिस्ट सेंटर बंद पड़े हैं उनका संचालन भी पतंजलि को सौंप दिया जाएगा,
    हर न्यूज़ चैनल पर देखे तो पतंजलि के तरह तरह के उत्पादों के विज्ञापन भरे हुए है, ये विज्ञापन उन्ही को दिए जा रहे हैं जो मोदी सरकार के पक्ष में बात करते हैं, पतंजलि को धीरे धीरे स्वतंत्र मीडिया को दबाने के टूल के रूप मे इस्तेमाल किया जा रहा हैंGirish Malviya

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    सिकंदर हयात सिकंदर हयात • 2 minutes ago
    Dilip C Mandal added 2 new photos.
    3 hrs ·
    आप में से कितने लोगों को आठ महीने पुरानी यह खबर याद है. 27 दिसंबर, 2016 की यह लगभग हर अखबार में पहले पन्ने पर छपी थी. और चैनलों में प्रमुखता से चली थी.
    नोटबंदी के बाद हर दल ने अपना कैश बैंक में जमा कराया. बीएसपी ने भी कराया. बीएसपी के पैसे पर इनकम टैक्स की निगरानी लगा दी गई. पैसा बैंक में फंस गया.
    अखबारों ने यह सब कुछ इस अंदाज में छापा मानो काला धन पकड़ा गया हो.
    यह सब यूपी चुनाव के दौरान हो रहा था.
    बीजेपी ने यूपी चुनाव अपने अथाह पैसे से लड़ा. यह हजारों करोड़ का चुनाव था.
    चुनाव बाद इनकम टैक्स विभाग ने कहा कि बीएसपी के पैसा जमा कराने में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई.
    चुनाव आयोग ने 4 मई, 2017 को कहा कि बीएसपी ने पैसा जमा करके कुछ भी गलत नहीं किया है. अब वह रकम निकाली जा सकती थी.
    लेकिन तब तक तो खेल खत्म हो चुका था.
    बीजेपी की राजनीति को राजनीति विज्ञान नहीं, अपराधशास्त्र के नजरिए से समझिए.
    बीजेपी के शिखर पर इस समय नेता नहीं, छंटे हुए अपराधी है. उनका दिमाग अपराधियों की तरह ही काम करता है.
    See TranslationDilip C Mandal
    11 hrs ·
    नोटबंदी अपने उद्देश्यों में सफल रही है. यूपी चुनाव में बीजेपी के 32 हेलीकॉप्टर्स के मुकाबले सपा+बसपा+कांग्रेस के 5 हेलीकॉप्टर थे. बीजेपी ने बाकी दलों से दस गुने से भी ज्यादा खर्च किया.
    बैनर, पोस्टर, गाड़ियां, अखबारों में फुल पेज के विज्ञापन, टीवी विज्ञापन, रैलियों में बसों से लोगों को लाना, वोट मैनेजरों और समाज के असरदार लोगों को पैसे बांटना, बूथ मैनेजमेंट….हर खेल में बीजेपी ने विरोधियों को पटक-पटक कर मारा और विरोधी रो भी नहीं पाए कि हमारे पास खर्च करने के लिए, पैसा नहीं है.
    करोड़ों रुपए तो बीजेपी ने अखबारी विज्ञापनों पर खर्च कर दीजिए. इसके मुकाबले सपा और बसपा के विज्ञापन देख लीजिए. आपको अंदाजा हो जाएगा कि मुकाबला किस कदर गैर-बराबरी का था.
    और क्या चाहिए?
    दो लोकसभा चुनावों के बीच सबसे बड़ा चुनाव यूपी का विधानसभा चुनाव ही होता है. बीजेपी की नोटबंदी वाली रणनीति कामयाब रही.
    यूपी का हर आदमी जानता है कि सपा और बसपा ने कंगालों की तरह यह चुनाव लड़ा. पैसा रहा होगा, लेकिन बैंक से निकालने की लिमिट लगी हुई थी. वहीं, बीजेपी तैयारी करके बैठी थी.
    अब इस चक्कर में कई लोग लाइनों में मर गए तो बीजेपी क्या करे. आदमी की जिंदगी की बीजेपी की नजर में क्या औकात है, यह आप गुजरात से लेकर गोरखपुर तक में देख चुके हैं.
    बीजेपी ने नोटबंदी की तैयारी कर ली थी. बीजेपी के नेता कहीं-कहीं नए नोटों के बंडल के साथ पकड़े भी गए. यह लोकल पुलिस वालों की बेवकूफी से हुआ.
    बीजेपी नेताओं तक नए नोट पहुंचा दिए गए थे.
    बीजेपी ने अपना काफी पेमेंट एडवांस भी कर लिया था.

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  16. सिकंदर हयात

    Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    7 hrs · Dehra Dun ·
    मनसा , वाचा ,कर्मणा अहिर्निश राम नाम सुमिरने वाले वृद्ध वैष्णव की हत्या को समर्थन देने वाली विचार धारा यदि भारत जैसे महान गण तंत्र में आज सत्तारूढ़ है , तो यह कांग्रेस के भीषण पतन के कारण ही घटित हुआ है । जिस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को गांधी ने एक दब्बू और सुधारवादी संगठन से उठा कर एक क्रांतिकारी समूह में रूपांतरित कर दिया , वह भ्रष्टाचार , अय्याशी और कदाचार में यूं फंस गई कि जनता को निकृष्ट विकल्प ही सूझा । भेड़ियों के झुंड में फंसा हिरन कभी कभी घबराहट और प्राण रक्षा की त्वरा में खन्दक अथवा अंधे कुंएं में कूद जाता है । 2014 में यही हुआ ।
    ऐसा नहीं कि भारतीय जन मानस साम्प्रदायिकता या सामूहिक हिंसक सन्निपात के खतरों से वाकिफ नहीं है । लेकिन एक हिंसक – साम्प्रदायिक समूह अवसर मिलने पर ही अपने मन की करता है , जबकि भ्रष्टाचार की लपट पूरे समाज को प्रतिपल झुलसाती है । भ्र्ष्टाचार का प्रतिफल केवल सार्वजनिक धन की चोरी तक सीमित नहीं है । बल्कि भ्रष्टाचारी मंहगाई बढाता है । अश्लीलता और अनैतिकता की गंध फैलाता है । याद है कुछ वर्ष पहले की वह वीडियो क्लिप , जिसमे एक 85 साल का कांग्रेसी खूसट भारत के राजचिन्ह अंकित पलँग पर चित लेट कर एकाधिक औरतों के साथ लैला मजनू का खेल खेल रहा है ? वह उन पर हर रात लाखों लुटाता था । वह लाखों रुपये क्या वह अपनी पेंशन या वेतन से ख़र्चता होगा ? ज़ाहिर है कि वह भ्रष्टाचार का पैसा था । भ्रष्टाचार का रावण सहस्त्र बाहु होता है । उसके अनेक रूप होते हैं । अतः राष्ट्र पिता की जयंती पर संकल्प लें , कांग्रेस को ठोको ( सुधारो ) और फिर भाजपा को रोको ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    16 hrs ·
    चूंकि हम हिंदुओं अथवा सनातनियों की धर्म श्रृंखला सर्वाधिक पुरातन है , अतः इसमे वैज्ञानिक , समाज शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक प्रामाणिकता का पुट न्यूनतम है । रामायण अथवा महाभारत जैसे हमारे धर्म ग्रन्थ अमिधा , लक्षणा एवं अभिव्यंजना से परिपूर्ण हैं । विश्व साहित्य में उनका कोई जोड़ नहीं । लेकिन इसके बावजूद वे शुद्ध साहित्य हैं , कथा गल्प हैं । इतिहास हरगिज़ नहीं । काल्पनिक कथा होने के कारण इनके पूज्य पात्र अविश्सनीय और कभी कभी हास्यास्पद हो जाते हैं ।
    अन्य प्रचलित धर्मों के साथ यह समस्या या तो है ही नहीं , अथवा न्यूनतम हैं । क्योंकि उनका सृजन निकट अतीत में हुआ है , जब ज्ञान विज्ञान और इतिहास तत्व का प्रारम्भ हो चुका था ।
    ऐसे में हम हिन्दू क्यों न परम् पावन , जगद्ग वरेण्य महात्मा गांधी को अपना पैगम्बर माने , जिनका शुभ जीवन और चरित्र किसी भी धर्म के मसीहा से उन्नीस नहीं है । उनके जीवन से अधिक उनकी मृत्यु में देवत्व का आलोक है । विश्व के अप्रतिहत साम्राज्य को धूल चटाने के बाद वह एक सामान्य , लुच्चे तथा नराधम हत्यारे के हाथों राम नाम भजते कीर्ति के स्यंदन पर बैठ परम् पिता के लोक को प्रस्थान किये । काश बाल्मीक या तुलसी जैसा कोई महा कवि गांधी चरित मानस का महा काव्य रचे ।————————–Shambhunath Shukla
    Yesterday at 10:22 ·
    मैं उन 31 प्रतिशत लोगों की कतार में नहीं हूँ जिन्होंने भाजपा को वोट दिया था। न तब मैंने कांग्रेस को वोट दिया था क्योंकि नियमतः और सैद्धांतिक रूप से मैं कांग्रेस के खिलाफ हूँ। मुझे कांग्रेस सदा से ही दलाल पूंजीपतियों की पार्टी लगी जिसने इज़ारेदार पूंजीवाद को बढ़ावा दिया। हालांकि कांग्रेस की तुलना में मुझे पूर्ववर्ती जनसंघ या भाजपा बेहतर लगी क्योंकि उसकी दृष्टि प्रगतिशील पूंजीवादी रही है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मैंने बसपा को वोट दिया था। बसपा सुप्रीमो मायावती भ्रष्ट भले हों मगर लोक कल्याण की भावना से वे ओतप्रोत हैं। किंतु जीती भाजपा तो मुझे लगा कि अब यह तो लोकतंत्र का खेल है। एक पार्टी हारेगी तो एक जीतेगी भी। लेकिन 3 साल 4 महीने की इस भाजपाई मोदी सरकार ने जो जनविरोधी फैसले किए हैं उससे तो लगता है मनमोहन सरकार ही ठीक थी। एक भी काम समय पर नहीं ऊपर से मंत्रियों के अहंकार का लेबल इतना हाई है कि कोई पत्रकार सवाल पूछे तो पीयूष गोयल डांट देते हैं कि अंग्रेजी समझ में नहीं आती? यह डांट भी उन्होंने उस पत्रकार को पिलायी जो खुद एक बड़े अंग्रेजी दैनिक की वरिष्ठ संपादक है। निर्मला सीतारमण किसी से मिलती तक नहीं हैं। सुना गया है कि एक दिन उन्होंने भारतीय मूल के एक बड़े विदेशी निवेशक को आधा घण्टा बैठाए रखा और वह निवेशक भी महिला थी। जो संज़ीदा मंत्री हैं उनकी कद्र नहीं है। राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मनोज सिन्हा जैसे समझदार मंत्री खाली बैठे हैं।
    नोटबंदी और जीएसटी से व्यापार ठप है। छोटे दुकानदार तक परेशान हैं। एक दिन एक मोदी स्टोर वाले ने बताया कि हम छोटे व्यापारी हैं, हमारे पास दस और पांच के सिक्के खूब आते हैं। जिन्हें न बैंक लेता है न रिटेलर। ऊपर से जीएसटी। हमें समझ नहीं आता किस चीज को किस दर से बेंचे। मैं खुद हर वर्ष दो अक्टूबर के बाद कनाट प्लेस के खादी ग्रामोद्योग भवन से कपड़े ले आया करता था क्योंकि वहां 20 प्रतिशत छूट मिलती थी। इस बार छूट तो दूर खादी पर 5 प्रतिशत जीएसटी ऊपर से है। हर जगह लूट-खसोट और भयभीत कर देने वाला माहौल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या तो इस अराजकता पर काबू नहीं कर पा रहे या उन्हें उनकी चौकड़ी ने कन्फ्यूज कर रखा है। जिस आदमी का बचपन रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते गुज़रा हो उसे इतना तो संवेदनशील होना चाहिए कि वह गरीब आदमी का कष्ट समझ सके। अब तो मुझे लगने लगा है कि इस सरकार से तो पप्पू सरकार अच्छी होगी।

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  17. सिकंदर हयात

    Ila Joshi
    10 hrs ·
    जिसे प्रेम मिलता है वह इस बात को समझ ही नहीं पाता कि सामने वाला उसको कितना प्रेम करता है। वह अपनी ही धुंध और नशे में होता है। वह समझता है यह मेरी खासियत है जिससे मुझे प्रेम मिल रहा है। पर वह सिर्फ उसकी ही खासियत नहीं होती। प्रेम करने वाले की खासियत होती है।
    प्रेम करना काबिलियत है। विश्वास देना गुण है। प्रेम ग्रहण करना भी काबिलियत है। जो मिल रहा है उसे श्रद्धा से, आदर से सिर झुका के ग्रहण करना चाहिए तभी वह आपको अपनी पूर्णता में मिलता है। जो डूबना नहीं जानता वह प्रेम की इस अगाध और अबाध वर्षा से भी सूखा निकल आता है।
    Sandhya Navodita ने ये जो लिख दिया है न ये हम सबके हिस्से का सच है—–Sandhya Navodita

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  18. सिकंदर हयात

    Indians for sexual Liberties लक्श्मन सिन्घ देव
    7 hrs ·
    #मानो या न मानो वास्तविकता यही है समाज की#
    1. अकेली रहती है! मतलब साथ(सेक्स) कि जरूरत तो होगी ही, ट्राय तो मार मौज़ करने के लिए बेस्ट ऑप्शन है।
    2. बाहर रहकर पढ़ी है मतलब घाट-घाट का पानी हुई है। पक्का कैरेक्टरलेस है। हाथ रखते ही तैयार हो जाएगी। ऐसियों का क्या….
    3. दिल्ली में रहती है मतलब खुली होगी। मेट्रो सिटीज़ में रहने वाली लड़कियां तो बहुत खुली {रंडी} होती हैं, पता नहीं कितनों के साथ सो जाए। यहाँ खुली का मतलब सेक्स के लिए हमेशा आसानी से उपलब्ध रहने से है।
    3. गाँव की है, सीधी होगी। मतलब इसको आसानी से बेवकूफ़ बनाकर यूज़ कर सकते हैं। छोटे शहर की है! मतलब चालू होगी।
    4. ब्रेकअप हो गया है! मतलब रोती लड़की को विश्वास देकर सेक्स की जुगाड़ की जा सकती है।
    5. पहले बॉयफ्रेंड ने चिट किया है! ओह्ह बेबी मैं ऐसा नहीं हूं, दुनिया से अलग हूँ। यार चिट हुई लड़कियों को यूज़ करना औऱ आसान है। सिली गर्ल्स……
    6. नीच जात की है! यार ये चमारिनें होती बहुत बेवकूफ़ हैं। मैं जाति को नहीं मानता, शादी करूँगा बस इतने में तो तन-मन-धन से समर्पित हो जायेंगी।
    7. काली है! ओह्ह….यार रंग से कुछ नहीं होता काला रंग तो बहुत खूबसूरत होता है। यार उस कलूटी को ऐसे नहीं बोलूंगा तो बिस्तर तक कैसे आएगी।
    8. सेल्फ डिपेंड है! इमोशनल फुल बनाकर सारी अय्याशी करने का बढ़िया ऑप्शन है। इंडिपेंडस और बराबरी की बात कर देख कैसे नीचे करती है।
    9. तलाकशुदा है ! विधवा है! यार कंधा ही तो देना है बस वो पैर खोलने की लिए तैयार मिलेंगी।
    10.अभी स्कूल में पढ़ रही है! लगती तो एकदम माल है, गोटी सेट करनी पड़ेगी।
    ये वो लोग जो गिरगिट से जादा रंग बदलने में विश्वास रखते है।
    और कपड़ो से ज्यादा girlfriend बनाने में एक्सपर्ट होते है।
    और लड़की न मिले तो गाँव से लेकर शहर तक उसे बदनाम करने का ठेका ले लेते है।
    और कुछ चंपू typ इनकी हा में हा मिलाते रहते है
    जैसे अपनी बहनों की दलाली करते है वैसे ही दूसरों की करने में तत्पर होते है।
    बातें चाहे जितने तरीके से हों….. केंद्र में बस ” सेक्स” है। ऐसे ही नहीं हर दिन रेप हो रहे, ये रेप की तैयारी तो हरपल हो रही है। नाभि के ठीक तीन इंच नीचे केंद्रित रहने वाला भारतीय समाज…..
    #यौन_कुंठित_समाज

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